Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 561–570

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 561–570

पृष्ठ 561

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनध्त्र ब्राह्मणे मनुष्य मन से जैसा संकल्प करता है, वह संकल्प प्रारण पर आता है । संकल्प करते ही प्राण पर धक्का लगता है । प्राण धक्का खा कर जब बाहर निकलने लगता है तो शरीर में विद्यमान वायु पर धक्का लगता है । अर्थात् प्रारण व्यापार का असर वायु पर पड़ता है । वायु से ही मनुष्य की मुखाकृति पर सूक्ष्म भाव -दशाओं अथवा विचार - तरंगों का वितान निम्ति हो जाता है । सूक्ष्म तत्ववेत्ता विद्वान् मनुष्य इन्हीं तरंगों के द्वारा मनुष्य के मन की

इच्छा अर्थात् संकस्प को जान लेते हैं ।

" वातो देवेम्य प्राचष्टे - यथा पुरुषस्य मनः " ॥ ६ ॥

मन जिस समय संकल्प करता है उसी समय शान्त और स्थिर अन्तः प्रारण वायु क्षुब्ध हो जाता है | क्षुब्ध अन्तः वायु प्राण के धक्के से रोमावलियों द्वारा बाहर निकलता है । बाहर निकल कर यह अन्तः वायु शरीर के चारों ओर वेष्टित बाह्य वायु पर धक्का मारता है । इससे जिस प्रकार की लहर अन्तः वायु की होती है उसी प्रकार की लहर बाह्य वायु में भी उत्पन्न हो जाती है । इन्हीं लहरों ( वायु - उम्मि- मण्डल ) के द्वारा विद्वान् वेत्ता - मनुष्य के

मन की बात जान लेते हैं ।

" वातो देवेभ्य आचष्टे यथा पुरुष ते मनः " ॥७ ॥

समस्त देवताओं ने अपने जो प्रिय तनु थे उनको तथा प्रिय स्थानों को एकत्र कर तनूनपात् की साक्षी में रख दिया और कहा कि हममें से जो भी इस प्रतिज्ञा का उल्लंघन करेगा, उसे संगठन से अलग कर दिया जाएगा । साथ ही वह अपने प्रिय स्वरूप एवं प्रिय स्थान से वञ्चित कर दिया जाएगा । इसी प्रतिज्ञा के कारण देवता सत्यव्रती अर्थात् सत्य पर दृढ़ रह कर कभी भी सत्य - पथ का अतिक्रमण नहीं करते हैं । यदि प्रतिज्ञा का प्रति-क्रमण करेंगे तो क्या वे मूल स्वरूप में रह पाएँगे? कदापि नहीं । प्रतिज्ञा तोड़ते हुए वे मिथ्या बोलेंगे - सत्यमार्ग से च्युत होंगे तो यही उनके नाश का कारण होगा । इस सत्य विज्ञान - सत्यबल - को जान कर जो मनुष्य सत्य बोलता है उसकी जित ( अर्थात् सम्पत्ति ) अनपजय्य रहती है अर्थात् उसका कभी नाश नहीं होता है । वह मनुष्य देवताओं की तरह यशस्वी हो जाता है । देवताओं ने तनूनपात् वायु को साक्षी बना कर तानूनप्त्र अर्थात् शपथ कर्म्म किया था । वायु को तो यजमान पकड़ नहीं सकता है अतएव वायु के स्थान पर निदानेन घृत रख कर उसका स्पर्श कर, उस घृत की साक्षी में तानूनप्त्र कर्म्म करता है— " तदेतत् तानूनप्त्रं निदानेन ॥ ८ ॥

प्राण - देवताओं ने अपने जुष्ट शरीरों और प्रिय पदार्थों को एकत्र कर तनूनप्ता की साक्षी में शपथ ली । एवमेव इस यज्ञ में देवतास्वरूप ऋत्विक् प्राज्य ग्रहण कर जुष्टतनू एवं प्रिय पदार्थों को एक साथ एकत्र कर तनूनपात् स्वरूप घृत की साक्षी में शपथ ग्रहण करते हैं । किन्तु शपथ लेना आत्मा को निर्बल करना है । जब बड़ा भारी काम आ पड़े [ ५५१ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मणं तनूनं ब्राह्मण तभी शपथ लेनी चाहिए । सोमयाग ऐसा ही काम है । बात - बात में शपथ नहीं लेनी चाहिए । शपथ भंग होने से जो प्रिय जुष्टतनू और प्रिय धाम है वह देवता से अलग हो जाते हैं । उत्तम पक्ष तो यह है कि शपथ - व्यवहार किया ही न जाए । यदि बहुत ही आवश्यकता श्रापड़े तो जिसके साथ शपथ कर ले उससे कभी भी द्रोह न करे, अर्थात् कभी न तोड़े । कहने का तात्पर्य्यं यह है कि जो स - तानूनप्त्र है, उसके प्रति कभी भी द्रोह न करे । जिनसे तानूनपत्र व्यवहार ( शपथ - व्यवहार ) हो जाए ऐसे स- तानूनप्त्रों से कभी द्रोह नहीं करना चाहिए-" इदं ह्याहुः न सतानून प्त्रिणे द्रोग्धव्यमिति " ॥६ ॥

घृत ही कालान्तर में वायु बनता है और वायु श्रग्नि है अग्नि से ही घृत बनता है अतएव “ तेजो वै घृतम् ” कहा जाता है । घृत से बनने वाला वायु ऋत्विजों में आने वाले प्राण - स्रोत में ही मिल जाता है । यह वायु प्रापति और परिपति भेदेन दो प्रकार का है । मन को प्रेरित करने वाला परिपति और प्राण को प्रेरित करने वाला आपति वायु कहलाता है । ऋत्विज यदि शपथ तोड़ देते हैं तो यह वायु यजमान का सर्वनाश कर डालता है । आपति और परिपति के लिए ऋत्विज घृत ग्रहण करते हैं— " तस्मादाह - आपतये त्वा परिपतये गृह्णामि " इति ॥१० ॥

तानूनप्त्र के अनन्तर स्थाल्याज्य तानूनप्त्र करने के लिए स्थाली में से स्रु ुवा द्वारा " तनूनप्त्रे शाक्वराय " यह मन्त्र बोल कर घृत ग्रहण करते हैं । यह जो बहने वाला तनूनप्त शाक्वर नामक वायु है, इसी के लिए घृत ग्रहण किया जाता है । अध्यात्म में प्रविष्ट यही वायु परिपति और प्रापति कहलाता है एवं प्रघि देवस्थ वायु तनूनप्ता शाक्वर कहलाता है । अतएव दोनों को ग्रहण करने लिए भिन्न - भिन्न नामों से आज्य ग्रहरण करते है-“ तनूनप्त्रे शाक्वरायेति ” ॥११ ॥

यह वायु शक्वा है । अतिबलशाली है । अप्रतिहतगति है । अतएव इसे ' शक्वा ' कहा गया है । यह वायु अत्यन्त प्रोजिष्ठ है अतएव इसे ' प्रोजिष्ठाय ' कह कर इसके लिए आज्य ग्रहण किया जाता है-" शक्वनऽओजिष्ठायेति ” ॥१२ ॥

ऋत्विक् लोग पुनः घृत का स्पर्श करते हैं । इसका कारण यह है कि देवता प्रति-थ्येष्ट्यन्तर पृथक् हो गए थे । तदन्तर पुनः तानूनप्त्र कर एकत्र हुए । अर्थात् पुनः तानूनप्त्र इसी के अनुसरण में ऋत्विक् भी पुनः घृत का स्पर्श करके

( शपथग्रहण - कर्म्म ) किया ।

शपथ लेते हैं-" यो न एतदतिक्रामादिति " ॥ १३ ॥

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मणे तनूनप्त्र ब्राह्मण हे आज्य! आप अनाधर्षणीय हैं - इसीलिए तो आपको अनाधृष्ट- आक्रमणरहित कहते हैं । यदि आप घर्षणीय होते तो फिर अनाधृष्ट कैसे हो सकते थे? एक ही बात बोलते हुए एवं एक इरादा रखते हुए ही देवता अनाधर्षणीय हुए थे । ' सहसन्तः ' के अनुसार सदा साथ रहें - सभी कार्य्यं मिल कर एक साथ करें । समान बोलें यही " समानं वदन्तः " का तात्पर्य है । एक का इरादा सबका इरादा हो - सबका इरादा एक हो - यही " समानं दधारणा ” काता है । इन नियमों का पालन कर देवता अनाधर्षरणीय हो गए । हे आज्या आप देवताओं के ओज हैं, प्यारे शरीर हैं, प्रिय स्थान हैं । हे आज्य! आप अनभिशस्ति हैं-निन्दा - रहित हैं । हे आज्य! मैं सीधे एवं सत्य मार्ग को प्राप्त होऊँ ऐसा आशीर्वाद दीजिए । मैं सत्य बोलूँगा - मिल कर रहूँगा यह मेरी प्रतिज्ञा है जिसका मैं कभी अतिक्रमण न करूँ ऐसी कृपा कीजिए । मुझे अच्छे मार्ग और अच्छी दशा में रखिए । सत्य पर चलना - सत्य बोलना-आत्मा को प्रतिष्ठित रखना है । मिथ्या बोलना आत्मा को गिराना है । जिस प्रकार देव-तानों ने सत्य बोल कर पुनः आत्म - स्वरूप को धारण किया है उसी प्रकार मैं ( ऋत्विक् ) भी श्रात्मा को श्रेष्ठ रख सकूँ-" स्विते माऽधा इति " ॥ १४ ॥

देवताओं ने तनूनपात् वायु की साक्षी में अपने जुष्टतनू और प्रिय धामों को एकत्र कर इन्द्र की सन्नधि में रख दिया अर्थात इन्द्र को समस्त देवताओं ने अपना अधिपति मान लिया । पृथिवी के अधिष्ठाता अन हैं । अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता अग्नि हैं । अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता सोम हैं तथा द्यौ के अधिष्ठाता इन्द्र हैं । इन्द्र से पार्थिव इन्द्र न समझा जाए । जब तक चारों देवताओं का सम्बन्ध सूर्य्य से नहीं हुआ था तब तक सूर्य्य सर्वथा काला था । अग्नि के सम्बन्ध से ताप, इन्द्र के सम्बन्ध से प्रकाश, वायु के सम्बन्ध से चमाचम ( चमक, कान्ति ) तथा वरुण के सम्बन्ध से किरणें ( अर्थात् गौ ) का निर्माण हो जाता है । जब बहुत से यजमान दीक्षा लें तब जो गृहपति ( मुख्य यजमान ) है उसके लिए प्राज्य छिड़क देते हैं । प्रधान यजमान ही ऋत्विक् देवताओं का इन्द्र है । समस्त देवता इन्द्र के अधीन हुए थे - अतएव सभी ऋत्विज इन्द्र स्वरूप गृहपति को घृत सौंपते हुए आपका आधिपत्य स्वी-कार करते हैं, क्यों कि यजमान इन्द्र स्थानीय है— " इद्रं ह्याहुः - इन्द्रो यजमान इति ” ॥१५ ॥

तनूनप्त्र के सत्य से तथा उसकी साक्षी से सारे देवता सम हुए - अतएव इस साम को " सत्यसोम ” शब्द से व्यवहृत करते हैं । यह साम चारों देवताओं के मेल से - एकीभाव से -बनता है - प्रतएव इसे " देवजम् ' ' साम कहते हैं-" तस्मादाहुः सत्यं साम, देवजं सामेति " ॥१६ ॥

[ विज्ञान भाष्य ] शकट द्वारा सोम बड़ी धूम - धाम के साथ यज्ञशाला में आ गया । इस आगत सोम के आतिथ्य के लिए यजमान ने श्रातिथ्येष्टि सम्पन्न कर दी । श्रातिथ्येष्टि से आगत सोम का [ ५५३ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मणे तानूनप्त्र ब्राह्मणे स्वागत कर दियागया । इसके अनन्तर तानूनप्त्र इष्टि की जाती है । प्रकृतिमण्डल के प्राणदेवता श्रातिथ्य इष्टि के अनन्तर तानूनप्त्र इष्टि किया करते हैं । उन्हीं के अनुसार भौम स्वर्ग निवासी देवता भी इष्टि किया करते थे । हम देवताओं की प्रजा हैं । हम ने यज्ञ - विद्या उन्हीं महर्षियों से सीखी है - जो कि स्वर्ग में जाया करते थे । मुवन - स्वर्गवासी देवता चूंकि प्राण - यज्ञवत् प्रतिध्यानन्तर तानूनप्त्रेष्टि किया करते थे श्रतएव " यद्वै देवा प्रकुवंस्तत् - करवाणि " के अनुसार आज यह यजमान भी आतिथ्येष्टि के अनन्तर तानूनप्त्रेष्टि करता है । वैदिक आख्यान - प्राध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक तीनों अर्थों में समान रूप से लागू होते हैं - यह बात हम कई बार कह चुके हैं । आगे बतलायी जाने वाली जो श्राख्यायिका है -- उस पर भी ये तीनों अभिप्राय लागू हैं । इन तीनों में से सर्वप्रथम हम आख्यायिका का प्राधिदैविक रहस्य बतलाते हैं— सारा ब्रह्माण्ड - भूः, भुव:, मह:, जनत्, तपः, सत्यम् - इन सात लोकों में विभक्त है । परम प्रजा-पति की ये सात व्याहृतियाँ हैं । अर्थात् प्रजापति ही उक्त सातों स्वरूपों में परिणत होकर सात नाम धारण कर लेता है । इन सातों लोकों की रोदसी, ऋन्द्रसी, संयती यह त्रैलोक्य - व्यवस्था होती है । पृथिवी अन्तरिक्ष - यो इन तीनों की समष्टि को ही त्रिलोकी कहते हैं । सारे ब्रह्माण्ड में तीन पृथिवियाँ हैं - तीन अन्तरिक्ष हैं- एवं तीन ही द्यो हैं- अतएव त्रिलोकी भी तीन हो जाती हैं । इन तीनों त्रिलो-कियों के - रोदसी - क्रन्द्रसी - संयती ये नाम बताये गये हैं । हम जिसे पृथिवी कहते हैं - जिस पर हम रहते हैं - वही पहला “ पृथिवी - लोक " है एवं आकाश में बृहतीछन्द पर स्थिर रूप से तपने वाले सूर्य्य के लोक को " धु - लोक " कहते हैं । द्युलोक का अर्थ है - " स्वर्ग लोक " श्रर्थात् सूर्य्यलोक को ही स्वर्ग-लोक कहते हैं - अतएव ब्राह्मण श्रुति कहती है-" एषा । गतिरेषा प्रतिष्ठा य एष तपति । तस्य ये रश्मयस्ते सुकृतः । श्रथ यत् परं भाः प्रजापतिर्वा स स्वर्गो वा लोकः " । ( शत ० १।६।३।१० ) सूर्य और पृथिवी के बीच में जो खाली स्थान है - वही " अन्तरिक्ष- लोक " कहलाता है । बस यही पहली त्रिलोकी है । पृथिवी - मूलक है, अन्तरिक्ष- ' भुवर्लोक ' है तथा द्यो - ' स्वर्लोक ' है । इस पहली त्रिलोकी को " रोदसी " त्रिलोकी कहते हैं । पृथिवी नाम है - प्रतिष्ठा का । जिस पर प्राणी प्रतिष्ठित रहते हैं - उसी का नाम पृथिवी है । हम जिस पर बैठे हैं वही पृथिवी नहीं हैं । पृथिवी एक नहीं - अनन्त हैं - करोड़ों हैं । प्रत्येक नक्षत्र - चूंकि भिन्न - भिन्न प्राणों को अपने ऊपर प्रतिष्ठित रखता है- प्रतएव वह पृथिवी शब्द से व्यवहृत किया जा सकता है । इस प्रकार पृथिवियाँ अनन्त हैं - तथापि इनके अतिस्थूल विभाग तीन ही मान लिए जाते हैं । इनमें से पहला विभाग बतला दिया गया है । अब चलिए दूसरे विभाग की ओर जिसे हमने द्युलोक बतलाया था, उसे पृथिवी समझिए । क्योंकि द्युलोकाधिष्ठाता " सूर्थ्य " में सारे देवता प्रतिष्ठित रहते हैं । हमारी प्रतिष्ठा जैसे पृथिवी है । तथैव देवताओं का प्रति-ष्ठाता सूर्य्य है । पृथिवी हयारी अवरा प्रतिष्ठा है -सूर्य्य पर प्रतिष्ठा है । प्रात्मा सूर्य से बनता है-[ ५५४ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण [ ५५५ ] तानूनप्त्र ब्राह्मण ( शत ० १ || ३ | १० ) ( ऋग्वेद मं ० १।१६४ । १० ) अतएव वहीं तक आत्मा की गति है । सूर्य्य से ऊपर यदि आत्मा चला जाएगा तो वह मुक्त हो जाएगा । आत्मा की अन्तिम प्रतिष्ठा यही सूर्य्य है । इसीलिए कहा जाता है— " तदेवमिमांल्लोकान्त्समारुह्यार्थतां गतिमेतां प्रतिष्ठां गच्छति " । सारे प्रपश्व से बतलाना हमें यही है कि- रोदसी का जो द्युलोक है - वही पृथिवी है एवं सूर्य से ऊपर जो परमेष्ठि - मण्डल है - जिसे कि जनत् लोक भी कहते हैं - इस पृथिवी का स्वर्ग है । परमेष्ठी और सूर्य्य के बीच का जो स्थान है - वही अन्तरिक्ष - लोक है । बस यही दूसरी क्रन्दसी नाम की त्रिलोकी है । क्रन्दसी के अन्तरिक्ष को महर्लोक कहते हैं । परमेष्ठी को जनलोक कहते हैं । प्रापोमय मण्डल का नाम परमेष्ठि - मण्डल है । पानी से ही मैथुनी सृष्टि होती है । मैथुनी सृष्टि का प्रवर्त्तक पानी ही है । यह पानी ही प्रजनन - धर्मा है - प्रतएव इसके लोक को जनतलोक कहते हैं । परमेष्ठिलोक पितरों और असुरों की प्रतिष्ठा है, अतएव पूर्वपरिभाषानुसार परमेष्ठी - अर्थात् क्रन्दसी त्रिलोकी का द्युलोक - पृथिवी बन जाता है । एवं परमेष्ठी से ऊपर जो स्वयम्भू - मण्डल है - वह क्रन्दसी का द्युलोक बन जाता है । इन दोनों के मध्य का स्थान अन्तरिक्ष कहलाने लगता है । यही तीसरी -- " संयती त्रिलोकी " है । इसके अन्तरिक्ष का नाम " तपोपलोक " है और इसके द्यु का नाम सत्यलोक है । तीनों त्रिलोकियों के हिसाब से - यद्यपि ९ ( नौ ) लोक होने चाहिए थे, परन्तु रोदसी का द्यौ ही क्रन्दसी का पृथिवी बन जाता है - एवं क्रन्दसी का द्यौ, संयती का पृथिवी बन जाता है । अतएव त्रैलोक्य त्रिलोकी में ७ ( सात ) ही लोक रह जाते हैं । वैदिक परिभाषानुसार पृथिवी को माता कहा जाता है एवं द्यौ को पिता कहा जाता । है भी बात ऐसी ही । सौर रस जब पृथिवी माता के गर्म में प्रविष्ट होता है तभी अस्मदादि प्राणिवर्ग की उत्पत्ति होती है । इसीलिए " नूनं जना: - सूर्येण प्रसूता: " कहा जाता है । इसीलिए हम पृथिवी को माता और द्युलोक को पिता कहने के लिए तय्यार हैं । इसी अभिप्राय से वेदभगवान्

कहते हैं--“ द्यौष्पितः पृथिवी मातरध्रुगग्ने भ्रातर्वसवो मृळता नः ।

विश्व प्रदित्या अदिते सजोषा अस्मभ्यं शर्म बहुलं वियन्त " ॥

( ऋग्वेद मं ० ६।५१।५ ) चूंकि तीन ही पृथिवियाँ हैं और तीन ही द्यो हैं - प्रतएव श्रुति कहती है-" तिस्रो मातृस्त्रीन्पितृन्बिभ्रदेक ऊर्ध्वस्तस्थौ नेमव ग्लापयन्ति । मन्त्रयन्ते दिवो श्रमुष्य पृष्ठे विश्वविदं वाचमविश्वमिन्वाम् ” ॥ इन सातों लोकों में से- भूः भुवः स्वः महः - जनत् तपः ये ६ हों लोक सत्यलोक ( स्वयम्भू ) की परिक्रमा लगाया करते हैं । प्रतएव इन छहों को " रज " कहा जाता है । इन छहों लोकों को अपने निय-

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मणे तानूनप्त्र ब्राह्मणे न्त्रण में करते हुए सत्य - स्वरूप " स्वयम्भू " भगवान् अटलरूप से स्थिर हैं । वही सर्वत्र व्याप्त हो रहे हैं । इसी स्वयम्भू का नाम प्रजापति है । इतर छहों लोक इसके पेट में कूदा करते हैं । इसी ईश्वर का स्वरूप बतलाती हुई श्रुति कहती है-“ यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चिद्यस्मान्नारणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्वम् " ॥ ( श्वे ० उ ० ३1 ९ ) छहों रज- इसी सत्य - स्थिर प्रजापति के आधार पर रहते हैं - प्रतएव कहा गया है-" अचिकित्वाञ्चिकितुषश्चिदत्र कवीन् पृच्छामि विद्मने न विद्वान् । वि यस्तस्तम्भ षळिमा रजांस्यजस्य रूपे किमपि स्विदेकम् " ॥ ( ऋग्वेद मं ० १।१६४६ ) सारे प्रपंच से बतलाना हमें यही है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड - सात लोकों में विभक्त है । इन सातों - पृथिवी सूर्य्यं परमेष्ठी - स्वयम्भू ये चार मण्डल हैं । रोदसी का जो मन्तरिक्ष है, उसमें जो सोम का पिण्ड है उसका नाम " चन्द्रमा " है । इस प्रकार प्रश्वत्थ वृक्ष की एक प्राजापत्य बल्शा - पचपुण्डीरा अर्थात् पाँच पोर की हो जाती है । अश्वत्थ वृक्ष की एक टहनी में - स्वयम्भू परमेष्ठी - सूर्य्यं चन्द्रमा-पृथिवी ये पाँच पोर हैं । बस, " अस्ति " कहने लायक संसार में जो कुछ है, वे यही पाँच हैं इन पाँचों मण्डलों में भिन्न - भिन्न प्रारण रहते हैं । स्वयम्भू में रहने वाले तत्त्व का नाम " प्राण " है । गन्ध - रस - रूप - स्पर्श - शब्द रहित जो एक मौलिक तत्त्व है - उसी का नाम " प्राण " है । मैथुनी सृष्टि के अर्थात् पारमेष्ठिनी सृष्टि के पहले इस " प्राणतत्त्व " के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं था । इसी अभिप्राय से श्रति कहती है-“ असद्वाऽइदमग्रश्रासीत् । तदाहुः किं तदसदासीदिति ऋषयो वाव तेऽग्रेसदासीत् । तदाहु: के त s ऋषय इति प्रारणा वाडऋषयस्ते यत्पुरास्मात् सर्वं स्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसारिषंस्तस्मादृषयः " | ( शत ० ६ | १ | १ | १ ) प्राण में प्रारण नहीं रहता - प्रतएव इसको " असत् " शब्देन व्यवहृत किया गया है । यह असत् -प्राणतत्त्व - उस श्रव्यय मन ( श्वोवसीयस मन ) पर प्रतिष्ठित रहता है । प्राण की प्रतिष्ठा " अव्ययमन " ही है । इस मन - प्राण समष्टि को ही - प्रात्मा कहते हैं । इस आत्मा की अर्थात् स्वयम्भू की परमेष्ठी आदि प्रजाएँ हैं - प्रतएव स्वयम्भू को प्रजापति कहा जाता है । इस प्रजापति से इस ऋषि - प्राण से सर्व-प्रथम पानी ही उत्पन्न होता है । विजातीय अनन्त ऋषि प्राणों के घर्षण से पानी उत्पन्न हो जाता है । इस मैथुनी सृष्टि में पहली सृष्टि यही पानी | अतएव कहा जाता है— * इन पाँचों पोरों का विस्तृत विवेचन पं ० मोतीलाल जी शास्त्री के " गीता - प्राचार्य रहस्य " के अन्तर्गत " परमेष्ठी कृष्ण रहस्य " नामक निबन्ध में देखना चाहिए । [ ५५६ ]

पृष्ठ 567

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मरण

" सोऽभिध्याय शरीरात्स्वात्सिसृक्षुविविधाः प्रजाः ।

अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् " ॥

तानूनप्त्र ब्राह्मरण ( मनुस्मृति १1८ ) इसके अनन्तर सूर्य्यं उत्पन्न होता है - तदनन्तर पृथिवी उत्पन्न होती है; तदनन्तर चन्द्रमा उत्पन्न होता है । यह जो पारमेष्ठ्य पानी है उसे बायु रूप समझना चाहिए । एवं चन्द्रमा को " प्रापोलोक " समझना चाहिए । इसीलिए श्रुति कहती है-" चन्द्रमा अप्स्वंतरा सुपरर्णी धावते दिवि " । ( ऋग्वेद मं ० १।१०५।१ ) इसी सृष्टिक्रम को बतलाती हुई श्रुति कहती है--संभूतः ॥ आकाशाद्वायुः ॥ वायो-" तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः

रग्निः ॥ अग्नेरापः । श्रद्द्भ्यः पृथिवी " ॥

( तै ० उ ० २।१ ) पारमेष्ठ्य पानी के घर्षण से अग्नि अर्थात् सूर्य्यं उत्पन्न होता है । सूर्य्यं के रश्मि घर्षण से फिर पानी उत्पन्न होता है - उससे पृथिवी बनती है । परमेष्ठी के - ऋषि प्रारण से उत्पन्न जो वायु प्रारण है, उसे ही " पितृ - प्राण " कहते हैं । यह वायु सोमात्मक है । इस सौम्य वायु - प्राण का नाम ही पितर है । पितर प्राणों के घर्षण से अग्नि उत्पन्न होता है । इसी अग्नि - प्राण को देवता कहते हैं । इससे सिद्ध हो जाता है - कि ऋषि - प्राण से पितर प्राण उत्पन्न हुए हैं - एवं पितृप्रारण से देवता उत्पन्न हुए हैं । इन देवतानों से ही अर्थात् सूय्यं से ही - समस्त चर - अचर का निर्माण होता है । इसी अभिप्राय से भगवान् मनु कहते हैं-“ ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितृभ्यो देवमानवाः । देवेभ्यस्तु जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः " ॥ ( मनुस्मृति ३।२०१ ) इन पाँचों मण्डलों में तीन - तीन मनोता रहते हैं । मनोता उसे कहते हैं- जिसमें कि - इन मण्डलों के मन ओत - प्रोत रहते हैं । जिनके आधार पर इन मण्डलों की केन्द्र शक्ति अवलम्बित रहती हैं- उसी को " मनोता " कहते हैं । यदि ये मनोता - इन मण्डलों में से निकाल लिए जाएं तो इन मण्डलों का स्वरूप ही नष्ट हो जाए । स्वयम्भू मण्डल के जो मनोता हैं, उन्हें वेब, सूत्र और नियति कहते हैं । " वेदा: -सत्यम्, ” “ सूत्रं - सत्यम्, ” “ नियतिः सत्यम् " ये तीन मनोता स्वयम्भू - मण्डल के हैं । इन्हीं के आधार पर स्वयम्भू की स्थिति है । यदि ये तीनों सत्य स्वयम्भू में से निकाल दिये जाएं तो स्वयम्भू का वस्तु रूप से स्वरूप ही नष्ट हो जाए । स्वयम्भू के बाद है - परमेष्ठि- मण्डल । इसके ' भृगु ' - ' श्रङ्गिरा ' ' श्रत्रि ' ये तीन मनोता हैं । भृगु को सोम तथा श्रङ्गिरा को अग्नि कहा जाता है । भृगु और अङ्गिरा - घन- तरल-विरल अवस्था भेद से तीन स्वरूप धारण कर लेते हैं । भृगु की, अर्थात् सोम की, जो घनावस्था है, उसका नाम पानी है । इसी प्राप्य प्राण को ही असुर कहते हैं । सोम की जो विरलावस्था है उसका नाम सोम है । इस सौम्य - प्राण को ही पितर कहते हैं । असुर श्राप्य हैं- पितर सौम्य हैं । तीसरी तरलावस्था [ ५५७ ]

पृष्ठ 568

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तनूनप्त्र ब्राह्मण का नाम वायु है । क्योंकि इस वायु में पानी मिला रहता है अतएव इसे साम्ब वायु कहते हैं । यह साम्बवायु ही संसार का कल्याण करता है - अतएव इसे ' साम्बसदाशिव ' कहते हैं । एवमेव अग्नि की जो घनावस्था है उसका नाम अग्नि ही है । अग्नि की तरलावस्था का नाम वायु है । यह आग्नेय वायु है I यह शरीर को फाड़ देता है - प्रतएव इसे रुद्र कहते हैं । भृगु वायु को शिव कहते हैं । श्रङ्गिरा वायु को रूद्र कहते हैं । इस अग्नि की जो विरलावस्था है उसे ही आदित्य कहते हैं । ' प्रापः - वायु सोम ' तीनों भृगु हैं । ' अग्नि- वायु - आदित्य ' तीनों श्रङ्गिरा हैं । प्राग्नेय - प्राण का नाम देवता है । श्राप्य - प्राण का नाम असुर है । दोनों में परस्पर घोर वैर ( विरोध ) है । श्रङ्गिरा -देवताओं के अधिष्ठाता हैं । भृगु-असुरों के अधिष्ठाता हैं । परमेष्ठि मण्डल में अङ्गिरा से एक बृहस्पति उत्पन्न होते हैं । सूर्य से अर्थात् इन्द्र से ऊपर पहले श्राङ्गिरस बृहस्पति ही का नम्बर है । प्रतएव कहा जाता है— " बृहस्पतिः पूर्वेषामुत्तमो भवति इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः ” । इस बृहस्पति के ऊपर प्राप्य प्राण हैं । इनका अधिष्ठाता - मृगु है । देवताओं के ' अधिष्ठाता-संचालक - गुरु बृहस्पति हैं । आप्य प्राणों के अर्थात् असुरों के गुरु भृगु हैं । परमेष्ठि मण्डल के तीसरे मनता अत्रि हैं । भृगु और अङ्गिरा दोनों तीन - तीन हैं जबकि अत्रि तीन नहीं हैं । अतः इन्हें अत्रि कहा जाता है । वाक् का नाम ही अत्रि है । पारदर्शकता का प्रतिबन्धक जो प्रारण है - उसी का नाम अत्रि-प्राण है । इसका विस्तृत विवेचन गुरु ( मधुसूदन प्रोझा जी ) प्रणीत “ श्रत्रिख्याति ” नामक पुस्तक में देखना चाहिए । परमेष्ठी के अनन्तर सूर्य्य है । इसके - ज्योति - गो- श्रायु ये तीन मनोता हैं । ' ज्योति ' ३३ हैं । गौ हजार हैं । ' आयु ' ३६ हजार हैं । सूर्य के अनन्तर चन्द्रमा है । इसके रेतः श्रद्धा यश ये तीन मनोता हैं । चन्द्रमा के अनन्तर पृथिवी है । इसके - वाग् - गौ- द्यौ ये तीन मनोता हैं । इस विषय के विस्तृत विवेचन हेतु तो पृथक से एक स्वतन्त्र ग्रन्थ ही अभिप्रेत है - प्रतएव इसके - विवेचन के लिए यहां पर्याप्त अवकाश नहीं है । इतना समझ लेना ही पर्याप्त होगा कि स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी ये पाँच मण्डल हैं । इनके तीन - तीन मनोता प्रत्येक के हिसाब से कुल १५ मनोता हैं । बस यही ब्राह्मी स्थिति है । इनको जान लेने पर मनुष्य विदित- वेदितव्य कहलाने लगता है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है—

" यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति ।

यस्तद्वेद स वेद सर्वं सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति " ॥

( छा ० उ ० २।२१।३-४ ) आग्नेय प्राण का नाम देवता है । आप्य प्रारण का नाम असुर है यह बात पूर्व में कह दी गयी है । परमेष्ठी के मनोता जो भृगु और ग्रङ्गिरा हैं, वे क्रमशः नीचे उतरते हुए - पृथिवी तक फैले हुए हैं । इनमें सबसेळाहले — क्रमशः आप वायु- सोम हैं । बाद में - क्रमशः आदित्य - वायु- अग्नि है । अग्नि पृथिवी लोक की वस्तु बन गया - वायु अन्तरिक्ष की वस्तु बन गया - आदित्य द्युलोक की वस्तु बन गया । इस प्रकार हमारे पृथिवी - लोक से लेकर - सूर्य्य तक अग्नि वायु- आदित्यात्मक अङ्गिरा व्याप्त है । परमेष्ठी के अन्त [ ५५८ ]

पृष्ठ 569

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 569 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनप्त्र ब्राह्मण तक श्राप - वायु - सोमात्मक भृगु व्याप्त है । इस प्रकार - यह परमेष्ठी ही सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो रहा है | परमेष्ठी ऋत् पदार्थ है । यही सर्वत्र व्याप्त हो रहा है । अतएव श्रुति कहती है-" ऋतमेव परमेष्ठि । ऋतं नात्येति किञ्चन । ऋते समुद्र श्राहितः । ऋते भूमिरियं श्रिता " ॥ ( तै ० ब्रा ० १।५।५।१ ) सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में - भृगु और श्रङ्गिरा ही व्याप्त हो रहे हैं— श्रतएव कहा गया है—

" श्रापो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयं ।

सर्वमापोमयं भूतं सर्वं भृग्वङ्गिरोमयम् ” ॥

( गो ० ब्रा ० पू ० १।३६ ) अङ्गिरा का जो अग्निभाग है, अर्थात् घनावस्था है वह पृथिवी को वस्तु बन जाती है । अङ्गिरा भी जो कि परमेष्ठी का मनोता है, पृथिवी की वस्तु बन जाता है । पृथिवी में प्रतिष्ठित हो कर यही अङ्गिरा - घन- तरल - विरल अवस्थाओं में परिणत होकर तथा पृथिवी से निकल कर अनवरत - द्युलोक की श्रोर जाया करता है । इसी अभिप्राय से वेद पुरुष कहता है—

" इत एत उदारुहन्दिवः पृष्ठान्या रुहन् ।

प्र भूर्जयो यथा पथोद्यामङ्गिरसो ययुः " ॥

( सामवेद १।१०।२ ) इस श्रङ्गिरा की जो घनावस्था है - वही अग्नि कहलाने लगती है । यह अग्नि पृथिवी के त्रिवृत्-स्तोम तक रहता है । अग्नि की जो तरलावस्था है वह पञ्चदश स्तोम तक रहती है - इसी का नाम वायु है । अग्नि की विरलावस्था एक विश स्तोम तक वितत रहती है - इसी का नाम श्रादित्य है त्रिवृत् स्तोम तक पृथिवी लोक है । इसके अधिष्ठाता अग्नि हैं । पञ्चदश स्तोम तक अन्तरिक्ष - लोक है । इसके अधि-ष्ठाता वायु हैं । एकविंश स्तोम तक द्यु - लोक है । इसके अधिष्ठाता द्वादशादित्य समष्टिरूप भगवान् सूर्य्य हैं । अतएव कहा गया है— " श्रग्निः पृथिवीस्थानो वायुर्वेन्द्रो वान्तरिक्षस्थानः सूर्य्यो द्युस्थानाः " । ( निरुक्त ७।५।२ वेङ्क ० सं. ) जिस प्रकार एक ही अङ्गिरा - प्रवस्था विशेष के कारण अग्नि वायु प्रादित्य इन तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है - एवमेव प्रग्नि वायु श्रादित्य तीनों ही प्रवान्तर अवस्थाओं के कारण ८-११-१२ श्रवस्थानों में परिणत हो जाते हैं । अग्नि आठ अवस्थाओं में परिणत होकर प्राठ स्वरूप धारण कर लेता है । यही आठ अवस्थाएं आठ वसु कहलाने लगती हैं । वायु ग्यारह स्वरूपों में परिणत हो जाता है — यही ग्यारह रुद्र कह लाते हैं । ये ग्यारहों रुद्र वायु स्वरूप हैं । ये सभी रुद्र श्राग्नेय हैं, रुक्ष है, विदा-ऱक है, पीड़ा पहुँचाने वाले हैं - अतएव ये - रुद्र शब्द से व्यवहृत होते हैं । एक ही आदित्य १२ स्वरूपों में [ ५५६ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनप्त्र ब्राह्मण परिणत हो जाता । धाता भग - पूषा - विवस्वान् सविता इन्द्र इत्यादि इन प्रादित्यों के नाम हैं । इस प्रकार के एक ही देवता के तीन देवता हो जाते हैं - तथा तीन के ३१ हो जाते हैं । दो देवता सन्धि-स्थान में रहते हैं । इन सन्धिस्थानीय प्राण- देवताओं को ' अश्विनी कुमार ' कहते हैं । तीनों देवतानों के थोक ( वर्ग या समूह ) अलग - अलग हैं । परन्तु इन तीनों को परस्पर अश्विनी कुमार मिलाते हैं - तीनों का संधान करते हैं- प्रतएव इनको देवताओं का चिकित्सक कहा जाता है । इस प्रकार कुल ३३ देवता हो जाते हैं । आठ वसुओं में पहले वसु का नाम ' अग्नि ' एवं १२ श्रादित्यों में आदित्य का नाम ' विष्णु ' है । ३३ देवताओं के आदि में अग्नि हैं तथा अन्त में विष्णु हैं । अत-एव कहा जाता है— " श्रग्निर्वे देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्यादेवताः ” । ( ऐ ० ब्रा ० १1१ ) पृथिवी से प्रारम्भ कर २१ तक अर्थात् सूर्य्यं तक ही ये ३३ देवता श्रभिव्याप्त रहते हैं । सूर्य्य से ऊपर परमेष्ठिमण्डल है -- वहीं पर सोम रहता है । वह सोम प्रतिक्षण इन ३३ देवताओं में आहुत होता रहता है । अग्नि में सोमाहुति होने का नाम ही यज्ञ है । इस यज्ञ से ही देवताओं की स्थिति स्वरूप सुर-क्षित रहता है - अतएव इन ३३ देवताओं को ' यज्ञिय ' देवता कहा जाता है - पृथिवी के ३३ अहर्गण पर जा कर स्तौम्य देवताओं की व्याप्ति समाप्त हो जाती है । किन्तु यज्ञिय देवताओं की व्याप्ति २१ अहर्गण पर ही समाप्त होने लगती है । जैसा कि श्रुति कहती है-" इति स्तुतासो असथा रिशादसो ये स्थ त्रयश्च त्रिशच्च । मनोर्देवा यज्ञियासः " । ( ऋग्वेद मं ० ८ | ३० | २ ) इन ३३ देवताओं में पारमेष्ठ्य सोम आहुत होता रहता है । ये प्राणदेवता सोम - यज्ञ करते रहते हैं । सोम राजा - सदा देवताओं के अतिथि बना करते हैं । एवं प्राण देवता - इनके लिए सदा ही प्रातिथ्येष्टि किया करते हैं । यहाँ पर वरुण सोम और इन्द्र का स्वरूप और समझ लेना चाहिए । पृथिवी का अधि-ठाता है अग्नि है । यही वसुत्रों का भी अधिष्ठाता है । सोम रुद्रों के अधिष्ठाता हैं । सोम अन्तरिक्ष की वस्तु हैं । इसीलिए " त्वमातनो सर्वान्तरिक्षम् " यह कहा जाता है । यह सोम- दिक् श्रौर भास्वर भेदेन दो प्रकार का है । जो भास्वर सोम है - उसे चन्द्रमा कहते हैं - एवं दिक् सोम को वरुण कहते हैं । भास्वर सोम जिसे कि चन्द्रमा भी कहते हैं - हमारी इसी त्रिलोकी के अन्तरिक्ष में रहता है । भास्वर सोम पृथिवी लोक और सूर्य्य - लोक के बीच की वस्तु है । पारमेष्ठ्य सोम - जिसे कि दिक् - सोम भी कहा जाता है - सूर्य्यं से ऊपर की वस्तु है । इसी का नाम वरुल है । सूर्य्याग्नि में पारमेष्ठ्य सोम आहुत होता रहता है | यहाँ केवल सोम सजात्येन कह दिया गया है । सोमत्वेन सोम एक है - प्रतएव ऐसा कह दिवा गया है । वस्तुतः देवताओं में भास्वर सोम अर्थात् चन्द्रसोम ही प्राहुत होता रहता है । यहाँ सोम से दिकु सोम का ही अभिप्राय है । अतएव कहा जाता है-[ ५६० ]