Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 571–580
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 571–580
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मणं तानूनप्त्र ब्राह्मण " एष वै सोमो राजा देवानामन्नं यच्चन्द्रमाः ” | ( शत ० १ | ६ | ४ | ५ ) अन्तरिक्ष में वायु रहता है । इसी की ग्यारह अवस्थाओं के नाम ग्यारह रुद्र हैं । इसी अन्तरिक्ष सोम ( चन्द्रमा ) रहता है । द्युलोक के अधिष्ठाता आदित्य हैं- एवं इनके ऊपर ही वरुण रहते हैं । वरुण दिक् साोम का नाम है । वरुण ही द्वादश प्रारणसमष्टि स्वरूप सूर्य का अधिष्ठाता है । वरुण ने सूर्य्यं को प्रादित्यों को - चारों ओर से घेर कर उन्हें प्रतिष्ठित कर रक्खा है । यदि वरुण चाहे तो एक क्षरण में श्रादित्यों को नेस्तनाबूद कर सकता है । प्रादित्य द्यलोक में प्रतिष्ठित हैं - ये वरुण की अर्थात् दिक् सोम की महिमा हैं । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-" प्र सम्राजे बृहदर्चा गभीरं ब्रह्म प्रियं वरुणाय श्रुताय । वि यो जघान शमितेव चर्मोपस्तिरे पृथिवों सूर्याय " ॥ ( ऋग्वेद मं ० ५८५।१ ) जिस प्रकार शमिता अर्थात् चर्म्म खींचने वाला चर्म को उतार कर बिछा देता है - वैसे ही वरुण सूर्यको प्रतिष्ठित रखने के लिए चर्म बिछा रक्खा है । यही श्रुति का तात्पर्य है -" वनेषु व्यन्तरिक्षं ततान वाजमर्वत्सु पय उस्त्रियासु । हृत्सु ऋतुं वरुणो स्वग्निं दिवि सूर्यमदधात्सोममद्रौ " ॥ ( ऋग्वेद मं ० ५८५२ ) इस श्रुति से स्पष्ट ही - वरुण का माहात्म्य सिद्ध हो जाता है । " दिवि सूर्य्यमदधात् " से सिद्ध हो जाता है कि द्युलोक में सूर्थ्य को प्रतिष्ठित रखने वाला यही वरुण है । यही पारमेष्ठ्य दिक् - सोम है । यद्यपि इस दिक्- सोम का मूल परमेष्ठी है - तथापि यह सर्वत्र व्याप्त है । इसीलिए तो वरुण को सम्राट् बतलाया जाता है इस सारे प्रपञ्च से बतलाना हमें यही है कि- अग्नि ही वस्तुनों के अधिष्ठाता हैं । वायु औौर सोम दोनों ही रुद्रों के अधिष्ठाता हैं । यहाँ पर सोम से भास्वर - सोम ही अभिप्रेत है । वरुण श्रादित्यों के अधिष्ठाता हैं एवं इन्द्र - मरुत् - आदित्य रुद्र तीनों के अधिष्ठाता हैं । मरुत् और रुद्र के अधिष्ठाता इन्द्र को मरुत्वान् इन्द्र कहते हैं । आदित्याधिष्ठाता इन्द्र का नाम - मघवाइन्द्र है । इस प्रकार आदित्य इन्द्र और वरुण दोनों के अधिकार में हैं । सारे देवता चार थोकों ( वर्गों ) में बँटे हुए हैं । इन सारे देवताओं के जो एक अधिष्ठाता हैं - वे बृहस्पति हैं । इसलिए " ब्रह्म वै बृहस्पतिः ” ( शत ० ३ | १ | ४ | -( १५ ) कहा जाता है । देवता सूर्य्य के नीचे हैं एवं अङ्गिरा बृहस्पति सूर्य्य से ऊपर हैं- प्रतएव कह सकते हैं कि बृहस्पति- इन सारे देवताओं के अधिष्ठाता हैं । इन सारे देवतानों की समष्टि को ही विश्वेदेवाः कहते हैं । विश्वेदेवा कोई अलग जाति नहीं है - प्रतएव " एते वे विश्वे देवाः यत् सर्वे देवाः " ( गो ०. चाहिए । * सोम का - वरुण का विस्तृत विवेचन शतपथ द्वितीय काण्ड के पुनराधान ब्राह्मण में देखना [ ५६१ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनप्त्र ब्राह्मण ब्रा ० उ ० १।२० ) यह कहा जाता है । इस प्रकार सारे देवता - प्रग्नि - सोम - वरुण - इन्द्र और बृहस्पति इन पाँच थोकों ( वर्गों ) में बँटे हुए हैं । वसु - प्रग्नि के मातहत हैं । रुद्र - सोम के मातहत हैं । आदित्य-वरुण के मातहत हैं । मरुत् इन्द्र के मातहत हैं । वायु में एक हिस्सा इन्द्र का रहता है । इन्द्र एक प्रकार की विद्युत् का नाम है । इसीलिए - " तस्यैष श्रादेशो यदेतद् विद्युतो व्यद्युतदा " ( केन ० ४।४ ) यह कहा जाता है । १४ प्रकार के इन्द्रों में से एक इन्द्र का नाम विद्युत् है । यही इस वायु में रहता है । अतएव - " इन्द्रतुरीयो ग्रहो गृह्यते " ( ऐ ० ब्रा ० ६ । १ ) यह कहा जाता है । एक ही देवता चार भागों में विभक्त हो गए - इसका एकमात्र कारण - सोम का आतिथ्य ही सम-झना चाहिए । यदि सोम इन देवताओं में अर्थात् अग्नि में आहुत न होता तो इन देवताओं के विभाग कभी न होते । ये सारे विभाग अग्नि के हैं । अग्नि तो अग्नि है ही, वसु भी अग्नि ही है, वायु भी अग्नि ही है, अन्तरिक्ष्य सोम भी अग्नि ही है, आदित्य भी अग्नि ही है, एवं वरुण भी अग्नि ही है, जिसके लिए श्रुति कहती है-" इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद्विप्रा बहुधा वदत्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहुः " ॥ ( ऋग्वेद मं ० १ | १६४।४६ ) श्रपिच इसीलिए राजसूय का निरूपण करती हुई ब्राह्मण श्रुति कहती है— " स य एष आग्नेयोऽष्टाकपालः पुरोडाशो भवति । सोऽग्नेरेको भागो s थ यवारुणो यवमयश्चरुर्भवति यो वै वरुणः सोऽग्निः सोने भागः । ( शत ० ५।२।४।१३ ) इस प्रकार श्रुति ही वरुण को अग्नि बतला रही है । इस प्रपञ्च से कहना हमें यही है कि, वरुण चूंकि अग्नि है - प्रतएव यह देवताओं में शामिल है । प्राग्नेय प्राण का नाम ही देवता है । सृष्टि के प्रारम्भ में ये सारे देवता एकरूप थे । सारे देवता मिलितरूप से थे । बाद में एक ही अग्नि ( देवता ) एक से तीन हो गये तथा तीन से ३३ देवता हो गये । ३३ के भी पाँच थोक ( वर्ग ) बन गये । इस थोक-बन्दी का एकमात्र कारण - सोम का आतिथ्य है । प्रतिथि बन कर - यदि सोम इस प्रङ्गिरा में प्राहुत न होता तो कभी भी अग्नि की घन - तरल - विरल ये अवस्थाएँ न होतीं । जब अवस्था - भेद ही न होता तो ये देवता ही न होते । देवता न होते तो थोकबन्दी किस की होती? प्रतएव इस विभाग का एक-मात्र कारण - श्रातिथ्येष्टि ही मानना पड़ता है । जब सोम अग्नि में ग्राहुत होता है तो ग्रग्नि प्रज्वलित हो जाता है | इसी सोमाहुति के कारण ग्रग्नि के घनतरलादि अवस्था - भेद हो जाते हैं । इन अवस्था विशेषों के ही अग्नि वायु - रुद्र आदि नाम पड़ जाते हैं । इसी विज्ञान को -प्रलङ्गार रूप में परिणत कर - भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— प्रातिथ्यइष्टि यजन के फलस्वरूप देवता विभक्त हो गए । आतिथ्य-इष्टि के अनन्तर - जो देवता मिलित रूप से - एकरूपेण विद्यमान थे, वे अलग - अलग थोकों ( वर्गों ) में [ ५६२ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनन्त्र ब्राह्मण बँट गए । क्यों बँट गये, क्यों देवता विभक्त हो गये इसका कारण बतलाते हुए कहते हैं- श्रातिथ्यइष्टि के अनुसार वे देवता समत् अर्थात् कलह को प्राप्त हो गए । समत् कहते हैं - झगड़े को - ग्रहमहमिका को । इष्टि के अनन्तर देवताओं में अहमहमिका चल पड़ी । अग्नि कहते थे- मैं बड़ा हूँ, वायु कहते - मैं बड़ा हूँ- मैं क्यों तुम्हारी मातहती स्वीकार करू? इन्द्र कहते थे- मैं क्यों तुम्हारी मातहती स्वीकार करू ँ? इस प्रकार सारे देवता एक - दूसरे के प्राधिपत्य को स्वीकार नहीं करते हुए चार भागों में विभक्त हो गए । एक - दूसरे के अनुचर बनने में इन्होंने अपनी अप्रतिष्ठा समझी । अतएव सारे देवता चार थोकों ( वर्गों ) में बँट गए । तात्पर्य्य इसका यही है कि सोमाहुति के कारण सारे देवता - जो कि एक रूप में थे - नानारूपों में परिणत हो गए । सबके पास सोम आया था । भला, फिर कौन एक - दूसरे की मातहती स्वीकार करे? अतएव अपनी - अपनी पार्टियों को साथ लेकर देवता लोग परस्पर के आधि-पत्य को सहने में असमर्थ हो, चार थोकों में विभक्त हो गए । " आतिथ्येन वै देवा इष्ट्वा ( व्यद्रवन्- विभक्ता प्रभूवन्- किमर्थं तदु-च्यते ) तान् ( देवान् ) समत् ( अहमहमिका - कलहो वा ) अविन्दत् । ते चतुर्धा व्यद्रवन् श्रन्योऽन्यस्य श्रियाऽप्रतिष्ठमानाः ( श्राधिपत्यम् श्रसहमाना: ) । किस थोक का अधिपति कौन बना, यह बतलाते हैं-अग्निदेवता वसुत्रों को साथ ले कर अलग हो गए । वास्तव में बात ठीक है क्योंकि अग्नि ही तो वसुओं के अधिष्ठाता हैं । वसुनों का निवास पृथिवी है । पृथिवी अग्नि - स्थानी है - प्रतएव सुतरां वसु पर अग्नि का आधिपत्य सिद्ध हो जाता है— " अग्निर्वसुभिः " ( सहव्यद्रवत् ) । सोम रुद्रों के साथ अलग हो गए । सोम अन्तरिक्ष की वस्तु है । रुद्र अन्तरिक्ष में रहते । इसी विज्ञान को बतलाने के अभिप्राय से कहा गया है-" सोमो रुद्रैः " ( सहव्यद्रवत् ) । वरुण आदित्यों के साथ अलग हो गए— " वरुण आदित्यैः " ( सहव्यद्रवत् ) । इन्द्र मरुतों को साथ ले कर अलग हो गए— " इन्द्रो मरुद्भिः " ( सहव्यद्रवत् ) । इस प्रकार अग्नि - सोम वरुण इन्द्र ये चारों प्रधान देवता वसु - रुद्र आदित्य मरुत् इन चारों दलों को ले कर अलग - थलग हो गए । हमने पूर्व में बतलाया था कि सूर्य के ऊपर बृहस्पति हैं । बृहस्पि ही समस्त देवताओं के अधिष्ठाता हैं । बृहस्पति ही इन विश्वेदेवों को ले कर अलग हो गए - यह मत [ ५६३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनप्त्र ब्राह्मण अन्य ऋषियों का है । उनका अभिप्राय यही है कि अग्नि सोमादि समस्त देवताओं के अधिष्ठाता क्योंकि बृहस्पति हैं - प्रतएव ऐसी अवस्था में यह थोक पूर्व में बतलाये गये चारों थोंकों से अलग मानना चाहिए । याज्ञवल्क्य इसी मत का निदर्शन कराते हुए कहते हैं-" बृहस्पतिविश्वैर्देवैः - इत्यु हैकप्राहुः " | याज्ञवल्क्य कहते हैं — थोक पाँच अवश्य ही हो सकते हैं परन्तु जातियाँ ( वर्ग ) कुल चार ही रहेंगी । बृहस्पति- थोक कोई नई जाति नहीं हैं - श्रपितु इसमें पूर्ववाणित चारों वर्ग शामिल हैं । एव-मेव - बृहस्पति का जो थोक ( वर्ग ) है - जिसे कि विश्वेदेवा बतलाया जाता है वे यही चारों हैं । चार वर्गों में विभक्त देवता ही मिलित रूप से विश्वेदेवा कहलाने लगते हैं । इसी का उपपादन करते हुए कहा गया है--" एते ह त्वेव ते विश्वे देवा: - ये ते चतुर्धा व्यद्रवन् ” । तमोमय प्राप्य प्राण का नाम असुर है एवं श्राग्नेय प्राण का नाम देवता है । यह बात पूर्व के प्रकरणों में बतला दी गयी है । अग्नि जब तक घन रूप से अर्थात् मिलित रूप से रहता है तब - तक उसमें अंधकार का अर्थात् तमोमय - प्राणस्वरूप असुरों का प्रवेश नहीं हो पाता । परन्तु जब अग्नि विशकलित हो जाता है - एवं भाव में परिणत होकर विच्छिन्न हो जाता है, तब उसके सन्धि भागों में असुर भर जाते अर्थात् व्याप्त हो जाते हैं । असुर मात्रा में बहुत अधिक हैं । पृथिवी से सूर्य्य १३ हजार गुना अधिक बड़ा है । सूय्यं की अपेक्षा से जैसे पृथिवी की सत्ता है वैसे ही परमेष्ठि- मण्डल की अपेक्षा से सूर्य्यं की सत्ता है । अतएव पौराणिक लोग सूर्य्यं को परमेष्ठी की अपेक्षा से ही बुबुद् बतलाया करते थे । परमेष्ठि- मण्डल बहुत बड़ा है । इसी में असुर रहते हैं । तमोमय प्राप्य प्राण का नाम ही तो असुर है । देवता सूर्य में रहते हैं । अग्नि का नाम ही देवता है अतएव देवताओं को प्रजापति की कनिष्ठ सन्तान एवं असुरों को ज्येष्ठ सन्तान बतलाया जाता है । प्रकृत में कहना यही है कि - असुर अर्थात् तमोमय प्राण मात्रा में अधिक हैं- अतएव जरा भी मौका मिलते ही ये देवतानों में घुस पड़ते हैं । यदि सूर्य्य का प्रकाश चारों ओर अविच्छिन्न रूप से - एक रूप से - पड़ता रहता है तो उसमें अन्धकार नहीं घुस पाता । परन्तु मकान के वृक्ष के प्रथवा अन्य किसी के आवरण से यदि प्रकाश में विच्छेद हो जाता है तो उसी समय वहाँ अन्धकार घुस पड़ता है । अन्धकार, प्रकाश का विरोधी पदार्थ है - प्रतएव उसे शत्रु कहा जाता है । प्रकाश का अन्धकार के साथ जो विरोध भाव है - देवासुर संग्राम में वही शत्रुता कहलाता है । सोमाहुति से जब एक ही अग्नि नाना रूपों अवस्थाओं में परिणत हो अलग - अलग थोकों ( वर्गों ) में विभक़ हो जाता है तो उसके उन सन्धि भागों में असुर अर्थात् तमोमय प्राण घुस पड़ते हैं । इसी विज्ञान को बतलाते हुए कहते हैं- जब देवता अहमहमिका के झमेले में पड़ कर अलग - अलग हो गए-तो उनको अलग - अलग थोकों में बँटा देख कर - " अपने शत्रु देवताओं को परास्त करने का यही अच्छा गौका है " - यह सोच कर असुर लोग उनमें प्रविष्ट हो गए । जब तक देवता एक थे तब तक तो श्रसुर लोग उनसे डरते थे । परन्तु आपस की फूट के कारण जब देवता अलग हो गए तो असुरों ने अवसर [ ५६४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शेतपंथ ब्राह्मणं तनूनप्त्र ब्राह्मणं पाकर उन पर धावा बोल दिया । अर्थात् अग्नि के विशकलित होते ही उसके सन्धि - भागों में तमोमय असुर घुस गए । " तान् विद्रुतान् ( परस्परं विश्लिष्टान् ) असुररक्षसानि अनुव्यवेयुः ( अन्तः प्रविष्टा बभूवुः ) " ॥ १ ॥
इस प्रकार तमोमय प्राण अग्नि में घुस तो पड़ता है - परन्तु रोदसी त्रिलोकी में उसका अधिकार नहीं जम पाता । रोदसी में तो प्राग्नेय प्रारण की ही प्रधानता रहती है । प्राप्य प्रारण आते हैं और अपना अधिकार जमाना चाहते हैं - परन्तु इन्द्र इन सारे असुरों को मार - मार कर रोदसी से बाहर क्रन्द्रसी में निकालता रहता है । द्वादशादित्य - प्राण समष्टि का नाम ही सूर्य्य है । अग्नि - मत्यं प्रमृत भेदेन दो प्रकार का होता है । मयं अग्नि पिण्ड में रहता है - एवं अमृताग्नि पिण्ड से बाहर बड़ी दूर तक व्याप्त रहता है । सू भी अग्निमय है । इसके मर्त्याग्नि - रूप को सूर्य्यं कहते हैं जो कि पिण्डरूप से श्राकाश में स्थित रहता है । यह सूर्य्यपिण्ड - प्रणुमात्र भी अपने स्थान से नहीं हटता । इसके केन्द्र से बद्ध चारों ओर तक वितत होने वाला जो श्रमृताग्नि है उसे ही इन्द्र कहते हैं । जहाँ तक सूर्य का प्रकाशमण्डल रहता है - वहाँ तक इन्द्र की सत्ता रहती है । सूर्य्य के सोलर सिस्टम् के पेट में रोदसी त्रिलोकी है । सूर्य्य के पेट में है इसका अर्थ यही है कि इन्द्र के पेट में है । क्योंकि चारों ओर इन्द्र ही फैला रहता है, यह इन्द्र ही सर्वत्र व्याप्त हो रहा है, एक बिन्दु भी इससे खाली नहीं है, अतएव " नेन्द्रादृते पवते धाम किञ्चन " ( ऋग्वेद मं ० ९ ६६ ६ ) यह कहा जाता है । सूर्य के सोलर सिस्टम के चारों ओर परमेष्ठिमण्डल का पानी भरा हुआ है । चारों ओर आपोमय - तमस्वरूप असुरों ने सूर्य को अर्थात् देवताओं को घेर रक्खा है । परन्तु सूर्य्य अपनी प्रखर किरणों से अनवरत उस पानी को धक्का देकर बाहर फ़ेंक रहा है । इस इन्द्र के धक्के के कारण ही असुर, देवताओं पर अपना राज्य नहीं जमा सकते । यदि इन्द्र का व्यापार एक क्षण के लिए भी बन्द हो जाए तो उस समय सारे देवता अर्थात् अग्नि बुझ जाएँ । सर्वत्र असुरों का ही राज्य हो जाय । परन्तु-इन्द्र के प्रभाव के सामने सारे असुर दब जाते हैं । अतएव मानना पड़ता है कि इन समस्त देवताओं के अधिष्ठाता इन्द्र ही हैं । सारे देवता इन्द्र को अपना राजा मानते हैं । अलग - अलग थोकों ( वर्गों ) में अग्नि- सोमादि सभी देवता स्वतन्त्र शासन करते हुए भी इन्द्र का अधिपत्य अवश्य ही मानते हैं । यदि ये इन्द्र का आधिपत्य न मानें तो इनका पता ही न लगे । यही कारण है कि इन्द्र के लिए - " इन्द्रो वं यज्ञस्य देवता " ( शत ० २।३।४।३८ ) कहा जाता है । इसी विज्ञान को कथारूप में परिणत कर, साथ ही में इतिहास का ध्यान रखते हुए भगवान् याज्ञ-वल्क्य कहते हैं - प्रग्नि आदि देवता - जब अलग - अलग थोकों ( वर्गों ) में परिणत हो गए तो उन्हें कम-जोर देख असुर उनमें घुस पड़े । यह देखकर देवता घबराए | उन्होंने कहा कि लो, हम तो अलग इस-लिए हुए थे कि आपस में एक - दूसरे से दबे नहीं, एक - दूसरे की मातहती न करनी पड़े परन्तु यहाँ तो [ ५६५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण इन्द्र द्युलोक के अधिष्ठाता हैं, अतएव कहा जाता है-[ ५६६ ] तानूनप्त्र ब्राह्मण ( बृ ० उ ० १।४।११ ) ( शत ० १४।६।४।२१ ) उलटी आफत आ गई । हम तो इन असुरों के आक्रमण से दिन पर दिन क्षीण होते जा रहे हैं । जिस मातहती से बचने के लिए अलग हुए थे ग्राज हमें उसी मातहती के चक्कर में श्राना पड़ रहा है । अलग होत ही असुर और राक्षस हमारे में घुस पड़े हैं । श्राज हम शत्रुओं से रौंदे जा रहे हैं । अलग न होते तो कम से कम शत्रु की तो मातहती स्वीकार नहीं करनी पड़ती । अलग होने के कारण हम शत्रुओं के वशीभूत हो गए । इस प्रकार असुराक्रमणों से दुःखी होकर देवताओं ने मिलकर कहा कि हे देवताओं! आओ, आज हम इस पर विचार करें । सब मिल कर सलाह करें कि किस उपाय से इस शत्रु को अपने से अलग करें । अन्त में निर्णय यही हुआ कि जब तक हम एक थे- हमारा संघ था - मेल था, तब - तक असुर अपने से घबराते थे । जहां हम अलग हुए कि, इन्होने हमारे ऊपर आक्रमण कर दिया - अतएव इस आक्रमण से बचने का एकमात्र उपाय यही है कि हम सभी किसी एक के श्राधिपत्य में रहें । जब-तक अलग - अलग खिचड़ी पकती रहेगी - तब तक खैर नहीं है । यह विचार कर समस्त देवता इन्द्र के आधिपत्य में आ गए । सबने एक स्वर से इन्द्र को अपना अधिपति मान लिया । याज्ञवल्क्य कहते है कि चूंकि देवताओं ने इन्द्र को अपना स्वामी मान लिया --- " इन्द्रः सर्वा देवता, इन्द्रश्रेष्ठा देवा: " ( शत ०-३।४।२।२ ) यह प्रसिद्धि चल पड़ी । " तेऽविदुः । पापीयांसो वै भवामोऽसुररक्षसानि वै नोऽनुव्यवागुः ( अनु-गताः ) द्विषद्द्भ्यो वै रध्यामः ( वशंप्राप्ताः ) । हन्त संजानामहाऽएकस्य श्रियै ( श्राधिपत्यस्य ) तिष्ठामहाऽइति । तऽइन्द्रस्य श्रियाऽप्रतिष्ठन्त । तस्मादाहु-रिन्द्रः सर्वादेवता इन्द्रश्रेष्ठा देवा इति " ॥२ ॥
शासन का काम इन्द्र का है । ब्रह्म क्षत्रविड् वीयों में सबसे श्रेष्ठ क्षत्रवीर्य्यं ही माना जाता है-अतएव कहा जाता है— " तस्मात् क्षत्रात्परं नास्ति तस्माद्ब्राह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये " । " यथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी " । इन्द्र से अधिक शक्तिशाली देवताओं में अन्य नहीं है । इन्द्र ही यज्ञप्रवर्तक हैं । इन्द्र ही बल-वानो में बलवान हैं । इसी के बल पर समस्त देवता नाचा करते हैं । अतएव " या च का च बलकुतिरिन्द्र कर्म एव तत् " यह कहा जाता है । यज्ञ ही देवताओं का जीवन है । यज्ञ का प्रवर्तक इन्द्र ही है । जैसा कि श्रुति कहती है-" यज्ञ इन्द्रमवर्धयत् । यद्भूमि व्यवर्तयत् । चत्राण ओपशं दिवि " । ( ऋग्वेद मं ० ८ । १४।५ )
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनंत्र ब्रह्मण अतएव इन्द्र को सारे देवताओं का अधिपति वतलाया गया है । देवता अलग होकर संघ शक्ति को तोड़ कर थोकों ( वर्गों ) में बँट गए । इस का फल उन्हें यह मिला कि उन पर असुर आक्रमण करने लगे । अन्त में देवताओं को शान्ति तभी मिल पाई - जब वे वापस संगठित हो गए । अतएव श्रुति उपदेश देती है— उन्हें चाहिए कि वे अलगाव को न पनपने दें, कभी अलग होने की इच्छा न करें । संघ में शक्ति रहती है । स्वतन्त्रता की घुन में आ कर संघ को तोड़ डालना अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारना है । अतएव कभी भी संघ को नहीं तोड़ना चाहिए । सदा मिलजुल कर, एक को गृहस्वामी मान कर ही जीवन - यात्रा का निर्वाह करना चाहिए -. " तस्मादु ह न स्वा ( ज्ञातयः परस्परं ) ऋतीयेरन् । ( वैमत्येन विश्लेषं न कुर्युः ) " । जो मनुष्य मूर्खतावश संघ - शक्ति तोड़ कर अलग हो जाते हैं - उनके दूर रहने वाले शत्रु भी उनकी शक्ति क्षीण होते देख कर उनमें घुस पड़ते हैं । शत्रु तो मौका देखा करते हैं कि, कब इनमें फूट हो और कब अपनी दाल गले । फूट का परिणाम यह होता है कि -अन्त में ये शत्रुओं के द्वारा रौंदे जाते हैं । अतएव जिसे अपने कल्याण की वांछा हो उसे चाहिए कि वह कभी भी संघ से पृथक् न हो । संघ शक्ति है | कौटुम्बिक जीवन ही सच्चा जीवन है । पाश्चात्य देशों में - इस व्यवस्था के अभाव में शान्ति व्याप्त है । पिता - पुत्र से स्वतन्त्र है, पुत्र - पिता से स्वतन्त्र है । पिता - पुत्र को कोई वस्तु देता है तो पुत्र थैंक्यू ( धन्यवाद ) कहता है । पुत्र - पिता को कोई वस्तु देता है तो पिता पुत्र से थैंक्यू कहता है । कैसा वीभत्स दृश्य है? नव - शिक्षा दीक्षित कितने ही भारतीय भी आज इस वातावरण में घुस रहे हैं । आवेश में आ कर भारतीय कौटुम्बिक व्यवस्थानों को पोपलीला बतला कर इनका उपहास कर रहे हैं । परन्तु उन्हें सोचना चाहिए कि इसमें सिवाय अशान्ति के और कुछ भी लाभ नहीं है । वेद भारत का हृदय है । भारतीयों का विश्वास है कि - वेद साक्षात् परमेश्वर की वाणी है । वह स्पष्ट शब्दों में “ तस्मादु ह नःस्वाऋतोयेरन् " इन श्रुति वाक्यों द्वारा संघ से स्वतन्त्र होने का विरोध कर रहा है, किन्तु उसी के पुत्र इसे पोप - लीलादि बतला रहे हैं । यदि ऐसा ही करते रहे तो क्या होगा इसका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं— " य ( शत्रुः ) एषां ( विश्लिष्टानाम् ) परस्तरामिव ( पृथक्तरमिव ) भवति स एनाननुव्यवैति । ( प्रपिच ) ते ( विश्लिष्टाः ) प्रियं द्विषतां कुर्वन्ति ( शत्रुरणांयथा प्रियं हितं स्यात्तथा कुर्वन्ति ) । द्विषद्द्भ्यो रध्यन्ति ( वशं प्राकु-र्वन्ति ) तस्मान्नतयेरन् ” । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जो मनुष्य, जो विद्वान, इस रहस्य को जान कर संगठन की शक्ति को नहीं तोड़ता वह शत्रुओं के लिए अप्रिय है । क्योंकि वह मनुष्य उनको आक्रमण करने का मौका नहीं देता है । ऐसे सावधान - संगठित मनुष्य कभी भी शत्रु के वश में नहीं आते हैं । अतएव वेदपुरुष की आज्ञा यही है कि असंगठित मत बनो -संघ को तोड़ कर स्वतन्त्र होने की चेष्टा मत करो -[ ५६७
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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण तानून ब्राह्मणं " सयो हैवं विद्वान्नर्तीयते अप्रियं द्विषतां करोति न द्विषद्द्भ्यो रध्यति तस्मान्नऽतयेत " ॥३ ॥
अब, तानूनप्त्रेष्टि क्या है— इसके प्राकृतिक विज्ञान का तात्त्विक रहस्य बतला रहे हैं । अब तानूनप्त्र का स्वरूप बतलाने के लिए भूमिका स्थापित करते हैं । इन्द्र को अधिष्ठाता बना कर देवताओं असुरों को निकाल कर प्रतिज्ञा की कि हम सब इन्द्र के आधिपत्य में रहेंगे एवं कभी संगठन - शक्ति नहीं तोड़ेंगे । यह प्रतिज्ञा तो कर ली परन्तु सम्भव है - प्रागे जा कर हम में से कोई इस प्रतिज्ञा को तोड़ वंठे - अतएव हमें ऐसा उपाय करना चाहिए कि जिससे मरते दम तक अपना संघ अजेय हो जाए । जब तक प्राण रहें तब तक अपना संघ - अपना मैत्र्य - न छूटे । अपना संघ यावज्जीवन अजर्थ्य रहे, कभी जीर्णं न हो, कोई ऐसा उपाय करना चाहिए । मन के आधार पर प्राण रहता है । प्राण ही का नाम स्वयम्भू - मण्डल है । उसी से प्रागे की सारी सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं । हम ऐसा करें - ऐसा करें, यह व्यापार उसी प्रजापति की प्रेरणा से हुआ करता है । सृष्टि को बने हुए लाखों वर्ष हो गए - परन्तु अभी तक इन देवताओं का संघ टूटा नहीं है । देवतो आज भी उसी प्रतिज्ञा पर दृढ़ हैं । क्या मजाल, प्रसुर रोदसी त्रिलोकी में व्याप्त हो जाएँ । प्राण देवताओं ने इन्द्र ही को अपना अधिपति मान रक्खा है । इन सब का मूल वही प्रजापति है । उसी की इच्छा से सब - कुछ हो रहा है । सृष्टि के प्रारम्भ में उसने ऐसा ही चाहा था । देवताओं का चाहना-उसी प्रजापति का चाहना है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-“ ते होचुः - हन्तेदं ( मैत्र्यं - संघटनम् ) तथा करवामहै - यथा न ( अस्मा-कन् ) इदम् ( सुसंघटनं ) आप्रदिवम् एव ( यावज्जीवनमेव ) प्रजर्यं ( अविनाश्यम् ) असत् ( भवेत ) " इति ॥४ ॥
यह विचार कर देवताओं ने अपना सबसे अधिक प्रिय जो शरीर है, उसे और जो अत्यन्त प्यारी वस्तुएँ हैं जिनसे वियोग हो जाने पर दुःख होता है, उन्हें एकत्र रख दिया । देह एवं प्रिय वस्तु को " प्रियाणि " और " जुष्टा " इसीलिए कहा है कि जो मामूली वस्तु होती है यदि वह छिन भी जाए तो ज्यादा दुःख नहीं होता परन्तु बहुमूल्य और प्रतिप्रिय वस्तु का बिछोह हो जाता है तो बहुत कष्ट होता है । इस प्रकार सब वस्तुओं को एक स्थान पर रख कर देवताओं ने कहा कि जो देवता अपनी प्रतिज्ञा का प्रतिक्रमण करेगा, इन्द्र के प्राधिपत्य की प्रतिज्ञा कर बाद में मुकर जाएगा वह देवता - संघ से बहिष्कृत माना जाएगा । इतना ही नहीं अपितु वह उस प्रिय वस्तु से भी वश्चित कर दिया जाएगा । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " ते देवा: - जुष्टास्तनूः प्रियाणि धामानि सार्धं ( सहैव ) समवददिरे ( विभज्य स्थापितवन्तः ) - ( एवं कृत्वा ) ते होचुः - एतेन नः ( अस्माकंमध्ये ) -[ ५६८ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनपत्र ब्राह्मण सनाना ( पृथक् ) असत् । एतेन ( प्रियेणधाम्ना ) - ( अभिः ) । विष्वङ् ( विशीर्णो ) यो न एतत् । ( एतेन प्रतिज्ञां - संघटनं वा ) प्रतिक्रामात् ( अतिक्रामेत् ) " इति । इस प्रकार अपनी प्रतिज्ञा को अजर्थ्य बनाने के लिए देवताओं ने अपनी - अपनी बहुमूल्य प्राण-वस्तुओं को अलग कर तय कर लिया कि जो प्रतिज्ञा भंग करेगा, उसे मण्डली से खारिज कर दिया जाएगा एवं उसकी बहुमूल्य वस्तु भी जप्त कर ली जाएगी । परन्तु अब चिन्ता इस बात की हुई कि ये वस्तुएँ रक्खें किस के पास? अपने में से तो इसका रक्षक कोई बन ही नहीं सकता है, क्यों कि अपने लिए तो यह कष्ट - कर्म ही है । ऐसी अवस्था में किस की साक्षी में अपने इन प्रिय पदार्थों को रक्खें? किसे यह अधिकार दिया जाए?? " कस्योपद्रष्टुः " ( कस्य पुरस्तादिदं भवेत् इति तात्पर्य्यम् ) । आखिर यह तय हुआ कि तानूनध्य शाक्वर है— उसकी निगरानी में अपने प्रिय पदार्थ रक्खें जाएँ । वे ही इस कार्य के लिए उपयुक्त हैं । उन्हें इस बात का अधिकार दे दिया जाए कि जो जरा भी गड़बड़ करे उसकी वस्तु जप्त कर उसे तत्काल मण्डली से निकाल दिया जाए । " तनूनप्तुरेव शाक्वरस्य - ( उपद्रष्टुरिति शेषः ) " इति । रोदसी - क्रन्दसी - संयती ये तीन त्रिलोकियाँ बतलायी गयी हैं । तीनों में से क्रन्दसी के वायु को " तनूनपात् शाक्वर वायु ” कहते हैं । पारमेष्ठ्य वायु चूंकि प्रापोमय है - प्रतएव उसे " साम्ब सदाशिव " कहा जाता है । संसार में जीवन का मूल आधार यही शिववायु है । जिस क्षण भी शिववायु निकल जाता है उसी क्षण आत्मा उत्क्रान्त हो जाता है । इसी साम्बसदाशिव पारमेष्ठ्यवायु की सत्ता से ही श्वास - प्रश्वास की स्थिति रहती है । इस वायु का मूल स्थान यद्यपि परमेष्ठी है - तथापि यह व्याप्त सर्वत्र है | श्रावण के महिने में - यह साम्बसदाशिव वायु पृथिवी पर अधिक मात्रा में आता है । अतएव एक महिने तक इसी साम्बसदाशिव की उपासना की जाती है । प्रतिष्ठा - स्थापक यही साम्ब सदाशिव है । इस प्रकार क्रन्दसी का यह वायु ही यच्चयावत् प्राणिमात्र का जीवन है । परन्तु रोदसी त्रिलोकी का वायु ठीक इसके विरुद्ध व्यवहार वाला है । रोदसी वायु के प्रविष्ट होते ही शरीर यष्टि गिर जाती है । मनुष्य इसके श्राक्रमरण से बीमार हो जाता है, या फिर मर भी सकता है । इसे " रुद्र " किंवा ' यम ' कहा जाता है । ग्रीष्म ऋतु में जो प्रचण्ड ' लू ' चलती है - वह साक्षात् रुद्र भगवान् है । जिस पर भी इनका हाथ पड़ जाता है, वह संसार से विदा होता ही दीखता है । क्रन्दसी वायु शरीर की रक्षा करती है । शरीर को गिरने नहीं देती है - प्रतएव " तनून् पातयति " इस व्युत्पत्ति से इसे तनूनपात् कहा जाता । शक्तिशाली को शाक्वर कहते हैं । शक्ति सोम ही में अधिक रहती है । अग्नि तो विशकलनधर्मा है । दृढ़ता सोम ही से आती है । चन्द्रभा सोम - पिण्ड है । इसी से क्षमता प्राती है । अतएव इसके परिभ्रमण - वृत्त को ' दक्ष ' कहा जाता है । सोम परमेष्ठा की [ ५६६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनप्त्र ब्राह्मण वस्तु है । वहाँ पर रहने वाला सोम प्रतिबलिष्ठ है । अतएव " शक्रोनीति " व्युत्पत्ति से उस सोम को शक्वर कहते हैं । यह वायु ( ऋन्दसी वायु ) परमेष्ठी की वस्तु है । तनूनपात् रहता सर्वत्र है - परन्तु मूल स्थान इसका परमेष्ठी है मतएव " तत्रभवः " से इस वायु को - शाक्वर कहा जाता है । प्रपिच इसे शाक्वर कहने का एक कारण और भी है । पृथिवी का जो रथन्तर साम है— उसमें अग्नि और सोम दो पदार्थ रहते हैं । पृथिवी ही में नहीं संसार के यच्चयावत् पदार्थों में ये दो पदार्थ रहते हैं । सोम - वि और भास्वर भेद से दो प्रकार का है । इस प्रकार - दो सोम ( दिक्- भास्वर ) और एक अग्नि- ये तीन पदार्थ हो जाते हैं । इन तीनों में से अग्नि के साम को रथन्तरसाम कहते हैं । इसको रथन्तर पृष्ठ भी कहा जाता है । भास्वर सोम के पृष्ठ को वैराज पृष्ठ कहा जाता है । दिक् सोम के पृष्ठ को शाक्वर पृष्ठ कहा जाता है - यह तनूनपात् वायु इसी शाक्वर पृष्ठ की वस्तु है । इसीलिए इसे भी शाक्वर कहते हैं । इस पारमेष्ठ्य वायु में सारे देवताओं के प्रिय पदार्थ रक्खे रहते हैं । देवताओं की अर्थात् श्राग्नेय प्राणों की सर्वाधिक प्रिय वस्तु सोम ही है । यदि अग्नि में सोम न श्राए तो देवताओं का सर्वनाश हो जाए । अग्नि की स्थिति तभी तक है, जब तक कि उसमें सोमाहुति होती रहे । जब तक अग्नि में सोम आता रहता है तभी तक शरीर की स्थिति है । सोम पारमेष्ठ्य है । उसका श्रधिष्ठाता यही तनूनपात् वायु है । वायु के धक्के से ही - सोम अग्नि में प्राहुत होता है । यह तो हुप्रा आधिदैविक अर्थ; अब लेते हैं अध्यात्म की बात । अध्यात्म में समस्त देवता मौजूद हैं । शरीर को जहाँ से भी छूते हैं वहीं से गरम लगता है । यही अग्नि है । मस्तिष्क में विज्ञान- प्रदाता इन्द्र रहता है । सोम अन्न के रूप में आहुत होता रहता है । हम जो वाक् बोलते हैं वही अग्नि है । चक्षु ज्योति ही सूय्यं है । अतएव " अग्निवान् भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः " – ( ऐत ० उ ० २।४ ) यह कहा जाता है । इन सारे देवताओं की स्थिति - तनूनपात् के आधार पर रहती है । वायु- संचालन से ही अस्थिमांसादि का निर्माण होता है । यदि शरीरस्थ देवता प्रतिज्ञा तोड़ें तो उसी समय वायु उन्हें नष्ट कर दे । प्रज्ञापराध हुआ नहीं कि प्रकृति ने काम बिगाड़ा नहीं । यही प्रजाओं का साक्षी है । यह अध्यात्म में अधिदैवत में, सर्वत्र प्रविष्ट है | अध्यात्म में तनूनपात् कौन सा है - यह देखने के लिए प्राणापान पर ध्यान देते हैं । हम जो श्वास-प्रश्वास ले रहे हैं, वही तनूनपात् है । जब तक श्वास आता रहता है, तभी तक शरीर का स्वरूप स्थित है । जिस क्षण भी श्वास नहीं आएगा उसी समय प्राण पखेरू उड़ जाएँगे । अधिदैवत में इसके स्वरूप को देखने के लिए बहते हुए वायु पर ध्यान दें । जिस शीतलवायु के संचरण और स्पर्श मात्र से तबियत हरी हो जाती है वही तनूनपात् है । देवताओं का उपद्रष्टा अर्थात् साक्षी यही है । इसी प्राकृतिक विज्ञान को बतलाते हुए कहते हैं-" कस्योपद्रष्टुरिति । तनूनप्तुरेव शाक्वरस्येति । यो वाऽयं पवते -एष तनूनपाच्छाक्वरः । सोऽयं प्रजानामुपद्रष्टा प्रविष्टस्ताविमौ प्राणोदानौ ॥५ ॥
यह वायु प्रजाओं का साक्षी बन कर शरीर में अन्तःप्रविष्ट हो रहा है । वायु ही शरीरस्थ देवताओं का एवं अधिदैवत देवताओं का साक्षी है । शरीर में जो भी कुछ काम अच्छा या बुरा होता [ ५७० ]