Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 71–80

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 71–80

पृष्ठ 71

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अथ तृतीयकाण्डे प्रथमः प्रपाठकः प्रथमोऽध्यायः तत्र तृतीयं ब्राह्मणम् ॥ श्रथ श्राग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणम् ॥ [ मूल ] -| - श्रपः प्ररणीय । श्राग्नावैष्णवमेकादशकपालं पुरोडाशं निर्वपत्य-ग्निर्वेसर्वा देवताऽग्नौ हि सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुह्वत्यग्निर्वै यज्ञस्यावराय विष्णुः परार्ध्यस्तत्सर्वाश्चैवैतद्देवताः परिगृह्य सर्वं च यज्ञं परिगृह्य दीक्षा ति तस्मादाग्ना वैष्णव एकादशकपालः पुरोडाशो भवति ॥ १ ॥

तद्धैके । आदित्येभ्यश्वरु निर्वपन्ति तदस्ति पर्युदितमिवाष्टौ पुत्रासो -दि जातास्तन्वस्परि ॥ देवाँऽउपप्रैत्सप्तभिः परामार्ताण्ड-मास्यदिति ॥ २ ॥

अष्टौ ह वै पुत्रा दितेः । यास्त्वेतद्देवाऽयादित्या इत्याचक्षते सप्त हैव तेऽविकृतं हाष्टमं जनयाञ्चकार मार्ताण्डं संदेघो हैवास यावानेवोर्ध्वस्तावां-स्तिर्यङ. पुरुषसंमित S इत्यु हैक हुः ॥ ३ ॥

त उ है as ऊचुः देवाऽश्रादित्या यदस्मान्नवजनि मा तदमुयेव भूद्धन्तेमं विकरवामेति तं विचक्रुर्यथाऽयं पुरुषो विकृतस्तस्य यानि मांसानि संकृत्य सन्यासुस्ततो हस्ती समभवत्तस्मादाहुर्न हस्तिनं प्रतिगृह्णीयात्पुरुषाजानो हि हस्तीति यमुह तद्विचक्रुः स विवस्वानादित्यस्तस्येमाः प्रजाः ॥ ४ ॥

स होवाच । राध्नवान्मे स प्रजायां य एतमादित्येभ्यश्च रु निर्वपादिति राप्नोति है य एतमादित्येभ्यश्चरुं निर्वपत्ययं त्वेवाग्ना वैष्णवः प्रज्ञातः ॥ ५ ॥

[ ५३ ]

पृष्ठ 72

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणं श्राग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणं तस्य सप्तदश सामिधेन्यो भवन्ति । उपांशु देवते यजति पञ्च प्रयाजा भवन्ति त्रयोऽनुयाजाः संयाजयन्ति पत्नीः सर्वत्वायैव समिष्टयजुरेव न जुहोति नेदिदं दीक्षितवसनं परिधाय पुरा यज्ञस्य संस्थायाऽग्रन्तं गच्छानीत्यन्तो हि यज्ञस्य समिष्टयजुः ॥ ६ ॥

प्रथाग्रेण शालां तिष्ठन्नभ्यङ्क्ते प्ररुर्वै पुरुषोऽवच्छितोऽनरु रेवैतद्भवति यदभ्यङ्क्ते गवि वै पुरुषस्य त्वग्गोर्वाऽएतन्नवनीतं भवति स्वयैवैनमेतत्त्वचा समर्धयति तस्माद्वाऽभ्यङ्क्ते ॥ ७ ॥

तद्वै नवनीतं भवति । घृतं वै देवानां फाण्टं मनुष्याणामथैतन्नाहैव घृतं नो फाण्टं स्यादेव घृतं स्यात्फाण्टमयातयामतायं तदेनमयातयाम्नैवायातयामानं करोति ॥ ८ ॥

तमभ्यनक्ति । शीर्षतोऽग्रापादाभ्यामनुलोमं महीनां पयोऽसीति मा इति हवा एतासामेकं नाम यद्गवां तासां वाऽएतत्पयो भवति तस्मादाह महीनां पयोऽसीति वर्चोदा असि वर्चो मे देहीति नात्र तिरोहितमिवास्ति ॥ ९ ॥

थाक्ष्यावानषि । रुर्वे पुरुषस्याक्षि प्रशान्ममेति ह स्माह याज्ञवल्क्यो -दुरक्ष s इव हास पूयो हैवास्य दूषीका तेऽएवैतदनरुष्करोति यदक्ष्यावानति ॥१० ॥

यत्र वै देवाः । असुररक्षसानि जघ्नुस्तच्छुष्णो दानवः प्रत्यङ पतित्वा मनुष्याणामक्षीणि प्रविवेश स एष कनीनकः कुमारकइव परिभाषते तस्मा एवं-तद्यज्ञमुपप्रयन्सर्वतोऽश्म पुरां परिदधात्यश्मा ह्याञ्जनम् ॥ ११ ॥

त्रैककुदं भवति । यत्र वाऽइन्द्रो वृत्रमहंस्तस्य यदक्ष्यासीत्तं गिरिं त्रिककुद-मकरोत्तद्यत्रककुदं भवति चक्षुष्येवैतच्चक्षुर्दधाति तस्मात्त्रककुदं भवति यदि त्रैककुदं न विन्देदध्यत्रैककुदमेव स्यात्समानी ह्येवाञ्जनस्य बन्धुता ॥ १२ ॥

[ ५४ ]

पृष्ठ 73

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तृतीय काण्ड ( अ ० १ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणँ शरेषीकया अनक्ति । वज्ञो वै शरः । विरक्षस्तायै । सतूला भवति । श्रमूलं

वा इदमुभयतः परिच्छिन्नं रक्षोऽन्तरिक्षमनुचरति । यथाऽयं पुरुषोऽमूल उभयतः ।

परिच्छिन्नोऽन्तरिक्षमनुचरति । तद्यत्सतूला भवति - विरक्षस्तायै ॥ १३ ॥

स दक्षिणमेवाग्रानक्ति । सव्यं वाऽग्रे मानुषेऽथैवं - देवत्रा ॥ १४ ॥

सनक्ति । वृत्रस्यासि कनीनकइति वृत्रस्य ह्येष कनीनकश्चक्षुर्दाऽसि चक्षुर्मे देहीति नात्र तिरोहितमिवास्ति ॥ १५ ॥

स दक्षिणं सकृद्यजुषाऽऽनक्ति । सकृत्तूष्णीमथोत्तरं सकृद्यजुषाऽऽनक्ति द्विस्तूष्णीं तदुत्तरमेवैतदुत्तरावत् करोति ॥ १६ ॥

तद्यत्पञ्चकृत्व अनक्ति । संवत्सरसंमितो वै यज्ञः पञ्च वाऽऋतवः संव-सरस्य तं पञ्चभिराप्नोति तस्मात्पञ्चकृत्वानक्ति ॥ १७ ॥

श्रथैनं दर्भपवित्रेण पावयति । श्रमेध्यो वै पुरुषो यदनृतं वदति तेन पूति-रन्तरतो मेध्या वैदर्भा मेध्यो भूत्वा दीक्षाऽइति पवित्रं वै दर्भाः पवित्रपूतो दीक्षा इति तस्मादेनं दर्भपवित्रेण पावयति ॥ १८ ॥

तद्वा एकं स्यात् । एको ह्येवायं पवते तदेतस्यैव रूपेण तस्मादेकं स्यात् ॥ १ ९ ॥ प्रथोऽपि त्रीणि स्युः । एको वायं पवते सोऽयं पुरुषेन्तः प्रविष्टस्त्रेधा विहितः प्राणऽउदानो व्यानऽइति तदेतस्यैवानु मात्रां तस्मात् त्रीणि स्युः ॥ २० ॥

थप सप्त स्युः । सप्त वाऽइमे शीर्षन्प्राणास्तस्मात् सप्त स्युस्त्रिः सप्तान्येव स्युरेकविंशतिरेषैव संपत् ॥ २१ ॥

[ ५५ ]

पृष्ठ 74

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणं तं सप्तभिः सप्तभिः पावयति । चित्पतिर्मा पुनात्विति प्रजापतिर्वै चित्पतिः प्रजापतिर्मा पुनात्वित्येवैतदाह वाक्पतिर्मा पुनात्विति प्रजापतिर्वै वाक्पतिः प्रजा-पतिर्मापुनात्वित्येवैतदाह - देवो मा सविता पुनात्विति तद्वै सुपूतं यं देवः सविता पुनात्तस्मादाह देवो मा सविता पुनात्वित्यच्छिद्रेण पवित्रेणेति योवाऽश्रयं पवत-एषोऽच्छिद्रं पवित्रमेतेनैतदाह सूर्यस्य रश्मिभिरित्येते वै पवितारो यत्सूर्यस्य रश्मयस्तस्मादाह सूर्यस्य रश्मिभिरिति ॥ २२ ॥

तस्य ते पवित्रपतऽइति । पवित्रपतिहि भवति पवित्रपूतस्येति पवित्रपूतो हि भवतियत्कामः पुत्रे तच्छकेयमिति यज्ञस्योहचं गच्छानीत्येवैतदाह ॥ २३ ॥

अथाशिषामारम्भं वाचयति । आ वो देवास ईमहे वामं प्रयत्यध्वरे । आ वो देवास प्रशिषो यज्ञियासो हवामहऽइति तदस्मै स्वाः सतीऋत्विज-श्राशिषाशासते ॥ २४ ॥

थाङ्ग लिति । स्वाहा यज्ञं मनसऽइति द्वे स्वाहोरोरन्तरिक्षादिति द्वे स्वाहा द्यावापृथिवीभ्यामिति द्वे स्वाहा वातादारभइति मुष्टीकरोति न वै यज्ञः प्रत्यक्षमिवारभे यथाऽयं दण्डो वा वासो वा परोक्षं वै देवाः परोक्षं यज्ञः ॥ २५ । स यदाह । स्वाहा यज्ञं मनसइति तन्मनस प्रारभते स्वाहोरोरन्तरिक्षादिति तदन्तरिक्षादारभते स्वाहा द्यावापृथिवीभ्यामिति तदाभ्यां द्यावापृथिवीभ्या-मारभते ययोरिदं सर्वमधि स्वाहा वातादारभइति वातो वै यज्ञस्तद्यज्ञं प्रत्यक्षमारभते ॥ २६ ॥

अथ यत् स्वाहा स्वाहेति करोति । यज्ञो वै स्वाहाकारी यज्ञमेवैतदात्म-धत्तेत्रो एव वाचं यच्छति वाग्वं यज्ञो यज्ञमेवैतदात्मन् धत्ते ॥ २७ ॥

[ ५६ ]

पृष्ठ 75

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तृतीय काण्ड ( अ ० १ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणं अथैनं शालां प्रपादयति । स जघनेनाहवनीयमेत्यग्रेरण गार्हपत्यं सोऽस्य संचरो भवत्यासुत्यायै तद्यदस्यैष संचरो भवत्यासुत्यायै तद्यदस्येष संचरो भवत्या सुत्यायाग्निर्वे योनिर्यज्ञस्य गर्भो दीक्षितोऽन्तरेण वै योनि गर्भः संच यत्स तत्रैजति त्वत्परि त्वदावर्तते तस्मादिमे गर्भाएजन्ति त्वतपरित्वदावर्तन्ते तस्मादस्यैष संचरोभवत्यासुत्यायै ॥ २८ ॥

[ अनुवाद ] – जल ले कर अग्नि तथा विष्णु को एकादश कपालपुरोडाश भेंट करता है । अग्नि ही देव - समष्टि है क्यों कि सारे देवताओं तक पहुँचाने के लिए अग्नि में ही हुति डालता है । अग्नि तो यज्ञ ( पुरुष ) का निम्न स्थानीय आधा भाग है तथा विष्णु शिखरस्थ आधा भाग । ( वह यजमान निश्चय करता है ) कि सारे देवों को वश में कर के तथा पूरे यज्ञ को अपना कर दीक्षित बनू इसी कारण आग्नावैष्णव पुरोडाश ( चावल की बटिया ) ग्यारह कपालों वाला ( मिट्टी के तवों पर पकाया गया ) होता है ॥ १ ॥

( विकल्प रूप में ) कुछ लोग आदित्य के लिए चरु की आहुति देते हैं । यह नियमापवाद जैसा है । प्रदिति के जो आठ पुत्र कहे जाते हैं ( वे ) उसकी अपनी देह से उत्पन्न हैं । सात ( पुत्रों ) को लेकर तो वह देवताओं में मिल गई ( किन्तु आठवें ) मार्ताण्ड

को ( उसने ) दूरातिदूर फेंक दिया । ( अष्टौ पुत्रासो अदितिये जातास्तन्वस्परि ।

देवाँ उपप्रत् सप्तभिः परा मार्ताण्डमास्यत् । ( ऋ. १०।७२।८ ) ॥ २ ॥

अदिति के आठ पुत्र थे 1 । वे तो सात ही हैं जिन्हें आदित्य देवता कहा जाता है । ( अदिति ने आठवें ( पुत्र ) मार्ताण्ड को ( हाथ - पैर आदि अङ्ग - विकार - रहित ) पिण्ड मात्र सा उत्पन्न किया । उसका आकार - प्रकार संशय में डालने वाला था क्यों कि वह जितना लम्बा था उतना ही चौड़ा था अतः कुछ लोग उसे पुरुष - प्रमाण वाला बतलाते हैं ( लोक में माना जाता है कि पुरुष की लम्बाई - चौड़ाई बराबर है अर्थात् यदि वह हाथ फैला कर खड़ा हो जाए तो जितनी चौड़ाई उसके दोनों हाथ घेरेंगे उतनी ही उसकी लम्बाई मानी जाएगी । मार्ताण्ड के गोल पिण्ड होने के कारण अर्थात् लम्बाई - चौड़ाई बराबर होने के कारण उसे पुरुष - संमित कहा गया है ) ॥ ३ ॥

वे आदित्य - संज्ञक देव कहने लगे कि जो हम सबके बाद उत्पन्न हुआ है वह ( कहीं ) ऐसा न रह जाय? अहो! इसे प्रङ्गयुक्त करें । इस प्रकार ( उन्होंने ) उसे विकार [ ५७ ]

पृष्ठ 76

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तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणं अर्थात् श्रङ्गों से युक्त कर दिया जैसा कि यह पुरुष विकृत अर्थात् विविध अङ्गकृत होता है । ( ङ्ग निर्माण के समय ) उसका जो मांस काट कर अलग किया उससे हाथी बन गया । इसीलिए कहा जाता है कि दान - दक्षिणा के रूप में ' हाथी ' नहीं लेना चाहिए क्यों कि हाथी पुरुष प्रकृतिक होता है । उन आदित्य देवों ने जिसे विकृत बनाया था

वही अदिति पुत्र विवस्वान् ' कहलाता है । उसी की यह जीव सृष्टि है ॥ ४ ॥

वह ( मार्ताण्ड ) कहने लगा " मेरी इस प्रारिण सृष्टि में वही ऐश्वर्यवान होगा जो इस चरु नामक हवि को आदित्यों को समर्पित करेगा । यही कारण है कि जो इस चरु की आहुति आदित्यों के लिए देता है वह निश्चितरूपेण ऐश्वर्यवान् होता है । यह हवि ही आग्नवैष्णव हवि के नाम से जानी जाती है ॥ ५ ॥

इसकी सत्रह सामिधेनी ऋचाएँ होती हैं । इन दोनों ( अग्नि तथा विष्णु ) देवताओं को उपांशु आहुतियाँ ( उच्चरित होते हुए भी अन्य को सुनाई न पड़े, इस प्रकार के मन्त्रोच्चारण द्वारा दी गई आहुतियाँ ) प्रदान की जाती हैं । पाँच प्रयाज ( मन्त्र समष्टि विशेष ) होते हैं तथा तीन अनुयाज । पूर्णत्व के लिए पत्नी संयाज ( नामक यागक्रिया ) करवाते हैं । किन्तु वह ( यजमान ) समष्टि यजुः आहुतियाँ नहीं प्रदान करता है ( यह सोच कर कि कहीं मैं ) इन दीक्षित वस्तुओं को धारण कर यज्ञ पूरा होने से पहिले ही यज्ञ - संस्था के अन्त में न पहुँच जाऊँ? क्यों कि समष्टि यजुः मन्त्र यज्ञ के अन्त में बोले जाने के कारण यज्ञान्त है ॥ ६ ॥

अब शाला के अगले भाग में खड़ा हो कर ( वह ) अभ्यञ्जन ग्रर्थात् नवनीत मक्खन से मालिश करता है । क्यों कि त्वचा के खिंच जाने के कारण पुरुष क्षत - युक्त हो गया है तथा इस किए जा रहे अभ्यञ्जन द्वारा वह क्षतरहित हो जाता है । गो पर पुरुष की त्वचा चढ़ी हुई है तथा ( गो - विकार होने के कारण ) गो ही नवनीत है । अपने ( अंश ) द्वारा ही यह गाय उस यजमान की क्षतिपूर्ति करे इसीलिए अभ्यञ्जन किया जाता है ॥ ७ ॥

नवनीत का स्वरूप कुछ भिन्न प्रकार का होता है । घृत तो देवता स्वरूप है तथा फाण्ट अर्थात् दही बिलोते समय आने वाले भाग मनुष्य स्वरूप । और यह यजमान न घृत है न फाण्ट ( क्यों कि वह देवता तथा मनुष्य दोनों का मध्यवर्ती है ) तथैव यह नवनीत न घृत है न फाण्ट । उसके पूर्व रूप को अलग करने के लिये उसमें देवत्व तथा मनुष्यत्व ( घृतत्व तथा फाण्टत्व ) दोनों होने चाहिये । अतः उस अपूर्णता को दूर करने के लिए ( यह नवनीत यजमान को ) पूर्णत्व प्रदान करता है ॥ ८ ॥

[ ५८ ]

पृष्ठ 77

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्रग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणं तदनन्तर " महीनां पयोऽसि - ( यजु ० ४ | ३ ) " इस यजुः को बोलता हुआ वह सिर से पैर तक अनुलोम अभ्यञ्जन करता है ( ऊपर मुख की ओर से नीचे की ओर मालिश करना अनुलोम अभ्यञ्जन कहलाता है | ) ( नवनीत का ) अनेक में से एक नाम ' मा ' भी है क्योंकि यह गव्य है । यह ( नवनीत ) उन ( गायों ) का पय अर्थात् सार होता है इसीलिए वह कहता है कि " महीनां पयोऽसीति " । " वर्चोदा श्रसि वर्चो मे देहि " - -( वाज ० सं. ४ | ३ ) अर्थात् ( हे नवनीत! ) तू वर्चस्व देने वाला है अतः मुझे वर्चस्व प्रदान कर । अर्थ स्पष्ट ही है ॥ 8 ॥

अब वह आँख में प्रञ्जन लगाता है । पुरुष की आँख जब घावयुक्त होती है त याज्ञवल्क्य का कथन है कि " मेरी आँखों को शान्ति मिल जाए " ( इस उद्देश्य से ) अञ्जनो लगाना चाहिए । पहिले ( उस यजमान की आँख ) मालिन्ययुक्त थीं अब उस प्रक्षि - अञ्जन द्वारा वह उस मालिन्य को दूर कर घाव रहित करता है ॥ १० ॥

जब देवों ने असुर रक्षसों का हनन किया तो दानव शुष्ण पीछे उछल कर मनुष्यों की आँख में प्रविष्ट हो गया । यह वह कनीनक है जो आँख की पुतली के रूप में चमकता है । उस अञ्जन द्वारा वह यजमान इस यज्ञ की परिधि में जाता हुआ प्रस्तर-प्राचीर में सब ओर से ( अपने को ) छिपा लेता है । यह अञ्जन ही यजमान के लिए प्रस्तर - प्राचीर है ॥ ११ ॥

यह अञ्जन ( सुरमा ) त्रिककुद् पर्वत का है । जब इन्द्र ने वृत्र को मारा था तब उस ( वृत्र ) की जो आँख है उसे ( इन्द्र ने ) त्रिककुद् पर्वत बना दिया । और यह अञ्जन पर्वतका है ( तो जब सुरमा प्राँख में डाला जाता है तो मानो ) आँख में आँख को ही रख दिया जाता है । इस प्रकार सुरमा त्रिककुद् पर्वत का ही होता है ( किन्तु ) यदि त्रिककुद् पर्वतका सुरमान मिले तो त्रिककुद् के अतिरिक्त इतरस्थानीय सुरमा भी चलेगा । क्यों कि सुरमे के भीतर का मेल - मिलाप तो एकसा ही होता है ॥ १२ ॥

अञ्जन नरकुल या सरपत की सींक से लगाता है । क्यों कि नरकुल वज्र है । उसमें से राक्षसत्व - भाव निकल जाय इसीलिए वह सलाई रूई से युक्त होती है । यह राक्षस मूल रहित हो कर दोनों ओर से बँधा अन्तरिक्ष में विचरता है जैसे कि यह ' पुरुष ' मूल रहित हो कर अन्तरिक्ष में विचरता है तो इसीलिए यह शरेषीका ( सलाई ) रूई से युक्त होती है ताकि राक्षस - भाव इससे विगत हो जाय ॥ १३ ॥

वह पहिले दाहिनी आँख में अञ्जन लगाता है । मनुष्य विधि के अनुसार पहिले बाईं आँख में लगाया जाता है । किन्तु दाहिनी प्राँख में सुरमा लगाने की प्रथा देवों की है ॥ १४ ॥

[ ५६ ]

पृष्ठ 78

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण " वृत्रस्यासि कनीनकः - ( यजु ० ४ | ३ ) ” इस मन्त्र को बोलता हुआ वह अञ्जन लगाता है । सचमुच यह आँख की पुतली वृत्र सम्बन्धी ही है । ( अब मन्त्र का शेषार्ध

बोलता है ) " चक्षुर्दा असि चक्षु देहि " । इसका भावार्थ अस्पष्ट है ही नहीं ॥ १५ ॥

वह दाईं आँख में प्रञ्जन एक बार यजुष् मन्त्र पढ़ कर लगाता है तथा एक बार मौन रह कर । इसके बाद बाईं आँख में एक बार यजुष् मन्त्र बोल कर अञ्जन लगाता है तथा दो बार मौन रह कर । इस प्रकार वह बाईं आँख को अधिक गौरव शाली बना देता है ॥ १६ ॥

वह पाँच बार अञ्जन इसलिए लगाता है कि यज्ञ संवत्सर प्रमारण वाला है । संवत्सर की ऋतुएँ पाँच होती हैं । पाँच काल - संख्याओं द्वारा वह यज्ञ को प्राप्त कर लेता है इसीलिए वह पाँच बार प्रञ्जन लगाता है ॥ १७ ॥

अब वह ( ऋत्विज ) उसे दर्भ से बनी पवित्रा ( तृणगुच्छ ) से पवित्र करता है । पुरुष यज्ञिय है क्योंकि असत्य वादन करता है । उस दर्भ- पवित्र से उसे भीतर से पवित्र बनाता है । क्यों कि दर्भ यज्ञिय हैं । ( यजमान विचारता है कि ) यज्ञिय बन कर दीक्षा लूँ । दर्भ शुद्धि लाने वाले हैं । पवित्र ( दर्भगुच्छ ) से शुद्ध हो कर दीक्षा लूँ । अतएव इस यजमान को ' पवित्र ' से शुद्ध करता है ॥ १८ ॥

और वह ' पवित्र ' एक ही होना चाहिए क्यों कि यह ' पवन ' भी अकेला है । वह ' पवन ' इस ' पवित्र ' जैसा ही है ( क्यों कि दोनों शोधन कार्य ही करते हैं ) अतः ' पवित्र ' संख्या में एक ही होना चाहिए ॥ १६ ॥

अन्यथा पवित्र तीन होने चाहिएँ । जो यह पवन बहता है वह तो एक ही है किन्तु यह पुरुष के अन्दर प्रविष्ट हो कर तीन प्रकार का हो जाता है जैसे प्राण, उदान तथा व्यान । वह ' पवित्र ' इस पवन परिमाण वाला ही है अतः पवित्राएँ तीन होनी चाहिए ॥ २० ॥

अन्यथा सात ( पवित्राएँ ) भी हो सकती हैं । ये शीर्ष प्रारण सात ही हैं अतः पवित्राए सात ही होनी चाहिएँ । और सात की तिगुनी भी हो सकती हैं अर्थात् इक्कीस । यही गौरवपूर्ण आकलन है ॥ २१ ॥

उस यजमान को सात पवित्राओं से ( यह मन्त्र पढ़ कर ) सात बार पवित्र करता है " चित्पति पुनातु... " - " चैतन्य अर्थात् बोधशक्ति का स्वामी प्रजापति है वह मुझे [ ६० ]

पृष्ठ 79

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण .. " पवित्र करे " – यही वह यहाँ कहता है । " वाक्पतिर्मा पुनातु " - " वारणी का स्वामी भी प्रजापति है वह प्रजापति मुझे पवित्र करे " यही वह यहाँ कहता है । " देवो मा -सविता पुनात्वच्छिद्र ेण पवित्रेण.... " - अपनी दोषरहित पवित्रा से सविता देव मुझे पवित्र करें— । यह जो ( वायु ) प्रवाहित होता है यही दोषरहित ' पवित्र ' है इसीलिए इस प्रकार कहता है " सूर्यस्य रश्मिभि: ( यजु ० ४।४ ) " ये जो सूर्य की रश्मियाँ हैं ये पवित्र करने वाली हैं इसीलिए ( यजमान ) बोलता है " सूर्यस्य रश्मिभिः " ( प्रस्तुत ब्राह्मण के सभी मंत्रांश एक समग्र मन्त्र हैं द्रष्टव्य यजु ० ४।४ ) ॥ २२ ॥

( वह मन्त्र उच्चारित करता है ) " तस्य ते पवित्रपते " अर्थात् हे पवित्रा अथवा पवन के स्वामी! ये सब तुम्हारा है । " पवित्र पूतस्य " ( मन्त्र बोल कर ) वह यजमान मानो ' पवित्रपति ' ही बन जाता है क्यों कि वह पवित्रा से शुद्ध हो जाता है । “ यत् कामः पुने तच्छकेयम्- ( यजु ० ४०४ ) " अर्थात् जिस लक्ष्य के लिए मैं पवित्र हुआ हूँ उसे पूरा कर सकं । यज्ञ की समाप्ति द्योतक ऋचा को पढ़ कर यज्ञ - समाप्ति तक पहुँच जाऊँ । यही वह यहाँ कहता है ॥ २३ ॥

तदनन्तर वह मङ्गलकामना का प्रारम्भिक रूप बोलता है " आ वो देवासऽईमहे वामं प्रयत्यध्वरे । श्रा वो देवास अाशिषो यज्ञियासो हवामहे " - हे देवो हम आपका आना यज्ञं में समृद्धि और फल प्राप्ति के लिए चाहते हैं । हे यज्ञयोग्य देवो! मङ्गलकामना के लिए हम आपको बुलाते हैं । इस प्रकार ऋत्विक् जन ( उन आशिषों को ) अपनाते हुए इस ( यजमान ) को आशीर्वाद प्रदान करते हैं ॥ २४ ॥

अब वह ( मुष्टिबन्धन क्रिया हेतु ) दोनों हाथों की ( कनिष्टिका ) अंगुलियों को ( यह मन्त्र बोलता हुआ ) मोड़ता है " स्वाहा यज्ञं मनसः " अर्थात् यज्ञ मन से ( पकड़ा जाता है ) दोनों ( अनामिकाओं ) को ( यह मन्त्र बोलते हुए ) मोड़ता है – “ स्वाहो रोरन्तरिक्षात् ” ( यजुः ४ । ६ ) अर्थात् ( यज्ञ ) विस्तीर्ण अन्तरिक्ष से ( पकड़ में आता है ) । तदनन्तर दोनों ( माध्यमिका ) अंगुलियों को ( यह मन्त्र पढ़ता हुआ ) मोड़ता है " स्वाहा द्यावापृथिवीभ्याम् " ( यजु ० ४।६ ) अर्थात् ( यज्ञ ) द्यलोक तथा पृथिवीलोक से ( पकड़ में आता है ) । दो तर्जनियों को ( इस मन्त्र से ) मोड़ता है " स्वाहा वातादारभे " ( यजु ० ४।५ ) अर्थात् ( यज्ञ ) वायु से पकड़ा जाता है । ( यज्ञ को मुट्ठी में करने के लिए ) मुठ्ठी बाँधता है क्योंकि यज्ञ प्रत्यक्ष तो पकड़ा नहीं जा सकता । जैसे कोई लाठी या वस्त्र पकड़ा जाता है । देवता परोक्ष है ( तथा ) यज्ञ भी परोक्ष है ( इस प्रकार यज्ञ के परोक्षरूपत्व को इस क्रिया द्वारा मुठ्ठी में बंद कर लेता है ) ॥ २५ ॥

[ ६१ ]

पृष्ठ 80

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बृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्ना वैष्णवेष्टि ब्राह्मण वह जब यह मन्त्र बोलता है " स्वाहा यज्ञं मनसः " तब वह ( यजमान ) उसे मन से पकड़ता है । “ स्वाहोरोरन्तरिक्षात् " ( बोलने पर ) वह यज्ञ को अन्तरिक्ष से पकड़ता है । “ स्वाहाद्यावा - पृथिवीभ्याम् " ( मन्त्रोच्चारण करने पर ) वह यजमान इन दोनों द्यावा -पृथिवियों से यज्ञ को पकड़ लेता है जिन दोनों पर यह सारा जगत् प्राश्रित है । " स्वाहा वातादारभे ” ( मन्त्र ) बोलने का यह अभिप्राय है कि वायु ही यज्ञ है । इस ( विधि ) से वह यज्ञ को प्रत्यक्ष सा ही पकड़ लेता है ( क्योंकि मुट्ठी के भीतर छिपी वस्तु वायु ही है ) ॥ २६ ॥

और यह जो पुनः पुनः स्वाहाकार करता है ( उसका कारण है कि ) यज्ञ ही स्वाहा-कार है । इस प्रकार ( स्वाहाकार के द्वारा ) यह यज्ञ को ही अपने भीतर रख लेता है अब वह वाक् विसर्जन ( मौन धारण ) करता है । वाक् ही यज्ञ है । इस विधि से वह यज्ञ को ही अपने अन्दर धारण कर लेता है ॥ २७ ॥

तदनन्तर ( ऋत्विज ) उसे ( यजमान को ) शाला में लिवा ले जाता है । श्राहवनीय वेदी को पीठ पीछे तथा गार्हपत्य को सामने रखता हुआ ( दोनों के बीच से ) तब तक संचरण करता है जब तक कि सोम न निचोड़ लिया जाए । सोम निचोड़े जाने तक वह इस विधि से सञ्चरण इसलिए करता है कि अग्नि यज्ञ की योनि है तथा यह दीक्षित, यज्ञ का गर्भ है । गर्भ वस्तुतः योनि में सञ्धरण करता है । जैसे वह ( दीक्षित यजमान ) वहाँ ( आहवनीय तथा गार्हपत्य अग्नियों के बीच ) गति करता है ( अर्थात् ) एक बार दूर तक जाता है, दूसरी बार पलट कर आता है इसी प्रकार यह गर्भ भी स्फुरण करते हैं, एक बार दूसरी ओर जाते हैं दूसरी बार पलटा खाते हैं । इसीलिए इस यजमान का यह सञ्चररण सोम निचोड़े जाने तक होता है ॥ २८ ॥

[ विज्ञानभाष्य ] प्रति प्राचीनकाल में जब कि भारतवर्ष में वैदिक विज्ञान का सूर्य्य अपनी सहस्रों कलानों से तप रहा था - एक वैदिक विज्ञान के महामहर्षि ने जो कि उस जमाने में सब से श्रेष्ठ थे, अपनी विद्या के प्रभाव से सब को प्रभावित कर रक्खा था । इनकी स्त्री का नाम ' इतरा ' था । यह भी उन्हीं के समानविदुषी एवं ब्रह्मवादिनी थी । दैवयोग से एक १० वर्ष के महीदास नाम के अबोध बालक को अनाथ बना एवं उस बेचारी इतरा को निराश्रय छोड़ थोड़ी ही उम्र में वे महर्षि परलोक सिधार गए । इतरा चूँकि विदुषी थी, समझदार थी अतः उसने हिम्मत करके उस वज्रपात को सहा । केवल उसे चिन्ता इसी बात की रही कि मेरा यह पुत्र भी किसी प्रकार से अपने पिता के समान विद्वान् बन जाय । बस इसके लिए सिवाय दैवाराधन के और कोई उपाय न देख कर उसने वेद - विद्या प्राप्त्यर्थ यज्ञवेदि - स्वरूप भगवती पृथिवी की आराधना प्रारम्भ की । करते - करते एक दिन सहसा भगवती पृथिवी स्त्री रूप बना कर इतरा के सामने खड़ी हो गई और बोली कि ' वरं ब्रूहि वरं ब्रूहि ' - इतरा को ' मेरा पुत्र वेद का [ ६२ ]