Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 601–610

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 601–610

पृष्ठ 601

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) तपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण भाषण एवं मिथ्या - कर्म आदि व्रत -भंगों के प्रायश्चित्त के लिए अवश्य ही अवान्तर दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए -- " यदतः प्राचीनमत्रत्यं वा करोति, अत्रत्यं वा वदति । तस्यैवैतत्प्राय-श्चित्तिं कुरुते || २ || अग्नि और दीक्षा समानधर्मा हैं अतः अग्नि का श्रात्मसात् करना अवान्तर दीक्षा को अंगीकार करना है । प्रायश्चित्त से दोषाक्रान्त आत्मा पुनः स्वच्छ हो कर नया जन्म धारण कर लेता है । सन्तों और सन्यासियों के जीवन चरित्र ऐसे ही नये जन्म के निदर्शन हैं । देवताओं के ही अनुकरण पर यजमान ने भी अवान्तर दीक्षा ग्रहण कर तानूनप्त्रादि विधि से दोषों से छुटकारा पा कर प्रजा को अर्थात् नये जन्म को प्राप्त किया— " प्रजामु हैव तद्देवा उपायन् ” ॥३ ॥

अग्नि ही मिथुन का - दाम्पत्य सम्बन्ध का - कर्ता है और यही प्रजनयिता है । रस-असृक् - मेद्य - मज्जा - मांस - शुक्र प्रादि सप्त धातुएँ अग्नि के चयन ( चिनाव ) से ही बनती हैं । सोम अर्थात् शुक्र तो स्त्री है और अग्नि अर्थात् असृक् पुरुष है । स्त्री के रुधिर में काम रहता है । स्त्री के रुधिर का निर्माण मंगलग्रह से होता है । मकर राशि में मंगल उच्च होता है । इसीलिए स्त्री के काम को " मकरध्वज " कहते हैं । पुरुष का वीर्य्य शुक्र ग्रह से बनता है । शुक्र मीन में उच्च होता है अतः पुरुष के काम को " मीनध्वज " कहते हैं । शुक्र- शोणित सम्बन्ध का नाम ही मिथुन - भाव है, जिस का कर्ता अग्नि ही है । अग्नि में सोमाहुति से ही सृष्टि होती है । अतएव अग्नि को " प्रजनयिता " कह सकते हैं । देवताओं ने ऐसे प्रजनयिता अग्नि को आत्मसात् कर अपना नया जन्म धारण किया था - " तत् प्रजामुपायन् ” । देवताओं की भाँति ही यजमान भी अवान्तर दीक्षा ग्रहण करता हुआ दिव्यभाव - रूपी नये जन्म को प्राप्त होता है - तथो एवैष ( यजमानः ) एतत् प्रजामेवोपैति ॥ ४ ॥

अग्नि को आत्मसात् करके तप करना दिव्यात्मा को ही आत्मसात् करना है । यह दिव्य भाव ही यजमान को स्वर्ग में ले जाएगा । यजमान का अपनी मेखला ( मूँज के कटि-बन्ध ) को कसना तथा मुट्ठी बाँधना क्रमशः कार्य हेतु सन्नद्ध होना एवं संकल्प और कर्म को वशीकृत ( मुट्ठी में ) कर लेने का सूचक है - " सन्तरामगुलीरचते, सन्तरां मेखलाम् ( पर्य्य-स्यते ) । तत् प्रजामात्मन् कुरुते ॥५ ॥

सोम - यज्ञ में ये चार ऋत्विक् प्रधान होते हैं - ( १ ) - होता ( २ ) - अध्वर्यु ( ३ ) -उद्-गाता ( ४ ) - ब्रह्मा । तीन - तीन ऋत्विक् इनके नायब ( उपकर्मी ) होते हैं । इस प्रकार कुल सौलह ऋत्विक् होते हैं जिनमें १७ वें यजमान को मिला कर कुल १७ ऋत्विक् हो जाते हैं-" यजमान सप्तदशा ऋत्विजो भवति " । [ ५६१ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण “ क ” शब्द से व्यवहृत होने वाला प्रजापति " अनिरुक्त " प्रजापति कहलाता है । " प्रजापतिश्चरति गर्भे ( महानारा ० उ ० १1१ ) तथा “ ईश्वरः सर्वभूतानां " ( महानारा ० उ ० १७।५ ) ये दोनों श्रुतियाँ क्रमशः अनिरुक्त और निरुक्त प्रजापति का स्वरूप बतला रही हैं । श्रनिरुक्त प्रजापति ही पदार्थ पर श्राक्रान्त हो कर " निरुक्त ( सर्व प्रथच विशिष्ट, महिमामण्डल युक्त ) प्रजापति कहलाने लगता है । इन दोनों का मध्यवर्ती, " उद्गीथ प्रजा-पति " कहलाता है । ३३ श्रहण की केन्द्रीभूत शक्ति का नाम ही उद्गीथ प्रजापति है जो १७ वें ग्रहरण पर स्थित होने से " सप्त दश प्रजापति नाम से भी प्रसिद्ध है । यद्यपि श्रग्नि की गति २१ अहर्गण तक है तथापि उसकी प्रातिस्विक स्थिति १७ वें ग्रहरण तक ही है । इस सप्तदशस्थ आहवनीय अग्नि में यदि सोम आहुत न हो तो नीचे के १६ हों अहर्गण तत्काल ही नष्ट हो जाएँ । यह १७ वाँ प्रजापति ही यज्ञ में यजमान स्थानीय है । इसी से सब ऋत्विजों का ऋत्वित्व रहता है । सभी ऋत्विजों के पृथक् - पृथक् कर्म नियत हैं । जो ऋत्विक् अग्नि में समिधाधान करता है उसे " समिद्- हरति " - इस व्युत्पत्ति से " समिद्धार ' कहते हैं । जो ऋत्विक् मन्त्र बोलता है उसे " प्रवचनकार " कहते है । असुर इनमें घुस कर इन्हें एक दूसरे के रूप से मारना चाहते है । समिद्धार आदि ऋत्विजों में गाली - गलौज ( अपशब्दों का प्रयोग ) होना ही असुर- प्राणों का प्रविष्ट होना है । असुर आक्रमण ऋत्विजों में ही होता है । ग्रह-वनीय अग्नि में असुरों की दाल नहीं गलती अतः न तो अग्नि ने किसी को और न अग्नि को ही किसी ने अपशब्द कहे - " अग्निर्हेव तथा नान्यमुवादाग्नि तथा नान्यः ॥ ६ ॥

जब ऋत्विजों ने ग्राहवनीयाग्नि से प्रश्न किया कि हे अग्निं! क्या आप से भी असुरों कुछ कहा है? तो अग्नि का उत्तर था कि न मैंने किसी से कुछ कहा और न किसी ने मुझसे कुछ कहा । तात्पर्य यही है कि अग्नि और तम दोनों नितान्त विरोधी पदार्थ हैं इसीलिए आहवनीय अग्नि में असुरों का कदापि प्रवेश नहीं होता-" त्वामग्नेऽवादिषूः ( असदा: ) । नैवाहमन्यं न मामन्य इति || ७ || ऋत्विजों में अग्नि सर्वथा विरक्षस्तम ( सुरक्षित, अक्षुण्ण ) है । इसमें असुर प्रविष्ट नहीं हो सकते । पृथिवी से जो अग्नि निकलती है वह आहवनीय है । इसकी १७ विभक्तियाँ हैं । इन १७ अग्नियों में से जो आहवनीय अग्नि है उसके अतिरिक्त अन्य १६ अग्नियाँ भी १७ वें अहर्गणस्थ प्राजापत्य से बद्ध रहने के कारण विरक्षा ही हैं तथापि उनमें प्राजापत्य से निम्न स्थिति के कारण ग्रसुर प्राणों का प्रवेश हो जाता है । फिर भो प्राजापत्य से बद्ध रहने के कारण असुर आक्रमण मात्र ही कर पाते हैं, इसका बिगाड़ कुछ नहीं सकते । चयनयज्ञ एवं सोमयागादि से ही १७ वें अहर्गणस्थ सप्तदशस्वर्ग की प्राप्ति होती है-" ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामोयजेत " । ग्राहवनीयवत् १६ ऋत्वजाग्नियों की सत्ता पृथिवी से उच्छिन्न न होने पर भी उनका उक्त स्वर्ग से अमृतलोक से सम्बन्ध बना रहता है - " स्वर्ग [ ५ ९ २ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण समाश्नुक्ते " । इन ऋत्विजों ने भी तप से अग्निरूप हो कर असुरों का संहार कर, स्वर्ग को प्राप्त कर लिया- " तेन स्वर्गलोकं समाश्नुवते " । यजमान भी प्राकृतिक देवताओं की भाँति अग्नि को श्रात्मसात् कर, अग्निमय हो कर इसी आहवनीय दिव्याग्नि के बल पर स्वर्ग का भोग करता है । अवान्तर - दीक्षा के कम्मों में समिधाधान ही सबसे प्रमुख कर्म्म है उसी से असुर - भाव का नाश होता है अतः उसी से ग्रवान्तर दीक्षा का सम्पन्न होना मान लिया जाता है - " स वै समिधमेवाध्यादधदवान्तरदीक्षामुपैति ॥ ८ ॥

वाक् - प्राण - चक्षु - श्रोत्र - मन ये पाँचों देवता हैं । इन पाँचों में आहवनीय अग्नि ही प्राण तत्त्व है । इस श्राहवनीयाग्नि ( प्राणाग्नि ) में ही असुर नहीं घुस पाते, अन्य सभी अग्नियों में तो असुर - प्राण का प्रवेश हो जाता है । वाक् में असुर और दैव, दोनों भाव रहते हैं । इसी-लिए आहवनीयाग्नि में समिधा आहुत करते हुए तथा अग्नि को देवताओं के व्रतपति रूप से सम्बोधित करते हुए अध्वर्यु अग्नि से आत्मसात् होने एवं दीक्षा - व्रत के पालन का सामर्थ्य प्रदान करने की प्रार्थना करता है । अवान्तर दीक्षा लेते हुए यजमान, ऐसे ही संकल्प से प्रेरित हो, अंगुलीन्यञ्चन करता हुआ, पहले से ही लिपटी मेखला को और भी कस कर बाँध लेता है—-“ सन्तरामङ्गुलीरचते, सन्तरां मेखलां पर्यस्तामेवैनमेतत्सतीं पर्यस्यते ” ॥६ ॥

अवान्तर दीक्षा के अनन्तर ऋत्विक् गरम पानी ( मदन्ती ) से सोम का उपचार ( सोमवल्ली का प्रक्षालन ) करता है । गरम से इसलिए कि अग्नि तप - स्वरूप, तप - धर्मा है, उधर मदन्ती भी गरम होने से तप - स्वरूप ही है एवं स्वयं यजमान भी दीक्षानन्तर तपो-मूर्ति हो गया है अत: उष्णजल से सोम का उपचार ही विहित है । मदन्ती से उपचार होने पर ही सोम का तपोबल क्षीरण नहीं होता, बल्कि उसमें वृद्धि ही होती है— " 1 " तस्मादेनं मदन्तीभिरुपचरन्ति ॥ १० ॥

“ राजावाजोग्रहो हविः " भेदेन सोम के चार प्रकारों में से वल्ली - सोम " राजासोम " है । गरम पानी के स्पर्श से ही इसका प्राप्यायन ( तुष्टि - पुष्टि कर्म्म ) किया जाता है क्योंकि प्राज्य ( घृत ) वज्र स्वरूप है और सोम रेतस् - रूप है । सोम की प्राहुति से ही नया दिव्यात्मा उत्पन्न होता है । यदि रेतस् सोम से आज्य - स्वरूप वज्र का सम्बन्ध हो जाए तो सोम की प्रजनन - शक्ति ही मारी जाए । तानूनप्त्र कर्म्म करते समय हाथ में घृत लेने से उत्पन्न आज्य-विद्युत् के प्रभाव को हटाना भी मदन्ती ( गरम पानी ) से सोम का आप्यायन करने पर ही संभव है । अग्नि मिथुन - भाव कर्ता एवं प्रजनयिता है । दिव्यात्मा की सृष्टि के लिए दाम्पत्य सम्बन्धों में शीतलता बाधक है क्यों कि दाम्पत्य सम्बन्ध ग्रग्नि पर ही निर्भर है । इसीलिए उष्ण ( न कि शीतल ) जल से सोम का प्राप्यायन ही विहित है । इससे दाम्पत्य - सम्बन्ध भी शिथिल या शीतल नहीं होते तथा श्राज्य की हिंसक शक्ति का भी दमन हो जाता है-" तस्मान्मदन्तीरुपस्पृश्य राजानमाप्याययन्ति " ॥११ ॥

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण अवान्तर दीक्षा तथा आतिथ्य - कर्म्म भी सोम का आप्यायन ही है क्यों कि इन से भी सोम की पुष्टि होती है तथा वह तपोमय हो जाता है । अतः कई महर्षियों की दृष्टि में क्रमशः प्रातिथ्येष्टि, अवान्तर दीक्षा तथा तानूनन्त्र कर्म्म किए जाने प्रभीष्ट हैं । किन्तु याज्ञवल्क्य का कहना है कि देवताओं में प्रवभृत् ( सोमभृत ) स्नान से पहले ही कलह हो गया था अतः उस दोष की शान्ति के लिए पहले तानूनप्य कर्म्म ही करना चाहिए और उसके पश्चात् ही अवान्तर दीक्षा सम्पन्न की जानी चाहिए - " पूर्वमुपायन ( कलहो शमन रूपतानूनपत्रं पूर्वं कृतवन्तः इतिभावः ) अथावान्तर दीक्षाम् श्रथाप्यायनम् " ॥ १२ ॥

" दिविसोम आसीत् " एवं " देवो वै सोमः " प्रमाण से सिद्ध है कि सोम भी देवता है । इन्द्र ने " विश्वरूप ” नामक असुर का घात कर डाला था जिस पर उसके पिता “ त्वष्टा ” ने क्रुद्ध हो इन्द्र को मारने के लिए यज्ञ किया, जिससे " वृत्र " नामक महावली असुर उत्पन्न हुआ । द्रोणकलश के सोम से वृत्र का निर्माण होने से वृत्र सोममय है - " वृत्रो ने सोम श्रासीत् ” । इन्द्र अर्थात् सूर्य्यं ने सोम में घुसे हुए प्राप्यप्राण - स्वरूप तमोमय असुर ( वृत्र ) को खण्ड - खण्ड कर विनष्ट कर डाला । अर्थात् सूर्य्य में आते हुए परमेष्ठी मण्डल के सोम को सूर्य्य- रश्मियाँ ( वज्र ) चूर - चूर कर डालती हैं - यही तात्पर्य्यं है । यह विभक्त सोम ही पत्थर बनता है-" सोममद्रो " । ध्रुब सोग से ही त्रिककुदादि पर्वत बने हैं । वृत्र - प्राण मिश्रित सोम ही ' प्रशाना ' वल्लरी नामक औषधि बन कर उत्पन्न होता है । उद्दालक महर्षि के पुत्र श्वेतकेतु ने परीक्षण से ज्ञात किया कि वृत्र- वध में इन्द्र द्वारा प्रयुक्त त्रिककुद गिरि ही अशाना नामक औषधि -लता का उत्पत्ति - स्थल है । सोम वल्लरी के त्वक् आदि असुर भाग को कूट कर रस - भाग युक्त मूल सोम का निष्कर्षण करते समय, कूटने से सोम भी आहत हुआ । उस घात ( क्षति ) को मिटाने के लिए ही मदन्ती ( गरम पानी ) से सोम का उपचार कर उसका श्राप्यायन किया जाता है - " एतद्दीक्षोपसद्भिस्तानून प्राप्यायनेन सोमं करोति " ॥ १३ ॥

सोम के श्राप्यायन का एक और भी कारण है । लोक में पदार्थों का रस, रूप आदि वरिणत करने के लिए उन्हें अन्य नामों ( संज्ञा ) से सादृश्यत्वेन व्यक्त किया जाता है, जैसे आम को मिश्री की डली कहना । इसी विधि से यज्ञ को " मधु सारघ " कहा जाता है । मधुर रस मात्र ( युक्त प्रत्येक पदार्थ ) ही मधु है । सारघ ( मधुमक्खियों द्वारा निर्गत मधु ) ही ऐसा मधु है जिसमें एक से अधिक पदार्थों ( विभिन्न पुष्पों - कलियों ) का एकत्र सञ्चित रस निहित है । " सरन् सघ्नन्ति " व्युत्पत्ति से ही इसे " सारघ " कहा जाता है । प्राकृतिक प्राण - देवताओं के यज्ञ में भी तीनों लोकों का रस सम्मिलित रहता है । प्रत्येक पिण्ड में भी स्तौम्य त्रिलोकी पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यौ - आप: - ये चार लोक अवस्थित रहते हैं । सूर्य्य, पृथिवी, चन्द्रमादि. यच्च-यावत् पिण्डों में ये चारों लोक रहते हैं । प्रत्येक पिण्ड का हृदयस्थ ग्रात्म - प्रजापति भी अपने पिण्ड - यज्ञ में शामिल रहता है । इन चारों लोकों के रसों को प्रारण - ऋत्विक् एकत्र कर उससे यज्ञ - मधु तैय्यार करता है । पूर्ववर्ती प्रकरणों में परिगणित ३३ देवता ही तीनों लोकों के [ ५ ९ ४ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण मधु को चूस कर पिण्ड में समाहित करते हैं । इसीलिए इन तेतीस प्रारण - देवताओं को सारघ ( मधुमक्षिकाएँ ) तथा यज्ञ को " मधु - सारघ " कहा गया है । तथैव मानुष यज्ञ में भी ऋत्विक् ब्राह्मण ही सारघ हैं, जो नाना पदार्थों ( यज्ञ - सामग्री ) से रस का निकर्षरण कर यज्ञ का सम्भरण करते हैं – “ तद्यथा मधु मधुकृत प्राप्याययेयुः एवमेवैतद्यज्ञमाप्याययन्ति ” ॥१४ ॥

सोम - यज्ञ की महिमा के कारण ही तेतीसों देवताओं ने अपराजेयत्व प्राप्त कर तीनों लोकों में सर्वत्र अपना अधिकार स्थापित कर रखा है । सोम की आहुति न हो तो प्राण-स्वरूप ये देवता उसी पल उच्छिन्न हो जाएं । मनुष्यों से यज्ञ - रहस्य को गोपन रखने के लिए प्राण- देवता मधुमक्षिकाओं की भाँति ही यज्ञ के सार - भाग ( मधु ) का अवशोष ( विदोहन ) कर उसे यूप ( योपन - साभनत्वात् यूप ) - रूपी सूर्य्य की नोट में छुपा कर अन्तर्हित हो गए । पारमेष्ठ्य सोम ही यज्ञ का सार भाग ( मधु ) है, जो हम जैसे सामान्य मनुष्यों की दृष्टि से नोझल है । योपन - साधनत्वात् ही सूर्य को " यूप " कहा जाता है - " विदुह्य यज्ञं यूपेन योप-यित्वा तिरोऽभवन् । अथ यदनेनायोपयन् । तस्माद्यूपो नाम || १५ || ब्रह्म और क्षत्र — ब्रह्म की ये दो विभूतियाँ हैं । इनमें से प्रत्येक चार भागों में विभक्त हैं । क्षत्र के चार विभाग हैं - राजा, सम्राट् - स्वराट् - विराट् । इन चारों विभागों में से प्रत्येक के पुनः दो - दो उप - विभाग हैं । स्वराट् के भी दो उप - विभाग हैं – इन्द्र एवं महेन्द्र । इन्द्र ने वृत्र को मार कर ही महेन्द्र की उपाधि प्राप्त की थी - " इन्द्रो वै वृत्रं हत्वा महेन्द्रो -ऽभवत् " । क्षत्र - वीर्य्य की भाँति ही ब्रह्म - वीर्य्य भी - ब्राह्मण - विप्र ऋषि - देवता - इन चार भागों में विभक्त है । इस " ब्रह्मचतुष्पदी " में देवता तो सिद्धावस्था में हैं, ऋषियों ने ही यज्ञ - विद्या का आविष्कार किया था । ऋषि प्रणीत पद्धति के अनुसार ही यजमान भी यज्ञ करता है । त्रिलोकी में व्याप्त इन्द्रवाक् पर ही अग्नीषोमात्मक यज्ञ प्रतिष्ठित रहता है । इसीलिए " वाक् " को यज्ञ कहा जाता है - " वाग् वै यज्ञः " । इन्द्र, सोम को चूस लेता है । संभव है, हमारे यज्ञ के सारभाग ( सोम ) को भी इन्द्र- प्राण ने चूस लिया हो, उसी की क्षतिपूर्ति करने के लिए सोम का आप्यायन किया जाता है--" तदेवैतत्पुनराप्याययति ” ॥१६ ॥

सोमाप्यायन के लिए छह ऋत्विक् ही क्यों होने चाहिए इसका कारण यह है कि पृथिवी के केन्द्र से लगाकर २१ अहर्गण तक वितत अग्नि के मण्डल ( संवत्सरमण्डल ) में छह ऋतुएँ होने से संवत्सराग्नि छह अवयवों में विभक्त हैं । ये छहों ऋतुएँ पारमेष्ठ्य सोम को श्राप्यायित करती रहती हैं । श्रतः प्रकृति - यज्ञानुसार मानुषयज्ञ में भी षड् - ऋतुनों के स्थानापन्न छह ऋत्विक् ही सोमाप्यायन करते हैं- " ऋतवएतद्भूत्वा श्राप्याययन्ति " ॥१७ ॥

" अंशुरंशुष्टे देव सोमाप्यायताम् " ' - इस मंत्र से ऋत्विक् सोम का आप्यायन करते हैं । सोम - वल्ली के प्रादेशमात्र टुकड़े किए जाते हैं क्यों कि प्रारण भी प्रादेशमित ही माने गये [ ५६५ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण हैं । ये टुकड़े ही " अंशु ” हैं । मंत्र- वाक् का स्फुरण सोम से ही होता है । मंत्रों में पूर्वापर - क्रम जिस मेघा से निर्णीत होता है, वह मेधा भी सोम - प्रदत्त है । इसीलिए सोम के लिए " मेघया ' कहा गया है । सोम के अनुग्रह से ही " सुत्या " सम्पन्न होती है । ऋत्विक् और यजमान, दोनों की यही कामना रहती है कि वे यज्ञ की सकुशल समाप्ति निर्विघ्न रूप से कर सकें-“ ऋत्विजां च यजमानस्य च यज्ञस्योदृचं गच्छेम " ॥१८ ॥

सोम के प्राप्यायन के अनन्तर यजमान दोनों हाथ जोड़े हुए, वेदी पर रखे " प्रस्तर " ( कुशामुष्टि ) का स्पर्श कर " अथ प्रस्तरे निह, नवते " मंत्र से अपने अपराध के लिए क्षमा-याचना करता है । पार्थिव देवता गार्हपत्याग्नि से यजमान का शरीर एवं सौर - देवता आह-वनीयाग्नि से उसका आत्मा बना हैं । आप्यायन- कर्म में होता - श्रध्वर्यु - उद्गाता यजमान के अपने - अपने स्थान ( आसन ) नियत हैं । यज्ञ में अग्नि दक्षिण से उत्तर ( नीचे से ऊपर ) की ओर जाता है तथा इसके विपरीत सोम उत्तर से दक्षिण ( ऊपर से नीचे ) की ओर आता है । सोम का अपना स्थान दक्षिण में है अतः ऋत्विकों को सोम का श्राप्यायन करने के लिए दक्षिण में आना पड़ता है । ऐसा करते हुए उन्हें गार्हपत्याग्नि की ओर पीठ करनी होती है, उसे पृष्ठभाग में रखना होता है । इसलिए वे अनचाहे ही सही, किन्तु प्रकृत ( मिथ्या ) कर्म्म दोषी हो जाते हैं । फलतः ऋत्विजों की आत्मा से गार्हपत्याग्नि स्वरूप पार्थिव देवता वियुक्त हो जाते हैं । हवि का आधार होने से यज्ञ - स्वरूप " प्रस्तर " ( कुशामुष्टि ) का स्पर्श कर, यज्ञ का पुन: आरम्भण करने से ही ऋत्विज उस दोष से मुक्त होते हैं- " तस्मात् प्रस्तरेनिनुवते " ॥१६ ॥

वेदी पर रखे हुए कुशा - प्रस्तर के दो भाग कर उनमें से एक को घी से चुपड़ देना ( घृताक्त कर देना चाहिए और दूसरे को अनक्त ( कोरा, बिना चुपड़ा ) ही रहने देना चाहिए । अनक्त प्रस्तर - भाग से निनुव कर्म्म तथा घृताक्त प्रस्तर - भाग से अनुप्रहरण करना ही विहित है ॥२० ॥

अनक्त प्रस्तर पर दोनों हाथ रख कर ऋत्विक् " ते निनुवते.. " मंत्र से दोष - मार्जन हेतु क्षमा - याचना करता है एवं इन्द्र- संज्ञक अन्तरंग सम्पत्ति ( भुक्त अन्नादि ) तथा भग ( ऐश्वर्य ) - संज्ञक बहिरंग सम्पत्ति ( हाथी - घोड़े, वस्त्र, भवन, अलंकरणादि ) का साधन भूत धन प्रदान करने के लिए श्रग्निदेवता से प्रार्थना करता है । श्रप वायु - यज्ञ ( सोम ) - घन - सत्य - ये पाँच ही " ऋत " पदार्थ हैं । " सत्य " स्वयं ऋत नहीं है अपितु " अनृत " के प्रभाव - रूप ही वह सत्य है । ऋत्विक् अग्नि से प्रार्थना करते हैं कि हे अग्ने! हम ऋतवादियों को ऋत प्रदान कीजिए श्रर्थात् हमें सदा सत्य पथ पर प्रारूढ़ रखिए । क्यों कि अग्नि- सोम- सूर्य्य - चन्द्र आदि सृष्टि के यच्चयावत् पिण्ड पदार्थ तथा समस्त यज्ञादि भी द्यावा - पृथिवी के उदर में ही स्थित हैं, अतएव अग्नि से अज्ञात दोष के मार्जन, ऐश्वर्य - सम्पत्ति प्रदान करने एवं ऋत में प्रतिष्ठित रखने की प्रार्थना की जाती है ॥२१ ॥

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पृष्ठ 607

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मणं अवान्तरदीक्षा ब्राह्मणं इसके बाद अध्वर्यु अग्नीत् से प्रश्न करता है - क्या पानी गरम हो गया? अग्नि का उत्तर है— “ मदन्ती ” अर्थात् पानी गरम हो गया है । तब अध्वर्यु गरम पानी लाने के लिए कह कर प्रस्तर को आहवनीयाग्नि पर बिखेर देता है । इसी कर्म्म को " अनुप्रहरण " कहा जाता है । कुछ प्रस्तर - अंश बचा भी लिया जाता है, जिसे अध्वर्यु दूसरे दिन काम में लेने हेतु सुरक्षित रखने के लिए अग्नीध्र को सौंप देता है - " तमग्नीन्निदधाति ॥ २२ ॥

[ विज्ञान भाष्य ] प्रातिथ्येष्टि के अनन्तर कौन - सी इष्टि पहले होनी चाहिए इस में विभिन्न मत हैं । कुछ याज्ञिकों का मत है कि पहले तानूनप्त्रेष्टि होनी चाहिए और कुछ का मत है कि पहले अवान्तर दीक्षेष्टि करनी चाहिए । दोनों मतों में कामाचार है । इसी बात को बतलाने के लिए - तानूनप्त्र ब्राह्मण के प्रारम्भ में " प्रातिथ्येन वै देवा इष्ट्वा " कह दिया गया है एवं अवान्तर दीक्षा के प्रारम्भ में भी - प्रातिथ्येन वै देवा इष्ट्वा " यह कह दिया गया है । जब नई बात बतलाई जाती है तो उसके लिए पहले भूमिका बाँधनी पड़ती है । बात कुछ बतलानी होती है और उस बात को जमाने के लिए भूमिका कुछ और ही बाँधनी पड़ सकती है । एक वाक्य के अनन्तर उससे सम्बन्ध जोड़ने के लिए उससे भिन्न जो दूसरा वाक्य बोला जाता है - उस वाक्य का जो सम्बन्ध पहले वाक्य से होता है - उसी का नाम संगति है । यह सम्बन्ध चूँकि विश्व के कार्य्य - कारणों में ६ ही प्रकार का है - प्रतएव संगति कुल ६ ही कहलाती हैं । ये छहों संगतियाँ निम्नलिखित नामों से प्रसिद्ध हैं-१ २ ३ " सप्रसङ्ग, उपोद्घातो, हेतुतावसरस्तथा । ५ ६ . निर्वाहैक्य, काय्यैक्ये, षोढा संगतिरिष्यते " - इति ॥ [ १ ] " एक सम्बन्धिज्ञानं परसम्बन्धीज्ञानस्य स्मारकं भवति " यह नियम है । हम यदि किसी विषय का प्रतिपादन करते हैं - तो उससे सम्बन्ध रखने वाले अन्य विषय भी उस समय स्मृति में आ जाते हैं । हम किसी स्मारक को देख कर वापस लौटते हैं तो मित्र आदि पूछ लिया करते हैं कि आपने क्या देखा? हम वर्णन करने लगते हैं- " रास्ते में एक पालतू बिल्ली अपने स्वामी के कभी सर पर चढ़ती तो कभी हाथ - मुंह आदि नोचती थी- इस पर भी स्वामी शान्त भाव से बैठा था । यह दृश्य यद्यपि स्मारक देखने से सम्बन्ध नहीं रखता हैं । गए तो थे स्मारक देखने किन्तु प्रसङ्ग से वह दृश्य भी दीख जाता है । स्मारक के दृश्य का वर्णन करते समय उस बिल्ली वाले दृश्य को जोड़ने के लिए यह बात भी कहनी पड़ती है । बात करते समय जो " यद्यपि यह बात प्रधान विषय से सम्बन्ध नहीं रखती है - तथापि प्रसङ्गागत होने के कारण ( अर्थात् - इससे उसके स्मरण हो जाने के कारण ) यह भी कह देता हूँ " - यह कह कर उस अन्य विषय का प्रतिपादन किया जाता है एवं तद्विषयक जो पूर्व - वाक्य संगति है - उसे " सप्रसंगसंगति " कहते हैं । [ ५६७ ]

पृष्ठ 608

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मणं श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण [ २ ] प्रधान विषय के स्थापन के लिए जो पूर्व - भूमिका जमाई जाती है - उसी का नाम उपो-घात है | उदाहरणार्थ इन्द्र और वृत्रासुर की लड़ाई को लें । प्रधान विषय लड़ाई बतलाना है । परन्तु इसका पूरा रहस्य तब तक मालूम नहीं हो सकता, जब तक कि - इन्द्र क्या है और वृत्र क्या है यह न बतला दिया जाए । इन्द्र तथा वृत्र के स्वरूप को बिना समझे - तद्विषयक युद्ध - चर्चा अधूरी ही रहेगी । प्रतएव इन्द्र - वृत्र युद्ध के प्रधान विषय के लिए पहले इन्द्र - वृत्र - मूल का स्वरूप बतलाना पड़ता है । इसी को " उपोद्घात संगति " कहते हैं । [ ३ ] तीसरी संगति है - " हेतुता " । किसी विषय का प्रतिपादन करने पर उसका कारण बत-लाना पड़ता है । कारण यद्यपि प्रप्रधान है - तथापि जब तक कारण न समझ लिया जाय तब तक विषय - सिद्धार्थ कहे गए वाक्य की संगति नहीं हो सकती । उदाहरणार्थ हम कहते हैं कि - " आज हम मित्र के यहाँ भोजन करने गए । वड़ी धूम - धाम थी, खूब रंग छाया हुआ था । नाना प्रकार के पकवान थे— बड़ा ही आनन्द आया । इस पर सामने वाला प्रश्न करता है कि, श्रापके मित्र के यहाँ प्रायोजन क्या था? जब तक दावत का कारण नहीं बतला दिया जाता है, तब तक प्रधान विषय की सिद्धि नहीं हो पाती । जिस संगति से प्रधान विषय की सिद्धि हो जाती है - वह " हेतुता संगति " कहलाती है । [ ४ ] चौथी है " अवसर संगति " । नियमित क्रम - युक्त जो वाग्व्यवहार है, उसे ही अवसर -संगति कहते हैं । चार उपदेशक भाषण देंगे । इसमें पहले अमुक उपदेशक भाषण देंगे - बाद में अमुक देंगे इत्यादि जो अवसर प्राप्त क्रम - व्यवस्था है - उसे ही " अवसर संगति " कहते हैं । [ ५ ] पांचवीं है " निर्वाहैक्य संगति " । अपनी बात को सिद्ध करने के लिए तत् तत्समान ही अन्य बात का उल्लेख करना एवं उसके द्वारा अपने कथन की पुष्टि करना निर्वाहैक्य संगति कहलाती है । हम अपने सबूत पेश कर जज के सामने यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हमारी आपत्तियाँ विचार योग्य हैं एवं इसी समय यदि हम किसी अन्य कोर्ट के ऐसे फैसले का प्रतिपादन कर देते हैं तो हमारा मत प्रबल हो जाएगा । इसी का नाम " निर्वाहैक्य संगति " है । आजकल इस संगति को बहुतायत से काम में लिया जाता है । अपनी कार्य - सिद्धि के लिए — वाहक जो कार्य है उसे नजीर - स्वरूप बतला कर अपने वाक्य की सिद्धि करना - " निर्वाहैक्य संगति " कहलाती है । [ ६ ] छटी है " काय्यैक्य संगति " । आपने यह कार्य्यं वैसा ही किया है जैसा कि रामलाल ने किया था | आपके कार्य के स्वरूप को बतलाने के लिए रामलाल के कार्य के स्वरूप को बतला कर जो सम - कार्थ्य - स्वरूप सिद्ध करना है उसे ही " काय्यैक्य संगति " कहते हैं । इस प्रकार संसार के यच्चयावत् वाग् व्यवहारों में कुल छः ही प्रकार की संगतियाँ हैं । छहों में से यदि एक भी नहीं है तो मर्थ्यादा का अतिक्रमण है । यदि छहों में से बाहर निकल गई तो वह " उन्मत्त प्रलाप " मात्र है । कुछ दार्शनिकों का कहना है कि- वेद में पुनरुक्तियाँ बहुत अधिक मात्रा में हैं । एक ही बात को ५०-५० बार कहा जाता है । जिसमें इस प्रकार पुनरुक्तियाँ हों वह वेद क्यों कर [ ५६८ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मणे प्रमाण माना जा सकता है? इस आरोप के प्रत्युत्तर में कहना यही है कि यदि पूर्वोक्त छहों संगतियों के अतिरिक्त अन्य पुनरुक्ति हो तो वेद पर लगाया गया आरोप अवश्य ही सत्य है, परन्तु इन छः संगतियों के अतिरिक्त जब सातवाँ वाक्य - विन्यास है ही नहीं तो फिर इस प्रकार के आक्षेपों का क्या आधार रह जाता है? सम्भव है कि - " आतिथ्येन वै इष्ट्वा " पर इसी प्रकार का आक्षेप लगाया जाए, परन्तु यह आक्षेप न हो कर तथ्यों का अपलाप ही होगा । देवताओं ने अवान्तर दीक्षा ली थी - यह बतलाना है । इसकी सिद्धि के लिए हेतुता - संगति करना आवश्यक है । पुनः दीक्षा क्यों ली थी- जब कि वे प्रारम्भ में ही दीक्षा ले चुके थे - इस प्रकार अवान्तर दीक्षा की हेतुता बतलाने के लिए पहले उसका कारण बतलाना आवश्यक है । ऐसी अवस्था में पुनरुक्ति दोष नहीं लगाया जा सकता । कहना इस प्रपञ्च से यही है वेद में कहीं भी पुनरुक्ति नहीं है । वेद में एक ही बात को बार - बार दोहराने का तात्पर्य्यं पुनरुक्ति दोष कदापि नहीं है । पूर्वोक्त संगतियों की मर्यादा के बाहर श्रुतियाँ कभी नहीं जाती हैं - अतएव वेद में पुनरुक्तियों का आक्षेप करना सर्वथा बौद्धिक प्रलाप करना है । पुनरुक्ति दोष के विषय में फैली भ्रांति को दूर करने के उद्देश्य से ही, अप्रासङ्गिक होते हुए भी इस विषय का स्पष्टीकरण कर दिया गया है । अब प्रकृत ग्रंथ का अनु-सरण करते हैं । देवतानों ने तानूनप्त्रों से अर्थात् तनूनपात् वायु को साक्षी बना कर उसकी साक्षी में- इन्द्र के आधिपत्य में - संघ रूप से रहने की जो सत्य प्रतिज्ञाएँ की थीं - उन प्रतिज्ञाओं के उल्लेख से पुनर्दीक्षा विषयक जिज्ञासा को शान्त कर दिया । किसे शान्त कर दिया इसका उत्तर देते हुए कहते हैं - " तान्-समदबिन्दत् " देवता श्रातिथ्येष्टि कर परस्पर की अहमहमिका से एक दूसरे के आधिपत्य में रहना नाप-सन्द करते हुए पृथक् हो गए - प्रोर आपस में कलह करने लगे । परस्पर के कलह के कारण देवताओं में असुर आघुमे । देवताओं का संगठन टूटने से असुरों ने उनके ऊपर आक्रमण कर दिया । इससे देवता घबराए और उन्होंने अपनी इस मूर्खता पर पश्चात्ताप किया । कार्य्यं के बिगड़ने के अनन्तर ताप होता है अत-एव इसे “ पश्चात् ताप् ” कहते हैं । आखिर उन्होंने तनूनपात् को साक्षी बना कर शपथ ली कि - " आज से हम परस्पर के कलह को शान्त करते हुए प्रतिज्ञा करते हैं — कि कभी अलग नहीं होंगे, हमेशा इन्द्र के आधिपत्य में रहेंगे । इस प्रकार जो अहमहमिका - जो समत् ( कलह ) देवताओं में उत्पन्न हो गया था-उसको उन्होंते तानूनपात् वायु की साक्षी में शपथ ले कर सत्य - प्रतिज्ञा ग्रहण कर शान्त किया, जैसा कि तानूनप्त्र ब्राह्मण में बतला दिया गया है— " आतिथ्येन वै देवा इष्ट्वा तान् समदविन्दत् । ते तानूनप्त्रैः सम-शाम्यन् ” । यज्ञान्त में जो स्नान होता है उस का नाम " प्रवभूथ " स्नान है । दीक्षित देवता को प्रतिज्ञा करनी पड़ती है कि जब तक यज्ञ समाप्त नहीं हो जाएगा तब तक अर्थात् अवभृथ स्नान पर्य्यन्त मैं कभी भी दीक्षित व्रतों का उल्लंघन नहीं करूँगा । सत्य ही बोलूँगा, कभी परस्पर झगड़ा नहीं करूंगा, चाहे [ ५६ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मणं भवान्तरदीक्षा ब्राह्मणं जिससे चाहे जो नहीं बोलूंगा, सर्वथा मर्य्यादा में रहूँगा । यदि दीक्षित देवता अवभृथ स्नान के पहले ही इन नियमों में से किसी भी एक नियम को भंग कर दे तो यज्ञ का धारा - बल टूट जाता है । उसी समय यज्ञ में क्षोभ उत्पन्न हो जाता है । प्राण - देवता आग्नेय हैं । यह बात कई बार बतला दी गयी है । प्राण - देवता पृथिवी से सूर्य्य तक व्याप्त रहते हैं । पृथिवी के केन्द्र से सूर्य्यं तक जो पार्थिव अग्नि है - सूर्य्य का जो सोलर सिस्टम है - वही संवत्सर - मण्डल कहलाता है । इस संवत्सराग्नि का सूर्य के साथ सर्वात्मना - ३६० दिन भोग होता है । सारे पार्थिव संवत्सर - मण्डल का भोग ३६० दिन में होता । इसी का नाम संवत्सर - यज्ञ है । संवत्सर - मण्डल के अन्त में परमेष्ठि- मण्डल है । सूर्य्यं के ऊपर चारों ओर पानी ही पानी भरा रहता है । संवत्सर में रहने वाले सारे प्राण - देवता यज्ञान्त में संवत्सर - मण्डल से ऊपर व्याप्त पारमेष्ठ्य पानी में " अवभृथ " स्नान करते हैं । इन प्राण - देवताओं ने सृष्टि के प्रारम्भ में जब कि यज्ञ प्रारम्भ ही हुआ था-इस स्नान से पहले ही कलह कर अपने दीक्षा - व्रत को तोड़ डाला था । अलग हो कर उन्होंने जो मिथ्या श्राचरण किया उसी से उनका व्रत भंग हो गया । इस कलह को शान्त करने के लिए उन्होंने परस्पर प्रतिज्ञा करते हुए " तानूनप्त्रकर्म्म " किया कि " यदि प्राइन्दा हम ऐसा करें तो हमारा सर्वनाश हो जाए । इस प्रकार परस्पर सौगन्ध खा कर इन्होंने पापमय व्यवहार किया । शपथ कर्म्म - तानूनप्त्र कर्म्म - सर्वथा निन्दित है | सौंगध खाना श्रात्मा को गिराना है । चूँकि देवताओं ने परस्पर शपथ ली थी - प्रतएव कह सकते हैं कि उन्होंने पाप व्यवहार किया । परन्तु क्या करते? । सुलह का और कोई उपाय था भी नहीं -श्रतएव बाध्य होकर उन्हें शपथ लेनी पड़ी । इस प्रकार पहले परस्पर कलह कर संघ को तोड़ना और बाद में शपथ द्वारा झगड़े को शान्त करना दोनों ही व्रत - भंग करने के प्रधान कारण हैं । कलह पहला दोष - शपथ दूसरा दोष । दोनों ही दोष ' अवभृथ ' स्नान के पूर्व ही हो जाते हैं - प्रतएव दीक्षा जो कि अवभृथान्त तक रहती है, पहले ही भंग हो जाती है । उस टूटी हुई दीक्षा का पुनः संधान करने के लिए-प्रायश्चित्त स्वरूप पुन: दीक्षा ली जाती है । यह दीक्षा पूर्व की दीक्षा के रहते हुए ली जाती है अतएव इसका नाम " अवान्तर दीक्षा " रक्खा गया है । प्रकृति - मण्डल के देवताओं ने तानूनप्त्र कर्म के प्राय-श्चित्त - विधान के रूप में इस अवान्तर दीक्षा - कर्म्म को देखा और सम्पन्न किया । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - " देवताओं ने जो संधान तोड़ते हुए व्रत भंग किया और परस्पर शपथ ग्रहण का पाप किया ये दो ही दीक्षा - व्रत भंग करने के कारण थे । अतएव दीक्षा - व्रत विधान तक इन दोनों दोषों को नष्ट कर दीक्षा संधान के लिए उन्होंने प्रायश्चित्त करने की इच्छा की --" त एतस्या प्रायश्चित्तिमैच्छन् - यदन्योऽन्यं पापमवदन् ” । स्वीकृत दीक्षा का यदि अवभूथ स्नान पर्यंन्त पालन कर लिया जाय तो प्रायश्चित्त की आवश्य-कता नहीं, है । क्यों कि उसी दीक्षा से कार्य्यं चल जाता है । यदि श्रवभूथ स्नानान्त की जाने वाली दीक्षा को अव स्नान से पूर्व ही भंग कर दिया जाता है— या दीक्षा का पालन यथोचित रूपेण नहीं किया जाता है तब उस अवस्था में प्रायश्चित्त अवश्य ही करना पड़ता है । देवताओं ने भी श्रवभृथ स्नान पर्य्यन्त प्रभावशील दीक्षा का पालन नहीं किया तथा बीच में ही पाप - कर्म्म कर बैठे - प्रतएव उन्हें प्रायश्चित्त करने की आवश्यकता श्रापड़ी-[ ६०० ]