Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 471–480
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 471–480
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मण गाय की बहुत महिम ) है, यह दस वीथ्यों की धारक है, बहुत ही श्रेष्ठ वस्तु है । इस प्रकार अध्वर्यु ही गाय के वीर्थों की प्रशंसा करता है । सोमविक्रयी एक बार भी सोम की प्रशंसा नहीं करता । कारण इसका यही है कि सोम तो प्रतिप्रसिद्ध वस्तु है । सोम तो साक्षात् देवता है, दुनिया में प्रसिद्ध है । इसकी महिमा का बखान करना सूर्य्यं को दीपक दिखाना है । " अथ यदध्वर्युरेव गोर्वीर्याण्युदाचष्टे -न -I सोमस्य सोमविक्रयी । महितो वं सोमः । देवो हि सोमः " । सोम को गाय से ही खरीदना चाहिए । क्यों कि गाय में ही इतने वीर्य्यं हैं । बस, लोग - बाग याज्ञिक मनुष्य - गाय के इन वीर्य्यो का परिचय दे कर गाय से ही सोम खरीदें । अतएव श्रध्वर्यु गाय की ही प्रशंसा करता है, सोमविक्रयी सोम की नहीं करता । क्यों कि वह तो प्रसिद्ध ही है— " अथैतदध्वर्युर्गां महयति । तस्यै पश्यन् वीर्याणि कीरणात् इति । तस्मा-दध्वर्युरेव गोर्वीर्याण्युदाचष्टे -न सोमस्य सोमविक्रयी " || ४ || अध्वर्यु सोम का मूल्य क्रमशः कला, शफ, पद, अर्ध, गौ- इन पाँच वस्तुनों से लगाता है । पाँच बार वह बढ़ा - बढ़ा कर सोम का मूल्य लगाता है । वास्तव में देखा जाय तो सोम खरीदा तो जाता ही है । फिर यह जो पाँच बार मोल - भाव बढ़ा कर सोम खरीदने का अभिनय करना है, इसका कारण कुछ और ही है । सोने के रूप में मूल्य के निमित्त जो कुछ सोम विक्रयी को दिया जाता है, वह उससे वापस लोटा लिया जाता है । केवल एक बकरी उसे दी जाती है । अतएव मालूम पड़ता है कि ये पाँच मूल्य - क्रम भी किसी खास कारण से ही रक्खे गये हैं । पाँच ही बार मूल्य बढ़ा कर क्यों सोम राजा को खरीदते हैं? तीन या चार बार में ही मूल्य का निश्चय क्यों नहीं हो जाता? भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - भाई ४ या ६ बार मोल न लगा कर जो ५ बार ही मोल - भाव बढ़ाने और सोम के खरीदने का अभिनय किया जाता है, उसका कोई खास मतलब है । बस जिस अभिप्राय से अध्वर्यु ' पाँच बार बोली बढ़ा कर ही सोम खरीदता है, उसका कारण बतलाते हैं— " प्रथ यत् ( यस्मात् ) पञ्च कृत्वः परणते ( तदुच्यते - इति शेषः ) " । हम सोम - यज्ञ कर रहे हैं । अग्नि में सोम की आहुति पड़ने का नाम ही यज्ञ है । पार्थिव अग्नि में पार-सोम की आहुति पड़ा करती है - इसी से सारे संसार का निर्माण हो रहा है । पृथिवी के केन्द्र से ले कर २१ अहर्गण तक का जो मण्डल है उसी का नाम संवत्सर है । यह संवत्सर अग्निमण्डल ही है । पूरे संवत्सराग्नि का ३६० दिन में उस पारमेष्ठ्य सोम से सम्बन्ध हो पाता है, अतएव संवत्सरमण्डल को यज्ञ कहा जाता है । संवत्सराग्नि में सोमाहुति पड़ने का नाम ही तो यज्ञ है । अतएव हम अवश्य ही यज्ञ को संवत्सर - संमित कह सकते हैं । इस संवत्सर की वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, हेमन्त - ये पाँच ऋतुएँ होती हैं । शिशिर को हेमन्त में [ ४६१ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपरणन ब्राह्मण मिला लिया जाता है । पञ्चतु विभाग वैदिक विभाग है । इसीलिए ग्राज भी " पून्यू पड़वा टाले, दिन बहत्तर गाले " की कहावत प्रचलित है, जिसका यही मूल है । इसीलिए श्रुतियों में बार - बार ' पञ्च-तंवः संवत्सरस्य । हेमन्त शिशिरयोः समासेन " यह लिखा रहता है । संवत्सराग्नि को आत्मसात् करने का नाम ही तो यज्ञ है । चूंकि संवत्सर पंचावयव है एवं संवत्सराग्नि यज्ञाधिष्ठाता सोम है । प्रकृति-मण्डल में पञ्चावयव - स्वरूप संवत्सर से ही वह सोम खरीदा जाता है, अतएव इस वैध यज्ञ में भी यह यजमान पांच बार मोल - भाव करके ही सोम खरीदता हुआ उस यज्ञ को पाँच अवयवों से प्राप्त कर लेता है । तात्पर्य यही है कि प्राकृतिक यज्ञ पाँच अवयवों में विभक्त है । अतएव पाँच बार मोल - भाव करके खरीदना - भावना द्वारा उस पंचावयव यज्ञ को आत्मसात् करना है । इसीलिए पाँच बार ही सोम का मूल्य लगाया जाता है-" संवत्सरसंमितो वै यज्ञः । पञ्च वाऋतवः संवत्सरस्य । तं पञ्चभि-राप्नोति । तस्मात् पञ्च कृत्वः परणते " || ५ || सोम खरीदने के लिए, एकहायनी गौ और हिरण्यादि द्रव्य दिए जाते हैं । इन १० द्रव्यों से अध्वर्यु जब सोम खरीदने के लिए सोमविक्रयी को सुवर्णं इत्यादि देता है - उस समय यह अध्वर्यु यजमान से निम्नलिखित मन्त्र बुलवाता है— “ शुक्रं त्वा शुक्रेरण क्रीणामि, चन्द्र चन्द्रेरणामृतममृतेन " । शुक्र अर्थात् वीर्य्य - स्वरूप दीप्तियुक्त जो आप ( सोम ) हैं, उनको मैं वीर्य्यस्वरूप दीप्त सुवर्ण से ही खरीद रहा हूँ । अर्थात् " गुञ्जया सह तोलनम् " - वत् मैं आपकी बेइज्जती नहीं करता हूँ, अपितु जैसा आपका स्वरूप है उसी के अनुसार आपको खरीद रहा हूँ । आप भी दीप्यमान हैं और सुवर्ण भी दीप्यमान है | चन्द्र स्वरूप आह लादक आपको आह्लादकारी सुवर्ण से ही खरीदता हूँ एवं अमृतस्वरूप जो हैं उनको अमृत से ही खरीदता हूँ । सुवर्ण वास्तव में अमृत है । सुवर्ण दिव्य - लोक की वस्तु है । पृथिवी में बद्ध सूर्य - रश्मि का नाम ही तो सुवर्ण है । अतएव इसे हम अवश्य ही अमृत कह सकते हैं । सोम शुक्र स्वरूप है - चमकदार है । सोम फास्फोरस की तरह चमका करता है । सोम राल की तरह दाह्य पदार्थ है एवं ग्राह्लादकर है । इसको देखने से ही तबियत हरी हो जाती है । एवं पीने से भी तबियत फड़क उठती है । यह तीसरे द्यु की वस्तु है, अतएव अमृत भी है । इसी अमृत को पी कर तो पार्थिव प्राग्नेय देवता मर नहीं पाते । जोगुण सोम में हैं वे ही सुवर्ण में हैं । सुवर्ण भी चमकदार है । देखते ही तबियत फड़क उठती है । एवं पृथिवी में पड़ती हुई सौर- रश्मियाँ ही तो सुवर्ण हैं, श्रतएव अमृत भी है । अर्थात् दिव्यलोक की वस्तु है । ऐसी अवस्था में शुक्र - चन्द्रवत् अमृतस्वरूप सोम को शुक्र - चन्द्र - ग्रमृतस्वरूप हिरण्य से खरीदना - सोम को इज्जत के साथ खरीदना है । जैसा कीमती योग सोम है तदनुरूप ही उसकी कीमत भी है । [ ४६२ ]
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपान ब्राह्मण बस इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रख कर मन्त्र का अर्थ करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं – यह सुवर्णं शुक्र है - इस प्रकार सुवर्ण से इसे खरीदता हुआ - शुक्र से शुक्र को खरीदता है । " शुक्रं ह्येतत् शुक्रेरण क्रीणाति - यत्सोमं हिरण्येन " । यह हिरण्य वास्तव में चन्द्र है अर्थात् ग्राह्लादकर है । तो सोम को जो सुवर्ण से खरीदता है वह चन्द्र से चन्द्र को खरीदता है-" चन्द्रं ह्येतत् । चन्द्रेण कीरणाति यत्सोमं हिरण्येन " । सुवणं वास्तव में अमृत है । तो, जो यजमान सुवर्ण से सोम खरीदता है, वह अमृत से अमृत को खरीदता है-" अमृतं ह्येतत् श्रमृतेन कीरणाति यत्सोमं हिरण्येन " ॥६ ॥
सोम - विक्रयी को गो और सुवर्ण दोनों दे दिये जाते हैं । ऐसी अवस्था में गो और सुवर्णं दोनों सोमविक्रयी की वस्तुएँ बन जाती हैं । उससे अध्वर्यु दोनों वस्तुएँ ले कर फिर यजमान को वापस दे देता है । अपनी सम्पत्ति यदि छिन जाती है तो आत्मा काँप उठता है । धैर्य जगह छोड़ देता है । अध्वर्यु सोम - विक्रयी को दी हुई वस्तु वापस ले कर यजमान को देता है अतएव सोम - विक्रयी का दिल जगह छोड़ देता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " अथ सोमविक्रयिरणमभिप्रकम्पयति ( अध्वर्यु ) ” । अध्वर्यु सोम - विक्रय से कहता है “ सम्मे ते गौः " हे सोम विक्रयिन्! तेरी जो यह गाय है वह वास्तव में यजमान की है । गो सम्पन्न को सम्म कहते हैं । यजमान संपन्न है अतएव यह गाय तेरी नहीं श्रपितु पालने वाले की है, अर्थात् यजमान की है । इस प्रकार " सम्मे ते गौः ” कह कर वहाँ पर यजमान को बुला कर उस गाय को यजमान के सुपुर्द करता हुआ कहता है-" तद्यजमानमभ्याहृत्य न्यस्यति । अस्मे ते चन्द्रारिण " । अध्वर्यु कहता है कि जैसे गौ यजमान की है, वैसे यह तुम्हारा सुवर्ण मेरे लिए है । यह कह कर अध्वर्यु दक्षिणा - स्वरूप द्रव्य को आत्मसात् कर लेता है । इस प्रकार यजमान गौ को ले लेता है एवं अध्वर्यु सुवर्ण ले लेता है । बेचारा सोम - विक्रमी अपने हाथ को वापस लौटा लेता है | तात्पय्यं इस प्रपञ्च से यही बतलाना है कि सुवर्ण और गाय दोनों सोम - विक्रयी को दे दिये जाते हैं । परन्तु यजमान और अध्वर्यु ' इस सम्पत्ति - दान से सदा के लिए गौ- सुवर्ण से शून्य न हो जाएँ श्रतएव दोनों को आत्म-सात् करने की भावना से सोम - विक्रयी से वापस लौटा लिया जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " सम्मे ते गोरिति यजमाने ते गौरित्येवैतदाह । तद्यजमानमभ्याहृत्य न्यस्यति । अस्मे ( श्रध्वर्यवे ) ते चन्द्राणि इति । स ( अध्वर्युः ) श्रात्मन्येव वीर्यं ( सुवर्णं ) धत्ते । शरीरमेव सोमविक्रयी हरते " । [ ४६३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मण सोम - विक्रयी अध्वर्यु के कहने पर हाथ में रक्खे हुए सुवर्ण को आगे बढ़ाता है एवं अध्वर्यु जब सोना ले लेता है तो वह बेचारा अपने खाली हाथ को वापस लौटा लेता है । यहीं " शरीरमेव सोम-विक्रयो हरति " यह कहा गया है । सोम - विक्रयी से दोनों वस्तुएँ केवल, हमसे सम्पत्ति सदा के लिए न चली जाए, इस खयाल से ले ली गई थीं । जब सम्पत्ति के आत्मसात् करने की भावना मन्त्र द्वारा हो जाती है तो गाय और सुवर्णं सोम - विक्रयी को वापस लौटा दिए जाते हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" तत्ततः सोमविक्रय्यादत्ते " || ७ || सोम खरीदने के लिए जैसे सुवर्ण और गाय दी जाती है वैसे ही एक बकरी भी दी जाती है । इस बकरी को प्रतीचीन ( पश्चिम की भोर ) मुख करके अर्थात् जिधर सोम - विक्रयी खड़ा है उस र बकरी का मुख करके अध्वर्युं यजमान से निम्नलिखित मन्त्र बुलवाता है— " तपसस्तनूरसि इति । प्रजापतेर्वर्णः । परमेण पशुना क्रीयसेऽइति । सहस्रपोषं पुषेयम् " - इति । हे अजे, श्राप प्रजापति के तप से बनी देह हो । पुरुष, प्रश्व गौ, अवि, प्रज - ये पाँच पशु - प्राण कहलाते हैं । ये पाँचों ही प्रजापति से उत्पन्न होते हैं । प्रजापति से चित्याग्नि अभिप्रेत है । दोनों में से मर्त्य श्रग्नि की जो वाष्प है, उसी से श्रजः " यह कहा जाता है । श्रज भाप से पंदा होता उत्पन्न होती है । अश्व पार्थिव तथा सौर अग्नि के अग्नि, मत्यं - श्रमृतभेदेन दो प्रकार का है । प्रजाप्राण उत्पन्न होता है । इसीलिए - " प्राग्नेयो वै है । पुरुष वैश्वानर से उत्पन्न होता है । गौ सूर्य से घर्षण से अर्थात् अंगिरा - आदित्य के घर्षण से उत्पन्न होता है । प्रकृत में केवल प्रजा के विषय में ही कहना है । अजा का आरम्भण द्रव्य प्रजापति की अर्थात् चित्याग्नि की भाप है । उसी से अज पशु उत्पन्न होता है । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं. -" तपसो ह वाडएवा प्रजापतेः संभूता यदजा । तस्मादाह तपसस्तनूरिसीति " । यह अजा प्रजापति के ढंग की है । प्रजापति का और प्रजा का स्वरूप मिलता - जुलता है । प्रजा-पति अग्नि का नाम है । इसका शरीर संवत्सर ही है । संवत्सर - मण्डल का नाम ही तो अग्नि है । श्रग्नि ही का तो नाम संवत्सर है । यह अग्नि सारे संवत्सर में भरा हुआ है । यह संवत्सर - प्रग्नि, प्रजा-पति - संवत्सर के तीन विभाग करके उसे तीन ही बार प्रसूत करता है, अर्थात् उत्पन्न करता है । वर्ष भर में प्रजापति तीन बार अन्न उत्पन्न करता है - श्यालू ( खरीफ ) उन्हालू ( रबी ) और चौमासा-एक वर्ष में ये तीन फसलें होती हैं । एवं उधर बकरी संवत्सर ( वर्ष ) में तीन बार बच्चे देती है । अन्य पशु वर्ष में एक ही बार बच्चा देते हैं परन्तु बकरी साल भर में तीन बार ब्याती है । अतएव प्रजनन - स्वरूप साधर्म्यात् हम इस बकरी को भी प्रजापति - सवर्णं कहने के लिए तैयार हूँ । वास्तव में बात ठीक है । यदि तीनों प्राण इसमें न प्राते तो यह हगिज तीन बार नहीं ब्या सकती [ ४६४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) याज्ञवल्क्य " प्रजा " वह वास्तव में " श्राजा ” सोमपणन ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण " सहस्रपोषं पुषेयम् " । [ ४६५ ] थी । परन्तु व्याती है - प्रतएव मानना पड़ता है कि प्रजापति की तीनों प्रजनन - शक्तियाँ इसमें शामिल हैं । " सा यत्त्रिः संवत्सरस्य विजायते तेन प्रजापतेर्वर्णः " । ऐसा जो यह श्रजा नामक परम अर्थात् प्रत्युत्कृष्ट पशु है, उससे सोम को खरीदते हैं । और-और पशुद्मों में संवत्सर प्रजापति का प्राण अल्पमात्रा में प्राता है एवं इस प्रजा में संवत्सर के तीनों प्राण आ जाते हैं । यह श्रजा इसी की बदौलत एक वर्ष में तीन बार ब्याती है । प्रतएव अन्य पशुओं की अपेक्षा हम इसे परमपशु कहने के लिए तय्यार हैं । " सा यत् त्रिः संवत्सरस्य विजायते तेन परमः पशुः ” । तात्पर्य यही है कि सोम मामूली वस्तु नहीं है, अपितु महाविशिष्ट वस्तु है । सोम राजा है । राजा ही नहीं, सम्राट् है । प्रतएव इसको प्रजा से खरीदा जाता है । क्यों कि प्रजा भी सामान्य वस्तु नहीं है, यह भी प्रजापति का शरीर है, परम पशु है, आग्नेय है, संवत्सर के अनुरूप है । प्रकृति-मण्डल में विभागत्रय युक्त संवत्सराग्नि द्वारा ही तो परमेष्ठि- मण्डल में से सोम श्राता है । यह प्रजा उसी श्रग्नि प्रजापति की प्रतिकृति है । तो इसके प्रतिफल में सोम खरीदना, उस प्रजापति से सोम खरीदना है-हे सोम! मैं परिपूर्ण पुष्टि को प्राप्त हो जाऊँ । सारे मन्त्र का अर्थ यही है कि हे श्रजे, आप प्रजा-पति के तप का शरीर हैं । आप प्रजापति श्रग्नि के वाष्प से उत्पन्न हुई हैं । एवं भाप प्रजापति की वर्णं हैं । ऐसा जो यह परम पशु है, अत्युत्कृष्ट पशु है, हे सोमराजा, इसे दे कर मैं आपको खरीदता हूँ । अतएव नाप मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि जिससे मैं पुत्र - पौत्रादिरूप परिपूर्ण पुष्टि को परिपूर्ण भूमा को प्राप्त हो जाऊँ । याज्ञवल्क्य मन्त्र का तात्पर्य्यार्थं बतलाते हुए कहते हैं कि यजमान इस मन्त्र से आशीष ही माँगता है । सहस्र का अर्थ कोई हजार नहीं समझे अतएव कहते हैं कि भूमा को, बहुत्व को, सहस्र कहते हैं । ऐसी अवस्था में " सहस्रपोषं पुषेयम् " का यही तात्पर्य है कि मैं भूमा को, बढ़ोत्तरी को, प्राप्त हो जाऊँ—
" श्राशिषमेवैतदाशास्ते, भूमा वै सहस्रं । भूमानं गच्छानीत्येवैतदाह " ॥ ८ ॥
वह श्रध्वर्युं इसी मन्त्र से प्रजा को, सोम - विक्रयी को सौंप देता है श्रौर सोम ले लेता है । इसी मन्त्र से बकरी को सौंप देता है और इसी मन्त्र से सोम को ले लेता है-" स वाऽनेनैवाजां प्रयच्छति - श्रनेन राजानमादत्ते " । शब्द का निबंचन करते हुए कहते हैं कि जिसे प्रजा शब्द से कहा जाता है । ' है । " श्राजा " - यह असली नाम है, चूँकि इसी से अन्ततोगत्वा सोम - यजमान
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) ` शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मण की ओर आता है । अतएव " प्राजनसाध " कत्वात् " इसे आजा कहते हैं । सोम खरीदने के लिए सोना-गाय - वस्त्र आदि कई वस्तुएँ दी जाती हैं । परन्तु अन्ततोगत्वा सोम - बकरी से ही अभिमुख होता है । " प्राज " कहते हैं अभिमुख्य को । इसमें साधनभूता यह बकरी ही है । अतएव इसे ही श्राजा कहने लग गये । इसी को परोक्षप्रिय देवता " प्रजा " शब्देन व्यवहृत करते हैं—
" श्राजा ह वै नामैषा यदजा । एतया ह्येनं ( सोम् ) अन्ततः श्राजति ।
तामेत्परोऽक्ष मजेत्याचक्षते " ॥९ ॥
बकरी पूर्वोक्त मन्त्र द्वारा सोम - विक्रयी को दे दी गई । अब श्रध्वर्यु -" मित्रो न ऽएहि सुमित्रधः ” । यह कहता हुआ उस सोम राजा को अपने हाथ में ले लेता है । सोम, आप सुमित्रधा होते हुए यजमान के मित्र बन कर इस यज्ञ में पधारिए । मित्रता दोनों से सम्बन्ध रखती है । यदि दोनों परस्पर एक दूसरे को चाहते हैं तो मित्रता रहती है । एक के मन में कपट है तो फिर मित्रता नहीं निभ सकती । सुमित्रधः का यही तात्पर्य्यं है कि जैसे यजमान आपको अपना मित्र समझता है तथैव प्राप भी यजमान को अवश्य ही अपना मित्र समझें - आप सुमित्रधा हैं, अर्थात् अच्छे - अच्छे मित्र रखने वाले हैं । हे सोम! ऐसे आप मित्र बन कर इस यज्ञ में आइए । कई पदार्थ ऐसे होते हैं कि घर में जिनके आते ही उपद्रव हो जाता है । किसी - किसी का पग-फेरा ही ऐसा होता है । कोई मनुष्य तो ऐसा होता है कि घर में जिसके आते ही त्राहि - त्राहि मच जाती है । किसी के आते ही पौ - बारा - पच्चीस हो जाते हैं । सोम श्राज हमारे यजमान के घर में आ रहा है । कहीं ऐसा न हो कि इसका आगमन बजाय शांति के, उपद्रव का कारण बन जाए । इसीलिए सोम से प्रार्थना करते हैं कि हे सोम! आप हमारे लिए ( यजमान के लिए ) शिव और शान्तस्वरूप बन कर ही इस यज्ञ में पधारिए । यही - " मित्रो न एहि सुमित्रधः " का तात्पय्यं है— " शिवो नः शान्त s एहीत्यवैतदाह " । इसके बाद अध्वर्युं उस सोम को यजमान की दाहिनी जाँघ पर रख कर उस सोम पर वस्त्र रख देता है । क्रीत सोम को यजमान की दाहिनी जाँघ पर रख कर उसे एक वस्त्र से ढ़क देना चाहिए-यही तात्पर्य है । जिस समय अध्वर्युं यजमान की दाहिनी गोद में सोम रखता है - उस समय यह कहता है— " इन्द्रस्योरुमाविश दक्षिणम् " । हे सोम! आप इन्द्र की दाहिनी जाँघ पर बैठिए । अग्नि में सोमाहुति पड़ने का नाम ही यज्ञ है, यह बात पूर्व के प्रकरणों में हम कई स्थानों पर बतला आये हैं । यह अग्नि पृथिवी के २१ प्रहर्गण तक [ ४६६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मण वितत रहता है । २१ पर सूय्यं है । इन्द्र - धाता - भग - पूषा इत्यादि द्वादश प्राण - समष्टि का नाम ही सूर्य्य है । इन सब प्राणों में इन्द्र ही प्रधान है । इन्द्र ही जाँघ का अधिष्ठाता है । गति से ही संसार-यज्ञ हो रहा है । हाथ - पैर चलना बन्द हुआ कि सारा काम समाप्त हुआ । यज्ञ - प्रवर्तक इन्द्र - प्राण ही है । इसीलिए श्रुति कहती है-" यज्ञ इन्द्रगवर्धयत् - यद्भूमिं व्यवर्तयत् । चक्रारण श्रोपशं दिवि " - इति । ( ऋग्वेद मं ० ८ | १४ | ५ ) यज्ञ के अधिष्ठाता इन्द्र सूय्यं प्राण का नाम है । श्रतएव हम सूय्यं को भी, यज्ञ कह सकते हैं । इस सूर्य का जो उत्तर भाग है, वह इसकी उत्तर जाँघ है और दक्षिण भाग दक्षिण जाँघ है । जैसे अग्नि दक्षिण से उत्तर को जाया करता है तथैव सोम उत्तर से दक्षिण को भाया करता है । सोम का दक्षिण की ओर श्राना इन्द्र की दाहिनी जाँघ पर श्राना है । प्रकृतिमण्डलस्थीत सोम उत्तर दिशा से आ कर इन्द्र की दाहिनी जाँघ पर ही बैठता है । अर्थात् सोम की स्थिति दक्षिण में होती है । श्रतएव इसी के अनुसरण पर यजमान - स्वरूप इन्द्र की दाहिनी जाँघ पर ही यह सोम रक्खा जाता है । अपि च भुवन - स्वर्गवासी इन्द्र देवता ने सोम - रक्षार्थं चन्द्रमा का ब्रह्मा द्वारा राज्याभिषेक करवा कर, प्रसन्न हो कर, उसे अपनी दाहिनी जाँघ पर बैठाया था । तात्पर्य्यं यही है कि इस पूर्वोक्त मन्त्र के ऐतिहासिक और प्राधिदैविक दोनों प्रर्थ हैं । आज यह यजमान अपने यज्ञ का इन्द्र है, स्वामी है । प्रतएव प्रकृतिवत् दाहिनी जाँघ पर सोम रक्खा जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " एष वाऽअत्रेन्द्रो भवति यद्यजमानः । तस्मादाह - इन्द्रस्योरुमा विश दक्षि-गमित्युशन्नुशन्त मिति " । सोम, कामयमान श्राप - कामयमान जो उरु है— उस पर विराजिए । तात्पर्य्यं यही है कि उरु भी आपसे उद्विग्न न हो और भाप भी उरु से उद्विग्न न हों । दोनों में प्रेम रहे । बाज मौके पर हमें एक मक्खी भी शरीर पर नहीं सुहाती । ऐसा न हो कि जाँघ उद्विग्न हो जाए एवं साथ ही आप भी ( जाँघ पर तिष्ठ रहना ) पसन्द न करें - यही तात्पर्य है । इसका अर्थ करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं- प्रिय जो आप हैं वे प्रिय उरु पर विराजिए । " प्रियः प्रियमित्येवैतदाह स्योनः स्योनमिति शिवः शिवमित्येवैतदाह ॥ १० ॥
कल्याणस्वरूप जो आप हैं, वे कल्याणस्वरूप इस उरु पर विराजिए । तात्पर्य कथन का यही है कि सोम का यजमान के साथ याज्ञिक - सम्बन्ध हो जाए । यजमान सोमात्मक बन जाए । जिस समय गायत्री सोम लेने गई थी, उस समय गन्धर्व उस सोम की रक्षा कर रहे थे । धिष्ण्याग्नि वह कहलाती है जो कि अन्तरिक्ष में रहती है । ये ही आठ गन्धर्व हैं । परमेष्ठी में से ग्राने वाला सोम इन्हीं आठों प्रान्तरिक्ष्य धिष्ण्याग्नियों में व्याप्त रहता है । अन्तरिक्ष में सोम अतिमात्रा में भरा रहता है-[ ४६७ ]
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बृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मण अतएव " त्वमात्म सर्वान्तरिक्षम् " यह कहा जाता है । ये प्राठों ही विद्युत् हैं । बिजली के आठ ही ( विभाग ) होते हैं । आठ जाति की बिजली होती है । यही ८ विद्युत - जातियाँ धिष्ण्याग्नि नाम से प्रसिद्ध हैं । इन आठों के स्वान, भ्राज, अंगार, बम्भार, हस्त, सुहस्त, कृषानु आदि -आठ नाम हैं । जिस विद्युत् में चट् - चट् - चट् आवाज प्राती है, वह स्वान - गन्धर्व कहलाता है एवं जिससे एकदम प्रकाश हो जाता है । उसे भ्राज - गन्धर्वं कहते हैं । जिस विद्य ुत् से पाप का विनाश होता है अर्थात् हवा फिल्टर होती है, उसका नाम घार है, एवं जो प्रतिशयेन भरण करता है - बल देता है, वही बम्भार - गन्धर्व कहलाता है विद्युत् का नाम ही इन्द्र है । इसीलिए " तस्यैष सृष्टिविधाते ते विद्यु बाह " यह कहा जाता है । इन्द्र ही अर्थात् विद्युत् ही से तो बल मिलता है अतएव " या च का च बलकृतिरिन्द्र कर्म एव ता " यह कहा जाता है । एवं जिससे विकास होता है, जो मुग्धभाव हरता है, उसका नाम हस्त है । जो विद्युत् दूर तक जाती है उसी का नाम सुहस्त है । एवं जो विद्युत् स्थूल वस्तु को पैना बना देती है, उसी का नाम कृषानु है । विद्युत् यद्यपि एक ही है परन्तु आाठ अवस्थाओं के कारण एक ही के आठ नाम हो जाते हैं । ये सभी रूप अन्तरिक्षमें रहते हैं । रहते हैं यद्यपि त्रिभुवन में परन्तु प्रातिस्विक स्थान इनका अन्तरिक्ष ही हैं । इन्हीं के द्वारा हमारे पृथिवीलोक पर सोम श्राता है । अन्तरिक्ष में ही आठों गन्धर्व रहते हैं वे ही सोमविक्रयी हैं । पार्थिवाग्नि अर्थात् गायत्री इन्हीं से सोम खरीदती है । इनकी ही अनुकृति पर इस सोम-याग में आठ धिष्ण्याग्नियाँ बनाई जाती हैं । ये गन्धर्व ही सोम के देने वाले हैं - प्रतएव इनसे प्रार्थना करते हैं-" स्वान भ्राजाङ्गारे बम्भारे हस्तसुहस्त कृशानवेते वः सोमक्रयणास्तान् रक्षध्वम् । मा वो दभन् ” । हे स्वानभ्राजादिगन्धर्वो! यह सोमऋयण अर्थात् सोम खरीदने वाले - सोम खरीदने के साधनभूत - गो - हिरण्य वस्त्रादि आपके हैं अर्थात् सोम खरीदने से सब आप ही के हैं । चूँकि ये सब श्रापके हैं प्रत-एव आप सोमक्रय - साधनभूत इनकी ( वागादि की ) रक्षा कीजिए । हे गन्धर्वो! श्राप इनकी हिंसा कभी न करें । कभी इनको न दबाएँ- हमारी यही प्रार्थना है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि सोमयज्ञ में जो आठ वेदियाँ बनाई जाती हैं वे आन्तरिक्ष्य - धिष्ण्याग्नियों की स्थानापन्न हैं । अंधार इत्यादि उन धिष्ण्याग्नियों के नाम हैं अतएव इनके भी यही नाम रक्खे गए हैं । बस, इन ग्राठों की स्तुति करता हुआ यह अध्वर्यु इन पदार्थों के लिए ( सोम क्रयार्थ द्रव्यों के लिए ) उन्हें आठों गन्धर्वो की क्षमादृष्टि में ला देता है । उनकी कृपा - दृष्टि इनके लिए प्राप्त कर इन्हें सम्पन्न कर देता है । तात्पय्यं यही है कि सोम के अधिष्ठाता धिष्ण्याग्नि ही हैं । अतएव सोम लेते समय अवश्य ही उनकी स्तुति करनी चाहिए-" धिष्ण्यानां वाऽएते भाजनेनैतानि वं धिष्ण्यानां नामानि तान्येवैभ्य एतदन्वदिक्षत् " ॥११ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) दीक्षा के समय यजमान को वस्त्र सोम को यजमान के दक्षिण उरु पर रखने आवरण वस्त्र को उतार लेता है-शतपथ ब्राह्मणं सोमपान ब्राह्म उढ़ाया जाता है । मस्तक पर वस्त्र डाल दिया जाता है । के बाद वह अध्वर्यु उस वस्त्र को उघाड़ देता है, शिर-" प्रथात्रापोर्णुते " । क्यों इस समय वह वस्त्र हटा दिया जाता है? इसका कारण बतलाते हुए कहते हैं कि जो मनुष्य दीक्षा लेता है - वह गर्भ बनता है । दिव्यात्म स्वरूप में पैदा होने के लिए यजमान को गर्भ बनना पड़ता है । गर्भ उल्व श्रौर जरायु से प्रावृत रहते हैं । चूँ कि यजमान गर्म बना हुआ है - प्रतएव इस यजमान को प्राकृतिक नियमानुसार उत्व और जरायु से प्रावृत होना पड़ता है । इसीलिए वह उल्व-स्थानीय मेखला पहिनता है और सिर पर जरायु स्थानीय वस्त्र डालता है । उस गर्भभूत यजमान को सोमविक्रयानन्तर अध्वर्यु ने नए दिव्यात्मरूप में पैदा कर दिया है । श्रतएव अध्वर्यु उस जरायुस्थाना-पन्न वस्त्र को हटा लेता है, क्यों कि प्रकृति में भी पैदा हुए बाद जरायु अपने प्राप हट जाते हैं । जब तक सोम नहीं आता तब तक दिव्यात्म - प्रजनन में संदेह रहता है । परन्तु सोम के आते ही मान लिया जाता है कि दिव्यात्मा उत्पन्न हो गया, यद्यपि अभी वह उत्पन्न होगा । क्षपयाग ( सुत्या ) के अनन्तर यह मान लिया जाता है— " अथात्रापोर्णुते । गर्भो वाऽएष भवति यो दीक्षते । प्रावृता वै गर्भा ऽउल्बेनेव जरायुणेव तमत्राजीजनत । तस्मादपोर्णुतः ” । पहले प्रावरण हो तभी तो उसे हटाया जाए । तो यहाँ पर प्रश्न होता है कि पहले उस पर श्रावरण कहाँ था? इसी का उत्तर देते हुए कहते हैं कि यजमान इस यज्ञ में गर्भ बनता है । अतएव वह दीक्षा के समय ही वस्त्र से परिवृत हो जाता है क्यों कि गर्भ उत्व और जरायु से परिवृत ही होते हैं । बस उसी आवरण को सोमानन्तर अध्वर्यु हटा देता है— " एष वाऽत्र गर्भो भवति तस्मात् परिवृतो भवति परिवृता ऽइव हि गर्भा उल्बेनेव जरायुरणेव " ॥१२ ॥
इसके अनन्तर अध्वर्यु यजमान से निम्नलिखित मन्त्र बुलवाता है-" परि माग्ने दुश्चरिताद् बाधस्वा मा सुचरिते भज - इति " । हे अग्ने, मा ( मां ) दुश्चरितात् बाधस्व ( त्रायस्व ) मा ( मां ) सुचरिते ( सदाचारे ) आभजे | हे सोम! पत्तियों से मुझे बचाइए और मुझे सदाचार में प्रवृत्त कीजिए । मैं असदाचारी न बनूँ अपितु सदाचारी बनूँ, यही आशीर्वाद दीजिए । प्रकृतिमण्डल में इन्द्र का दाहिना पाँव अर्थात् दक्षिण दिशा स्थिर रहती है एवं इस स्थिर - दिशा में आता हुआ सोम उस पर स्थिर हो जाता है । उसी के अनुसार यज्ञाधिपति इन्द्र का स्थानापन्न यह [ ४६६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मण यजमान बैठा रहता है एवं उस बैठे हुए यजमान की जांघ पर ही सोम ला कर रक्खा जाता है । तात्पर्य्य यही है कि बैठे हुए यजमान की ओर सोमराजा श्राता है । यजमान बैठा रहता है और सोम को उसकी दक्षिण जाँघ पर बैठा दिया जाता है । जब सोम इसकी दाहिनी जाँघ पर श्रा जाता है तब जा कर यह यजमान उठता है - ऐसा करता हुआ यह यजमान बहुत श्रनुचित करता है । मिथ्याचरण अर्थात् विरुद्धा-चरण करता है एवं व्रतभंग करता है । यदि कोई बड़ा आदमी अपने घर पर श्राए और उसे आते देखकर हम न उठें, अपितु वह आ कर हमारे पास बैठ जाय तब उठें - यह व्यवहार जैसे सर्वथा मर्यादा के बिरुद्ध है तथैव सोम के आने पर अगवानी न करना एवं उसके पास आ जाने पर बाद में उठना सर्वथा मर्यादा - भंग करना है । परन्तु करें क्या यजमान बाध्य है, नहीं उठ सकता क्योंकि प्रकृति में स्थिर अवस्था में ही सोम प्राता है । परन्तु निषिद्ध श्राचरण करने से यजमान अपराधी हो जाता है । बस, इस अपराध के प्रायश्चित्त के लिए ही ' महिमाग्ने ' इत्यादि बोला जाता है । इस मन्त्र से क्षमा माँग लेने पर यजमान कासोम के आने पर उठ जाना अपराध नहीं माना जाता है । एवं माफी माँगने से यजमान व्रत भंग के दोष से मुक्त हो जाता है । व्रतपति देवता ही हैं । अतएव ' परिमाग्ने ' कहा गया है । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रख कर याज्ञवल्क्य कहते हैं--" प्रासीनं वाऽएनमेष ( सोम ) श्रागच्छति । स ( यजमानः ) श्रागतऽउत्तिष्ठति तन्मिथ्या करोति व्रतं प्रमीणाति तस्यो हैषा प्रायश्चितिः । तथो हास्यैतन्न मिथ्याकृतं भवति न व्रतं प्रमीणाति, तस्मादाह परिमाग्ने इत्यादि " ॥१३ ॥
इसके बाद निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुश्रा, सोम को अपने हाथों में ले कर यजमान खड़ा हो जाता है--" अथ राजानमादायोत्तिष्ठति । उदायुषा स्वायुषोदस्थाममृता " । फिर वह यजमान आयु के साथ - साथ ही स्वायु के साथ अर्थात् आयु - साधन सोम के साथ-अमृतस्वरूप सोम के साथ उठता है । ऐसा कर यजमान सोम को नहीं अपितु श्रायु के साधन सोम को उठाता है, यही तात्पर्य है । सोम ही से आयु रहती है । जब तक आत्माग्नि में सोम की आहुति पड़ती रहती है तभी तक आयु रहती है । जिस दिन आत्माग्नि में सोमाहुति बंद हो जाएगी, उस दिन आत्मा शरीर से उत्क्रान्त हो जाएगा । श्रतएव स्वायु तो सोम ही है । सोम को ले कर उठता हुआ यजमान अपने आयु - सोम के साथ उठता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" अमृतं वाऽएषोऽनूत्तिष्ठति यः सोमं क्रीतं तस्मादाहोदायुषा - इत्यादि " ॥ १४ ॥
इसके अनन्तर सोमांशुत्रों को ले कर सोम को निकट में रखने के लिए इस स्थान से, ( जहाँ पर कि सोम खरीदा था ) चलता है । एवं साथ ही में निम्नलिखित मन्त्र बोलता है-[ ४७० ]