Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 461–470
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 461–470
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मण श्रथ राजानमादायोत्तिष्ठति । उदायुषा स्वायुषोदस्थाममृतां २ ॥ श्रन्वि त्यमृतं वाऽएषोऽनूत्तिष्ठति यः सोमं क्रीतं तस्मादाहोदायुषा स्वायुषोदस्थाममृ-तां२।न्विति ॥ १४ ॥
श्रथ राजानमादायारोहणमभिप्रैति । प्रति पन्थामपद्महि स्वस्तिगामनेह-सम् । येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वस्विति ॥ १५ ॥
देवा ह वै यज्ञं तन्वानाः । तेऽसुररक्षसेभ्य श्रासङ्गाद्विभयांच क्रुस्तऽएत-द्यजुः स्वस्त्ययनं ददृशुस्तऽएतेन यजुषा नाष्ट्रा रक्षांस्यपहत्येतस्य यजुषोऽभयेऽनाष्ट्र निवाते स्वस्ति समाश्नुवत तथोऽएवैष एतेन यजुषा नाष्ट्रा रक्षांस्यपहत्यैतस्य यजुषोऽभयेनाष्ट्रे निवाते स्वस्ति समश्नुते तस्मादाह प्रति पन्थामपद्महि स्वस्ति-गामनेहसम् । येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वस्विति ॥ १६ ॥
तं वाऽइति हरन्ति । अनसा परिवहन्ति महयन्त्येवैनमेतत्तस्माच्छीर्णा बीजं हरन्त्यनसोदावहन्ति ॥ १७ ॥
अथ यदपामन्ते कीरणाति । रसो वाऽश्रापः सरसमेवैतत्क्रीणात्यथ यद्धि-रण्यं भवति सशुक्रमेवैतत्कीरणात्यथ यद्वासो भवति सत्वचसमेवैतत्कीरणात्यथ यदजा भवति सतपसमेवैतत्कीरणात्यथ यद्धेनुर्भवति साशिरमेवैतत्कीरणात्यथ यन्मि-थुनौ भवतः समिथुनमेवैतत्कीरणाति तं वै दशभिरेव क्रीणीयान्नादशभिर्दशाक्षरा वं विराड् वैराजः सोमस्तस्माद्दशभिरेव कीरणीयान्नादशभिः ॥ १८ ॥
[ अनुवाद ] अब वह ग्रध्वर्यु सोम बेचने वाले से सोम राजा को खरीदता है । क्यों कि वह श्रध्वर्यु सोम राजा को खरीदता है इसलिए विश्व के सभी पदार्थ पण्य ( क्रय्य ) बन जाते हैं । तथैव क्यों कि सकल विश्व अग्निसोममय है अतः सोममय होने से सभी पदार्थ सोम के पण्य ( क्रय्य ) वन जाने से क्रय बन जाते हैं, मूल्य द्वारा खरीदने योग्य बन जाते हैं । वह अध्वर्युं सोम बेचने वाले से कहता है कि हे सोम बेचने वाले! क्या यह तुम्हारा सोम राजा खरीदा जा सकता है? तब सोम बेचने वाला कहता है, हाँ बेचा जा सकता है । ध्वर्यु कहता है कि तो क्या मैं इसे खरीद लू? सोमविक्रमी कहता है कि खरीद लो । अध्वर्यु सोम का मूल्य लगाता हुआ कहता है कि गो नामक सुवर्ण मुद्रा के एक भाग अर्थात् सोलहवें हिस्से से मैं इसे खरीदता हूँ । सोमविक्रयी कहता है कि सोम राजा का [ ४५१ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० 3 ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मण मूल्य इससे अधिक है । अध्वर्यु कहता है कि यद्यपि सोम राजा अधिक मूल्यवान् है किन्तु गो नामक सुवर्ण सिक्के की षोडशांश कला का महत्त्व भी सोम से कम नहीं है, महान् है ॥ १ ॥
' स श्राह सोमविक्रयिन् क्रव्यस्ते सोमो राजा । ' क्रव्य इत्याह सोमविक्रयी ' । ' तं वै ते क्रीणानीति ' ' कोणीहीत्याह सोमविक्रयी ' । ' कलया ते क्रोणानीति ' । ' भूयो वाऽग्रतः सोमो राजाहंतीत्याह सोमविक्रयी ' ( का. श्री. सू ७।२०१-१०६ ) अध्वर्यु कहता है कि गाय से इतने इतने वीर्य्य ग्रर्थात् द्रव्य उत्पन्न होते हैं । गाय का प्रतिक् ( ताजा निकाला ) दूध उसका एक वीर्य्य है । गर्म किया हुआ दूध ( शृतं ) दूसरा वीर्य्य है । मलाई ( शरः ) तीसरा वीर्य्य है । दही ( दधि ) चौथा वीर्य्यं है । मट्ठा ( मस्तु ) पांचवां वीर्य्य है । जिससे दूध जमता है वह आतञ्चन द्रव्य ( जावन ) छठा वीर्य्य है । नवनीत ( कच्चे दूध से निकाला गया सारभाग ) सातवाँ वीर्य्यं है । घृत ( दही का मन्थन कर उससे निकाला हुआ सारभाग ) आठवाँ वीर्य है । आमिक्षा ( गर्म दूध में दही डालने से फट कर निकला हुआ स्थूल भाग ) नववी है तथा वाजिन ( दूध के फट जाने पर पृथक् हुआ द्रवभाग ) दसवाँ वीर्य्य है । इस तरह् १० वीर्य्य वाले गो की सोम से कम महिमा नहीं है ॥ २ ॥
' भूय एवातः सोमो राजार्हति महांस्त्वेव गोर्महिमेत्यध्वर्यु: गोवें प्रतिधुक् तस्यै शृतं, तस्यैशर-स्तस्यै दधि, तस्यै मस्तु तस्याऽप्रातंचनं तस्यै नवनीतं, तस्यै घृतं तस्थाऽश्रामिक्षा, तस्यै वाजिनम् ' ( का. श्री. सू ७ / २०७ ) जब सोमविक्रयी कहता है कि सोम गो - महिमा से अधिक है तब अध्वर्यु कहता है कि गाय के एक शफ ( खुर ) मूल्य से तुम से सोम खरीद लूँ । यहाँ शफ से चतुर्थ का अर्धांश अर्थात् दो कला ली गई हैं । क्यों कि गाय के ४ पादों में एक पाद चतुर्थांश है । तथा एक पैर में दो खुर होते हैं । ग्रतः शफ ( एक खुर ) चतुर्थांश का भी अर्धांश है । अर्थात् सोलह कलाओं में दो कलाएँ होती हैं । तब सोमविक्रयी कहता है, सोम का मूल्य शफ अर्थात् दो कला से भी अधिक है । अध्वर्यु पुनः गाय के प्रतिधुक् श्रादि वीथ्यों का वर्णन करता हुआ कहता है । कि षोडशकल के चतुर्थांश ग्रर्थात् चार कलाओं से सोम को खरीद लूँ । सोमविक्रयी कहता है कि सोम का मूल्य इससे भी अधिक है । तब अध्वर्यु कहता है कि षोडशकल के प्रर्धांश अर्थात् आठ कलाओं से सोम को खरीद लूं । सोमविक्रयी पुनः कहता है कि गो से अर्थात् गो नामक सुवर्णमय पूरे सिक्के से सोम को खरीद लूं । तब सोमविक्रयी कहता है कि यह इस सोम राजा का उचित मूल्य है । यहाँ पर जैसे - जैमे सोम का मूल्य बढ़ाता है वैसे - वैसे " भूय एवातः सोमो राजार्हति महाँस्त्वेव गोर्महिमा गोर्वे प्रतिधुक् " इत्यादि का ग्रावर्तन करना चाहिए । शफ, पद, अर्ध तथा गो इस क्रम से सोमक्रयण के लिए चार बार मूल्य बढ़ाया गया है । अतः चारों ही बार ' भूय एवातः सोमो राजाऽर्हति ' इत्यादि का चार बार श्रावर्तन करना चाहिए । जैसा कि श्रौत सूत्रकार कात्यायन ने कहा है: - ' भूय एवेत्यत: प्रभूति चतुरा-[ ४५२ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मणे सोमपान ब्राह्मणं वर्तयति ' ( का ० श्रौ ० सू ० ७।२०८ ) । अन्त में पाँचवीं बार ' गवा ते क्रीणामि ' अर्थात् गो से सोम को खरीदता हूँ - यह कहे । प्राचीन समय में वस्तु खरीदते समय वस्तु के मूल्य से अतिरिक्त बेचने वाले को पारितोषिक रूप में जो कुछ दिया जाता था उसे ' वयम् ' कहा जाता था । सोमविक्रयी कहता है कि सोम का तो उचित मूल्य हो गया । अब आप वय के रूप में क्या देंगे, यह बतलाइए-हिन्दी विज्ञानभाष्यकार ( प्रस्तुत ग्रन्थकार ) पं ० श्री मोतीलाल जी शास्त्री ने चन्द्र का अर्थ इस प्रसंग में चाँदी का रुपया किया है । ' एकैकेनान्ते परणते शफेन पवा अर्धेन गवा ' | ' गवा ते क्रीणामीत्यनातः ' ' क्रीतः सोमो राजेत्यनये वयांसि प्रब्रूहि सोमविक्रयी ' ( का. श्री सू. ७।२१२ ) इस कण्डिका में उसी देय वय का निरूपण किया जा रहा है । अध्वर्यु कहता है कि मैं वय के रूप में तुम्हें चन्द्र अर्थात् आनन्ददायक हिरण्य दूँगा, वस्त्र दूँगा, बकरी दूँगा, धेनु दूँगा, गाय बैल का जोड़ा दूँगा तथा इसके अतिरिक्त तीन गायें और दूँगा । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि अध्वर्यु अल्प मूल्य से प्रारम्भ करता हुआ अन्त में अधिक मूल्य से वस्तु का सम्पादन करता है अर्थात् अधिक मूल्य से सोम का क्रयण करता है । लोक में भी मनुष्य कम मूल्य से वस्तु खरीदने का उपक्रम करते हैं और अन्त में अधिक मूल्य दे कर बस्तु का सम्पादन करते हैं । अध्वर्यु गाय के प्रतिधुक्, शृत आदि मूल्यों का वर्णन करता है किन्तु सोमविक्रयी सोम के वीर्य्यो का कथन नहीं करता । उसका कारण यह है कि सोम प्रतिप्रशस्त वस्तु है । सोम साक्षात् देवता है । अतः उसके वीर्य्यो के वर्णन की आवश्य-कता नहीं है । इसी प्रकार अध्वर्यु गाय की महिमा का वर्णन करता है, उस के वीर्थों का वर्णन करता है, उसका यह तात्पर्य है कि गाय में इतने वीर्य्य हैं अतः गाय से ही सोम खरीदना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहा है ' अध्वर्युः गां महयति तस्यै पश्यन् वीर्य्याणि क्रीणादिति तस्मादध्वर्युरेव गोर्वीर्याण्युदाचष्टे न सोमस्य सोमविक्रयी ' इति ॥ ४ ॥
जो यह यजमान सोम का मूल्य- कला, शफ, पाद, अर्ध, गो - इस क्रम से पाँच बार करता है, इसका तात्पर्य यह है कि यह यजमान सोमयाग कर रहा है । पार्थिव अग्नि पारमेष्ठ्य सोम की आहुति ही सोमयाग है । इसी से विश्व का निर्माण होता है । पृथ्वी के केन्द्र से लेकर २१ वें अहर्गण तक का जो मण्डल है वह संवत्सरमण्डल है । यह संवत्सर अग्नि-मण्डल है । इसका ३६० दिनो में जा कर पारमेष्ठ्य सोम से सम्बन्ध हो पाता है । इसलिए यज्ञ को संवत्सरसंमित कहा जाता है । अर्थात् संवत्सरमण्डल को यज्ञ कहा जाता है । संवत्सर में वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त एवं शिशिर इस प्रकार से पाँच ऋतुएँ होती हैं । इस रूप से संवत्सर पञ्चावयव है । प्रकृति से पञ्चावयव - रूप संवत्सर के द्वारा यह सोम खरीदा जाता है । क्योंकि संवत्सर की पाँच ऋतुओं में जा कर ही इस संवत्सराग्नि का पारमेष्ठ्य [ ४५३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मणे सोमवरणन ब्राह्मण सोम से सम्बन्ध होता है, इसी आधार पर इस वैध यज्ञ में यजमान भी पाँच बार सोम-वल्ली को खरीदने का उपक्रम करता है ॥५ ॥
मध्वर्यु सोम खरीदने के लिए एक हथिनी, गाय और हिरण्य, वस्त्र, बकरी आदि दश द्रव्यों में से हिरण्य देने के समय यजमान से निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करवाता है— शुक्रं त्वा शुक्रेण क्रीणामि चन्द्र चन्द्रेणामृतममृतेन ॥ इति ॥ अर्थात् हे सोम! दीप्यमान, आह्लादकारक, अमृतस्वरूप सुवर्ण से मैं दीप्यमान, अमृतस्वस्त्व आह्लादकार तथा अमृतरूप आपको खरीदता हूँ । अर्थात् सुवर्ण दीप्यमान है । सोमवल्ली भी रात्रि में दीप्यमान ( अर्थात् चमकदार ) है । सुवर्ण भी मानव को आनन्द देने वाला है क्यों कि सुवर्ण प्राप्ति से मनुष्य को आनन्द प्राप्त होता है । सुवर्ण अमृतरूप है क्यों कि सूर्य्यकिरण ही पृथिवी से बद्ध होकर सुवर्ण बनती है । सूर्यकिरण दिव्य होने से अमृतरूप है ही और सोम तृतीय दिव्यलोक की वस्तु होने से अमृतरूप है । सोमवल्ली भी उसी सोम का अंश है तथा सोम की आहुति से सोमयाग द्वारा दिव्यात्मा की निष्पत्ति होती है । इसी दीप्यमान, आह्लादजनक तथा अमृतरूप हिरण्य से दीप्यमान, आनन्दजनक एवं अमृतरूप सोम को अध्वर्यु खरी-दता है ॥६ ॥
सोमविक्रयी को उससे सोम खरीदने के लिए गाय और सुवर्ण दोनों दिये जाते हैं । देने पर वे दोनों वस्तुएँ सोमविक्रयी की हो जाती हैं । किन्तु अध्वर्यु उन दोनों को सोमविक्रयी से वापस ले कर उन्हें यजमान को दे देता है । अतः सोमविक्रयी के हृदय में कम्पन हो जाता है । इस प्रकार अध्वर्यु गाय और सुवर्ण को सोमविक्रयी से वापस ले कर उसके हृदय में कम्प उत्पन्न कर देता है । अध्वर्यु यजमान को बुला कर जब उसे गाय और सुवर्ण देता है तब इस मन्त्र का उच्चारण करता है - " सग्मे ते गोः ” " अर्थात् हे सोमविक्रयिन्! तेरी यह जो गाय है वह वस्तुतः यजमान की है । यह मन्त्र बोल कर वह यजमान को गाय सौंपता है ' सग्म शब्द ' ऋत्विग्भि सह गच्छति तत्तत् कर्मसु ' इस व्युत्पति से विभिन्न कर्मों में ऋत्विजों के साथ जाने वाले यजमान का बोधक है । इसके बाद वह अध्वर्यु ' अस्मे ते चन्द्राणि ' इस मन्त्रशेष का उच्चारण करता है अर्थात् जैसे यह गाय यजमान की है वैसे ही तुम्हारा सुवर्ण भी हमारे यजमान का है । ' अस्मे ' का अर्थ अस्मदीय अर्थात् हमारा यजमान है । इस प्रकार वीर्य्य - रूप हिरण्य को लेता हुआ यजमान अपने में वीर्य को धारण करता है । केवल शरीर ही सोमविक्रयी के पास रहता है । इस तरह पहले उस सुवर्ण को यजमान को सौंप कर पश्चात् यजमान के पास रखे हुए सुवर्ण को सोमविक्रयी स्वीकार करें ॥ ७ ॥
1. ‘ सग्मे ते ( गोः ) इति सोमविक्रयिणं हिरण्येनाभिकम्पयति ' ( का.श्रौ. सू. ७।२१५ ) 2. सोमविक्रय्येतदादत्ते ' ( का. भौ. सू. ७।२१७ ) [ ४५४ ] ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मण तदन्तर सोम खरीदने के लिए दी हुई बकरी को पश्चिमाभिमुख कर, उसका स्पर्श कर, यजमान से निम्नलिखित मन्त्र बुलवाता है - ' तपसस्तनूर सि ' अर्थात् हे बकरी! तुम प्रजापति के तप की देह हो । अर्थात् चित्याग्निरूप प्रजापति के तप ( वाष्प ) से तुम उत्पन्न हुई हो । पश्चात् ' प्रजापतेर्वर्णः ' मन्त्र को यजमान से कहलाता है । अर्थात् अजा! तुम प्रजापति के वर्णरूप की हो । अर्थात् जैसे प्रजापति वर्ष में ग्रीष्म, वर्षा, शरद् ये तीन विभाग कर तीन बार अन्न को उत्पन्न करता है उसी प्रकार अजा भी एक वर्ष में तीन बार सन्तान उत्पन्न करती है । इसीलिए वर्ष में तीन बार प्रजनन - स्वरूप साधर्म्यात् प्रजा को प्रजापति का वर्ण बतलाया है । इसी कारण अजा नामक पशु परम उत्कृष्ट है । इससे जो सोम खरीदा जाता है उससे सोम की महत्ता सिद्ध होती है । क्योंकि सोम राजा ही नहीं अपितु सम्राट् है । अत: इसे प्रजा से खरीदा जाता है जो कि प्रजापति का शरीर है, प्रजापति का वर्ण है, प्रजापति के सर्वथा अनुरूप है । प्रकृति में विभागत्रययुक्त संवत्सराग्नि द्वारा ही परमेष्ठिमण्डल से सोम आता है । अतः यहाँ वैध यज्ञ में भी अग्निप्रजापति की प्रतिकृतिरूपा इस प्रजा से सोमवल्ली को खरीदा जाता है । अन्त में ' सहस्रपोषं पुषेयम् ' अर्थात् मैं पूर्ण पुष्टि प्राप्त करूँ - इस मन्त्र-शेष का उच्चारण करता है । इसके द्वारा यह आशीष की कामना करता है कि मैं भूमा को प्राप्त करू, भूमा बन जाऊँ, प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त होता जाऊँ । मन्त्र में सहस्र शब्द का अर्थ भूमा है | 5 || वह अध्वर्यु इसी मन्त्र से प्रजा को सोमविक्रयी को सौंप देता है तथा सोम ले जाता है । सायण भाष्य में ' अनेन, अनेन इन दोनों पदों से वाम तथा दक्षिण हस्त का ग्रहण किया गया है । अर्थात् एक हाथ ( अर्थात् वाम हाथ ) से सोमविक्रयी को अजा देता है तथा दक्षिण हाथ से सोम का ग्रहण करता है । भगवान् याज्ञवल्क्य ' प्रजा ' शब्द का निर्वचन करते हुए कहते हैं कि एकहायनी गाय, हिरण्य आदि सोमक्रय द्रव्यों अन्तत: इस अजा के द्वारा ही सोम का सांमुख्य प्राप्त करता है, सोम का क्रयण करता है । सोमाजन - साधन होने से यह ' आजा ' कहलाती है । और ' प्रजा ' ही परोक्ष भाषा में ' प्रजा ' शब्द से व्यपदिष्ट हुई है || || अब अध्वर्यु ' मित्रो न एहि सुमित्रध: ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उस सोम राजा को अपने हाथ में लेता है । अर्थात् हे सोम! शोभन मित्र यजमान के धारक बनते हुए यजमान के घर में पधारिए । अर्थात् प्राप शान्त बन कर यजमान के घर में पधारें । इसके बाद अध्वर्यु उस साम को यजमान की दाहिनी जाँघ पर रख कर उसे वस्त्र से ढक देता है । अध्वर्युसोम को यजमान की दक्षिण जंघा पर रखता हुआ ' इन्द्रस्योरुमा विश दक्षिणम् ' अर्थात् हे सोम! आप इन्द्र की दक्षिण जंघा पर बैठिए इस मन्त्र का उच्चारण करता है । तात्पर्य यह है कि में सोमाहुति ही यज्ञ है । यह अग्नि पृथिवी के केन्द्र से २१ वें अहर्गण तक वितत रहती है । २१ वें अहर्गण पर सूर्य है । इन्द्र, धाता, भग, पूषा, वरुण, विष्णु इत्यादि द्वादश प्राणसमष्टि ही सूर्य्य है । इन प्राणों में इन्द्रप्राण ही प्रधान है । परमेष्ठिमण्डल से [ ४५५ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपान ब्राह्मण आने वाला सोम २१ वें अहर्गण तक वितत श्रग्नि में ही आहुत होता है । २१ वें ग्रहरण पर सूर्य है अर्थात् इन्द्र है, उसी पर वह सोम ना कर बैठता है । उस में दक्षिण जंघा पर बैठने का अभिप्राय यह है कि सूर्य का उत्तर भाग उसकी उत्तर अर्थात् नाम जंघा है तथा दक्षिण भाग, दक्षिण जंघा है । श्रग्नि दक्षिण में रहता है अतः वह दक्षिण जंघा है । उसी पर सोम के आहुतिरूप का उपवेश होता है । उपयुक्त मन्त्र की व्याख्या करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जो यजमान है, वही इन्द्र है । अतः यजमान की दक्षिण जंघा पर रखते हुए सोम के लिए ' इन्द्र की दक्षिण जंघा पर बैठिए ' यह कहा है । पुनः ' उशन्नुशन्तम् ' इस मन्त्र शेष का उच्चारण करता है । अर्थात् प्रिय! आप यजमान की प्रिय जंघा पर विराजिए । पुनः ' स्यो नः स्योनम् ' इस मन्त्रशेष का उच्चारण करता है । अर्थात् शान्तरूप कल्याणकारी प्राप यजमान की शान्त जंघा पर विराजिए ॥१० ॥
इसके अनन्तर सोमक्रयण - साधनभूत वस्तुओं का नाम - निर्देश करते हैं । प्रकृति में गायत्री जब पारमेष्ठ्य सोम को लाने के लिए गई थी उस समय गन्धर्व सोम की रक्षा कर रहे थे । वे गन्धर्व अन्तरिक्ष में रहने वाली धिष्ण्याग्नियाँ हैं, जिन के नाम स्वान, भ्राज, घारि, बम्भारि, हस्त, सुहस्त, कृशानु हैं । ये सब गन्धर्व सोम की रक्षा करने वाले हैं । प्रकृति में गायत्री इन्हीं से सोम लाई थी । आज इस वैध यज्ञ में अध्वर्यु ' इन्हीं गन्धर्वो प्रार्थना करता है कि आप हमारे वैध यज्ञ में सोमक्रयण - साधनभूत गाय, हिरण्य आदि की रक्षा करें, क्योंकि ये आपके ही हैं । हे गन्धर्वो! आप इन की कभी हिंसा न करें । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि सोमयाग में आन्तरिक्ष्य धिष्ण्याग्नि की नकल पर जो आठ वेदियाँ बनाई गई हैं वे प्रान्तरिक्ष्य धिष्ण्याग्नियों की स्थानापन्न हैं । स्वान, भ्राज, अंधार आदि प्रान्तरिक्ष्य धिष्ण्याग्नियों के नाम हैं । अतः यहाँ भी इन के वे ही नाम रखे गये हैं । इन आन्तरिक्ष्य धिष्ण्याग्नियों की स्तुति करता हुआ अध्वर्यु इनकी सोमक्रयणसाधन-भूत गवादि पर कृपादृष्टि करा देता है ॥ ११ ॥
दीक्षा के समय यजमान के मस्तक पर जो शिरः प्रावरण वस्त्र डाल दिया गया था उसे अब सोम को यजमान की दक्षिण जंघा पर रखने के बाद हटा देता है । क्यों कि जो मनुष्य दीक्षा लेता है वह दिव्यात्मास्वरूप में उत्पन्न होने के लिए गर्भ बन जाता है । गर्भ उल्व व जरायु से आवृत रहना है । अतः यजमान रूप गर्भ को उल्व ( बाह्य गर्भावरण ) से वृत रहना पड़ता है । इसीलिए यजमान दीक्षा के समय उत्वस्थानीय मेखला धारण करता है तथा जरायुस्थानीय शिरोवस्त्र मस्तक पर डालता है । किन्तु आज सोमविक्रयण पर गर्भभूत यजमान को अध्वर्यु ने उत्पन्न कर दिया है अतः वह उस शिरःप्रावरण को हटा लेता है । इसके अनन्तर अध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र यजमान से बुलवाता है— ' परिमाग्ने दुश्चरिताद् बाधस्वा मा सुचरिते भज ॥ इति ॥ [ ४५६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मणे अग्ने! मुझे दुश्चरित अर्थात् आपत्ति से बचाइए तथा सदाचार में वर्तमान मुझ पर अनुग्रह कीजिए । प्रकृति में दक्षिण दिशा स्थिर रहती है और उसी में उत्तर से सोम आकर प्रतिष्ठित होता है । तदनुसार इस वैध यज्ञ में भी स्थिर बैठे हुए यजमान की दाहिनी जाँघ पर सोम को रखा जाता है प्रतिष्ठित किया जाता है, तब यजमान उठता है । किन्तु यह नियम - विरुद्ध है, मर्यादा - भङ्ग है कि महान् पुरुष के आ कर बैठ जाने के बाद घर वाले मनुष्य उठें । यह जो शिष्टाचार के नियम का उल्लंघन है, मर्यादाभङ्ग है, इसे ही मिथ्याचरण एवं व्रतभङ्ग कहा है । उस व्रतभङ्ग के प्रायश्चितरूप में यजमान मन्त्रोच्चारण करता हुआ अपराध के लिए क्षमायाचना करता है । इससे मर्यादा भंगरूप व्रत-भङ्ग का दोष हट जाता है ॥१३ ॥
तदन्तर यजमान निम्नांकित मन्त्र का उच्चारण करता हुआ सोम को अपने हाथों में ले कर खड़ा हो जाता है । ' उदायुषा स्वायुषोदस्थाममृताँ अनु ' इति । अर्थात् आयु के साथ तथा स्वायु के साथ अर्थात् आयुसाधनभूत सोम के साथ ( जो कि सोम अमृत रूप है ) मैं उठ गया हूँ । जो सोम के
साथ उठता है, वह अपनी आयु के साथ ही उठता है क्यों कि सोम ही आयु का साधन है ।
सोमाहुति पर ही आत्माग्नि की स्थिति है ॥ १४ ॥
इसके बाद सोम को ले कर सोमारोहण - स्थान शकट की ओर जाता है और निम्न-लिखित मन्त्र का उच्चारण करता है— ' प्रतिपन्थामपद्महि स्वस्ति गामने हसम् । ये न विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वसु ' इति । अर्थात् ऐसे मार्ग से, जो कि सुपरिष्कृत सुमार्ग है, हम जा रहे हैं । जिस मार्ग से जाता हुआ मनुष्य सर्व शत्रुओं को नष्ट कर निकाल देता है तथा धन को प्राप्त करता है ॥१५ ॥
इस कण्डिका में आख्यायिका द्वारा मन्त्र का प्रभाव बतलाया जाता है । भुवन स्वर्ग-वासी यज्ञ किया करते थे । असुर और राक्षस देवताओं के विरोधी थे । अतः उन्हें उन राक्षसों व असुरों के आक्रमण से भय हुआ । उन्होंने स्वस्त्ययन नामक इस मन्त्र को देखा । उन्होंने इस मन्त्र के द्वारा यज्ञविध्वंस करने वाले राक्षसों को नष्ट कर इस मन्त्र के यज्ञ-विध्वंसक राक्षसों से रहित अभयप्रदस्थान में यज्ञ को निर्विघ्न समाप्त किया । तथैव इस वैध यज्ञ में यह यजमान इस मन्त्र से यज्ञ - विध्वंसक असुरों का नाश कर इस मन्त्र - शक्ति से अभयप्रद, असुर - रहित स्थान में निर्विघ्न यज्ञ का समापन करता है । जिस मन्त्र शक्ति से यज्ञविध्वंसक असुरों का नाश किया था, वह यही मन्त्र है-' प्रतिपन्थामपद्महि स्वस्ति गामने हसम् ' । विश्वाः परिद्विषो वृणक्ति विन्दते वसु ' इति इस मन्त्र का अर्थ पूर्व- कण्डिका की व्याख्या में बतलाया जा चुका है ॥१६ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मण इस सोम को पहले पूर्वोक्त प्रकार से मस्तक पर रख कर लाते हैं, पश्चात् शकट में रख कर नियत स्थान पर ले जाते हैं । इस प्रकार वे इस सोम का सत्कार करते हैं । पहले भौमस्वर्गवासी देवता इस सोम को क्रयणस्थान से मस्तक पर रख कर लाये थे और बाद में शकट पर रखकर लाये थे । उसी प्रकार आज भी कृषक बीज का वपन करते समय उसे प्रथम मस्तक पर रख कर लाते हैं तथा बाद में गाड़ी में रख कर ले जाते हैं ॥१७ ॥
जहाँ सोम को खरीदा जाता है वहाँ जल रहता है । जल के स्थान पर ही सोम खरीदा जाता है । क्यों कि जल रस - रूप है और सोम भी सरस है, अतः जल - स्थान पर ही सोम को खरीदा जाता है । वह सोम हिरण्य से खरीदा जाता है, क्यों कि हिरण्य तेजोद्रव्य है । अतः उससे सोम खरीदना तेजोयुक्त सोम को खरीदना है । वस्त्र से खरीदता है । वस्त्र से खरीदता हुआ त्वचायुक्त सोम को खरीदता है । बकरी से सोम को खरीदता हुआ तपोयुक्त सोम को खरीदता है, क्यों कि अजा आग्नेय पशु है । गाय से सोम को खरीदता हुआ मलाई. युक्त अर्थात् सारभाग युक्त सोम को खरीदता है । गाय - बैल के जोड़े से सोम को खरीदता प्रजनन क्रिया में समर्थ मिथुन भावयुक्त सोम को खरीदता है । क्यों कि प्रजनन - सामर्थ्य मिथुन में ही है । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि हिरण्यादि दश द्रव्यों से सोम को खरीदना चाहिए | क्योंकि सोम वैराज है और विराट् दशाक्षरा है, अतः उसे दश द्रव्यों से ही खरीदा जाता है ॥१८ ॥
[ विज्ञान भाष्य ] सोम को सोमोपनहन वस्त्र में बाँध कर सोम बेचने वालों को दिया जाता है एवं बाद में उससे सोम खरीदा जाता है । सोम को अध्वर्यु ही खरीदता है । वह अध्वर्यु ' सोम बेचने वाले से सोमराजा को खरीदता है । " स वै राजानं पणते " | वह श्रध्वर्यु चूंकि सोम राजा को खरीदता है अतएव संसार के यच्चयावत् पदार्थ एक बार तो अवश्य ही पण्य बनते हैं अर्थात् एक बार सबकी कीमत होती । जो वस्तु हम बेकार समझते हैं उसकी भी कभी - कभी इतनी कीमत हो जाती है, जिसका कोई ठिकाना नहीं । तात्पर्य यही है कि प्रकृतियज्ञ में वाग् द्वारा वास्तव में सोम खरीदा जाता है एवं उस खरीदे हुए सोम से ही विश्व के सारे पदार्थ बनते हैं । सारा विश्व अग्नी-पोमात्मक ही तो है । सोम कीमती वस्तु है, खरीदी जाती है । अतएव सोम से निर्मित संसार के यच्च-यावत् पदार्थों का कोई मूल्य नहीं है, अर्थात् वे अमूल्य हैं । संसार में कोई भी चीज व्यर्थ नहीं है । यह चीज तो रद्दी है - अब यह किसी काम की नहीं है - यह कहना परमेश्वर की सृष्टि का तिरस्कार करना है | सब पण्य हैं अर्थात् परिणतव्य ( क्रय - विक्रय योग्य ) हैं । सब की कीमत है । व्यर्थ की, बिना मूल्य की, कोई वस्तु हीं है । प्रकृति में सोम खरीदा जाता है । इसी बात को परोक्ष रूप से बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-“ स यद् राजानं परणते तस्मादिदं सकृत् सर्वं पण्यम् " । अध्वर्यु ' सोम बेचने वाले से कहता है - सोमविक्रयिन! ( हे सोम बेचने वाले! ) क्या तुम्हारा यह सोम राजा ऋय्य है? अर्थात् क्या तुमने इसे बेचने के लिए यहाँ रक्खा है । सोम - विक्रयी उत्तर देता है-[ ४५८ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपरणन ब्राह्मण ऋय्यः । हाँ, यह वास्तव में बेचने के लिए है । अतएव यहाँ रक्खा गया है । अध्वर्यु कहता है, तो फिर तुम्हारे इस सोम को मैं खरीद सकता हूँ । सोम - विक्रयी कहता है - हाँ अवश्य खरीदिए । अध्वर्यु सोम की क़ीमत लगाता हुआ कहता है कि क्या एक कला ( गौ नाम के सोने के सिक्के के १६ वें हिस्से ) से अर्थात् सुवर्ण की एक इकन्नी ( पूर्व - प्रचलित रुपए के सोलहवें भाग ) से खरीद सकता हूँ? सोमविक्रयी कहता है - हे अध्वर्यु! यह सोम - राजा एक कला से अधिक मूल्यवान है । सोमविक्रय से कहता है- सोम की एक कला से अधिक मूल्य की हैसियत है, तुम्हारा यह कहना बिल्कुल ठीक है । परन्तु साथ ही तुम्हें यह भी समझ लेना चाहिए कि जिस गौ के सिक्के की यह कला है, उसकी महिमा भी तुम्हारे सोम से कम नहीं है । सिक्के से ही गो आती है । अतएव तत्-साधन को सिक्के को गौ कह दिया जाता है । सह-सोमविक्रयिन् ऋय्यस्ते सोमो राजा इति ( प्रश्नार्थे प्लुतः ) । ऋय्य - इत्याह सोमविक्रयी । श्रध्वर्यु: - तं वं ते क्रीणानि - इति । " क्रीणीहीत्याह सोमविक्रयी कलया ते क्रीणानि इति । भूयो वाऽग्रतः सोमो राजार्हतीत्याह सोमविक्रयी । भूय एवातः सोमो राजार्हति महाँस्त्वेव गोमहिमा इत्यध्वर्यु: " ॥१ ॥
कहता है कि देखो, गाय की यह महिमा है । गाय से इतने इतने वीर्य्यं उत्पन्न होते हैं । गाय का जो उसी वक्त निकाला हुआ दूध है, वह गाय का पहला वीर्य्य है । गरम दूध दूसरा वीर्य्यं है । मलाई इसका तीसरा वीर्य्य है । दधि इसका चौथा वीर्य्य है । दधि से होने वाला जो मट्ठा है, वह पाँच-वां वीर्य्य है । एवं जिससे दही जमता है, वह आतञ्चन नाम का छठा वीर्य्य है | कच्चे दूध से निकाला गया नवनीत ७ वां वीर्य्य है । घृत आठवाँ वीर्य्य है । एवं प्रामिक्षा और वाची क्रमशः नवें तथा दसवें वीर्य्य हैं । इस प्रकार गाय की जिस कला से हम सोम खरीद रहे हैं वह गाय १० वीर्य्यं धारण किए हुए है । क्या इतने पर भी गो महान नहीं हैं? " गोर्वै प्रतिधुक् " । तस्यै ( तस्याः ) शृतम् । तस्यै शरः । तस्यै दधि । तस्यै मस्तु । तस्याऽप्रातञ्चनम् । तस्यै नवनीतम् । तस्यै घृतम् । तस्याऽश्रा-मिक्षा । तस्यै वाजिनम् " ॥ २ ॥
परन्तु सोमविक्रयी एक कला में राजी नहीं होता है । तब अध्वर्यु कहता है कि अच्छा, तो क्या एक शाक से अर्थात् दो आने ( रुपए के आठवें भाग से तुम्हारे इस सोम को खरीद लूं? सोमवि = ऋयी कहता है- नहीं, सोमराजा की कीमत इससे भी अधिक है । श्रध्वर्यु कहता है - यह ठीक है कि सोम [ ४५६ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मणं सोमपणनं ब्राह्मणे राजा इससे भी अधिक कीमत का है, परन्तु इस गाय की भी कम कीमत नहीं । यह कह कर अध्वर्यु फिर " गोर्वै प्रतिधुक् " इत्यादि शब्दों से गाय के १० वीयों का बखान करता है और कहता है- अच्छा तो क्या एक चीनी ( पदा ) से तुम्हारे सोम को खरीद सकते हैं? वह सोम - विक्रयी वापस " भूयो वा " इत्यादि उत्तर देता है । फिर अध्वर्यु गौ महिमा का बखान कर कहता है कि अच्छा तो गौ के आधे हिस्से से-अर्थात् आठ आने से — खरीद सकता हूँ? फिर सोमविक्रयी ना कर देता है । फिर अध्वर्यु कहता है- प्रच्छा तो हम पूरे एक गो ( सोने के सिक्के ) से सोम खरीदते हैं । जब अध्वर्यु " " गवा ते कीरणा नि " यह कह देता है तो सोम - विक्रयी कहता है कि अब आपने सोम को क्रीत कर लिया, क्यों कि एक गौ ही इसका उचित मूल्य है— " शफेन ते क्रोणानीति । भूयो वाऽअतः सोमो राजार्हतीत्याह - सोमविक्र-यी । भूय एवातः सोमो राजाऽर्हति, महांस्त्वेव गोर्महिमेत्यध्वर्युरेतान्येव दश वीर्या-दाख्यायाह - पदा ते - ( क्रीणानीति- भूयो वा अतः इत्यादि पूर्वोक्तम् सर्वं वक्तव्यम् ) अर्धेन ते ( कीरणनीति सर्वं वक्तव्यम् ) गवा ते क्रीणामि इति । क्रीतः सोमो राजेत्याह सोमविक्रयो " । प्राचीन समय में एक रिवाज था कि जब कोई वस्तु खरीदी जाती थी तो बेचने वाले को ऊपर से बतौर पारितोषिक के, कुछ अतिरिक्त भी दिया जाता था, जिसका नाम था - वय । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि जब सोने का एक सिक्का मूल्य हो जाता तो सोम विक्रयी अध्वर्यु से कहता कि मूल्य तो हो गया अब आप वय क्या देंगे यह बतलाइए -" वयांसि प्रब्रूहीति ( इत्याह सोमविक्रयीति शेषः ) " ॥ ३ ॥
अध्वर्यु कहता है - मैं वय में तुम्हें चन्द्रमा दूँगा, अर्थात् चाँदी का रुपया दूँगा, वस्त्र दूँगा, बकरी दूँगा, गाय दूँगा, बैल दूँगा एवं तीन गौएँ अलग दूँगा— " स ग्राह - चन्द्रं ते ( दास्यामीति शेषः ) । वस्त्रं ते । छागा ते । धेनुस्ते । मिथुन ते गावौ । तिस्रस्तेऽन्या इति " । भगवान् याज्ञवल्क्य व्यवहार ज्ञान कराते हुए कहते हैं - वह अध्वर्यु चूँकि छोटी - छोटी रकम से मूल्य लगाता है एवं अन्त में जा कर वड़ी रकम पर सौदा तय करता है, अतएव आज भी सौदा खरीदते समय पहले - पहले मनुष्य थोड़ी ही कीमत लगाते हैं और बाद में बढ़ी हुई रकम पर तय करते हैं क्योंकि शुरू से ऐसा ही होता आया है । " स यदर्वाक् परणन्ते परः सम्पादयन्ति । तस्मादिदं सकृत् सर्वं पण्यमर्वा-वपणन्ते परः सम्पादयन्ति " | [ ४६० ]