Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 501–510

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 501–510

पृष्ठ 501

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण " आसीदद्विश्वा भुवनानि सम्राट् - इति " ॥४ ॥

सोमपर्य्याणहन ब्राह्मणं सोम ही सम्पूर्ण भुवनों का सम्राट् बन कर बैठा हुआ है । इसका तात्पर्य्यं भी यही है कि इस मन्त्र से - यह यजमान - सारे लोकों में व्याप्त हो जाता है । इस सोम का, जो कि त्रिलोकी में व्याप्त हो रहा है, न कोई हन्ता है, न इसका वध हो सकता है । " विश्वेत्तानि वरुणस्य व्रतानि " । कहता हुआ यह ग्रध्वर्यु इस सोम के लिए, सारे विश्व को अनुकूल बनाता है । जो भी कुछ इस ब्रह्माण्ड में है, वास्तव में सोम सब पर हावी है । रोदसी, क्रन्दसी, संयती, तीनों भुवनों में सोम व्याप्त हो रहा है । " विश्वेत्तानि ” कहता हुआ यह अध्वर्यु सोम के प्रति किसी को प्रत्युद्यामी अर्थात् मुकाबला करने वाला नहीं बनाता, अपि तु सब को सोम का मातहत बनाता है । बनाता क्या है, जो स्थिति है, उसे बतलाता है— " तस्मादाह विश्वेत्तानि वरुणस्य व्रतानि " - इति ॥५ ॥

इस प्रकार स्तुतिपूर्वक नीड़ में बिछे हुए कृष्णमृगचर्म पर सोम रख दिया गया । अब उसका चारों र सोमपणहन से वेष्टन करते हैं । सोमोपनहन, सोमपर्याहन और उष्णीष, ये तीनों चीजें काम में आती हैं । इन तीनों में से शकट के चारों ओर लपेटने का जो वस्त्र है, उसे ही सोम-पर्याहन कहते हैं । सोम को रखने के बाद उसी वस्त्र को लपेटते हैं । शकट के चारों ओर वस्त्र लपेटने के तीन कारण हैं । वायु में एक प्रकार के जीव रहते हैं जिन्हें कि नाष्ट्रा कहते हैं । ये जिस पदार्थ में घुस जाते हैं, उसे ही दूषित कर डालते हैं । शकट के चलने से धूल उड़ेगी, यह धूल यदि सोम में पड़ जाएगी तो सोम दूषित हो जाएगा । बस, नाष्ट्रा जीव इसी सोम के सारभाग को नष्ट न कर डालें, इसमें धूल, कचरा, वगैरः न पड़ जाए - इसलिए इसके चारों ओर वस्त्र लगाया जाता है— " नेदेनं नाष्ट्रा रक्षांसि प्रमृशान् " - इति । यह सोम ही दिव्यात्मा बनेगा । मन्त्र द्वारा अग्नि में जब सोम की आहुति दी जाएगी तो यही सोम आत्मा बनेगा । आज शकट में रक्खा हुआ सोम गर्भ बनता है । गर्भ मनुष्यों की दृष्टि से छुपा रहता हैं । गर्भ का प्रत्यक्ष नहीं होता । एवं जो पर्याणद्ध अर्थात् ढका हुआ होता है वह भी तिरइव ही है । सोम गर्भ है । गर्भ तिरइव रहते हैं । पर्याणद्ध तिरइव ही है । इसलिए निदानेन गर्भ संपत्यर्थ इसका पर्यारणहन किया जाता है— " गर्भो वाऽएष भवति, तिरइव वै गर्भाः । तिरऽइवैतद् यत्पर्याणद्धम् ” । [ ४ ९ १ ]

पृष्ठ 502

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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्य्याणहन ब्राह्मणं अपि च यह सोम देवता है । इसे मामूली बेलड़ी ( बेल, वल्लरी ) नहीं समझना चाहिए । सोम तो देवताओं का भी देवता है । देवता मनुष्यों से छुपे हुए रहते हैं । वरुण, इन्द्र का नाम हम खूब सुनते हैं । नाम ही नहीं सुनते, वे सारे देवता हमारे शरीर में ही बैठे हुए हैं । परन्तु हम उन्हें आँखों से नहीं देखते । सोम देवता है— अतएव निदानेन इसको तिरइव बनाने के लिए चारों ओर कपड़ा लपेटा जाता है— " तस्माद्वै पर्याणह्यति " ॥ ६ ॥

क्यों पर्याहन होता है, इसकी उपपत्ति बतला चुके । अब पद्धति बतलाते हैं । वह श्रध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ उस सोम को चारों ओर से ढक देता है । वह मन्त्र - यह है— " वनेषु हि इदं अन्तरिक्षं विततं वृक्षाग्रेषु वाजमर्वत्सु पय उस्त्रियासु । हृत्सु ऋतु वरुणो विश्वग्निम् दिवि सूर्यमदधात्सोममद्रौ " । इस मन्त्र से वरुण के सारे काम गिना दिये गये हैं । वन कहते हैं काष्ठ को, अर्थात् वृक्ष को । इस वरुण सोम ने वनों में प्रर्थात् वृक्षों में अन्तरिक्ष का वितान कर रक्खा है । वृक्षरस प्रारम्भिक अवस्था में संभूय ही रहते हैं । मूल में सब रस घनीभूत हो कर ही रहते हैं । बाद में ज्यों - ज्यों वे ऊपर बढ़ने लगते हैं, त्यों - त्यों विशकलित होने वगते हैं । ऊपर जा कर वे रस फैल जाते हैं । बस, इस फैलाव के कारण ही रसों के बीच में सन्धि हो जाती है अर्थात् अन्त-रिक्ष आ जाता है । यदि ये सब फैलते नहीं और इकट्ठे हो कर ही रहते, तो ऊपर जा कर इनके अग्र • भागों में कभी सन्धि नहीं रहती । प्रत्येक शाखा ऊपर जा कर अलग छँट जाती है, सारे पत्ते अलग - अलग हो जाते हैं । यदि रस घनीभूत होता तो जैसी स्थिति वृक्ष के मूल में होती है वैसी ही वृक्षाग्र में रहती । परन्तु वही इस वृक्षाग्र में जा कर चारों ओर वितत हो जाते हैं । वृक्ष घेर घुमेर बन जाता है । यह घुमाव - यह अन्तरिक्ष इसी वरुण ने अर्थात् पानी ने किया है । यदि पानी न होता तो क्या मजाल वृक्ष फैल जाता । वृक्ष को इसी पानी ने अर्थात् वरुण ने फैलाया है । इससे बतलाना यही है कि वृक्षों में एक जो फैलाव देखा जाता है वह इसी वरुण का काम है । इसी अभिप्राय से कहते हैं - ' वनेषु ( वृक्षाग्रेषु ) हीदमन्तरिक्षं विततम् वनेषु का अर्थ वृक्षाग्रेषु किया गया है । वृक्ष के मूल में अन्तरिक्ष नहीं होता, वृक्षाग्र में ही वह फैला होता है ॥ पुरुष को ही अर्वन् कहते है । वीर्य्य को ही वाज कहते हैं । उत्साह का नाम ही वाज है । पुरुषों में स्त्रियों की अपेक्षा जो एक उत्साह दीखता है - वह इसी वरुण की महिमा है । यह वरुण ही वीर्य्याधान करते हैं । अतएव भाषा में बलिष्ठ मनुष्य के लिए पानीदार शब्द का व्यवहार होता है— " वीर्यं वै वाजाः । पुमांसोऽर्वन्तः । पुंस्वेवैतत् वीर्यं दधाति । पय उत्रियासु इति ॥ यह पय ही गायों में स्थित है । गायों में जो दूध देखा जाता है वह इसी वरुण ( पानी ) की महिमा है । जिसमें अधिक पानी रहता है वह गाय उतना ही अधिक दूध देती है-[ ४ ९ २ ]

पृष्ठ 503

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण " पयो हीदमुत्रियासु हितम् हृत्सु ऋतुम् " । सोमपर्थ्याएन ब्राह्मण हृदयों में जो ऋतु है उसके उत्पादक भी वरुण ही हैं । ऋतु नाम है इरादे का । नई - नई उमंगें इसी सोम के कारण उठती हैं । जिसमें प्रारणमात्रा जितनी अधिक होती है उसमें उमंगें उतनी ही अधिक होती हैं । अन्न से जैसे मन बनता है तथैव पानी से प्रारण बनता है । इसीलिए - प्रन्नमयं हि सोम्यमन - प्रापोमयः प्राणस्तेजोमयी वाक्- ( छा ० उ ० ६।५।४ ) यह कहा जाता । पानी वरुण ही है । अतएव हम कह सकते हैं कि चित्तोत्साह के अधिष्टाता भी यही वरुण हैं । जिसमें पानी की मात्रा कम होती है, जो पानीदार नहीं होता है उसका मन मरा रहता है । ऐसे मनुष्य के मुख पर मक्खियाँ भिनभिनाया करती हैं । एवं जो पानीदार होता है, वह नई - नई उमंगों से श्रोतप्रोत रहता है, उत्साहयुक्त रहता है— " वरुणो विश्वग्निम् " । प्रजात्रों में अर्थात् यच्चयावत् जड़ - चेतन पदार्थो में अग्नि को इसी वरुण ने स्थिर कर रक्खा है । अग्नि विकलनधर्मा है । वरुण अर्थात् सोम संकोचधर्म्मा है । पिण्ड बनाना सोम ही का काम है । यदि अग्नि में सोम की आहुति न हो तो पिण्ड ही न बने । यच्चयावत् पदार्थों में पिण्डरूप में परिणत जो अग्नि दिखलाई पड़ रहा है, वह इसी वरुण की महिमा है । यदि सोम न हो तो विशकलनधर्म्मा अग्नि क्षण मात्र में पदार्थ के खण्ड - खण्ड कर दे । शरीर को जहाँ छूते है, वहीं गरमी मालूम होती है । यदि पूछो कि यह गरमी किससे है, तो हम यही कहेंगे कि वरुण से है, सोम से है । अन्न द्वारा जो सोम इस अग्नि में आहुत होता है - वही शरीर की गर्मी की स्थिति का कारण है । यदि अन्न खाना बन्द कर दिया जाए तो उसी समय हाथ - पैरों की गरमी निकल जाए । कहने का तात्पर्य यही है कि प्राणीमात्र में अग्नि को स्थिर रखने वाला यही वरुण है । अपि च सूर्य अग्नि का गोला है । इसके चारों ओर यही आपोमय वरुणमण्डल है । इसी वमरणमण्डल को परमेष्ठि- मण्डल कहते हैं । इसी से सूर्य का गोला स्थित है । सूर्य्य अग्नि है, यदि उसमें पारमेष्ठ्य सोमाहुति न हो, तो सूर्य्य एक सेकण्ड में नेस्तनाबूद हो जाए । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह वरुण हृदयों में ऋतु - स्वरूप है, उमंग-स्वरूप है । उमंग उत्पन्न करना इसी का काम है । मनोजव बन कर वरुण हृदय - स्थान में प्रविष्ट हो रहा है— " हृत्सु ह्ययं ऋतुः । मनोजवः प्रविष्टः " । यही वरुण प्रजाओं में अग्निस्वरूप है, अर्थात् प्रजात्रों में जो अग्नि दीखती है वह इसी वरुण सोम की महिमा है— " विक्षु ह्ययं प्रजास्वग्निः दिवि सूर्यमदधात् " । इसी वरुण ने सूर्य को द्युलोक में रोक रक्खा है । परमेष्ठिमण्डल के पेट में सूर्य्य है । सूर्य्यं द्युलोक में स्थित है । इसका एकमात्र कारण यही वरुण है । यदि वरुण सोम इसमें न आए तो सूर्य्य अभी द्युलोक में से नष्ट हो कर गिर जाए-[ ४ ९ ३ ]

पृष्ठ 504

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मण " दिवि सौ सूर्यो हितः " । सोम पर्वतों में ही होता है । इसके दो अर्थ हैं । सोमवल्ली पर्वतों में ही होती है । पर्वत में ही प्राकृतिक सोम चुआ करता है । वही सोमवल्ली स्वरूप में परिणत हो जाता है । दूसरा अर्थ यही है कि सोम अद्रि में है । अर्थात् सोम के साक्षात् दर्शन करना चाहो तो पत्थर ही है । सोम ही पत्थर बना हुआ है । अग्नि विशकलनधर्मा है, सोम संकोचधर्म्मा है, यह बात पूर्व में बतला आए हैं । इस सोम की ध्रुव, धत्रं, धरुण, धर्म ये चार अवस्थाएँ होती हैं । चारों में जो ध्रुव सोम है, वही पत्थर बनता है । जिसमें ध्रुव - सोम घुस जाता है, वह पत्थर बन जाता है— " तस्मादाह दिवि सूर्यमदधात् सोममद्राविति ॥ ७ ॥

आज इसी सोम को शकट पर रक्खा गया है एवं इसके चारों ओर वस्त्र लपेटा गया है । वस्त्र को प्राप्त किया है । प्राप्ति वरुणसोम का ही काम | अतएव " वनेषु व्यन्तरिक्षम् " इत्यादि मन्त्र से ही अध्वर्यु सोम का पर्यारणहन करता है । दीक्षा प्रकरण में बतलाया गया था कि कृष्णमृगचर्म दो हों अथवा एक हो । दोनों में कामचार । इसी बात को लक्ष्य में रख कर कह रहे हैं कि यदि कृष्णमृगचर्म दो होते हैं तो इन दोनों में से एक तो बिछा दिया जाता है एवं दूसरे का प्रतीनाह भाजन बना कर प्रत्यानहन कर देते हैं । शकट के अग्र-भाग में, जहाँ शकट हाँकने वाला कोचवान बैठता है, उसके पार्श्व में एक बाँस का स्तम्भ रहता है-त्वग रहता है— उसे ही प्रतीनाह कहते हैं । उसी पर उस कृष्णमृगचम्मं को लपेट देना चाहिए तथा दूसरे मृगचर्म को ध्वजा के काम में ले लेना चाहिए । “ तयोरन्यतरत्प्रत्यानह्यति प्रतीनाहभाजनम् " । यदि दो कृष्णमृगचर्म्म न हों, एक ही हो, तो मृगचर्म की ग्रीवा को काट कर प्रतीनाह स्थान में उसी का प्रत्यानहन कर देते हैं-“ एकं भवति, कृष्णाजिनग्रीवा एवावकृत्य प्रत्यानह्यति प्रतीनाहभाजनम् " । जिस समय कृष्णमृगचर्म को उस ध्वजा में लगाता है, उस समय, अध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र बोलता है-" सूर्यस्य चक्षुरारोहाऽग्नेरक्ष्णः कनीनकम् । यत्रतशेभियसे भ्राजमानो विपश्चिता " - इति ॥ ( यजु ० ४ । ३२ ) हे कृष्णाजिन! ( त्वं ) सूय्र्यस्य चक्षुस्थानीयम् । एतादृशस्त्वं ग्रनस्युपरि आरोह । हे कृष्णाजिन, त्वं अग्नेः कनीनकमारोह । यत्र - ( यस्मिन्ना रोहे सति ), एतेभिः ( श्रश्वः ) विपश्चिता ( मेधाविना सोमेन सह ) भ्राजमानः ( दीप्यमानः सन् ) ईयसे - गच्छसि । [ ४६४ ]

पृष्ठ 505

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मए सोमपयांहून ब्राह्मण हे कृष्णाजिन, आप सूर्य के चक्षु बन कर इस शकट के उपरिभाग में अर्थात् प्रतिनाह ( ध्वजा ) में एवं अग्नि की कनीनिका में सवार होइए । सूर्य्यं पृथिवी से ऊपर ही रहता है एवं अग्नि की जो कनीनिका है वह भी ऊपर ही रहती है । अग्नि से वैश्वानर मनुष्य का अर्थ अभिप्रेत है । मनुष्य की जो कनीनिका है वह मस्तक - भाग में स्थित चक्षु के बीचों - बीच रहती है । कनीनिका " फोकस " को कहते हैं । अग्नि का पृथिवी से सम्बन्ध है । सूर्य्य का द्युलोक से सम्बन्ध है । तो इस कृष्णमृगचर्म को अग्नि की कनीनिका और सूर्य का चक्षु बतलाने से यही अभिप्राय है कि सोम द्यावा - पृथिवी की निगरानी में चल रहा है । कृष्णमृगचर्म्म, सामान्य चर्म नहीं है, अपितु द्यावापृथिवी का प्रतीक है । ऊपर टाँकने से सूर्य्य के चक्षुभाव तथा अग्नि की अर्थात् वैश्वानर पुरुष की कनीनिका के भाव का भी समावेश हो जाता है | अतएव - सूर्य्यस्य चक्षुरारोह - इत्यादि कहा गया है । सूर्य्यं के घोड़ों का नाम " एतश " है, जैसा किश्रुति कहती है-" उबु त्यद्दर्शतं वपुदिव एति प्रतिह्नरे 1 महति देव एतशो विश्वस्मै चक्षसे अरम् ” ॥ ( ऋ ० मं ० ७।६६।१४ ) जब कि कृष्णमृगचर्म्म - सूय्यं स्थानापन्न है तो अनस में जुते हुए श्रश्व अवश्य ही रक्षक हैं । प्रकृति-मण्डल से सूर्य्यं पारमेष्ठ्य सोम को ले कर अपने सातों घोड़ों पर सवार हो कर सोम ले जाता रहता है । सूर्य्य की रक्षा में आया हुआ सोम असुर - आक्रमण से बच जाता है । प्राप्य प्रारण का नाम असुर है । यह परमेष्ठि- मण्डल में रहता है । सोम भी परमेष्ठि- मण्डल में ही रहता है । जब तक सोम पर-मेष्ठि - मण्डल में रहता है तब तक तो वह असुरों से अर्थात् आप्यप्राण से ग्राक्रान्त रहता है । परन्तु जब सूर्य्य में आ जाता है तो आसुराक्रमण से मुक्त हो जाता है । सूर्य के प्रखर ताप के सामने आप्यप्राण एक क्षण भी नहीं टिक सकता । बस, सौराग्नि के प्रतीक रूप में ही ध्वजा पर कृष्णमृगचर्म्म को बाँधते हैं । कृष्णमृगचर्म्म सूर्य्यं है एवं अनस से जुते हुए घोड़े एतश हैं । हम सोमयज्ञ पृथिवी पर कर रहे हैं । पृथिवी -लोक के अधिष्ठाता अग्नि हैं । अतएव " अग्ने रक्ष्णः " भी कह दिया है । यदि सिर्फ सूर्य्यं ही का नाम लिया जाता तो यजमान की प्रतिष्ठा पृथिवी से उखड़ जाती । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि हे कृष्णाजिन! आप विपश्चित् अर्थात् भ्राजमान सोम के साथ जिस शकट पर जा रहे हैं, ऐसे आप सूर्य के चक्षुस्थान में और अग्नि के अक्षिस्थान में सवार होइए । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं कि " सूर्यस्य चक्षुः " इत्यादि कथन से कृष्ण मृगचर्म्म को शकट के अग्रभाग में स्थित ध्वजा पर लगाना, सूर्य्य को पूर्वभाग में रखना है । सूर्य पश्चिम से पूर्व की ओर असुरों - राक्षसों का संहार करता हुआ, एतश घोड़ों पर सवार हो कर जाता है । जब सूर्य्यं राक्षसों का नाश कर देता है तो एतश घोड़े निष्कण्टक मार्ग से सोम को ले जाते हैं । तथैव सूर्य की निगरानी में इस शकटस्थ सोम को एतश घोड़े ले जा रहे हैं । [ ४ ९ ५ ]

पृष्ठ 506

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तृतीय काण्ड ( ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्यारणहन ब्राह्मण सूर्य्यं सुर - निहन्ता है । अतएव उसी के अनुकरण पर कृष्णमृगचर्म्म बाँधा जाता है । कृष्णमृग-चम्मं त्रयी - विद्यास्वरूप है । इसलिए पुरोडाश - सम्पादन ब्राह्मण में इसके लिए " संवात्रयी विद्या मज्ञः ” -कहा जाता है । उधर सूर्य्य भी त्रयी - विद्या धन है । अतएव - " सैषा त्रयी विद्या तपतीति " कहा जाता है । कहना इससे यही है कि निदानेन कृष्णमृगचर्म्म अवश्य ही सूर्य की प्रतिकृति माना जा सकता है—

“ सूर्य मेवैतत् पुरस्तात् करोति । सूर्यः पुरस्तान्नाष्ट्रा रक्षांस्यपघ्नन्नेति ।

प्रथाभयेनानाष्ट्रेण परिवहन्ति " ॥८ ॥

नीड, कस्तम्भी, प्रउग्य, फलक, प्रतीनाह, इत्यादि शकटावयवों के नाम हैं । जिस स्थान पर अनाज वगैर: रक्खा जाता है एवं मनुष्य बैठते हैं उसका नाम नीड है-- " धान्य निधानाय परिक्षित प्रदेशो नीडः " । शकट के अग्रभाग में दो लम्बी लकड़ियाँ रहती हैं । जब बैलों को खोल दिया जाता है तो इन दोनों लकड़ियों के सहारे गाड़ी ज्यों की त्यों खड़ी रहती है, नीचे नहीं गिर पातीं-" शकटस्याधःपतनं वारयितुमीषादण्डप्रोत्तम्भ्यनार्थामेथी कस्तम्भी " । ये दोनों लकड़ियां जिसमें बँधी रहती हैं, उसका नान प्रउग्य है | जब कस्तम्भी को भी हटा दिया जाता है तो गाड़ी का अग्रभाग जमीन पर टिक जाता है । जो ऊपर से चौड़ा होता है. मुखाग्र पर पलंग के पाए के माफिक होता है उसे प्रउग्य कहते हैं एवं जिनके नीचे दोनों बैल जोते जाते हैं, वे ही फलक कहलाते हैं । भाषा में जिन्हें जुड़ा कहते हैं, उसे ही वैदिक परिभाषा में फलक कहते हैं । जहाँ सोम रक्खा जाता है, उसके अग्रभाग में ही एक बाँस रहता है जिसे कि ध्वजा भी कहते हैं, तथा प्रतीनाह भी कहते हैं । प्रकृत में केवल फलक से अर्थात् जूड़े से सम्बन्ध है । जब गाड़ी में बैल जोत दिए जाते हैं तो यह प्रउग्य सम्बन्धी फलक उद्धत हो जाते हैं । इसका प्रमाण चुबुक तक माना जाता है । बैल जुते बाद फलक ठोडी तक आ जाते हैं । प्रउग्य के दोनों ओर फलक रहते हैं एवं वे ऊँचे उठे रहते हैं । बैल जो दिये गये हैं । सोम रख दिया गया है । अतएव फलक प्रउग्य से भी ऊँचे हो जाते हैं । बस इसी अभि-प्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं-भवतः " “ उद्धते प्रऽउग्ये फलके भवतः । प्रउग्यसम्बन्धि फलके प्रयुगादयुन्नते 11 इन दोनों फलकों के बीच में ( शकट के अन्तिम स्थान ) से बैलों को हाँका जाता है— " तदन्तरेण तिष्ठन्त्सुब्रह्मण्यः प्राजति " । जहाँ पर बैठ कर गाड़ी हाँकी जाती है वहाँ पर सुब्रह्मण्य नहीं बैठ सकता, अपितु इसे सोम से बहुत दूर बैठ कर गाड़ी हाँकनी पड़ती है । इसका कारण बतलाते हैं । जो मनुष्य घोड़े पर अथवा [ ४ ९ ६ ]

पृष्ठ 507

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तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्थ्यारणहन ब्राह्मण गाड़ी पर अथवा हाथी पर सवार हो कर चलता वह श्रेयान् हो जाता है । सवारी पर चलने वाला मनुष्य पैदल चलने वालों की अपेक्षा श्रेष्ठ माना जाता है । आज यह सोम शकट पर सवार है अतएव यह श्रेष्ठ हो गया है । सोम पैदल नहीं चलता अपितु सवारी पर ही चलता है, यही इस सोम की श्रेष्ठता का प्रत्यक्ष प्रमाण है । भला, जब शकट पर राजाधिराज सोम बैठे हुए हैं तो फिर उनके अधि-ष्ठित रहते, उस शकट पर और कौन बैठ सकता है? जिस सिंहासन पर राजा सवार हो रहा है । सामान्य मनुष्य की क्या ताकत है कि वह उस पर बैठ जाए? सोम के सामने सुब्रह्मण्य मामूली मनुष्य है, वह सोम के पास नहीं बैठ सकता अतएव उसे फलक के मध्य भाग में, सोम से अलग बैठ कर ही गाड़ी चलानी पड़ती है-" श्रेयान् वाऽएषोऽभ्यारोहाद्भवति को ह्येतमर्हत्यभ्यारोढुं तस्मादन्तरेण तिष्ठन् प्राजति " ॥ ९ ॥

वह सुब्रह्मण्य और किसी शाखा से बैलों को न हाँक कर पलाशशाखा से ही हाँकता है - " पलाश-शाखयाप्राजति " पलाश - शाखा में ही क्या विशेषता है - यह बतलाते हैं । गायत्री ने धावा मार कर सोमापहरण किया था, जिसका कि विस्तृत विवेचन " सोमाख्यान " ब्राह्मण में कर दिया गया है । यहाँ सिर्फ इतना ही कहना है कि गायत्री ने जिस स्थान पर ( परमेष्ठी पर ) सोम की ओर अभिमुख हो कर, उस पर धावा मारा उस समय सोम लाते समय, नीचे के प्रदेश में आक्रमण कर पर्ण को छेद डाला । अर्थात् जिस समय सोम ऊपर से गिरा तो गिरते हुए उस सोम ने गायत्री के पंख को काट डाला एवं काट कर जमीन पर गिरा दिया-" यत्र ( यस्मिन् स्थाने ) वै गायत्री ( सुपर्णो भूत्वा ) सोममच्छ ( सोमम-भिलक्ष्य ) प्रपतत् ( अगच्छत् ) तत् ( तत्र ) अस्या - प्रहरन्त्याऽप्रपादस्ताभ्या-यत्य पर्णं प्रचिच्छेद " । किसका पक्ष विच्छिन्न हो गया, इसका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-या तो गायत्री का ही पक्ष कट कर गिर गया - यह समझ लो अथवा सोम का ही पक्ष अर्थात् हिस्सा गिर गया – यह समझ लो । दोनों ही में कोई अनुपपत्ति नहीं है । गायत्री पृथिवी की अग्नि का नाम है । यही सोम ला कर वापस लौटती है । उस समय जो सोम पृथिवी पर चू पड़ता है उस हिस्से को गायत्री और सोम दोनों कह सकते हैं, क्यों कि दोनों अविनाभूत हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" गायत्र्यै ( त्र्याः ) वा सोमस्य वा राज्ञः " । वह सोम अधःप्रदेश में गिर कर पर्ण हो गया । पतित पर्ण से यह पलाश बन गया अतएव इसका नाम पर्ण हो गया । पर्ण और पलाश दोनों पर्य्याय हैं । चूँ कि सोम का अंश नीचे गिर गया अतएव उसका नाम प हो गया । पतित अंश का नाम ही पर है-[ ४ ९ ७ ]

पृष्ठ 508

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपय्र्याणहून ब्राह्मण " तत् पतित्वा पर्णोऽभवत् तस्मात् परर्णो नाम " । तो बस, जितना सा सोम का हिस्सा गायत्री से अलग हो कर जमीन पर गिरा और पर्णं बन गया, पलाश बन गया, वह भी हमारे इस यज्ञ में आ जाए, सर्वात्मना सोम का ग्रहण हो जाए - इसलिए पलाश - शाखा से ही बैलों को हाँकते हैं । यदि यह सोम - भाग शामिल नहीं किया जाएगा तो सारा सोम नहीं आ पाएगा । निदानेन सर्वतो सोमकारिता के लिए पलाश - शाखा से ही बैलों को हाँका जाता है-" तद्यदेवात्र सोमस्य न्यक्तं तदिहाप्यसदिति तस्मात् पलाशशाखया प्राजति " । 112011 जिस समय बैलों को गाड़ी में जोता जाए उस समय यदि बैलों में काली झांई प्रतीत हो तो समझ लो, इस वर्ष बहुत ही दृष्टि होगी । बैल जिस समय गाड़ी को खींचने लगते हैं, उस समय उनके चित्त में एक प्रकार का प्रवेश होता है । उस समय सुब्रह्मण्य को चाहिए कि उधर ध्यान रक्खे | उस समय दोनों बैलों पर काली झांई मालूम हो तो समझ लो इस वर्ष पर्जन्य खूब ही मेह बरसाएगा । बड़ी गहन विद्या है । समझ में नहीं आता कि काली झांई प्रतीत होने से क्यों कर वृष्टि का अनुमान कर लिया जाता है? इस रहस्य को वे ही जान सकते हैं जो कि विदितवेदितव्य हैं एवं साक्षात् कृतधर्म्मा I हम यदि बैठे रहते हैं और हमारे सामने हो कर कोई मनुष्य द्वार के आगे से निकल जाता है । तो उसकी काली - सी परछाई पड़ती है । वैसी ही परछाई यदि दोनों बैलों पर पड़े तो समझ लो इस वर्ष बहुत ही वृष्टि होगी । यदि एक ही बैल पर काली परछाई मालूम हो तो सामान्य दृष्टि होगी । यही इस काली परछाई का विज्ञान है । इसी को शकुनविद्या कहते हैं । इसे मिथ्या नहीं समझना चाहिए । वेद में सैकड़ों जगह शकुनविद्या का उपपादन किया गया है, जिसका कि विवेचन करना अप्राकृत होगा । सामने घड़ा भरा हुआ मिलता है तो कार्य सिद्धि होती है । रीता होता है तो काम बिगड़ जाता है | ऐसा क्यों होता है? इसका कारण तो हम नहीं जानते परन्तु होता ऐसा अवश्य है । यद्यपि भाष्यकार लोग इसका अर्थ करते हैं कि जुते हुए बैल यदि काले हों तो प्रचुर वृष्टि होगी - तथापि हमारे खयाल से यह अर्थ अशुद्ध है । अकल्पित घटना से ही शकुन का सम्बन्ध है । यदि जान - बूझ कर काला बैल लाया जाता है तो उसका शकुन से जरा भी सम्बन्ध नहीं होता । अस्तु, कहना हमें यही है कि गाड़ी में जोतते समय यदि बैलों पर काली परछाई पड़े तो अतिवृष्टि होगी-“ प्रथानड्वाहावाजन्ति । तौ यदि कृष्णौ स्यातामन्यतरो वा कृष्णः तत्र विद्याद्वषिष्यत्यैषमः ( अस्मिन् संवत्सरे ) पर्जन्यो वृष्टिमान् भविष्यति -[ ४ ९ ८ ]

पृष्ठ 509

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्य्यारणहन ब्राह्मण ( यदि - ( उभौ ) कृष्णौ स्याताम् ( तदा ) ऐषमः पर्जन्यः ( वर्षिष्यति अर्थात् अति-वृष्टिर्भविष्यति ) यदि ( एक एव ) कृष्णस्यात् तदा पर्जन्यो वृष्टिमान्भविष्यति ।

( प्रर्थात् साधारण वृष्टिर्भविष्यति । ) एतदु विज्ञानम् " ॥११ ॥

सुब्रह्मण्य को कहाँ बैठना चाहिए - इत्यादि बातों का निर्णय हो चुका । अब पद्धति बतलाते हैं । इसके अनन्तर वह सुब्रह्मण्य निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ गाड़ी में दोनों बैलों को जोतता है—

" उनावेतं धूर्षाही युज्येथामनश्रू प्रवीरहरणौ ब्रह्मचोदनौ ।

स्वस्ति यजमानस्य गृहान् गच्छतम् " ॥

" हे उत्रौ ( अनड्वाहौ ) धूर्षाहौ ( धुरंसोढुं समर्थों युवाम् एतम् प्रत्यागच्छतम् — शकटम् ) युज्येथाम् - अश्रू - प्रवीरहरणौ ब्रह्मचोदनौ ( एतादृशौ भवन्तौ एवं भूतौ - भवन्तौ ) स्वस्ति यजमानस्य गृहान् गच्छतम् ” ॥ हे बलीवर्दो! आप इस धुर को सहने में समर्थ हैं । ऐसे आप इस शकट से जुड़िए । हे बलीवर्दो! श्राप अनश्रू हैं अर्थात् शकट में जुड़ने से प्रापको जरा भी कष्ट मालूम नहीं होता । आप मन्त्रप्रेरित हैं । अथवा आप यज्ञप्रेरयिता हैं, यह भी ब्रह्मचोदनो का अर्थ हो सकता है । अथवा आपको हाँकने वाले ब्राह्मण हैं । ब्राह्मण हैं प्रेरयिता जिनके ऐसे आप हैं । आप शंका आदि से प्रवीरह हैं अर्थात् शान्त-भाव युक्त हैं | सींग वगैरः से किसी को भी नहीं मारते हैं । ऐसे आप क्षेमकुशलपूर्वक यजमान के घर पधारिए । भगवान् याज्ञवल्क्य प्रत्येक पद का अर्थ करते हैं— " उस्रावेतं धूर्षा हौ - इति ” । ये बैल वास्तव में उस्र नाम से ही प्रसिद्ध हैं- " उस्रो हि भवतः " । ये बैल धुरी को वहन करने वाले भी हैं - भारवाही भी हैं-" धूर्वाहौ हि भवतः । युज्येथामनश्रू ” । हो कर ये शकट में जुड़ते हैं, यही अश्रू का तात्पर्य है— " अनार्ताविति - प्रवीरहणाविति - पापकृताविति ” । ये अपापकृत हैं - अर्थात् किसी के सींग नहीं मारते हैं । ये वास्तव में मन्त्रप्रेरित हैं । इस शकट को बीच ही में असुर राक्षस लोग नष्ट न कर दें, क्षेमकुशलपूर्वक दोनों यजमान के घर पहुँच जाएँ, यही स्वस्ति - इत्यादि से कहा है-" यथैनावन्तरा नाष्ट्रा रक्षांसि न हिंस्युरेवमेतदाह " ॥१२ ॥

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पृष्ठ 510

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 510 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपहन ब्राह्मण इसके अनन्तर वह अध्वर्यु शकट के पश्चिम भाग में लौट कर पालम्ब पर सवार हो सोम का स्पर्श करके कहता है-" सोमाय क्रीतायानुब्रूहीति - सोमाय पर्युह्यमाणायेति वा " । दोनों में से एक ही वाक्य बोले । सुब्रह्मण्य कहता है - है ऋत्विजो! आप यजमान से कह दीजिए कि सोम खरीद लिया गया है- सोम वहन कर लिया गया है - यही मन्त्र का तात्पर्य है । ऐतरेय ब्राह्मण में विकल्प पक्ष नहीं है । वहाँ -" सोमाय क्रीताय प्रोह्यमाणायानुब्रूहीत्याह श्रध्वर्युः ” । ( ऐ ० ग्रा ० ३।२ ) यह बोला जाता है । इसीलिए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वहाँ एक विकल्प - पक्ष व्यवस्थित नहीं है किन्तु यहाँ तुम एक साथ दोनों वाक्यों को भी बोल सकते हो, अथवा कोई सा एक भी बोल सकते हो -“ प्रथ पश्चात् परिक्रम्य । श्रपालम्बमभिपद्याह- सोमाय क्रीतायानुब्रूहीति

सोमाय पर्युह्यमाणायेति वा । अतो यतरथा कामयेत " ॥१३ ॥

इसके अनन्तर अध्वर्यु यजमान से निम्नलिखित मन्त्र बुलवाता है— " भद्रो मेऽसि प्रच्यवस्व भुवस्पते विश्वान्यभिधामानि । मा त्वा परिपरिणो विदन्मा त्वा परिपन्थिनो विदन्मा त्वा वृका श्रघायवो विदन् श्येनो भूत्वा परा-पत । यजमानस्य गृहान् गच्छ तन्नौ संस्कृतम् ” । हे सोम! आप भद्र हैं अर्थात् कल्याण करने वाले हैं, अग्नि विशकलनधर्मा है । अतएव अग्नि से अशान्ति होती है । सोम ठण्डे हैं । शीतल वस्तु से शान्ति होती है । श्रतएव भद्रोऽसि कहा है । आप भद्र हैं, अर्थात् स्तुत्य हैं । हे भुवस्पते! तीनों भुवनों के पालनकर्ता आप अपने सारे स्थानों को लक्ष्य में रख कर इधर-उधर किए । सोम त्रिलोकी में व्याप्त रहता है । रोदसी भुवन, क्रन्दसी भुवन एवं संयती भुवन - इन तीनों में सोम रहता है, अतएव उसे भुवस्पते कहा है । सोम की अनेक जगह जरूरत पड़ती है । इसी से ग्रहयाग होता है । इसी से उपांशुसवन होता है । इसी से ग्रन्तर्याम होता है । बस इसीलिए कहा जाता है कि जहाँ - जहाँ जिस - जिस कर्म में आपकी जरूरत पड़े वहाँ - वहाँ ही प्राप पधारिए । आप अपने कर्तव्य का खयाल रखखें । क्यों कि आप देवता हैं अतएव सत्यसंहित हैं । हम मनुष्य हैं - हम से भूल हो सकती है । [ ५०० ]