Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 491–500

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 491–500

पृष्ठ 491

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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणहन ब्राह्मण हो तो इस वर्ष बहुत वर्षा होगी, और यदि एक बैल में ही काली परछाई प्रतीत हो तो भी ठीक वर्षा होगी यह समझना चाहिए, क्यों कि बैलों पर काली परछाई पड़ना यह शकुन है जिससे भावी वर्षा का अनुज्ञान होता है । जानबूझ कर कृष्णवर्णं बैलों को गाड़ी में जोतने से वर्षा हो जाय, यह शकुन - विज्ञान नहीं है । वह तो आकस्मिक बात है कि बैलों के सामने किसी मानव या अन्य वस्तु के आ जाने से बैलों पर काली झाँई पड़े तो वर्षा होगी । घटना वस्तु का हो जाना ही शकुनविज्ञान है । ( अतः स्व ० शास्त्री जी ने जो इसका अर्थ किया है वही उचित प्रतीत होता ) है ॥११ ॥

इसके अनन्तर वह सुब्रह्मण्य निम्नलिखित मन्त्र को पढ़ता हुआ दोनों बैलों को गाड़ी

में जोतता है-' उस्रावेतं धूर्षा हौ युज्येथामनश्रू अवीरहरणौ ब्रह्मचोदनौ ।

स्वस्ति यजमानस्य गृहान् गच्छतम् ' ॥ इति ॥

अर्थात् धुरे को सहने में समर्थ, व्यथारहित, शृङ्ग के अग्रभाग से पुत्र आदि के न मारने वाले, मन्त्र के द्वारा प्रेरित, बैलो! आप इस शकट में जुतिए और कुशलतापूर्वक यजमान के घर जाइए । याज्ञवल्क्य मन्त्र के प्रत्येक पद की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि ये बैल उस्र नाम से प्रसिद्ध हैं । धूर्षाहो – ये धुर का भार वहन करने वाले हैं । अन अर्थात् श्रुरहित हैं । भार वहन करने में इन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता । किसी प्रकार के कष्ट का अनुभव न करते हुए आप इस रथ में जुत जाइए । ये अवीरहरणौ - पाप नहीं करने वाले हैं अर्थात् किसी के सींग नहीं मारने वाले है । ब्रह्मचोदनौ - मन्त्र से प्रेरित हैं । ये क्षेमपूर्वक यजमान के घर जाएँ । अर्थात् विनाशक प्राणी राक्षस आदि इन्हें मार्ग में न सताएँ ॥१२ ॥

तत्पश्चात् श्रध्वर्युं शकट के पश्चिम ( पीछे के ) भाग में हो कर अथवा शकट के पीछे के भाग का सहारा लेकर ' सोमाय क्रीताय अनुब्रूहीति सोमाय पर्युह्यमाणाय अनुब्रूहि ' ऐसा कहता है । सोम खरीदने के बाद जो कर्तव्य है, वह परिवहण ही है । अत: चाहे सोमाय क्रीताय अनुब्रू हि ऐसा कहे चाहे ' सोमाय पर्युह्यमाणाय अनुब्रूहि ' कहे एक ही तात्पर्य है । अर्थात् हे ऋत्विजो! आप यजमान से कह दो कि सोम खरीद लिया गया है । ऐतरेय ब्राह्मण में इनमें विकल्प न मानते हुए समुच्चय - रूप में ' सोमाय क्रीताय प्रोह्यमाणायानुब्रू हि इत्याह अध्वर्युः ' यह कहा गया है । याज्ञवल्क्य के अनुसार इन दोनों पक्षों में इच्छानुसार कह देना चाहिए ॥१३ ॥

इसके अनन्तर अध्वर्युं यजमान से निम्न मन्त्र बुलवाता हैः-1. ' पश्चात् परोत्यालम्बनं गृहीत्वा सोमाय कीतायानुवाचयति पर्युह्यमाणायेति वा ' ( का.श्रौ.सू. ७।२३७ ) [ ४८१ ]

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्थ्याएन ब्राह्मण ' भद्रो मेऽसि प्रच्यवस्व भुवस्पते विश्वान्यभिधामानि । मावा परिपरिणो विदन्, मा त्वा परिपन्थिनो विदन्, मा त्वा वृका अघायवो विदन् ॥ इति ॥ अर्थात् हे सोम! आप कल्याणकारी हैं । हे तीनों लोकों का पालन करने वाले सोम! आप सारे स्थानों को लक्ष्य में रख कर जहाँ - जहाँ आवश्यकता हो वहाँ जाइए । अर्थात् उपांशुवन अन्तर्याम आदि ग्रहों में जहाँ भी आप की आवश्यकता हो, पधारिए । तदनन्तर तीन प्रकार के शत्रुओं से सोम अविज्ञात ही रहे, यह कामना की गई है । पहले प्रकार के शत्रु वे हैं, जो हमारे द्रव्य को चुरा कर ले जाना चाहते हैं, चोरी कर भाग जाना चाहते हैं उन्हें ' परिपरिन् ' कहा गया है । द्रव्य चुर कर भाग जाने वाले शत्रु आपको मालूम न कर सकें । हमारे यज्ञादि कर्म पर आक्रमण करने वाले जो शत्रु हैं उन्हें यहाँ परिपन्थिन् शब्द से कहा है । ये परिपन्थी शत्रु भी आप को मालूम न कर सकें । तीसरे प्रकार के शत्रु वे हैं जो हमारी ग्रात्मा के नाशक या घातक है उन्हें यहाँ वृक ( भेड़िया ) कहा गया है । ये आत्मघाती शत्रु भी आप को न जान सकें । अर्थात् हे सोम! ये नीच प्रकार के शत्रु आप को न जान सकेँ । अपि च हे सोम! आप श्येन बन कर यजमान के घर जाइए । अर्थात् प्राप बलिष्ठ बन कर इतने वेग से जाइए जिससे तीनों प्रकार के शत्रुओं का नाश हो जाए । अपि च हे सोम! आप का और हम ऋत्विजों का संस्कृत स्थान यजमान का घर ही है । आप भी यजमान के घर में काम आएँगे और हम ऋत्विजों का काम भी वहीं पड़ेगा । उपर्युक्त मन्त्र की व्याख्या करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह सोम यजमान का कल्याण करने वाला है । सोम से बढ़ कर यजमान का कल्याण करने वाला कोई दूसरा नहीं है । अतएव साथ में आते हुए जो राजा लोग हैं उनका भी यह यजमान श्रादर नहीं करता । यजमान सर्वप्रथम सोम राजा का ही अभिवादन करता है, क्यों कि सोम उसका कल्याण करने वाला है । यह सोम तीनों भुवनों का स्वामी है । यज्ञाङ्ग ही इस सोम के भाग हैं | उन्हीं यज्ञाङ्गों को लक्ष्य में कर ही - सोम! जाओ, यह कहा है । हे सोम! परिपरिन् अर्थात् यजमान के द्रव्य को चुराने वाले, परिपन्थिन् अर्थात् यज्ञ सम्बन्धी कर्मों पर आक्रमण करने वाले तथा अघायु वृक् अर्थात् आत्मघाती ये तीनों प्रकार के शत्रु तुम्हें न जान सकें । अर्थात् किसी भी प्रकार के नाशक राक्षस तुम्हें न जान सकें ॥ १४ ॥

१५ वीं कण्डिका में ' श्येनो भूत्वा परापत ' इस मन्त्रांश की व्याख्या है । अर्थात् यह सोम श्येन बनकर, उग्र बन कर बड़े वेग से जाता है । अत: शत्रु राक्षस उस की ओर नहीं आते हैं । क्यों कि श्येन पक्षियों में सब से अधिक प्रोजस्वी व बलवान् है, अतः श्येन बन कर यजमान के घर की ओर जाने को कहा है ॥१५ ॥

१६ वीं कण्डिका में बतलाया गया है कि यदि प्रमादवश राक्षस असुर आदि आक्रमण भी करें तो ' श्येनो भूत्वा ' इत्यादि मन्त्र के सामर्थ्य से सोम के सारभाग आत्मा का कुछ [ ४८२ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्थ्याणहून ब्राह्मण नहीं बिगड़ता । केवल सोमवल्ली का त्वचा रूप जो शरीर है उसे ही न कि आत्मा को नष्ट करने के लिए असुर उस का अनुगमन करते हैं । आगे ' यजमानस्य गृहान् गच्छ तन्नौ संस्कृतम् ’ इस मन्त्रांश का अर्थ ऊपर पहले ही स्पष्ट कर दिया गया है ॥ १६ ॥

तदनन्तर अर्थात् सोम के यजमान के घर पहुँच जाने पर सुब्रह्मण्य नामक देवता का उक्त मन्त्र से आह्वान करते हैं । देवता जिस मन्त्र से बुलाया जाता है, उसे ब्रह्म कहते हैं तथा मन्त्र को सुब्रह्म कहा जाता है । जो देवता शोभन मन्त्र से बुलाने योग्य है उसे सुब्रह्मण्या कहते हैं । जैसे जिसको भोजन दिया जाने वाला है उससे घरवाला कह देता है कि कल आप हमारे यहाँ भोजन करेंगे, यह लौकिक मर्यादा है, उसी प्रकार इस यज्ञ में जिन देवताओं को सोम दिया जाने वाला है उन्हें निगद मन्त्रों से पहले निवेदन करता है कि कल आप को सोम दिया जाएगा । यह निवेदन - मन्त्र ही सुब्रह्म है । और इस निवेदन मन्त्र से जिन देवताओं का आह्वान किया जाता है उन्हें सुब्रह्मण्या कहते हैं । मूल में ' इत्यहे ' शब्द से पाकदिवस का निर्देश है | जिस मन्त्र से देवताओं का आह्वान किया जाता है वह मन्त्र ' सुब्रह्मण्योम्, सुब्रह्मण्यम् ' यह है | यह मन्त्र देवताओं को अपने स्थान से च्युत कर देता है । वाक् से अन्त-रिक्ष में स्थान हो जाता है और उससे देवता आ जाते हैं । यह मन्त्र तीन बार बोला जाता है क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् होता है । तात्पर्य यह है कि सूर्य्य का नाम ही यज्ञ है । सूर्य्य के दिन भर के सत्ता - काल में प्रातःसवन, माध्यन्दिनसवन व सायं सवन ये तीन भाग होते हैं, क्यों कि सूर्य्यं सवन - भेद से त्रिवृत् है । सूर्य्य ही यज्ञ है, अतः इस मन्त्र को तीन बार बोला जाता है ॥१७ ॥

सुब्रह्मण्या के आह्वान के बाद ' इन्द्रागच्छ ' मन्त्र के द्वारा इन्द्र को बुलाया जाता है । इन्द्र यज्ञ के देवता हैं अतः उन्हें बुलाया जाता है कि ' हरिव प्रागच्छ । मेधातिथेर्मेष वृषण-श्वस्य मेने । गौरावस्कन्दिन् अहल्यायै जार ' इस मन्त्र द्वारा इन्द्र की स्तुति करते हैं । इन्द्र हरि नामक घोड़ों से आता है अतः उसे हरिवाहन कहा जाता है । हे हरिवाहन् इन्द्र! आइए । मेधातिथि के यज्ञ में इन्द्र मेष बन कर आये थे । अतः इन्द्र के लिए ' मेधातिथिमेष ' कहा गया है । इन्द्र के घोड़े ( गायत्री आदि सातों छन्द ) अत्यन्त बलिष्ठ हैं अतः ' वृषण-श्वस्य ' कहा है । हे गौरावस्कन्दिन् - गौर पशु को मारने वाले तथा अहल्या के जार इन्द्र! आप हमारे यज्ञ में आइए । दिन का नियमन करने वाली रात्रि ' हर्यमयति ' इस व्युत्पत्ति से अर्ध्या कहलाती है । और हर्या ही परोक्ष भाषा में अहल्या कहलाती है, क्यों कि देवता परोक्ष प्रिय हैं । सूर्य्य के ' इन्द्रोधाता भगः पूषाः मित्रोऽथवरुणोऽर्यमा इत्यादि १२ प्राणों में इन्द्र भी अन्यतम प्राण है । इस प्राण के आते ही रात्रिरूप अहल्या जीर्ण हो जाती है । अतः इन्द्र प्राण को अहल्या का जार कहा गया है न कि अहल्या के साथ व्यभिचार के कारण । [ ४८३ ]

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्य्यारगहन ब्राह्मण इन्द्र के आते ही गोतम ( पृथिवी में व्याप्त अन्धकार ) चला जाता है । यही इन्द्र के आने के समय अहल्या ( रात्रि ) के पति गौतम का आश्रम से चले जाना है । इन्द्रप्रारण का समय प्रातःकाल पौ फटते ही आता है । और इसके बाद ही सूर्य्य की सहस्र रश्मियाँ चम-कने लगती हैं । संसार में इन सहस्ररश्मियों का प्रसारण ही इन्द्र के सहस्र भग कहलाते हैं । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इन्द्र के जो ये चरित्र हैं उन्हीं उत्तम चरित्रों के निरूपण से इन्द्र को प्रसन्न करने की इच्छा व्यक्त की जाती है ॥ १८ ॥

' कौशिक ब्राह्मण गौतम ब्रु बाण ' इति । चित्रा नक्षत्र आदि अनेकविध इन्द्रों में दक्षिण में पञ्चपक्षियों में एक कौशिक भी इन्द्र है । उसके लिए कौशिक कहा गया है । इस कौशिक इन्द्र का प्रचार सर्वप्रथम गौतम अर्थात् उद्दालक महर्षि ने किया था इसलिए कहा है कि ' ब्राह्मण गौतम ब्रुवाणेति ' परन्तु याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इसके बोलने में कामचार है- बोलो या न बोलो । जितने दिन तक सुत्या - सवनकर्म होता है उतने दिन तक ऊह करना चाहिए । अर्थात् जिस दिन सुत्या होती है उस दिन का नाम लेकर देवता का आह्वान करना पड़ता है । जितने दिन तक सुत्या होती है उतने दिन तक देवता का आह्वान करना चाहिए ॥ १६ ॥

पश्चात् ' देवा ब्राह्मण श्रागच्छत ' इति । अर्थात् हे देवताओ ओर ब्राह्मणो ( ऋत्विजो ) यज्ञ में आइए । क्यों कि यज्ञनिष्पादनार्थ देवतात्रों और ब्राह्मणों ( ऋत्विजों ) की ही प्राव-श्यकता है । देवता यष्टव्य हैं इसलिए आवश्यकता है तथा ब्राह्मण ( ऋत्विज ) याज्ञिक ( यज्ञ करने वाले ) हैं एतदर्थ इनकी भी यज्ञ में श्रावश्यकता है । यज्ञ में देवता तथा ऋत्विक् दोनों से ही यज्ञरूप प्रयोजन सिद्ध होता है ॥ २० ॥

इसके बाद प्रतिप्रस्थान नामक ऋत्विक् यज्ञशाला के पूर्व भाग में अग्नीषोमीय पशु के साथ उपस्थित होता है । अर्थात् प्रतिप्रस्थाता अग्नीषोमीय पशु को ले कर जाते हुए सोम अभिमुख खड़ा कर दे, क्यों कि दीक्षित यजमान को अग्नि और सोम अपनी दाढ़ के मध्य में रख लेते हैं । वीक्षणीयेष्टि से आग्नावैष्णव एकादश कपाल पुरोडाश की हवि दी जाती है । उस दक्षिणीयेष्टि से यजमान अग्नि और सोम ( विष्णु ) दोनों के बीच में दाढ़ में आ जाता है । ३३ आग्नेय देवताओं में अग्नि प्रथम तथा सोम ( विष्णु ) अन्तिम है । जैसा कि ' अग्निर्वै देवानामवमः विष्णुः परमस्तदन्तरेणान्याः सर्वा देवता: ' इस ब्राह्मण श्रुति सिद्ध है | अन्य सब देवता उनके मध्य में हैं । अतः अग्नि व सोम के द्वारा सब देवताओं का ग्रहण हो जाता है । दीक्षणीयेष्टि से यजमान, अग्नि और सोम ( विष्णु ) दोनों के उदर में, दोनों की दाढ़ में बद्ध हो जाता है । ' विष्णुर्वै सोमः ' इस ब्राह्मणश्रुति के अनुसार सोम विष्णु ही है | अग्नीषोमीय पशु दे कर यजमान अपने आत्मा को उन दोनों की दाढ़ से अर्थात् भोग्यता से दूर कर लेता है । अर्थात् अग्नीषोमीय पशु से आत्मा को खरीद लेता है ॥ २१ ॥

इस आनीय पशु का प्रालम्भन किया जाता है । इसके लिए अग्नि का उल्मुक बना कर लाया जाता है और उसे अग्नीषोमीय पशु पर घुमाया जाता है । यहाँ पर कितने ही [ ४८४ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणहून ब्राह्मण आचार्य ( तैत्तिरीय सम्प्रदाय वाले ) ग्राहवनीयाग्नि से उल्मुक लाते हैं । क्यों कि यह पशु अग्नीषोमीय है, अतः उल्मुक ऐसा होना चाहिए जिसमें अग्नि व सोम दोनों साथ रहते हों । आहवनीयाग्नि में जलाया हुआ उल्मुक श्रग्नि रूप तो है ही । और ग्राहवनीयाग्नि में सोम की आहुति होने से वह अग्नि- सोम युक्त है । साथ में रहने वाले अग्नि व सोम से आत्मा का निष्क्रय करेंगे, इस आशय से ग्राहवनीयाग्नि से जलते हुए उल्मुक को लाते हैं । किन्तु भग-वान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि श्राहवनीयाग्नि से उल्मुक नहीं लाना चाहिए, क्योंकि अग्नि व सोम सर्वत्र साथ ही रहते हैं । अग्नि बिना सोम के नहीं रहती और सोम बिना अग्नि नहीं रहता । दोनों अविनाभूत हैं । अतः ग्राहवनीयाग्नि से उल्मुक का आहरण करने पर भी अग्निसोम का साहचर्य ही रहता है ॥ २२ ॥

वह अग्नीषोमीय पशु दो - रूप वाला ( दुरङ्गा ) होता है । क्यों कि अग्नीषोमीय पशु अग्नि व सोमभेद द्विदेवत्य अर्थात् दो देवताओं की वस्तु है । यदि एक रूप का अग्नीषोमीय पशु होगा तो अग्नि व सोम देवताओं में परस्पर झगड़ा होगा अतः दो रङ्ग वाला ही पशु होना चाहिए । कितने ही प्राचार्यों का कथन है कि पशु कृष्णसारङ्ग अर्थात् श्वेत तथा कृष्णवर्ण का संम्मिश्रण होना चाहिए । कृष्णसारङ्ग वर्ण श्रग्नि व सोम दोनों देवताओं का अत्यन्त अभिमत रूप है । क्योंकि अग्नि का कृष्ण रूप है और सोम का श्वेत । यदि कृष्णसारङ्ग वर्ण का पशु न मिले तो लोहितसारङ्ग वर्ण का अग्नीषोमीय पशु होना चाहिए । क्यों कि प्रज्वलित अग्नि का लाल वर्ण है और सोम का श्वेत, अतः लोहितसारङ्ग वर्ग भी द्विदेवत्य है ॥२३ ॥

जब प्रतिप्रस्थाता कृष्णसारङ्ग अथवा लोहितसारङ्ग पशु को ले आता है तव अध्वर्यु यजमान से निम्न मन्त्र का उच्चारण कराता है-' नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसे महो देवाय तद्ऋतं सपर्यत । दूरे दृशे देवजाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्याय शंसत ' ॥ इति ॥ चक्षु दो प्रकार के हैं - बाह्य चक्षु और प्रान्तर चक्षु । बाह्य चक्षु सूर्य्य है और आन्तर चक्षु नेत्र है । बाह्यचक्षुरूप सूर्य्य, मित्र ( अर्थात् खगोल के पूर्व कपाल ) तथा वरुण ( अर्थात् पश्चिम कपाल ) दोनों का द्रष्टा ( प्रकाशक ) है । अपि च ' अहर्वै मित्र ', ' रात्रिर्वरुणः ' इस ब्राह्मणश्रुति में अथवा ' मैत्रं वा अहवरुणी रात्रि: ' इस तैत्तिरीय श्रुति में मित्र नाम दिन का तथा वरुण नाम रात्रि का है । दिन और रात्रि के अधिष्ठाता सूर्य्यं ही हैं । ऐसे सूर्य्य को नमस्कार है । हे ऋत्विजो! आप ऐसे महादेव के लिए ऋत अर्थात् सोम प्रदान कीजिए । सूर्य के प्रकाश का नाम महः है इसलिए मन्त्र में ' महो देवाय ' कहा है । परमेष्ठिमण्डल के सोम की आहुति सूर्य्य में होती रहती है । अतः इसी अभिप्राय से इस सूर्य्य को सोम प्रदान करें, यह कहा है । [ ४८५ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपान ब्राह्मणं अपि च हे ऋत्विजो! सूर्य्य बड़ी दूर तक देखनेवाला अर्थात् सारे ब्रह्माण्ड का द्रष्टा है तथा उसी से सारे देवता उत्पन्न हुए हैं क्यों कि सौर - प्रकाश व सौर - रश्मियों का नाम ही देवता है, जो देवसमूहरूप हैं । इसीलिए ' चित्रदेवानामुदगादनीकम् ' यह मन्त्र सूर्य को देव-समूह बतला रहा है | अतः जो बुद्धि का प्रदाता है और दिन का पुत्र है ऐसे सूर्य की स्तुति करें | भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इस मन्त्र के द्वारा यजमान सूर्य्य को नमस्कार करता है । नमस्कार द्वारा सूर्य्य को अपने पर कृपादृष्टि रखने वाला बनाता है ॥२४ ॥

इसके बाद अध्वर्यु शकट के आरोहण को, जिसे कि उत्तम्भन कहते हैं, ' वरुणस्योत्त-म्भनमसि ' - वरुण का उत्तम्भन हो, यह मन्त्र बोल कर शकट के आगे जो दो लकड़ियाँ बँधी रहती हैं, उन को खोल देता है । इस से शकट जमीन पर न गिर कर पूर्व की तरह समस्थिति में खड़ा रहता है । इस उत्तम्भन को कुस्तुम्भी भी कहा जाता है । पश्चात् बैलों को गाड़ी से खोलने के पहले बँधी हुई दोनों लकड़ियों को ' वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थ: ' तुम वरुण के उत्तम्भन हो, इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ खोल देता है । उपस्तम्भन से उस शकट का उपस्तम्भन करता है, ' नीचे गिरने से बचाता है । यदि दोनों लकड़ियाँ जमीन पर बिना टेके बैलों को खोल देगा तो शकट के जमीन पर गिरने से सोम जमीन पर गिर जाएगा । इसके बाद बैलों के गले में बँधी हुई चर्म की पट्टी जूड़े की जिन कीलों के आश्रय पर टिकी रहती है, उन कीलों को ' वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थः ' अर्थात् हे कीलो! आप स्कम्भ-सर्जनी हो, ऐसी आप को मैं निकालता हूँ । इस प्रकार दोनों कीलों को निकाल कर बैलों के जोत उतार देता है । " यद्यपि स्कम्भसर्जनी सोम की है न कि वरुण की तथापि सोम आज बँधा हुआ है, बन्धन वरुण देवताक होता है अतः ' वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थः ' ऐसा कह दिया है । ' वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थः ' कह कर दोनों कीलों को खोल देता है । सोम वरुण्य है क्योंकि बँधा है और उसे खरीदा जा चुका है ॥ २५ ॥

सोम को शकट से उतारने के बाद चार ऋत्विक् सोम राजा के सवार होने के लिए नियत सिंहासन को लाते हैं । जो मनुष्य राजा होता है उसके सिंहासन को उठाने के लिए दो आदमी आते हैं । किन्तु सोम की आसन्दी ( सिंहासन ) को उठाने के लिए चार आदमी आते हैं । क्यों कि सोम राजाओं का भी राजा है, देवाधिपति है अतएव इस प्रसन्दी की प्रतिष्ठार्थ चार ऋत्विक् उठाते हैं ॥ २६ ॥

यह आसन्दी गूलर की लकड़ी की होती है । " अन्न ही ऊ है । अर्थात् अन्न के खाने से ऊळ ( बल ) पैदा होता है । गूलर का वृक्ष ऊ मय है । संसार में गूलर औषधियों में सबसे १. ' समीपेऽन उपस्थाप्योत्तम्भनेनोपस्तम्नाति वरुणस्योत्तम्भनमिति ' ( का ० श्री ० सू ० ७।२४६ ) २. शम्ये चोद्बृहति वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थ इति ' ( का ० श्री ० सू ० ७।२४७ ) ३. ' औदुम्बरीमासन्दीं नाभिददतामर त्रिमात्राङ्गीभूतामाहरन्ति चत्वारः ( का ० श्रौ ० सू ० ७।२४८ ) [ ४८६ ]

पृष्ठ 497

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मणं सोमपणहून ब्राह्मणं अधिक बल होता है । अन्नाद्य संग्रहण के लिए, बलयुक्त सोम में और अधिक बलाधान के लिए दुम्बरी ( गूलर वृक्ष की ) आसन्दी होती है ॥२७ ॥

यह आसन्दी नाभि परिमाण की ( नाभि जितनी ऊँची ) होती है । नाभि में ही भुक्त अन्न प्रतिष्ठित होता है । रस- रूप आदि का विभाग नाभि से ही होता है । सोम अन्न है । अतः इसे नाभिस्थान में ही प्रतिष्ठित करना चाहिए । इसीलिए आसन्दी नाभि जितनी ऊँची ( नाभि प्रमाण की ) होती है । अपि च इस नाभि में ही वीर्य्य का स्थान है । सोम ही वीर्य्य है । अतः नाभिप्रमारण की आसन्दी होती है ॥ २८ ॥

पश्चात् अध्वर्यु ' वरुणस्य ऋतसदनमसि ' आप वरुण ( सोम की ) ऋतसदनी हो इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उस आसन्दी का स्पर्श करता है । प्रकृति में सोम परमेष्ठी में रहता है । ऋत का अर्थ परमेष्ठी है जैसा कि ' ऋतमेव परमेष्ठी ' यह श्रुति बतला रही है । अतः यहाँ भी सोम जिस आसन्दी पर रखा जाता है उस में परमेष्ठी की भावना की जाती है । इसके पश्चात् ‘ वरुणस्य ऋतसदन्यसि ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उस आसन्दी पर कृष्णमृगचर्म्म बिछाता है । तत्पश्चात् ' वरुणस्य ऋतसदनमासीद ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ सोम को उस पर विराजमान कर देता है । यह खरीदा हुआ सोम बँधा हुआ होने से वरुणदेवताक है । अतएव मन्त्रों में सर्वत्र ' वरुणस्य ' पद प्रयुक्त किया गया है ॥ २६ ॥

_ इसके पश्चात् इस सोम को यज्ञशाला में पहुँचा देता है । यज्ञशाला में सोम को पहुँचा कर उसे यज्ञशाला में विराजमान कराते हैं । उस समय अध्वर्यु यजमान से निम्न मन्त्र बुल-वाता है-' या ते धामानि हविषा यजन्ति ता ते विश्वापरिभूरस्तु यज्ञम् । गयस्फानः प्रतरणः सुवीरोऽवीरहा प्रचरा सोमदुर्यान् ' ॥ इति ॥ अर्थात् हे सोम! आपको हविरूप में परिणत कर आपके जिन स्थानों का ऋत्विक् लोग यजन करते हैं उस स्थानों को एवं यज्ञ को आप व्याप्त कर लें । अर्थात् ये सारे कर्म स्वतन्त्र न बनें अपितु श्रङ्गी यज्ञ के सहकारी बनें । हे सोम! आप गयस्फान ( गृह वर्धक ) हैं, प्रत्तरण ( प्रपत्ति निवारक ) हैं, सुवीर ( अच्छी सन्तान देने वाले ) हैं, आप अवीरहा ( पुत्रादिक के घातक ) न बन कर - अर्थात् कृपालु बन कर, यजमान की यज्ञशाला में विराजें । आप कल्याण-रूप शान्त और पापकर्ता न बन कर घर में विराजें । दुर्य नाम घर का है । इसीलिए लिखा है ' गृहा वै दुर्गा: ' इति ॥ ३० ॥

कितने ही याज्ञिक सोम के आने पर, जिस प्रकार घर में आये हुए राजा के लिए पूजार्थं जलपात्र लाया जाता है, उसी प्रकार जलपात्र लाना चाहिए ऐसा कहते हुए जलपात्र ४. अभिमृशत्येतां वरुणस्य ऋतसदन्यसि ' इति । ( का. श्री. सु. ७१२४६ ) [ ४८७ ]

पृष्ठ 498

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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्थ्यारणहन ब्राह्मणे लाते हैं । परन्तु याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ऐसा नहीं करना चाहिए । क्यों कि गृहागत अतिथि के सत्कार के लिए जलपात्र लाना मानुष कर्म है । मानुष कर्म करने से यज्ञ की ऋद्धि का नाश होता है । अतः घर में सोम के आने पर उदपात्र नहीं लाना चाहिए ॥ ३१ ॥

[ विज्ञान भाष्य ] सोम खरीद लिया गया एवं यजमान अपने मस्तक पर रख कर उसे शकट के पास ले गया । इस छकड़े में सोम रख कर गाजे - बाजे के साथ इसे ले जाया जाएगा । शकट में सोम रखने से पहले उसमें कृष्णमृगचर्म बिछाया जाता है । काले हरिण का चमड़ा ही इस सोम के लिए बिछाया जाता है । एवं जिस कृष्णमृगचर्म्म पर यजमान दीक्षा लेता है, उसे बिछाया जाता है । वह अध्वर्यु " अदित्यास्त्वगसि " । यह कहता हुआ शकट के नीड़ - भाग में, प्रस्थान - भाग में ( शकट रक्खा जाता है — उस स्थान का नाम नीड़ है ) कृष्णाजिन बिछाता है । में जहाँ पर अनाज वगैरः गायत्री सोम लेने गई थी । तब वह सोम इस पृथ्वी पर प्राया था । यह यज्ञ उसी की अनुकृति पर किया जाता है । श्रतएव कृष्ण-मृगचर्म्म पर सोम रक्खा जाता है । कृष्णमृगचर्म्म प्रतीक रूप से इस पृथिवी का ही चर्म है । इस पर सोम का रखना, पृथिवी पर रखना है । याज्ञवल्क्य इसका अर्थ बतलाते हुए कहते हैं कि प्रथमकाण्ड में " श्रदित्यास्त्वगसि ” - यह जो ब्राह्मण - भाग है, वही उसका बन्धु है । अर्थात् पूर्वोक्त ब्राह्मण का सम्मानार्थक ही यह ब्राह्मण - भाग है । अतः इसका अर्थ उसी सन्दर्भ में समझना चाहिए । इसके बाद --" सोऽसावेव बन्धुः । प्रदित्यै सद प्रसीद " ॥ १ ॥

यह बोलता हुआ उस सोम को कृष्णमृगचर्म पर रख देता है । यह पृथिवी ही अदिति है, यही प्रतिष्ठा है । संसार के यच्चयावत् पदार्थ, क्या प्रौषधि, क्या वनस्पति, क्या मनुष्य, क्या पशु - पक्षी, जड़-चेतन, सभी इस प्रदिति पृथिवी पर ही प्रतिष्ठित हैं । प्राकृतिक सोम ही गायत्री द्वारा अपहृत हो कर इसी पर प्रतिष्ठित होता है । बस, कृष्णमृगचर्म्म - स्वरूप अदिति की त्वचा पर सोम रखता हुआ अध्वर्यु प्रकृतियज्ञवत् पृथिवी की प्रतिष्ठा में ही इसे प्रतिष्ठित करता है । प्रतएव— " अदित्यै सद प्रसीद " । यह कहा गया है । इसके अनन्तर अध्वर्यु इस सोम का स्पर्श करके यजमान से निम्नलिखित मन्त्र बुलवाता है— " अस्तभ्नाद् द्यां वृषभोऽन्तरिक्षमिति XXX वरिमाणं पृथिव्या ॥ २ ॥

प्रसीदद्विश्वा भुवनानि सम्राड् " ॥३ ॥

" विश्वेत्तानि वरुणस्य व्रतानि " - इति ( वृषभः — द्यां स्तंभितवान् ) । [ ४८८ ] =

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण [ ४८६ ] सोमपरहन ब्राह्मणॆ ( ऋग्वेद मं ० 1८३ | १ ) वायु तरलावस्था कहते हैं । भृगु तथा च श्रन्तरिक्षं स्तम्भितवान् । एवं पृथिव्याः वरिमाणं ( वरिमाणमहत्त्वं ) श्रमिमीत । एता-दृशः सम्राट् विश्वा भुवनानि श्रासीद ( सर्वाणि भुवनानि ) इत् ( श्रपि ) वरुणस्य सोम - व्रतानि देवा अनुसरन्तीति शेष: ) । यह सोम सर्वश्रेष्ठ है । देवताओं को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है । सोम देवताओं से भी श्रेष्ठ है । यदि सोम न हो तो आग्नेय देवता उसी क्षण नष्ट हो जाएँ । देवता ही क्या, अपितु प्राणिजात का श्रधिष्ठाता यही सोम है । अतएव इसे वृषभ कहा जाता है । इस वृषभ ने अर्थात् सर्वश्रेष्ठ सोम ने द्यौ का स्तम्भन कर रक्खा है । अर्थात् यह सोम द्युलोक तक, परमेष्ठि तक, व्याप्त है । सोम से एक पिण्ड भी खाली नहीं है । जहाँ तक यह आकाश दीखता है, सोम पृथिवी से लेकर वहाँ तक परिव्याप्त है । इसी ने अन्तरिक्ष का भी स्तम्भन कर रक्खा है । द्यौ की तरह अन्तरिक्ष भी इसके अधिकार में है । अन्तरिक्ष भी सोम से व्याप्त हो रहा है - यही तात्पर्य है । अतएव - " त्वमातनोसर्वान्तरिक्षम् " यह कहा जाता है । एवं इसी सोम ने पृथिवी की परिमा को नाप डाला है । पृथिवी यहाँ तक है, इतनी बड़ी है, सोम ने यह ना डाली है । अर्थात् सोम पृथिवी पर ही नहीं अपितु पृथिवी से भी बहुत दूर तक त्रिलोकी में व्याप्त हो रहा है । पृथिवी तो सोम के पेट में एक कोने में पड़ी हुई है । सोम परमेष्ठिमण्डल की, क्रन्दसी - लोक की, वस्तु है । परमेष्ठी का जो ब्रह्मणस्पति ग्रह है, वहीं सोम रहता है । इसी सोम के लिए कहा जाता है-" पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः । प्रतप्ततनूनं तदामो अश्नुते शृतास इद्वहंतस्तत्समाशत " ॥ यही सोम रोदसी भुवन में अर्थात् सूर्य्य से ले कर पृथिवी तक की रोदसी त्रिलोकी में आता है । एवं यही उस अपने लोक से ऊपर के संयती भुवन में भी आता है । इस प्रकार तीनों भुवनों में, सम्पूर्ण त्रैलोक्य - त्रिलोकी में, यह व्याप्त हो रहा है । इसीलिए इसका नाम सार्वभौम है । इसीलिए तो इसे सम्राट् कहा गया है । ये सारे विश्व इस वरुण के अर्थात् सोम के व्रत का नियम का पालन करते हैं । सारा ब्रह्माण्ड सोम का अनुचर है । यदि सोम की आज्ञा न मानें तो उसी समय विश्व नष्ट हो जाए । भृगु और अंगिरा ये दो तत्त्व प्रधान हैं । दोनों ही वायु हैं । भृगु भी वायु है । अंगिरा भी वायु है । इस वायु पर जब और वायु का चिनाव होता है तो यह वायु पानी के स्वरूप में परिणत हो जाता है । वायु की धनावस्था का नाम ही पानी है । एवं तद् अवस्था विशेष का नाम ही सोम है । इस प्रकार एक ही भृगु वायु - घन - तरल-विरल भेदेन प्रप् - वायु - सोम ये तीन स्वरूप धारण कर लेता है । अप् धनावस्था है, है, सोम विरलावस्था है । तीनों सोम ही हैं । इस प्रापोमण्डल को ही वरुण वरुण के पुत्र हैं । अतएव " भृगुवँवारुणिः ' ( तै ० उ ० ३।१।१ ) यह कहा जाता है ।

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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्य्याणहून ब्राह्मणे सोम में व्याप्त होने का सामर्थ्य नहीं है । व्याप्ति पानी में ही होती है । चारों ओर फैलना यह पानी का धर्म है । पानी भी सोम ही है । इसलिए सोमस्तुति में विरोध भी नहीं समझना चाहिए । पानी में प्राप्ति धर्म है अतएव " यदाप्नोत् तस्मादापः " यह कहा जाता है । पानी के अधिष्ठाता वरुण हैं । अतएव यहाँ वरुण का नाम ले दिया है । सोम ही की वरुण भी अवस्था विशेष है । ' अग्नीषोमत्मकं जगत् " में सोम से तीनों का ग्रहण है । एवं " श्रस्तिर्वचतुर्थी देव-लोक प्रापः ” में अप् से तीनों का ग्रहण है । पृथिवी - प्रन्तरिक्ष- द्यौ तीन लोक कहलाते हैं । इन तीनों के अधिष्ठाता अग्नि- वायु - आदित्य ये तीन अंगिरा हैं । बस, सारा ब्रह्माण्ड इन छहों में बँटा हुआ है । अग्नि-सोम कहो या भृगु - अंगिरा कहो या अप् - वायु- सोम - अग्नि- वायु - प्रादित्य कहो - एक ही बात है । इस प्रपञ्श्व से बतलाना हमें यही है कि वरुण प्राप्ति के सम्बन्ध से कह दिया गया है । इस मन्त्र के एक - एक भाग का याज्ञवल्क्य अर्थ करते हैं-देवता लोग यज्ञ - वितान करते हुए असुरों और राक्षसों के आक्रमण से डरने लगे । उन्होंने अपने को सुरक्षित रखने के लिए असुरों के प्रघात द्वारा वध के भय से इस सोम को बहुत अधिक दूर तक फैला दिया । असुर कृष्ण - प्राण का नाम है । कृष्ण - प्राण पृथिवी की वस्तु है । इसकी दौड़ पृथिवी तक ही है । परन्तु सोमतो परमेष्ठी तक है । इसके महत्त्व का क्या ठिकाना है? असुरों की पहुँच पृथिवी तक ही तो थी । बस, इन असुरों को दबाने के लिए प्राणदेवताओं ने सोम को तीनों लोकों में फैला दिया । सोम ही से देवताओं की विजय है । देवता आग्नेय हैं । अग्नि में जब तक सोमाहुति पड़ती रहती है तभी तक देवता अर्थात् अग्नि असुरों के आक्रमण से बचा रहता है । तभी तक अग्नि नहीं बुझने वाला । इसी अभिप्राय से कहते हैं-“ अस्तभ्नाद्द्द्यां वृषभोऽग्रन्तरिक्षम् ” ॥२ ॥

यह सोम त्रिलोकी में व्याप्त हो रहा है । अतएव इस सोम - साधक मन्त्र से - किंवा सोम से- यह यजमान भी अपनी आत्मा को तीनों लोकों में अभिव्याप्त करता है— " तदेनेने माँल्लोकाना स्पृणोति " - इति । त्रिलोकी में व्याप्त इस सोम को मारने वाला कोई भी नहीं है । एवं यदि कोई मारने वाला है भी तो इसका वध नहीं हो सकता । सोम अमृत तत्त्व है । अमृत तत्त्व का कभी भी विनाश नहीं होता । भला, जिस सोम से तीनों लोक व्याप्त हो रहे हैं, जो सबका अधिष्ठाता है, उसे कौन मार सकता है? मारे जिसको तो यह मारे, इसे कौन मारे? भाव इसका यही है कि मैंने आज ऐसे को आत्मसात् किया है जो कि त्रिलोकी का अधिष्ठाता है, अतएव मुझे किसी का डर नहीं है— " तस्य हि न हन्तास्ति न वधो येनेमे लोका प्रस्पृतास्तस्मादाह श्रमिमीत वरिमाणं पृथिव्या इति " ॥३ ॥

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