Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 531–540
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 531–540
पृष्ठ 531
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण प्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण बीच में जो दो कुशाएँ उत्तराग्रमुख करके रखी जाती हैं वे ही ' विधृति ' कहलाती हैं । प्रकृति-याग में ये विधृतियाँ कुशा की होती हैं । किन्तु इस प्रातिथ्येष्टिरूप विकृतियाग में इक्षुदण्ड ( साँठे ) की होती हैं, क्यों कि कुशा की विधृति बनाने पर आश्ववालनिर्मित प्रस्तर तथा कुशा-निर्मित विधृति दोनों सूक्ष्म होने से मिल कर एकरूपा हो जाएँगी और प्रस्तर उठाने के समय विधृति भी साथ उठ जाएगी, तो यज्ञ नष्ट हो जाएगा । अतः प्रस्तर और विधृतियाँ लिमिल न हो जाएँ इसलिए विधृतियाँ स्थूल इक्षुदण्ड की बनानी चाहिए । तदनन्तर आज्य का उत्पवन प्रकृतियाग की तरह करना चाहिए । किन्तु प्रकृतियज्ञ में जुहू और ध्रुवा दोनों में आज्यस्थाली से चार बार घृत लिया जाता है और उपभृत् में आठ बार लिया जाता है | अनुयाजयाग के लिए चार बार अधिक घृत लिया जाता है । आतिथ्येष्टिरूप विकृति-याग में जुहू, उपभृत् तथा ध्रुवा तीनों में चार बार ही आज्यस्थाली से घृत लिया जाता है क्यों कि आतिथ्येष्टि में अनुयाज - कर्म्म नहीं होता । वह यज्ञ की समाप्ति पर ही होता है । तिथ्येष्टि पर सोमयाग की समाप्ति नहीं होती है । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि " सर्वाण्येव चतुर्ग होतान्याज्यानि गृह्णाति न ह्यत्रानुयाजा भवन्ति " इति ॥ १८ ॥
इसके पश्चात् अष्टकपाल हवि को प्रस्तर पर रख कर यथावत् सामग्री का संभरण कर, अध्वर्यु अग्निमन्थन करता है । यह प्राकृतिक नियम है कि परमात्मा प्रजा उत्पन्न करने से पूर्व माता के स्तनों में उत्पत्स्यमान ( उत्पन्न होने वाली ) प्रजा के पालनार्थ दुग्ध उत्पन्न करता है, पश्चात् प्रजा उत्पन्न करता है । प्रकृति से भी अग्निस्वरूप प्रजा को उत्पन्न करता पहले प्रजा के पालनार्थ अष्टकपाल हवि को प्रस्तर पर रखता है, पश्चात् अग्नि-रूप प्रजा को उत्पन्न करता है । अग्निमन्थन से पूर्व हवि को प्रस्तर पर रखने का यही अभि-प्राय है । आतिथ्येष्टि यज्ञ का मस्तक है और यज्ञ अग्निस्वरूप है, क्योंकि अग्नि और सोम में अग्नि का प्राधान्य है । अतः मन्थन द्वारा अग्नि को उत्पन्न करना ही यज्ञ को उत्पन्न करना है । अतः प्रथम यज्ञस्वरूप अग्नि का मन्थन होता है तदनन्तर यजमस्तकरूप आतिथ्येष्टि होती है । प्राकृतिक प्रजनन में पहले शिशु का मस्तक ही बनता है, तदनन्तर अन्य अवयव । इसी प्रकार इस वैधयज्ञ द्वारा उत्पन्न होने वाले दिव्यात्मा का मस्तक ही प्रथम बनता है और वह अग्नि से बनता है । अतः प्रातिथ्येष्टि में सर्वप्रथम अग्निमन्थन किया जाता है । अपि च अग्नि ही सर्वदेवतास्वरूप है । घन, तरल, विरल अवस्थाओं में परिणत अग्नि में ही ३३ आग्नेय देवता हैं । अतः सभी देवताओं के लिए अग्नि में ही आहुति दी जाती है । फलतः अग्नि को मन्थन द्वारा उत्पन्न करना सब देवताओं को उत्पन्न करना है ॥१६ ॥
इसके बाद अध्वर्यु काष्ठवल्कल ( काष्ठ के छोड़ों ) को अग्नि - मन्थन करते समय नीचे रखता है । यूपनिर्माण करते समय जो काष्ठवल्कल उतरते हैं उन्हें अधिमन्थन शकल कह. [ ५२१ ]
पृष्ठ 532
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण आतिथ्येष्टि ब्राह्मण जाता है । ये अग्नि को जल्दी पकड़ते हैं । वह अध्वर्यु ' अग्नेर्जनित्रमसि ' अर्थात् हे अधिमन्थन शकल! आप अग्नि को उत्पन्न करने वाले हैं - यह कहता हुआ नीचे रखे हुए अधिमन्थनशकल को हाथ में उठा लेता है ॥ २० ॥
' वृषणौ स्थः ' - हे दर्भो! तुम अभिमत फल की वर्षा करने वाले हो । इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ अध्वर्यु दो कोमल दर्भों को नीचे जमीन पर रख देता है । ये दर्भ निदानेन स्त्री से उत्पन्न होने वाले युगलपुत्र हैं । पैदा होने के समय पुत्र कोमल होता है । अतः पुत्रस्थानीय ये दर्भ भी तरुण कोमल रखे जाते हैं ॥२१ ॥
चन्द्र वंश के प्रतिष्ठापक चन्द्रमा के पौत्र तथा बुध के पुत्र महाराजा पुरूरवा ईरान में प्रतिष्ठानपुर में रहते थे । पुरूरवा ने उर्वशी अप्सरा से गन्धर्व विवाह कर पुत्र आयु को उत्पन्न किया था । उत्तरकुरु क्षेत्र में यज्ञ करने वाले सोम देवता भारतवासी मनुष्यों से यज्ञविद्या को प्रच्छन्न रखते थे । महाराजा पुरूरवा को गन्धर्वो द्वारा यज्ञविद्या का रहस्य मालूम हो गया । पुरूरवा ने सर्वप्रथम अग्निमन्थन का आविष्कार किया । अग्निमन्थन २४ अगुल की दो अरणियों से होता है । इनमें एक अधरारणि होती है और दूसरी उत्तरारणि । जिस प्रकार पुरूरवा उर्वशी से आयु को उत्पन्न किया उसी प्रकार दोनों अरणियों से वैध प्रग्नि को उत्पन्न किया । अतः अध्वर्यु ' उर्वश्यसि ' कहता हुआ अधरारणि को नीचे रख देता है । जिसमें प्राज्य को पिघलाया जाता है उस प्राज्य-विलापनी का ' आयुरसि ' यह कह कर उत्तरारणि से स्पर्श करा कर ' पुरूरवा असि ' कहता हुआ उत्तरारणि को अधरारणि के ऊपर रख देता है । अधरारणि तथा उत्तरारणि में क्रमश: उर्वशी तथा पुरूरवा की भावना मान कर मिथुन से अग्नि अर्थात् यज्ञ उत्पन्न हुआ । दोनों अरणियों को रखने के बाद अध्वर्यु होता से कहता है कि मथ्यमान अग्नि के लिए अनुवाक्या मन्त्र बोलें - " अग्नये मथ्यमानाय अनुब्रू हि ॥ २२ ॥
वह अध्वर्यु ‘ गायत्रेण त्वा छन्दसा मन्यामि ' ' त्रैष्टुभेन त्वा छन्दसा मन्थामि ' ' जागतेन त्वा छन्दसा मन्थामि ' इस मन्त्र को बोलता हुआ अग्निमन्थन करता है । यह मन्त्र ही याज्या मन्त्र है तथा यही मन्त्र अनुवाक्या मन्त्र भी है । अध्वर्यु होता को ' छन्दांसि मथ्यमानायानु-ब्रूहि ' इस प्रकार अनुवाक्या के लिए प्रेरित करता हुआ छन्दों को यज्ञ ( अग्नि ) के अधीन करता है । जैसे रश्मियाँ सूर्य के अधीन हैं वैसे ही छन्द यज्ञ के अधीन हैं । इसके अनन्तर अध्वर्यु होता को ' जातायानुब्रूहि ' यह प्रैष करता है । अध्वर्यु अग्नि को आहवनीय में ले जाने के समय अनुप्रहरण करता हुआ जातव प्रह्रियमाण अग्नि के लिए होता को प्रैष करता है और अनुवचन करो, यह कहता हैं ॥ २३ ॥
वह अध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करता हुआ मन्थन द्वारा जात अग्नि को आहवनीय में रख देता है -[ ५२२ ]
पृष्ठ 533
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०४ ) शेतपथ ब्राह्मण श्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण " भवतं नः समनसौ सचेतसावरेपसौ । मा यज्ञं हिंसिष्टं मा यज्ञपतिं जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः इति " । हे आहवनीय व निर्मन्थ्य ( दोनों ) अग्नियो! आप हमें अभिमत फल देने के लिए समान मनवाले हो जाइए । आप पाप - -रहित र हैं । ऐसे आप जो हैं, यज्ञ की व यजमान की हिंसा न करें । आज आपका हमसे परिचय हो गया है । अतः आप हमारे लिए कल्याण-कारी हों ॥२४ ॥
तदन्तर वह अध्वर्यु निम्न मन्त्र बोलता हुआ स्रवा में घृत लेकर आहवनीय अग्नि की ओर झुक कर उसमें प्राज्य की आहुति दे देता है—
' अग्नावग्निश्चरति प्रविष्ट ऋषीणां पुत्रोऽभिशस्तिपावा ।
स नः स्योनः सुयजा यजेह देवेभ्यो हव्यं सदमप्रयुच्छन्त्स्वाहा ॥२५ ॥
इस यज्ञ में अनुयाज- कर्म नहीं होता । यह कर्म इडाप्राशनान्त ही होता है । आतिथ्य यज्ञ का मस्तक भाग है अतः इसमें अनुयाज करना प्रयुक्त ही होगा-" तस्मादिडान्तं भवति - नानुयाजान्यजन्ति " || २६ ॥ [ विज्ञानभाष्य ] शकट द्वारा सोम यजमान के घर आ गया एवं आसन्दी ( सिंहासन ) पर रख कर उसे यज्ञशाला में विराजमान कर दिया गया । सोम सम्राट् है, राजाधिराज है । अतएव यजमान श्राज इस आगत सोम के लिए स्वागत - प्रयुक्ता प्रतिध्येष्टि करता है, अतिथि सत्कार करता है । प्रायणीय दृष्टि में बतलाया था कि इस सोमयज्ञ का जो प्रातिथ्य है वह मस्तक - स्थानापन्न है । सोमयज्ञ को पुरुष माना जाता है, जैसा कि " यज्ञपुरुष ब्राह्मण " में बतलाया जाएगा । कल्पना कर लीजिए कि सोमयज्ञ एक पुरुष है । उसकी जो आतिथ्येष्टि है वह मस्तक - स्थानापन्न है एवं प्रायणीयेष्टि और उदयनीयेष्टि - इस यज्ञ पुरुष के दोनों हाथ हैं । प्रारम्भ में प्रायणीय होता है, अन्त में उदयनीय होता है । दोनों के बीच में प्रातिथ्येष्टि होती है । वास्तव में होना भी ऐसा ही चाहिए । क्यों कि हाथ मस्तक के दोनों ओर होते हैं । मस्तक दोनों हाथों के बीच में रहता है । अतएव पहले प्रायणीयेष्टि होती है, बाद में आतिथ्येष्टि होती है, अनन्तर उदयनीय इष्टि होती है । आतिथ्येष्टि करना, आगत सोम का स्वागत करना है । आतिथ्य यद्यपि सोम के आते ही हो जाना चाहिए था परन्तु चूंकि आतिथ्य मस्तक - स्थानापन्न है एवं मस्तक के पहले हाथ रहता है अतएव प्रातिथ्येष्टि के पहले प्रायणीय इष्टि करना ही आवश्यक है । श्रतएव पहले प्रायणीय इष्टि को जाती है । सोम राजा यजमान के घर आ पहुँचे । अब यजमान सोम के स्वागत में - हवि प्रयुक्त आतिथ्य का निर्वाण करता है । अतिथि सत्कार पहले होना चाहिए, न कि प्रायणीयादि । इसका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ठीक है, पहले प्रातिथ्य ही होना चाहिए था परन्तु यज्ञपुरुष का मस्तक प्रातिथ्य को माना जाता है एवं मस्तक के दोनों ओर हाथ रहते हैं अतएव शिरस्थानीय आतिथ्य के दोनों ओर होने वाली प्रायणीय और उदयनीय हषियों में से सबसे पहले प्रायणीय इष्टि होती है बाद में प्राति-येष्टि होती है तथा अन्त में उदयनीय इष्टि होती है -[ ५२३ ]
पृष्ठ 534
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( प्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण " शिरो वै यज्ञस्यातिथ्यं बाहू प्रायणीयोदयनोयौ । अभितो वै शिरो बाहू भवतः । तस्मादभितऽश्रातिथ्यमेते हविषी भवतः प्रायरणीयश्चोदयनीयश्च " ॥१ ॥
जिस कारण इष्टि का नाम प्रातिथ्येष्टि हुआ है, वह कारण बतलाते हैं-" अथ यस्मादातिथ्यं नाम " । ( तदुच्यते ) जो कि खरीदाहुआ यह सोम इस यजमान के घर आता है, वह अतिथि के रूप में आता है । सोम का यजमान के घरआना अतिथि का घर पर आना है । सोम राजा है, राजा ही नहीं सम्राट् है । आज यह यजमान के घर आए हुए हैं । आज यजमान के घर सामान्य अतिथि नहीं हैं, बहुत बड़े, प्रतिष्ठित अतिथि प्राए हुए हैं— " अतिथिर्वा एष एतस्यागच्छति यत् सोमः क्रीतः ” । चूंकि अतिथि का सत्कार करना आवश्यक है अतएव इस सोम के लिए यजमान हवि का निर्वाप करता है । अतिथि के लिए यह हवि दिया जाता है । अतएव इसका नाम प्रातिथ्य - हवि है । तस्मा ( तस्मै ) एतत् ( दीयते इति शेष:) आगत अतिथि का स्वागत अवश्य ही करना चाहिए । इसकी लौकिक मर्यादानुसार पुष्टि करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं--यदि राजा अथवा ब्राह्मण किसी के घर जाता है तो उस राजा और ब्राह्मण के लिए जिस प्रकार महोक्ष अर्थात् मोटा - ताजा बैल अथवा मोटा - ताजा बकरा पकाया जाता है, निवेदित किया जाता है, ही मानुष - प्रति है । अर्थात् मनुष्य घर में आए तो उसका इन पदार्थों से आतिथ्य किया जाता है एवं यदि देवता घर में आए तो उनका प्रातिथ्य हवि से किया जाता हैं । इस प्रकार प्रागत मनुष्य और देवता का सत्कार करना लोकाचार है । मर्यादा यही कहती है कि यदि आपके घर पर अतिथि आए तो आप सबसे पहले और काम छोड़ कर उसी का स्वागत करें । आज सोम राजा अतिथि बन कर यजमान के घर पधारे हुए हैं अतएव इस सोम के लिए यजमान प्रातिथ्य - हवि का निर्वाण करता है । ' महोक्षं वा महाजं वा ' से कहीं यह मत समझ लेना कि वास्तव में उनके लिए मांस पकाया जाता है । मांस पकाया नहीं जाता, प्रतिपत्ति मात्र की जाती है । गौ को वेद में अध्न्या कहा जाता है—
" माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः ।
I नुवोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट " ॥
( ऋग्वेद ० मं ० ८।१०१।१५ ) इस प्रकार गोवध का जबर्दस्त प्रतिरोध किया गया है । भला फिर उसे कैसे मार सकते हैं? ऐसी अवस्था में पकाने की केवल प्रतिपत्ति समझनी चाहिए । गृहपति अतिथि से कहता है - हे प्रतिथे! आज आप हमारे घर पधारे हैं, हमारे अहोभाग्य हैं । हमारे घर में सब से श्रेष्ठ वस्तु गौ और अज पशु [ ५२४ ]
पृष्ठ 535
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण प्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण है । गोया है । सर्वाराध्य है, प्रति पूजनीया है । ऐसी अमूल्य वस्तु भी आपके लिए न्यौछावर है, वह भी आपके लिए तैयार है । बस, " महोक्षं वा पचेत् " का यही तात्पर्य है । श्रादरातिशय दिखलाने के लिए ऐसा कहा जाता है, न कि उसका मांस वास्तव में पकाया जाता है । परन्तु इतना अवश्य समझ लेना चाहिए कि जो श्रमांस मधुपर्क है उसी में यह प्रतिपत्ति लागू होती है । जो समांस मधुपर्क है वहाँ तो श्रवश्य मांस पकाया जाता है । अतएव ऐसे अतिथि के लिए - " गोधनोऽतिथिः " का प्रयोग होता है । अब प्रकृत में हमें सिर्फ कहना यही है कि श्रागत अतिथि का मधुपर्क से सत्कार करना लौकिक नियम है । आज सोम यजमान के घर प्राया हुआ है । सोम अतिथि है, अतएव श्राज यह यजमान इसके लिए प्रातिथ्य हवि का निर्वाप करता है । इसीलिए इस इष्टि का नाम आतिथ्येष्टि है— " यथा राज्ञे वा ब्राह्मणाय वा महोक्षं वा महाजं वा पचेत् तदह मानुषं ( प्रातिथ्यमिति शेषः ) हविर्देवानाम् । एवमस्मा ( अस्मै सोमाय ) एतदातिथ्यं करोति ” ॥२ ॥
किस समय प्रातिथ्य - हवि का ग्रहण करना चाहिए - यह बतलाते हैं । सोम छकड़े ( शकट ) पर से न उतरे इसके पहले ही सोम का अतिक्रमण करके अर्थात् उसे पृष्ठ भाग में करके घर में दौड़ कर हवि ग्रहण करे । तात्पर्य्यं यही है कि यजमान को चाहिए कि जिस समय छकड़ा जा कर वहाँ खड़ा हो, उस समय सोम को वहीं छोड़ कर भट घर में ( शाला में ) जा घुसे और सोम शकट पर से उतारा जाए, उसके पहले ही हवि को हाथ में उठा ले— " पूर्वोऽतीत्य ( पूर्वभागत्य ) गृह्णीयात् " । सोम घर में श्राए इसके पहले ही हवि तैयार रक्खे, यही तात्पर्य है । इसका कारण बतलाते हैं । जिस घर में पूजनीय प्रगत व्यक्ति का आने के साथ ही घर वाले सत्कार नहीं करते - श्रग्र - पूजा नहीं करते ऐसी अवस्था में वह आगत अतिथि उन घर वालों पर नाराज हो जाता है । उसके दिल में खयाल होता है कि देखो, हम तो इसके घर आये हैं और इसे हमारा कुछ खयाल ही नहीं है । अतएव गृहपति को चाहिए कि सोम - अतिथि के आते ही यजमान स्वागतार्थं उसके लिए हवि सहित तैयार रहे । श्राये बाद, घर में प्रविष्ट हुए बाद, स्वागत करना स्वागत नहीं कहलाता । अग्र - पूजा वही कहलाती है । कि सोम अभी बाहर ही है और यजमान हवि लिए तैयार खड़ा है । ऐसा करने से अर्थात् घर में सोम के प्रवेश करने से पूर्व ही हवि ग्रहण करने से सोम अग्र - पूजित हो जाता है-“ तदाहुः । पूर्वोऽतीत्य गृह्णीयात् इति यत्र वाऽग्रर्हन्तम् ( पूज्यम् ) आगतं ( आगतमात्रम् ) नापचायन्ति क्रुध्यति वै स ( अतिथिः ) तत्र तथाह ( सोमप्रवेशात् प्रागेव हविर्ग्रहणे सति ) अपचितो भवति " ॥ ३ ॥
[ ५२५ ]
पृष्ठ 536
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण आतिथ्येष्टि ब्राह्मण जिनका यह मत है कि घर में सोम के घुसने से पहले हवि ग्रहण करना चाहिए, वे हवि - ग्रहण का ठीक समय बतलाते हुए कहते हैं कि जिस समय एक बैल का जूड़ा उतर जाए और दूसरे का न उतरे उस समय यजमान हवि ग्रहण करे । दोनों बैलों में से एक बैल खोल दिया गया हो, दूसरे को न खोला हो - उस समय हवि ग्रहण करे -" तद्वा ऽग्रन्यतरऽएव विमुक्तः स्यात् । अन्यतरोऽविमुक्तोऽथ गृह्णीयात् ” । वह शकट एक बैल से मुक्त हो गया है । इससे तो सोम श्रागत हो जाता है । " श्रागताय स्वागतं कुर्यात् " यह सिद्धान्त है । अतिथि के आ जाने का निश्चय हो जाय तभी स्वागत की तैयारियाँ होती हैं । एक बैल के खुल जाने से यह निश्चिय हो जाता है कि यह अतिथि वास्तव में प्रागत हो गया, हमारे घर में आ गया । बस, इस श्रागत सम्पत्ति के लिए तो एक जूड़ा उतार दिया जाता है एवं दूसरा जूड़ा नहीं उतारा जाता है । इससे वह अग्रपूजित हो जाता है । यदि एक भी जूड़ा न उतरे तब तो आागत का स्वा-गत नहीं हुआ समझना चाहिए । यदि दोनों उतरे बाद हवि - ग्रहण हुआ तो भी अग्रपूजा नहीं हुई । श्रत-एव दोनों प्रशंकाओं अथवा आपत्तियों के निवारण के लिए अन्यतर जूड़े के खुल जाने और दूसरे के न खुल जाने के समय ही हवि - ग्रहण करना चाहिए । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं— " स यदन्यतरो विमुक्तस्तेनागतो यद्वन्यतरोऽविमुक्तस्तेनापचितः-( अग्रपूजितः ) " || ४ || परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य इस मत का खण्डन करते हुए कहते हैं कि नहीं - ऐसा कभी न करे -" तबु तथा न कुर्यात् " । दोनों बैल खोल कर सोम को यज्ञशाला में पहुँचा कर ही हवि ग्रहण करे । सोम घर में पहुँचे नहीं, उसके पहले ही हवि ग्रहण करना सर्वथा अनुचित है । एक जूड़ा खोल देने मात्र से आगत सम्पत्ति नहीं हो सकती । पूरा श्रागमन तभी माना जाता है जब कि दोनों बैल खोल दिये जाएँ और अतिथि घर में आ जाए । प्रकृतिमण्डल में प्राण - देवता जैसा कर रहे हैं उसके अनुसार ही मनुष्य-देवताओं ने किया था एवं जैसा मनुष्य देवों का चरण अर्थात् आचरण रहा है, वैसा ही हम मनुष्यों में प्रचलित है । " यद्वै देवा अकुर्वस्तत् करवाणि ' यही हमारा मूल मन्त्र है । मनुष्य जो कुछ करते हैं देवताओं के अनुसार ही करते हैं । देवतानों की, विद्वान मनुष्यों की मर्यादा है कि जब तक अतिथि घर में न प्रा जाए तब तक वह अतिथि नहीं है । तब तक उसका स्वागत भी विधेय नहीं है । अतएव जब सवारी से उतर कर वह घर में आ जाए तभी उसका स्वागत करना चाहिए । देव - व्यवस्थापित उसी मर्यादा के अनुसार मानुष - प्रातिथ्य कर्म में, अतिथि जब तक सवारी को नहीं छोड़ दे, घर में प्रविष्ट नहीं हो, तब तक उसके लिए पाद - प्रक्षालनार्थ उसे घर में नहीं लाते एवं तब तक उसकी पूजा भी नही करते हैं । कारण इसका यही है कि जब तक वह सवारी पर से उतर कर घर में नहीं आ जाता, तब तक अनागत ही है । आगत का ही स्वागत होता है, न कि अनागत का । परन्तु जब बैलों को खोल कर वह घर में ले आया जाता है, तो उस समय घर के लोग उस के पैर धोने के लिए उदकाद्या-हरण करते हैं और उसकी अग्रपूजा करते हैं । क्यों कि घर में आया हुआ अतिथि वास्तव में आगत हो [ ५२६ ]
पृष्ठ 537
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रातिथ्येष्टि ब्राह्मरण जाता है एवं आगत का ही स्वागत करना उचित है । अतएव दोनों बैलों को खोल कर तथा सोम को यज्ञ-शाला में पहुँचाकर ही यजमान हवि अर्पित करे— " विमुच्यैव प्रपाद्य गृह्णीयात् । यथा वै देवानां चरणं ( श्राचरणं ) तद्वा ऽननुमनुष्याणाम् । तस्मान्मानुषे ( प्रातिथ्य कर्मरिग ) यावन्न विमुञ्चते नैवास्मै तावदुदकं हरन्ति नापचितिं कुर्वन्ति । तहि हि स श्रागतो भवति । तस्माद्विमुच्यैव प्रपाद्य गृह्णीयात् " ॥ ५ ॥
जिस समय सोम प्रसन्दी पर विराजमान हो कर यज्ञ - शाला में ना जाए उस समय यजमान को चाहिए कि सन्त्वरमाण हो कर हवि ग्रहण करे । अर्थात् प्राकुलता दिखलाता हुआ, त्वरमाण होता हुना हवि ग्रहण करे | ऐसा करने से सोम अग्र - पूजित हो जाता है । बात सच है, यदि श्रतिथि घर में श्राए और उस समय जरा उपेक्षा का भाव दिखला दिया जाए तो उससे अतिथि अपना अनादर समझता है । वह खयाल करता है कि देखो, हम तो इसके घर में आये हैं और इसे अपनी परवाह ही नहीं है । अतएव अतिथि के आने पर लापरवाही महीं दिखानी चाहिए । श्रपितु फुर्ती से, उत्साह के साथ, हवि ग्रहण करना चाहिए, जिससे अतिथि को मालूम हो जाए कि वाह, यह तो मेरे लिए बड़ा ही व्यग्र हो रहा है, वास्तव में यह मेरा आदर करता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— हैं-" स वै सन्त्वरमारण इव ग्रह्णीयात् । तथा हापचितो ( अग्रपूजितो ) भवति " । जिस समय यजमान हवि ग्रहण करता है उस समय यजमान के साथ यजमान - पत्नी भी रहती है " तत् पत्न्यन्वारभते " । पर्युह्यमाण जो सोम है उसका अन्वारम्भरण केवल यजमान ही करता है । अर्थात् सोम को शकट में रख कर उसे घर तक लाना यजमान का ही काम है । इस समय उसकी पत्नी साथ नहीं रहती । परन्तु जब सोम घर में आ जाता है एवं उसके लिए हवि ग्रहण की जाती है तो इसमें यजमान और यजमान-पत्नी दोनों शामिल रहते हैं । इस अन्वारम्भरण से ये जायापति दोनों पावों में अन्वारम्ण कर देते हैं । तात्पर्थ्य इसका यही है कि सोम राजा है, राजा की सवारी के साथ सारा सेवक वर्ग होता है । यजमान और यज-मान - पत्नी सेवकवर्ग में शामिल हैं । परन्तु सोम की सवारी के साथ यजमान ही रहता है, यजमान की पत्नी नहीं रहती । ऐसी अवस्था में सेवा - धर्म में आघात पहुँचता है । इसको दूर करने के लिए हवि -निर्वाप कर्म में पत्नी भी शामिल हो जाती है । इससे दोनों पार्श्वों का ( सोम की सवारी और आतिथ्य -सत्कार का ) अन्वारम्भण हो जाता है । पत्नी बजमान का आधा शरीर है । यदि केवल यजमान भी सेवा में पहुँच गया तो समझ लो, पत्नी भी आ गयी । परन्तु एक बार पत्नी को अवश्य ही शामिल होना पड़ेगा । यदि एक कर्म में पत्नी शामिल हो जाती है, तो समस्त कर्म में केवल यजमान से ही अन्वा-रम्भण विहित समझ लिया जाता है— [ ५२७ ]
पृष्ठ 538
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण प्रातिथ्येष्टि ब्राह्मणं " पर्युह्यमाणं वै यजमानोऽन्वारभते । अथात्र पत्नी । उभयत एवंत-न्मिथुनेनान्वारभेते ” । जिस घर में कोई पूज्य अतिथि श्राता है, उस घर के सारे मनुष्य उसकी सेवा करने के लिए तत्पर हो जाते । कोई पानी लाता है, कोई आसन बिछाता है, कोई पंखा भलता है - इस प्रकार घर के सारे आदमी तिथि - सेवा के लिए कुछ - न - कुछ करने लगते हैं । जब घर के सभी लोग सेवा में तत्पर रहते हैं । तभी वह अतिथि पूजित होता है । सारे घर के मौज करें और इकल्ला ( अकेला ) यजमान ही यदि भायें-भायँ करता रहे तो अतिथि इसमें अपना अनादर समझता है । वह विचारने लगता है कि देखो अपना श्राना सिवाय इसके श्रीर सबको अखरता है । ऐसा न हो—- प्रतिथि जरा सा भी मन मुटाव न लाए-श्रतएव अतिथि के आते ही सारे घर वालों को सेवा में तत्पर हो जाना चाहिए । इसी से अतिथि अपनी प्रतिष्ठा समझता है । अतएव पत्नी को भी हवि - निर्वाप में शामिल होना चाहिए, यही तात्पर्य है । पत्नी आ गई तो सब आ गये । बस, इसीलिए हवि - निर्वाण के समय पत्नी का अन्वारम्भरण बतलाया गया है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" यत्र वाऽअर्हन् ( पूजनीयोऽतिथिः ) आगच्छति सर्वगृह्या - इव वै तत्र चेष्टन्ति तथा हापचितो भवति " ॥ ६ ॥
अथवा इसका दूसरा अर्थं समझना चाहिए । यदि कोई पूजनीय अतिथि घर में आता है तो घर में रक्खी कोई भी वस्तु ऐसी नहीं रहती जो अतिथि के लिए न हो । अतिथि के आने पर सारे पदार्थ सर्वगृह्य बन कर रहते हैं । अतिथि यजमान के सारे पदार्थों का उपभोग कर सकता है । इसीलिए तो या गो तक अतिथि को समर्पित कर दी जाती है । देवताओं के लिए हविर्ग्रहण मन्त्र होता है । मन्त्र बोल कर देवताओं के लिए हवि - ग्रहण किया जाता है । सोम भी देवता है, देवता ही नहीं, देवताओं के राजा हैं । अतएव इनके लिए हवि ग्रहण करते समय मन्त्र बोलना पड़ता है । सोम मामूली देवता नहीं हैं । अतएव यजमान को चाहिए कि जिन मन्त्रों से अन्यान्य हवियों का ग्रहण किया जाता है, उनसे इतर अन्य मन्त्रों से ही सोम के लिए हवि ग्रहण करे । और प्रौर देवताओं के हविग्रहरण मन्त्र से सोम के लिए हवि का ग्रहरण करना सोम को सब देवताओं के समान समझना है । अतएव सोम के लिए हवि - ग्रहण का मन्त्र अन्य ही होना चाहिए । जिन मन्त्रों से अन्य हवियों का ग्रहण किया जाता है, उनसे सर्वथा स्वतन्त्र ऐसे मन्त्र होने चाहिए जिनसे कि केवल सोम के लिए ही हवि ग्रहण किया जाता हो । सामान्य मन्त्रों से हवि ग्रहण करना सोम राजा को उच्छिष्ट खिलाना है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" स वाऽन्येनैव ततो यजुषा गृह्णीयात् । येनो चान्यानि हवींषि ( येन मन्त्रेण अग्न्यानि हवींषि गृह्यते ततो अन्येन गृह्णीयादिति भावः ) [ ५२८ ] [ः ) ” ।
पृष्ठ 539
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण प्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण सोम देवता है । देवता के साथ छन्द भी रहता है । छन्द से ही देवता का स्वरूप बनता है । सोम परमेष्ठिमण्डल से आता है एवं गायत्री, त्रिष्टुप् जगती - इनके द्वारा प्राता है । परमेष्ठी के नीचे सूर्य, अन्तरिक्ष और पृथिवी - ये तीन लोक हैं । सूर्य्यं ( श्रादित्य ) के छन्द का नाम जगती है । अन्तरिक्ष के छन्द का नाम त्रिष्टुप् है । पृथिवी के छन्द का नाम गायत्री है । पृथिवी - लोक के अधिष्ठाता हैं, अतएव गायत्री को श्रग्नि का छन्द भी कहा जाता है । अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता वायु और मरुत्वान् इन्द्र हैं, अतएव त्रिष्टुप् को इन्द्र का छन्द कहा जाता है । द्युलोक के अधिष्ठाता श्रादित्य हैं, अतएव जगती को आदित्यका छन्द भी कहा गया है । कहना यही है कि सोम सूर्य्य से पृथिवी तक व्याप्त रहता है । तीनों लोकों में व्याप्त रहना - तीनों छन्दों पर व्याप्त रहना है । सोम, बिना छन्दों के नहीं रह सकता । छन्द ही इसकी प्रजा हैं । इस छन्द - प्रजा की अपेक्षा ही से तो सोम राजा कहलाता है । सोम छन्दों का सम्राट् है । यह सम्राट् - रूप तभी स्थिर रह सकता है जब कि हवि - निर्वाप में छन्दों की प्रधानता न रख कर सोम की ही प्रधानता रक्खी जाए । सोम को यदि छन्दों के नाम से अलग - अलग हव्य दिया जाएगा तो छन्द स्वतन्त्र हो जाएँगे । सोम का साम्राज्य नष्ट हो जाएगा । प्रजा जब तक राजा के शासन में - अधि-कार में रहती है, तभी तक राजा का राजत्व है । यदि प्रजा स्वतन्त्र हो जाती है तो राजा का साम्राज्य नष्ट हो जाता है । ऐसा न हो, इसके लिए छन्दों के ऊपर सोम का राज्य बना रहना चाहिए । साम्राज्य बना रहे इसलिए की मारण श्रर्थात् श्रातिथ्य - इष्टि से ध्यायमान सोम को एक ही भाग दिया जाता है । अर्थात् केवल सोम को उद्देश्य करके ही हवि देनी चाहिए । परन्तु इतना अवश्य है कि छन्दों का खयाल रख कर एक ही हवि इतनी मात्रा में दे देनी चाहिए जिससे छन्द भी तृप्त हो जाएँ । छन्दों का नाम न लिया जाए - इसका तात्पर्य यह नहीं है कि छन्दों के लिए हवि दी ही न जाए- अतएव छन्दों का खयाल रख कर एक ही बार हवि दी जाए किन्तु पर्य्याप्त मात्रा में दी जाए । अलग - अलग नाम से देना आवश्-यक नहीं है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " एकं वाऽएष भागं क्रीयमाणोऽभिक्रीयते । छन्दसामेव राज्याय, छन्दसां साम्राज्याय " । सोम को देने से सोम के साथ प्रजारूप से रहने वाले छन्दों को भी हवि स्वतः मिल जाएगी । छन्द सोम की प्रजा है । वह सदा सोम के साथ रहती है । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि छन्द इस सोम के चारों ओर खिदमतगार बन कर रहते हैं । ' साचय ' अर्दली को कहते हैं । अंगरक्षकों को साचय कहते हैं । छन्दसोम के अंगरक्षक हैं । इन्हीं से सोम का स्वरूप बना हुआ है । ये सोम के चारों ओर रहते हैं । जिस प्रकार राजा के चारों ओर राजा से इतर लोग, जो कि राजकृत हैं, ऐसे सूत - ग्रामणी - सेनानी भी रहते हैं, जिनके बिना राजा बाहर नहीं निकलता, तथैव इस सोम के चारों ओर अंगरक्षक छन्द अभिव्याप्त रहते हैं | दीवानी सीगे ( विभाग ) के अफसर को ग्रामणी कहते थे । फौजदारी सीगे के अफसर को सेनानी कहते थे । जिस समय राजा की सवारी निकलती थी उस समय उसके साथ सेनानी - ग्रामीण-सूत वगैरः सब साथ रहते थे, जिनके बिना राजा कहीं नहीं जाता था । एवमेव सोम राजा ग्रामणी-सेनानी स्वरूप अपने साचय ( अंगरक्षक ) छन्दों के बिना कहीं नहीं जा सकता । जैसे राजा को सेनानी -ग्रामणी लोग चारों ओर से सदा घेरे रहते हैं तथैव सोम के चारों ओर छन्द सदा व्याप्त रहते हैं— [ ५२६ ]
पृष्ठ 540
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण " न वै तदवकल्पते - यच्छन्दोभ्य "
न कि कि छन्दों के लिए-“ केवलं गृह्णीयात् ” ।
तदेव च्छन्दस्यन्वा भजेत् " ॥ ८ ॥
[ ५३० ] श्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण इति । -" तस्य च्छन्दांस्यभितः साचयानि यथा राज्ञोऽराजानो राजकृतः सूतग्रा-मण्यः एवमस्य छन्दांस्यभितः साचयानि " ॥७ ॥
सूत - ग्रामणी लोग राजा नहीं हैं, राजेतर हैं परन्तु राजकृतः हैं - राजा बनाने वाले हैं । यदि ये न हों तो राजा, राजा ही न रहे । प्रजा से ही राजा बनता है । यदि प्रजा ही न हो तो राजा किसका? श्रतएव सूत - ग्रामणी इत्यादि के लिए श्रराजानः - राजकृतः - यह कहा गया है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जब छन्द सूत - ग्रामणी की तरह, सोम राजा के साचय ( अंगरक्षक ) हैं, प्रजास्थानीय हैं, मातहत हैं, तो " छन्दोभ्यः " कहकर छन्दों के लिए अलग हवि देना सर्वथा अनुचित है । “ छन्दोभ्यः ” कहकर छन्दों के लिए सोम से अलग हवि सर्वथा अनुचित है— अतएव एक ही हवि को ग्रहण करना चाहिए । केवल सोम के लिए हवि को ग्रहण करना चाहिए यदि कोई मनुष्य अपने यहाँ राजा अथवा अन्य किसी श्रेष्ठ व्यक्ति को भोजन करने बुलाता है तो उसके साथ रहने वाले, अराजानः राजकृतः जो सूत - ग्रामणी - सेनानी वगैर: हैं, वे भी अन्वाभक्त हो जाते हैं | राजा के साथ राजा के नौकर - चाकर बिना बुलाये ही, अनिमन्त्रित ही, भोज में शामिल हो जाते हैं । उनके लिए अलग निमन्त्रण नहीं दिया जाता । अतएव यहाँ पर भी यजमान सोम के लिए जो हवि ग्रहण करे उसी में से छन्दों को भी भागी बना दे । सोम के लिए ही हवि ग्रहण करना उचित है | " छन्दोभ्यः " कहकर छन्दों के लिए अलग हवि ग्रहण करने की कोई आवश्यकता नहीं है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" यत्र वाऽश्रर्हते ( पूज्याय महाराजाय ) पचन्ति - तदभितः साचयोऽन्वा-भक्ता भवन्ति राजानो राजकृतः सूतग्रामण्यः । तस्मात् यत्रैवैतस्यै गृह्णीयात् । सोम के लिए एक ही हवि ग्रहण क्यों करनी चाहिए जब कि छन्द भी सोम के साथ रहते हैं -इसका कारण बतला दिया गया । अब पद्धति बतलाते हैं-वह यजमान निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ सोम के लिए हवि ग्रहण करता है - ~ -" अग्नेस्तनूरसि विष्णवे त्वा । सोमस्य तनूरसि विष्णवे त्वा । अतिथे-रातिथ्यमसि विष्णवेत्वा । श्येनाय त्वा सोमभृते विष्णवे त्वा । अग्नये त्वा रायस्पोषदे विष्णवे त्वा " ।