Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 441–450

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 441–450

पृष्ठ 441

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनह्न ब्राह्मण से प्रजा प्रतिष्ठित रहती है । यदि राजा ही प्रतिष्ठित नहीं है तो फिर प्रजा की प्रतिष्ठा कैसे रह सकती है? सोम राजा है, अध्वर्यु ' वगैरः उसकी प्रजा हैं । अतएव अध्वर्यु को चाहिए कि वह राजा की प्रतिष्ठा को सुरक्षित रक्खे । राजा के लिए मामूली पोशाक नजर करना - मामूली बिछायत करना - राजा की बेइज्जती करना है | उसकी बेइज्जती से प्रजारूप इस यजमान की भी बेइज्जती होती है । अतएव उसे चाहिए कि यह सोमोपनहन वस्त्र बहुमूल्य ही लाए । “ यो हैनं शोभनेन उपचरति, शोभते " - इति । जो मनुष्य सोम के लिए चाहे जैसा मामूली वस्त्र ही उपयोग में लाता है वह स्वयं यत् किचित् हो जाता है । अर्थात् सोम के साथ वह भी मामूली मनुष्य ही रह जाता है । उसकी जरा भी प्रतिष्ठा नहीं रहती । श्रतएव जो बहुमूल्य वस्त्र हो, वही सोमोपनहन होना चाहिए । सोमोपनहन सोम की पोशाक है । इसे मामूली पोशाक रखने से यजमान स्वयं पतित हो जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— जो मनुष्य सोचता है कि अरे बाबा, बहुमूल्य वस्त्र की क्या आवश्यकता है— रखना तो इस पर सोम ही है अतएव चाहे जैसे मामूली वस्त्र को सोमोपनहन बना देना चाहिए, वह स्वयं प्रतिष्ठा से च्युत हो जाता है, यत्किचित हो जाता है । ऐसा न हो कि हम अपनी पोजीशन ( स्तर, पद ) से न गिर जाएँ अतएव जो वस्त्र बहुमूल्य हैं वही सोमोपनहन होने चाहिए । जिस पर सोम रक्खा जाता है, उसका नाम है सोमोपनहन एवं शकट के चारों ओर जिस वस्त्र का पर्दा लगाया जाता है उसका नाम सोमपर्यागहन है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि सोमपर्यारणहन के लिए ये नियम नहीं हैं । वह मामूली भी हो सकता है । वह तो पर्दा है । पर्दा भी बेशकीमती ही हो, इसकी जरूरत नहीं है । पोशाक जरूर बेशकीमती होनी चाहिए । सोमपर्यारणहन तो चाहो जैसा कर सकते हो । “ अथ य ग्रह यदेव किञ्चेति ( सोमोपनहनम् ) यद्धेव किं च भवति ( स-मनुष्यः ) तस्माद्यदेव शोभनं तत् सोमोपनहनं स्यात् । यदेव किं च सोमपर्याणह-नम् ( नात्र सोमोपनहनवन्नियम इति भावः ) ॥३ ॥

तीसरी चीज है उष्णीष । उष्णीप पगड़ी का नाम है । इसमें दोनों ओर जरी के पल्ले होते हैं । इससे बिखरी हुई सोम - लता को इकट्ठी कर बाँधा जाता है । सोम राजा है उसके लिए बाँधने का शब्द बुरा है अतएव उष्णीष शब्द का प्रयोग किया है । उष्णीष बाँधना बुरा नहीं कहलाता । उष्णीष बाँधना तो एक प्रकार से राजा के मस्तक पर मुकुट रखना है । उष्णीष जरा कीमती चीज है । यदि यह समय पर न मिले तो दूसरी चीज भी ली जा सकती है परन्तु जहाँ तक हो सके उष्णीव ही लाना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि यदि इस काम के लिए उष्णीष मित्र जाए तो उष्णी ही को लेना चाहिए । अच्छा तो बस यही है । यदि कारणवशात् उष्णीष प्राप्त न हो सके तो जिस वस्त्र को लपेटा जाता है, जिसका कि नाम सोमपर्याहरणन हैं, उसमें से २ अंगुल चौड़ी अथवा ३ अंगुल चौड़ी लीर फाड़ लेनी चाहिए । यह कर्तित वस्त्रांश ही उष्णीष के स्थान में मान लिया जाता है । तात्पर्य यही है [ ४३१ ]

पृष्ठ 442

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनहन ब्राह्मण कि यदि समय पर पगड़ी न मिल सके तो सोमपर्याहरान में से दो - तीन अंगुल चौड़ी, जितनी कि सोम-वल्ली बँधने में उपयुक्त हो, फाड़ लें । यही पगड़ी मान ली जाती है । " द्युष्णीषं विन्देत् - उष्णीषः स्यात् यद्युष्णीषं न विन्देत् सोमपर्याणहन-स्यैव द्वयगुलं वात्र्यङ्गुलं " वावकृन्तेदुष्णीषभाजनम् " । जितनी बड़ी पगड़ी होनी चाहिए उतनी ही बडी लीर होनी चाहिए । यही उष्णीषभाजनम् का तात्पर्य्यं है । सोमोपनहन सोमराजा की पोशाक है । इसे मामूली प्रादमी नहीं ले जा सकता । ग्रध्वर्यु अथवा यजमान - ये दो ही मनुष्य इसे ले जाने के अधिकारी हैं । परन्तु सोमपर्यारणहन कोई भी ले जा सकता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" श्रध्वर्युर्वा यजमानो वा सोमोपनहमादत्ते । य एव कश्च सोमपर्यारण-हनम् ॥४ ॥

इसके अनन्तर प्राचीन वंश के ( पूर्व - पश्चिम जो ऊपर की थूणी है - उसी का नाम प्राचीन वंश है ) अग्रभाग में अर्थात् पूर्व की ओर सोम राजा की छाँट करते हैं । प्राचीन वंश के आगे सोमवल्ली रक्खी रहती है । उसे साफ करते हैं, उसमें जो अनुपादेय प्रश आ गया है, उसे निकाल देते हैं, यही तात्पर्य है । " प्रथाग्रेण राजानं विचिन्वन्ति । एवं उस क्रय - स्थान में, जहाँ से कि सोम खरीद कर लाया जाएगा, वहाँ पानी से भरा हुआ घड़ा रक्खा रहता है । एवं वहीं उस घड़ के पास ही सोम बेचने वाला नियत ब्राह्मण बैठा रहता है । पानी से सोमवल्ली साफ की जाएगी । बाद में उसके अशु बनाये जाएँगे । अतएव वहाँ पानी का घड़ा भी रहना चाहिए एवं उसी स्थान पर सोमविक्रयी ब्राह्मण को मौजूद रहना चाहिए । “ तवुदककुम्भ उपनिहितो भवति तद् ब्राह्मण उपास्ते । " उस स्थान पर ऋत्विग् लोग प्राङ्मुख होकर, अर्थात् जहाँ कि घट रक्खा है उधर की ओर मुंह करके, सोम लेने के लिए जाते हैं— " तदभ्यायन्ति ( प्रत्यभिगच्छन्ति ) प्राञ्चः ( सोमऋय प्रदेशाभिमुखाः सन्तः - इति भावः ) " ॥५ ॥

सोम वाक् द्वारा लाया जाता है । वही सोम वाक् में विभक्त रहता है जो कि वाक् पृथिवी-पृष्ठ से ३३ अहर्गण तक वितत रहती है । इस वाक् में कुल सात छन्द हैं । वाङमण्डल का नाम ही संवत्सर - मण्डल है । इस संवत्सर - मण्डल में कुल ७ छन्द हैं । पृथिवी के त्रिवृत पृष्ठ तक अर्थात् ε अहर्गण तक तो गायत्री छन्द है । बाद में पञ्चदश तक त्रिष्टुप् छन्द है । एकविंश तक जगती छन्द है एवं इन्हीं में उष्णिक् - अनुष्टुप् - बृहती - पंक्ति - ये चार छन्द और हैं । इस प्रकार ७ छन्द हो जाते हैं । २१ के ऊपर रहने वाला सोम इन सात छन्दों में विभक्त रहता है । सातों छन्दों का स्वरूप सर्वथा पृथक् - पृथक् है । सातों का प्रारण भिन्न भिन्न है । एक ही सोम को सात भागों में विभक्त होना पड़ता है । [ ४३२ ]

पृष्ठ 443

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तृतीय काण्ड ( ग्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनहन ब्राह्मणं एक के सात टुकड़े हो जाते हैं । इस प्रकार प्रकृति - मण्डल में वाग् द्वारा लाया गया एकरूप सोम यहाँ आ कर गायत्री आदि छन्द - भेद से कई विभागों में विभक्त हो जाता है । प्रकृति यज्ञ के अनुसार ही मानुष यज्ञ का वितान होता है अतएव समूह रूप से आया हुआ जो सोम है, उसे यहाँ भी गायत्र्यादि देवतानुसार अलग - अलग विभक्त करना पड़ता है । सोमवल्ली इकट्ठी ही, एकरूपा ही यहाँ आती है । उस समष्टि को ही खरीद लिया जाता है । बाद में देवतानुसार बेलड़ी ( वल्ली ) को काट - काट कर उसके विभाग किये जाते हैं । क्यों कि प्रकृति में भी तो पहले सोम समष्टि रूप से ही प्रा जाता है, बाद में विभाग होता है । सोम राजा है, इसे काटना बड़ा अनर्थ है । परन्तु क्या करें, काटना पड़ता ही है । बिना काटे यज्ञ हो नहीं सकता । देवता- विभाग से पहिले इसके विभाग अवश्य ही करने पड़ते हैं । परन्तु यह काटना, काटना नहीं है, अपितु सोम को राजा बनाना है । राजा प्रजा का होता है । यदि प्रजा नहीं तो राजा, राजा ही नहीं रहता । एक रियासत के यच्चयावत् मनुष्यों को आप बाहर निकाल दीजिए देखें राजा जी कहाँ और कैसे बचते हैं । प्रजा का राजा है । राजा शब्द प्रजा की अपेक्षा रखता है । प्रकृतिमण्डलस्थ सोम, राजा इसलिए कहलाता है कि यह सारा विश्व इसकी प्रजा है । परन्तु इस प्रजा का निर्माण तभी होता है जब सोम विभक्त हो कर नीचे फैलता है । यदि विभक्त न होता - एकरूप ही रहता तो सृष्टि ही न बनती । नानाभाव में परिणत होने पर ही सृष्टि बनती है । हमारा कान, नाक से अलग है, भिन्न शक्ल का है । नाक, आँख से नहीं मिलता । पैर हाथों से नहीं मिलते । हाथ पैरों से नहीं मिलते । सबका स्वरूप भिन्न - भिन्न है । यह सोम - विभाग की ही महिमा है । विभाग ही से प्रजा बनती है । एवं प्रजा बनती है तभी सोम सम्राट् कहलाता है । सोम वाङ् मण्डल का अधिपति है परन्तु अधिपति तभी तक है जब तक कि वह स्वयं विभक्त हो कर वाक् - अग्नि में आहुत होता रहता है । जिस दिन इस अग्नि में सोम की प्राहुति न पड़ेगी उस दिन वाङ् मण्डल ही न होगा । जब वाङ्मण्डल ही नहीं रहेगा तो मण्डलेश्वर किस मण्डल की अपेक्षा से मण्डलेश्वर कहलाएँगे? तात्पर्य यही है कि प्रकृति में एकरूप सोम वागग्नि में आ कर जब विभक्त हो जाता है तभी वाक्मण्डल स्थित रहता है । एवं तभी सोम सम्राट् कहलाता है । उसी प्रकृति के अनुसार यह मानुष यज्ञ है । इसमें भी गायत्री श्रादि के हिसाब से जो सोम को काट - काट कर अलग - अलग विभागों में विभक्त करना वह इसे काटना नहीं है । अपितु प्रजा बन कर उस प्रजा का उसे सम्राट् बनाना है, अध्यात्म - प्रजा उत्पन्न कर उसका स्वामी बनाना है । यह तभी हो सकता है जब कि इसके खण्ड किये जाएँ । क्योंकि प्रजा तो नानाभाव को लेकर ही उत्पन्न होती है । यह सब कुछ है परन्तु ग्राखिर सोम काटा जाता है । श्रतएव एक तरह से उसे पीड़ा पहुँचती है । अध्वर्यु यजमान की ओर से सोम से प्रार्थना करता है कि मैं आपको अपने स्वार्थ के लिए नहीं काटता ग्रपितु आपके प्रारूप जो गायत्री छन्द हैं उनके लिए आपका विभाग इसलिए करता हूँ कि ग्राम उनके राजा बने रहें । जब तक आपकी ओर से उन्हें मदद मिलती रहेगी तब तक वे जीवित रहेंगे एवं जब तक प्रजाजन जीवित रहेंगे तभी तक आप राजा कहलाएँगे । तो मै ग्रापके राजत्व को सुरक्षित रखने के लिए ही ग्रापके नाना विभाग करता हूँ । यदि प्रजा एकरूपा होती तब भी कोई बात न थी परन्तु गायत्री आदि प्राणभेद से प्रजा नानारूपों की है [ ४३३ ]

पृष्ठ 444

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतरथ ब्राह्मण सोमोपनहन ब्राह्मण अतएव प्रजानुसार अवश्य ही प्रापको विभक्त करना पड़ता है । इसलिए आप मेरे इस अपराध को क्षमा करेंगे । जिस समय यजमान और ऋत्विक् लोग सोम - क्रय स्थान पर या जाते हैं तो उनके आने के बाद यजमान अध्वर्यु से कहलाता है— " एष ते गायत्रो भाग इति मे सोमाय ब्रूतात् " । हे अध्वर्यु! तुम मेरी ओर से सोम राजा को कह दो कि हे सोमराजा! आपका यह विभाग गायत्र है, अर्थात् गायत्री से सम्बन्ध रखने वाला है । गायत्री आदि जो आपकी प्रजा है उनको तृप्त करने के लिए ही आपका क्रय और विभाग किया जाता है, न कि वध के लिए । हम आपकी हिंसा नहीं करते अपितु गायत्री आदि प्रजा को तृप्त कर आपके साम्राज्य को सुरक्षित रखते हैं, यही तात्पर्य है । " इति मे सोमाय ब्रूतात् " का तात्पर्य्यं यही है कि तुम मेरी ओर से सोम के लिए " एष ते गायत्रो भाग ” यह कह दो । बोलता है यह मंत्र यजमान ही, परन्तु साक्षात् न बोल कर पर्दे की प्रोट से बोलता है | राजा जी सामने बैठे हुए हैं । खवास जी ( सेवारत नापित ) उनके पास बैठे हुए हैं । उनसे राजा जी को सुनाते हुए कह रहे हैं कि हे खवास जी! आप महाराज साहब से कह दीजिए कि हम यह काम प्रापकी प्रजा के सुख के लिए कर रहे हैं, न कि आपको किसी प्रकार का कष्ट पहुँचाना चाहते हैं । बस इसी प्रकार का " एष ते गायत्रो भाग इति मे सोमाय ब्रूतात् " – यह कहना है । चूंकि गायत्री-वत् वाक् में त्रिष्टुप् और जगती आदि छन्द भी रहते हैं अतएव एष ते वे त्रैष्टुभो भाग - इत्यादि कह दिया गया है । " तदायत्सु ( ऋत्विग् यजमानेषु ऋयदेशे समागच्छत्सु - श्रध्वर्यु यजमानम् ) वाचयति । एष ते गायत्रो भाग इति मे सोमाय ब्रूतात् । एष ते त्रैष्टुभो भाग इति मे सोमाय ब्रूतात् । एष ते जागतो भाग इति मे सोमाय ब्रूतात् " । अध्वर्युळे यजमान से परोक्ष भाव से एप ते. ' ' इत्यादि बुलवाता है । गायत्री, त्रिष्टुप् जगती, तीन छन्द मुख्य हैं एवं इस वाङ मण्डल में अनुष्टुप् आदि चार छन्द हो रहे हैं । उनके लिए भी इस सोम का विभाग किया जाता है । अतएव कहते हैं — पंक्ति आदि छन्द हैं नाम जिनके, ऐसों के ऊपर आप साम्राज्य प्राप्त कीजिए । हे अध्वर्यु! आप मेरी तरफ से सोम के लिए यह कह दीजिए । छन्द ही तो सोम की प्रजा हैं । इसलिए " छन्दोनामानां " कहा है । अर्थात् छन्द नाम वाली प्रजा के आप सम्राट् बनाए जा रहे हैं, न कि आपकी हिंसा की जा रही है । ' छन्दोनामानां साम्राज्यं गच्छ - इति मे सोमाय ब्रूतात् ' आपका यह गायत्र भाग है, यह त्रैष्टुप् है - इस प्रकार से कहने की आवश्यकता ही क्या है? इसी का स्पष्टीकरण करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं— क्रीयमाण जो सोम है, वह एकरूप ही खरीदा जाता है अर्थात् सोमवल्ली को विभक्त करके नहीं खरीदा जाता श्रपितु समष्टि रूप से एकरूप ही ख़रीदा जाता है । क्यों कि प्रकृति मण्डल में भी तो एकरूप ही — समष्टि - रूप ही वाक्, सोम को अपने में आहुत करती है । बाद में छन्दों के राज्य के लिए और छन्दों के साम्रज्य के लिए अर्थात् सोम को छन्दों का सम्राट् बनाने के लिए ऋत्विक् लोग अलग-[ ४३४ ]

पृष्ठ 445

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनन ब्राह्मण अलग काटते हैं एवं काट कर उसका रस निकालते हैं क्यों कि प्रकृति - यज्ञ में भी तो दिव्यत्राण - रूप ऋत्विक् लोग उस प्रगत सोम को गायत्री आदि के विभाग से विभक्त कर उसे सारे वाङ् मण्डल का सम्राट् बना देते हैं । तात्पर्य यही है कि हम हिंसा करने के अभिप्राय से सोम के टुकड़े नहीं करते अपितु सम्राट् बनाने के लिए करते हैं । सोम केवल छन्दों के सम्राट् बनाये जाने के खयाल से ही खरीदा जाता है । इसका एकमात्र यही प्रयोजन है कि सोम इनका सम्राट् बन जाए परन्तु इसको जो कूटते हैं, वे इसका नाश ही करते हैं । इसके लिए " एष ते गायत्र " इत्यादि कहा जाता है । " एकं वाऽएष की मारणोऽभिक्रीयते छन्दसामेव राज्याय छन्दसां साम्राज्याय घ्नन्ति वा एनमेतद्यदभिषुण्वन्ति । तमेतदाह छन्दसामेव त्वा राज्याय क्रीणामि, छन्दसां साम्राज्याय न बधाये - इति " । अभी सोम का विभाग किया नहीं है अपितु होने वाले विभाग को लक्ष्य में रख कर ही " एष ते गायत्रः " इत्यादि कह दिया है । इस प्रकार मन्त्र बोल कर वह अध्वर्यु सोम के पास जा कर प्राङ्मुख होकर बैठ जाता है— " अथ एत्य ( सोमम् ) प्राङ, उपविशति ॥६ ॥

इसके बाद वह “ नास्माकोऽसीति " यह बोलता हुआ सोम का स्पर्श करता है । " सोऽभि-मृशति - श्रास्माकोऽसीति " । याज्ञवल्क्य कहते हैं यह सोम आज अपना ही बन जाता है । अब तक इस पर बेचने वाले का अधिकार था परन्तु अब इस पर यजमान का अधिकार हो जाता है— " स्व - इव ह्यस्यैतद् भवति यदागतः तस्मादाह श्रास्माकोऽसीति " । यह सोम दिव्यलोक में रहता है । सोम मृत्युलोक की वस्तु नहीं है, अपितु दिब्यलोक की वस्तु है । दिव्यलोक में भी तीसरे दिव्यलोक की वस्तु है । इसीलिए " तृतीयस्यां इतो दिवि सोम श्रासीत् ' । ( तै ० ब्रा ० १।१।३।१० ) यह कहा जाता है । वही सोम अन्तरिक्ष में आता है । इसी सोम की सूर्य्य में आहुति होती है । जब तक यह सोम दिव्यलोक में रहता है तब तक इसकी ध्रुव, धर्म, धरुण, धर्म्म, ये ४ अवस्थाएँ रहती हैं । परन्तु अन्तरिक्ष में आ कर यही सोम ४० स्वरूपों में परिणत हो जाता है । अन्तरिक्ष में आया हुआ यह सोम ग्रह नाम से व्यवहृत होता है । ग्रह को ही पाश्चात्य जगत् गैस कहता है । ये गैस कुल ४० प्रकार की हैं । इनकी ४० जातियाँ है । इन्हीं के लाखों अवान्तर भेद हैं । उपांशुगवन, उपांशु, अन्तर्याम, शुक्र, मन्वी इत्यादि इन ग्रहों के नाम हैं । ग्रह कुल ४० ही हैं । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है: -[ ४३५ ]

पृष्ठ 446

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तृतीय काण्ड ( अ ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनहन ब्राह्मण

षत्रशांश्च चतुरः कल्पयंतश्छन्दांसि च दधत श्रद्वादशम् ।

यज्ञं विमाय कवयो मनीष ऋक्सामाभ्यां प्र रथं वर्तयन्ति ॥

( ऋग्वेद मं १०।११४।६ ) इन ४० ग्रहों में शुक्र और मन्वी दो ही ग्रह प्रधान हैं । दो में भी शुक्र प्रधान है । सूर्य जिस सोम को अन्तरिक्ष में से खींचता है उसका नाम है शुक्र । एवं चन्द्रमा सम्बन्धी सोम का नाम हैमन्वी । सूर्य और चन्द्रमा दो ही श्राकाश के अधिष्ठाता हैं । एवं दोनों में भी शुक्र ही अर्थात् सौर सोम ही प्रधान है । कहने का तात्पर्य्य यही है कि अन्तरिक्ष सोम का नाम ग्रह सोम है । इसी को गृह्य भी कहते हैं । ये चूंकि ४० हैं अतएव यहाँ भी ४० ही ग्रह किये जाते हैं । प्राकृतिक सोम याग में प्रातःसवन, माध्य-न्दिनसवन, सायंसवन, इन तीन सवनों में ४० ग्रहों की आहुति हो जाती है । उन सब में पहिली आहुति शुक्र ग्रह की होती है । बस, ठीक इसी प्रकार इस सोम - यज्ञ में भी ४० पात्रों में सोम भर लिया जाता है । यही ४० ग्रह कहलाते हैं । इनकी भी उसी प्रकार प्रातःसवनादि क्रम से ग्राहुति होती है । इन सब में पहला चूंकि शुक्र ग्रह है - इसी अभिप्राय से कहते हैं— “ शुक्रस्ते ग्रह्यः ( ग्रहः ) ” अर्थात् हे सोम! आपका पहला ग्रह यह शुक्र ही है । इस मंत्र को बोलते हुए इस सोम- पिण्ड से शुक्र ग्रह का ग्रहण किया जाता है । चूंकि ४० ग्रह होते हैं, अतएव सोम को ४० भागों में विभक्त किया जाता है । सम्पूर्ण सोम के ४० भाग नहीं किये जाते हैं अपितु थोड़ा सा नियमित हिस्सा ले कर उसके भाग किये जाते हैं । शेष सोम उपांशुसवन अन्तर्यामादि कम्मों के लिए छोड़ दिया जाता है । इसके बाद फिर ग्रध्वर्यु बोलता है - " विचितस्त्वा विचिन्वन्तु ” इस सोम से ग्रह - याग होगा- इसमे उपांशुसवन होगा उससे अन्तर्याम होगा । इस प्रकार सोम की छाँट करने वाले पुरुष नियत रहते हैं | उनका काम सिर्फ यही रहता है कि वे कम्र्मानुसार उसे विभक्त कर दें, ऐसे मनुष्य का नाम ' विचित ' रख दिया गया है । अब सोम - विभाग का मौका आ गया है । श्रतएव अध्वर्यु कहता है - है सोम! विचित पुरुष आपका विभाग करे । सर्वत्व के लिए विचिन्वन्त्विति कहा है । एक ही ग्रह नहीं है । एक ही ग्रह का विभाग नहीं करना है, अपितु ४० ग्रहों के लिए विभाग करना है । इन सबके लिए ही विचिन्वन्ति - इस बहुवचन का प्रयोग किया गया है ।

" शुक्रस्ते ग्रह्य इति शुक्रं ह्यस्मात् ( सोमपिण्डात् ) ग्रहं ग्रहीष्यन् भवति ।

विचितस्त्वा विचिन्वन्त्विति सर्वत्वायैतदाह " ॥ ७ ॥

कई आचार्य लोग सोम ग्रहों के लिए जिस समय सोम की छाँट की जाती है, उस समय उस सोम में ( मोमवल्ली में ) यदि सोम से अतिरिक्त विजातीय तृण अर्थात् अन्य लकड़ी आदि के टुकड़े आ जाते हैं तो उन्हें बाहर निकाल देते हैं । तात्पर्य्यं यही है कि कितने ही याज्ञिक सम्प्रदायों की राय है कि सोम की छाँट करते समय यदि उस सोम में कूड़ा - कर्कट हो तो उसे निकाल कर बाहर फेंक देना चाहिए | केवल शुद्ध सोम ही रखना चाहिए-[ ४३६ ]

पृष्ठ 447

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनन ब्राह्मणं " अत्र हैके । तृणं वा काष्ठं वा वित्त्वा अपास्यन्ति " । परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ऐसा कभी नहीं करना चाहिए । " तदु तथा न कुर्यात् ' याज्ञवल्क्य कहते हैं - सोम क्षत्र है, अर्थात् राजा है एवं अन्य जितनी भी औषधियाँ हैं, वे सब इसकी प्रजा हैं | वास्तव में बात सच है । सारी औषधियों की स्थिति एवं प्राप्यायन ( तुष्टि ) सोम से ही तो होती है । अमावस्या के दिन चन्द्रसोम इन औषधियों में भर जाता है । अतएव कहा जाता है-" तदेष वै सोमो राजा देवानामन्नं यच्चन्द्रमाः स यत्रैष एतां रात्रि न पुरस्तान पश्चाद्ददृषे तदिमं लोकमागच्छति । स इहापश्चौषधीश्च प्रविशति " । ( शत ० १।६।४।१५ ) सोम ही तो औषधियों का जीवन है । ये श्रौषधियाँ - सोमवल्ली, ( साक्षात् सोम ) ही हैं । अतएव यह वल्ली - सोम सारी औषधियों का स्वामी - अधिपति - है । सारी औषधियाँ इसकी प्रजा हैं । यह उनका क्षत्र है । " सोमो वै क्षत्रः । विडन्या श्रोषधयः " । यह विट् अर्थात् प्रजा, क्षत्र ( राजा ) का अन्न है । प्रजा ही तो राज्यों की भोग्य सामग्री है । सारे भोगजात प्रजा से ही तो मिलते हैं । प्रजा कर ( टैक्स ) न दे तो राजा भूखों मर जाए । ये जो तृ सोम से लिपट रहे हैं, तृण नहीं पिट रहे हैं अपितु क्षत्र सोम ने प्रजा - स्वरूप प्रत्रधि अन्न को - अपने कब्जे में कर रखा है । सोम ने तृण को अपने अन्न को - ले रक्खा है । तो जिस प्रकार भुक्त अन्न को जबर्दस्ती ले कर उसे खाने वाले से छुड़ा कर कोई दुष्ट मनुष्य दूर फेंक दे - वैसा ही यह तृण अथवा काष्ठ निकालना है । सोम में से तृण को निकालना, सोम के मुँह से अन्न को खींच कर बाहर डालना है, राजा- प्रजा के सम्बन्ध को विच्छिन्न करना है । इसलिए हमारी राय है कि हमें तृण वगैरः बाहर निकाल कर हर्गिज नहीं फेंकने चाहिए । हम केवल उसका ( सोम का स्पर्श ही कर लें । यजमान सोम की छाँट भी न करे अपितु यजमान कह दे - " विचितस्त्वा विचिन्वन्तु " बस, यजमान के जो विचित लोग हैं वे ही इसे कर्म - भेदेन विभक्त करते हैं । यजमान तो केवल स्पर्श मात्र ही कर लेता है । " अन्नं वै क्षत्रियस्य विट् स यथा ग्रसितमनुहायाछिद्य परास्येदेवं तत्

( तृणवदेतद्बहिधाक्षेपणम् ) तस्मादभ्येव मृशेत् । विचितस्त्वा विचिन्वन्त्विति ।

तद्यएवास्य विचेतारस्त एनं विचिन्वन्ति " ॥८ ॥

इसके अनन्तर जितना सोमोपनहन हो उस अन्दाज़ से उस वस्त्र को दो लड़ा ( दुहरा ) अथवा तीन - लड़ा ( तिहरा ) अथवा चौ - लड़ा ( चौहरा ) कर वह ग्रध्वर्यु बिछा देता है । सोग रखने के लिए सोमोपनहन वस्त्र को दो लड़ा अथवा तीन लड़ा अथवा चौ - लड़ा करके ( जितना बड़ा कपड़ा हो उसके [ ४३७ ]

पृष्ठ 448

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनन ब्राह्मण अनुसार ) बिछा देना चाहिए | एवं उसके जो फलने ( वस्त्र के छोर ) हैं या तो उनका मुँह पूर्व की ओर करना चाहिए अथवा उत्तर की ओर करना चाहिए । पूर्व दिक् देवताओं की है, उत्तरा दिक्- इस सोम की अपनी दिक् है । अतएव दोनों में कामाचार है— " अथ वासः । द्विगुणं वा चतुर्गुणं वा प्राग्दशं वोदग्दशं वोपस्तृणाति " । इस प्रकार प्राग्दश अथवा उदग्दश वस्त्र बिछाकर उस पर सोम को मापते हैं । अर्थात् इतने सोम से ग्रहयाग होगा - इतने से उपांशु - सवन होगा, इतने से अन्तर्याग होगा । ग्रहों में भी ग्रह के लिए नियत सोम के ४० विभाग होंगे । इस प्रकार उस समष्टि- सोम की व्यष्टि करते हैं । उसे कर्म्मभेदेन सोमोनहन वस्त्र पर अलग - अलग छांटते हैं— " तद् ( तत्र वस्त्रोपरि ) राजानं ( सोमं ) मिमीते " । चूँकि अध्वर्युळे वस्त्र पर सोम का मात्रा - विभाग करता है, अलग - अलग छाँटता है, अतएव मनुष्यों अंगुली, हाथ, पैर, माथा, इत्यादि मात्राएँ उत्पन्न होती हैं । संसार के यावन्मात्र पदार्थ चाहे वे जड़ हों अथवा चेतन, - प्रग्नि और सोम से ही बनते हैं । अग्नि में जब सोम की आहुति होती है तभी नई वस्तु उत्पन्न होती है । स्त्री का रज आग्नेय है । अग्नि के समान गरम है । एवं पुरुष का वीर्य्य साक्षात् सोम है । अन्न खाने से वीर्य्य बनता है । अन्न सोममय है | अतएव हम कह सकते हैं कि यह वीर्य्य सोम - स्वरूप है । इसलिए तो " रेतः सोमः " यह कहा गया के अग्निमय प्रसृक् में आहुति देता है । है । इसी वीर्य्यं की - इसी सोम की — यह यज्ञकर्ता पुरुष, स्त्री आहुति देना ही इस पुरुष का काम है । आगे का सारा काम अन्य देवताओं के अधीन है । पुरुष के सिक्त सिंचित रेत को योनि में प्रतिष्ठित रखने वाला एक प्रारण ( नाभानेदिष्ठ ) है । वही प्राण सिक्त रेत को योनि में प्रतिष्ठित करता है । जब यह प्राण नहीं होता तो स्त्री की योनि में वीर्य प्रतिष्ठित रह ही नहीं सकता । सिक्त रेत को योनि में प्रतिष्ठित करने वाले इस प्राण का नाम है " नाभानेदिष्ठ " | वस्तुतः यह प्राण सोम में ही रहता है । योनि में सित्रत हो कर उसकी वस्तु बन जाता है । इस सोम में ही एक ऐसा प्राण रहता है जो कि इसे योनि में प्रतिष्ठित करता 1 जिसके शुक्र में नाभानेदिष्ठ प्राण नहीं रहता वह अल्पवीर्य्यं कहलाता है । इस प्राण से शुक्र की प्रतिष्ठा है । प्राण नहीं है तो योनि में वह प्रतिष्ठित हो नहीं सकता । अस्तु, जब वीर्य्यं नाभानेदिष्ठ द्वारा प्रतिष्ठित हो जाता है तो बाल के समान सूक्ष्म अतएव वालखिल्य नाम से व्यवहृत होने वाले प्राण उस समष्टि - वीर्य्यं को व्यष्टिरूप में परिणत कर देते हैं | माथा, गर्दन, हाथ, पैर, अंगुलियाँ, नाक, कान, आँख, उपस्थ, इत्यादि अंगों के लिए उस एक सोम के, " वालखिल्य " प्राण द्वारा टुकड़े - टुकड़े कर दिये जाते हैं । इतने से हाथ बनेगा इतने से पैर बनेगा, इस प्रकार उस वीर्य्य को विभक्त कर दिया जाता है । यदि वीर्य्य विभक्त न हो तो शरीर एकाकार हो कर एक पिण्ड सा बन जाए । इसमें जो हाथ, पैर, नाक, कान, मस्तक अलग - अलग छँटेहु दीखते हैं यह बात कभी न हो । इस मात्रा - विभाग का कारण एकमात्र वही सोम - विभाग है । एक ही सोम वाल्यविल्यायों द्वारा शिरोग्रीवादि भेदेन नाना मात्राओं में परिणत कर दिया जाता [ ४३८ ]

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मणं सोमोनहन ब्राह्म है । यद्यपि सृष्टि अग्नि और सोम दोनों के मेल से उत्पन्न होती है तथापि विचयन सोम ही का होता है, विभाग सोम ही का होता है । अग्नि तो उन विभागों में प्रतिष्ठित हो जाता है । हाथ यदि अलग छँट गया है तो उसमें भी गर्मी घुस गई है । नाक अलग है तो उसमें भी अग्नि मौजूद है । विचयन सोम का होता है । सोम के विचयन से ही मनुष्य में मात्रा - विभाग होता है । अग्नि उस विचित सोम में जा बैठता है । जब वालखिल्या प्राण शिरोग्रीवादि भेदेन समष्टि - सोम को व्यष्टिरूपेण परिणत कर देते हैं तो तदनन्तर वृषाकपि नाम का प्राण उसमें प्राणाधान करता है । वीर्य्यं भिन्न - भिन्न स्वरूपों में रहता है । अतएव आहित प्राणों का स्वरूप भी भिन्न - भिन्न हो जाता है । वृषाकपि इन्द्रप्राण को कहते हैं । इसी इन्द्र प्राण से प्रविविक्त वीर्य्य में बलाधान होता है । बल - विभाग के अधिष्ठाता वृषाकपि- इन्द्र ही हैं अतएव “ या च का च बलकृतिरिन्द्र कर्म एव तत् " यह कहा जाता है । जब बलाधान हो जाता है तो उसमें आपसे आप आदान- विसर्गात्मिका क्रिया होने लगती है । इस वीर्य्यं की मात्रात्रों के चिनाव ( चयन ) से ही लोम, त्वचा, अस्थि, मांस, मज्जा, इत्यादि का निर्माण होने लगता है । यह भी उसी इन्द्र का काम है । लोम, त्वचा आदि सातों का चयन कर उन सातों में फिर बलाधान करना भी इसी वृषाकपि का काम है । इस प्रकार क्रमशः आत्मा, प्राण, शुक्र, मज्जा, अस्थि, मेद, मांस, असृक, त्वचा, इनका चयन होता है । इनमें आत्माप्राण मुख्य हैं । इन पर शुक्रादि स्वरूप सात चितियाँ होती हैं । इस चयन के अनन्तर गर्भ का स्वरूप बन जाता है । इस प्रतिष्ठारहित, अस्थि- मांस - समूह में एवया नाम का महत् प्रतिष्ठा करता है । " एवया मरुत " एक विशेष प्रकार का वायुमय प्राण है जो कि रुक्षता पैदा कर उस ढीले गर्भ - पिण्ड को कठोर बना देता हैं । जब तक एवया मरुत् का उसमें प्रवेश नहीं होता है तब तक वह गर्भ दूसरे की ( माता की ) प्रतिष्ठा से ही प्रतिष्ठित रहता है । अतएव वह तब तक गर्भाशय को नहीं छोड़ता । तब तक गर्भाशय को नहीं छोड़ता जब तक कि एवया मरुतु उसे प्रतिष्ठित नहीं बना देता । एवया मरुत् से जब यह गर्भ प्रतिष्ठित हो जाता है तो उसी समय स्व - प्रतिष्ठा से अपने आपको प्रतिष्ठित रखने का सामर्थ्य प्राप्त कर गर्भाशय से बाहर निकलने की कोशिश करने लगता है । तात्पर्य यही है कि एवया मरुत् प्रवेशानन्तर ही गर्म, गर्भाशय से बाहर आता है । इस प्रकार से नाभा-नेदिष्ठ वालखिल्या वृषाकपि और एवयामरुत् ये ४ प्राण अध्यात्म में सहचर भाव से रहते हैं इन चारों में से यदि एक भी नहीं होता है तो सृष्टि नहीं हो सकती - इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है— तान्येतानि सहचराणीत्याचक्षते नाभानेदिष्ठं वालखिल्या वृषाकपिभेव-यामरुतं तानि सहैव शंसेत् । नाभानेदिष्ठेनैव रेतोऽसिञ्चत् । तद् वालखिल्याभिर्व्यकरोत् । X ×× एवयामरुतत करोति तेनेदं सर्वमेतवै कृतमेति यदिदं किञ्च । ( ऐत ० ब्रा ० २२।१० ) एवया मरुत् ही गर्भ को, गमन के लिए ( एतवै ) प्रवृत करता है । इसी एवया मरुत् से यह सारा पुद्गल एतवैकृत होकर अर्थात् गमन की ओर अभिमुख हो कर चलने लगता है । तात्पर्य्यं यही है कि एवया मरुतु ही प्रतिष्ठापन कर गर्भ को गर्भाशय से बाहर निकालता है! पूर्वकथन से सिद्ध हो जाता [ ४३६ ]

पृष्ठ 450

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बृतीय काण्ड ( अ ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोनहन ब्राह्मण है कि रेत, प्राण, आत्मा, प्रतिष्ठा, ये चार अर्थ ही शरीर - निर्माण करते हैं । नाभानेदिष्ठ रेत का प्रतिष्ठा-पक है, रेत - विभाजक वालखिल्या है । आत्मा - संस्थापक वृषाकपि है एवं प्रतिष्ठापक एवयामरुत् है । नाभानेदिष्ठ सम्बन्धी जो रेत है वह सोम है । वालखिल्या प्राणवायु है । वृषाकपि विष्णु है । एवया मरुत् श्रत्रि है । इन चारों में से प्रकृत में केवल नाभानेदिष्ठ और वालखिल्या का ही सम्बन्ध है । यदि वह सोम विभक्त न हो तो मनुष्य का शरीर एकाकार ही बन जाए । अंगुलियाँ अलग हैं, हाथ अलग छँट गये हैं, मस्तक ऊपर निकल गया है - यह बात न होती । इस मात्रा - विभाग का एकमात्र कारण सोम का मापना ही है । वालखिल्या प्राणात्मक वायु सोम को व्यष्टि - रूप में परिणत कर देता है । तभी मनुष्यों में अंगुत्यादि मात्रा - विभाग होता है । इसी प्राकृतिक सोम - यज्ञ की अनुकृति पर हमारा यह यज्ञ है । इससे जैसे मनुष्यादि की सृष्टि होती है तथैव इस वैध यज्ञ से नया दिव्यात्मा उत्पन्न किया जाता है । इस सोम को विभक्त कर, इसकी आहुति देकर दिव्यात्मा उत्पन्न किया जाता है । इस विज्ञान को परोक्षभाव से यहाँ बतलाया जाता है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह अध्वर्यु सोमोपनहन पर सोम को रख कर —- इसका विभाग करता है, छाँट करता है, अतएव मनुष्यों में हाथ - पैर - अंगुली वगैर: का मात्रा - विभाग हो रहा है । इसका तात्पर्य यही है कि प्रकृति में सोम विभक्त हो कर ही सृष्टि में परिणत हो रहा है । इसका सबूत मनुष्य का मात्रा - विभाग ही है । अतएव हमें इसी प्रकार सोम को विभक्त करना चाहिए-" स यद् राजानं मिमीते तस्मात् ( सोमोमात्रात् विभागात् ) मात्रा मनुष्येषु " । अन्त में याज्ञवल्क्य कहते हैं कि मनुष्य ही में नहीं अपितु प्राणिमात्र में जो मात्रा - विभाग है वह सोममात्रात्मक ही है । अर्थात् मात्रा - विभाग का एकमात्र कारण सोम- मात्रा ही है । " यो चाप्यन्या मात्रा ( सापि सोमस्यैवेति भावः ) ” ॥९ ॥

वह अध्वर्यु सावित्री छन्द से अर्थात् सवितादेवताक अतिच्छन्द से इस सोम राजा की माप करता है । प्रतिच्छन्द बोलते हुए सोम का विभाग करना चाहिए, यही तात्पर्य है । सावित्र्या मिमीते । सवितादेवताक मंत्र से ही विभाग क्यों करने चाहिए, इसका कारण बतलाते हैं । सविता ही देवताओं के प्रसविता हैं, प्रेरयिता हैं । देवता संसार में जिन्हें कुछ देना चाहते हैं वह वस्तु सविता देवता द्वारा ही मिलती है । इज्रा ( निर्णय की तामील ) करना सविता का काम है । बिना सविता की प्रेरणा के किसी कोकुछ नहीं मिल सकता, चाहे अन्य देवता उस पर कितने ही प्रसन्न हों । सर्वकर्म्मविषयानुज्ञाप्रद यही सविता । आज यजमान सोम खरीद रहा । यह क्रय बिना सोम की आज्ञा के नहीं हो सकता एवं न उसकी आज्ञा विना इसका विभाग ही हो सकता है । ग्रतएव प्रत्येक कर्म के पहले सविता देवता की श्राज्ञा प्राप्त कर लेना परमावश्यक हो जाता है । सविता की आज्ञा बिना सारा कर्म नष्ट - भ्रष्ट हो जाता है | अतएव सवितादेवताक प्रतिच्छन्द से ही - सावित्री छन्द से ही - सोम क्रय करना है । इसी से सोम का विभाग करना है । ऐसा करने से इस यजमान के लिए यह सोम सवितृ - प्रसूत हो क्रय के लिए [ ४४० ]