श्रीगणेशाय नमः।
Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 511–520
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 511–520
पृष्ठ 511
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्थ्याएहन ब्राह्मण शत्रु तीन तरह के होते हैं । एक तो आत्मनाशक होते हैं । वे हमारे काम को भी नहीं बिगाड़ना चाहते, न हमारे द्रव्य को ही लूटना चाहते हैं, वे तो हमारे श्रात्मा के नाशक हैं । ऐसे को ' आयुवृक ' ( जीवनाशक हिंस्र भेड़िया ) कहा जाता है । एवं कई ऐसे होते हैं जो खाली द्रव्य ही को चुरा कर सताना चाहते हैं; उन्हें परिवर्त कहा जाता है । चोर - चोरी कर दूर से दूर भाग जाना चाहता है. अतएव उसे परिवर्त कहा जाता है । तीसरे ऐसे होते हैं जो हमारे कर्म्म पर आक्रमण करते हैं उन्हें ' परिपन्थी ' कहते हैं | तीनों में से किसी एक के भी आ जाने पर यज्ञ नष्ट हो जाता है, अतएव तीनों का नाम लेकर कहते हैं-हे सोम! तुम्हें न परिवर्त पहिचानें न परिपन्थी पहिचानें एवं न अधायुवृक लोग ही पहिचानें । श्राज सोम यजमान के घर आया है । इसका इन तीनों को पता ही न लगे । अपि च हे सोम! आप श्येन बन कर अर्थात् बलिष्ठ पक्षी बन कर यजमान के घर पर पधारिए । अर्थात् प्राप इतने वेग से -बलिष्ठ बन कर पधारिए कि तीनों शत्रुओं का नाश हो जाए । हे सोम! आपका और हमारा दोनों का संस्कृत स्थान यही है । आप भी यजमान के घर ही काम करेंगे एवं हमारा ( ऋत्विजों का ) काम भी वहीं पड़ेगा । भगवान् याज्ञवल्क्य मन्त्र के प्रत्येक पद का अर्थ करते हैं । भद्रोऽसि –- इति " यह सोम यजमान यजमानात्मा स्वर्ग से बद्ध होता है । सोम दूसरा है ही नहीं । अतएव सभा में श्राते चाहे यज्ञ में बड़े से बड़ा राजा बैठा हो का भद्र अर्थात् कल्याण करने वाला है । सोम से ही तो से बढ़ कर यजमान का कल्याण करने वाला संसार में कोई हुए जो राजा लोग हैं उनका भी यह आदर नहीं करता है । परन्तु यजमान उसकी पर्वाह न कर पहले सोम राजा का ही अभिवादन करता है, क्यों कि यही इसके लिए कल्याणकारी हैं । इसलिए इन्हें भद्र कहना औरों की अपेक्षा इसे अधिक प्रतिष्ठायुक्त बनाना है । “ भद्रो ह्यस्यैष भवति । तस्मान्नान्यमाद्रियते अध्यस्य राजानः सभागा आग-च्छन्ति - पूर्वो राज्ञोऽभिवदति । भद्रो हि भवति - ( सोमः ) । तस्मादाह भद्रो मेऽसीति । प्रच्यवस्व भुवस्पतऽइति " । यह सोम वास्तव में तीनों भुवनों का मालिक है--" भुवनानां ह्येष पतिः । विश्वान्यभिधामानि इति " । यज्ञांकुशे - इसके धाम हैं - प्रर्थात् स्थान हैं । यज्ञांगों में सोम की आवश्यकता पड़ती है । " विश्वानि " -यह यज्ञांगों के लिए ही कहा गया है— " अङ्गानि वं विश्वानि धामान्यङ्गान्येवैतदभ्याह- मा त्वा परिपरिरणो इत्यादि " । इस सोम को राक्षस, असुर लोग न पहिचान लें - यही मात्वा इत्यादि मन्त्रभाग का तात्पर्य है— [ ५०१ ]
पृष्ठ 512
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ० प्र ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्य्याणहन ब्राह्मणं " यथैनमन्तरा नाष्ट्रा रक्षांसि न विन्देयुरेवमेतदाह " ॥१४ ॥
“ इयेनो भूत्वा परापतेति । वय एवैनमेतद्भूतं प्रपातयति " । वय कहते हैं पक्षी को । इस सोम को वय बना कर ही यज्ञ में भेजते हैं । उग्रवय प्रर्थात् प्रबल पक्षी को राक्षस असुर मारने के लिए नहीं आते हैं । उग्र से सब डर जाते हैं । संसार भर के पक्षियों में यह श्येन पक्षी ओजिष्ठ है और बलिष्ठ है । मनोबल और शरीरबल दोनों ही इसमें अधिक रहते हैं । अतएव इसे श्येन बना कर ही भेजते हुए ' श्येनो भूत्वा ' कहते हैं । श्येनो भूत्वा कहना - सोम को श्येन बना कर भेजना है-“ यद्वाऽउग्रं तन्नाष्ट्रा रक्षांसि नान्ववयन्ति ( हन्तुम् नानुगच्छन्ति ) एतद्वैव यसा-मोजिष्ठं बलिष्ठं यच्छयेनः । तमेवैतद्भूतं प्रपातयति । यदाह श्येनो भूत्वा परा-पत " – इति ॥ १५ ॥
यदि प्रमादवश सोम को राक्षस, असुर आदि हिंसक प्राण नष्ट करते भी हैं तो — “ श्येनो भूत्वा " इत्यादि मन्त्र - सामर्थ्य से वे श्येन भाव में परिणत श्येन के शरीरमात्र का ही नाश करने में समर्थ होते हैं । सोम के आत्मा का, अर्थात् सारभाग का, कुछ नहीं बिगड़ता । मन्त्र - प्रभाव से सोम पक्षी की जो त्वचा है वही असुरों द्वारा बिगड़ने वाली है । सोम रस का कुछ नहीं बिगड़ता । " अथ शरीरमेवान्ववहन्ति ( हन्तुमनुगच्छन्त्यसुराः नात्मानमिति भावः )
यजमानस्य गृहान् गच्छेति " -इसका अर्थ तो स्पष्ट ही है ।
" नात्र तिरोहितमिवास्ति " ॥१६ ॥
सोम यजमान के घर पहुँच गया । अब सुब्रह्मण्या नाम के देवता का निगद मन्त्र से आह्वान करते हैं । देवताओं को बुलाने का जो मन्त्र है उसे ब्रह्म कहते हैं । जो शोभन मन्त्र है उसे सुब्रह्म कहते हैं । जो देवता शोभन मन्त्र के द्वारा बुलाने लायक है, उसका नाम " सुब्रह्मण्या " देवता । आज इस यज्ञ में ये देवता पधारेंगे एवं इन्हें सोम दिया जाएगा । अतएव निगद मन्त्रों से उनका आह्वान किया जाता है । याज्ञबल्क्य कहते हैं कि जिनके लिए मनुष्य रसोई का प्रबन्ध करता है, उन्हें कह देता है आज के दिन आपकी रसोई हमारे घर है । बस, ठीक इसी प्रकार लौकिक मर्यादानुसार आज यह यज-मान देवताओं के लिए हवि - निवेदन करता हुआ कहता है - हे देवताओ! आज के दिन आपकी रसोई हमारे यहाँ है । सुत्या, दीक्षा, उपसत् ये तीन कर्म्म तीन - तीन दिन तक होते हैं । अतएव वहाँ - इत्यहेमे-प्रथमेऽहनि, द्वितीयेऽहनि तृतीयेऽहनि इसका ऊह करना पड़ता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं -[ ५०२ ]
पृष्ठ 513
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपहन ब्राह्म " थ सुब्रह्मण्यामाह्वयति । यथा येभ्यः पक्ष्यन्त्स्यात्तान् ब्रूयात - इत्यहे वः पक्तास्मीत्येवमेवैतत् देवेभ्यो यज्ञं ( हव्यं ) निवेदयति " । वह मन्त्र यह है— " सुब्रह्मण्यम् – सुब्रह्मण्योम् " - इति । देवताओं की स्थिति के अनुरूप ही उच्चावच लहरों से मन्त्र बोलने के कारण स्थिर देवता ऊपर से फिसल पड़ते हैं । वाक् से अन्तरिक्ष में स्थान हो जाता है । उधर से देवता प्रा जाते हैं— " ब्रह्म हि देवान् प्रच्यावयति " । इस मन्त्र को तीन बार बोलता है । यज्ञ त्रिवृत् होता है । सूर्य का नाम ही यज्ञ है । प्रातःकाल से सायंकाल तक सूर्य की सत्ता रहती है । इसमें चढ़ाव, समता, उतार - ये तीन भाव रहते हैं । इन्हीं तीनों को प्रातः सवन, माध्यन्दिनसवन और सायंसवन कहते हैं - चूंकि देवता त्रिसत्य हैं अतएव मन्त्र तीन बार बोला जाता है— " त्रिष्कृत्व ग्रह - त्रिवृद्धि यज्ञः " ॥ १७ ॥
सुब्रह्मण्या के अनन्तर इन्द्र को बुलाते है । इन्द्र यज्ञ के देवता हैं । अतएव उन्हें यज्ञ में बुलाना तथा उनकी स्तुति करना अत्यन्त आवश्यक है । उनको बुलाने का मन्त्र है--“ इन्द्रागच्छेति - इन्द्रो वै यज्ञस्य देवता । तस्मादाह- इन्द्रागच्छेति । हरिव श्रागच्छ । मेधातिथेर्मेष वृषरणश्वस्य मेने । गौरावस्कन्दिन् हत्यायै जारेति ” । इन्द्र जिस अश्व पर चलते हैं उसका नाम हरि है । अतएव इन्द्र को हरिवाहन कहा गया है । है हरिवाहन! आप यज्ञ में पधारिए - यही ' हरिव प्रागच्छ ' का तात्पर्य है । इन्द्र मेधातिथि के यज्ञ में मेष बन कर गए थे अतएव " मेधातिथिर्मेषः " कहा है । ये दोनों विशेषण इन्द्र के मानवीकरण के अभिप्राय से दिए गए हैं । इन्द्र के ये घोड़े ( सातों छन्द ) अत्यन्त बलिष्ठ हैं । हे गौरावस्कन्दिन् अर्थात् गौर नाम के पशु को मारने वाले इन्द्र! हे अहल्या के जार!! आप हमारे यज्ञ में पधारिए । जो दिन का नियमन करती है उसी का नाम अह है । दिन का नियमन करने वाली रात्रि ही है । रात ही दिन की आजादी को छीनती है । अतएव " हयमयति नियच्छति - इस व्युत्पत्ति से रात्रि को कहा जाता है । परोक्षप्रिय देवता - प्रहर्य्या को अहल्या शब्द से व्यवहृत किया करते हैं । सूर्य्य के अन्यतम प्राण का नाम ही इन्द्र है । इसके आते ही अहल्या जीर्ण - शीर्ण हो जाती प्रातःकाल में दो घड़ी के शेष रहते ही सूर्य्य अर्थात् इन्द्र की सत्ता स्थापित हो जाती है । तड़का [ ५०३ ]
पृष्ठ 514
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोम पहन ब्राह्मणं उगी ( पौ फटते ही ) प्रासमान में सफेदी चमकने लगती है । उसी समय गोतम जो कि अहल्या का पति है, भाग जाता है । गौ पृथिवी का नाम है । तम अन्धकार का नाम है । जहाँ इन्द्र आया कि पृथिवी का तम नष्ट हुआ । चूँकि इन्द्र ही अहल्या को जीर्ण - शीर्ण करता है अतएव " अहिल्या जीरयति " - इस व्युत्पत्ति से उस सौर प्रारण को, इन्द्र को, अहल्या- जार कहा जाता है । अपिच उद ति ही सूर्य्य की सहस्र रश्मियां संसार में फैल जाती हैं- ये ही इन्द्र के सहस्र भग हैं - इसीलिए मीमां दर्शनकार कहते हैं— “ सवितं वाहनि लीयमानतया रात्रेरहल्या श वाच्यायाः शयात्मक जररणहेतुत्वात् जीर्य्यत्यस्मादनेन वोदितेन वेत्यहल्याजार उच्यते नतुपरस्त्री व्यवहारात् ” – इति । ( जै ० सू ० ६।१।४१ - ४४ अधि ०१५ ) इन निगद ( व्याख्यान ) मन्त्रों का तात्पर्य्यार्थ बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि अध्वर्यु इस इन्द्र के जोउत्तमोत्तम चरित्र हैं उन्हीं के स्तवन से इसकी अनुग्रह - प्राप्ति की इच्छा करता है | विरुदावली बखान कर इन्द्र को अपने ऊपर प्रसन्न करना चाहता है— " तद्यान्येवास्य चरणानि तैरेवैनमेतत् प्रमुमोदयिषति " ( प्रमोदयितुमिच्छति ) ॥ १८ ।, " कौशिक ब्राह्मण गौतम ब्रुवाणेति " । इन्द्र आकाश में कुल १४ हैं । चित्रा को भी इन्द्र कहते हैं । इसीलिए - " स्वस्ति न इन्द्रो वृद्ध-श्रवा " – ( ऋ ० मं ० ११८६ | ६ ) यह कहा जाता है । उत्तर में ध्रुव समीप भी एक के इन्द्र है, एवं दक्षिण में पञ्चपक्षियों में भी एक कौशिक इन्द्र है । गौतम ब्रुवाण - इसका सबसे पहले दूर तक गौतम महर्षि ने प्रचार किया था, जो याज्ञवल्क्य के गुरु थे । इन्होंने ही इसका प्रतिपादन किया था । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इसमें कामचार है । चाहो तो बोल सकते हो नहीं तो इसकी कोई आवश्यकता नहीं है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— “ शश्वद्वैतदारुणिनाऽधुनोपज्ञातं - यद्गौतम ब्रुवाणेति । स यदि कामयेत ब्रूयादेतद् । यद्यु कामयेत - प्रपि नाद्रियेत । इत्यहे सुत्यामिति " । जिस दिन सुत्या होती है, जितने दिन तक होती है उन दिनों का उतने दिन तक ऊह करना पड़ता है । उस दिन का नाम ले कर देवता का आह्वान करना पड़ता है— " यावदहे सुत्या भवति ( तावद हे । इत्यहे - अस्मिन् दिने - सुत्यामागच्छ इति वक्तव्यमिति भावः " ) ॥१९ ॥
" देवा ब्रह्माण आगच्छत " – इति । [ ५०४ ]
पृष्ठ 515
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण [ ५०५ ] सोमपर्य्याणहन ब्राह्मणं ( ऐत ० ब्रा ० १1१ ) । हे देवताओ और ब्राह्मणो! अर्थात् ऋत्विजो!! आप मेरे इस यज्ञ में पधारिए । ' देवा ब्राह्मणं ' इत्यादि मन्त्र से यजमान देवता और ब्राह्मणों की ओर संकेत करता है । इस यज्ञ में दोनों से ही प्रयो-जन सिद्ध होता है । देवता आहुति लेने वाले हैं । ऋत्विग् लोग आहुति देने वाले हैं - प्रतएव दोनों को बुलाते हैं-" तद् देवांश्च ब्राह्मणांश्चाह - एतैर्ह्यत्रोभयैरर्थो भवति यद्देवैश्च ब्राह्म-णैश्च " - इति ॥२० ॥
इसके अनन्तर ' प्रतिप्रस्थाता ' नाम का ऋत्विक् शाला के पूर्व भाग में अग्नीषोमीय पशु के साथ उपस्थित होता है । प्रतिप्रस्थाता को चाहिए कि अग्नीषोमीय पशु ले कर जाते हुए उसे सोम के अभिमुख ले जा कर खड़ा कर दे— " अथ प्रतिप्रस्थाता । श्रग्रेरण शालामग्नीषोमीयेरण पशुना प्रत्युपतिष्ठते " । सोम के सामने अग्नीषोमीय पशु ले कर उपस्थित होने की क्या आवश्यकता है? इसका कारण बतलाते हैं । जो यजमान दीक्षा लेकर दीक्षित बनता है, उसे अग्नि और सोम अपनी दाढ़ के बीच में दबा लेते हैं । यज्ञस्वरूप को आत्मसात् करने के लिए दीक्षणीयेष्टि करनी पड़ती है । उसमें प्राग्नावैष्णव एका-दश कपाल पुरोडाश किया जाता है । अग्नि पूर्वावसु है, विष्णु उत्तरा आदित्य है । अर्थात् वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्यों में सबसे पहला वसु अग्नि है । अन्तिम १२ वाँ आदित्य विष्णु है । इन आदि - प्रन्त के देवताओं को पकड़ने से सारे देवता पकड़ में आ जाते हैं-" श्रग्निर्वे देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवताः ” । श्राग्नावैष्णव एकादशकपाल पुरोडाश द्वारा अग्नि विष्णु - स्वरूप यज्ञ को दीक्षणीयेष्टि द्वारा आत्मसात् कर लेता है, जिसका कि विस्तृत विवेचन ' दीक्षरणीयेष्टि ब्राह्मण " में कर दिया गया है । इस दीक्षणीयेष्टि से यजमान अग्नि एवं सोम ( विष्णु ) के बीच में दोनों की दाढ़ में आ जाता है । उस व्या-पक श्राग्नावैष्णव यज्ञ के पेट में यजमानात्मा बद्ध हो जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" अग्नीषोमो वाऽएतमन्तर्ज भऽप्रादधाते - यो दीक्षते " दीक्षा लेने वाला यजमान श्रग्निसोम की दाढ़ में आ जाता है - यह कहना गलत है । क्योंकि दीक्षणीयेष्टि से श्राग्नावैष्णव एकादशकपाल पुरोडाश होता है न कि अग्नीषोमीय में । प्रतएव ' अग्नी-षोमो अन्तर्जम्भऽप्रादधाते ' - यह कहना गलत है । इसी पूर्वपक्ष का उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-
पृष्ठ 516
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मणं सोमपर्य्यारणहन ब्राह्मणं दः अर्थात् प्रायणीय इष्टि से भी अतिपूर्व - अधिकारसमर्पणरूप प्राग्नावैष्णव दीक्षणीय हवि होती है । अधिकार - समर्पण - रूपा दीक्षणीयेष्टि में प्राग्नावैष्णव एकादशकपाल पुरोडाश का निर्वाप होता है । इसमें जो विष्णु है - वही सोम है । विष्णु कहते हैं संवत्सराग्नि को, जो कि पृथ्वी के २१ वें अहर्गण तक रहता है । अतएव इस विष्णु को यज्ञ कहा जाता है । २१ वें स्थान पर रहने वाले इस अग्नि में पारमेष्ठ्य सोम की आहुति होती रहती है । इसी से विष्णु की, अर्थात् यज्ञ की, सत्ता रहती है । सोम अन्न है – विष्णु स्वरूप संवत्सराग्नि अन्नाद है, अर्थात् भोक्ता है । अन्न, अन्नाद में जा कर अन्नाद ही बन जाता है । भुक्त अन्न आत्मस्वरूप में परिणत हो जाता हैं । अतएव हम विष्णु को सोम कहने के लिए तैय्यार हैं । ऐसी अवस्था में अग्निसोमीय कहो या श्राग्नावैष्णव कहो - कुछ भी विरोध नहीं आता है— " आग्नावैष्णवं ह्यदो दीक्षरणीयं हविर्भवति । यो वै विष्णुः । सोमः स हविर्वाष भवति - यो दीक्षते " । जो दीक्षणीयेष्टि द्वारा कृष्णमृगचर्म्म पर बैठ कर दीक्षा ले लेता है, वह देवताओं की हवि बन जाता है, देवताओं का पशु अर्थात् भोग्य बन जाता है । वह अग्नि और सोम अर्थात् विष्णु दोनों की दाढ़ में आ जाता है । बस अग्नीषोमीय पशु को दे कर इससे यह यजमान अपने आत्मा को उन दोनों की दाढ़ में से छुड़ा लेता है, पशु चूंकि अग्नीषोमीय है, अतः उसे देने से यजमान उन दोनों की दाढ़ से निकल भी जाता है | यदि ऐसा न किया जाएगा तो एक वर्ष के भीतर यजमान मर जाएगा— " तदेनमन्तर्जम्भऽप्रादधाते - तत् पशुनात्मानं निष्क्रीणीते ॥२१ ॥
इस अग्नीषोमीय पशु का आलम्भन किया जाता है । इसके लिए अग्नि लायी जाती है । अग्नि का उल्मुक बना कर लाया जाता है । उसे अग्नीषोमीय पशु पर फिराया जाता है । यहाँ पर कितने ही प्राचार्य ग्राहवनीयाग्नि से उल्मुक लाते हैं । आहवनीय अग्नि में से ही अग्नि का पूला लाना चाहिए यही उनका सिद्धान्त है । आहवनीय से ही क्यों लाना चाहिए - गार्हपत्य से क्यों नहीं लाए? इसका कारण यह बतलाते हैं कि यह पशु अग्नीषोमीय है; अतएव उल्मुक ऐसा चाहिए जिसमें अग्नि और सोम दोनों साथ रहते हैं । दोनों के साथ रहने से ही दोनों देवताओं से आत्मा खरीद लिया जाएगा । आहवनीय में जुपा ( जलता हुआ ) जो उल्मुक है - वह अग्नि भी है और सोम भी है । इस ग्राह-वनीय में सोम की आहुति दी जाती है । ग्राहवनीयाग्नि सोममय है । अतएव इसमें जुपा हुआ ( जलता हुआ ) पूला अग्नि भी है और सोममय भी है । यजमानात्मा अग्नि - सोम दोनों की दाढ़ में है । अतएव ऐसा उल्मुक फिराना चाहिए जो कि अग्निसोममय हो । इस प्रकार आहवनीयाग्नि से प्रज्वलित किया यह पूला अग्नि भी है और सोम भी है । इन दोनों से, जो कि साथ रहने वाले हैं, हम यजमा-नात्मा को इस अग्नि - सोम देवता की दाढ़ में से निकालेंगे । यह कहते हुए, यह उपपत्ति बतलाते हुए, कितने ही याज्ञिक ग्राहवनीयाग्नि में से उल्मुक लाते हैं— [ ५०६ ]
पृष्ठ 517
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपहन ब्राह्मणं " तर्द्धके । श्राहवनीया दुल्मुकमाहरन्ति । अयमग्निः, अयं सोमः । ताभ्यां सहसद्द्भ्यां निष्क्रेष्यामहे - इति वदन्तः " । परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य इस मन्त्र का खण्डन करते हुए कहते हैं- कि ऐसा कभी नहीं करना चाहिए | श्राहवनीयाग्नि ही सोममय है, यह बात नहीं है । जहाँ पर ये दोनों रहते हैं वहाँ साथ ही रहते हैं । न अग्नि, बिना सोम के रहता है और न सोम, बिना अग्नि के रहता है । दोनों अविनाभूत हैं । अग्नि और सोम की तो ऐसी मित्रता है - ऐसी मित्रता है कि कभी एक दूसरे से जुदा हो ही नहीं सकते ।
अतएव श्रुति कहती है-" अग्निर्जागार तमृचः कामयन्तेऽग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति ।
अग्निर्जागर तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः ” ॥
( ऋग्वेद मं ० ५।४४ । १५ ) श्राहवनीयाग्नि में ही चूंकि सोम की प्राहुति होती है अतएव वही अग्नि सोममय है । अन्य अग्नि सोममय नहीं है । और अत्यावश्यकता है अग्नि तथा सोम दोनों की । अतएव आहवनीय से उल्मुक लेना चाहिए, ऐसा कहना श्रवैज्ञानिक है । वैज्ञानिक दृष्टि से देखने पर कोई भी अग्नि ऐसा नहीं मिलता जिसमें कि सोम न हो एवं न सोम ही बिना अग्नि के रहता है - अतएव आहवनीय से ही उल्मुक लाना चाहिए - इस नियम को मानने की कोई आवश्यकता नहीं है-" तदु तथा न कुर्यात् । यत्र वाडएतौ क्व च -- तत्सहैव " ॥२२ ॥
वह अग्नि- सोमीय पशु द्विरूप ( दुरंगा ) होता है । कारण इसका यही है कि यह पशु अग्नि और सोमभेदेन द्विदेवत्य होता है । यह दोनों देवताओं की ( अग्निसोम की ) चीज है । ऐसी अवस्था में यदि एक ही रंग का होगा तो देव - प्राणों में परस्पर विरोध हो जाएगा । ऐसा न हो, दोनों देवताओं में झगड़ा न हो - अतएव दुरंगा पशु ही होना चाहिए-" स वै द्विरूपो भवति । द्विदेवत्यो हि भवति । देवतयोरसमदे । ( द्विरूपो भवतीति शेषः ) " इति । कई प्राचार्यों का कहना है कि यह पशु कृष्ण - सारंग होना चाहिए । कबूतरी रंग को कृष्ण -सारंग रंग कहते है | जिसमें सफेद और काला दोनों रंग मिले हैं, उसे - कृष्णसारंग - कहते हैं । इसी को संस्कृत भाषा में कर्बुर किंवा शबल भी कहते हैं । कृष्णसारंग ही इन दोनों देवताओं का अधिक तम अभिमत रूप है । अग्नि अर्थात् अंगिरा का रूप काला है एवं सोम का रूप शुक्ल है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि दक्षिण में अग्नि रहता है, अतएव दक्षिण के जितने भी आदमी हैं वे १०० में से ६६ काले रंग के होते हैं एवं सोम उत्तर में होता है, अतएव उत्तर में १०० में से ६ मनुष्य गौर वर्ण के होते हैं । [ ५०७ ]
पृष्ठ 518
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्य्याणहन ब्राह्मण अतएव मानना पड़ता है कि अग्नि का वर्ण काला है - सोम का वर्ण गोरा है । यह पशु अग्नी-षोमीय है अतः कृष्णसारंगवर्ण का ही होना चाहिए । यदि उस समय खोज करने पर भी कृष्णसारंग न मिले तो फिर लोहित सारंग भी ले लेना चाहिए । अंगिरा अर्थात् अग्नि जब तक सुत्य रहता है, तब तक काले वर्ण में परिणत रहता है । जब यह जलता है तो लालरूप धारण कर लेता है । इसकी ज्वालाएँ हिरण्य वर्ण की हो जाती हैं । अतएव लोहित सारंगपशु भी लिया जा सकता है— " कृष्णसारंगः स्यादित्याहुः - एतद्धये नयो रूपतममिवेति । यदि कृष्णसारङ्गं न विन्देदो s पि लोहितसारंगः स्यात् " ॥ २३ ॥
जिस समय प्रतिप्रस्थाता उस कृष्णसारंग अथवा लोहितसारंग पशु को ले आता है तो अध्वर्यु यजमान से यह मन्त्र बुलवाता है—
" नमो मित्रस्य वरुरणस्य चक्षसे महो देवाय तदृतं सपर्यत ।
दूरे दृशे देवजाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्याय शंसत " ॥
बाह्यचक्षु, और अन्तश्चक्षुभेदेन चक्षु दो प्रकार के होते हैं । इन दोनों में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है । बाह्यचक्षु सूर्य्य नाम से प्रसिद्ध है, प्रान्तरचक्षु चक्षु नाम से प्रसिद्ध है । यदि सूर्य्य रहता है, तो अन्त-श्चक्षु काम देते हैं, यदि अन्तश्चक्षु होते हैं तो सूर्य्य काम देता है । ग्राँखों में जो प्रकाश है वह सूर्य्य का प्रकाश है । अतएव “ सूर्यो मे चक्षुषि श्रितः । ( तैत्ति ० ब्रा ० ३।१०।८।५ ) यह कहा जाता है । सूर्य्य-चक्षु त्रिवृत् है । वरुण, मित्र, अर्यमा ( अर्थात् अग्नि ) इन तीनों के योग से सूर्य्य चक्षुष्वान हुआ है - प्रतएव " चक्षुमित्रस्प वरुणस्याग्ने: " ( ऋग्वेद मं. १।११५ । १ ) कहा जाता है | चूँकि सूर्य त्रिवृत् है । अतएव हमारे चक्षु भी त्रिवृत् हैं, सबसे पहले सफेद हैं- बाद में काले हैं, उनके पेट में कृष्ण कनीनिका है । सूर्य्य महाचक्षु हैं एवं हमारे चक्षु प्रातिस्विक हैं - अल्प हैं । हमारी आँख से हम ही देख सकते हैं । परन्तु सूर्य्यचक्षु से समस्त संसार को देख सकता है, अतएव महाचक्षु कहलाता है । सूर्य्यं को पूर्वोक्त मन्त्र से नमस्कार किया जाता है । मित्र - वरुण ( और अग्नि ) के जो चक्षु हैं, उनको हम नमस्कार करते हैं । मित्र पूर्व - कपाल का नाम है । वरुण पश्चिम - कपाल का नाम है । अग्नि- प्रसिद्ध ही है । तीनों के चक्षु अर्थात् स्वरूप कायम रखने वाले यही सूर्य्य हैं । सूर्य्य से पूर्व - पश्चिम कपाल की व्यवस्था होती है । यही अग्नि-धन हैं - दिन मित्र को कहते हैं- रात्रि वरुण को कहते हैं । दोनों के अधिष्ठाता सूर्य्य ही हैं - ऐसे सूर्य्य को नमस्कार है! हे ऋत्विज! अन्ये च प्राणिनः आप ऐसे महादेव के लिए ऋत को प्रदान कीजिए - सोम - निवेदन कीजिए । अग्नि, वायु, सूर्य्यं तीनों क्रमशः पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक के अधिष्ठाता हैं । पार्थिव प्रकाश [ ५०६ ]
पृष्ठ 519
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्य्याहणन ब्राह्मण का नाम प्रभ्भ है | अन्तरिक्ष प्रकाश का नाम नभः है और द्यलोक के प्रकाश का नाम महः है । ये तीनों ही अम्भस, नाभस, माहस, देवता कहलाते है । सूर्य के प्रकाश का नाम ' मह ' है अतएव महोदेवाय कहा गया है । परमेष्ठिमण्डल का जो सोम है वह इस सूर्य्य में आहुत होता रहता है । अग्नि सत्य है । सोम ऋत | सोम से यही निवेदन किया जाता 1 अपि च हे मनुष्यो! बड़ी दूर तक जिसकी दृष्टि जाती है, अर्थात् जो सारे ब्रह्माण्ड को देख रहा है अथवा जो बहुत दूर पर दिखलाई पड़ता है ऐसे सूर्य्यं के प्रति, जिससे देवता उत्पन्न हुए हैं ऐसे देवजात के प्रति ( श्राहिताग्नाविषु इत्यनेन देव शब्दस्य पूर्वनिपातः ) अथवा देव - समूह के प्रति ( जातः शाब्दः समूह-बाची ) एवं बुद्धि प्रदाता जो दिन के पुत्र सूर्य्यं हैं— उन के प्रति स्तुति करो । हम सब मिल कर उसकी स्तुति करें । यह पशु प्राग्नावैष्णव है । अग्नि और विष्णु के लिए ही पशु दिया जाता है । श्रग्नि आदि है, विष्णु अन्त में है । प्रग्नि- विष्णु को देना ३३ देवताओं को देना है । सूर्य्य में ३३ देवता हैं । इसीलिए -" चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुणस्याग्नेः । प्रा द्यावापृथिवी अंतरिक्षं सूर्य्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च " । ( ऋग्वेद मं ० १।११५ / १ ) यह कहा जाता है । अतएव लाघवात् श्रज को सूर्थ्य के प्रति निवेदित ( प्रर्पित ) किया जाता है । सम्पूर्ण मन्त्र का तात्पर्य्यार्थं बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं - यह यजमान इस मन्त्र से सूर्य के प्रति ही नमस्कार करता है । इस सूर्य्यं को मित्रधेय अर्थात् अपने ऊपर कृपा दृष्टि करने वाला बनाता है--“ नम एवास्माऽएतत्करोति । मित्रधेयमेवैनेनैतत्कुरुते ” ॥२४ ॥
इसके अनन्तर अध्वर्यु – " वरुणस्योत्तम्भन मसि " । यह बोलता हुआ शकट को - आरोहण को - जो कि उत्तम्भन नाम से प्रसिद्ध है - खोल देता 1 शकट के श्रागे दो लकड़ियाँ बँधी रहती हैं । बँधी हुई उन दोनों लकड़ियों को खोल दिया जाता है । इससे गाड़ी जमीन पर न टिक कर उसी समभाव से खड़ी रहती है । इस उत्तम्भी को कस्तम्भनी भी कहते हैं । अब सोम को उतारना है । अतएव बैलों को खोलने के पहले शकट में बँधी हुई दोनों लक-ड़ियों को " वरुणस्योत्तम्भनमसि " - यह बोलता हुआ खोल देता है । उपस्तम्भन से उस शकट का स्तम्भन करता है— नीचे गिरने से बचाता है । यदि दोनों लकड़ियों को जमीन पर बिना टेके ही बैल खोल दिये जाएँगे तो वरुण ( सोम ) जमीन पर खिसक जाएगा । चूँकि इन दोनों के कारण बरुण जमीन पर नहीं गिर पाता अतएव प्राप वरुण के उपस्तम्भन हो – यह कहा जाता है [ ५०६ ]
पृष्ठ 520
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ग्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्य्याणहन ब्राह्मण " उपस्तम्भनेनोपस्तभ्नाति " । सोम वरुण ही है, यह हम बतला आए हैं । अतएव " वरुणस्य " कह दिया गया है ।. इसके बाद बैलों के गले में बँधी हुई चर्म की पट्टी - जिन कीलों के आधार पर जुड़े ( जुए ) में टिकी रहती है, उनको— " वरुणस्य स्कम्भ सर्जनी स्थः " 1 कहता हुआ निकाल लेता है । है कीलो! आप स्कम्भसर्जनी हो । ऐसे आपको मैं निकालता हूँ । इस प्रकार दोनों कीलों को निकाल कर बैलों के जूड़े उतार देता है । असल में " स्कम्भ सर्जनी " सोम की है, न कि वरुण की । फिर वरुणस्य क्यों कहा जाता है? इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि सोम आज बँधा हुआ । बंधन वरुणदेवताक है । अतएव " वरुणस्य स्कम्भ " - इत्यादि कहा गया " वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थ इति । शम्येऽउद्वहति स यदाह वरुणस्य
स्कम्भसर्जनी स्थ इति । वरुण्यो ह्येष एतह भवति यत्सोमः क्रीतः " ॥ २५ ॥
सोम उतार लिया गया - इसके अनन्तर ऋत्विग् लोग, सोमराजा के आसीन होने के लिए नियत सिंहासन को लाते हैं— " अथ चत्वारो राजासन्दीमाददते " । सोम की आसन्दी लाने हेतु चार ऋत्विक क्यों आएँ? इसका कारण बतलाते हैं कि जो मनुष्य राजा है उसके लिए ही जब दो आदमी आते हैं अर्थात् मनुष्याधिपति की आसन्दी को ही दो आदमी उठाते हैं तो सोम तो उन राजाओं का भी राजा है, देवाधिपति है, अखिल विश्व का स्वामी है | अतएव इसकी आसन्दी की प्रतिष्ठार्थ उसे चार ऋत्विक् क्यों न उठाएँ? " द्वौ वाग्रस्मै मानुषाय राज्ञश्राददाते । श्रथैतां चत्वारो योऽस्य सकृत् सर्वस्येष्टे ” ॥२६ ॥
यह आसन्दी प्रदुम्बरी ( गूलर की लकड़ी की ) होती है - " श्रौदुम्बरी भवति । अन्न ही ऊ है । अन्न खाने के बाद जो रौनक या जाती है उसी का नाम ऊ - बल है । जो उदुम्बर का वृक्ष है वह ऊर्मय है अर्थात् संसार में यदि किसी अवधि में अधिक बल है तो वह यही उदुम्बर है । गूलर से अधिक ताकतवर कोई वस्तु नहीं है । बस अन्नाद्य के संग्रह के लिए बल को श्रात्मसात करने के लिए - बलयुक्त सोन में और बलाधान करने के लिए प्रौदुम्बरी ग्रासन्दी होती है— " अन्नं वाऽऊर्स् ' । उदुम्बर ऊर्जः । अन्नाद्यस्यावरुद्धयं । तस्मादौदुम्बरी भवति ॥२७ ॥
[ ५१० ]