Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 451–460
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 451–460
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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनन ब्राह्मण उपयुक्त हो जाता है । अर्थात् सवितादेवताक मंत्र बोल कर सोम खरीदने से एवं विभाग करने से यह खरीदना उसकी आज्ञा से खरीदना हो जाता है ।-" सविता वै देवानां प्रसविता । तथो हास्माऽएष सवितृप्रसूत एव क्रयाय भवति ॥१० ॥
सविता देवता से सम्बन्ध रखने वाले अनेक छन्द होते हैं । उनमें से प्रतिच्छन्द से ही अध्वर्यु सोम - विभाग करता है— " प्रतिच्छन्दसा मिमीते " । वैदिक छन्द - पथ्या, छन्द, प्रतिछन्द, दण्डक छन्द भेदेन चार प्रकार के होते हैं । एक अक्षर से प्रारम्भ कर पाँच अक्षरों तक के जो छन्द हैं, वे सभी पथ्या छन्द कहलाते हैं । इनमें अक्षर से तात्पर्य्यं चरण से है अर्थात् प्रत्येक चरण मेंएक से लगा कर पाँच अक्षर तक होते हैं । सबसे छोटा एवं प्रारम्भ का जो छन्द, है वह कुल ४ अक्षरों का है । इसमें एक अक्षर प्रतिचरण ( अर्थात् कुल ४ अक्षर ) और मिला दें, तो प्रति चरण दो अक्षरों का छन्द होजाएगा । इसी प्रकार क्रमशः चार चार अक्षर प्रति छन्द में ( अर्थात् प्रति चरण एक अक्षर ) बढ़ाते जाएँ तो अन्तिम ( सबसे बड़ा ) पथ्या छन्द पाँच - पाँच अक्षर प्रति चरण के हिसाब से २० अक्षरों का हो जाएगा । बस, पथ्या छन्द २० अक्षरों से अधिक का नहीं हो सकता । इसके आगे ६ अक्षर प्रति चरण से लगाकर १२ अक्षर प्रति चरण तक के छन्दों का नाम छन्द हो है । २० अक्षरों के ( सबसे बड़े ) पथ्या छन्द में ही यदि प्रति चरण एक अक्षर के हिसाब से कुल ४ अक्षर और बढ़ा कर कुल २४ अक्षर कर दिये जाएँ तो पथ्या न रह कर, छन्द हो जाता है । गायत्री ही वह प्रथम छन्द है जिसमें ६ अक्षर प्रति चरण के हिसाब से कुल २४ अक्षर होते हैं । इस षडाक्षरी चरणों वाली गायत्री छन्द में ही क्रम - क्रमशः १ अक्षर प्रति चरण ( अर्थात् कुल ४ अक्षर ) के हिसाब से बढ़ाते जाने पर गायत्री के बाद तारतम्य से उष्णिक् ( ७ X ४ = २८ अक्षरयुक्त ), अनुष्टुप् ( ८ x ४ = ३२ अक्षर ), बृहती ( ६ x ४ = ३६ अक्षरयुक्त ) पंक्ति ( १० X ४ = ४० अक्षरयुक्त ) त्रिष्टुप् ( ११ × ४ = ४४-अक्षरयुक्त ) तथा जगती ( १२ ४ = ४८ अक्षरयुक्त ) छन्द बन जाते हैं । बस, इन छन्दसंज्ञक छन्दों की समाप्ति ४८ अक्षरीय जगती छन्द पर हो जाती है । जगती ही छन्द - वर्गीय छन्दों में सबसे बड़ा छन्द है । सारांश यह, कि इन सातों छन्दों में सबसे छोटा छन्द ६ अक्षरीय चरणों का है अर्थात् २४ अक्षरों का गायत्री छन्द है । एवं अन्तिम छन्द १२ अक्षरीय चरणों का अर्थात् ४८ अक्षरों का जगती छन्द है । इनके नाम छन्द हैं । इसके बाद १३ से २४ अक्षर तक प्रति चरण वाले छन्दों का नाम अतिच्छन्द है । अतिच्छन्दों में सबसे छोटा छन्द १३ अक्षर प्रति चरण का अर्थात् कुल ५२ अक्षरों का है एवं सबसे बड़ा २४ अक्षरीय चरण का अर्थात् कुल ९ ६ अक्षरों का है । ४८ तक जगती है, उसी में ६-६ अक्षर प्रति चरण और मिलाने से सबसे बड़ा छन्द पूरा हो जाता है । बस यहीं से अतिच्छन्द का प्रारम्भ हो जाता है । यह छन्द गायत्री आदि सातों छन्दों का अतिक्रमण कर जाता है, सातों छन्दों को अपने पेट में ले [ ४४१ ]
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तृतीय काण्ड ( ग्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोनहन ब्राह्मणं लेता है, अतएव इसे प्रतिच्छन्द कहते हैं । इसके बाद २५ अक्षरीय प्रति चरण युक्त छन्द तथा आगे तक जितने बड़े छन्द हैं, वे सारे के सारे दण्डक छन्द कहलाते हैं । दण्डक छन्दों में सबसे छोटा छन्द १०० अक्षरों का है । यहाँ पर प्रतिच्छन्द से ही सोम - विभाग क्यों किया जाता है, इसका कारण बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इस प्रतिच्छन्द के पेट में चूंकि सारे छन्द आ जाते हैं अतएव यह सर्वच्छन्द -स्वरूप है । ऐसी अवस्था में प्रतिच्छन्द से माप करने पर यजमान का यह सोंम, गायत्री आदि सारे छन्दों से मित हो जाता है । वाङ्मण्डल में सोम भरा हुआ है । यह सोम गायत्री आदि ७ छन्दों में विभक्त हो रहा है अतएव यहाँ भी इन्हीं छन्दों से विभाग करना चाहिए । ऐसी अवस्था में ७ मन्त्र बोलने पड़ेंगे । अतएव कोई ऐसा उपाय निकालना चाहिए जिससे एक ही तो मंत्र बोलना पड़े और काम हो जाए सातों छन्दों का । बस वह उपाय यह अतिच्छन्द ही है । अतिच्छन्द में सारे छन्द आ जाते हैं । अतएव इससे माप करने में सातों छन्दों से सोम मित हो जाता है । और छन्दों से मित न कर प्रतिच्छन्द से मित करने का यही कारण है । परन्तु ध्यान रहे, प्रतिच्छन्द सविता देवताक ही हो । “ प्रतिछन्दसा मिमीते । एषा वै सर्वारिण छन्दांसि यदतिछन्दास्तथो
हास्यैष सर्वैरेव छन्दोभिर्मितो भवति । तस्मात् प्रतिच्छन्दसा मिमीते " ॥ ११ ॥
अतिच्छन्द से क्यों विभाग करना चाहिए वह भी सवितादेवताक ही क्यों हो — इसका कारण बतला दिया है । अब पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्यु निम्नलिखित सवितादेवताक मंत्र बोलता हुआ सोम - विभाग करता है - " स मिमीते " वह मन्त्र यह है— " अभित्यं देवं सवितारमोण्योः कविक्रतुमर्चामि सत्यसवं रत्नधामभि प्रियं मति कविम् । ऊर्ध्वा यस्यामतिर्भा दिद्युतत्सवीमनि हिरण्यपाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपा स्वरिति ॥१२ ॥
" त्वं सवितारं देवं अभ्यर्णामि । कीदृशं तं प्रभ्यर्चामि श्राण्योः कविक्रतुम् । सत्यसवसम् । रत्न-धाम् । अभिप्रियम् । मतिम् कविम् — एतादृशं देवं सवितारमभ्यर्चयामि । यस्य श्रमितिः ऊर्ध्वा भाः सवीमनि ( अनुज्ञायाम् ) अदिद्युतत् एतादृशा: हिरण्यपारिणः कृपा ( कव्यनया ) स्वः श्रभिसीत " । मैं इस सविता देवता की पूजा करता हूँ, स्तुति करता हूँ । यह सवितादेवता द्यावा - पृथिवी का कविऋतु है । क्रतु कहते हैं- -- काम करने वाले को । इस द्यावा - पृथिवी का शासन यह सूर्य्य ही करता है । क्या पृथिवी, क्या अन्तरिक्ष, क्या स्वर्ग, तीनों लोकों के अधिष्ठाता यही भगवान सूर्य्य हैं । यदि सू न हो तो इसी समय सारा ब्रह्माण्ड नष्ट हो जाय । काम करने वाले दो तरह के होते हैं । एक तो ऐसे होते हैं कि काम करते हैं परन्तु गलती कर जाते हैं । एक ऐसे होते हैं जिनके काम में कभी भी गलती नहीं हो सकती । ऐसे मनुष्य को " कवि " कहा जाता है । प्रेक्षापूर्वकारी को ही कवि कहते हैं । जो सदा सोच - समझ कर ही काम करता है, कभी चूक नहीं करता, वही कवि कहलाता है । सुचतुर प्रेक्षापूर्वकारी कारीगर कविऋतु कहलाता है । सूर्य्यं सारे विश्व का सञ्चालन करता है । त्रिभुवन का कर्म्म इसी की प्रेरणा से होता है । क्या मजाल, इसमें जरा भी गड़बड़ हो जाय । अग्नि की प्रेरणा ही [ ४४२ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनन ब्राह्मणं अग्नि के स्वरूप की रक्षा करती है । पानी की प्रेरणा पानी के स्वरूप की रक्षा करती है । वह सविता नियति है, सत्यरूप से सर्वथा विद्यमान है । द्यावा - पृथिवी में ऐसा जो सुचतुर कर्मकर्ता सविता देवता है, उसको प्रणाम करता हूँ - श्राप्योः ( द्यावापृथिव्योः ) कविम् तमभ्यर्चामि एवं यह सविता सत्यसवस है । अर्थात् अनिवारितानुज्ञ है । सविता देवता की श्राज्ञा को कोई नहीं टाल सकता । सूर्य की रश्मियाँ कहीं भी नहीं रुक सकतीं, सर्वत्र इनका राज्य है । सर्वत्र इन्हीं की हुकूमत चलती है । इनकी आज्ञा को कोन टाल सकता है? ऐसे सत्यानुज्ञ को मैं प्रणाम करता हूँ । ' सत्य सवमभ्यर्चामि यह सविता रत्नधा है । संसार की बहुमूल्य वस्तुओं को यही धारण करता है । सुवर्ण, हीरा, पन्ना, माणिक, इत्यादि बहूमूल्य पदार्थ सूर्य्य ही से बनते हैं । ये सारे पदार्थ पार्थिव नहीं हैं, अपितु सौर हैं । सूर्य्यं रश्मियाँ ही सुवर्ण बनती हैं बहुमूल्य वस्तुनों के अधिष्ठाता यही सविता देवता हैं, यही सूर्य्य हैं- " तादृशं रत्नधातममयर्चामि " । यह सविता देवता सर्वतः प्रिय हैं । सूर्य्यं किसे प्यारे नहीं लगते? इन्हीं से अन्न का परिपाक होता है । यही तमोमय प्रारण का नाश कर आत्मा को प्रतिष्ठित रखते हैं । इन्हीं की कृपा से संसार का काम चलता है । रात को जरा देर के लिए जब ये विश्राम करने चले जाते हैं, तो सारा काम चौपट हो जाता है | भला ऐसे सविता देवता किसे प्यारे नहीं लगें? ऐसे सर्वतः प्रिय सविता देवता को मैं प्रणाम करता हूँ— “ अभिप्रियमर्चयामि " यही सूर्य्य बुद्धि के प्रदाता हैं, अतएव बुद्धिस्वरूप हैं । विज्ञान के प्रदाता भी यही सविता हैं । सविता बुद्धि को प्रेरित करते हैं । इसीलिए ब्राह्मण लोग प्रातः काल ही " तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि । धियो योनः प्रचोदयात् " मन्त्र से सविता देवता के तेज को प्रात्मसात् किया करते हैं । ऐसे मतिस्वरूप सविता को मैं प्रणाम करता हूँ - " मति तमभ्यर्चयामि " सविता बड़े ही कवि हैं अर्थात् सब को कवि बनाने वाले हैं । जो सूर्य की प्राराधना करता है, वह कवि बन जाता है | उसकी बुद्धि प्रति तीव्र हो जाती है । ऐसे कविस्वरूप सविता देवता की मैं आराधना करता हूँ- ~~ ‘ “ कविमभ्यर्चामि " एवं जो खयाल में आने लायक नहीं है, उसी की अनुज्ञा में सारा विश्व चमक रहा है । सारा विश्व उसी की आज्ञा का पालन करने के कारण अपनी सत्ता कायम किये हुए है । सूर्य्यं के ऊपर परमेष्ठी और स्वयम्भूमण्डल हैं एवं नीचे चन्द्रमा और पृथिवी हैं । ये दोनों अधो-लोक हैं । ऊपर के ऊर्ध्वलोक हैं । हमारी ओर आने वाली जो सूर्य की भा ( श्राभा ) है उसका हमें कुछ - कुछ ज्ञान है । हमारी ओर जो प्रकाश आता है, उसका हमें पता है । परन्तु जो ऊर्ध्वाभा है, सूर्थ्य के ऊपर का रश्मिमण्डल है, उसका हमें कुछ भी पता नहीं है । वह सर्वथा प्र - मति है, उसमें खयाल नहीं दौड़ सकता । उसी की अनुज्ञा में सारा संसार चलता है । सूर्य्य से नीचे का भाग मर्त्य कहलाता है, ऊपर का श्रमृत कहलाता है । सूर्य्य अमृत - मर्त्य दोनों के बीच में है, दोनों का विभाजक है । प्रतएव कहा जाता है-श्री कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मत्यं च । हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥ ( यजुः ० ३३।४३ ) इसमें प्रधान मृत भाग है । वास्तव में अमृत भाग ही संसार का शासन करता है । यह सूर्य्यं के ऊपर है । अतएव " ऊर्ध्वाभाः " कहा जाता है । तो जिस सविता देवता की श्रमति - ऊर्ध्वाभा की अनुज्ञामें संसार चलता है, उसी का हम श्रर्चन करते हैं - ~ -[ ४४३ }
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मणं ऊर्ध्वा यस्यामतिर्भा तस्यांसवीमनि ( अनुज्ञाया ) वो s नुज्ञा - इति विश्वकोश: । अदिद्युतत् तमभ्यर्चामि । सोमोपनहन ब्राह्मण सवीमा प्रक्ष वास्तव में सूर्य के प्रकाश से ही सारे पदार्थों का निर्माण होता है । प्रकाश ही उसकी अनुज्ञा है । जिस वस्तु से सूर्य - रश्मियों का सम्बन्ध होता है, उसी की सत्ता रहती है । " नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः " यह अटल सिद्धान्त है । यह " हिरण्यपाणि " अर्थात् सोने के हाथ वाला जो सविता देवता है, जो कि सुक्रतु है अर्थात् अपनी कृपा से ही अर्थात् कल्पना से ही, अपने हाथों से सारे स्वर्ग को त्रिभुवन को सूर्य्य- रश्मियों से नाप रक्खा है । रश्मियाँ हिरण्य वर्ण की अच्छे विचार वाला है, उसने नाप दिया है । स्वर्ग ही नहीं, हैं । रश्मियाँ ही उसके हाथ हैं । ये रश्मियाँ सारी रोदसी त्रिलोकी में व्याप्त हो रही हैं । इसीलिए " अधः स्विदासीत् उपरि स्विदासीत् " यह कहा जाता है । तात्पर्य्य इस स्तुति का यही है कि इस सोम का विभाग मैं नहीं करता श्रपितु संसार को अपने हाथों से नापने वाले हिरण्यपारिण सविता ही इसे नाप रहे हैं । इस प्रकार यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु सोम को नापता है तथा नाप कर विभक्त करता है । वह अध्वर्यु पहले - पहल " श्रादित्यदेवं सवितारमोण्योः " | यह ऋचा बोलता हुआ पाँचों अंगुलियों से उसे ( सोम को ) नापता है । बाद में चार अंगुलियों से नापता है । बाद इसी ऋचा से तीन अंगु-लियों से नापता है । बाद में इसी ऋचा से दो अंगुलियों से नापता है । बाद में इसी ऋचा से एक अंगुली से नापता है । इस प्रकार प्रवरोह क्रम में ५ बार १/५ - २ / ४-३ / ३-४ / २-५ / १ के हिसाब से सोम को नापता है । इसी अबरोह - क्रम को बतलाते हुए कहते हैं-( १ ) " एतया सर्वाभिः ( मिमीते इति शेषः ) । ( २ ) एतया चतसृभिः । ( ३ ) एतया तिसृभिः । ( ४ ) एतया द्वाभ्याम् । ( ५ ) एतया एकया " । इसके बाद आरोह - क्रम से पाँच बार नापता है । पहले इसी ऋचा से एक अंगुली से नापता है । इसी से दो से नापता है । इस मंत्र द्वारा तीन अंगुलियों से नापता है । इसी मन्त्र द्वारा चार अंगुलियों सेनापता है । इसी मन्त्र से पाँचों अंगुलियों से नापता है । इसी प्रारोह - क्रम को लक्ष्य में रखकर कहते हैं— ( १ ) " एतयैव एकया । ( २ ) एतया द्वाभ्याम् । ( ३ ) एतया तिसृभिः । ( ४ ) एतया चतसृभिः । ( ५ ) एतया सर्वाभिः ” । इस प्रकार १० बार नाप कर, दोनों हाथों को मिला कर, अंजलि करके - अंजलि से सारे सोम का स्पर्श करता है । पहले १० बार अंगुलियों से माप करनी चाहिए । बाद में दसों को मिला कर एक बार माप करनी चाहिए --[ ४४४ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शताव ब्राह्मण सोमोपनहन ब्राह्मण " समस्याञ्जलिनाध्यावपति " - इति ॥१३ ॥
इस प्रकार वह अध्वर्युं सोम को, अंगुलियों को ऊंचा - नीचा करके आरोह - अवरोह क्रमानुसार नाता है । अंगुलियों को फैला कर नापता है । एवं साथ ही अंगुलियों से नापता है । बाद में चार से, बाद में तीन से - इस उत्तरोत्तर मिलाता जाता है । पहले सब प्रकार फैला कर अलग - अलग अंगुलियों से एवं मिलाकर दोनों तरह से नापता है । यहाँ " उदाचं " का अर्थ प्रारोह समझना चाहिए एवं “ न्याचं ” का - अवरोह समझना चाहिए । " सा वाऽउदाचं न्याचं मिमीते " । वह अध्वयूँ जो कि ऊपर - नीचे शामिल करके एवं अलग - अलग करके सोम को नापता है, इन १० अंगुलियों को ही नाना जन्म ( रूप ) वती बनाता है । इसीलिए अंगुलियाँ नाना ( १० ) उत्पन्न होती हैं । प्रकृति - मण्डल में जो सृष्टि - निर्माण होता है उसमें सोम वास्तव में उदाच और न्याय रूप से ही परिणत रहता है । इसीलिए १० अंगुलियों का काम अलग - अलग होता है । अतएव अंगुलियां १० होती हैं । यदि सोम उदाच त्याच न रह कर एकरूप ही रहता तो अंगुली एक स्थान से पैदा होती और एक ही होती । उसी प्रकृति की नकल पर हमारा यह यज्ञ है । इससे दिव्यात्मा बनता है । अतएव सोम को प्रकृतिवत् उदाच - त्याच किया जाता है । हम उस प्रकृति का ही अनुसरण करते हैं । याज्ञव-ल्क्य का भाव तो है यह परन्तु परोक्षता के लिए कहते हैं कि अंगुलियाँ १० होती हैं एवं १० भिन्न - भिन्न स्थानों से उत्पन्न होती हैं-" स यदुदाचं न्याचं मिमीतऽइमा एवैतदङ्गुलीर्नानाजानाः करोति । तस्मा-दिमा नाना जायन्ते " । यह अध्वर्यु १० अंगुलियों को एक साथ मिला कर सबसे एक साथ नापता है । अतएव अंगुलियाँ अलग - अलग रहती हुई भी परस्पर संश्लिष्ट रहकर ही उत्पन्न होती हैं । प्रकृति में सोम अलग छँटता है परन्तु अन्त में वह एकात्म प्रारण रूप से बँध जाता है । अतएव अंगुलियाँ अलग - अलग रह कर भी एक दूसरी से बँधी रहती हैं । उसी के अनुसार अध्वयूँ भी दसों अंगुलियों को मिलाकर एक साथ नापता है -" अथ यत् सह सर्वाभिर्मिमीते संश्लिष्टा इव हैवेमा जायेरंस्तस्माद्वाऽउदाचं न्याचं मिमीते ॥१४ । उदाच त्याच का एक ही प्रयोजन नहीं है, अनेक प्रयोजन हैं, जिनके कारण यह उदाच - न्याच करता है । इसकी दूसरी उपपत्ति बतलाते हैं “ यद्वेवोदाचं न्याचं मिमीते " ( तदुच्यते - इति शेषः ) । उदाच — त्याच करता हुआ यह अध्वयूँ १० अंगुलियों को नाना वीर्य्ययुक्त करता है अतएव अंगुलियाँ नाना वीर्य्ययुक्ता होती हैं । [ ४४५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनहन ब्राह्मण तात्पर्य यही है कि यदि सोम एकरूप ही होता तो न १० अंगुलियां होतीं न उनमें नानारूप वीर्य्य होता । चूंकि सोम कम - अधिक मात्रा में १० भागों में विभक्त हो जाता है इसीलिए १० अंगुलियां होती हैं एवं दसों में बल का तारतम्य होता है । चिट्टी ( अनामिका ) अंगुली में सबसे कम ताकत है, उससे अधिक उससे अगली कनिष्ठिका में है । इस प्रकार भिन्न - भिन्न बल हैं एवं सबकी लम्बाई-चौड़ाई भी भिन्न - भिन्न है । " इमा ऐवैतन्नानावीर्याः करोति । तस्मादिमा नानावीर्याः । तस्मा-द्वाऽउदाचं त्याचं मिमीते " ॥ १५ ॥
अपि च उदाच - न्याच करने का एक तीसरा प्रयोजन और भी है । विराट् नाम है सोम का । बू से ऊपर परमेष्ठिमण्डल है । परमेष्ठिमण्डल पृथिवी के २६ वें अहर्गण पर है । सूर्य्य २१ पर है । परमेष्ठी २६ पर है । सोम परमेष्ठिमण्डल में है । २१ तक रथन्तर साम है । २६ तक वैराज साम है । ३३ तक शाक्वर साम है । यह बात पूर्व ब्राह्मण में बतला दी गई है । इसमें सोम २६ पर अर्थात् वैराज-साम पर रहता है । अतएव इस पारमेष्ठ्य सोम को विराज कहा करते हैं । अध्वर्यु पहले अवरोह - क्रम से अंगुलियों द्वारा सोम को नापता है, फिर पांच बार आरोह - क्रम से नापता है । ऐसा करता हुआ यह देवताओं और मनुष्यों - दोनों को तृप्त करता है । तात्पर्य यही है कि यह सोम पहले सूर्थ्य द्वारा पृथिवी पर आता है । इससे पार्थिव पदार्थों की, मनुष्यादि की, रक्षा होती है । परमेष्ठिमण्डल से श्राया हुआ सोम ही पृथिवी - लोक को प्रतिष्ठित रखता है । इस आते हुए सोम से सारे मनुष्य जीवित रहते हैं । सोम ही तो अन्न रूप में परिणत होता है । यदि सोम न आए तो अन्न ही उत्पन्न न हो, अन्न न हो तो सारे प्राणी भूखे मर जाएँ । परन्तु साथ ही वह सोम वापस भी चला जाता है । अर्थात् पार्थिव पदार्थों को सूर्य्यं खाता रहता है तथा पृथिवी सौर पदार्थों को खाती रहती है । सूर्य प्रतिपल पार्थिव पदार्थों को खाता रहता है । जिन पदार्थों को सूर्य्यं खाता है वह सोम ही तो है । यदि सोम आ कर वापस न जाए तो सारा खजाना खाली हो जाए - अतएव मानना पड़ता है कि सोम जितना भी आता है उतना ही जाता भी रहता है । इसी आधार पर - इतः प्रदानाद्धि देवाः जीवन्ति -- यह कहा जाता है । गायत्री द्वारा ही सोम ऊपर जाता है, उसी के द्वारा वापस आता है । संसार के यच्चयावत् पदार्थ गायत्री द्वारा ही प्राते और जाते रहते हैं । " एति च प्रेति च " यह क्रम अन-वरत चलता रहता है । इसीलिए — गायत्री सोम लेने गई तो उसने देवताओं से कहा कि मैं तो सोम लेने जाती हूँ और आप पीछे से प्रेति च एति च इत्यादि मन्त्रों से मंगलपाठ करते रहें । इसका यही रहस्य है । ( देखिए, सोमोपाख्यान ब्राह्मण ) । सोम ऊपर से नीचे श्राता है, इससे मनुष्य जीवित रहते हैं । नीचे से ऊपर जाता है, उससे देवता जीवित रहते हैं । इसी प्राकृतिक यज्ञ की प्रतिकृति पर ग्रध्वर्यु पहले अंगुलियों का अवरोहण करता है । अवरोहण करना सोम के नीचे उतरने की भावना को व्यक्त करना है । एवं आरोहण - क्रम से सोम के ऊपर जाने की प्रक्रिया को अपनाना है । इसी विज्ञान को परोक्ष भाव से बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं— [ ४४६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनहन ब्राह्मण “ यद्वेवोदाचं न्याचं मिमीते । विराजमेवैतदर्वाचीं च पराचों च युनक्ति । पराच्ह ( तु ) देवेभ्यो यज्ञं ( हव्यं ) वहति । अर्वाची मनुष्यानवति । तस्मा-द्वाऽउदाचं न्याचं मिमीते " ॥१६ ॥
पाँच बार उदाचभावेन एवं पाँच ही बार न्याचभावेन इस प्रकार १० बार क्यों नापता है, इसका कारण बतलाते हैं— " अथ यश कृत्वो मिमीते ( तदुच्यते ) " विराट् छन्द १० अक्षर का हुआ करता है एवं सोम भी वैराज ही है, जैसा कि पूर्व में बतला आए हैं । हम सोम ही को नाप रहे हैं । इस बात को दृढ़ करने के लिए ही १० बार नापा जाना है । वैराज सोम भी १० है अतः १० दफे नापने से ही उसकी पूरी नाप होती है, यही तात्पर्य है—
" दशाक्षरा वै विराट् । वैराजः सोमः । तस्मादृश कृत्वो मिमीते " ॥ १७ ॥
इसके ग्रनन्तर वह अध्वर्यु सोम के नीचे बँधा हुआ जो सोमोपनहन नाम का वस्त्र है उसके पर्यन्त प्रदेश के एक तरफ के छोर की लीर फाड़ कर उसे उष्णीष के साथ बाँध देता है । तात्पर्य यही है कि अध्वर्यु को चाहिए कि सोमोपनहन में से एक लीर फाड़ कर उसे उष्णीष में बाँध दे । “ प्रजाभ्यस्त्वा " यह कहता हुआ बाँधे— " श्रथ सोमोपनहनस्य समुत्पार्यान्तान् उष्णीषेण विग्रथ्नाति प्रजाभ्य-स्त्वा " - इति । प्रजाभ्यस्त्वा कहता हुआ उस लीर को पगड़ी से बाँध देता है । मैं प्रजा के लिए आप को खरी-दता हूँ । यही प्रजाभ्यस्त्वा का तात्पर्य है । " प्रजाभ्यो ह्य ेनं क्रीणाति " मस्तक और अंस का अन्तराल प्रदेश जैसे सटा रहता है, बस इसी भाव के लिए एक लीर उष्णीष के बाँध दी जाती है— " प्रजाभ्यो ह्येनं क्रीणाति स यदेवेदं शिरश्वांसौ चान्तरोपेनितमिव तदे-वास्यैतत्करोति ” ॥१८ ॥
इसके बाद उस ग्रन्थि के बीच में दो अंगुलियाँ डाल कर उन्हें चौड़ी कर अंगुल्याकाश करता है । अर्थात् ग्रन्थि के बीच में अंगुलियाँ दे कर उन्हें चौड़ा कर देना चाहिए जिससे कि दोनों अंगुलियों के बीच का स्थान खाली रह जाए - " प्रजास्त्वानुलिप्रन्तु " यह मन्त्र बोलते हुए अंगुल्याकाश करना चाहिए --" अथ मध्येऽङ्गुल्याकाशं करोति । प्रजास्त्वानुप्राणन्तु " - इति ॥ सोमोपनहन की लीर लेता हुआ यह अध्वर्यु एक प्रकार से सोम को हानि पहुँचाता है, उसे प्राण - रहित करता है, अर्थात् उसकी हिंसा करता है, उसे दमघुट करता है । [ ४४७ }
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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनन ब्राह्मण " तमयतीव वाऽएनमेतत् समायच्छन् - अप्रारणमिव करोति " । समायच्छन् अन्तान् संगृहरणन् तं प्रयतीव - ग्लापयतीव । प्राणं- सोमं प्रारण रहितमिव करोति । सोम का दम घुट न जाए प्रतएव ग्रन्थिस्वरूप जो सोम का शरीर है, उसमें अंगुली से पोल करता प्राणदान करता है, अर्थात् बँधी हुई ग्रन्थि को अंगुली से चौड़ा कर उसमें पोल करना - बँधे हुए सोम को अवकाश देना है, उसके श्वास लेने के लिए गुंजाइश करना है— तस्यैतदत एव मध्यतः प्रारणमुत्सृजति । सोम ही सारी प्रजा का जीवन है । यदि वह जीवित रहता है उसकी सत्ता रहती है - तो सारी प्रजा की स्थिति रहती है । सोम के प्राणन - व्यापार से सारी प्रजा प्राणन करती है, अर्थात् जीवित रहती है । तो गोया अंगुल्याकाश द्वारा सोम का प्राणन करना प्रजा का प्राणन करना है । अतएव ग्रन्थि में अंगुल्याकाश करता हुआ प्रजास्त्वानुप्राणन्तु यह बोलता है -" तं ततः प्राणन्तं प्रजा अनुप्रारगन्ति तस्मादाह प्रजास्त्वानुप्रारण-विति " इति । इसके अनन्तर उस सोम को सोमोपनहन वस्त्र में बाँधकर उसे सोम बेचने वाले को देता है— तं सोमविक्रयिणे प्रयच्छति प्रथातः परणनस्यैव ॥ १ ९ ॥ ॥ इति सोमोपनहनब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति तृतीयाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ [ ४४८ ]
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तृतीयाध्याये तृतीयं ब्राह्मणम् ' सोमपणन ब्राह्मणम् ' [ मूल ] स वै राजानं परणते । स यद्राजानं परणते तस्मादिदं सकृत्सर्वं पण्यं स ह सोमविक्रयिन्त्रय्यस्ते सोमो राजा ३ इति । क्रय्य इत्याह सोमवि-ऋयी, तं वै ते क्रीणानीति, कीरणीहीत्याह सोमविक्रयी कलया ते कीरणानीति, भूयो वाऽग्रतः सोमो राजार्हतीत्याह सोमविक्रयी, भूय एवातः सोमो राजार्हति, महाँस्त्वेव गोर्महिमेत्यध्वर्युः ॥१ ॥
गो प्रतिधुक् । तस्यै शृतं तस्यै शरस्तस्यै दधि तस्यै मस्तु तस्याऽप्रात-ञ्चनं तस्यै नवनीतं तस्यै घृतं तस्याऽग्रामिक्षा तस्यै वाजिनं ॥२ ॥
शफेन ते क्रीणानीति । भूयो वाऽश्रतः सोमो राजार्हतीत्याह सोमविक्रयी भूय एवातः सोमो राजार्हति महाँस्त्वेव गोर्महिमेत्यध्वर्युरेतान्येव दशवीर्याण्युदा-ख्यायाह पदा तेऽर्धेन ते गवा ते कीरणामीति क्रीतः सोमो राजेत्याह सोमविक्रयो वयाँसि प्रब्रूहीति ॥ ३ ॥
स ह । चन्द्रं ते वस्त्रं ते छागा ते धेनुस्ते मिथुन ते गावौ तिस्त्रस्तेऽन्या इति स यदर्वाक्पणन्ते परः सम्पादयन्ति तस्मादिदं सकृत्सर्वं पण्यमर्वावपणन्ते परः सम्पादयन्त्यथ यदध्वर्युरेव गोर्वीर्याण्युदाचष्टे न सोमस्य सोमविक्रयी महितो वै सोमो देवो हि सोमोऽथैतदध्वर्युर्गां महयति तस्यै पश्यन्वीर्याणि कीरणादिति तस्मादध्वर्युरेव गोर्वीर्याण्युदाचष्टे न सोमस्य सोमविक्रयी ॥४ ॥
अथ यत्पञ्च कृत्वः परणते । संवत्सरसंमितो वे यज्ञः पञ्च वाऽऋतवः संवत्सरस्य तं पञ्चभिराप्नोति तस्मात्पञ्च कृत्वः परणते ॥५ ॥
अथ हिरण्ये वाचयति । शुक्रं त्वा शुक्रेरण क्रीणामीति शुक्रं ह्येतच्छुक्रेरण क्रीणाति यत्सोमं हिरण्येन चन्द्र चन्द्रेणेति चन्द्र होतच्चन्द्रेण क्रीणाति यत्सोमं हिरण्येनामृतममृतेनेत्यमृतं ह्येतदमृतेन क्रीणाति यत्सोमं हिरण्येन ॥ ६ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मण अथ सोमविक्रयिणमभिप्रकम्पयति । सम्भे ते गोरिति यजमाने ते गौरि-त्येवैतदाह तद्यजमानमभ्याहृत्य न्यस्यत्यस्मे ते चन्द्राणीति सश्रात्मन्येव वीर्यं धत्ते शरीरमेव सोमविक्रयी हरते तत्ततः सोमविक्रय्यादत्ते ॥७ ॥
प्रथाजायां प्रतीचीनमुख्यां वाचयति । तपसस्तनूरसीति तपसो ह वा-एषा प्रजापतेः सम्भूता यदजा तस्मादाह तपसस्तनूरसीति प्रजापतेर्वर्णऽइति सा यत्त्रिः संवत्सरस्य विजायते तेन प्रजापतेर्वर्णः परमेण पशुना क्रीयसइति सा यत्त्रिः संवत्सरस्य विजायते तेन परमः पशुः सहस्रपोषं पुषेयमित्याशिषमेवैतदा-शास्ते भूमा वै सहस्रं भूमानं गच्छानीत्येवैतदाह ॥८ ॥
सवाऽनेनैवाजां प्रयच्छति । अनेन राजानमादत्तश्राजा ह वै नामैषा यद-जैतया नमन्तत प्राजति तामेतत्परोऽक्षमजेत्याचक्षते || ९ || श्रथ राजानमादत्ते । मित्रो न एहि सुमित्रध इति शिवो नः शान्तऽएही-त्येवैतदाह तं यजमानस्य दक्षिणऊरौ प्रत्यु वासो निदधातीन्द्रस्योरुमा विश दक्षिणमित्येष वाऽत्रेन्द्रो भवति यद्यजमानस्तस्मादाहेन्द्रस्योरुमाविश दक्षिणमि-त्युशन्नुशन्तमिति प्रियः प्रियमित्येवैतदाह स्योनः स्योनमिति शिवः शिवमित्येव -तदाह ॥१० ॥
अथ सोमक्रयणाननुदिशति । स्वान भ्राजाङ्घारे बम्भारे हस्त सुहस्त कृशानवेते वः सोमक्रयरणास्तान् रक्षध्वं मा वो दभन्निति धिष्ण्यानां वाऽएते भाजनेनैतानि वै धिष्ण्यानां नामानि तान्येवैभ्य एतदन्वदिक्षत् ॥ ११ ॥
अथात्रापोर्णुते । गर्भो वाऽएष भवति यो दीक्षते प्रावृता वै गर्भा उल्बेने-व जरायुवतमत्राजीजनत तस्मादपोर्णुतऽएष वाऽत्र गर्भो भवति तस्मात्परिवृतो भवति परिवृता इव हि गर्भा उल्बेनेव जरायुणेव ॥ १२ ॥
ग्रथ वाचयति । परि माग्ने दुश्चरिताद्बाधस्वा मा सुचरिते भजेत्यासीनं वाऽएनमेष श्रागच्छति स श्रागतऽउत्तिष्ठति तन्मिथ्या करोति व्रतं प्रमीरणाति तस्यो हैषा प्रायश्चित्तिस्तथो हास्यैतन्न मिथ्याकृतं भवति न व्रतं प्रमीणाति तस्मादाह परि माग्ने दुश्चरिताद्बाधस्वा मा सुचरिते भजेति ॥ १३ ॥
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