Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 61–70
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 61–70
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण दोक्षा ब्राह्मणं जिसे कि " रथन्तरसाम " कहते हैं, वैसे ही इस सूर्य का भी एक सोलर सिष्टम है । इसका जो प्रकाश-मण्डल है उसी का नाम सोलर सिष्टम है । इसो को " बृहत् साम " कहते हैं । इस सोलर सिष्टम ही को संवत्सर कहते हैं । इस संवत्सर मंण्डलाधिष्ठाता सूर्य्य ही से संसार का निर्माण होता है । जैसा कि श्रुति कहती है " नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः ” । चूँकि संवत्सराधिष्ठाता सूर्य्यं ही विश्व का उत्पादक है अतएव वेद में इस संवत्सर को भी " प्रजापति " कहा जाता है । हमें प्रकृत में यही बताना है कि ऊपर जाते हुए पार्थिवाग्नि से एवं ऊपर से नीचे आते हुए संवत्सराग्नि से अर्थात् सावित्राग्नि से पृथिवी - सूर्य्य दोनों के बीच में रहने वाले अन्तरिक्ष्याग्नि का जब परस्पर संघर्ष होता है तो एक तीसरा तापधर्मा अग्नि उत्पन्न हो जाता है । पूर्वोक्त तीनों ही श्रग्नियों में ताप नहीं है । तीनों ताप और श्राकार रहित हैं । परन्तु इन तीनों के मेल से जो एक यह चौथा अग्नि पैदा हुआ है उसमें ताप और रूप दोनों हैं । लौकिक मनुष्य जिसे अग्नि कहते हैं वह यही. चौथा अग्नि है । इसी अग्नि का नाम है " वैश्वानर " जिसे कि भाषा में ' बेसन्दर ' कहते हैं । इसी वैश्वानर के अभिप्राय से वेद भगवान कहते हैं— " अग्निं तं मन्ये यो वसुरस्तं यं यन्ति धेनवः । अस्तमर्वन्त शवोऽस्तं नित्यासो वाजिन इषं स्तोतृभ्य आभर " ॥ ( ऋ ० ५।६।१ ) मैं न ( वैश्वानराग्नि ) उसे मानता हूँ जिसमें से कि सूर्यास्त होने पर चारों ओर किरणें निकलती हैं । ' विश्व ' लोक को कहते हैं । पृथिवी, अन्तरिक्ष एवं द्यौ यह तीन लोक हैं अतएव विश्व भी तीन ही कहलाते हैं । इन विश्वों के अग्नि, वायु और आदित्य यह तीन अधिष्ठाता हैं । अधिष्ठाता ही को वेद " नर " शब्द से व्यवहृत करते हैं । चूँ कि इन तीनों विश्वों के तीनों नरों के मेल से यह चौथा वैश्वानराग्नि उत्पन्न होता है अतएव " विश्वेभ्योनरेभ्योजातः ” इस व्युत्पत्ति से इसे " वैश्वानराग्नि " कहते हैं । वैश्वानर में ' वैश्वा ' पद दिया है । यह वैश्वा पद " विश्वानि ” इन तीनों लोकों के संकेत के लिए समझना चाहिए । हमने बतलाया है कि पृथिवी के केन्द्र में अग्नि रहता है । अग्नि का स्वभाव विशकलन करने का है । लकड़ी में अग्नि इस समय सो रहा है - आप जरा अन्याग्नि से उसे जगा दीजिए, बस जगने के साथ ही — जो लकड़ी ठोस थी वह विशकलित हो जायगी — खिल जाएगी । कहने का तात्पर्य यही है कि अग्नि विशकलनधर्म्मा है । बस अग्नि के इस विशकलन को रोकने के लिए— पृथिवी के चारों ओर ४८ तक एक भूवायु का स्तर विद्यमान है । प्रतिक्षरण विशकलित होने वाले इस पार्थिव अग्नि का उस भूवायु ने स्तम्भन कर रखा । चारों ओर से उस अग्नि की विशकलन शक्ति को इस भूवायु ने रोक रक्खा है । यदि इसे रोकने वाला इसके चारों ओर यह भूवायु स्तर न होता तो -विशकलन धर्म्मा ग्रग्निः - पृथिवी के खण्ड - खण्ड कर डालता । इसी वायु का नाम " एमूष वराह " है । यह वायु इस पृथिवी को संवरण करके चारों ओर इस पर व्याप्त हो कर इस पर आक्रान्त हो रहा है अतेएव इसे “ एमूष वराह " कहते हैं । " वृण ते इति वरः, श्रह्नोतीति श्रहः वरन्चासौ ग्रहश्चेति वराहः । [ ४३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मणं श्रा ( श्रासमन्तात् - इमं ( पृथिवीम् ) वसति - इति एषः । एक साथ चारों ओर से संवरण कर रक्खा है । इसी बात को बतलाने के लिए इसका नाम " एमूष वराह " रखा गया है । यदि एक साथ चारों ओर से संवरण न करता एवं एक- देश में ही करता तो दूसरी ओर का अग्नि स्वतन्त्र हो पृथिवी को टुकड़े - टुकड़े कर देता । बस यही " एमूष वराह भगवान् " इस पृथिवी को अपने दाँत पर उठाए हुए हैं । यदि यह न होते तो पृथिवी का कहीं पता भी नहीं रहता । बस यही वराह भगवान् का अवतार है जो हर घड़ी - हर मिनिट, हर सेकिण्ड, हर पल, हर प्रतिविपल हो रहा है । सूर्य्य की जो प्रती हुई रश्मिएँ हैं उनका नाम " सावित्री " है एवं प्रतिफलित तेज का नाम गायत्री है । आतप - प्रकाश का नाम सावित्री है - छाया - प्रकाश का नाम गायत्री है । हमने बतलाया है कि पृथिवी के ऊपर चारों ओर ४२ कोस तक भूवायु स्तर रहता है । प्रातःकाल क्षितिज से २००० ( दो हजार ) कोस नीचे रहने वाला भी सूर्य्य हमें क्षितिज पर दिखलाई पड़ता है - वह इसी भूवायु की महिमा है । भूवायु पानी की तरह तरल है । इस तरल भूवायु पर सीधी ऊपर की ओर जाती हुई सूर्य्य रश्मिएँ प्रतिफलित हो जाती हैं । पानी में पड़ी हुई सरला सीधी भी लकड़ी जैसे टेढी प्रतीत होने लगती है वरना वास्तव में वह टेढी नहीं है - ठीक इसी प्रकार से पानी के सदृश तरल इस भूवायु पर सीधी जाती हुई वे सूर्य्य रश्मिएँ फिसल पड़ती हैं— एवं उसी स्थान की सीध में हमें सूर्य्य दिखलाई देने लगता है । वास्तव में यह सूर्य्य लम्बितयष्टिवत् मिथ्या है | सच्चा सूर्य्य अभी ( प्रातः ) क्षितिज से दो हजार कोस नीचे है । सूर्य्य से हमारा आत्मा बनता है एवं प्रातःकाल का सूर्य्य मिथ्या है— प्रत: इसे देखने से हमारे आत्मा पर बुरा असर पड़ेगा, इसीलिए भगवान् मनु उपदेश करते हैं— " नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं नास्तं यान्तं
कदाचन ।
नोपसृष्टं न वारिस्थं न मध्य नभसोगतम् " ॥
प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि इस भूवायु पर लम्बित हो कर जो छायामय सौर - प्रकाश आता है उसे ही “ गायत्री " कहते हैं । गौ पृथिवी को कहते हैं । इसके पेट में हो कर यह प्रकाश निकलता है अतएव इसे गायत्री कहते हैं । इसी वैज्ञानिक रहस्य को समझाने के लिए भगवान् व्यास ने निम्न कथा बना दी है— ब्रह्मा के एक स्त्री थी । उसका नाम गायत्री था । ब्रह्मा यज्ञ करना चाहते थे । यज्ञ बिना पत्नी के हो नहीं सकता था एवं सावित्री नाराज होकर चली गई थी अतः उन्होंने एक ग्वाले की छोरी को गाय के मुँह में डाल कर उसे पूँछ के रास्ते से निकाल उसका नाम गायत्री रख कर उसके साथ यज्ञ किया । सूर्य्यं प्रजापति ही ब्रह्मा हैं, उनका सीधा सत्यरूप से जाने वाला तेज ही सावित्री है । जो जाती हुई किरणें हैं उन्हीं का नाम सावित्री है । वह जाने वाली हैं इसीलिए " सावित्री रूस कर चली गई " कहा जाता है । बस मायके अर्थात् पृथिवी के भूवायु में प्रतिफलित हो पृथिवी के पेट में से निकलने वाला जो प्रकाश है— उससे ही प्राणियों की सत्ता रखने वाला यज्ञ सूर्य्य प्रतिदिन करते रहते हैं । बस भू - वायु में प्रविष्ट इस सावित्र्याग्नि के और भू - वायु अन्तर्गत पार्थिवाग्नि के मेल से एक विजातीयं वस्तु बन जाती है । गायत्री और पार्थिवाग्नि की जो मिश्रित अवस्था है उसे ही " उषा " कहते [ ४४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण हैं । बस उषा में जब उस वैश्वानराग्नि का सम्बन्ध होता है तो उससे " कुमाराग्नि " पैदा होता है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-तद्यदसृज्यत अक्षरत् । तद्यदक्षरत् तस्मादक्षरम् । यदष्टौ कृत्वा प्रक्षरत् संवाष्टाक्षरा गायत्र्यभवत् । प्रभूद्वा इयं प्रतिष्ठेति । तद्भूमिरभवत् । ताम-प्रथयत् सा पृथिव्यभवत् । तस्यामस्यां प्रतिष्ठायां भूतानि च भूतानां च पतिः संवत्सराया दीक्षन्त । भूतानांपति गृहपतिरासीत् उषाः पत्नी ॥ तद्यानितानि भूतानि ऋतवस्ते । अथ यः स भूतानांपतिः संवत्सरः सः । अथ या सोषा पत्नी श्रौषसी सा । तानि इमानि भूतानि च भूतानां च पतिः संवत्सरे उषसि रेतो -ऽसिञ्चत् । स संवत्सरे कुमारोऽजायत " – ( श ० ६।१।३।६ ) इस कुमार - अग्नि के आठ भेद हो जाते हैं । यह आठ स्वरूपों में परिणत हो जाता है उन आठों के नाम यह हैं – १ रुद्र २ सर्व, ३ पशुपति ४ उग्र ५ अशनि ६ भव ७ महादेव ८ ईशान । इन्हीं को इन निम्नलिखित नामों से भी व्यवहृत किया जाता है - १ अग्निः २ प ३ औषधि ४ वायु ५ विद्य ुत् ६ पर्जन्य, ७ चन्द्रमा ८ आदित्य । जैसा कि श्रुति कहती है-१ १ २ २ ३ ३ ४ ४ " अग्निवै रुद्रः । आपो वै सर्वः । श्रोषधयो वै पशुपतिः । वायुर्वा उग्रः । ५ ५ ६ ६ ७ द ८ विद्युद्वा शनिः । पर्जन्यो वं भवः । प्रजापतिर्वै चन्द्रमा - प्रजापतिर्वै महादेवः । ८ श्रादित्यो वा ईशानः । उस कुमाराग्नि के ८ प्रकार से दर्शन होते हैं । वह ८ विभागों में विभक्त हो जाता है । यह आठों अग्नि ही के रूप हैं । स्वरूप से स्वतन्त्र रहता हुआ आठ अवस्था - भेद मात्र से ८ नाम हो गए हैं — वास्तव में आठों अग्नि हैं - एवं कुमार 8 वाँ अग्नि है चूँकि यह ( अग्नि ) - कुमार आठ स्वरूपों में परिणत हो जाता है - इसीलिए अग्नि को गायत्री कहते हैं एवं चूँकि कुमार सहित अग्नि 2 भागों में विभक्त रहता है अतएव इस अग्नि को त्रिवृत् कहते हैं जैसा कि श्रुति कहती है-— " तस्येतान्यष्टावाग्नि रूपाणि कुमारो नवमः । सैवाग्नेस्त्रिवृता । यद्वेवा-ष्टावग्निरूपाणि - अष्टाक्षरा गायत्री - तस्मादाहुः - गायत्रोऽग्नि इति " -इन पूर्वोक्त आठों प्रग्नियों को ही " चित्राग्नि " कहते हैं— [ ४५ ] ( श ० ६।१।३।१८ )
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अ ० १ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण १ रुद्रः अग्निः || " अग्निवें रुद्रः " ( पृथिवी ) २ सर्वः आपः || " आपोवै सर्वः " ( जल ) ३ पशुपतिः प्रोषधयः “ प्रोषधयोवै पशुपतिः " ( औषधि:) ४ उग्रः वायुः 11 " वायुर्वा उग्रः ' ( वायु ) ५ अशनि विद्यत् || " विद्य ुद्वा अशनिः " ( विद्य ुत् ) ६ भवः पर्जन्यः 11 " पर्जन्यो वै भवः " ( आत्मा ) ७ महादेवः चन्द्रमाः || " प्रजापतिर्वे चन्द्रमाः " ( प्रज्ञान ) ८ ईशानः श्रादित्यः 11 " आदित्योर्वा ईशानः " ( विज्ञान ) चित्राग्निः यह आठों चित्राग्नि हैं इसीलिए श्रुति कहती है— " चित्रमात्मानं करोति - चित्रोऽसीति । सर्वारिण हि " चित्र्याण्यग्निः " । तदनन्तर इसी चित्राग्नि से पशु - अग्नि उत्पन्न होती है । अर्थात् इन पृथिवी, जल, वायु, चन्द्रमा, आदित्य, पर्जन्य, विद्य ुत् एवं औषधियों से ही पुरुष, अश्व, गो, अधि और अज – यह पाँच पशु उत्पन्न होते हैं । पशु से तात्पर्य्य अग्नि है । इन आठों के मेल से एक अग्नि उत्पन्न होता है जो कि पशु नाम से प्रसिद्ध है । वास्तव में हमारे और गौ आदि के शरीर में पृथिवी, जलादि यह आठ ही तो पदार्थ हैं । इनके अवयव सन्निवेश में एवं मात्रा में तारतम्य रहता है अतएव हमारे में और गाय वगैरहों में फरक हो जाता है । हमारे में विज्ञान है त्वचा नहीं, उनमें त्वचा है विज्ञान नहीं । जो 5 में आदित्य है उसके रस से हमारा विज्ञानात्मा बनता है, चन्द्रमा के रस से प्रज्ञानात्मा बनता है एवं पर्जन्य उस आत्मा का नाम है जो कि अखण्ड है, निर्धर्षक है । इन आठों अग्नियों को ' संवर्ग्य ' अग्नि भी कहते हैं । कहना हमें यही है कि इस चित्राग्नि से पशु - अग्नि उत्पन्न होती है परन्तु इसमें प्रजापति की इच्छा से मात्रा में तारतम्य हो जाता है । प्रजापति इस भुवन के केन्द्र में बैठा है " बृहद्धतस्थौ भुवनेश्वन्तः " उसी की इच्छा से सारे विश्व का निर्माण होता है । हम संसार में पुरुष अश्वादि में सर्वथा वैचित्र्य देखते हैं एवं नरा - नरा भावों का परिवर्तन देखते हैं । यह परिवर्तन - क्रिया, बिना प्रारण व्यापार के नहीं हो सकती, एवं प्रारण व्यापार इच्छा के बिना नहीं हो सकता । इच्छा होती है जब तप होता है, अर्थात् प्राणव्यापार होता है तभी श्रम अर्थात् क्रिया ( भूत - व्यापार ) होती है । चूंकि पुरुषादि की निर्माण क्रिया हम देखते हैं अतएव मानना पड़ता है कि इस क्रिया का प्रेरक [ ४६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण कोई इच्छा करने वाला अवश्य ही है । बस उसी को प्रकृत में देवता कहा है । वह प्रजापति एक स्वरूप होता हुआ भी प्रतिबिम्बवत् यच्चयावत् पदार्थों के केन्द्र में बैठा रहता है । इसे ही सप्तपुरुष पुरुषप्रजापति कहते हैं जिसका कि छठे काण्ड के प्रारम्भ में विस्तृत विवेचन किया गया है । वह पुरुष प्रजापति चूंकि आग्नेय है— एवं अग्नि ही को कहते हैं देवता — श्रतएव प्रकृत में प्रजापति का नाम लेकर " ते देवा श्रब्रुवन् " यह कह दिया गया है । वस्तुतः " देवा " से अभिप्राय है " आग्नेय प्रजापति ” का । इस प्रजापति ने मनुष्य- पशु में बुद्धि ' प्रधान ' कर दी है अतएव यह स्वयं उद्योग कर वस्त्र पहन सकता है परन्तु गौ - पशु में बुद्धि नहीं है अतएव उसमें उसने त्वचा का निर्माण कर दिया है । " पाँचों पशु हैं " । इसमें लोगों को प्रश्न हो सकता है कि जब पाँचों में पशु - अग्नि है तो फिर निर्माण में इतना वैषम्य क्यों? बस इसी प्रश्न को हल करने के लिए भगवान याज्ञवल्क्य को यह सृष्टि - विज्ञान बतलाना पड़ा । उन्होंने बतलाया कि पुरुष - पशु में त्वक् नहीं है एवं गौ में है । इसका कारण यही समझो कि प्रजापति भगवान ने पुरुष - पशु में से उस च - निर्माण करने वाले अग्नि की मात्रा निकाल ली एवं उसमें बुद्धि की मात्रा अधिक रख दी एवं गायों में से बुद्धि की मात्रा निकाल ली एवं चर्म की मात्रा रख दी । अग्नि ही से पाँचों पशु बनते हैं इसीलिए " त एते सर्वे पशवो यदग्निः " यह कहा जाता है ( ० ६।२।१।१२ ) । बस इसी प्राकृतिक विज्ञान को लक्ष्य में रख कर ही - " था ह वा गोस्त्वक् — पुरुषे हैवाग्रास ते देवा अब्रुवन् " इत्यादि कहा कहा गया है । अन्त में भगवान याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वास्तव में पुरुष प्रवच्छित है अर्थात् वाकई गौ सदृश इसमें त्वचा नहीं है । होती भी कैसे? जब कि प्रजापति ने इसमें से अग्नि के उस हिस्से को ही निकाल लिया जो कि त्वचा बनाता है— " विच्छतो हि वै पुरुषः ” । इसके त्वचा नहीं है इसीलिए इसके शरीर में जहाँ कही पानी की फाँस ( मूंज की फाँस ) अथवा चक्कू वगैरह लग जाते हैं, उसी स्थान से लोही ( रुधिर ) निकलने लगता है । जरा सी फाँस लगते ही इसके खून निकल आता है । परन्तु यह बात पशुओं में नहीं है । पशुओं का चमड़ा बहुत मोटा होता है । उनके चाहे काँटे वगैरह लग जाओ – उनके एकाएक खून नहीं निकलता । अपि च वधिक लोग जब बकरे किंवा भेड़ के ऊपर के चम्मं को तराश कर जब उतार लेते हैं तो उसके भीतर लाल सुर्ख पतली सी झिल्ली दिखाई पड़ती है । बस वही हमारे शरीर में है । उसे काटने पर पशुओं के खून निकलता है परन्तु हमारे ऊपर की को काटते ही रुधिर निकलने लगता है । [ ४७
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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण पशुओं के त्वचा होने का और हमारे न होने का इससे ज्यादा और क्या प्रमाण हो सकता है - इसी अभिप्राय से कहते हैं-विच्छतो वै पुरुषः । तस्मादस्य यत्रैव क्व च कुशो वा यद्वा ( अन्यत् ) विकृन्तति तत एव लोहितमुत्पतति " । पूर्वोक्त प्रपञ्च से बतलाना हमें यही है कि पुरुष - पशु की त्वचा उतार ली गई है और इनमें विज्ञान देकर प्रजापति ने इन्हें आज्ञा दे दी है कि तुम अपने सर्वत्व के लिए वस्त्र पहिनो । वस्त्र ही तुम्हारी त्वचा है । जब तक तुम वस्त्र न पहिनोगे तब तक तुम अधूरे हो । तुम्हारा सर्वत्व वस्त्रों के अधीन है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— चूंकि देवताओं ने ( प्रजापति ने ) इनकी त्वचा को गौनों के सुपुर्द कर दिया अतः इनके निस्त्वक्त्व के परिहार के लिए इनके सर्वत्व के लिए इनके शरीर में इस वास स्वरूप त्वचा को रखा । " तस्मिन्नेतां त्वचमदधुः " भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि - चूंकि पुरुषों के लिए ही देवताओं ने वस्त्र की व्यवस्था की है— प्रतएव पृथिवी मण्डल भर में, सिवाय पुरुष के और कोई भी वस्त्र नहीं पहनता है । पहिने कसे - जबकि इन्हीं में त्वचा की व्यवस्था की है— " तस्मान्नान्यः पुरुषाद्वासो बिभत । एतां हि श्रस्मिन् त्वचमदधुः । " तात्पर्य कहने का यही है कि पुरुषों में गौ सदृश त्वचा नहीं है, इससे समझना चाहिए कि भगवान् प्रजापति की मनुष्यों की त्वक्स्थानापन्न वस्त्र पहिनने की ही आज्ञा हुई है । जब तक वस्त्र नहीं पहिने जाते हैं तब तक मनुष्य अधूरे रहते हैं अतः मनी तरक्की चाहने वाला समृद्धि चाहने वाला - अपने अधूरे भाव को पसन्द न करने वाला मनुष्य सदा सर्वदा सुवासा रहने ही की इच्छा रखे । सदा दिव्य वस्त्र पहिने रहे -" तस्मादु सुवासा एव बुभूषेत्- ( भवितुमिच्छेत् ) " " स्वया त्वचा समृध्यै " - इत्यतः । -वस्त्र मनुष्य की त्वचा है - यह मनुष्य को समृद्ध करने वाले हैं, अतएव जो महाघृणित नीच मनुष्य होता है – यदि वह भी सुन्दर, दिव्य, स्वच्छ वस्त्र पहिन लेता है तो उसकी तरफ सबकी नजर पड़ने लगती है । वस्त्र पहनने मात्र से उसकी तरफ होने वाले घृणा के भाव उठ जाते हैं । हट कैसे नहीं जाय - जबकि वह अपनी त्वचा से समृद्ध हो रहा है । अर्थात् घृणित भाव हटने का एकमात्र कारण वस्त्र ही हैं, इसीलिए कहते हैं- " तस्मादप्यश्लीलं सुवाससं दिदृक्षन्ते । स्वया हि त्वचा समृद्धो भवति । " अतः दिदृक्षन्ते इति भावः । इससे कहना यही है कि यजमान को भी सर्वत्व के लिए, समृद्धि के लिए - देवताओं की नजर मेरे ऊपर पड़े, इसलिए वस्त्र पहिनना चाहिए । बस इसीलिए - - " सः वासः परिधते सर्वत्वाय " यह कहा गया ॥ १६ ॥
सृष्टि निर्माण में प्रजापति ने किंवा देवताओं ने पुरुष पशु का हिस्सा गौनों को दे डाला था जो कि आज तक उन्हीं में चला आता है । गायों की अन्तरात्मा इस प्राकृतिक रहस्य से परिचित है कि [ ४८ ]
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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण मनुष्यों की त्वचा हमें मिलती है अतः गायों के पास बिना वस्त्र पहिने - नग्न हो कर - कभी नहीं जाना चाहिए- - " नो हान्ते गोर्नग्नः स्यात् " । क्योंकि गाय इस रहस्य को जानती है कि मैं इसी पुरुष की त्वचा को धारण किए हुए हूँ । अतएव वह डरती हुई कांपती है, त्रास खाती है कि अब यह अवश्य ही मेरी त्वचा को ले लेगा । त्रास और भय एक वस्तु नहीं है भिन्न - भिन्न वस्तु हैं - प्रतएव " बिभ्यति - त्रसति " कहा है । अज्ञात प्रकृतिक पुरुष से जो डर लगता है वह " भय " कहलाता है एवं ज्ञात - कृतिक पुरुष से जो डर लगता है वह " त्रास " कहलाता है— " अज्ञात प्रकृतिकादनिष्ट संभावना भयम् ज्ञात द्रोहादनिष्ट संभावना - त्रासः । " याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इसीलिए गाएँ सुवासस मनुष्य का आश्रय लेती हैं । अर्थात् जो कपड़े पहिन कर उनके पास जाता है उसे प्यार की नजर से देखती हैं । इससे वास्तव में प्रतीत होता है
कि चर्म्म उनकी वस्तु नहीं है अपितु पुरुषों की है ।
" तस्मादु गावः सुवाससमुपैव निश्रयन्ते " ॥ १७ ॥
" जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एव देवताभ्यः " यह सिद्धान्त इस प्रकरण के प्रारम्भ बना है, यह बात सिद्ध हो जाती है । में ही हम बतला आए हैं । इससे वस्त्र भी उन्हीं देवताओं से सिद्ध ही नहीं हो जाती, वास्तव में बात सच है । रूई को पैदा करने वाले देवता हैं । पार्थिवाग्नि ही रूई उत्पन्न करती है, उसी का वस्त्र बनता है, फिर क्यों न हम वस्त्र को देवता का बनाया हुआ एवं देवतायुक्त कह सकते हैं । अवश्य ही कह सकते हैं । हमने बताया है कि अवस्था विशेष से एक ही अग्नि के अग्नि, नक्षत्र, वायु, पितर, विश्वेदेव इत्यादि नाम हो जाते हैं, जैसा कि " देवता निरूपण " नाम के मन्त्र में बतलाया गया है । तो बस इस वस्त्र में भी स्थान भेद से नाना देवता का भाव उत्पन्न हो जाता है, इसी अभिप्राय से कहते हैं ---अग्निदेवताक है । अग्नि देवता से प्रताप - अनुच्छाद कहा गया है— अर्थात् नीवी का जो बन्धन है वह इस वस्त्र को जो पर्यास ( वस्त्र के अन्त को झालर ) पर्य्यास बनता है, एवं जो वस्त्र है जिससे छादन क्रिया होती है वायु देवताक है, एवं धोती की किनार पितृदेवताक है । पितृ - बन्धन है । सर्प या ग्रन्थि - बन्धन वरुण प्राण का स्वरूप है । बिलकुल खुला देवता का भाव है, एवं मध्य भाव पितरों का है एवं उस वस्त्र में बीच - बीच में जो एक लम्बा तागा श्रा जाता है जो कि की से स्वतन्त्र ही दीखता है, वही सर्पों का है । उसमें सर्प - प्राण हैं । एवं जो ताने - बाने वस्त्र बुनगट हैं वे विश्वेदेवताओं के हैं, एवं जो ताने - बानों के छिद्र हैं वे नक्षत्रों के हैं । बात वास्तव में ठीक है, रोमावली के निर्माता छिद्रों के अधिष्ठाता नक्षत्र ही हैं जैसा कि श्रुति कहती है-[ ४ ९ ]
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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण " एभ्योलोम गर्त्तेभ्यो ऊर्ध्वानि ज्योतींष्यायन् तद्यानि तानि ज्योतींषि एतानि तानि नक्षत्राणि । यावन्त्येतानि नक्षत्राणि तावन्तो लोमगर्त्ताः । यावन्तो लोमगर्त्तास्तावन्तः सहस्र संवत्सरस्य मुहूर्ता: " ( श ० १० । ४ । ४।२ ) कहने का तात्पर्य यही है कि छिद्रों के देवता नक्षत्र ही हैं । इस प्रकार से इतने देवता इस वस्त्र की पकड़ में हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " तस्य वा एतस्य वाससः श्रग्नेः पर्यासो भवति । वायोरनुच्छादः । नीविः पितृणाम् । सर्पाणां प्रघातः । विश्वेषां देवानां तन्तवः । रोका नक्षत्राणाम् । एवं हि वा एतत् सर्वे देवा अथायत्ताः ” । एक प्रश्न उठता था कि यह यजमान देवता बनने वाला है अतः सामान्य मनुष्यों के काम में आने वाले वस्त्र यह पहिन सकता है या नहीं । बस इसी के लिए " तस्य वा ० " इत्यादि कहना पड़ा है । वस्त्र भी दैवत ही है अतः दीक्षित यजमान भी अवश्य पहिन सकता है । चूंकि इसमें सारे देवता हैं अतएव यह दीक्षित - वसन हो जाता है अर्थात् दीक्षित अवश्य ही वस्त्र पहिन सकता है— " तस्माद्दीक्षितवसनं भवति " - इति ॥ १८ ॥
वह वस्त्र एकदम नया होना चाहिए । किसी का पहिना हुआ नहीं होना चाहिए— तद्वाऽहतं स्यात् ' । वह वस्त्र मजबूती के लिए और मेध्यता के लिए एकदम नया होना चाहिए - " तद्वाऽनहतं स्यादयातयामतायें " । जिस समय वस्त्र आ जाय उस समय किसी नौकर से उस वस्त्र को कूट कर साफ करने के लिए कह दें । निर्माण के समय, जो कि इसमें माँडी लगाते हैं एवं बुनते हैं, उस समय की जो अमेध्यता है, वह हट जाय एवं पवित्र और स्वच्छ हो जाय, इसीलिए धुलवाने के लिए कह दे अर्थात् माँडी - वाँडी निकालने से यह साफ हो जाता है अतः उसे कुटवा कर साफ करवाना ही चाहिए— " तद्वै निष्पेष्ट्वै ब्रूयात् । यदेवास्यात्रा मेध्या ( नीच मनुष्याः शूद्रादयः ) कृणत्ति वा वयति वा तदस्यमेध्यमसदिति " । यदि माँडी आदि प्रत्यक्ष दोष न हो तो भी ' पवित्र हो जाय ' इसलिए पानी से तो धुलवा ही डालना चाहिए -[ ५० ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण " ग्रहतं स्यात् प्रद्भिरभ्युक्षेत् मेध्यमसदत् - इत्यतः ” । अथवा प्रतिदिन स्नान करने के अनन्तर ( अपल्यूनकृत ) क्षार वगैरह — साबुन वगैरह से नहीं धोया गया अर्थात् अपवित्र पदार्थों से नहीं धोया हुआ वही जो वस्त्र होता है उससे भी दीक्षा ले सकता है— " अथो यदिदं स्नातवस्यं निहितं दीक्षेत् " ॥ १ ९ ॥ अपल्यूलनकृतं भवति — तेनो हापि वस्त्र क्यों पहनना चाहिए — कैसा पह्निना चाहिए यह बतला कर अब पद्धति बतलाते हैं-वह यजमान निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ वस्त्र पहिनता है – “ दीक्षातपसोस्तनू रसि ” हे वस्त्र! तुम दीक्षा और तप के शरीर हो । इसके पहिले यह वस्त्र अदीक्षित का शरीर था अर्थात् दीक्षा के पहिले यह मामूली मनुष्य की त्वचा थी परन्तु यहाँ अब वही दीक्षातप वाले यजमान की त्वचा बन रही है । इसी अभिप्राय से " दीक्षातपसोस्तनुः " कहा गया है । फिर मन्त्र का शेष भाग बोलता है— " तां त्वा शिवां शग्मां परिदधे " कल्याणी और साध्वी अर्थात् सुन्दर ऐसी तुझ तक ( वस्त्र ) को मैं धारण करता हूँ । फिर मन्त्र शेष बोलता है " भद्र ं वरणं पुष्यन् " - भद्रवर्ण को पुष्ट करते हुए तुझको मैं धारण करता हूँ । दीक्षा के पहले यह वस्त्र पापभावयुक्त मनुष्य वर्ण ( शरीर ) की पुष्टि करता है । परन्तु अब तो दीक्षित की करता है । अर्थात् आज यह वस्त्र एक दीक्षित पहिन रहा है । दीक्षित जैसा महापुरुष वस्त्र को अपना रहा है । इसी बात को दिखलाने के लिए —
" भद्रं वर्णं पुष्यन् " इति । यह कहा है ॥ २० ॥
बस इस प्रकार से जब क्षौर करा के स्नान करा के यह यजमान वस्त्र धारण कर लेता है तो तदनन्तर इसे उस शाला में प्रविष्ट करवाते हैं— " अथैनं शालां प्रपादयति " इसके अनन्तर यह यजमान गाय का दूध और बैल से खेती किया हुआ अन्न न खाय— “ स धेन्वं च अनडुहश्व नाश्नीयात् " । [ ५१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण इसका कारण बतलाते हैं । धेनु और बैल ही सारे जगत का पालन करते हैं । यह देख कर देवताओं ने ( प्रजापति ने ) कहा कि गाय और बैल ही प्राणिमात्र का पालन करते हैं अतः अन्य वयों ( पक्षि ) के अन्न का जो वीर्य्यं है उसे इन दोनों में रख दें । बस यह विचार कर देवताओं ने जो क्यों का एवं अन्यान्य पशुओं की अर्थात् प्राणिमात्र का जो रस था उसे इनमें रख दिया । इसीलिए गाय और बैल सदा चरते ही रहते हैं । चरें कैसे नहीं? जब कि सबका आत्मा – सबकी बुमुक्षा इनमें बैठी हुई है । तो बस जो घेनु और अनुडुह सम्बन्धी खाता है वह एक प्रकार से सर्वभक्षी बनता है जो कि दीक्षित के लिए बुरा है । उसके सन्तान खराब होती है एवं पाप करता है एवं उसकी दुनियाँ में बदनामी होती है इसलिए दूध और कर्षण - साध्य प्रन्न नहीं खाना चाहिए परन्तु याज्ञवल्क्य कहते हैं जबकि इसका दूध और अन्न शरीर पुष्ट करता है तो अवश्य ही खाना चाहिए । पूर्वोक्त अर्थ सायण मतानुसार समझना चाहिए । वास्तव में मांस ही प्रदत्त अर्थ से अभिप्रेत है । उपक्रमोपसंहार से माँस हो का प्रकरण सिद्ध होता है । यदि गाय के दूध से एवं बैल की खेती से उत्पन्न अन्न में अधोगति होना, संतान का खराब होना- पापी होना - अपयश होना - सर्व भक्षी होना इत्यादि दोष होते तो फिर तो सारा संसार ही पातकी होता क्यों कि सभी का इन्हीं दोनों से पालन होता है अतः सायरण मत अशुद्ध है । इति दीक्षा ब्राह्मणं - संस्कार ब्राह्मणं समाप्तम् इति तृतीय काण्डे प्रथमाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् समाप्तम् [ ५२ ]