Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 541–550
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 541–550
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तृतीय काण्ड ०४ ) शतपथ ब्राह्मण अतिथ्येष्टि ब्राह्मण ब्रीहि! हे हवि!!, आप अग्नि के शरीर हैं- ऐसे प्रारको मैं विष्णु के लिए अर्थात् यज्ञ-साधक सोम के लिए ग्रहण करता हूँ । अग्नि का शरीर हव्य ही है । जब तक अग्नि में हव्य की आहुति पड़ती रहती है तभी तक प्रग्नि प्रज्वलित रहती है । जब तक शरीराग्नि में प्रन्नाहुति डालते रहेंगे तभी तक शरीर में गर्मी रहेगी । जहाँ प्राहुति बन्द हुई कि हाथ - पैर ठंडे हुए । अतएव अग्नेस्तनूरसि कहा है । अपि च इसमें एक और भी रहस्य है । सोम के साथ - साथ ही छन्दों को भी हवि देना है । इनको प्रत्यक्ष तो दी नहीं जा सकती अतएव परोक्ष भाव से छन्दों को हवि देने के लिए अग्ने स्तनूरसि सोमस्य तनूरसि - यह कह दिया है । अग्नि ही तो गायत्री है । अग्नि के छन्द का नाम ही तो गायत्री है, जैसा कि पूर्व में बतलाया गया है 1 । तो बस " अग्नेस्तनूर सि " - यह कहता हुआ यजमान सोम के साथ - साथ गायत्री छन्द को भी
परोक्षभाव से हवि में शामिल कर देता है ।
" अग्निवें गायत्री । तद् गायत्रीमन्वाभजति " ॥९ ॥
हे हवि, आप सोम के शरीर हो - ऐसे श्रापका विष्णु के लिए अर्थात् सोम के लिए ग्रहण करता हूँ । इन्द्र - वरुण - सोम - रुद्र - पर्जन्य - यम - मृत्यु - ईशान ये क्षत्र वीर्य्यं के दाता कहलाते हैं । अतएव— " यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणि इन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्यु-शान इति । तस्मात् क्षत्रात्परं नास्ति " । ( बृ ० उ ० १।४।११ ) सोम क्षत्र है । क्षत्र इन्द्र है । इन्द्र अन्तरिक्ष के देवता हैं एवं अन्तरिक्ष के छन्द का ही नाम त्रिष्टुप् है । त्रिष्टुप् अन्तरिक्ष के छन्द का नाम है । अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता इन्द्र हैं । इन्द्र क्षत्र है । प्रत-एव त्रिष्टुप् को क्षत्र कहा जाता है । अपि च सोम अन्तरिक्ष में ही रहता है । जैसा कि " त्वया तत्त सर्वान्तरिक्षम् " श्रुति से स्पष्ट है— सोम भी क्षत्र है | एवं अन्तरिक्ष के छन्द का नाम ही त्रिष्टुप् है - इसलिए भी त्रिष्टुप् को क्षत्र कहा जाता है । हवि से कहते हैं कि तुम सोम के शरीर हो । वास्तव में बात ठीक है । हवि कहते हैं अन्न को । अन्न ही तो सोम का शरीर है । सोम साक्षात् स्व - स्वरूप से लभ्य नहीं है अपितु मन्त्र द्वारा ही सोम आहुत होता है । साक्षात् सोम को हम नहीं देख सकते । अन्न में, हवि में, घुसा हुआ जो सोम है - वही हमारे उपयोग में आता है । हवि ही सोम का शरीर है । जैसे अग्नि से परोक्षभावेन गायत्री को अन्वाभक्त किया था तथैव - " सोमस्य " - इत्यादि से परोक्षभावेन त्रिष्टुप् छन्द को अन्वाभक्त करते हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं-“ क्षत्रं वं सोमः । क्षत्रं त्रिष्टुप् । तत् त्रिष्टुभमन्वा भजति " ॥१० ॥
हवि भाप तिथि सोम के आतिथ्य हो । आप ही प्रातिथ्य के साधनभूत हो । अर्थात् आप ही से ( अन्नादि से ) अतिथि का सत्कार किया जाता है । ऐसे प्रापका विष्णु के लिए, अतिथि [ ५३१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण प्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण सोम के लिए, ग्रहण करता हूँ । और जो मन्त्रभाग हैं उनमें तो छन्द भी शामिल हैं । परन्तु इस हिस्से में छन्द शामिल नहीं है । यह भाग इस सोम का उद्धार है अर्थात् प्रातिस्विक है । जिस प्रकार आगत श्रेष्ठ प्रातिथि का उद्धार होता है तथैव यह हिस्सा सोम छन्दों से अलग इस सोम के लिए उद्धार है । राजा यदि किसी के घर आता है तो उसके साथ नौकर - चाकर भी आते हैं । उनको भी वही सामग्री परोसी जाती है । परन्तु नजर ( भेंट ) राजा की ही होती हैं । बहुमूल्य वस्तु की नजर ( भेंट ) राजा की ही होती है, नौकरों की नहीं । तो यह जो हिस्सा है, वह सोम की नजर है । इसमें छन्दों का हिस्सा नहीं है । प्रतिनियत भाग को ही ' उद्धार ' कहते हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" सोऽस्योद्धारः यथा श्रेष्ठस्योद्धारः । एवमस्यैषः । ऋते छन्दोभ्यः ” ॥११ ॥
श्येनायत्वेति — गायत्री श्येन बन कर चूं कि सोम लाई थी, अतएव गायत्री को सोमभूत कहते हैं । ऐसा जो बिन्दु है अर्थात् सोम है, उसके लिए हवि का ग्रहण करता हूँ । " प्रग्नेस्तनूरसि " - इससे भी गायत्री को प्रन्वाभक्त किया था एवं श्येनाय - इत्यादि से दुबारा फिर गायत्री को परोक्षभाव से अन्वा-भक्त करते हैं-" गायत्रीमन्वा भजति " । परमेष्ठीमण्डल में, गायत्री ( पार्थिवाग्नि ) ने वाग् बन कर द्युलोक के सोम का अपहरण कर लिया था - अतएव वह श्येनरूपा गायत्री सोमभृत् कहलाती है । बस इसी पराक्रम के कारण इस गायत्री को दुबारा अन्वाभक्त करते हैं । गायत्री - त्रिष्टुप् जगती तीनों ही सोम लेने गई थीं । परन्तु सोमापहरण करने में गायत्री ही समर्थ हुई थी, अतएव पराक्रम का पारितोषिक देने के लिए उसे दो बार शामिल किया जाता है । यद्यपि इनाम सभी नौकरों को मिलता है परन्तु जो मर्जीदान नौकर हैं उन्हें अधिक इनाम मिला करता है । यह गायत्री सोम राजा की मर्जीदान ( कृपा पात्र ) है । गायत्री ही सोम के साथ रहती है । प्रतएव इसे डबल ( दुगना ) इनाम दिया जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं -“ सा यद् गायत्री श्येनो भूत्वा दिवः सोममाहरत् भृत् । तेनैवैनामेतद् वीर्येण द्वितीयमन्वा भजति ॥१२ ॥
तेन सा श्येनः सोम-प्रग्नये त्वां - हे हवि!, अग्निस्वरूप रायस्पोष के देने वाले जो विष्णु हैं - उनके लिए तुम से ग्रहण करता हूँ | संपत्ति की पुष्टि को रायस्पोष कहते हैं । संपत्ति को ही वैदिक भाषा में पशु कहते हैं । उपकरण - सामग्री का नाम ही पशु है । पशु जगती - स्वरूप है । जगती कहते हैं पृथिवी को । पृथिवी से ही पशु पुष्ट होते हैं । अतएव " जागता वै पशवः ” यह कहा जाता है— " अग्नये त्वा रायस्पोषदे " । से परोक्षभावेन जगती को शामिल करते हैं । विष्णु अग्नि - स्वरूप है । पृथिवी से २१ ग्रहण तक जाने वाला जो अग्नि है, उसी का नाम पिण्ड है । इसे ही यज्ञ भी कहते हैं । इसमें सोम की आहुति [ ५३२ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथं ब्राह्मणं श्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण पड़ती है । तभी यज्ञ का, अर्थात् विष्णु का, अर्थात् अग्नि का स्वरूप सुरक्षित रहता है । श्रतएव विष्णु कोसोम कहा जाता है । विष्णु वास्तव में सोम । श्रग्नि सोम ही तो है । यदि सोम न हो तो अग्नि का पता ही न लगे—
" पशवो वै रायस्पोषः । पशवो जगती । तज्जगतीमन्वा भजति " ॥ १३ ॥
यह यजमान, किसलिए ( १ ) " श्रग्नेस्तनूरसी " ( २ ) " सामस्य तनूरसि " ( ३ ) “ प्रतिथेरातिथ्य-मसि " ( ४ ) " श्येनादत्वा सोमभृते " ( ५ ) " प्रग्नयेत्वा रायस्पोषदे " - - इन पाँचों में से पाँच बार हवि ग्रहण करता है - इसका कारण बतलाते हैं— “ अथ यत्पञ्च कृत्वो गृह्णाति ( तस्य कारणमुच्यते - इति शेषः ) " । सोम यज्ञ संवत्सर - संमित है । पृथिवी के केन्द्र से २१ वें अहर्गण तक जो वर्तुलवृत्त है उसे ही संवत्सरमण्डल कहते हैं । यह अग्नि का ही मण्डल है । इसी में सोम की आहुति पड़ने से अग्नीषोमात्मक यज्ञ हुआ करता है । अतएव यज्ञ को संवत्सर - संमित कहा जाता है । एक संवत्सर में वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, हेमन्त ये पाँच ऋतुएं होती हैं । बस, अध्वर्यु इन पाँचों से हवि ग्रहण करता हुआ, दृढ़ मनोभावना से पश्वावयव - उस संवत्सर को पाँच मन्त्र - भागों से आत्मसात् कर लेता है । प्रतएव पाँच बार हवि ग्रहण करता है— " संवत्सरसंमितो वै यज्ञः । पञ्च वाडऋतवः संवत्सरस्य । तं पञ्चभि राप्नोति । तस्मात् पञ्च कृत्वो गृह्णाति " । यह यजमान पाँचों में-" farna त्वा, विष्णवे त्वेति " । का समावेश करके ही हवि ग्रहण करता है । वह विष्णु के लिए ही हवि ग्रहण करता है । यज्ञ के लिए, अर्थात् यज्ञ - साधक सोम के लिए, हवि ग्रहण कर रहा है भौर बोल रहा है- " विष्णवेत्वा " । इससे भ्रम में नहीं पड़ जाना चाहिए । क्योंकि यज्ञ और विष्णु दोनों एक ही हैं— " अथ यद् विष्णवे त्वा विष्णवे त्वेति गृह्णाति । विष्णवे हि गृह्णाति यो यज्ञाय गृह्णाति ॥१४ ॥
“ नवकपालः पुरोडाशो भवति " । इस आतिथ्य - इष्टि से नवकपाल पुरोडाश होता है । आतिथ्येष्टि में नवकपाल पुरोडाश क्यों करना चाहिए, इसकी उपपत्ति बतलाते हैं । [ ५३३ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शेतपंथं ब्राह्मण श्रातिथ्येष्टि ब्राह्मणं यह जो आतिथ्य - कर्म है, वह यज्ञ का मस्तक है । प्रायणीय और उदयनीय यज्ञ - पुरुष के दोनों हाथ हैं एवं दोनों के बीच में होने वाला आतिथ्य - यज्ञ मस्तक - स्थानीय है । जैसा कि ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही बतला दिया गया है-" शिरो वै यज्ञस्यातिथ्यम् " । गायत्री छन्द नवाक्षर होता है । प्राठ प्रक्षर तो वे हैं जो कि अनुवाक्या मन्त्र में बोले जाते हैं, जिनका कि अनुवचन होता है । गायत्री का असली स्वरूप आठ ही अक्षर का है । अतएव " अष्टाक्षरा गायत्री " कहा जाता है एवं प्रणव अर्थात् श्रोंकार इस गायत्री छन्द का नवाक्षर हो जाता है । चूँकि गायत्री नवाक्षर है, अतएव नवकपाल ही पुरोडाश किया जाता है-" नवाक्षरा वं गायत्री अष्टौ तानि यान्यन्वाह । प्ररणवो नवमः " । वादी पूर्वपक्ष कहता है कि - गायत्री से ही क्यों प्रातिथ्येष्टि की जाती है? उष्णिक, जगती, बृहती आदि छन्दों से क्यों न आतिथ्येटि कर ली जाए? - इसी का समाधान करते हैं । प्राकृतिक यज्ञ - मण्डल का यह गायत्री छन्द पूर्वार्द्ध है । पश्चिमार्द्ध और पूर्वार्द्ध - इस प्रकार पुरुष वार - यज्ञ - पुरुष के दो विभाग हैं । इसमें जो गायत्री है वह इस यज्ञ का पूर्वार्द्ध है । पृथिवी से लेकर ३३ तक का जो वाङ्मण्डल है, इसी कला यज्ञमण्डल है । उसी यज्ञमण्डल में अग्नि और सोम दो विभाग हैं । २१ तक अग्नि है । ३३ तक सोम है । इसमें जो २१ तक जाने वाला अग्नि है वह घन, तरल, विरल अवस्था - भेद से अग्नि, वायु, आदित्य तीन स्वरूपों में परिणत हो रहा है । तीनों में अग्नि पृथिवीलोक का अधिष्ठाता है । इसके छन्द का नाम गायत्री है । वायु अन्तरिक्ष- लोक का अधिष्ठाता है । इसके छन्द का त्रिष्टुप् है । आदित्य द्युलोक के अधिष्ठाता हैं । इनके छन्द का नाम जगती छन्द है । इस प्रकार तीनों के तीन छन्द हैं । तीनों में सबसे पहला गायत्री छन्द है । यही यज्ञ - पुरुष का पूर्वार्द्ध है, अर्थात् मस्तक - भाग है । एवमेव यह जो आतिथ्य है, वह भी उस यज्ञ - पुरुष का पूर्वाद्धं ही है । मस्तक भाग ही को तो पूर्वार्द्ध कहते हैं । चूंकि मस्तक - स्थानीय यज्ञ - पुरुष के पूर्वार्द्ध के आतिथ्य का यजन करना है, श्रतएव प्राकृतिक यज्ञ का जो पूर्वार्द्ध - भाग है, अर्थात् गायत्री है, उसी से आतिथ्येष्टि करना युक्त है । मस्तक में ६ प्राण होते हैं । अतएव अष्टाक्षरा गायत्री में एक प्रणव और बढ़ा कर नवाक्षरा बना दिया जाता है । प्राजापत्य, वायव्य, ऐन्द्र भेदेन प्रारण तीन ही प्रकार के हैं । प्रकृति - मण्डल में चूँकि तीन प्रारण हैं अतएव अध्यात्म में भी तीन ही प्राण रहते हैं । जो प्राजापत्य प्रारण है, वह तो पृथिवी का श्राग्नेय प्राण है, जो कि पृथिवी के केन्द्र में रहता है । जिसके लिए कि कहा जाता है— " प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरदृश्यमानो बहुधा वि जायते " । ( अथर्ववेद १०।४।८।१३ ) [ ५३४ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ०४ ) शतपथ ब्राह्मणं प्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण इसी का नाम वैश्वानराग्नि है । यह आलोमभ्यः - प्रानखाग्रेभ्यः व्याप्त रहता है । शरीर में जहाँ हाथ लगाया जाता है, वहीं गरमी मालूम होती है । वह यही प्राजापत्य प्राण है जिसे कि वैश्वानराग्नि कहेंगे । दूसरा है वायव्य प्राण । हम जो श्वास - प्रश्वास लेते हैं, जिससे कि प्राजापत्य और ऐन्द्रप्राण की स्थिति रहती है, वही वायव्य प्राण है । इसे ही वामन भगवान् कहते हैं । तीसरा है ऐन्द्र प्राण । यह विज्ञान, प्रज्ञान स्वरूप में परिणत हो, शिरोगुहा में रहता है । विज्ञान चिदनुगृहीत सौरप्राण का नाम है एवं चिदनुगृहीत महान् का नाम प्रज्ञान है । प्रज्ञान और विज्ञान दोनों परस्पर अनुस्यूत रहते हैं । न विज्ञान, बिना प्रज्ञान के रहता है; न प्रज्ञान, बिना विज्ञान के रहता है । अतएव " यो वं प्रज्ञा स प्राणः " । या वा प्रज्ञा स प्राणः । " - यह कहा जाता है । ये प्रज्ञान और विज्ञान दोनों मस्तक में रहते हैं । इस प्रकार दो प्रारण तो मस्तक में रहते हैं एवं सात प्राण मुख नासिका में रहते हैं । दो कान, दो आँखें, दो नासिका छिद्र, एक मुख - इन सातों के सात प्राण भी मस्तक ही में रहतें । इस प्रकार इन सातों को मिला कर कुल 8 प्राण हो जाते हैं । इन ε वों में विज्ञान के अधीन प्रज्ञान है । प्रज्ञान के अधीन सातों प्राण हैं अतएव इन सातों को " प्रारण " शब्द से व्यवहृत किया जाता है । प्रज्ञान मुख्य प्राण शब्द से व्यवहृत किया जाता है । सारे प्रपंच से बतलाना यही है कि मस्तक में 8 प्राण रहते हैं । मस्तक पुरुष का पूर्वार्द्ध है । उधर प्रातिथ्य - यज्ञ मस्तक - स्थानीय ही है एवं गायत्री भी यज्ञ का पूर्वार्द्ध है | चूँकि पूर्वार्द्ध ( मस्तक ) ६ प्राणों से युक्त होता है । अतएव इस नवधा प्राण - सम्पत्ति के लिए अष्टाक्षरा गायत्री में एक प्ररणव और मिला दिया जाता है । नवाक्षर गायत्री से होने वाली प्रतिध्येष्टि में नव - कपाल - पुरोडाश की यही उपपत्ति है । इसी को लक्ष्य में रख कर याज्ञवल्क्य कहते हैं—
" पूर्वार्धो वै यज्ञस्य गायत्री । पूर्वार्ध एष ( आतिथ्य यज्ञः ) यज्ञस्य ।
तस्मान्नवकपालः पुरोडाशो भवति ॥ १५ ॥
" प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या " यह सिद्धान्त है । जो - जो काम प्रकृति - यज्ञ में होते हैं वे - वे विकृति यज्ञ में भी करने पड़ते हैं । प्रातिथ्यादि इष्टियों की प्रकृति दर्शपूर्णमास है । जो -- जो काम दर्शपूर्ण - मास में होते हैं वे ही विकृत - यज्ञस्वरूप आतिथ्यादि इष्टियों में भी होते हैं । प्रकृति - यज्ञ में ग्राहवनीय कुण्ड के तीन ओर लकड़ी की परिधि लगाई जाती है । परिधि क्यों लगाई जाती है? इसकी उपपत्ति दर्शपूर्ण -मास में ही बतला दी गई है । दर्शपूर्णमास में पलाश, खदिर, प्लक्ष, वट, अश्वत्थ, उदुम्बर, कुमुक ( सुपारी ) वरण, बिल्व, शमीगर्भ, विकङ्कत, काश्मर्य, सरल, साल, देवदारु, चन्दन, इत्यादि जितने भी यज्ञिय वृक्ष हैं उन सब में से चाहे जिसकी परिधियाँ बनाली जाती हैं । यह प्रातिथ्येष्टि पूर्णमास की विकृति है । प्रतएव – " प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या ' के अनुसार इसमें भी परिधि के विषय में कामचार प्राप्त होता है । उसका नियमन करने के लिए कहते हैं । [ ५३५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण प्रतिष्येष्टि ब्राह्मण " कार्यमयाः परिधयः " । आतिथ्येष्टि में काश्मर्यमय परिधियाँ ही होती हैं । यही प्रकृति - यज्ञ से इसमें विशेषता है । काष्र्य ही क्यों होती है? इसका कारण बतलाते हैं । याज्ञिक महर्षि विद्वानों ने, जो कि देवतापद वाच्य हैं, यच्चयावत् वनस्पतियों में इस कामयं को ही रक्षोघ्न देखा । राक्षसों का नाम है नाष्ट्रा । वायु में जो प्रासुरप्राण व्याप्त रहते हैं उन्हीं का नाम नाष्ट्रा है । नाष्ट्रा को ही मस्तक कहते हैं । इनके प्रविष्ट होते ही दिव्यभाव नष्ट हो जाता है । और - और जितने भी यज्ञिय वृक्ष हैं उन सब के अवयव श्लथ रहते हैं । अतएव उनमें वायु को घुसने का मौका मिल जाता है । वायु के घुसते ही उसमें रहने वाले राक्षस भी अर्थात् नाशक प्रारण भी घुस जाते हैं । इन सब काष्ठों में एक कामय अर्थात् भद्रपर्णी ही ऐसा वृक्ष है जिसमें वायु असर नहीं कर सकता । यह वृक्ष अत्यन्त गरम होता है । गर्मी में वायु को घुसने का मौका नहीं मिलता । यह वृक्ष अत्यन्त गरम है, अतएव कहा जाता है— है-गम्भारी मधुरा तिक्ता कषाया कटुका गुरुः दीपनी पाचनी मेध्योष्णवीर्या मेदिनी तथा । विपाक मधुरं ग्राहि वातलं रक्तदोषहृत् गम्भारी मूलमत्युष्णं मानुषेषु हितं नतत् । इति यही वृक्ष श्रीपर्णी, भद्रपर्णी, स्निग्धपर्णी, मधुपर्णी, इत्यादि नामों से प्रसिद्ध है । यहाँ सिर्फ इतना ही कहना है कि यह वृक्ष गरम है । प्राग्नेय में प्रासुर प्रारण नहीं घुस सकता । वैज्ञानिक विद्वानों ने परीक्षा करके निश्चय कर लिया है कि सौर याज्ञिक वृक्षों में यह काष्मर्य वृक्ष रक्षोघ्न है, राक्षसों को मारने वाला है । आसुर प्रारण को इसमें घुसने का मौका नहीं मिल सकता— " देवा ह वाऽएतं वनस्पतिषु राक्षोघ्नं ददृशुर्यत्कार्यम् " । यह आतिथ्य - यज्ञ यज्ञ - पुरुष का मस्तक है । आज इस यज्ञ द्वारा मस्तक बनाया जा रहा है । यह बड़ा ही नाजुक काम है । इस बीच में ही राक्षस लोग यज्ञ के इस मस्तक को नष्ट न कर डालें, अतएव रक्षा के लिए रक्षोघ्नस्वरूप काष्मर्य परिधियाँ ही होती हैं— “ शिरो वै यज्ञस्यातिथ्यम् । नेच्छिरो यज्ञस्य नाष्ट्रा रक्षांसि हिनसन्— इति । तस्मात् कार्ष्ममयाः परिधयो भवन्ति ॥ १६ ॥
प्रकृति - यज्ञ में प्रस्तर कुशा का होता है । वही इस विकृति - यज्ञ में भी प्राप्त था । उसका अव-रोध कर, उसमें भी विशेषता बतलाते हैं । यद्यपि आतिथ्येष्टि के विकृति - याग होने के कारण कुशा के प्रस्तर की नियमतः प्राप्ति थी परन्तु इसमें कुशा का प्रस्तर नहीं होता अपितु " श्राश्ववाल " का प्रस्तर होता है । घोड़े के बाल के समान अतिसूक्ष्म पुच्छ - रूप में उगने वाले जो तृण विशेष हैं, उन्हें ही — " श्राश्ववाल " कहते हैं । उसी का प्रस्तर होना चाहिए-[ ५३६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मणं प्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण " आश्ववालः प्रस्तरः " । श्राश्ववाल प्रस्तर ही क्यों होना चाहिए - इसका कारण बतलाते हैं । यज्ञ, देवतानों से अपक्रमण कर गया एवं वह अश्व बन कर देवताओं से बहुत दूर चला गया । श्रग्नि को ही यज्ञ कहते हैं । यह अग्नि पृथिवी केन्द्र में रहता है एवं पृथिवी के केन्द्र से ऊपर जाता रहता है । इसी के लिए –— कहा जाता है— " इत एत उदारुहन् दिवः पृष्ठान्या रुहन् । प्र भूर्जयो यथा पथोद्यामङ्गिरसो ययुः " ॥ ( सामवेद पू ० १।१०।२ ) यह अंगिरा अग्नि अश्वरूप में परिणत होकर ही पृथिवी से निकलता है । पृथिवी प्रातिस्विकरूपेण सर्वथा काली है । इस पर सूर्य्य का प्रकाश पड़ता है । पृथिवी के श्राधे भाग पर प्रकाश पड़ता है, आधे पर अन्धकार रहता है । इस पृथिवी के अन्धकार भाग को काट कर सौर प्रकाश बड़ी दूर तक लोका-लोक तक गया हुआ है । प्रकाश से कटे हुए अन्धकार को ही राहु कहते हैं । जितनी दूर तक सूर्य का प्रकाश नहीं जाता है वहाँ से वह प्रतिफलित हो उसी आकार में परिणत हो कर पृथिवी से ऊपर सूर्य्य की ओर चला जाता है । जिस समय आदित्य - रश्मि पृथिवी पर आती है एवं प्रतिफलित होकर – अश्वरूप परिणत हो कर - ऊपर की ओर जाती है, उस समय पृथिवी का अंगिरा भी उसके साथ चला जाता है । बस, यही यज्ञ - रूप अग्नि का अश्वरूप बन कर पार्थिव देवताओं से अभिक्रमण कर जाना है । वह यज्ञ अश्व बन कर बड़ी दूर तक चला जाता है, पृथिवी को छोड़ कर द्युलोक में चला जाता है । इसी लिए " द्यामंगिरसो ययुः " कहा जाता है । बस इसी प्रश्व से संसार के यच्चयावत् पदार्थों की उत्पत्ति होती है । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं— " यज्ञो ह देवेभ्योऽपचक्राम । सोऽश्वो भूत्वा पराङाववर्त " । देवता लोग उसकी खोज करने लगे । आखिर देवताओं को मालूम हो गया कि यह यज्ञ अश्व बन कर भाग रहा है । बस झट से देवताओं ने उस पर आक्रमण कर उसकी पूँछ के बालों को नोच लिया । नोच कर उस समष्टि को ही जमीन में गाड़ दिया । बस वही अश्व - पुच्छ के बाल इस प्रौषधिरूप में उत्पन्न हुए जो कि ठीक पुच्छ के आकार के होने के कारण " श्राश्ववाल " नाम से प्रसिद्ध हैं । इसी प्रश्व से सब कुछ पैदा होता है । अश्व के पुच्छ भाग से ही पार्थिव औषधियाँ पैदा होती हैं । अश्व में प्रारण अनन्त हैं । वह अग्नि जो कि अश्व - रूप में परिणत हो एकान्ततः उच्छिन्न हो कर जाना चाहता था, उसे पृथिवी के केन्द्र में बैठे हुए भगवान प्रजापति पकड़े रहते हैं । अश्व के ऊपर का हिस्सा यद्यपि द्यौलोक की ओर ( २१ तक ) चला जाता है परन्तु इसका पुच्छ भाग प्रजापति की पकड़ मे ही रहता है । यही पुच्छ - भाग अर्थात् अंगिरा - यज्ञ पार्थिव पदार्थों की उत्पत्ति का कारण बनता है । पृथिवी से २१ तक वितत होने वाला जो संवत्सराग्नि है, वही अश्व है । इसी को [ ५३७ ]
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तृतीय काण्ड अ ०, ४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण संवत्सर- मण्डल कहते हैं । इसी से यच्चयावत् जड़ - चेतन की सृष्टि होती है । इसके पैर पृथिवी में हैं । अतएव सूर्य्य को इस अश्व का चक्षु बतलाया जाता है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-" उषा वाऽअश्वस्य मेध्यस्य शिरः । सूर्य्यश्चक्षुर्वातः प्राणो व्यात्त-मग्निवैश्वानरः । संवत्सर आत्माश्वस्य मेध्यस्य द्यौस्पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं पृथिवी पाजस्यं दिशः पार्श्वेऽप्रवान्तरदिशः पर्शव " – इत्यादि । ( शत ० १० । ६ । ४ । १ ) इससे सिद्ध हो जाता है कि पृथिवी से निकलने वाला, प्रतिफलित आदित्य के साथ जाने वाला घन - तरल - विरल रूप में परिणत हो कर २१ अहर्गण तक अर्थात् सूर्य्यं तक वितत होने वाला जो संवत्स-राग्नि है ' वही अश्व है । इससे सब कुछ पैदा होता है । चूंकि इससे सूर्य सम्बन्ध से नाना प्राणों का सम्बन्ध हो जाता है अतएव पदार्थ भी नाना प्रकार के ही उत्पन्न होते हैं । इसका जो पृष्ठ भाग है उसके प्राण से “ प्राश्ववाल ” औषधि उत्पन्न होती है । प्राकृतिक अश्व के पृष्ठ - प्राण से " प्राश्ववाल " उत्पन्न हुए हैं इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि यह औषधि ठीक अश्व की पूँछ के आकार की है, श्रतएव मानना पड़ता है कि श्राश्ववाल में अवश्य ही अश्व का पुच्छ - प्रारण है । इस उत्पत्ति के कारण यही पार्थिव प्रजा-पति देवता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर याज्ञवल्क्य कहते हैं-" तस्य देवा अनुहाय ( आक्राम्य ) वालानभिपेदुः । तानालुलुपुः । ताना-लुप्य सार्द्धं सन्यासुः । तत एता ओषधयः समभवन् यदश्ववालाः ” भारतीय यज्ञ - रहस्य - वेत्ता इस प्राकृतिक सृष्टि - विज्ञान से परिचित थे, वे जानते थे कि यज्ञस्वरूप अश्व के पुच्छ - प्राण से वह प्राश्ववाल औषधि उत्पन्न हुई है । श्रतएव यज्ञ - संपत्ति को सर्वात्मना पूरी करने के लिए उन्होंने आतिथ्येष्टि में इसका विधान कर दिया । यह श्रातिथ्य - यज्ञ यज्ञ - पुरुष का मस्तक है एवं आश्ववाल उस प्राकृतिक यज्ञ - पुरुष का पृष्ठ-भाग है । प्रातिथ्य पूर्वार्ध हैं, श्राश्ववाल पश्चिमाधं है । बस, सारा यज्ञ हमारी पकड़ में ना जाय, यज्ञ-स्वरूप सर्वात्मना सम्पन्न हो जाय, श्रतएव आश्ववाल का मस्तक बनाया जाता है । आतिथ्य - यज्ञ बिना कंधों के, पृष्ट - भाग के, आधा है । यदि आश्ववाल का सम्बन्ध कर दिया जाता है तो यज्ञ का स्वरूप पूरा बन जाता है । जो यजमान श्रातिथ्येष्टि में श्राश्ववाल का प्रस्तर करता है, वह इस यज्ञ को पृष्ठ श्रीर मुख दोनों ओर से गृहीत कर उसे पूरा सम्पन्न करता है, अधूरे यज्ञ को पूरा करता है । बस श्राश्ववाल - प्रस्तर बनाने की यही उपपत्ति है । शिरो वै यज्ञस्यातिथ्यम् । जघनार्थो ( पश्चिमार्धी ) वालाः । उभयत एवै -तद्यज्ञं परिगृह्णाति - यदाश्ववालः प्रस्तरो भवति ॥ १७ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण आतिथ्येष्टि ब्राह्मण प्रकृति - यज्ञ में विघृति कुशा की होती है परन्तु यहाँ सांठे ( इक्षु, गन्ने ) के पत्ते की विघृति होनी चाहिए । वेदी पर सबसे पहले कुशास्तरण किया जाता है । बाद में दो कुशाएँ उत्तराग्र मुख करके उस प्रस्तर पर रक्खी जाती हैं । इन दोनों पर पूर्वाग्रमुख करके प्रस्तर रक्खा जाता है । आश्ववाल भी सूक्ष्म हैं । ऐसी अवस्था में यदि विधृति भी सूक्ष्म ही ( कुशा की ही ) रक्खी जाएगी तो विधृति और प्रस्तर दोनों घिल-मिल हो जाएँगे । ऐसी अवस्था में, सम्भव है, प्रस्तर उठाते समय विधृति और बहि भी साथ चली जाए । यदि प्रस्तर के साथ विधृति और बह चली जाएगी तो यज्ञ ही नष्ट हो जाएगा । ऐसा न हो, बहि और प्रस्तर घिलमिल न होने पाएँ, दोनों का विभाग साफ देखने में आए अतएव ऐक्षव्यौ विघृती होती है । वास्तव में बात ठीक हैं । यदि कुशा की ही हि बन जाएगी, कुशा की ही विधृति भी बन जाएगी तो सूक्ष्म प्राश्ववाल के प्रस्तर को पहचानना कठिन हो जाएगा । इस पहचान के लिए विधृति साँठों के पत्तों की करनी चाहिए-" ऐक्षव्यौ विधृती । नेद् बहिश्च प्रस्तरश्च संलुभ्यात ( तस्मादेक्षव्यौ कर्त्तव्ये - इति भावः ) " । प्रकृति - यज्ञ में जुहू और ध्रुवा इन दोनों में प्राज्यस्थाली में से चार - चार बार करके धृत लिया जाता है | और उपभृत् में आठ बार करके लिया जाता है । अनुयाज इष्टि में चार अधिक, अनुयाज के लिए लिया जाता है परन्तु इस श्रातिथ्येष्टि में सारे ग्राज्य, जुहू, उपभृत्, ध्रुवा तीनों में ही चतुर्गृहीत होते हैं । श्रर्थात् प्रकृतिवत् यहाँ उपभृत में आठ बार घृत नहीं लिया जाता अपितु जुहू - उपभृत् - ध्रुवा -तीनों में ही चार - चार बार धृत लिया जाता है । कारण इसका यही है कि यहाँ अनुयाज कर्म नहीं होता अनुयाज यज्ञसमाप्ति पर होता है । अभी सोमयज्ञ समाप्त नहीं हुआ है । अतएव यहाँ अनुयाजस्थानीय उप-भृव ४ अधिक ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है । घृत - ग्रहण से पहले घृत का जो निरीक्षण है उसे उपायन कहते हैं । घृत में और कुछ तृणादि तो नहीं पड़े हुए हैं इसलिए पहले उसे देख लिया जाता है । इस प्रकार यह ध्वर्यु श्राज्य को देख कर जुहू - उपभृत - ध्रुवा सारे ही अनुगृहीत प्राज्य ग्रहण करता है । प्रकृतिवार यहाँ उपभृत में भी आठ बार न ले कर चार बार ही लिया जाता है । कारण इसका यही है कि इस कर्म में " अनुयाज " नहीं होता । " थोत्याज्यं, सर्वाण्येव चतुर्गृहीतान्याज्यानि गृह्णाति । न ह्यत्रानुयाजा भवन्ति " ॥ १८ ॥
इसके अनन्तर उस नवकपाल पुरोडाशहवि को प्रस्तर पर रख कर यथावत् सामग्री संभृत कर फिर अग्निमन्थन करता है । अग्नि - मन्थन करना प्रजा को उत्पन्न करना है । प्रकृति में जब परमेश्वर बच्चा उत्पन्न करता है तो पहले माता के स्तनों में उस उत्पत्स्य ( जन्म लेने वाले ) के लिए दूध उत्पन्न करता है । अन्न पहले उत्पन्न करता है, अन्नाद को बाद में उत्पन्न करता है । प्रकृति [ ५३६ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रातिथ्येष्टि ब्राह्मणं में अन्न ( दूध ) पहले उत्पन्न होता है अतएव अग्निस्वरूप प्रजा को उत्पन्न करता हुआ यह अध्वर्यु उसकी उत्पत्ति से पूर्व दुग्धान्नस्वरूप हवि को प्रस्तर पर रख देता है । अग्निमन्थन से पहले हवि - श्रासादन का यही कारण है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" आसाद्य हवींष्यग्नि मन्थति " । पूर्व की जो और - और इष्टियाँ थीं उनमें अग्निमन्थन नहीं होता अपितु पूर्व के मथित अग्नि से ही काम ले लिया जाता है । ऐसी अवस्था में प्रातिथ्येष्टि में अग्निमन्थन की क्या आवश्यकता है? क्यों न पूर्व के अग्नि से ही काम ले लिया जाए? इसका समाधान करते हैं. यह जो आतिथ्य है वह यज्ञ का मस्तक स्थानापन्न । यज्ञ का मस्तक प्रातिथ्य है - यह यज्ञ अग्नि-स्वरूप ही है । अग्नि का ही नाम तो यज्ञ है । वास्तव में अग्नि यज्ञस्वरूप है । अग्नि में जब सोमा-हुति डाली जाती है तो यज्ञ होता है । यज्ञ का सोमाहुति का आधार अग्नि है । अतः हम अवश्य ही अग्नि को यज्ञ कहने के लिए तैय्यार हैं । तो अग्नि को जो उत्पन्न करना है, वह यज्ञ को ही तो उत्पन्न करना है । जिस यज्ञपुरुष का मस्तक आतिथ्य को बतलाया जाता है । यह यज्ञ अग्निस्वरूप है । अतएव प्रातिथ्य के लिए यज्ञ - मस्तक के लिए यज्ञस्वरूप अग्नि को ही पहले ही उत्पन्न करना चाहिए । यदि अग्नि पैदा नहीं होगा तो प्रातिथ्यस्वरूप यज्ञमस्तक ही उत्पन्न नहीं होगा । जो ऋत्विक् लोग इस अग्नि का मन्थन करते हैं, वे इस यज्ञ को ही उत्पन्न करते हैं । अग्नि को उत्पन्न करना यज्ञस्वरूप को उत्पन्न करना है -“ शिरो वै यज्ञस्यातिथ्यम् । जनयन्ति वाऽएनं ( यज्ञम् ) एतद्यन्मन्थन्ति ( अग्नि ऋत्विजः -- इति शेषः ) " । पैदा होने वाला प्राणी पहले मस्तक की ओर से ही पैदा होता है । प्राकृतिक प्रजनन में पहले बच्चे का मस्तक बनता है । मस्तक का स्वरूप अग्नि से बनता है । पार्थिवादि भेदेन अग्नि दो प्रकार का है । दिव्यानि मस्तक में रहता है । इसे ही सौराग्नि भी कहते हैं । इस आग्नेय - प्रारण के बल से ही अध्वर्यु सबसे पहले मस्तक का निर्माण करता है । मस्तक - प्राण की पुष्टि यही आग्नेय प्राण करता है, चूंकि प्राकृतिक उत्पत्ति क्रम में पैदा होने वाला बच्चा मस्तक की ओर से ही होता है । यह आतिथ्य मस्तक - स्थानापन्न है अतः इसमें अग्नि को उत्पन्न करता हुआ मस्तक की ओर से ही पहले यज्ञपुरुष को उत्पन्न करता है । प्रातिथ्य - मस्तक अग्निप्राण से उत्पन्न होता है । ऐसी अवस्था में आतिथ्ययज्ञ में जो कि मस्तकस्वरूप है, यदि अग्नि का मन्थन कर उसमें आग्नेय प्राण का प्रधान न किया जाएगा तो आगे के अवयव ही न बनेंगे । जब मस्तक ही कच्चा रह जाएगा तो ऐसी अवस्था में यज्ञ - पुरुष को उत्पन्न करने के लिए अग्निमन्थन किया जाता है । अथवा इसका अर्थ यह समझना चाहिए कि अग्नि यज्ञ है, प्रतिध्य मस्तक है । प्रकृति - प्रजनन में बच्चे का पहले [ ५४० ]