Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 551–560
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 551–560
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण आतिथ्येष्टि ब्राह्मण मस्तक उत्पन्न होता है । पाँव की ओर से तो कोई विरला ही उत्पन्न होता है । अतः प्रातिथ्य, यज्ञ का मस्तक है । यज्ञ अग्निस्वरूप है तो आतिथ्य में अग्निमन्थन द्वारा अग्नि उत्पन्न करना दिव्यपुरुष को -यज्ञात्मा को - प्रकृतिवत् पहले मस्तक की ओर से ही उत्पन्न करना है । बस, अग्निमन्थन का यही कारण है-" शीर्षतो वाऽग्रे जायमानो जायते शीर्षत । एवैतदग्रे यज्ञं जनयति ( यः अतिथ्येऽग्निमन्थति ) - इति शेषः " । अपि च अग्नि ही में सारे देवता हैं । वास्तव में अग्नि ही सर्व - देवता - स्वरूप है । श्रग्नि की घन-तरलादि जो ३३ अवस्थाएं हैं, उन्हीं को तो ३३ देवता कहते हैं । आग्नेय प्राण का ही नाम देवता है । सर्व देवता अग्निमूलक ही हैं । इसीलिए तो ३३ देवतानों के लिए अग्नि में ही आहुति दे देते हैं । इन्द्र- वरुण - सोम - वसु- श्रादित्य जिस किसी को भी प्राहुति देनी होती है— अग्नि में दे दी जाती हैं । यही अग्नि के सर्वदैवत्य भाव का प्रत्यक्ष प्रमाण है । यह जो प्रातिथ्य - यज्ञ है, वह यज्ञ - पुरुष मस्तक है । बस, श्रातिथ्य में अग्नि मन्त्रदाता मस्तक की ओर से ही इस यज्ञ को सारे देवताओं से समृद्ध करता है । अग्नि को उत्पन्न करना सारे देवताओं को उत्पन्न करना है, यही तात्पर्य्य है । एवं ऐसा करने से यजमान का यज्ञ सारे देवताओं से समृद्ध हो जाता है । सारे देवप्राण यजमान के यज्ञ में प्रविष्ट हो जाते हैं । इससे अधिक और क्या समृद्धि हो सकती है? बस, श्रातिथ्य - इष्टि में अग्निमन्थन की यही उपपत्ति है— " अग्निर्वै सर्वा देवता । अग्नौ हि सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुह्वति । शिरो वै यज्ञस्यातिथ्यम् । शीर्षत एवैतद्यज्ञं सर्वाभिर्देवताभिः समर्धयति । तस्मादग्नि मन्थति ॥ १ ९ ॥ काष्ठ के जो छिलके होते हैं जिन्हें कि भाषा में छोडे कहते हैं उन्हीं का वैदिक नाम " श्रधि-मन्थनशकल " है | ये छोडे सामान्य लकड़ी के नहीं होते । अपितु यूप तैयार करते समय जो काष्ठत्वक् उतरते हैं वही अधिमन्थन - शकल कहलाते हैं । ये शकल ( काष्ठ ) अग्नि को जरा जल्दी पकड़ लेते हैं । अतएव इनको नीचे रख दिया जाता है उन पर अग्निमन्थन होता है । अग्नि जल्दी प्रज्वलित हो जाता है अतएव इन्हें मन्थन - क्रिया में शामिल कर लिया जाता है । यही तात्पर्य है । वह अध्वर्यु " श्रग्नेर्जनित्रमसि " । यह कहता हुआ अधिमन्थन शकल को अपने हाथ में उठाता है । हे अधिमन्थनशकल, आप अग्नि को उत्पन्न करने वाले हैं, आप ही पर अग्नि उत्पन्न होगा, प्रज्वलित होगा - ऐसे आपको में उठा सकू ँ यही तात्पर्य है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-५४१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मग प्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण
" अत्र ह्यग्निर्जायते । तस्मादाह अग्नेर्जनित्रमसीति ॥ २० ॥
इसके बाद " वृषणौ स्थ " बोलता हुआ अध्वर्यु दो डाब के कोमल पत्ते, दो प्रति मुलायम हरी डाब, जमीन पर रख देता है । वे दोनों समानाकार होने चाहिए । -" अथ दर्भतरुणके ( कोमलौ परस्परसदृशौ दभौं ) निदधाति " । हे दतरुणको! आप अभिमत फल को बरसाने वाले हैं - यज्ञ - फल देने वाले हैं । यही ' वृषरणौ स्थ " का तात्पर्य्यं है । दो दर्भतरुणक रखने की क्या आवश्यकता है? यह बतलाते हैं । लोक में जैसे किसी के दो जोड़ले ( जुड़वाँ ) पुत्र होते हैं, निदानेन यह बह भी वैसे ही जोड़ले ( जुडवां पुत्र ) हैं । इसीलिए प्रजननशक्त्याधिक्यार्थ दो कुशाएँ रक्खी जाती हैं, यही तात्पर्य है । पैदा होते समय बच्चा कोमल होता है अतएव यहाँ जातस्थानीय दर्भ कोमल ही ली जाती है-" तद्यावेवमौ ( लोकस्थौ ) स्त्रियं ( स्त्रियाः ) साकञ्जौ ( सहोत्पन्नौ । निदानेन ) एतावेवैतौ ” ॥२१ ॥
अग्निमन्थन अरण से किया जाता है । एक अरणि नीचे रहती है, एक उसके ऊपर रहती है । दोनों ही २४ - २४ अंगुल की रहती हैं । जो नीचे की अरणि है उसे अधरारणि कहा जाता है । ऊपर की श्ररण को उत्तरारणि कहा जाता है । हम पद्धति बतलाएँ इससे पहले थोड़ा सा इतिहास जान लेना आवश्यक है । चन्द्रवंश के आदिपुरुष महाराजा पुरूरवा थे । यह चन्द्रमा के पौत्र थे एवं बुध के पुत्र थे । पुरूरवा से उर्वशी अप्सरा में आयु महाराज उत्पन्न हुए थे । यह आयु महाराज प्रतिष्ठानपुर के राजा थे । प्रति-ष्ठानपुर ईरान में था । आयु के पुत्र महाराजा रजि हुए । रजि के पुत्र नहुष हुए । नहुष के पुत्र ययाति हुए । ययाति इस ईरान वाले प्रतिष्ठानपुर को छोड़ कर प्रयाग में आ बसे । " अन्य देशे कृतं पापं तीर्थ देशे प्रमुच्यते । तीर्थ देशे कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति ” ॥ ( सूक्ति ) इस प्रकार स्मृतिकार, तीर्थ पर गृहस्थ बसा कर रहना अनुचित बतलाते हैं । अतएव ययाति महाराज ने प्रयास से हट कर अपना निवासस्थान बनाया । चूंकि उनकी ईरानवाली राजधानी का नाम " प्रतिष्ठानपुर " था अतएव उन्होंने इसका नाम भी प्रतिष्ठानपुर रख दिया । इस रहस्य से अपरिचित हो कर ही ग्राज अंग्रेज इतिहासकार इसी को असली प्रतिष्ठानपुर मान बैठे हैं । परन्तु यह उनकी सरासर भूल है । वास्तव में असली प्रतिष्ठानपुर कौन सा है, इसका विस्तृत विवेचन " त्रिख्याति " में देखना चाहिए । [ ५४२ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण वस्तुतः प्रतिष्ठानपुर सिन्धु से २७ कोस पश्चिम में है । इसी के पास गन्धर्व रहते थे । यह प्रदेश गान्धार नाम से प्रसिद्ध था जिसे आज " कन्धार " कहा जाता है । गन्धर्व सोम के रक्षक थे । सोम से ही यज्ञ होता था । गन्धर्व उस यज्ञविद्या से परिचित हो गए थे जिससे भौमदेवता उत्तर कुरु में यज्ञ किया करते थे । पुरूरवा ने गन्धर्व मर्य्यादानुसार उर्वशी अप्सरा को, जो कि गन्धर्व जाति की थी, अपने साथ रख लिया था और उसके साथ गान्धर्व विवाह किया था । उसी से प्रायु महाराज उत्पन्न हुए थे । देवता लोग यज्ञ - विद्या को भारतवासी मनुष्यों से छुपाते थे । परन्तु पुरूरवा को गन्धर्वो द्वारा यज्ञ - रहस्य मालूम हो गया । उन्होंने - भारतवर्ष में यज्ञ - विद्या का आरम्भ किया । देवता लोग वैध अग्नि को पहचानते थे प्रतएव उन्हें अग्नि- मन्थन नहीं करना पड़ता था । परन्तु मनुष्य नहीं पहचानते थे, श्रतएव इस क्षति को पूरा करने के लिए महाराज पुरूरवा ने अग्निमन्थन का आविष्कार किया । २४ अंगुलि की अरणि बना कर उसके घर्षण से वैध अग्नि को उत्पन्न करने की तरकीब निकाल कर भारतवर्ष में उस देवविद्या का प्रचार किया । अग्निमन्थन - प्रक्रिया का आविष्कार पुरूरवा ने किया था । जैसे उन्होंने उर्वशी में से आयु को उत्पन्न किया था तथैव दोनों अरणियों से अग्नि को उत्पन्न किया था । अतएव उनकी प्रतिष्ठा के लिए आज हम उनका स्मरण करते हैं । अतएव वह प्रध्वर्यु " उर्वश्यसि " यह कहता हुआ अधराररिण को नीचे रख देता है । " अथाधराररिंग निदधाति - उर्वश्यसीति " । जिसमें श्राज्य तपाया जाता है, पिघलाया जाता है, उस स्थाली को " श्राज्य विलापिनी " कहते हैं । " प्रायुरसि " बोलता हुआ उसका उत्तरारणि से स्पर्श करा - " पुरूरवा असि " यह उच्चरित करता हुआ उस उत्तराणि को भी रख देता है— " थोत्तरारण्याज्यविलापनीमुपस्पृशति श्रायुरसीति । तामभिनिद-धाति - पुरूरवा असि - इति " । इसी पूर्वोक्त कथन का स्पष्टीकरण करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि उर्वशी नाम की अप्सरा थी । पुरूरवा उसके गन्धर्वसम्बन्धेन पति थे । प्रायु महाराज ही उनके मिथुन से उत्पन्न हुए थे । इसी प्रकार उत्तरारणि - अधरणि को पुरूरवा मान कर इस मिथुन से यजमान का प्रायुस्वरूप जो यज्ञ है अर्थात् अग्नि है, उसे उत्पन्न करता है । “ उर्वशी वाऽअप्सराः । पुरूरवाः पतिः । अथ यत्तस्मान्मिथुनादजायत-तदायुः । एवमेवैष - एतस्मान्मिथुनाद्यज्ञं जनयति " । [ ५४३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण इसके बाद ( अरण्यासादनानन्तर ) अध्वर्यु अनुवाक्या बोलने के लिए होता को प्रैष करता है और कहता है-“ अग्नये मथ्यमानायानुब्रूहि ” ॥२२ ॥
वह अध्वर्यु यह मन्त्र बोलता हुआ अग्निमन्थन करता है— " गायत्रेण त्वा च्छन्दसा मन्थामि त्रैष्टुभेन त्वा च्छन्दसा मन्थामि, जागतेन त्वा च्छन्दसा मन्थामि " । प्रत्येक देवता के लिए याज्या और अनुवाक्या दो - दो मन्त्र होते हैं और वे दोनों पृथक् - पृथक् होते हैं । परन्तु इस अग्निमन्थन कर्म में यही पूर्वोक्त मन्त्र याज्या है, यही अनुवाक्या है । इसे ही बोल कर होता अनुवाक्या करेगा और इसे ही बोल कर अध्वर्यु याज्या करेगा । छन्दों से ही तो मन्थन किया जाता है और छन्दों को शामिल करके ही " मध्यमानायानुब्रू हि " कहा जाता है । अर्थात् अनुवचन मन्त्र भी छन्दयुक्त ही हैं एवं याज्या मन्त्र भी छन्दोयुक्त ही हैं । दोनों के लिए वही मन्त्र है -" छन्दोभिरेव मन्थति । छन्दांसि मथ्यमानायान्वाह " । ऐसा कहता हुआ अध्वर्यु तीनों छन्दों को यज्ञ के अधीन करता है- अग्नि के अधीन करता है । जिस प्रकार श्रादित्य को रश्मियाँ नहीं छोड़तीं क्यों कि दोनों का प्रोत्पत्तिक सम्बन्ध है, एवमेव अग्नि - स्वरूप यज्ञ का और छन्दों का भी औत्पत्तिक सम्बन्ध ही है । रश्मियाँ जैसे आदित्य के अन्वायत्त हैं तथैव प्राकृतिक गायत्री आदि छन्द, अग्नि के तथा अग्नि, वायु - आदित्यावस्था के अन्वायत्त है, अधीन है । उस प्रौत्पत्तिक सम्बन्ध को बतलाने के लिए उसी से याज्या की जाती है और उसी से अनुवाक्या की जाती है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " छन्दांस्येवैतद्यज्ञमन्वायातयति यथाऽमुमादित्यं रश्मयः ( अन्वायत्ता इति शेषः ) " । इसके अनन्तर अध्वर्यु होता को जातायानुब्रूहि इति - यह प्रैष करता है । जब अग्नि उत्पन्न हो जाता है तो उसे ग्राहवनीय में रक्खा जाता है । आहवनीय में प्रह्रियमाण अर्थात् नीयमान जो अग्नि है— उसके लिए अनुप्रहरण करता हुआ अध्वर्युं प्रेष करता है कि हे होत:, तुम जात ( उत्पन्न ) के अनु-प्रहरण के लिए अनुवाक्या मन्त्र बोलो -" जातायानुब्रूहि - इत्याह । यदा जायते । प्रहियमारणाय ( निर्मथ्याग्नि-माहवनीये नीयमानाय ) इत्यनुप्रहरन् ( अनुब्रूहि इत्याह - इति शेषः ) " ॥२३ ॥
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तृतीय काण्ड ( प्र ० 2 ) शतपथ ब्राह्मण प्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण वह निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ निर्मथ्याग्नि को आहवनीय में रख देता है— है-“ भवतं नः समनसौ सचेतसावरेपसौ । मा यज्ञं हिंसिष्टं । मा यज्ञपति जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः " । हवनीय निम्याग्नि! आप हमारे लिए श्रभिमत फल देने हेतु समानमनस्क हो जाइए । परस्पर क्लेशरहित बनिए । आप समानस्थानीय हैं । आपका एक ही स्थान है । काष्ठ से मन्थन कर निकाला गया अग्नि यही दिव्याग्नि तो है । प्रतएव " समोकलौ " ( समान स्थानी ) कहा है । एवं श्राप प्रवरेपस अर्थात् पाप - रहित हो जाएँ । ऐसे जो श्राप हैं वे इस यज्ञ के यजमान की हिंसा मत करिए । आज आपका हमसे परस्पर परिचय हो गया है । आप जातप्रज्ञ हो गये हैं । ऐसे आप आज हमारे लिए सुखकर बनिए । इसका भावार्थं बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ये दोनों परस्पर लड़ न मरें-एक दूसरे की हिंसा न कर बैठें - यही प्रार्थना करता है— " शान्तिमेवाभ्यामेतद् वदति - य - यथा नाऽन्योऽन्यं हिस्याताम् " ॥२४ ॥
जब अग्नि का अनुप्रहरण हो जाता है, तो तदनन्तर वह अध्वर्यु मन्त्र बोलता हुआ स्रव में घृत ले कर ( उपहृत्य ) श्राहवनीयाग्नि की ओर झुक कर उसमें श्राज्याहुति डालता हुआ-" अथ स्रुवेणोपहत्याज्यम्, श्रग्निमभिजुहोति " । इस मन्त्र का उच्चारण करता है— " अग्नावग्निश्चरति प्रविष्ट ऋषीणां पुत्रोऽभिशस्तिपावा । स नः स्योनः सुयजा यजेह देवेभ्यो हव्यं सदमप्रयुच्छरस्वाहा ” । आज इस ग्राहवनीय अग्नि में " निर्मथित " अग्नि विचर रहा है । यह अग्नि ऋषियों का पुत्र है । ऋषिप्राण संघात से ही तो श्रग्नि- पुरुष उत्पन्न होता है । यह अग्नि निद्रा से बचाने वाला है । ऐसा जो यह अग्नि है, वह हमारे लिए प्रमादरहित हो कर, सदा देवताओं के लिए हव्य- वहन करे । ऐसे अग्नि के लिए यह द्रव्याग्नि आहुत हो । श्राज अध्वर्यु ने हुति के लिए ही ( देवताओं को हव्य पहुँचाने के लिए ही ) इस द्रव्याग्नि को उत्पन्न किया है । अत-एव इस प्रकृत मन्त्र को बोल कर आहुति देता है—
" प्राहुत्यै वाऽएतमजीजनत । तमेतयाहुत्याऽप्रेषीत् । तस्मादेवम-भिजुहोति ” ॥२५ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण आतिथ्येष्टि ब्राह्मरण यह कर्म इडा प्राशनान्त होता है । इसमें ऋत्विक् लोग अनुगाजों का यजन नहीं करते हैं । अनु-याज क्यों नहीं करते हैं- इसका कारण बतलाते हैं । यह प्रातिथ्य यज्ञ - पुरुष का मस्तक भाग है । मस्तक भाग पूर्वाधं को कहते हैं । भाज जो यह प्रातिथ्य यज्ञ किया जा रहा है उससे यजमान यज्ञ के पूर्वार्ध का ही संस्कार कर रहा है । अनुयाज यज्ञपुरुष का पश्चिम भाग है । बस, जो इस कर्म में अनुयाज करेगा वह ऐसा ही होगा, जैसे पाँवों को पकड़ कर माथे से जोड़ दिया जाए । छातः इसमें
इान्त ही कर्म होता है, अनुयाज- यजन नहीं होता ।
" तस्मादिडान्तं भवति । नानुयाजान्यजन्ति " ॥२६ ॥
॥ इति श्रातिथ्येष्टिब्राह्मणं समाप्तम् ॥
॥ इति चतुर्थाध्याये प्रथमं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥
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चतुर्थाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् ' तानूनप्त्र ब्राह्मण ' [ मूल ] प्रातिथ्येन वै देवा इष्ट्वा । तान्त्समदविन्दत्ते चतुर्धा व्यद्रव-न्नन्योऽन्यस्य श्रिया अतिष्ठमाना अग्निर्वसुभिः सोमो रुद्रवरुण श्रादित्यैरिन्द्रो मरुद्भि बृहस्पतिविश्वैर्देवैरित्यु हैकाहुरेते ह त्वेव ते विश्वे देवा ये ते चतुर्धा व्यद्रवंस्तान्वितानसुररक्षसान्यनु व्यवेयुः ॥ १ ॥
तेऽविदुः । पापीयांसो वै भवामोऽसुररक्षसानि वै नोऽनुव्यवागुद्विषयो वैरध्यामो हन्त संजानामहाऽएकस्य श्रियै तिष्ठामहाऽइति तऽइन्द्रस्य श्रियाऽप्रति-ष्ठन्त तस्मादाहुरिन्द्रः सर्वा देवता इन्द्र श्रेष्ठा देवा इति ॥२ ॥
तस्मादु ह न स्वा ऋतीयेरन् । य एषां परस्तरामिव भवति स एनान-नुव्यवैति ते प्रियं द्विषतां कुर्वन्ति द्विषद्भयो रध्यन्ति तस्मान्न तयेरन्त्स यो हैवं विद्वान्नर्तीयतेऽप्रियं द्विषतां करोति न द्विषद्धयो रध्यति तस्मान्नतयेत ॥ ३ ॥
ते होचुः । हन्तेदं तथा करवामहै यथा न इदमाप्रदिवमेवाजर्यमसदिति ॥४ ॥
ते देवाः । जुष्टास्तनूः प्रियाणि धामानि सार्धं समवददिरे ते होचुरेतेन नः स नानासदेतेन विष्वङ्यो न एतदतिक्रामादिति कस्योपद्रष्टुरिति तनूनप्तुरेव शाक्वरस्येति यो वाऽयं पवतऽएष तनूनपाच्छाक्वरः सोऽयं प्रजानामुपद्रष्टा प्रविष्टस्ताविमौ प्रारणोदानौ ॥५ ॥
तस्मादाहुः । मनो देवा मन्युष्यस्याजानन्तीति मनसा संकल्पयति तत्प्राणमपिपद्यते प्राणो वातं वातो देवेभ्य आचष्टे यथा पुरुषस्य मनः ॥ ६ ॥
तस्मादेतदृषिरणाभ्यनूक्तम् । मनसा संकल्पयति तद्वातमपि गच्छति । वातो देवेभ्य श्राचष्टे यथा पुरुष ते मन इति ॥७ ॥
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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनप्त्र ब्राह्मरण ते देवाः । जुष्टास्तनूः प्रियाणि धामानि साधं, समवददिरे ते होचुरेतेन नः स नानासदेतेन विष्वङ्यो न एतदतिक्रामादिति तद्देवा प्रप्येतर्हि नातिक्रामन्ति केहि स्युर्यदतिक्रामेयुरनृतं हि ववेयुरेकं ह वै देवा व्रतं चरन्ति सत्यमेव तस्मा-देषां जितमनपजय्यं तस्माद्यश एवं ह वाऽअस्य जितमनपजय्यमेवं यशो भवति य एवं विद्वान्त्सत्यं वदति तदेतत्तानूनप्त्रं निदानेन ॥८ ॥
ते देवाः । जुष्टास्तनूः प्रियारिण धामानि सार्धं समवददिरेऽथैतऽश्राज्या-न्येव गृह्णाना जुष्टास्तनूः प्रियाणि धामानि सार्धं समवद्यन्ते तस्मादु ह न सर्वेणेव समभ्यवेयान्नेन्मे जुष्टास्तन्वः प्रियारिण धामानि साधं समभ्यवायानिति येनो ह समभ्यवेयान्नास्मै द्रुह्येदिदं ह्याहुनं सतानूनन्त्रिणे द्रोग्धव्यमिति ॥ ९ ॥
अथातो गृह्णात्येव । आपतये त्वा परिपतये गृह्णामीति यो वाऽश्रयं पवतएष आच पतति परि च पतत्येतस्माऽउ हि गृह्णाति तस्मादाहापतये त्वा परिपतये गृह्णामीति ॥१० ॥
तनूनप्त्रे शाक्वरायेति 1 । यो वाऽश्रयं पवतऽएष तनूप्ता शाक्वर एतस्माऽउ हि गृह्णाति तस्मादाह तनूनपत्रे शाक्वरायेति ॥। ११ ॥ शक्वनऽओजिष्ठायेति । एष वै शक्वौजिष्ठ एतस्माऽउ हि गृह्णाति तस्मादाह शक्वनऽओजिष्ठायेति ॥ १२ ॥
प्रथातः समवमृशन्त्येव । एतद्ध देवा भूयः समामिरऽइत्थं नः सोऽमुथा-सद्यो न एतदतिक्रामादिति तथोऽएवैत एतत्सममन्तऽइत्थं नः सोऽमुथासद्यो न एतदतिक्रामादिति ॥१३ ॥
ते समवमृशन्ति । ' अनाधृष्टमस्यनाधृष्यं देवानामोज ' इत्यनाधृष्टा हि देवा श्रासन्ननाधृष्याः सहसन्तः समानं वदन्तः समानं दधाणा देवानामोज इति देवानां वै जुष्टास्तन्वः प्रियाणि धामान्यनभिशस्त्यभिशस्तिपा श्रनभिशस्तेन्यमिति सर्वां हि देवा अभिशस्त तीरर्णा श्रञ्जसा सत्यमुपगेषमिति सत्यं वदानि मेदमतिक्रमिष-[ ५४८ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तनूनपत्र ब्राह्मण मित्येवैतदाह स्विते माऽधा इति स्थिते हि तद्देवा आत्मानमदधत यत्सत्यमवदन्य-त्सत्यमकुर्वंस्तस्मादाह स्विते माऽधा इति ॥ १४ ॥
अथ यास्तद्देवाः । जुष्टास्तनूः प्रियाणि धामानि सार्धं समवददिरे तदि-न्द्रे संन्यदधतैष वाऽइन्द्रो य एष तपति न ह वा एषोऽग्रे तताप यथा हैवेदमन्यत्कृ धरणमेवं हैवास तेनैवैतद्वीर्येण तपति तस्माद्यदि बहवो दीक्षेरन्गृहपतयऽएव व्रतमभ्यु-रिसच्य प्रयच्छेयुः स हि तेषामिन्द्रभाजनं भवति यद्यु दक्षिणावता दीक्षेत यज-मानायैव व्रतमभ्युत्सिच्य प्रयच्छेयुरिदं ह्याहुरिन्द्रो यजमान इति ॥ १५ ॥
अथ यास्तद्देवाः जुष्टास्तनूः प्रियारिण धामानि सार्धं समवददिरे तत्साधं संजघ्ने तत्सामाभवत्तस्मादाहुः सत्यं साम देवजं सामेति ॥ १६ ॥
[ अनुवाद ] सृष्टि के प्रारम्भ में समस्त देवता मिलित रूप से थे । बाद में अग्नि के एक से तीन तथा तीन से ३३ देवताओं में परिणत हो जाने के कारण ये ३३ देवता पाँच थोकों ( वर्गों ) में बँट गए । इसका कारण सोम का आतिथ्य है । अतिथि बनकर यदि सोम अङ्गिरा अग्नि में आहुत न होता तो अग्नि की घन - तरल - विरल ये अवस्थाएँ न होतीं । जब अवस्था भेद न होता तो ये देवता ही न होते और देवता न होते तो थोक -बन्दी भी न होती । प्रातिथ्य - इष्टि के कारण समस्त देवता समत अर्थात् कलह को प्राप्त हो गए एवं चार थोकों ( वर्गों ) में बँट गए । समस्त देवता मिलित रूप से थे सोमाहुति के कारण नानारूपों में परिणत हो गए । कारण इसका यह था कि सब के पास जब सोम गया हो तो फिर वे एक - दूसरे की मातहती क्यों स्वीकार करते? अतएव अग्नि - सोम - इन्द्र - वरुण ये चारों देवता वसु - रुद्र- आदित्य मरुत् इन चारों दलों को ले कर अलग हो गए । बृहस्पति ही इन विश्वेदेवों के अधिष्ठाता । मिलित् रूप से देवता ' विश्वेदेवा ' कहलाते हैं । सोमाहुति से जब एक ही अग्नि नाना रूपों में परिणत हो पृथक् - पृथक् थोकों ( वर्गों ) में विभक्त हो गया तो उसके सन्धि भागों में असुर घुस गए तथा असुरों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया— " तान् विद्रुतान् असुररक्षसानि अनुव्यवेयुः " ॥१ ॥
देवता एक - दूसरे की मातहती से बचने के लिए पृथक् - पृथक् थोकों ( वर्गों ) में बँट गए । देवताओं के पृथक् होते ही उन पर असुरों ने घावा बोल दिया । तब देवता घबराये और विचार करने लगे कि जिस मातहती से बच रहे थे, उसी के चक्कर में आना पड़ रहा है । अलग होते ही वे असुरों के वशीभूत हो गए अतः असुरों से बचने के लिए उन्होंने संघटित होने पर विचार किया और एक स्वर में इन्द्र को अपना अधिपति मान लिया-[ ५४६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मणं तानून ब्राह्मण " इन्द्रः सर्वादेवता इन्द्र श्रेष्ठा देवा " ॥ २ ॥
देवताओं के पृथक् - पृथक् हो जाने के कारण असुर उन पर आक्रमण करने लगे । असुराक्रमण से देवताओं को शान्ति तभी मिल सकी जब वे इन्द्र के आधिपत्य में पुन: संग-ठित हो गए । इसका तात्पर्य यह है कि संघ में रह कर एक गृहस्वामी की प्राज्ञा में ही जीवन - यात्रा का निर्वाह करना चाहिए । इसीलिए वेद - " तस्मादु ह न स्वा ऋतीयेरन् " आदि श्रुति वाक्यों के द्वारा संघ से स्वतन्त्र होने का विरोध कर रहा है । विद्वान् कभी भी संघ को तोड़ कर शत्रुनों को आक्रमण का मौका नहीं देते हैं । अतएव वेद पुरुष की स्पष्ट आज्ञा है कि संघ से स्वतन्त्र होने की चेष्टा न करें-" यो हैवं विद्वान्नऽर्तीयते । प्रियं द्विषतां करोति । न द्विषद्द्भ्योरध्यति । तस्मान्नऽर्ती-येत ॥ ३ ॥
इन्द्र को अधिपति बना कर देवताओं ने प्रतिज्ञा कर ली कि वे इन्द्र के आधिपत्य में रहेंगे । किन्तु इस सम्भावना से कि कहीं हम में से कोई इस प्रतिज्ञा को न तोड़ बैठे, ऐसा उपाय करना चाहिए कि जिससे हमारा यह मैत्र्य संघ अजेय हो जाए । अर्थात् अपना संघ अपनी मैत्री न टूटे । अपना संघ यावज्जीवन अज रहता हुआ अविनाशी रहे । सृष्टि को ब हुए लाखों वर्ष हो गए हैं, किन्तु तभी से इन्द्र के आधिपत्य में देवताओं का संगठन आज
भी अजय - अविनाशी ही रहा है ।
" इदं तथा करवामहै - यथा नऽ इदं प्राप्रदिवं एव अर्जयं असत् इति ॥। ४ ॥
संगठन को बनाये रखने के उपाय के रूप में देवताओं ने संकल्प किया कि अपने श्रेष्ठ देय और अपनी सबसे अधिक प्रिय वस्तुओं को एकत्र कर उन्हें किसी की साक्षी में रख दिया जाए तथा जो भी देवता प्रतिज्ञा भंग करे उसे ही संघ से निकाल कर उसकी प्रिय वस्तु को जब्त कर लिया जाए । किन्तु देवताओं को चिन्ता हुई कि साक्षी किसे बनाया जाए? क्योंकि यह अति कष्टकर्म है अतएव देवताओं में से इनका रक्षक बनने को कोई भी तैय्यार नहीं हुआ । अतएव यह तय हुआ कि तनूनपात् - शाक्वर वायु को ही यह अधिकार दे दिया जाए । क्रन्दसी वायु को ही तनूनपात्शाक्वर वायु भी कहते हैं । यही वायु यच्च-यावत् प्राणिमात्र का जीवन है । ' तनूनपातयति ' इस व्युत्पति से इसे तनूनपात् कहा जाता है । “ शक्रोनीति ” व्युत्पत्ति से सोम को शक्वर कहते हैं । यह वायु परमेष्ठी की वस्तु है अतएव “ तत्रभवः ' से इस वायु को " शाक्वर " कहते हैं । यही वायु प्रजाओं का साक्षी है । यह अध्यात्म में श्रधिदैवत में सर्वत्र प्रविष्ट है । हम जिसके बल पर श्वास - प्रश्वास लेते हैं-वह यही तनूनपात् है । देवतानों का उपद्रष्टा अर्थात् साक्षी यही तनूनपात् है— " सोऽयं प्रजानामुपद्रष्टा प्रविष्टस्ताविमौ प्राणोदानौ ॥ ५ ॥
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