Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 591–600

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 591–600

पृष्ठ 591

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मणं तनूनप्त्र ब्राह्मण " अनाधृष्टा हि देवाऽआसन्, अनाधृष्याः, सहसन्तः, समानं वदन्तः, समानं दध्राणा " । उक्त श्रुति में यही भाव संकेतित है कि तानूनप्ता वायु को साक्षी बना कर देवता पूर्वोक्त नियमों का पालन कर अनाधर्षणीय हो गए । एवमेव हम आप का स्पर्श कर - आपको अपना साक्षी बना प्रार्थना करते हैं कि आप हमें ऐसी बुद्धि दीजिए जिससे कि, हम इस प्रतिज्ञा को पूरी करते हुए - प्रनाधर्षणीय बनें । अपि च हे श्राज्य! श्राप देवताओं के श्रोज हैं । देवताओं के प्रिय शरीर हैं— इष्ट स्थान हैं । प्राज्य यही है कि हम आपका स्पर्श कर प्रतिज्ञा करते हैं हमारी प्यारी से प्यारी वस्तु को श्राप नष्ट कर दें सुपुर्द है । इसका तात्यय्र्य्यार्थ बतलाते हुए कहते हैं कि प्राज्य से आग्नेय प्राण प्रबल हो जाता है । भाव इसका कि यदि हम अपनी प्रतिज्ञा से च्युत हो जाएँ तो । शपथ की दृढ़ता के लिए हमारा आत्मा ही आपके " देवानामोज इति । देवानां वै जुष्टास्तन्वः प्रियाणि धामानि " । हे श्राज्य! प्राप अनभिशस्ति ( निन्दा रहित ) हैं । आपकी निन्दा कौन कर सकता है? श्रापका तो सम्पूर्ण संसार आदर करता है । यही नहीं, अपितु आप निन्दा से बचाने वाले भी हैं । जो आपके सामने सत्य प्रतिज्ञा कर - सत्य पर अटल रहता है, वह पहले यदि निन्दनीय रहा है तो भी उसकी सारी निन्दा दूर हो जाती है । जैसे अत्याचार करने वाला यदि हरिभजन ( भक्ति ) में लीन हो जाता है तो उसके सारे पाप कट जाते हैं- एवमेव प्राज्य की शरण लिए बाद सारे पाप कट जाते हैं । म्राज्य से शरीर में बल आ जाता है । जो मनुष्य बलिष्ठ होता है - जिसमें प्रात्मगौरव होता है - वह बुरे काम नहीं करता । निर्बल मनुष्य पाप किया करता है । घृत से समस्त दोष हट जाते हैं । अतएव - " अभिशस्तिपा " कहा गया है । सारे देवता - इसी के आधार पर निन्दा को पार कर गए थे-" " सर्वां हि देवा श्रभिशस्त तीर्णाः ” । आज्य! मैं अपनी मूल वृत्ति से सत्य को प्राप्त होऊं, यह अशीर्वाद दीजिए-" प्रजसा सत्यमुपगेषम् " । तात्पर्य्य इसका यही है कि मैं छल - कपट से शपथ नहीं ले रहा हूँ । हृदय से सत्य को स्त्रीकार कर रहा हूँ । हे आज्य! मैं सत्य बोलू गा । मिल कर रहूँगा । यह मेरी प्रतिज्ञा है । मैं कभी इसका अतिक्रमण न करूँ ऐसी कृपा कीजिए— " सत्यं वदानि - मेदमतिक्रमिषम् इत्येवैतदाह " । हे प्राज्य! आप मुझे अच्छे मार्ग में अच्छी स्थिति में रखिए--" स्विते मा s धाः इति " [ ५८१ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मरण तनूनप्त्र ब्राह्मणं मेरी प्रतिज्ञा पूरी हो जाए । मैं कभी सत्य से डिग न जाऊँ यही आशीर्वाद दीजिए । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, जिन देवताओं ने तनूनपात् को साक्षी बना कर सत्य - भाषण किया था, सत्याचरण किया था वे इसी प्राज्य- महिमा से आत्म - स्वरूप को अक्षुण्ण रखने में समर्थ हुए थे । अर्थात् इसी सत्य से देवतानों की प्रतिष्ठा रह पाई थी एवं आज भी रहती है । सत्य पर चलना, सत्य बोलना, आत्मा को प्रतिष्ठित रखना है । मिथ्या बोलना - प्रात्मा को गिराना है । जिस प्रकार देवताओं ने सत्य बोल कर आत्मा को धारण किया था, उसी प्रकार मैं ( ऋत्विक् ) भी सत्य - पालन की प्रतिज्ञा पूरी कर आत्मा को श्रेष्ठ स्थिति में रख सकू ँ, इसी अभिप्राय से ऋत्विक् कहता है-" स्विते माऽधा इति " ॥ १४ ॥

पूर्व में बतला दिया है कि, अग्नि - सोम - इन्द्र - वरुण इन चारों देवताओं ने विचार कर सनून-पात् वायु की साक्षी में अपने जुष्टतनू और प्रिय धामों को एक साथ इकठ्ठा कर इन्द्र की सन्नधि में रख दिया अर्थात् इन्द्र को शेष तीनों देवताओं ने अपना अधिपति मान लिया-“ अथ यास्तद्देवाः जुष्टास्तनूः प्रियाणि धामानि सार्धं समवददिरे- तदिन्द्रे संन्यदधत " । उक्त ब्राह्मण के प्रारम्भ में हमने बतलाया था कि रोदसी - क्रन्दसी - संयती भेदेन त्रिलोकी तीन प्रकार की होती है । ये तीनों त्रिलोकियाँ त्रैलोक्य - त्रिलोकी नाम से व्यवहृत होती हैं । इन्हीं तीनों त्रिलोकयों में अन्य भी कई त्रिलोकियाँ - मानी जाती हैं । कुल आठ प्रकार की त्रिलोकियां मानी जाती हैं | ये त्रिलोकियाँ - स्तौम्य त्रिलोकी, उदृढत्रिलोकी, भौमत्रिलोकी, शरीरत्रिलोकी, त्रैलोक्य त्रिलोकी इत्यादि नामों से व्यवहृत होती हैं । इन सबमें से- प्रकृत में हमें स्तौम्य त्रिलोकी और उदृढ त्रिलोकी के विषय में ही कहना है । जिसे हम पृथिवी समझ रहे हैं - वह तो पृथिवीलोक है । आकाश में जो सू तप रहा है - वह द्युलोक है एवं इस पृथिवी और सूर्य के बीच का जो स्थान है - वह अन्तरिक्ष लोक कहलाता है -- इसी त्रिलोकी का नाम " उदृढ त्रिलोकीं " है । इस प्रकार रोदसी त्रिलोकी ही उद्दृढ-त्रिलोकी कहलाती है । त्रिलोकी से पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ अभिप्रेत हैं । पृथिवी के अधिष्ठाता अग्नि हैं । अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता सोम हैं । द्यौ के अधिष्ठाता - इन्द्र हैं । अतएव कहा जाता है—-" यथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिरणी वायुदिशां " । ( शत ० १४ । ६ । ४ । २१ ) इस प्रकार तीन लोक माने जाते हैं । कितने ही वैज्ञानिक सोमसम्बन्धेन एक चौथा प्रापोलोक और मानते हैं, जिसके लिए " अस्ति वै चतुर्थी - देवलोक / प: ' ( कौ. १८ / २ ) यह कहा जाता है । यही वरुण देवता हैं । इस प्रकार एक त्रिलोकी में अग्नि - सोम - इन्द्र - वरुण - ये चार देवता हैं । [ ५८२ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनन्त्र ब्राह्मण संसार के यच्चयावत् पदार्थ सूर्य्य - चन्द्रमा - नक्षत्र पर्वत मनुष्य औषधि वनस्पति आदि समस्त जड-चेतन प्रपश्च अग्नीषोमात्मक है । जिन वस्तुनों को हम आँखों से देखते हैं - वे सब अग्निसोमात्मक हैं । श्रतएव " अग्नीषोमात्मकं जगत् " यह कहा जाता है । यह अग्नि चित्य - चितेनिधेय भेदेन दो प्रकार का है । चित्याग्नि को मत्यग्नि कहते हैं - चितेनिधेय को अमृताग्नि कहते हैं । पिण्ड चित्याग्नि से बनता है । किन्तु पिण्ड का कभी न कभी नाश अवश्य ही होता है- प्रतएव इसे मर्त्यपिण्ड कहा जाता है । एवं जो अमृताग्नि है उसका नाश नहीं होता है । अमृताग्नि घन - तरल - विरल भेद से अग्नि-वायु - इन्द्र स्वरूपों में परिणत हो जाती है । इन्द्र को आदित्य कह सकते हैं । इस प्रकार से अग्नि और सोम में से केवल अग्नि ही, अग्नि वायु - प्रादित्य बन जाता है । अन्तरिक्षस्थ होने के कारण ही वायु को सोम कह दिया गया है । अग्नि की आठ अवस्था विशेषों को ही आठ वसु कहते हैं । वायु की ग्यारह अवस्था विशेषों को ही ग्यारह रुद्र कहते हैं । आदित्य की १२ अवस्था विशेषों को ही १२ आादित्य कहते हैं । इन आदित्यों में इन्द्र ही प्रधान है । वसुत्रों में अग्नि तथा रुद्रों में सोम प्रधान है । इस प्रकार एक ही अग्नि के तीन अवस्था - भेद, अग्नि- सोम इन्द्र स्वरूप से - तीन देवता कहलाने लगते हैं । यह तो हुत्रा अग्नि का विभाग । अब सोम - विभाग को देखिए । अग्नि के ऊपर रहने वाले सोम - मण्डल का नाम प्रापोलोक है | यह चौथा लोक कहलाता है । इस प्रकार अग्नीषोमात्मक पदार्थ के पृथिवी - प्रन्तरिक्ष-द्यौ - प्रापोलोक भेदेन चार लोक हैं । प्रत्येक पिण्ड में ये चारों लोक एवं इनके अधिष्ठाता अग्नि- सोम - इन्द्र-वरुण - ये चारों देवता रहते हैं । इन्द्र द्युलोक की वस्तु है । वह सबमें कैसे रह सकता है, इसी संशय का समाधान करती हुई श्रुति कहती है- “ एकैको वै जनतायामिन्द्रः " । सम्पूर्ण कथन से मानना पड़ता है कि अग्नि- सोम इन्द्र वरुण ये चारों देवता पृथिवी - सूर्य्य - चन्द्रमा आदि पिण्डों में ही नहीं अपितु पिण्ड मात्र में व्याप्त हैं । प्रकृत में केवल पृथिवी और सूर्य से ही सम्बन्ध है । सूर्य्य के मरीचि ( पानी ) से पृथिवी उत्पन्न होती है अतएव सूर्य्य प्रज्ञान है । पृथिवी बाद में उत्पन्न होने के कारण अपेक्षाकृत गौण है । अतएव पहले सूर्य्यं के सम्बन्ध में ही कहा जाता है । परन्तु इतना और समझ लेना चाहिए कि सारे ब्रह्माण्ड में – पृथिवी - जल - तेज- वायु- प्राकाश - ये पाँच महाभूत हैं । इन पञ्चभूतों में सबसे पहले आकाश है - इसे ही स्वयम्भूमण्डल कहते हैं । बाद में वायु है - इसे ही परमेष्ठिमण्डल कहते हैं । यहाँ पर जो कुछ है या आता है वह सब वायुमय हो जाता है । इसके बाद तेज है-इसी तेज का नाम सूर्यलोक है । यहाँ पर समस्त पदार्थ ज्योतिर्मय रहते हैं । इसके बाद पानी है— इसी का नाम चन्द्रमण्डल है – अतएव - " चन्द्रमा अप्स्वन्तरा सुपर्णोधावते दिवि " ( यजुः ३३।६० ) यह कहा जाता है । पाँचवाँ महाभूत पृथिवी है । इस सारे प्रपश्व से कहना यही है कि सूर्य्य से ऊपर सर्वत्र वायु ही व्याप्त है । वायु के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । यहाँ के देवता भी वायुमय ही हैं एवं जो भी इसमें श्राते हैं वे सभी वायुमय हो जाते हैं । -सूर्य में अग्नि - सोम इन्द्र वरुण ये चारों देवता हैं । सूर्य के प्रकाश - मण्डल की व्याप्ति जहाँ तक रहती है, ये चारों देवता वहाँ तक व्याप्त रहते हैं । सूर्य की रश्मियाँ जिस प्रकार पृथिवी की ओर आती रहती हैं उसी प्रकार सूर्य्य से ऊपर परमेष्ठि- मण्डल की ओर भी जाती हैं । इन्हीं रश्मियों के साथ [ ५८३ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनंष्त्र ब्राह्मणं अग्नि - सोम इन्द्र- वरुण ये चारों देवता जहाँ हमारी ओर आते हैं, वहीं परमेष्ठिलोक की ओर भी जाते हैं । चूंकि परमेष्ठिमण्डल वायुमय है अतः यहाँ जा कर ये चारों देवता वायुमय हो जाते हैं अर्थात् ये चारों देवता अपने प्रिय स्वरूपों को प्रिय स्थानों को - तनूनपात ( पारमेष्ठ्य वायु ) को अर्पित कर देते हैं । यही चारों देवताओं द्वारा वायु में अपने शरीर को अर्पण कर देने का वैज्ञानिक रहस्य है । प्रकृत में केवल पृथिवी ही अभिप्रेत होने से इस विषय का विस्तृत विवेचन सम्भव नहीं है । सूर्य के नीचे की ओर आने वाले अग्नि - सोम इन्द्र- वरुण ये चारों प्रवर्ग्य हो कर पृथिवी की वस्तु बन जाते हैं । इसी प्रकार पारमेष्ठ्य वायु भी प्रवर्ग्य बन कर पृथिवी की वस्तु बन जाता है । इसी सम्पूर्ण त्रिलोकी को ही स्तोम्य त्रिलोकी कहते हैं । अग्नि - सोम इन्द्र - वरुण इन चारों देवताओं के कारण पृथिवी में ही चारों लोकों ( स्तौम्य त्रिलोकी ) की व्याप्ति मान ली जाती है । अग्निलोक को पृथिवीलोक, सोमलोक को अन्तरिक्ष, इन्द्रलोक को द्युलोक एवं वरुणलोक को अपोलोक कहते हैं । जिस प्रकार सूर्य्य से ऊपर परमेष्ठी का वायु है उसी प्रकार पृथिवी के ऊपर अन्तिम स्थान पर भी वायु का स्तर है । इसी वायु - स्तर का नाम शाक्वर -साम है । जैसे सूर्य्य अग्न षोमात्मक है, उसी प्रकार पृथिवी भी अग्नीषोमा-त्मक है । पृथिवी का अग्नि पृथिवी के २१ वें अहर्गण तक वितत होकर अग्नि - सोम इन्द्र इन तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । इसी २१ वें अहर्गण पर भगवान् सूर्य्यं प्रतिष्ठित रहते हैं । पृथिवी में जो सोम है - वह दिक्- भास्वर भेदेन दो प्रकार का है । भास्वर सोम पृथिवी के सत्ताईसवें अहर्गण तक रहता है । दिक् सोम पृथिवी के ३३ अहर्गण तक वितत रहता है । इस प्रकार २१ अहर्गण तक तो अग्नि- सोम व इन्द्र वितत रहते हैं तथा ३३ अहर्गण तक वरुण वितत रहते हैं । ३३ अहर्गण तक वितत रहने वाला सोम वायुमय है और यही पारमेष्ठ्य तनूनपात् वायु है । तनूनपात् वायु ही परमेष्ठी से, प्रवर्ग्य रूप से, आ कर पृथिवी की प्रातिश्विक वस्तु बन रहा है । पृथिवी अग्निमय है । अग्नि का स्वभाव है - विशकलित कर देना- फाड़ देना । यदि पृथिवी का अन्तिम स्तर वायुमय न होता तो पृथिवीपिण्ड खण्ड - खण्ड हो जाता । परन्तु इस वायु ने पृथिवी के शरीर को एक-कालावच्छेदेन चारों ओर से संवरण कर रोक रक्खा है - अतएव पृथिवी के शरीर को संवरण करने वालेवायु को " तनूनपात् - शाक्वर " कहते हैं । यही बराह भगवान् हैं । पृथिवी के साम ( परिधि ) का नाम रथन्तर साम है । रथन्तरसाम, अग्नि और दो सोमों-( दिक्- भास्वर सोम ) के कारण तीन नामों से व्यवहृत होता है । पृथिवी का अग्नि जहाँ तक जाता है, उस साम ( परिधि ) का नाम " रथन्तरसाम " है । २१ वें अहर्गण पर सूर्य्य है । अग्नि इक्कीस के भी ऊपर तक चला जाता है - अतएव अग्नि के साम को रथन्तरसाम कहते हैं । सूर्य्यं के रथ के तरण ( संचरण ) के कारण ही यह रथन्तर साम कहलाया है । — इसके बाद २७ अहर्गण तक भास्वर साम है । इसका नाम * पिण्ड का केन्द्रस्थ अव्यय भाग, जिससे कि पिण्ड का मूल स्वरूप प्रविकृत भाव से प्रतिष्ठित रहता है ब्रह्मोदन कहलाता है । इस ब्रह्मोदन का जो भाग पृथक् हो जाता है, उसी को वैदिक भाषा में उच्छिष्ट या प्रवर्ग्य कहते हैं । [ ५८४ ]

पृष्ठ 595

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शेतपथ ब्राह्मण. तानूनप्त्र ब्राह्मण " रूप साम " है । पृथिवी से ऊपर की ओर आने वाले देवता यहाँ तक सर्वथा अलग - अलग ही रहते हैं अर्थात् २७ ग्रहण तक इनका स्वरूप सर्वथा विभिन्न रहता है । यहाँ तक ये अपने पृथक् - पृथक् प्रतिस्विक् स्वरूप में ही रहते अतएव इस साम को वैरूप साम कहते हैं । इसके बाद है शाक्वर पृष्ठ | पृथिवी के अन्तिम छन्द का नाम " शक्वरी छन्द " है । इसीलिए कहा जाता है-" यत्र वै वाचः प्रजातानि छन्दांसि सप्तपदा वै तेषां परार्ध्या शक्वरी " । ( शत ० ३ | ३ | १ | १ ) यह साम चूँकि यहाँ ( ३३ अहर्गण ) पर समाप्त होता है - प्रतएव इसे शाक्वर साम कहते हैं । यहाँ पर वही तनूनपात् वायु रहता है । यह साम वायुमय है । पूर्वोक्त कथन के अनुसार यहाँ पर आ कर सब वायुमय हो जाते हैं अतएव पृथिवी के अग्नि- सोम - इन्द्र - वरुण ये चारों देवता यहाँ आकर विरूप भाव छोड़ कर समभाव में परिणत हो जाते हैं । इससे पूर्व ये चारों देवता अलग - अलग थोकों में बँटे हुए थे, किन्तु यहाँ वायु की साक्षी में आ कर चारों- एकमेव हो जाते हैं । शाक्वर तनूनपात् के पहले चारों विरूप रहते थे । इसी विज्ञान को समझाने के लिए - इसके पूर्व के साम का नाम विरूप ( वैरूप ) रक्खा जाता है । विरूप रहेंगे तभी तो आगे चल कर सरूप रहेंगे । यहाँ जो इन्द्र तनूनपात् वायु में श्रा कर वायुमय हो गया है वह पार्थिव इन्द्र है, उसका सौर इन्द्र से कोई सम्बन्ध नहीं है । पूर्व में बतलाया गया था कि वायु को साक्षी कर देवता अपने प्रिय धामों को एकत्र कर इन्द्र को अर्थात् सूर्य को अपना अधिपति मान लेते हैं । इसका तात्पर्य्यं यही है कि शाक्वर साम सहित पृथिवी सूर्य्य के चारों ओर परिक्रमा लगाती रहती है । सूर्य्य इसका भोग करता रहता है । सूर्य्यं ही पृथिवी का अधिष्ठाता है । पृथिवी के शाक्वर साम में मज्जित जो वायुमय चारों देवता हैं — सूर्थ्य से इनका भोग होता है । ३६० दिनों में सूर्य्य पूरे मण्डल का भोग कर लेता है । वायु की साक्षी में अपने प्रिय तनू देकर चारों देवतानों ने इन्द्र को अपना अधिष्ठाता मान लिया, इस का यही वैज्ञानिक रहस्य है । इसी को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— " अथ यास्तद्देवा जुष्टास्तनूः प्रियाणि धामानि सार्धं समवददिरे तदिन्द्रे संन्यदधत " । इन्द्र से पार्थिव इन्द्र न समझ लिया जाए इसी भ्रम को दूर करने के लिए कहा गया है— " एष वाऽइन्द्रो य एष तपति " । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जब तक इन चारों देवताओं का सम्बन्ध सूर्य्य से नहीं हुआ था तब तक सूर्य्य सर्वथा काला था । इन चारों के सम्बन्ध से ही सूर्य्य में ताप - चमचमाहट - गति और प्रकाश हुआ । ताप और प्रकाश बिना घर्षण के उत्पन्न नहीं होता है और जब सूर्य्य निपट अकेला था तो घर्षण किससे होता? पृथिवी से जब चारों देवता ऊपर की ओर जाते हैं तो सौर प्राण का इनसे घर्षण हो जाता है । परिणामस्वरूप प्रकाश उत्पन्न हो जाता है । जब चारों देवताओं के साथ सूर्य्य का भोग होता है तो परि-[ ५८५ ]

पृष्ठ 596

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तृतीय काण्ड ( अ ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनप्त्र ब्राह्मण णाम स्वरूप सूर्य्य में तापादि चारों धर्म्म उत्पन्न हो जाते हैं । अग्नि के सम्बन्ध से सूर्य में ताप उत्पन्न हो जाता है । इन्द्र के सम्बन्ध से प्रकाश उत्पन्न हो जाता है । वायु के सम्बन्ध से चमचमाहट ( चमक ) उत्पन्न हो जाती है एवं वरुण के सम्बन्ध से किरणें अर्थात् गौ का निर्माण हो जाता है । सूर्य्य में चारों ' भावों का प्रत्यक्ष दर्शन होता रहता है । देवताओं के घर्षण से ही सूर्य्य में उजाला मालूम हो रहा है, अन्यथा सूय्यं तो प्रतिस्विक रूपेण सर्वथा काला है । इसी अभिप्राय से कहा गया है— " न ह वा एषोऽग्रे तताप - यथा हैवेदमन्यत् कृष्णमेवं हैवास । तेनवैतद्वी-ये तपति " । इससे बतलाना यह है कि यदि " सत्रयाग " * हो, अर्थात् बहुत से यजमान दीक्षा लें तो उन सब में जो गृहपति हो, * उसी के लिए श्राज्य को छिड़क देना चाहिए । श्रर्थात् जिस श्राज्य का स्पर्श ऋत्विजों ने किया है उसे प्रधान यजमान पर छिड़क कर उसे ही दे देना चाहिए । प्रधान यजमान ही ऋत्विक देवताओं का इन्द्र है । सारे देवता इन्द्र के अधीन हुए थे । श्रतएव ये सभी ऋत्विज् उस इन्द्र-स्वरूप गृहपति को घृत सौंपते हुए उसका आधिपत्य स्वीकार करते हैं । यदि सत्रयाग न हो एवं दक्षिण यज्ञ ही हो, अर्थात् ज्योतिष्टोम ही हो तो, उसमें जो यजमान हो उसे ही घृत दे देना चाहिए । इसमें कोई विवाद नहीं है क्योंकि यजमान इन्द्र- स्थानीय है - " इन्द्रोवैयजमानः " ( शत ० ४ | ५ | ४ | ८ ) यह श्रुति प्रसिद्ध है— " तस्माद्यदि बहवो दीक्षेरन् - गृहपतय एव व्रतमभ्युत्सिच्य प्रयच्छेयुः । स हि तेषामिन्द्रभाजनं भवति । यद्यु दक्षिणावता दीक्षेतयजमानायैव व्रतमभ्यु-त्सिच्य प्रयेच्छेयुः । इदं ह्याहु: -इन्द्रो यजमान इति ॥ १५ ॥

शाक्वर को साम क्यों कहते हैं इसका कारण बतलाते हैं । सारे देवताओं ने अपने प्रिय धामों को एक कर एक साथ सबको मिला लिया । विरूपता हटा कर सभी देवता शाक्वर वायु में मिल कर एक हो गए । सब सम हो गए अतएव उसको ( वायु को ) साम कहने लगे । तनूनप्त्र के सत्य से - साक्षी से - सारे देवता सम हुए हैं । वायु में जा कर - वायु की साक्षी पूर्वक - सत्य से सभी देवता सम हुए हैं - अतएव इस साम को " सत्यसाम " शब्द से व्यवहृत करते हैं । सारे देवताओं की समष्टि हो जाती है । यह साम चारों देवताओं की समष्टि से - मेल से - एकीभाव से बनता है अतएव इसे " देवजम् " साम भी कहते हैं-" तस्मादाहुः - सत्यं साम देवजं सामेति ॥ १६ ॥

॥ इति तानूनप्त्रब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति चतुर्थोध्याये द्वितीयं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ * जिसमें १७ यजमान दीक्षा लेते हैं वह " सत्रयाग " कहलाता है । * गृहपति - मुख्य यजमान का नाम है, अन्य यजमान इसके तानुका होते हैं । [ ५८६ ]

पृष्ठ 597

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चतुर्थाध्याये तृतीयं ब्राह्मणम् ' अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण ' तिथ्येन वै देवा इष्ट्वा । तान्त्समदविन्दत्ते तानूनप्त्रैः समशाम्यंस्तऽ-एतस्य प्रायश्चित्तिमैच्छ्रन्यदन्योऽन्यं पापमवदन्नाह पुरावभृथात्पुनर्वीक्षामवाकल्पयं-स्त एतामवान्तरां दीक्षामपश्यम् ॥१ ॥

तेऽग्निनैव त्वचं विपल्याङ्गयन्त । तपो वाऽअग्निस्तपो दीक्षा तदवा-न्तरां दीक्षामुपायंस्तद्यदवान्तरां दीक्षामुपायंस्तस्मादवान्तरदीक्षा सन्तरामगु-लीराञ्चन्त सन्तरां मेखलां पर्यस्तामेवनामेतत्सत पर्यास्यन्त तथोऽएवैष एतद्य-दतः प्राचीनमव्रत्यं वा करोत्यव्रत्यं वा वदति तस्यैवैतत्प्रायश्चित्तं कुरुते ॥२ ॥

सोऽग्निनैव त्वचं विपल्यङ्गयते । तपो वाऽग्रग्निस्तपो दीक्षा तदवान्तरां दीक्षामुपैति सन्तरामगुलीरचते सन्तरां मेखलां पर्यस्तामेवैनामेतत्सतों पर्यस्यते प्रजामु हैव तद्देवा उपायत् ॥ ३ ॥

तेऽग्निनैव त्वचं विपत्याङ्गयन्त । श्रग्निर्वै मिथुनस्य कर्ता प्रजनयिता तत्प्रजामुपायन्त्सन्तरामगुलीराञ्चन्त सन्तरां मेखलां तत्प्रजामात्मन्नकुर्वत तथोऽ-एवैष एतत्प्रजामेवोपैति ॥४ ॥

सोऽग्निनैव त्वचं विपल्यङ्गयते । श्रग्निर्वै मिथुनस्य कर्ता प्रजनयिता तत्प्रजामुपैति सन्तरामगुलीरचते सन्तरां मेखलां तत्प्रजामात्मन्कुरुते ॥५ ॥

देवानामु ह स्म दीक्षितानाम् । यः समिद्धारो वा स्वाध्यायं वा विसृज्यते तं ह स्मेतरस्यैवेतरं रूपेणेतरस्येतरमसुररक्षसानि जिघांसन्ति ते ह पापं वदन्त उपमेयुरिति वै मां त्वमचिकीर्षीरिति माजिघांसीरित्यग्निहॅव तथा नान्यमुवा-दाग्नि तथा नान्यः || ६ || ते होचुः । श्रपीत्थं त्वामग्नेऽवादिषूः ३ इति नैवाहमन्यं न मामन्य इति [ ५८७ ] ॥७ ॥

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण विदुः । श्रयं वै नो विरक्षस्तमोऽस्यैव रूपमसाम तेन रक्षांस्यति-मोक्ष्यामहे तेन स्वर्गं लोकं समश्नुविष्यामहऽइति तेऽग्नेरेव रूपमभवंस्तेन रक्षां-स्यत्यमुच्यन्त तेन स्वर्गं लोकं समाश्नुवत तथोऽएवैष एतदग्नेरेव रूपं भवति तेन रक्षांस्यतिमुच्यते तेन स्वर्गं लोकं समश्नुते स वै समिधमेवाभ्यादधदवान्तर-दीक्षामुपैति ॥८ ॥

स समिधमभ्यादधाति । अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपा इत्यग्निहि देवानां व्रतपतिस्तस्मादाहाग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपा इति या तव तनूरियं सा मयि यो मम तनूरेषा सा त्वयि । सह नौ व्रतपते व्रतानीति तदग्निना त्वचं विपल्यङ्गयतेऽनु मे दीक्षां दीक्षापतिर्मन्यतामनु तपस्तपस्पतिरिति तदवान्तरां दीक्षामुपैति सन्त-रामगुलीरचते सन्तरां मेखलां पर्यस्तामेवैनामेतत्सतों पर्य्यस्यते ॥ ९ ॥

अथैनमतो मदन्तीभिरुपचरन्ति । तपो वाऽग्निस्तपो मदन्त्यस्तस्मादेनं मदन्तीभिरुपचरन्ति ॥१० ॥

अथ मदन्तीरुपस्पृश्य । राजानमाप्याययन्ति तद्यन्मदन्तीरुपस्पृश्य राजानमाप्याययन्ति वज्रो वाऽद्याज्यं रेतः सोमो नेद्वज्ञेरणाज्येन रेतः सोमं हिन-सामेति तस्मान्मदन्तीरुपस्पृश्य राजानमाप्याययन्ति ॥११ ॥

तदाहुः यस्मा एतदाप्यायनं क्रियतऽप्रातिथ्यं सोमाय तमेवाग्रऽश्राप्याय-येयुरथावान्तरदीक्षामथ तानूनप्त्राणीति तदु तथा न कुर्याद्यज्ञस्य वाऽएवं कर्मात्र वाएनान्त्समद विन्दत्ते संशममेव पूर्वमुपायन्नथावान्तरदीक्षामथाप्यायनम् ॥१२ ॥

तद्यदाप्याययन्ति । देवो वै सोमो दिवि हि सोमो वृत्रो वै सोम आसी-तस्यैतच्छरीरं यद्गिरयो यदश्मानस्तदेषोऽशाना नामौषधिर्जायतऽइति ह स्माह श्वेतकेतुरौद्दालकिस्तामेतदाहृत्याभिषुण्वन्ति तां दीक्षोपसद्भिस्तानूनप्त्रैराप्यायनेन सोमं कुर्वन्तीति तथो ऽएवैनामेष एतद्दीक्षोपसद्भिस्तानूनप्त्रैराप्याययेन सोमं करोति ॥१३ ॥

मधु सारधमिति वाआहुः । यज्ञो ह वै मधुसारघमथैत एव सरघो मधुकृतो यहत्विजस्तद्यथा मधु मधुकृत प्राप्याययेयुरेवमेवैतद्यज्ञमाप्याययन्ति ॥ १४ ॥

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पृष्ठ 599

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बृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण यज्ञेन वै देवाः । इमां जिति जिग्युर्येषामियं जितिस्ते होचुः कथं न इदं मनुष्यै रनभ्यारोह्यं स्यादिति ते यज्ञस्य रसं धीत्वा यथा मधु मधुकृतो निर्धयेयु-विदुयज्ञं यूपेन योपयित्वा तिरोऽभवन्नथ यदेनेनायोपयंस्तस्माद्यूपो नाम ॥ १५ ॥

तद्वाऽऋषीणामनुश्रुतमास । ते यज्ञं समभरन्यथायं यज्ञः सम्भृत एवं वाऽएष यज्ञं सम्भरति यो दीक्षते वाग्वै यज्ञस्तद्यदेवात्र यज्ञस्य निर्धीतं यद्विदुग्धं तदेवैतत्पुनराप्याययति ॥१६ ॥

ते वै षड्भूत्वाप्याययन्ति । षड्वा ऋतव ऋतव एवैतद्भूत्वाप्याययन्ति ॥१७ ॥

प्राप्याययन्ति । अंशुरंशुष्टे देव सोमाप्यायतामिति तदस्याशुंभंशुमेवा-प्याययन्तीन्द्रायैकधनविद s इतीन्द्रो वै यज्ञस्य देवता तस्मादाहेन्द्रायेत्येकधनविद-इति शतं शतं ह स्म वाऽएष देवान्प्रत्येकैक एवांशुरेकधनानाप्यायते दश - दश वा तुभ्यमिन्द्रः प्यायतामा त्वमिन्द्राय प्यायस्वतीन्द्रो वै यज्ञस्य देवता सा यैव यज्ञस्य देवता तामेवैतदाप्याययत्या त्वमिन्द्राय प्यायस्वेति तदेतस्मिन्नाप्यायनं दधात्याप्याययास्मान्त्सखीन्त्सन्या मेधयेति स यत्सनोति तत्तदाह यत्सन्येत्यथ यदनुब्रूते तदु तदाह यन्मेधयेति स्वस्ति ते देव सोम सुत्यामशीयेत्येका वाऽएतेषा-माशीर्भवत्यृत्विजां च यजमानस्य च यज्ञस्योरचं गच्छेमेति यज्ञस्योहचं गच्छानी-त्येवैतदाह ॥१८ ॥

अथ प्रस्तरे निह्नुवते । उत्तरतउपचारो वै यज्ञोऽथैतद्दक्षिणेवान्वित्या-प्यापयन्त्यग्नि यज्ञस्तद्यज्ञं पृष्ठतः कुर्वन्ति तन्मिथ्याकुर्वन्ति देवेभ्य आवृश्च्यन्ते यज्ञो वै प्रस्तरस्तद्यज्ञं पुनरारभन्ते तस्यो हैषा प्रायश्चित्तिस्तथो हैषामेतन्न मिथ्या-कृतं भवति न देवेभ्य श्रावृश्च्यन्ते तस्मात्प्रस्तरे निनुवते ॥१ ९ ॥ तदाहुः । क्ते निनुवीरा ३ ननक्ता ३ इत्यनक्ते हैव निनुवीरन्न तुप्प्रहरणं ह्येवाक्तस्य ॥२० ॥

[ ५८६ ]

पृष्ठ 600

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 600 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण ते नुवते । एष्टा रायः प्रेषे भगायऋतमृतवादिभ्य इति सत्यं सत्यवा-दिभ्य इत्येवैतदाह नमो द्यावापृथिवीभ्यामिति तदाभ्यां द्यावापृथिवीभ्यां निनुवते ययोरिदं सर्वमधि ॥२१ ॥

अथाह समुल्लुप्य प्रस्तरम् । अग्नीन्मदन्त्यापा ३ इति मदन्तीत्यग्नीदाह ताभिरेहीत्युपर्युपर्यग्निमतिहरति स यन्नानुप्रहरत्येतेन ह्यत ऊर्ध्वान्यहानि प्रचरि-व्यन्भवत्यथ यदुपर्युपर्यग्निमतिहरति तदेवास्यानुप्रहृतभाजनं भवति तमग्नी प्रयच्छति तमग्नीन्निदधाति ॥ २२ ॥

[ अनुवाद ] आतिथ्येष्टि के अनन्तर पहले तानूनप्त्रेष्टि होनी चाहिए अथवा अवान्तर दीक्षेष्टि होनी चाहिए - इसमें कामचार है । किसी नई उपस्थापना की भूमिका बाँधने के लिए बात कुछ बतलानी होती है किन्तु उस बात को स्थापित करने के लिए कुछ इतर भूमिका भी बाँधनी पड़ जाती है । एक वाक्य के अनन्तर उससे सम्बन्ध - योजक जो अगला वाक्य बोला जाता है, उसका पूर्ववर्ती वाक्य से सम्बन्ध ही " संगति " कहलाता है । संगति कुल छह प्रकार की होती है - ( १ ) सप्रसंग ( २ ) उपोद्घात ( ३ ) हेतुता ( ४ ) अवसर ( ५ ) निर्वा-हैक्य तथा ( ६ ) कार्मैक्य । इन छहों संगतियों की मर्यादा के बाहर श्रुतियाँ कभी नहीं जातीं । इसे न समझने के कारण ही विद्वन्मन्य वेद में पुनरुक्ति - दोष का आक्षेप लगाते हैं जो बौद्धिक प्रलाप मात्र है । यज्ञान्त में जो स्नान होता है उसे " अवभृथ स्नान " कहते हैं । दीक्षित देवता को प्रतिज्ञा करनी पड़ती है कि अवभृथ स्नान पर्यन्त मैं दीक्षित व्रतों ( नियमों ) का उल्लंघन नहीं करूँगा- “ श्रवभृथ पर्य्यन्त सत्यमेव वदिष्यामि " । किन्तु देवताओं ने इस प्रतिज्ञा को भंग कर डाला । प्रतिज्ञा लेना स्वयं में ही दोष है, उसे भंग करना तो दोष की पुनरावृत्ति है । इन दोनों दोषों के प्रयिश्चित के लिए देवताओं को पुनः दीक्षा लेनी पड़ती है । इसीलिए इसे " अवान्तर दीक्षा " कहते हैं । प्रारण - देवताओं ने नानूनप्त्र के साक्ष्य में प्राय-श्चित्त के लिए अवान्तर दीक्षा ली थी- " त एतामवान्तरां दीक्षामपश्यन् ” ॥१ ॥

भौम देवताओं ने अवान्तर दीक्षा में अग्नि से अपनी त्वचा को चारों ओर से वेष्टित कर लिया अर्थात् वे अग्निमय बन गये । अग्नि तापयुक्त होने से तप - स्वरूप ही है तथा तप ही दीक्षा है अतः अग्निमय हो कर देवता तप में दीक्षित हो गये । इस दीक्षा में देवताओं ने अंगुलीन्यञ्चन किया अर्थात् दोनों हाथों की अंगुलियों को एक दम मोड़ लिया तथा मेखला का बन्धन भी किया अर्थात् शिथिल हुई मेखला को पुनः जोर से कस कर बाँध लिया । मेखला को कस कर बाँध लेना कर्म में सन्नद्ध होना है । देवताओं का अनुकरण करते हुए यजमान को भी अपने ज्ञात - अज्ञात मिथ्या-[ ५६० ]