Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 611–620

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 611–620

पृष्ठ 611

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण " नाह पुराऽवभृथात् पुनर्दीक्षामवाकल्पयन् ( अतः प्रायश्चित्तिमैच्छ-दिति भावः ) " । उन प्राण देवताओं ने प्रायश्चित स्वरूप इस अवान्तर दीक्षा को उपाय के रूप में सार्थक देखा । उन्होंने निश्चय किया कि अवान्तर दीक्षा से हमारा मिथ्याभाव - पापकर्म्म नष्ट हो जाएगा । इस प्रकार प्राण- देवताओं ने तानूनप्त्रानन्तर- इस अवान्तर दीक्षा को ग्रहण किया । " प्रवभृथ पर्यन्त सत्यमेव वदि-surfa " ( श्रौत सूत्र, का ० ) इस नियम को देवताओं ने भंग कर डाला । अतः तत्साधनार्थ बीच में पुनः दीक्षा करनी पड़ी - प्रतएव इस का नाम “ अवान्तर दीक्षा " पड़ा । इस नाम का दूसरा निर्वचन यह है कि प्रारम्भ में जो दीक्षा ली गई थी वह तो अवभृथ स्नानान्त पर्य्यन्त चलती है अतः उसी नियम के अन्तर्गत पुनः दीक्षा ली जाती है । क्योंकि यह दीक्षान्तर्गतदीक्षा - है - प्रतएव इसे " अवान्तरदीक्षा " कहते हैं । प्राणदेवताओं ने तानूनप्त्र के साक्ष्य में प्रायश्चित्त के लिए अवान्तर दीक्षा ली थी- यही तात्पर्य है— " त एतामवान्तरां दीक्षामपश्यन् " ॥ १ ॥

प्राण - देवताओं का हमारे यज्ञ से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है । हमने यज्ञ - विद्या भुवन स्वर्गवासी देवतानों से सीखी थी - प्रतएव वे जो कुछ करते थे, वही हम करते थे । भौम देवता जो कुछ भी करते थे - प्राणदेवताओं के अनुसार ही करते थे । प्राण - यज्ञ की परीक्षा कर ठीक उसी के अनुकरण पर भौम देवताओं ने यज्ञ - विद्या का आविष्कार किया । भौम देवताओं ने - प्राणदेवताओं में होने वाली अवान्तर दीक्षा का अवलोकन कर उसी दीक्षा का समावेश सोमयज्ञ में किया था । भौम देवताओं ने किस प्रकार प्रवान्तर दीक्षा ली - प्रौर उन्होंने अवान्तर दीक्षा में क्या किया-यही बतलाते हैं । भौम देवताओं ने अग्नि से अपनी त्वचा को चारों ओर से वेष्टित कर लिया । अग्नि को ही त्वचा बना कर वे सर्वथा अग्निमय बन गए । " बिपल्याङ्गयन्त " का अर्थ है - " विपर्थ्याङ्गयन्त " -विशिष्य परि - ( प ) परितः - ( प्रवेष्टयन् ) " " वि " - पद से सूचित किया जाता है कि अग्नि को शरीर में वेष्टित करने का एक विशेष वैज्ञानिक नियम है । इसी नियम के अनुसार अग्नि को त्वचा के चारों ओर किया जाता है । अग्नि को शरीर के चारों ओर वेष्टित करने का अर्थ अग्नि में बैठ कर शरीर को जला देना कदापि नहीं है । इस प्रकार का वेष्टन यहाँ न समझा जाए - इसीलिए " वि " कह दिया गया है । अग्नि को वेष्टित करने की खास विधि से अग्नि श्रात्मसात् हो जाता है और चारों ओर इस प्रकार से वेष्टित होता है कि इससे शरीर पर बिलकुल भी प्राँच नहीं आती है । इसी विधि - से देवताओं ने अपने शरीरों को अग्नि से श्रात्मसात् ( वेष्टित ) कर लिया अर्थात् वे श्रग्निमय बन गए -" तेऽग्निनैव त्वचं विपल्याङ्गयन्त " । अग्नि से त्वचा को क्यों वेष्टित किया जाता है, इसका कारण बतलाते हैं । अग्नि तप - स्वरूप है । दीक्षा भी तप - स्वरूप है । ताप का नाम अग्नि है - प्रतएव इसे ' तक ' कहते हैं । दीक्षा में भी ताप [ ६०१ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मणे ( संताप ) होता है । जो मनुष्य नियम में रहते हैं— उनका जीवन कष्टमय ही रहता है । वहाँ नहीं जा सकते - यह नहीं बोल सकते - इनसे नहीं बोल सकते - इस समय सो नहीं सकते । इस प्रकार के नियम-बन्धनों का नाम ही दीक्षा है । इन्हीं बन्धनों के कारण आत्मा की स्वतन्त्रता नियंत्रण में श्रा जाती है— अतएव श्रात्मा अकुलाता है । इस अकुलाहट के कारण आत्मा में संताप पैदा होता है । चार घण्टे नित्य-बन्धन में रहने वाले पाठशालीय नियमों में दीक्षित विद्यार्थी से इस संताप का स्वरूप सम्यक्तया ज्ञात हो सकता है । कहना यही है कि दीक्षा नाम है नियम में रहने का और नियम से " संताप " होता है-श्रतएव हम दीक्षा को " ताप " कहने के लिए तय्यार हैं । ताप श्रग्नि का स्वरूप है । इसका प्रत्यक्ष उदा-हरण यही है कि जिस समय हम भूखे होते हैं— उपवास कर लेते हैं— उस दिन हमारे शरीर का वैश्वा-नर अग्नि प्रबल वेग से उद्दीप्त हो जाता है - होठ सूख जाते हैं — शरीर थर - थर काँपने लगता है । यह होठ सूखना- देह का कांपना श्रादि श्रग्नि के कारण ही होता है क्योंकि ये सब अग्नि के ही धर्म हैं । अत-एव अग्नि ताप होने से तप - स्वरूप ही है--" तपो वा श्रग्निः, तपो दीक्षा " । ताप ही को तप कहते हैं । दीक्षा भी तपस्वरूप है । तप श्रग्नि है - प्रतएव श्रग्नि को चारों ओर वेष्टित करना ही अवान्तर दीक्षा लेना है । दीक्षा का घटपटादिवत् कोई स्वरूप तो है नहीं - जिसे धारण कर लिया जाए । तप ही दीक्षा का स्वरूप है - तप अग्नि का धर्म है - श्रतएव निदानेन श्रग्नि का वेष्टन करना पड़ता है । इसी कारण भौमदेवता भी अग्नि से त्वचा को वेष्टित करते हुए भवान्तर दीक्षा को प्राप्त हो गए । आत्मा में अग्निधारण करना ही अवान्तर दीक्षा है । अग्नि को वेष्टित करना ही अवान्तर दीक्षा को धारण करना है, क्योंकि अग्नि तप - स्वरूप है और तप ही का नाम दीक्षा है-" तदवान्तरां दीक्षामुपायन् " । अवभृथ स्नान पर्य्यन्त चलने वाली पूर्व दीक्षा के बीच में भंग हो जाने के कारण ही देवताओं प्रायश्चित्त स्वरूप इस दीक्षा को लिया था - प्रतएव इसका नाम " अवान्तर दीक्षा " हो गया । दीक्षा-न्तर्गता दीक्षा का नाम ही - अवान्तर दीक्षा है-" तद् यदवान्तरां दीक्षामुपायन् तस्मादवान्तरदीक्षा " । समिधा को अग्नि में डाल कर अग्नि को तो आत्मसात् किया ही परन्तु देवताओं ने इस दीक्षा अंगुलीम्यञ्चन किया और मेखला का बन्धन भी धारण किया । देवताओं ने अपनी अंगुलियों को बहुत ही ज्यादा संश्लिष्ट किया । दोनों की अंगुलियों को एकदम मोड़ लिया । दीक्षणीयेष्टि के पूर्व मेखला -धारण की जाती हैं । उस समय उसका बन्धन कुछ ढीला रहता है । सर्वप्रथम चारों ओर बँधी हुई जो ढीली - ढाली मेखला है— उसे वापस जोर से कस लिया । इस प्रकार भौम देवताओं ने अवान्तर दीक्षा ली । [ ६०२ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण यदि किसी मनुष्य से किसी प्रकार का पाप कर्म हो गया है तो वह एकदम अपने हाथों को परस्पर मसलने लगता है । इसका तात्पर्य यह है कि - यदि वास्तव में हमें अपने पाप-कम्र्म्मो का पश्चात्ताप होता है तो हम अपने हाथों को स्वतः ही मसलने लग जाते हैं । सम्पूर्ण - शरीर-मारे दुःख के मारे पश्चात्ताप के प्रग्निसय बन जाता है । हाथ मलना ही पश्चात्ताप का साक्षात् स्वरूप है । अवान्तर दीक्षा - पश्चात्ताप - स्वरूपा ही है । प्रकृति में पश्चात्ताप का स्वरूप हाथ मलना है - शरीर का अग्निमय बनना है -- प्रतएव अवान्तर दीक्ष । में अंगुलियों को बड़े जोर से मोड़ा जाता है- प्रग्नि को आत्मसात् किया जाता है । इसी कारण ढीली मेखला को जोर से कस कर वास्तविक पश्चात्ताप का अभिनय किया जाता है । प्राण देवता अग्निमय हैं । वे सदा तप करते रहते हैं । सूर्य्य हिरण्यपारिण कहलाता है । उसकी रश्मियाँ ही उसकी अंगुलियाँ हैं । अंगुलियाँ ही परस्पर संश्लिष्ट रहती हैं । यही प्रारण - देवताओं का अंगुलीन्यञ्चन है । देवता रात - दिन तपस्या किया करते हैं । तभी तो उनका संव-त्सर - यज्ञ सम्पूर्ण होता है । इसी की प्रतिकृति - स्वरूप - भौमदेवताओं ने अवान्तर दीक्षा की थी । उन्होंने मन्त्र द्वारा समिधा को अग्नि में डाल कर अग्नि में श्रात्मसात् किया था तथा अग्नि को प्रात्मसात् करके ही तनूनपत्र दोष को मिटाया था । जैसा कि अग्नि में सोने को तपा कर उसे निर्दुष्ट कर दिया जाता है तथैव देवताओं ने पश्चात्ताप - स्वरूप अंगुलिन्यञ्चन किया था और मेखला कसी थी । पश्चात्ताप से पाप की निवृत्ति हो जाती है । श्रतएव पश्चात्ताप - स्वरूप इस अवान्तर दीक्षा से भौमदेवताओं का पाप सर्वथा नष्ट हो गया । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" सन्तरामङ्गुलीराञ्चन्त - ( अंगुलीरतिशयेन संश्लिष्टा अकुर्वन् ) -सन्तरां मेखलां पर्यस्तामेवैनामेतत्सतों पर्यास्यन्त ( पूर्वी शिथिलबद्धां परितः क्षिप्तामेव पुनः संलग्नां - बढ़बन्धनयुक्तामकुर्वन् ) " । " यद्वै देवा प्रकुर्वंस्तत् करवाणि " - यह हमारा सिद्धान्त है - इसी सिद्धान्त के अनुसार कलह न रहने पर भी ग्रह यजमान प्रवान्तर दीक्षा ग्रहण करता है । अपिच हमसे कलह भी हो जाता है । यज-मान आखिर मनुष्य है । मनुष्य से त्रुटि अवश्य हो जाती 1 कई भूलें तो ऐसी हो जाती हैं कि जिनका पता भी नहीं रहता । अवान्तर दीक्षा से - यजमान प्रवभृथ स्नानान्तर से पूर्व जो कुछ - श्रप्रत्यय ( नियम-विरुद्ध ) करता है - एवं बोलता है – उसी का अर्थात् मिथ्या - भाषण और मिथ्या - कर्म्म का प्रायश्चित्त करता है । प्रतएव प्रायश्चित्त के लिए अवश्य ही अवान्तर दीक्षा करनी चाहिए - यही

तात्पर्य है -" तथो एवैष एतद् - यदतः प्राचीनमत्रत्यं वा करोति, अत्रत्यं वा वदति ।

तस्यैवैतत्प्रायश्चित्त कुरुते " ॥२ ॥

देवताओं ने अवान्तर दीक्षा में मन्त्र द्वारा अग्नि में समिधाधान कर अग्नि से ही अपनी त्वचा को परिवेष्टित किया था । तथैव यजमान भी इस अवान्तर दीक्षा में समिधाधान करता हुआ अग्नि से [ ६०३ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण ही त्वचा को परिवेष्टित करता है । अग्नि को आत्मसात् कर मिध्याप्रयुक्त दोषों को जलाता है । श्रग्नि तप - स्वरूप है एवं दीक्षा भी तप स्वरूप है - जैसा कि पूर्व में बतला दिया गया है । इस प्रकार अग्नि को अत्मसात् करता हुआ यजमान प्रवान्तर दीक्षा को ही प्राप्त हो जाता | तात्पर्य यह है कि श्रग्नि और दीक्षा समानधर्मा हैं- ऐसी अवस्था में अग्नि को आत्मसात् करना प्रवान्तर दीक्षा को श्रङ्गीकार करना है -" सोऽग्निनैव त्वचं विपल्यङ्गयते ( विपर्य्यङ्गयते ) । तपो वा अग्निः, तपो दीक्षा । तदवान्तरां दीक्षामुपैति " । भौमदेवतावत् यजमान अंगुलियों को बड़े जोर से मोड़ता है और पहले बँधी हुई ढीली मेखला को कस कर बाँधता है । यही तो पश्चात्ताप का वास्तविक स्वरूप है— " सन्तरामगुलीरचते, सन्तरां मेखलां पर्यस्तामेवैनामेतत्सतीं पर्य्यस्यते " । एक विशेष बात और बतलाने के अभिप्राय से - फिर उसी बात को दोहराते हैं - देवता अग्नि को आत्मसात् कर अवान्तर दीक्षा से प्रजा को प्राप्त हो गए । अवान्तर दीक्षा से देवताओं ने नया जन्म ले लिया । वास्तव में बात सच है कि जब तक मनुष्य दोषाक्रान्त रहता है तब तक उसका श्रात्मा असुर भावाक्रान्त रहता है | यदि मनुष्य कोई धोखा कर लेता है तो उसका श्रात्मा पतित हो जाता है - निर्बल हो जाता है । यदि दैवयोग से उसको अपने कम्मों का पश्चात्ताप हो जाता है— एवं पश्चात्ताप से वह अपने पापों को धो डालता है तो उसका नया जन्म हो जाता है । उसके असुर भाव नष्ट हो जाते हैं तथा दिव्य भाव नए तौर पर जन्म ले लेते हैं । इस कारण दोषाक्रान्त श्रात्मा पुनः स्वच्छ हो जाता है । इसीलिए संन्यासी की जाति पूछते हुए - " आपका पूर्व जन्म कौन सा था? " - यह कहा जाता है । इसका कारण यही है कि सन्यासी का जो आत्मा गृहस्थाश्रम में था उसका कहीं पता नहीं है क्योंकि सन्यासी का आत्मा बिलकुल उससे भिन्न है । महात्मा तुलसीदासजी, महात्मा सूरदासजी, महात्मा कबीरजी, महात्मा दादूजी, ये सब नये जन्म के निदर्शन हैं । तुलदीदास जी और सूरदासजी का आत्मा जैसा ज्ञानो-दय के पूर्व था - वह बाद में बिलकुल बदल गया । ज्ञानोदय के अनन्तर अब वे तुलसीदास जी -सूरदास जी थे । यह उनका नया जन्म था । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि -देवताओं ने अवान्तर दीक्षा से - तानून-त्रादि विधि से दोषों से छुटकारा पा कर - प्रजा को अर्थात् नये जन्म को प्राप्त किया । देवताओं ने नया जन्म धारण किया । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" प्रजामु हैव तद्देवा उपायन् " ॥३ ॥

प्रजा को अर्थात् - नये जन्म को उन्होंने वास्तव में प्राप्त किया था । देवताओं ने अग्नि से ही त्वचा को वेष्टित किया था वही उनके नये जन्म का कारण है । अग्नि से ही नया जन्म होता है । मिथुन भाव का कर्त्ता अग्नि ही है । फिर भला इसका सम्बन्ध होने पर नया जन्म क्यों न हो? चूँकि देवताओं ने इसे आत्मसात् किया था - प्रतएव उन्हें नया जन्म लेना पड़ा । अग्नि समस्त दोषों को नेस्त-नाबूद कर आत्मा का नया जन्म कर देता है । [ ६०४ ]

पृष्ठ 615

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण " तेऽग्निनैव त्वयं विपल्याङ्गयन्त । अग्निर्वै मिथुनस्य कर्ता प्रजनयिता " । अग्नि ही मिथुन का - दाम्पत्य सम्बन्ध का कर्ता है - और यही प्रजनयिता है । यह अग्नि दो प्रकार से मिथुन का कर्त्ता है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-" सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः । तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः " ॥ ( ऋग्वेद मं ० १० ८५।४० ) इसका तात्पर्य यही है कि जब लड़की पैदा होती है तो दो वर्ष तक उसमें सौम्य प्रारण उल्वरण रहता है । दो से चार वर्ष पर्य्यन्त गन्धर्वप्राण का भोग होता है एवं चार वर्ष के बाद अग्नि का भोग होता है । पुरुष के साथ स्त्री के दाम्पत्य सम्बन्ध का साधक यही अग्नि तत्त्व है । क्यों कि दाम्पत्य को ही मिथुन कहते हैं - अतएव " श्रग्निवें मिथुनस्य कर्ता " कहा है । पुरुष को स्त्री अग्नि द्वारा श्रग्नि की साक्षी में मिलती है । दाम्पत्य अग्नि से होता है- प्रतएव अग्नि को मिथुनस्यकर्ता ( दाम्पत्य विधायक ) कहते हैं | यह पहला दाम्पत्य - सम्बन्ध है । शुक्र - शोणित का सम्बन्ध दूसरा दाम्पत्य सम्बन्ध है अर्थात् दाम्पत्यभाव स्थापित होने के बाद ही स्त्री - पुरुष के बीच शुत्र - शोणित का सम्बन्ध होना चाहिए । दाम्पत्य - सम्बन्ध का साधक और निर्वाहक भी अग्नि ही है । रस- असृक्- मेद्य - मज्जा - मांस - शुक्रादि सातों धातुत्रों में शुक्र और शोणित भी सम्मिलित धातुएँ अग्नि के चिनाव ( चयन ) से बनती हैं । इन सातों हैं । इनके सम्बन्ध को ही दाम्पत्य - सम्बन्ध कहते हैं । सोम अर्थात् शुक्र तो स्त्री है और अग्नि अर्थात् असृक् पुरुष है । रूधिर अग्नि है, लाल है । स्त्री के रुधिर में काम रहता है । इस लाल रुधिर ( अग्नि ) का निर्माण मंगलग्रह से होता है । मंगल का उच्च स्थान मकर है । मकर राशि में मंगल उच्च होता है, चूंकि यही स्त्री के रुधिर में रहता है - प्रतएव स्त्री के काम को ' मकरध्वज ' कहते हैं । पुरुष का वीर्य्य शुक्र ग्रह बनता है । शुक्र - मीन में उच्च होता है - अतएव पुरुष के काम को " मीनध्वज " कहते हैं । पुरुष के काम में स्त्री बैठी हुई है - प्रत-एब वह सदा स्त्री को चाहा करता है - एवं स्त्री के काम में पुरुष बैठा हुआ है - प्रतएव स्त्री सदा पुरुष को चाहा करती है । प्रकृत में हमें इतना ही कहना है कि शुक्र - शोणित के सम्बन्ध का नाम ही मिथुन भाव है । इसका कर्ता अग्नि ही है । मिथुनकर्ता ही नहीं है अपितु प्रजनयिता - अर्थात् पैदा करने वाला भी है । यदि श्रग्नि न हो तो कोई भी वस्तु पैदा ही न हो । अग्नि में सोमाहुति से ही सृष्टि होती है । शरीर की गरमी ही तो सन्तान उत्पन्न करती है । जो निर्बल मनुष्य हैं - अर्थात् जिनके शरीर में गरमी नहीं है - वे सन्तान पैदा करने में सर्वथा असमर्थ हैं । सूर्य्य अग्निमय है - इसी से तो यच्चयावत् चर - अचर की उत्पत्ति होती * इस अग्नि के क्रमशः परिपक्व एवं पुष्ट होने का प्रमाण स्त्री के ऋतुचक्र का प्रारम्भ होना हूँ । वार्धक्य की प्रारम्भिक अवस्था में अग्नि की क्षीणता स्त्री के ऋतुचक्र की समाप्ति है । [ ६०५ ]

पृष्ठ 616

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण है । इसीलिए " नूनंजनाः सूर्येण प्रसूता " यह कहा जाता है - प्रतएव श्रग्नि को अवश्य ही " प्रजनयिता " कह सकते हैं । यही मिथुन का कर्त्ता है - यही प्रजनयिता है - इसी अभिप्राय से कहते हैं-" अग्नि मिथुनस्य कर्त्ता प्रजनयिता " । देवताओं ने ऐसे प्रजनयिता श्रग्नि को आत्मसात् कर प्रजा को उत्पन्न किया श्रर्थात् अपना नया जन्म धारण किया । श्रग्नि को आत्मसात् करना ही प्रजोत्पत्ति करना है -“ तत् प्रजामुपायन् ” । केवल अग्नि को आत्मसात् करने से ही काम नहीं चलता है । तदनुकूल प्राण व्यापार भी करना पड़ता है । शरीर -बल तब तक बेकार है जब तक उसे काम में न लाया जाए- प्रतएव देवताओं ने पहले अग्नि को श्रात्मसात् कर बलाधान किया । बाद में तदनुकूल प्राण - व्यापार स्वरूप अँगुलियों को सिकोड़ा ( मोड़ा ) श्रोर ढीली मेखला को कस कर बांधा - अर्थात् काम में मुस्तैद हो गए । प्राणपण से काम में जुट गए । इसी तप के प्रभाव से देवताओं ने उस प्रजा को आत्मा में धारण किया । श्रर्थात् परिश्रम से जब पाप धुल गए तब उससे जो नया दिव्य श्रात्मा ( दिव्य भाव ) उत्पन्न हुआा - उसे उन्होंने श्रात्मसात् कर लिया । अवान्तर दीक्षा से देवता तपे, स्वर्ण के माफिक स्वच्छ हो गए - यही तात्पर्य है । चूंकि देवता अवान्तर दीक्षा से प्रजा को अर्थात् दिव्यभाव को प्राप्त ' गए थे तथैव यजमान प्रवान्तर दीक्षा ग्रहण करता हुआ दिव्यभाव को प्राप्त होता है । " सन्तरामङ्गुलीराञ्चन्त, सन्तरां मेखलाम् ( पर्थ्यास्यन्त ) । तत् प्रजामा-त्मन्नकुर्वत ( देवाः ) । तथो एवैष ( यजमानः ) एतत् प्रजामेवोपैति ” ॥४ ॥

अवान्तर दीक्षा में भीमस्वर्गवासी देवताओं ने जो कार्य किये थे वही कार्य्यं यह यजमान करता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं - यजमान अग्नि में समिधाधान करता हुआ त्वचा को अग्नि से परिवेष्टित करता है, अर्थात् आत्मा को श्रग्निमय बनाता है । अग्नि ही मिथुनकर्त्ता और प्रजनयिता है । इसे ग्रात्म-सात् करता हुआ यजमान प्रजा को अपने दिव्य भाव को - उत्पन्न करता है एवं तदर्थ तपस्वरूप अँगुलीन्य-ञ्चन करता है और मेखला को कसता है । कमरबंध ( कमर पर बांधने का मौञ्जीबन्ध ) कस कर कार्य्यं में जुट जाता है - यही मेखला - बन्धन का तात्पर्य है । यजमान इससे नया दिव्यात्मा ( दिव्य भाव ) पैदा करेगा । यही दिव्यभाव यजमान को स्वर्ग में ले जाएगा । इस प्रकार अग्नि को आत्मसात् करके तप करना मानो प्रजा को ही अर्थात् दिव्यात्मा को ही ग्रात्मसात् करना है । यदि मनुष्य किसी काम पर मुस्तैद हो जाता है तो उसके लिए कहा जाता है कि- " इसने तो काम को मुट्ठी में कर लिया । इसी प्रकार यजमान मुट्ठी बाँधता है - इससे यह दिखलाता है कि मैंने काम को मुट्ठी में कर लिया है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " सोऽग्निनैव त्वचं विपत्यङ्गयते । श्रग्निर्वै मिथुनस्य कर्त्ता प्रजनयिता । तत् प्रजामुपैति । सन्तरामगुलीरचते, सन्तरां मेखलाम् ( पर्य्यस्यते ) । तत् प्रजामात्मन् कुरुते ॥५ ॥

[ ६०६ ]

पृष्ठ 617

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण सोम यज्ञ में कुल १६ ऋत्विक् होते हैं । उन सोलहों में चार प्रधान होते हैं । उनके १ - होता, २ - अध्वर्यु, ३ – उद्गाता, ४ - ब्रह्मा ये नाम हैं । तीन - तीन ऋत्विक् इनके नायब होते हैं । इस प्रकार कुल १६ ऋत्विक् होते हैं । इन सोलहों का क्रम निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट हो जाता है— १ होता अध्वर्युः उद्गाता ब्रह्मा इति प्रथमा ( १ ) ४ ) २ प्रशास्ता प्रतिप्रस्थाता प्रस्तोता ब्राह्मणच्छंसी इति श्रधिनः ( 11 ) २ ) ३ श्रच्छावाकः नेष्टा प्रतिहर्त्ता अग्नीध्रः इति तृतीयिनः ( 1-1 ) १1-1 ) ४ ग्रामस्तोता उन्नता सुब्रह्मण्यः पोता इति पादिनः ( 1 ) १ ) दक्षिण दक्षिणत्वं १६ ऋग्वेदिनः यजुर्वेदिनः सामवेदिनः त्रिवेदिनः ऋत्विजः प्रत्येकस्य चतुष्टयस्य इस प्रकार सोलह ऋत्विक् होते हैं एवं १७ वीं यजमान होता है । अतएव १७ ऋत्विक् मान लिए जाते हैं - प्रतएव " यजमान सप्तदशा ऋत्विजो भवति ". - यह कहा जाता है । प्राणदेवता यज्ञ में यही १६ ऋत्विक् हैं । इसीलिए तो वैधयज्ञ में १६ ऋत्विक् होते हैं एवं १७ वाँ प्रजापति होता है । प्रजापति श्रनिरुक्त- निरुक्त और उद्गीथ भेदेन तीन प्रकार के होते हैं । केन्द्र में रहने वाला जो प्रजापति है - वह " अनिरुक्त प्रजापति " ' कहलाता है । इसे " क " शब्द से व्यवहृत करते हैं । " कस्मै देवाय हविषा विधेम " ( इवे ० उ ० ४।१३ ) इस मन्त्र में इसी अनिरुक्त प्रजापति का आशय ग्रहण करते हैं । " कस्वा युनक्ति " ( शत ० १।१।१।१३ ) में जो " क " है उससे भी अनिरुक्त प्रजापति अभिप्रेत है । " प्रजापतिश्चरति गर्भे " ( महानारा ० उ ० १।१ ) तथा " ईश्वर सर्व भूतानां " ( महानारा ० उ ०१७ / ५ ) ये दोनों श्रुतियाँ क्रमशः श्रनिरुक्त और निरुक्त प्रजापति का स्वरूप बतला रही हैं । निरुक्त पूर्वोक्त क्रमानुसार दूसरा प्रजापति है । निरुक्त प्रजापति पदार्थ पर प्राक्रान्त हो " निरुक्त " ( सर्व प्रथच विशिष्ट ) " प्रजापति " कहलाने लगता है | सर्व प्रजापति महिमा विशिष्ट का नाम है । महिमा ३३ अहर्गण तक रहती है । श्रतएव इस सर्वं प्रजापति के लिए " प्रजापतिश्चतुस्त्रिंश: " * ( शत ० ४।५।७।२ ) कहा जाता है । केन्द्रस्थ कारणात्मक प्राणगर्भित वाक् स्तर ' वाक् साहस्री ' नाम से प्रसिद्ध है । इन सहस्र वाक् तत्त्वों में से ३०-३० वाक् राशि का एक - एक अहर्गण होता है । इस संख्या क्रम से ε ९ ० वाग् - रश्मियों के ३३ अहर्गण हो जाते हैं । १० वाक् शेष रह जाती हैं । यही उच्छिष्ट भाग चौंतीसवाँ सर्वप्राजापत्य अहर्गण हैं । ( शत ० ४।५।७।१-२ ) । [ ६०७ ]

पृष्ठ 618

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण श्रनिरुक्त प्रजापति एवं महिमामण्डलयुक्त कार्यात्मक निरुक्त प्रजापति का मध्यवर्ती प्रजापति " उद्गीथ प्रजापति " कहलाता है ( शत ० ६।५।३।७ ) । महिमामण्डल को वषट्कार- मण्डल कहते हैं । वषट्कार मण्डल में ३३ अहर्गण होते हैं । ३३ ग्रहण की केन्द्रीभूत शक्ति का ही नाम उद्गीथ प्रजापति है । पिण्ड के केन्द्र से प्रारम्भ कर बाहर तक ३३ अहर्गण होते हैं । इन ३३ प्रहर्गणों के मण्डल का नाम ही विभूति - मण्डल अथवा महिमामण्डल है । इनकी ही " पुन: पदम् " ( कौ ० २३।६ ) संज्ञा है । जिस प्रकार अन्तर्मण्डलीय पिण्ड का एक निश्चित केन्द्र होता है, एवमेव ३३ अहर्गणात्मक बहिर्मंण्डल का भी एक स्वतन्त्र केन्द्र होता है । यह केन्द्र सत्रहवाँ ग्रह-गंण माना गया है । अन्तर्मण्डलस्थ पिण्ड के केन्द्र का नाम अनिरुक्त प्रजापति एवं त्रयस्त्रिंश अहर्गणा-त्मक बहिर्मण्डल के १७ वें अहर्गण पर स्थित केन्द्र का प्रजापति " सप्तदश प्रजापति " " उद्गीथ प्रजापति " इत्यादि नामों से प्रसिद्ध है । ३३ विभाग पृथिवी से निकलने वाली वाक् के होते हैं - प्रतएव इसे वाङ्मण्डल कहते हैं । संसार के यच्चयावत् पदार्थ अग्नीषोमात्मक हैं । पृथिवी का अग्नि १७ वें ग्रहण तक जाता है । इसके बाद सोम है । यही सोम १७ वें ग्रहणस्थ अग्नि में आहुत होता रहता है- प्रतएव इसे " आहवनीयाग्नि " कहते हैं । यद्यपि अग्नि रहता है १७ अहर्गण तक ही - परन्तु सोम के भक्षरण से भभक कर यह अग्नि २१ अहर्गण तक चला जाता है -- प्रतएव अग्नि को २१ तक ही मान लिया जाता है । वस्तुतः श्रग्नि की अपनी प्रातिस्विक स्थिति १७ तक ही है । इस १७ वें अग्नि के बल से ही नीचे की १६ कलाओं ( अहर्गणों ) की स्थिति रहती है । सप्तदशस्थ श्राहवनीयाग्नि में यदि सोम प्राहुत न हो तो उसी समय नीचे के १६ हों अहर्गण नष्ट हो जाएँ । इन सोलहों का अधिष्ठाता १७ वीं अहर्गणस्थ - श्राहवनीय ही है - अतएब इस १७ वें को प्रजापति कहा जाता है । यही १६ ऋत्विक् हैं और १७ वां यही प्रजापति है । यह प्रजापति ही यज्ञ का यजमान - स्थानीय है । इसी से ऋत्विजों का ऋत्वित्व रहता है । यदि यहाँ पर ( यज्ञ में ) यजमान न हो तो ऋत्विजों का ऋत्वित्व नहीं रहेगा । प्रकृति के सोम याग में १६ अहर्गण १६ ऋत्विजों के रूप में होते हैं तथा १७ वीं प्रजापति - यजमान स्वरूप होता है - प्रतएव मनुष्य कृत सोम याग में भी १६ ऋत्विज होते हैं एवं १७ वाँ यजमान प्रजापति - स्वरूप होता है । इसीलिए श्रुति कहती है-" तस्माऽएतस्मै सप्तदशाय प्रजापतये । एतत्सप्तदशमन्नं समस्कुर्वन्य एष सौम्योऽध्वरोऽथ या श्रस्य ताः षोडश कला एते ते षोडशऽत्विजस्तस्मान्न सप्तदशमृत्विजं कुर्वीत नेदतिरेचयानि ” – इति । ( शत ० १० । ४ । १ । १ ९ ) प्रकृति में जो १६ ऋत्विज हैं— उनके पृथक् - पृथक् काम हैं । उन्हीं के अनुसार यहाँ मानुष्य सोमयाग में भी ऋत्विजों के काम नियत किए जाते । प्रकृति में पूर्वोक्त १६ ऋत्विजों में से जो ऋत्विक् प्रग्नि में समिधाधान करता है - उसे " समिद् - हरति " - इस व्युत्पत्ति से - " समिद्धार " कहते हैं । जो ऋत्विक् मन्त्र बोलता है— उसे प्रवचनकार कहते हैं । यहाँ भी एक समिद्धार होता है तो एक [ ६०८ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण प्रवचनकार होता है । जब देवता यज्ञ करते हैं उस समय उन दीक्षित - अर्थात् नियमसूत्र में बद्ध - देवताओं के मध्य में जो समिद्धार और प्रवचनकार नाम के ऋत्विज हैं उन्हें असुर ( राक्षस ) इतर को इतर के रूप से अर्थात् समिद्धार को प्रवचनकर्ता के रूप से और प्रवचनकर्ता को समिद्धार के रूप से मारना चाहते हैं । एक ही व्यापक असुर उन दोनों ऋत्विजों में घुस जाता है । एक ही असुर - प्रवचनकार बन-कर समिद्धार पर आक्रमण करता है, उन्हें मारना चाहता है । ग्राहवनीयाग्नि से नीचे ऋत्विक् रहते हैं - यह बात पूर्व में बतला दी गयी है । आहवनीय अग्नि प्रति प्रज्वलित रहता है— प्रतएव तमोमय श्रसुर उसमें नहीं घुस सकते । किन्तु इनको नीचे के ऋत्विजों में घुसने का - आक्रमण करने का मौका मिल जाता है । श्राहवनीय से नीचे के ऋत्विक् ( श्रर्थात् श्रग्नि ) जरा विशकलित रहते हैं— मन्द रहते है - श्रतएव असुरों को उनमें प्रविष्ट होने का मौका मिल जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं--" देवानामु ह स्म दीक्षितानां यः समिद्धारो वा, स्वाध्यायं वा - विसृज्यते-( अर्थात् - प्रवचनकारः ) । तं ह स्म ( प्रवचनकारं - समिद्धारं च ) इतरस्यैवेतरं रूपेरण- ( समिदाहर्त रूपेण प्रवचन कर्त्तारम् ) इतरस्येतरं - ( प्रवचन कर्त रूपेरण समिदाहर्त्तारम् ) श्रसुर रक्षसानि जिघांसन्ति - ( हन्तुमिच्छान्ति ) ” । प्रकृति के ऋत्विजों में- जो कि आहवनीय ( १६ वें अहर्गण ) से नीचे हैं - असुर भावों को घुसने का मौका मिल जाता है, यही तात्पर्य है । प्रकृति में जो असुर घुस जाते हैं— उनका सामान्यतः प्रत्यक्ष नहीं हो पाता है परन्तु अस्मदादि मनुष्यों में जो असुर घुस जाते हैं उनका प्रत्यक्ष अपेक्षाकृत अधिक सरलता से ज्ञेय है । हमारे में असुर भावों को पहचानने के लिए - प्राण - ऋत्विजों को लक्ष्य बना कर उन पर घटित करते हुए - भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - " जब समिद्धार में श्रौर प्रवचनकार दोनों में, इन दोनों के रूप से असुर घुस पड़े तो वे अपशब्दों का प्रयोग करते हुए परस्पर झगड़ने लगे । समिद्धार प्रव-चनकर्त्ता से कहने लगा- " तुमने मेरे काम को बिगाड़ना चाहा - यही नहीं, तुमने तो मुझे मारने तक का विचार कर लिया । इसी प्रकार प्रवचनकर्ता - समिद्धार से इसी प्रकार कहते हुए आरोप लगाता है— " तुमने मेरा काम बिगाड़ दिया और मुझे मारना चाहा । इस प्रकार वे दोनों ( ऋत्विक् ) परस्पर गाली - गलौज करने लगे । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि पारस्परिक कलह - गाली - गलौज - का कारण असुर भाव ही है । जिस वाक् ( क्रुधा वाक् ) से दूर खड़े व्यक्ति भी काँप जाएँ वह वाक् राक्षसी वाक् कहलाती है । बुरी वाणी मुनष्य स्वयं नहीं बोलता, मनुष्य में प्रविष्ट असुरप्राण बोलता है । एवमेव जो शान्तिपूर्वक रहते हैं, जिनकी वाणी में मिठास है, समझ लीजिए उनमें देवता प्रविष्ट हो रहे हैं । समिद्धारादि ऋत्विक् तो प्राण - रूप हैं, उनमें गाली - गलौज का होना ही असुर- प्राणों का प्रविष्ट होना है । यहाँ केवल असुर - भाव के स्वरूप को समझाने के उद्देश्य से पूर्वोक्त प्रतिपत्ति को घटित कर बतला दिया है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-[ ६० ९ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण " ते ह पापं वदन्त उपसमेयुः - इति वै मां त्वमचिकीर्षोः इति । मा जिघांसीरिति " । पूर्वोक्त कथनानुसार असुराक्रमण - ऋत्विजों में होता है । आहवनीय अग्नि में असुरों की दाल नहीं गलती । क्यों कि श्राहवनीय अग्नि श्रति प्रज्वलित रहता है, अतएव तमोमय प्राण ( असुर ) इसमें नहीं घुस पाते हैं । जहाँ तक अग्नि तत्त्व है वहाँ तक तमोमय प्राण रहता ही नहीं अर्थात् जिस प्रकार ऋत्विजों में असुरों के घुसने के कारण परस्पर गाली - गलौज हो गयी थी, उस प्रकार की स्थिति श्रग्नि के साथ नहीं हुई । क्यों कि अग्नि में श्रसुर- प्राण प्रवेश नहीं कर पाये श्रतएव न अग्नि ने किसी को गाली दी ओर न अग्नि को किसी ने गाली दी-" अग्निर्हेव तथा नान्यमुवाद - श्रग्नि तथा नान्यः ” ॥६ ॥

जिन ऋत्विजों ( आहवनीयाग्नि से नीचे रहने वाली १६ श्रग्नि - कलाओं ) में असुर घुस गए थे, उन्होंने इस अवस्थान में आहवनीय अग्नि से पूछा - हे अग्नि! क्या आपके साथ भी असुरों ने इसी प्रकार का व्यवहार किया? आप में ( अग्नि में ) प्रासुर भाव प्रविष्ट हो सकते हैं या नहीं? तमोमय प्राण का असर होता है या नहीं?? यही भगवान् याज्ञवल्क्य का प्रश्न है । इसका वे स्वयं उत्तर देते हुए कहते हैं कि- श्रग्नि से पूछा गया कि तुम से असुरों ने क्या कहा? तो अग्नि ने उत्तर दिया कि न तो मैंने किसी से कुछ कहा और न किसी ने मुझ से कुछ कहा । श्रग्नि और तम दोनों विरोधी पदार्थ हैं - यही तात्पर्य है --" ते होचु: - पीत्थं ( अनेन प्रकारेण ) त्वामग्नेऽवादिषू: ( श्रसुराः ) । नैवाहमन्यं न मामन्य " - इति ॥७ ॥

इससे -ऋत्विजों ने पहचान लिया कि हम सब में अग्नि सर्वथा विरक्षस्तम ( सुरक्षित, प्रक्षुण्ण ) है । असुर कभी भी इसमें प्रविष्ट नहीं हो सकते हैं । पृथिवी से निकलने वाला जो अग्नि है वह श्रहव-नीय है । इसकी १७ विभक्तियाँ हैं । ये १७ विभक्तियाँ - स्वयं आहवनीय हैं । इनमें चूँकि - सोम प्राहुत होता रहता है— अतएव यह सबकी अपेक्षा अधिक प्रज्वलित रहता है । इन १७ अग्नियों में से श्राहव-नीय अग्नि के अतिरिक्त अन्य १६ अग्नियाँ भी यद्यपि विरक्ष ही हैं तथापि उनमें असुर प्राण का प्रवेश हो जाता है । परन्तु श्राहवनीय अग्नि में श्रासुरभाव कभी भी प्रविष्ट नहीं हो पाते हैं - यही इस सारे प्रकरण का तात्पर्य है । आहवनीय से नीचे की १६ हों अग्नियाँ भी १७ वें ग्रहणस्थ प्राजापत्य विरक्षस्तुम ( ग्राहवनीय ) अग्नि से बद्ध रहती हैं - अतएव - सुर - उन पर आक्रमण मात्र ही कर पाते हैं, किन्तु बिगाड़ कुछ भी नहीं सकते । यदि ग्राहवनीय से इनका सम्बन्ध न होता तो अवश्य श्रासुर प्रारण इनमें अपना आधिपत्य जमा लेते । किन्तु श्राहवनीय अग्नि के कारण इन्हें मौका नहीं मिल पाता है । १७ वें स्थान ( ग्रहण ) [ ६१० ]