Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 581–590
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 581–590
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनपत्र ब्राह्मण है - वायु उसी समय उन विद्वान् देवताओं को खबर कर देता है । तनूनपात् वायु से आँख छुपा कर शरीरस्थ- प्राण- देवता कोई भी काम नहीं कर सकते हैं । देवता - वैज्ञानिक महर्षि - आदि इसी वायु के माध्यम से मनुष्य ' के मन की बात पहचान जाते हैं । मनुष्य मन से जैसा संकल्प करता है - वह संकल्प-प्राण पर आता है । संकल्प करते ही प्राण पर धक्का लगता है । प्रारण धक्का खा कर जब बाहर निक-लने लगता है तो रास्ते में विद्यमान वायु पर पड़ता है । वायु से इसका प्रभाव वातावरण पर पड़ता है । इस आधार पर मनुष्य के मन में जो भी इच्छा या संकल्प होता है, विद्वान् लोग वातावरण के द्वारा उसे पहचान लेते हैं । मन वायु पर धक्का मारता है । वह वायु को प्रेरित करता है । वायु से ही मनुष्य की मुखाकृति पर सूक्ष्म भाव - दशाओं अथवा विचार तरंगों का वितान निम्मित हो जाता है । बात सच है, मामूली बातें तो आकृति से सामान्य मनुष्य की भी पहचान में श्रा जाती हैं । इस समम अमुक मनुष्य दुःखी है, या सुखी है, यह आकृति -विन्यास से बतलाया जा सकता है । परन्तु जो वैज्ञानिक ( सूक्ष्म तत्त्व - वेत्ता ) मनुष्य होते हैं, जिन्हें इस वायु - विज्ञान का ज्ञान है, वे वायु की सूक्ष्म तरंगों से ही व्यक्ति की इच्छाएँ जान लेते हैं । तात्पर्यं कहने का यही है कि मन जिस समय संकल्प करता है, तब शान्त और स्थिर प्राण-वायु क्षुब्ध हो विकृत हो जाता है । विकृत होकर अन्तः वायु प्रारण के धक्के से रोमावलियों द्वारा जब बाहर निकलता है - तो शरीर के चारों ओर वेष्टित जो बाह्य वायु है, उस पर धक्का मारता है । जैसी लहर अन्तः वायु की होती है, वैसी ही लहर बाह्य वायु में भी पैदा हो जाती है । इन्हीं लहरों ( वायु-मण्डल ) के द्वारा ही मनुष्य के मन की स्थिति को जाना जा सकता है । इसी अभिप्राय से— " प्रत्ययस्य परिचित्ति - ज्ञानम् " ( यो ० ३।२ ९ ) कहा जाता है । इस अन्तर्यामी विज्ञान का उपहासकर्ता श्राधुनिक पाश्चात्य जगत् क्या स्वयं उपहासास्पद नहीं बनता? निष्कर्षतः हम इस वायु को - उपद्रष्टा ( साक्षी ) कहने के लिए तय्यार हैं । " तस्मादाहुः - मनो देवा मनुष्यस्याजानन्तीति । मनसा संकल्पयति - तत् प्राणमपिपद्यते, प्राणो वातम् - वातो देवेभ्य श्राचष्टे - यथा पुरुषस्य मनः " ॥६ ॥
इसी अभिप्राय से वेद महर्षि कहते हैं -" मनसा संकल्पयति तद् वातमपि गच्छति ।
वातो देवेभ्य श्राचष्टे यथा पुरुष ते मनः " ॥७ ॥
तनूनपात शाक्वर वायु की साक्षी में देवताओं ने अपने प्रिय स्वरूपों को एकत्र किया । यह तानू-नत्र वायु वास्तव में देवताओं के प्रिय पदार्थों का साक्षी है । यही उपद्रष्टा बन कर शरीर में अर्थात् अध्यात्म में एवं अधिदैवत में प्रविष्ट हो रहा है । अध्यात्म में यह वायु प्राणोदान स्वरूप से है, तो अधिदैवत में - प्रवहमान स्वरूप से सश्चरित है | शरीरस्थ देवता जो कुछ कर रहे हैं - वायु उसकी निग-रानी रखता है । इसी से देवतागण - मनुष्यों के मन का हाल जान पाते हैं । इस तानूनप्त्र के विषय में एक विशेष बात और बतलानी है - प्रतएव पुनः पूर्वोक्त कथन का अनुवाक् करते हैं -[ ५७१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनप्त्र ब्राह्मरण उन देवताओं ने अपने जो प्रियतनु थे उनको तथा प्रिय स्थानों को एक साथ एक कर, तनू-नपात् की साक्षी में - अपने से अलग कर रख दिया और कहा कि, हम में से जो भी इस सत्यप्रतिज्ञा का उल्लंघन करेगा, उसे हमारी मण्डली से पृथक् कर दिया जाएगा एवं वह अपने उस प्रिय स्वरूप से तथा प्रिय स्थान से भी हाथ धो बैठेगा -" ते देवा जुष्टास्तनूः प्रियाणि धामानि सार्द्धं समवददिरे । ते होचुः एतेन नः स नाना s सद्, एतेन विष्वङ् ( असत् ) यो न एतदतिक्रामात् ( अति-क्रामेत् ) " इति । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि देवताओं ने सृष्टि के प्रारम्भ में तनूनपात् को साक्षी बना कर जो तान किया था अर्थात् शपथ ली थी कि यदि हम अपनी प्रतिज्ञा से च्युत हो जाएँ तो हमारी प्यारी से प्यारी वस्तु नष्ट हो जाए उस अपनी शपथ का वे कभी भी उल्लंघन नहीं करते हैं । इसीलिए अग्नि, सोम, इन्द्र, वरुण चारों देवता मिल कर तनूनपात् की साक्षी से एकीभूत हो कर उसी इन्द्र ( सूर्य्यं ) के आधिपत्य में विद्यमान हैं । जहाँ अग्नि रहता है— वहीं पर सोम, इन्द्र और वरुण अवश्य रहते हैं । एक के बिना दूसरा fe नहीं रह सकता है । संसार के यच्चयावत् पदार्थ अग्नि - सोमात्मक हैं - यह बात हमने कई बार कह दी है । अग्नि जहाँ रहता है- वहीं पिण्ड बनता है । पिण्ड बनाना नित्याग्नि का काम है । अग्नि जहाँ पिण्ड रूप में परिणत हुआ कि बाकी के तीनों देवता भी उसमें सम्मिलित हो जाते हैं । श्रग्नि — घन - तरल - विरल भेद से अग्नि- वायु - प्रादित्य स्वरूपों में परिणत हो जाता है । वायु अन्तरिक्ष- स्थानीय है - अतएव इसे सोम भी कह दिया जाता है । इसी प्रकार आदित्य से -इन्द्र अभि-प्रेत है । दूसरा जो सोम है, वही चौथा प्रापोलोक कहलाता है । इसी का नाम वरुण है । यह वरुण भी श्रग्नि ही है । इस प्रकार - अग्नि- सोम इन्द्र- वरुण चारों देवता - उस पारमेष्ठ्य वायु की साक्षी में सदा साथ रह कर सूर्य्य के आधिपत्य में रहते हैं । आज भी वे अपनी प्रतिज्ञा पर सत्यव्रती हैं, दृढ हैं । कभी वे उस सत्य - पथ का अतिक्रमण नहीं करते हैं । इसीलिए " सत्यसंहिता वे देवा: " ( ऐ ० ब्रा ० १।६ ) यह कहा जाता " तद्देवा श्रप्येतहि नातिक्रामन्ति " । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यदि देवता लोग शपथ का अतिक्रमण कर देंगे तो फिर वे कहाँ रहेंगे? शपथ तोड़ने पर, सत्य से च्युत हो जाने पर उनकी सत्ता ही कहाँ रहेगी? अपनी प्रतिज्ञा तोड़ते ही वे झूठ बोलेंगे । सत्य - भाव से उनका आत्मा गिर जाएगा । रेलगाड़ी जब तक अपनी नियत लाइन पर चलती रहती है— तभी तक उसके स्वरूप की रक्षा होती । यदि वह लाइन को छोड़ देती है- तो चकनाचूर हो जाती है । उसका अंगभंग हो जाता है । ठीक यही बात यहाँ है । सत्य पर चलूँगा - कभी प्रतिज्ञा से विमुख नहीं होऊँगा, यदि प्रतिज्ञा से विमुख हो जाऊँ तो मेरी प्यारी से प्यारी वस्तु- अर्थात् मात्मा मुझ से अलग हो जाए - मेरा सर्वनाश हो जाए इस प्रकार तनूनपात् वायु की साक्षी में शपथ [ ५७२ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) 11 तस्माद्यशः 1 शतपथ ब्राह्मण तनूनप्त्र ब्राह्मण " के हि स्युर्यदतिक्रामेयुः " । " अनृतं हि वदेयुः " । रोदसी त्रिलोकी में [ ५७३ ] लेकर यदि देवता विमुख हो जाएँगे तो यह वायु इनके स्वरूप को छिन्न - भिन्न कर डालेगी । उसी समय इनका आत्मा - उस वाक् - सामर्थ्य से नष्ट हो जाएगा । जब तक ये सत्य पर रहते हैं - तभी तक इनकी आत्मा में बल रहता है अतएव पतनाभिमुख वायु को सन्धि नहीं मिलती । परन्तु - " अरे तोड़ो प्रतिज्ञा को " - यह खयाल होते ही सन्धि हो जाती है । अर्थात् अवकाश मिल जाता है । इसलिए तनूनपात् वायु सन्धिस्थान में घुस कर सर्वनाश कर डालता है । शपथ तोड़ना - मिथ्या बोलना - अपनी लीक से हटना है एवं ऐसा करना भपने ही सर्वनाश को निमन्त्रण देना है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— यदि प्रतिज्ञा का अतिक्रमण करेंगे तो क्या वे रहेंगे? - कदापि नहीं । प्रतिज्ञा तोड़ने से देवता क्यों नष्ट हो जाएँगे - इसकी उपपत्ति बतलाते हुए कहते हैं-प्रतिज्ञा तोड़ते हुए वे मिथ्या बोलेंगे - सत्य मार्ग से च्युत होंगे तो यही उनके नाश का कारण होगा परन्तु प्राण - देवता पतन के इस कारण को भली प्रकार से जानते हैं - अतएव देवता एकमात्र सत्यव्रत का ही प्राचरण करते हैं । वे जानते हैं कि यदि हम सत्य से विमुख हो जाएँगे तो हमारी सत्ता ही नहीं रहेगी । अतएव अन्य प्रपवों में न पड़ कर वे एकमात्र सत्यव्रत के पालन में ही तत्पर रहते हैं । यही कारण है कि देवताओं का असुरों से जीता हुआ जो द्रव्य है - सम्पत्ति है - वह अनपजय्य | देव-ताओं की सम्पत्ति सर्वथा अजेय है । किसी की भी इतनी मजाल नहीं है कि वह देवताओं और उनकी सम्पत्ति पर नजर उठा कर देख सके । श्राग्नेय प्राण के सामने तमोमय प्रारण की क्या ताकत है? आग्नेय प्राण में सत्य की ही महिमा है । श्रग्नि में ताप है - प्रकाश नहीं । प्रकाश इन्द्र का धर्म है । प्रकाश ही असुरों का विरोधी है -- प्रतएव जब तक सारे देवता मिल कर अपने सत्य पर दृढ़ रहेंगे तभी तक खैर ( कुशल ) है । अपि च इसी सत्य बल के कारण ही देवता आज यशस्वी हो रहे हैं । सर्वत्र - इन्हीं की तूती बोल रही है-" एक ह वै देवा व्रतं चरन्ति - सत्यमेव । तस्मादेषां जितमनपजय्यम्, भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, इस सत्य - विज्ञान अथच सत्य - बल को जान कर जो मनुष्य सत्य बोलता है— उसका जो जित है अर्थात् सम्पत्ति है वह सर्वथा अनपजय्य रहती है । सत्यवादी की सम्पत्ति का कभी नाश नहीं होता । सत्यवादी मनुष्य देवताओं की तरह यशस्वी हो जाता है— " एष वै जातो जायते सर्वाभ्य एताभ्यो देवताभ्यः " । ( ऐ ० ब्रा ० ११।२ ) यही हमारे विज्ञान का सिद्धान्त है । अधिदैवत --मण्डल में जो प्राण - देवता हैं - वे ही हमारे में-हैं अर्थात् अध्यात्म में हैं - एवं वे ही अधिभूत में है । इसीलिए यह कहा जाता है ।
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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनप्त्र ब्राह्मण “ यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विहः " । ( कठो ० २ । १ । १० ) प्रकृतिमण्डल में अग्नि - वायु ( सोम ) - इन्द्र - वरुण ये चार देवता हैं । ये ही चारों देवता हमारे शरीर में भी रहते हैं । इन्हीं देवताओं से हमारे शरीर का निर्माण होता है । इन्द्र को श्रादित्य कहते हैं । यह आदित्य प्राण - रूप में परिणत होकर हमारे शरीर में आता है । अग्नि - अपान रूप से परिणत हो कर आता है । वायु व्यान स्वरूप में परिणत होकर आता है । शरीर में जो खून है वही वरुरण है । शरीर में जो पानी का हिस्सा है - वह भी वरुण है । इस प्रकार प्रारण - प्रपान - व्यान - असृक् रूप से परिणत हो कर चारों देवता अध्यात्म में व्याप्त रहते हैं । इन चारों में से जो अग्नि है - उसका नाम वैश्वानर है । यही भूतात्मा कहलाता है । सोम के प्राण के मेल से उसी को प्रज्ञानात्मा कहने लगते हैं । यह प्रज्ञा-नात्मा- अर्थात् चारों देवता - शिरोगुहा में रहने वाले विज्ञान के, अर्थात् सूर्य के अधीन रहते हैं । परन्तु ध्यान रहे कि वायु की, अर्थात् व्यान की साक्षी में, चारों एक सूत्र में बद्ध हो कर रहते हैं । यदि व्यान का सहारा देवता न लेंगे तो उसी समय नष्ट हो जाएँगे । सारे देवताओं में वायु ही प्रधान है । जब तक श्वास श्राता रहता है तभी तक चेतना अर्थात् इन्द्र रहता है । तभी तक गर्मी अर्थात् अग्नि रहता है । हृदय से ऊपर प्राण है - वह इन्द्र है । हृदय से नीचे अपान है - यही अग्नि है - पृथिवी - लोक है । सारे देवता मध्यस्थ व्यान के आधार पर अवलम्बित हैं । अतएव श्रुति कहती है-" न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ” ॥ ( कठो ० उ ० २।२।५ ) " मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा उपासते " । ( कठो ० उ ० २।२१३ ) ये चारों देवता विज्ञान के आधार पर रहते हैं । विज्ञान शिरोगुहा में रहता है । यह विज्ञान सूर्य्यस्थानापन्न है । धियो यो नः प्रचोदयात् से मानना पड़ता है कि विज्ञान सूय्यं की वस्तु है । जिसमें जितना अधिक सौर प्रारण होगा- वह उतना ही अधिक बुद्धिमान होगा । इस विज्ञान के प्राश्रित - प्रज्ञान अर्थात् सारे देवता रहते हैं । इसी विज्ञान को ' क्षेत्रज्ञ ' कहा जाता है । यही कारयिता है अतएव यह कहा जाता है— " यो s स्मात्मनः ( प्रज्ञानात्मनः ) कारयिता तं क्षेत्रज्ञं प्रचक्षते " । इस प्रकार जो स्थिति प्रकृति में है वही अध्यात्म में है । फर्क इतना है कि अध्यात्म में प्रायः प्रज्ञान उत्वरण रहता है तथा विज्ञान अनुत्व रहता है । अधिदेवत में विज्ञान उत्वरण रहता है- तथा प्रज्ञान दबा रहता है । इसका कारण यही है कि हम पृथिवी पर उत्पन्न होते हैं - प्रतएव सौर -प्राण ( विज्ञान ) की अपेक्षा पार्थिव - प्राण ( प्रज्ञान ) हमारे में अधिक मात्रा में आता है । पृथिवी में असुर अर्थात् तमोमय प्राण रहते हैं - अतएव पार्थिव प्राण के साथ ये असुर भी हमारे अन्दर घुस पड़ते हैं— इसीलिए प्रज्ञान उल्वरण हो जाता है । यदि हम कभी बुरा काम करना चाहते हैं तो हमारे भीतर कोई [ ५७४ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनन्त्र ब्राह्मण बोलता है - देखो । ऐसा मत करो - इसमें तुम्हारा पतन है । यह कहने वाला विज्ञान है । एवं जो करूँ -करू ँ कहने वाला है - वही प्रज्ञान है । चूंकि यह प्रबल रहता है- अतएव मनुष्य पतन की ओर झुक जाता है । बस जहाँ प्रज्ञान ने अर्थात् देवताओं ने विज्ञान का अर्थात् सूर्थ्य का श्राधिपत्य छोड़ा - वहीं सर्वनाश हुआ । प्रज्ञापराध से ही - मनुष्य का सर्वनाश होता है । परन्तु यह बात प्रकृति में नहीं हो पाती । प्राकृतिक देवताओं में सौर प्रारण उल्वण रहता है- प्रतएव पार्थिव प्रारण ( असुर ) वहाँ पर अधिकार नहीं जमा सकते प्रतः देवता कभी भी सत्य से च्युत नहीं होते । इसीलिए कहा जाता है— " सत्य संहिता वै देवाः प्रनृत संहिता मनुष्याः " । ( ऐ ० ब्रा ० १।६ ) यह विज्ञान विद्यादि साधनों के द्वारा बढ़ाया जा सकता है । अतएव विद्वान् को चाहिए कि सात्त्विक पदार्थों द्वारा - विद्या द्वारा - विज्ञान को सदा सम्पन्न रक्खें, सदा सत्य बोलते रहें, दैवी सम्पत्ति से युक्त रहें, श्रासुरी सम्पत्तियों से सदा परहेज करते रहें । यदि इस प्रकार नियम- पूर्वक चलते रहें और सत्य पर दृढ़ रहें तो आपको त्रिलोकी में किसी भी प्रकार का भय नहीं रहेगा । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" एवं ह वा अस्य जितमनपजय्यम्, एवं यशो भवति य एवं विद्वान्त्सत्यं वदति " । देवताओं ने आतिथ्येष्टि के अनन्तर - तनूनपात् को साक्षी बना कर तानूनप्त्र अर्थात् शपथ - कर्म्म किया था । " यद्वै देवा श्रकुर्वंस्तत् करवारिण " यह हमारा सिद्धान्त है । अतएव यजमान निदानेन घृत का स्पर्श करके तानूनप्त्र करता है । वायु की साक्षी में तानूनप्त्र किया जाता है । वायु का नाम चूँकि तनूनपात् है अतएव इसकी साक्षी में किया गया कर्म ' तानूनप्त्र ' कहलाया । वायु को तो यजमान पकड़ नहीं सकता - प्रतएव वायु के स्थान पर घृत रख कर इससे तानूनप्त्र करता है । निदानेन यह घृत तानू-नप्त्र कर्म का ( शपथ - कर्म का ) साधक है । एवज ( पर्य्याय या प्रतीक ) को निदान कहते हैं । कमल को पृथिवी समझिए यह जो संकेत है - उसी का नाम वैदिक परिभाषा में निदान है । इसी प्रकार घृत को निदानेन तानूनप्त्र कर्म्म का साधक अथवा अनुकल्प समझना चाहिए । वायु ही तो घृत बनता है एवं घृत ही तो तनूनपात है । घृत से अस्थि आदि का संश्लेषण रहता है, यदि संश्लेषण न हो तो आदमी अभी ( तुरन्त ) मर जाए । अतएव हम अवश्य ही धृत को तनूनपात् कह सकते हैं-" तदेतत् तानूनपत्रं निदानेन " ॥८ ॥
इसी निदान का स्वरूप बतलाते हैं-प्राण - देवताओं ने अपने जुष्ट शरीरों और प्रिय पदार्थों को एकत्र कर, तनूनप्ता के सुपुर्द कर, उनकी साक्षी में शपथ ली थी । एवमेव इस यज्ञ में देवता - स्वरूप ये ऋत्विक लोग - आज्य ग्रहण करते हुए - उसके साथ अपने जो जुष्टतनू हैं - एवं प्रिय पदार्थ हैं - उनको एक साथ मिला कर रख देते हैं । तनू-नपात -स्वरूप घृत को हाथ में ले कर उसकी साक्षी में ऋत्विक् प्रतिज्ञा करते हैं - हे आज्य! अर्थात [ ५७५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनप्त्र ब्राह्मण हे तनूनपात्! हम आपके सामने शपथ लेते हैं कि हम कभी भी अलग नहीं होंगे । हम सब ऐकमत्य से यज्ञ करेंगे, यज्ञ को निर्विघ्न पूर्ण करेंगे । यदि ऐसा न करें तो आपके पास हमारी जो प्यारी से प्यारी वस्तु है - आत्मा है - वह हमें न मिले । अर्थात् यदि हम इस प्रतिज्ञा को तोड़ें तो हमारा सर्वनाश हो जाए । यदि ऐसी प्रतिज्ञा न की जाएगी तो यज्ञ सम्पूर्ण न होगा । सोमयज्ञ बड़ा भारी काम है । यदि इसमें वैमत्य हो जाएगा - मन - प्राण - वाक् व्यापार एक लीक पर न रहेंगे तो यज्ञ का विध्वंस हो जाएगा । अतएव यहाँ अवश्य ही शपथ ग्रहण करनी चाहिए-" ते देवा जुष्टास्तनूः, प्रियाणि धामानि सार्धं समवददिरे । ( एव-मेव ) प्रथैत ( ऋत्विगः ) श्राज्यान्येव गृह्णाना जुष्टास्तनूः प्रियाणि धामानि सार्धं समवद्यन्ते - ( घृतेन तानूनप्त्रं - शपथकर्म्म कर्त्तव्यमिति भावः ) " । शपथ ले कर यदि उसके विरुद्ध काय्यं किया जाता है - तो इससे मनुष्य का आत्मा नष्ट हो जाता है । जिसके साक्ष्य में वह शपथ लेता है, वही साक्षी उसमें अन्तः प्रविष्ट होकर उसका सर्वनाश कर डालता है । अतएव यदि बात सच्ची भी हो -- तब भी शपथ नहीं लेनी चाहिए । क्यों कि हम मनुष्य हैं— सम्भव है, हमारे से भूल हो जाए । ऐसी अवस्था में यदि शपथ टूट जाएगी तो वह मिथ्या भाव आत्मा का सर्वनाश कर डालेगा । अतएव जरा - जरा सी बात में शपथ लेने का निषेध करते हुए धर्म-शास्त्रकार कहते हैं—
" सत्येनापि शपेद्यस्तु देवता गुरु संन्निधौ ।
तस्यवैवस्वतो राजा धर्म्मस्यार्धं निकृन्तति ॥
( धर्म शास्त्र ) अतएव जरा - जरा सी बात पर - " आपकी शपथ, तुम्हारी कसम, ठाकुरजी की सौगन्ध " - इस प्रकार शपथ लेना सर्वथा बुरा है । इससे श्रात्मा निर्बल हो जाता है । कोई बड़ा भारी काम मा पड़े तभी शपथ लेनी चाहिए । सोमयज्ञ ऐसा ही काम है- अतएव यहाँ शपथ लिए बिना काम नहीं चल सकता है । परन्तु सब के साथ चाहे जब शपथ - व्यवहार नहीं करना चाहिए । अतएव याज्ञवल्क्य कहते हैं -- " मनुष्य को चाहिए कि वह सब के साथ बात - बात में शपथ - व्यवहार न करे " । शपथ - भंग होने से जो प्रिय जुष्टतनू और प्रिय धाम है वह उससे अलग हो जाता है । अतएव इसको ध्यान में रखते हुए बात - बात में शपथ न लें -" तस्मादु ह न सर्वेणेव समभ्यवेयात् । नेन्मे जुष्टास्तन्वः प्रियारिण धामानि सार्धं समभ्यवायान् - ( अतः - न समभ्यवेयाम् ) " -- इति । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, उत्तम पक्ष तो यही है कि शपथ - व्यवहार किया ही न जाए और यदि बहुत ही आवश्यकता आ पड़े तो जिसके साथ शपथ कर लें उससे कभी द्रोह न करें । या तो शपथ लें ही [ ५७६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनप्त्र ब्राह्मण नहीं, यदि कर लें तो फिर चाहे प्राण ही निकल जाएँ कभी उसे न तोड़ें । श्राज से तुम हमारे शपथ पूर्वक मित्र हो गए - जिसे यह कह दिया जाए उसे मरते दम तक मित्र ही समझना चाहिए । चाहे वह आपको मार ही डाले, तथापि उससे अपनी ओर से द्रोह न करें । " येनो ह समभ्यवेयात् — नास्मै दुह्येत् ” । लौकिक परिभाषानुसार कहा जाता है - " जो स - तानूनप्त्र है, उनके प्रति कभी द्रोह नहीं करना चाहिए । सतानूनत्रियों से अर्थात् जिनसे तानूनप्त्र व्यवहार हो जाए - श्रर्थात् शपथ - व्यवहार हो गया है - ऐसे शपथ - व्यवहारयुक्त मनुष्यों से ( सतानूनों से ) कभी द्रोह नहीं करना चाहिए— " इदं ह्याहुः न सतानूनप्त्रिरणे द्रोग्धव्यमिति ॥ ९ ॥
देवताओं ने तानूनप्त्र कर्म किया था - अर्थात् तनूनपात् - ( वायु ) की साक्षी में मिलित रूप से रहने की शपथ ली थी- एवमेव तनूनपात् में घृत हाथ में ले कर ऋत्विक् लोग भी संभूय यज्ञ कर-वाने की प्रतिज्ञा लेते हैं । क्यों तानूनप्त्र करना चाहिए इसकी उपपत्ति बतला दी गई है । अब पद्धति बतलाते हैं— “ अथातो गृह्णात्येव " । देवता त्रिसत्य हैं - अतएव तीन बार बोल कर तीन मन्त्रों से आाज्य ग्रहण कर, तानूनप्त्र किया जाता है । स्थाली और ध्रुवा इन दोनों में घृत रहता है । इसमें पहले " आपतयेत्वा " इत्यादि मन्त्र से ध्रुवा में सेवा द्वारा सारा घृत लेकर उससे तानूनप्त्र किया जाता है । चूँकि यह ध्रुवाज्य से किया जाता है, अतएव इस तानूनप्त्र को " ध्रुवाज्यतानूनप्त्र " कहते हैं । बाद में उत्तर के दोनों मन्त्रों से-थाली में से घृत लिया जाता है - अतएव उसे " स्थाल्याज्य तानूनप्त्र " कहते हैं । यद्यपि गृह्णाति ' ' में एक वचन है- तथापि " प्रथैतत्प्राज्यान्येव - गृह्णाना " में बहुवचन दिया गया है - अतएव सभी ऋत्विजों को आज्य ग्रहण करना चाहिए । ऋत्विज पहले " प्रापतये त्वा परिपतयेत्वा गृह्णामि " इस मन्त्र से ध्रुवाज्य का ग्रहण करता है । हे आज्य! " आपति " के लिए और " परिपति " के लिए मैं तुम्हारा ग्रहण करता हूँ । पति प्राणवायु का नाम है । परिपति मनोवायु का नाम है । मन में अनेक प्रकार की इच्छाएँ हुआ करती हैं । कभी लड्डू खाने की इच्छा होती है, कभी बाग - बगीचों में घूमने की इच्छा होती है । कभी नाटक देखने की इच्छा होती है । प्रश्न होता है कि मन में ये इच्छाएँ किसने पैदा कीं? मन को इच्छा की ओर किसने प्रेरित किया? जो इस मन को विभिन्न इच्छाओं की ओर प्रेरित करता है वह " तनूनप्ता वायु " है । यही मन को प्रेरित करता है । मन विकासी है । जैसे दारु ( देवदारु ) के कुज्जे ( कोरक ) में से चारों ओर फूल झड़ते हैं - वैसे ही मन चारों ओर विकसित होकर इच्छा स्वरूप में परिणत होता है । मन सर्वतो दिक् है । इसकी कोई नियत दिशा नहीं है । जो वायु मन को परितः ( सर्वत्र ) अर्थात् चारों ओर सर्वतो दिक् में विकसित करता है-[ ५७७ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनप्त्र ब्राह्मण उसी का नाम " परिपति - वायु " है । प्राण को प्रेरित करने वाला जो वायु है उसी का नाम आपति है । प्राण एक तरफ उन्मुख हो कर ही अपना व्यापार करता है । प्राण - व्यापार सर्वतोदिक् नहीं होता है । तनूनप्ता वायु - परिपति एवं प्रापति दो स्वरूपों में बँट जाता है । यह वायु जब मन को प्रेरित करता है तब इसका नाम परिपति हो जाता है एवं प्राण को प्रेरित करते समय यह वायु आपति कहलाने लगता है । यही वायु परिपतति तो यही प्रापतति है इस घृत का इसी वायु के लिए ग्रहण किया जाता है । घृत वास्तव में वायु बनता है । जिस घृत को ऋत्विज लोग ग्रहण करते हैं - वह घृत धन्त में वायु बनता है । घृत अन्तरिक्ष की वस्तु है - तो पूर्वोक्त वायु भी अन्तरिक्ष की वस्तु है । दधि घृत- मधु - प्रमृत ये चार ही पदार्थ हैं । दधि पृथिवी की वस्तु है । घृत अन्तरिक्ष की वस्तु है । मधु द्युलोक की वस्तु है । अमृत आपोलोक की वस्तु है । अग्नि - वायु - इन्द्र - वरुण से चार ही देवता हैं । इन चारों के चार ही लोक हैं । चारों लोकों में चार ही पदार्थ हैं । अतएव श्रुति कहती है-" तमभ्यनक्ति । दध्ना मधुना घृतेन दधि हैवास्य लोकस्यरूपं घृतमन्त-रिक्षस्य मध्वमुष्य " - इति । ( शत ० ७।५।१।३ ) प्रत्येक मनुष्य का प्राण - स्रोत भिन्न - भिन्न है हमारे में जो प्राण प्रधिदैवत मण्डल से आते हैं— उनके स्रोत भिन्न - भिन्न हैं । जो घृत है वह कालान्तर में वायु वन जाता है । वायु श्रग्नि है । इसी से घृत बनता है — प्रतएव " तेजो वै घृतम् " कहा जाता है । इस घृत से बनने वाला वायु - ऋत्विजों में आने वाले प्राण - स्रोत में ही जा मिलता है । यदि ऋत्विज लोग शपथ तोड़ देते हैं तो घृत से बना हुआ वायु - यजमान का सर्वनाश कर डालता है । चूँकि वायु - आपति - परिपति भेदेन दो प्रकार का है - इसी अभिप्राय से कहते हैं--" आपतये त्वा परिपतये गृह्णामि " । * इस वक्तव्य की सम्यक् अवधारणा के लिए यह कहना समीचीन होगा कि अखिल सृष्टि का मूल तत्त्व तो एक ही है – ' एको ब्रह्म द्वितीयोऽनास्ति ' ' एकं सद्विप्राः वहुधा वदन्ति ' इत्यादि श्रुति-वाक्यों से उसी परमसत्य का निर्देश है । तथापि एक से अनेक होने की प्रक्रिया में ही प्राणियों के नाना नाम - रूप - कर्म - स्वभावादि दृष्टिगत होते हैं । इसी क्रम में यह उप - स्थापन भी सन्दर्भ प्राप्त है कि सारे मनुष्यों के प्राण - स्रोत भिन्न - भिन्न हैं । महानात्मा ही इस नानात्व का नियामक है । त्रिगुणा-त्मिका प्रकृति का विकास भी उसी से है । भूत - प्रधान आकृति भात्र के सम्बन्ध से तथा भूतों का जनक होने से इसी महानात्मा को भूतात्मा भी कहा गया है । कम्र्मात्मा के अहंभाव की प्रतिष्ठा भी वह महा-नात्मा ही है । प्रकृति - प्रकृति - अहंकृति का नियामक भी वही है । आकृति भूतमयी है, प्रकृति प्राणमयी है एवं अहंकृति मनोमयी है । प्रकृति - प्रकृति - अहंकृति के वैषम्य एवं वैविध्य के स्वरूप - निर्धारण में भूत, प्राण एवं मन तत्त्वों की ही विशद भूमिका है । महानात्मा ही इनका नियामक है तथा शुभाशुभ कम्मों की योनि भी वह महानात्मा ही है । एतत्सम्बन्धी विशद् विवेचन के लिए स्व ० पं ० मोतीलाल जी शास्त्री द्वारा रचित ईशोपनिषद् विज्ञान भाष्य एवं श्राद्ध - विज्ञान, प्रथम खंड में महानात्मा प्रकरण द्रष्टव्य है । [ ५७८ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तनूनप्त्र ब्राह्मण याज्ञवल्क्य कहते हैं - यह जो वायु बह रहा है यही आपतति तथा यही परिपतति अर्थात् यही मन को प्रेरित करता है और यही प्राण को प्रेरित करता है । इसी वायु के लिए ऋत्विज घृत ग्रहण करते हैं— “ यो वाऽप्रयं पवते - एष श्रा च पताति परि च पतति । एतस्माऽउ हि गृह्णाति । तस्मादाह - आपतये त्वा परिपतये गृह्णामि ” — इति ॥१० ॥
इसके अनन्तर स्थाल्याज़्य तानूनप्त्र करने के लिए स्थाली में से स्रवा द्वारा “ तानूनप्त्रे शाक्वराय " कह कर घृत ग्रहण करते हैं । यह जो बह रहा है वह तनूनप्ता शाक्वर नाम का वायु है, इसी के लिए चूँकि घृत ग्रहण किया जाता है - प्रतएव कहा जाता है— " तनूनप्त्रे शाक्वरायेति ” ॥११ ॥
अध्यात्मा में प्रविष्ट जो वायु है वह परिपति और प्रापति कहलाता है - अधिस्थ वायु तनूनप्ता शाक्वर कहलाता है | अध्यात्म - अधिदेवता दोनों को ग्रहण करने के लिए - भिन्न - भिन्न नामों से आज्य ग्रहण करते हैं ॥११ ॥।
तीसरी बार स्थाल्याज्य के लिए " शक्वनश्रोजिष्ठाय " यह मन्त्र बोलते हुए आज्य ग्रहण करते हैं । यह वायु शक्वा है । प्रति बलशाली है । अप्रतिहतगति है - अतएव शक्वा कहा है । यह वायु अत्यन्त प्रोजिष्ठ है । शरीर - बल के अभिप्राय से इसे शक्वा ' कहा गया है । मनोबल के अभिप्राय से " श्रोजिष्ठाय " कहा गया है । मन - प्राण दोनों इसी के आधार पर अवलम्बित है - प्रतएव कहा गया है--गृह्णाति तस्मादाह शक्वनऽश्रोजिष्ठाय " इति ॥।१२ ॥ इस प्रकार जब एक ऋत्विक् पूर्वोक्त मन्त्र बोलता हुआ घृत उठाता है तो तदनन्तर अन्य सारे ऋत्विक् उस घृत का स्पर्श करते हैं-" अथातः समवमृशन्त्येव " । क्यों दुबारा स्पर्श करें - इसका कारण बतलाते हैं । प्राण देवता पहले एक थे- बाद में श्रातिथ्ये-ष्ट्यनन्तर अलग - अलग हो गए थे । तदनन्तर पुनः वे इरा तानूनप्त्र द्वारा एकत्र हुए थे । एकत्र होते समय उन्होंने यह कहते हुए तानूनप्त्र किया था अर्थात् शपथ ली थी कि अपनी मण्डली के मध्य में जो देवता है - समृद्धशाली है, वह सगर देवताओंों की गण्डली से विरुद्ध हो जाएगा तो वह देवम्व खो देगा | जो प्रतिज्ञा का अर्थात् संघशक्ति का अतिक्रमण करेगा वह अपना देवत्व खो देगा | चूँकि देवताओं ने पुनः यह कह कर दढ़ प्रतिज्ञा की थी, अतएव ये ऋत्विक् भी दुबारा घृत का स्पर्ण करते हुए- " जो ऐसा है वह वैसा हो जाएगा, प्रतिज्ञा तोड़ने वाला पूर्व - प्रतिष्ठित स्वरूप को खो बैठेगा " यह कह कर संगत होते हैं । दुबारा घृत को स्पर्श करने का यही कारण है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— [ ५७६ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनप्त्र ब्राह्मण " एतद्ध देवा भूयः समामिरे - इत्थं नः सोऽमुथासद् - यो न एतदतिक्रामा-दिति । तथो एवंत एतत्सममन्ते- इत्थं नः सोऽमुथासत् - यो न एतदतिक्रामा-दिति " ॥ १३ ॥
दुबारा घृत का स्पर्श क्यों करना चाहिए इसका कारण बतला दिया गया है । अब पद्धति बत " लाते हैं । ऋत्विक् लोग निम्न मन्त्र से गृहीत घृत का स्पर्श करते हैं— " अनाधृष्ट मस्यनाधृष्यं देवानामोजोऽनभिशस्त्यभिशस्तिपा । अनभिशस्तेन्यम् श्रञ्जसा सत्यमुपगेषंस्विते माऽधाः " ॥ ( वा ० सं ० ५।५ ) हे आज्य! आप अनाधृष्य हों । अर्थात् आपका घर्षण कोई भी नहीं कर सके । श्राप्य प्राण का नाम असुर है । वास्तव में घृत में पानी का कुछ भी वश नहीं चलता है । श्राप नाधर्षणीय हैं । इसी -लिए तो आपको -- श्रनाघृष्ट - आक्रमणरहित - कहते हैं -" यतः अनाधृष्यं - ( प्रधर्षणीयम् ) अतः - अनाधृष्टमसि " । ज्य! आप देवताओं के अर्थात् अग्नि के प्रोज हैं । यदि अग्नि मन्द होने लगे तो उसमें घृत की आहुति देने से वह पुनः पहले की तरह ही बलवान् हो प्रबल वेग से प्रज्वलित हो जाता है । मन्त्र के इसी भाग का अर्थ करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं — जब तक देवता एक थे- मिलितरूप थे - तब तक अनाधृष्ट थे । परन्तु जब वे अलग - अलग थोकों ( वर्गों ) में बँट गए तो उनकी शक्ति क्षीण हो गई । वे असुरों से दबने लगे । ऐसे समय में घृत की अर्थात् तनूनप्ता वायु की साक्षी से ही पुनः अनाधृष्ट हो पाए । अतएव आज्य को अनाधृष्ट कहते हैं । देवता लोग इसी से अनाधर्षणीय होते हुए अपने श्रापको अनादृष्ट कहने में समर्थ हुए थे । अतएव तत्साधनत्वात् यह आज्य भी श्रनाघुष्ट और प्रधर्षणीय कह-लाने लग गया । किस प्रकार देवता प्रधर्षणीय हो गए - यह बतलाते हैं— तनूनप्ता के सामने मिलित रूप से रहने की प्रतिज्ञा कर - सदा साथ रहते हुए - एक बात बोलते हुए एवं एक इरादा करते हुए ही देवता अनाधर्षणीय हुए थे । इससे याज्ञवल्क्य शिक्षा देते हैं कि यदि आपको परस्पर मेल रखना है- शत्रु का नाश करना है तो निम्नलिखित नियमों का पालन करें । सदा साथ रहें । सभी कार्य्यं मिल कर एक साथ करें । कभी एक दूसरे से अलग न हों । यही सह सन्तः का तात्पर्य्यं है । समान ही बोलें । सबके इरादे एक हों । यह जो कहता है वह मैं ही कहता हूँ — सबके ऐसे ही भाव रहें । यही " समानं वदन्तः " का तात्पर्य है । सब की धारणा समान हो । अर्थात् चाहे कोई कार्य्यं जायज हो या बेजा हो - उसे करने में एक के साथ सब रहें, एक का इरादा सबका इरादा हो - यही " समानं दधारणाः ” का तात्पर्य्यं है । यदि हम अपने आप को विजयी बनाना चाहते हैं तो हमें पूर्वोक्त नियमों का पालन करना पड़ेगा । जिस दिन हम इनका पालन करने में समर्थ हो जाएँगे उसी दिन से हमारी संगठनशक्ति इतनी प्रबल हो जाएगी कि शत्रु हमारा बाल भी बाँका न कर सकेगा । इस प्रकार देवता इन नियमों का पालन करते हुए - श्रनादृष्ट - प्रधर्षणीय हुए थे । [ ५८० ]