Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 621–630

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 621–630

पृष्ठ 621

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण को ही स्वर्ग कहा जाता है । चयनयज्ञ के अतिरिक्त जो सोमयाग आदि हैं उनसे यही स्वर्ग मिलता है । " ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत् " । १७ वें अहर्गण में जो स्वर्ग है, वह सप्तदशस्वर्ग है । इससे नीचे रहने वाला अग्नि भी इस स्वर्ग से ही सम्बद्ध रहता है । श्राहवनीय अग्नि स्वग्नि है । चूँकि ऋत्विजाग्नि ( सोलहों अग्नियाँ ) इस ग्राहवनीय से बद्ध रहती हैं- प्रतएव इन का भी उस स्वर्ग से — अमृतलोक से — सम्बन्ध हो जाता है । श्राहवनीयवत् इनकी भी सत्ता पृथिवी से उच्छिन्न नहीं हो पाती है - यही " स्वर्गं समश्नुवते " का तात्पर्य है । इसी प्राकृतिक विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं— " ते ( ऋत्विजः प्राणाग्नयः ) प्रविदुः अयं वै ( श्राहवनीयाग्निः ) नो ( आत्माकं मध्ये ) विरक्षस्तमः । अस्यैव रूपमसाम " । हम लोग ( ऋत्विज ) इसी के ( आहवनीय अग्नि के ) रूप को प्राप्त हो जाएँ अर्थात् अग्नि ही बन जाएँ । जिससे कि हम भी विरक्षस्तम हो जाएँ । " तेन रक्षांस्यतिमोक्ष्यामहे - तेन स्वर्गं लोकं समश्नुविष्यामहे " । इस अग्नि द्वारा हम लोग असुरों को नष्ट कर स्वर्ग में चले जाएँगे । यह सोच कर वे ( ऋत्विज ) श्रग्निरूप हो गये । हो क्या गये, वे अग्नि रूप थे ही । केवल इस विज्ञान को बतलाने के लिए " हो गये " यह कह दिया जाता है । चूँकि वे श्रग्नि रूप हो गए - श्रतएव उन श्राग्नेय ऋत्विजों ने स्वर्ग को प्राप्त कर लिया । " तेऽग्नेरेव रूपमभवन्, तेन रक्षांस्यत्यमुच्यन्त । तेन स्वर्गं लोकं समा-नुवत " । जिस प्रकार प्राकृतिक देवताओं - ऋत्विग् जनों ने अग्निरूप बन कर विरक्षस्तम हो कर स्वर्गलोक मैं अपना आधिपत्य जमा लिया, ठीक उसी प्रकार अवान्तर दीक्षा लेता हुआ यह यजमान अग्नि को आत्मसात् कर अग्निमय बन जाता है । ऐसा करने से वह यजमान आसुरभाव से सर्वथा मुक्त हो जाता है एवं इसी ( आहवनीयाग्नि - दिव्याग्नि ) से स्वर्ग का भोग करता है— “ तथोऽएवैष एतदग्नेरेव रूपं भवति, तेन रक्षांस्यतिमुच्यते, तेन - स्वर्गं लोकं समश्नुते " । अवान्तर दीक्षा से आत्मा में आने वाला असुरभाव नष्ट हो जाता है । यही प्रवान्तर दीक्षा का रहस्य है । यद्यपि मेखलाकरण, अजिनधारण, अंगुलीन्यञ्चनादि सारे काम श्रवान्तर दीक्षा में ही शामिल हैं, सब कम्मों की समष्टि का नाम ही अवान्तर दीक्षा है - तथापि इन सब कम्भों में समिधाधान करके अग्नि को आत्मसात् करना ही मुख्य काम है- अतएव - यजमान अग्नि में समिधाधान करता हुआ ही अवान्तर दीक्षा को प्राप्त होता है, यह कहा जा चुका है । प्रधान्यात् केवल समिधाधान से ही अवान्तर [ ६११ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण दीक्षा की समाप्ति मान ली जाती है । समिधाधानेन - आग्नेय प्राण को आत्मसात् कर - अध्यात्म और आहवनीय में आने वाले - प्रासुरभाव को रोका जाता है -" स वै समिधमेवाभ्यादधदवान्तरदीक्षामुपैति ॥८ ॥

अवान्तर दीक्षा क्यों होती है, इसका कारण बतला दिया गया है । श्रब पद्धति बतलाते हैं । पद्धति बतलाने के पूर्व यह कह देना आवश्यक है कि अन्य अग्नियों में तो असुरप्राण घुस जाते हैं- परन्तु शिरस्थानीय श्वास - स्वरूप प्राणाग्नि में असुर नहीं घुस सकते हैं । यह अधिदेवत चरित्र - अध्यात्म में भी लागू समझना चाहिए । श्राँख - नाक - कान - मुँह ये सभी देवता हैं और देवता श्रग्निमय हैं अतएव -' प्रग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः " ( ऐ ० उ ० २1४ ) इत्यादि कहा जाता है । वाक् प्राण - चक्षुः श्रोत्र - मन ये पाँचों देवता हैं । प्राँचों में जो प्राण तत्त्व है वह आहवनीय अग्नि ही है । इस प्रारण ( आहवनीयाग्नि ) में ही असुर घुस नहीं पाते हैं । गाली देना आसुरभाव है । मीठा बोलना देवभाव है । इस प्रकार वाक् में असुर और देव दोनों भाव है । बुरा अच्छा सुनना भी क्रमशः आसुर और देव भाव हैं । डरावनी आँखों और प्यार भरी आँखों से देखना इत्यादि भी प्रासुर और देवभावयुक्त हैं । इस प्रकार समस्त देवताओं में ( प्राणाग्नि को छोड़ कर ) असुर हैं । अध्वर्यु समिधा को श्राहवनीय अग्नि में डालता हुआ यह मन्त्र बोलता है—

" अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपाः या तव तनूरियं सा मयि यो मम तनूरेषा सा त्वयि ।

सह नौ व्रतपते व्रतानि अनु मे दीक्षां दीक्षापतिर्मन्यताम् अनुतपस्तपस्पतिः ” ॥

( वा ० सं. ५६ ) अग्नि! आप व्रतपा हैं । देवताओं के व्रतपति हैं । देवता जो भी व्रत करते हैं उसे श्राप ही पालते हैं । देवताओं का प्राण आहवनीय ही है, क्यों कि आग्नेय प्राण का नाम ही तो देवता है । अतएव अग्नि को देवताओं का व्रतपति कह सकते हैं । व्रता अग्ने! आपके व्रतपति रहने पर मैं व्रत का पालयिता बन जाऊँ - ऐसी कृपा कीजिए अर्थात् मैं इस दीक्षा - व्रत का पालन करने में समर्थ बन सकूँ यही तात्पर्य है । आज मैं आपको ( अग्नि को ) आत्मसात् कर आपकी साक्षी में ( त्वयि सति ) व्रतपा बन गया हूँ । अग्नि देवताओं के व्रतपत्ति हैं- प्रतएव कहा गया है— " अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपा " - इति । हे अग्ने! आपके तेजोमय शरीर की तरह ही मेरा शरीर बन जाए अर्थात् मैं आपकी तरह ही तेजस्वी बन जाऊँ । मेरा शरीर आपका बन जाए । हे व्रतपते! प्रापके और हमारे व्रत साथ रहें । प्राप करें वही मैं करू ँ और मैं करूँ वही आप करें । वास्तव में बात सच है - जिस अग्नि को हमने आत्मसात् किया है वह हमसे पृथक् नहीं हैं । उसका और हमारा तो सर्वथा अभेद है । " सह नौः " इत्यादि का तात्पर्य्यं बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं- " श्रापका जो शरीर है - वह मेरा है " - यह कहता हुआ यजमान श्रग्नि से अपनी त्वचा को परिवेष्टित करता है, अग्नि को प्रात्मसात् करता है । है अग्नि! मेरी [ ६१२ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मणे अवान्तरदीक्षा ब्राह्मणं दीक्षा के साथ आप भी दीक्षा लें और मेरे तप के साथ तप करें । आपका और मेरा अद्वैत हो जाए-अतएव कहा जाता है— " या तव तनूरियं- - सा मयि । यो मम तनूरेषा सा त्वयि । सह नौं व्रत-पते? व्रतानि - इति । तद् अग्निना त्वचं विपत्यङ्गयते । अनु मे दीक्षां दीक्षा-पतिर्मन्यताम् । अनुतपस्तपस्पतिः " । इस मन्त्रोच्चार के साथ समिधा को अग्नि में डालता हुआ यजमान अवान्तर दीक्षा लेता है । तदनन्तर अंगुलीन्यञ्चन करता है और पहले से ही चारों ओर लिपटी मेखलानों को कस कर बाँधता है --" तदवान्तरां दीक्षामुपैति । सन्तरामगुलीरचते, सन्तरां मेखलां पर्यस्ता-मेवनामेतत्सत पर्यस्यते ॥९ ॥

अवान्तर दीक्षा होने के बाद उसके प्रागे का कर्म्म बतलाते हुए कहते हैं कि - प्रवान्तर दीक्षा के अनन्तर ऋत्विक् गरमपानी से ( मदन्तीभिः ) सोम का उपचार करते हैं प्रर्थात् गरमपानी से सोमवल्ली को साफ करते हैं-" अथैनं ( सोमम् ) अतो- ( अस्मात् कालात् ) मदन्तीभिरुपचरन्ति " । गरम पानी से ही सोम का उपचार करने की क्या आवश्यकता? ठण्डे पानी से ही क्यों न सोम का उपचार कर लिया जाए - इसका उत्तर देते हुए कहते हैं--यह अग्नि तप - स्वरूप है, ताप - धर्मा है - एवमेव मदन्ती है । तथैव गरम पानी है, वह भी तप-स्वरूप ही है । अतएव सोम को गरम पानी से साफ करते हैं अर्थात् गरम पानी से स्पर्श कर सोम क । उपचार करते हैं । तात्पर्य कहने का यही है कि अवान्तर दीक्षा करने के बाद यजमान अग्निमय बन गया - प्रतएव वह तपोमूर्ति हो गया । इस स्थिति में यजमान को चाहिए कि जो कुछ भी करे तप - स्वरूप बन कर ही करे । सोम का उपचार करे तो तप ही से करे । ऐसा करने से इसके ( सोम के ) तर की वृद्धि हो जाती है । गरम पानी तप - स्वरूप है - प्रतएव इसके द्वारा सोम का उपचार करने से सोम का तपोबल बढ़ता है - अतएव सोमराजा का मदन्ती ( गरम पानी ) से उपचार किया जाता है । गरम पानी से उपचार करने की यह पहली उपपत्ति है-" तपो वा अग्निः, तपो मदन्त्यः । तस्मादेनं मदन्तीभिरुपचरन्ति " ॥१० ॥

मदन्ती से सोम राजा को स्पर्श करने के अनन्तर उसे करते हैं । गरम पानी के सिकताव से जैसे शान्ति और पुष्टि अध्यर्यु सोम राजा को आप्यायित करता है । " राजा वाजो ग्रहो [ ६१३ ] आप्यायित करते हैं, अर्थात् तुष्ट - पुष्ट होती है - तथैव गरम पानी के स्पर्श से हविः " - भेदेन सोम चार प्रकार का

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण होता है । चारों में जो वल्ली सोम है वह " राजा " कहलाता है । प्रकृत प्रकरण में चूं कि वल्ली सोम का ही उपचार चल रहा है अतएव यहाँ पर सोम को " राजा " विशेषण से व्यवहृत कर दिया गया है— " अथ मदन्तीरुपस्पृश्य राजानमाप्याययन्ति " । जिस कारण गरम पानी का स्पर्श करा कर सोम राजा को श्राप्यायित करते हैं वह कारण बतलाते हैं-" तद् यन्मदन्तीरुपस्पृश्य राजानमाप्याययन्ति " । श्राज्य वज्र - स्वरूप है । घृत वास्तव में वज्र है । इन्द्र - विद्युत् का नाम ही वज्र है । अग्नि को जब पानी से अर्थात् वरुण से मार दिया जाता है तब घृत का जन्म होता है । इन्द्र जब वरुण से मार दिया जाता है तो तैल का जन्म होता है । अग्नि में जो इन्द्र - विद्युत् रहती है, वह वज्रस्वरूपा है - प्रतएव श्रग्नि - स्वरूप आज्य को अवश्य वज्र कह सकते हैं । सोम रेतस् ( वीर्य्य ) है । इसी सोम की श्राहुति से नया दिव्यात्मा पैदा किया जाता है । यदि इससे ( सोम से ) आज्य - स्वरूप वज्र का सम्बन्ध हो जाए तो सोग की प्रजनन शक्ति मारी जाएगी । हम कहीं प्राज्य - स्वरूप वज्र से - वीर्य्य - स्वरूप सोम की उस शक्ति को नष्ट न कर डालें- जिससे कि दिव्यात्मा पैदा होता है अतएव मदन्ती पानी से सोम राजा का श्राप्यायन करते हैं । श्रवान्तर दीक्षा के पहले तानूनप्त्र करते हुए हाथ में घृत ले कर उसका स्पर्श किया था अतएव इसके कारण जो आज्य की विद्युत् हाथ में मौजूद रहती है उस विद्युत् को हटाने के लिए मदन्ती पानी से राजा ( सोम ) का आप्यायन होता है । परन्तु ध्यान रहे कि पानी गरम होना चाहिए क्यों कि मिथुन भावकर्ता एवं प्रजनयिता है - " प्रग्निः प्रजननम् " ( गो ० पू ० २।१५ ) हमें सोम से दिव्यात्मा पैदा करना है और पैदा होना दाम्पत्य - सम्बन्ध पर निर्भर है तथा दाम्पत्य सम्बन्ध प्रग्नि पर निर्भर है-अतएव गरम पानी से प्राप्यायन किया जाता है । इससे दाम्पत्य - सम्बन्ध भी हो जाता है और ज्य की हिंस्र शक्ति भी दब जाती है तथा सम्यक्तया प्राप्यायन भी हो जाता है - प्रतएव मदन्ती से उपचार करते हैं - इसी अभिप्राय से कहते हैं-" वज्रो वा आज्यम्, रेतः सोमः । नेद्वज्ञेरणाज्येन रेतः सोमं हिनसामेति । तस्मान्मदन्तीरुपस्पृश्य, राजानमाप्याययन्ति ” ॥११ ॥

कितने ही याज्ञिक महर्षि कहते हैं - जिस सोम के लिए आतिथ्य स्वरूप प्राप्यायन किया जाता है-उसे ही पहले आप्यायनादि से सत्कृत करना चाहिए । तात्पर्य यही है कि सोम का आतिथ्य करना भी सोम को श्राप्यायित करना है एवं अवान्तर दीक्षा करना भी सोम को श्राप्यायित करना है । अवान्तर और आतिथ्य दोनों से सोम की पुष्टि ही होती है, अर्थात् वह तपोमय हो जाता है - प्रतएव उचित यही है कि पहले प्रातिथ्य - इष्टि की जाए । प्रातिथ्य - इष्टि करते ही आगत सोम के श्राप्यायन के लिए अवान्तर दीक्षा की जाए तथा इसके बाद तानूनन्त्र किया जाए । [ ६१४ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मरण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मणं हमारे यहाँ यदि कोई अतिथि आए तो अन्य सभी कार्य्यं छोड़ कर सर्वप्रथम अतिथि का श्राप्या-यन करना चाहिए । आगत अतिथि का उपचार ( आप्यायन ) करने की जगह अन्य कार्यो में ही प्रवृत्त रह जाना सर्वथा अनुचित है । अतएव प्रतिथ्यानन्तर मर्य्यादानुसार आप्यायन - स्वरूपा प्रवान्तर दीक्षा करनी चाहिए । बाद में तानूनप्त्र करना चाहिए - यह प्राचीनों का मत है । इसी को बतलाने के लिए उक्त ब्राह्मण के प्रारम्भ ( प्रथम कण्डिका ) में " श्रातिथ्येन वै देवाः " यह कह दिया गया है । प्राचीन याज्ञिक प्रातिथ्य के अनन्तर अवान्तर - इष्टि को मान्य करते हैं- " प्रातिथ्येन वें " । इसी मत का उल्लेख करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं— " यस्मा एतदाप्यायनं क्रियते - आतिथ्यं सोमाय - तमेवाग्रऽश्राप्याययेयुः -( आगत सोमस्य - अन्य कर्म्मश्य - प्राक् - मर्य्यादानुसारमाप्यायनभावृश्यकन् ) अथावान्तरदीक्षाम् - प्रथ तानूनत्राणीति " । इस मत का खण्डन करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि " नहीं, ऐसा कभी नहीं करना चाहिए " -" तदु तथा न कुर्याद् ” । याज्ञवल्क्य कहते हैं - ' ' प्राचीनों ने जो क्रम - संनिवेश बतलाया है वह यज्ञ का है अर्थात् यदि यज्ञ में श्रवभृथ स्नान पर्य्यन्त किसी भी प्रकार का व्यवधान नहीं आता तो पहले अवान्तर दीक्षा ही की जाती । परन्तु देवताओं में अवभृथ ( सोमभृत ) स्नान से पूर्व ही कलह हो गया था - प्रतएव आप्यायन के पूर्व उन्होंने इस कलह की शान्ति - स्वरूप " तानूनप्त्र कर्म्म " किया था । तदनन्तर श्राप्यायन -स्वरूप श्रवान्तर दीक्षा ली थी । बात वास्तव में सच है - यदि कर्म करते समय किसी भी प्रकार का व्यवधान या दोष श्रा जाए तो सर्वप्रथम उसे शान्त करना चाहिए । पहले उसका प्रायश्चित्त करना चाहिए उसके बाद आगे का कर्म करना चाहिए । अतएव पहले तानूनप्त्र करना चाहिए; उसके बाद अवान्तर दीक्षा करनी चाहिए --" यज्ञस्य वा एवं ( क्रम विशिष्टं ) कर्म । अत्र वा एनान्त्समदविन्दत् । ते संशममेव पूर्वमुपायन् ( शमवे पूर्वं समुयायन्- कलहो पशमनरूप तानूनपत्रं पूर्वं कृत वन्तः इति भावः ) अथावान्तरदीक्षाम् - प्रथाप्यायनम् ” ॥१२ ॥

जिस कारण से सोम का आप्यायन करते हैं - वह बतलाते हैं— " तद् यदाप्याययन्ति " ( तदुच्यते ) । जिस प्रकार अग्नि देवता है - तथैव सोम भी देवता है । सोम देवता इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि सोम द्युलोक में रहता है और द्युलोक में सिवाय देवतानों के कोई नहीं रह सकता । यह स्थान [ ६१५ ]

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बृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मरण श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मणे चूंकि देवताओं का है - अतएव इसे ' द्युलोक " कहते हैं । " दिवि सोम श्रासीत् ' ( तै ० ब्रा ० १।१।३।१० ) से सिद्ध होता है कि सोम द्युलोक की वस्तु है श्रतएव हम इसे देवता कहने के लिए तैय्यार हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " देवो वै सोमः - दिवि हि सोमः " - ( श्रासीत् - प्रसौ वै सोमो देवः-इति भावः ) । वृत्र नाम का जो असुर है - वह सोम - स्वरूप था अर्थात् उसका शरीर सोम से बना था । त्वष्टा नाम का बड़ा जबर्दस्त असुर था । उस असुर के पुत्र का नाम विश्वरूप था । उसके तीन मस्तक थे, छह श्राँखें थीं - वह विश्वरूप नाम से प्रसिद्ध हुआ । जैसा कि श्रुति कहती है— " त्वष्टुर्ह वै पुत्रः । त्रिशीर्षा षडक्ष नास तस्य त्रीण्येव मुखान्यासुस्तद्य देवं रूप श्रास तस्माद्विश्वरूपो नाम " । ( शत ० ५।५।४।२ ) इन्द्र ने इस विश्वरूप नामक राक्षस को मार डाला । यह देख कर त्वष्टा को बहुत क्रोध श्राया । उसने इन्द्र को मारने के लिए यज्ञ किया । यज्ञ में एक द्रोणकलश होता है । उसमें सोम भरा गया । स्वष्टा ने विचार किया कि इस सारे सोम से मैं ऐसा पुत्र उत्पन्न करूँगा जो इन्द्र को एक क्षण में मार डालेगा । इसकी सूचना इन्द्र को मिल गई । वे अति सूक्ष्म रूप धारण कर उस द्रोणकलश में घुस कर सारा सोम पी गए । किन्तु उसमें थोड़ा सोम फिर भी शेष रह गया । जव त्वष्टा को यह मालूम हुआ तो वह क्रुद्ध हो कर बोला - हे इन्द्र! तुम मेरे हाथ से बच कर निकल नहीं सकते हो । यह कह कर उसने बचे हुए सोम की ‘ ' इन्द्र शत्रुर्वर्धस्व " कह कर आहुति देना प्रारम्भ कर दिया । इस यज्ञ से वृत्र नाम का महाबलवान् असुर उत्पन्न हुआ । इस प्रकार इस सारे प्रपञ्च से कहना यही है कि द्रोणकलश के सोम से " वृत्र " बना है । वृत्र का शरीर सोममय है अतएव कहा गया है— “ वृत्रो वै सोम आसीत् ” । वृत्र को इन्द्र ने खण्ड - खण्ड करके अन्त में मार डाला— “ इन्द्रो ह यत्र वृत्राय वज्रं प्रजहार " । ( शत ० १।२।४।१ ) पूर्व कपाल और पश्चिम कपाल इन दोनों को मिलाने से घट रूप खगोल का स्वरूप बन जाता है । यह खगोल वास्तव में घटाकार ( मटके की तरह का ) ही है । इसी का नाम द्रोणकलश है । इसमें अर्थात् व्यापक आकाश में - सर्वत्र सोम भरा रहता है । यह तोम निज स्वरूप से सर्वथा काला है । * इस विषय का विस्तृत विवेचन पं. मोतीलाल शास्त्रीजी द्वारा प्रणीत ' शतपथ ब्राह्मण हिन्दी विज्ञान भाष्य ' के प्रथम काण्ड में देखना चाहिए । [ ६१६ ]

पृष्ठ 627

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तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण यह सर्वत्र व्याप्त हो सब को ढक लेता है - अतएव - " सर्वं वृत्वा शिश्ये तस्माद् वृत्रः " ( शत ० १।१।३।४ ) के अनुसार इस सोम को वृत्र नाम से व्यवहृत किया जाता है । सोम असुर नहीं है । आप्य प्रारण का नाम असुर है । आप्य प्राण असुर को इसी सोम में रहने का मौका मिलता है । क्यों कि अग्नि में आप्य -प्राण नहीं घुस सकता, केवल सोम ही में इसकी दाल गलती है । परन्तु इन्द्र अर्थात् सूथ्यं - सोम में घुसे हुए आप्यप्राण - स्वरूप तमोमय असुर का खण्ड - खण्ड कर डालता है अर्थात् परमेष्ठि- मण्डल के सोम को जो सूर्य्यं में श्रा जाता है, सूर्य्य- रश्मियाँ धक्का दे कर खण्ड - खण्ड में परिणत कर देती हैं । वही विभक्त सोम पत्थर बनता है । इसीलिए तो " सोममद्रौ " कहा जाता है । बड़े - बड़े जितने भी पर्वत हैं वे वृत्र का शरीर हैं । पत्थर आदि भी ध्रुव सोम से बनते हैं । " ध्रुव घर्त्र - धरुण धम्मं " - इन चार जातियों के सोमों में जोध्रुव सोम है - वही पत्थर बनता है । यह सोम भी खण्डशः नाना रूपों में परिणत हो जाता है । जैसे त्रिककुद पर्वत है वह भी इसी ध्रुव सोम से बना है - इसीलिए कहा गया है— " यत्र वाऽइन्द्रो वृत्रमहंस्तस्य यदक्ष्यासीत्तं गिरिं त्रिककुदमकरोत् ” । ( शत ० ३।१२।३।१२ ) यही सोम " प्रशाना " नाम की औषधि बन कर उत्पन्न होता है । सोमवल्ली का प्रातिविक नाम " अशाना " ही है । वृत्रप्रारण मिश्रित जो सोम है वही अशाना नाम की वेलड़ी ( लता ) बनता है । इसे ही सोमवल्ली या सोमलता कहते हैं । उद्दालक महर्षि के पुत्र महर्षि श्वेतकेतु अपनी " ब्रह्मपर्षद " में परीक्षा कर यह मानते हैं कि इन्द्र ने जिसके द्वारा वृत्र को खण्ड - खण्ड कर दिया था वही त्रिककुद गिरि प्रश्मा-अशाना नाम की औषधि का उत्पत्ति स्थल है । उस वृत्रखण्ड - मिश्रित सोम से ही यह गिरि पैदा हुआ है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" तस्यैतच्छरीरम् यद्गिरयो, यदश्मानः । तदेषोऽशाना नामौषधिर्जायते इति ह स्माह श्वेतकेतुरौद्दालकिः " । यज्ञ में श्रागत सोमवल्ली को कूटते हैं । इसी को " अभिषव " कहते हैं । सोमवल्ली में त्वचा इत्यादि भाग असुर - भाग है प्रोर रस - भाग साक्षात् सोम देवता है । इस रस - भाग के अर्थात् सोम के मूल स्वरूप के निष्कर्षण के लिए उसके असुर - भाग को मार - कूट कर नष्ट किया जाता है । इसके बाद दीक्षा से - तानून से - उपसत् से- आप्यायन इत्यादि कम्र्म्मो से - वल्ली से सोम निष्पन्न करते हैं । वास्तव में प्राण - देवता ऐसा ही करते हैं । जो सोम सूर्य्य में आता ( आहुत होता ) है - उसके साथ असुर ( प्राप्यप्राण भी श्राना चाहते हैं । परन्तु इन्द्र अपनी प्रबल रश्मियों के द्वारा धक्का दे कर आध्यप्राण को बाहर की श्रोर फेंक देता है और सोम को छाँट कर अपने में ले लेता है । वही सोमवल्ली बनता है । भौमस्वर्ग निवासी देवताओं ने इसे कूट कर दीक्षा - तपादि से शुद्ध रूप से निकाला । जिस समय असुर को कूटा जाता है तो उस घात का असर सोम पर भी होता | अवान्तर दीक्षादि से उस कृश सोम को अलग कर उस घात को मिटाने के लिए उसे प्राप्यायित करने के लिए उसका मदन्ती ( गरम ) पानी से उपचार करते हैं | भौम देवताओं ने ऐसा करके वल्ली में से अभिषव द्वारा असली सोम को निकाला था तथैव यज-मान भी इसी प्रकार असली सोम को निकाल कर उसका श्राप्यायन करता है— [ ६१७ ]

पृष्ठ 628

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण भवान्तरदीक्षा ब्राह्मणं " तामेतदाहत्याभिण्वन्ति । तां दीक्षोपसद्भिः तानूनः प्राप्यायनेन सोमं कुर्वन्तीति । तथोऽएवैनामेष एतद्दीक्षोपसद्भस्तानून त्रैराप्यायनेन सोमं करोति " ॥१३ ॥

अवान्तर दीक्षा के अनन्तर सोम का श्राप्यायन किया जाता है । सोम का आप्यायन क्यों किया जाता है, इसका विवरण पूर्व में बतला दिया गया है । सोम वृत्र का शरीर था । वृत्र सोम में घुसा हुआ था । वल्ली को कूट कर जब उसमें से सोम निकाला जाता है तो अभिषवजनित श्राघात से सोम पर भी प्रघात होता है । इस आघात से सोम में निर्बलता आ जाती है । उसी निर्बलता को दूर करने के लिए सोम का आप्यायन किया जाता है । आप्यायन का अन्य कारण और बतलाते हैं— प्राचीन समय में " यह मधु सारध है " - इस प्रकार कहा करते थे । कितने ही पदार्थ लोक में ऐसे हैं जिनको असली नाम न लेकर अन्य नामों से व्यवहृत करते हैं । उन पदार्थों की उत्कृष्टता बतलाने के लिए ही उन्हें अन्य नामों से व्यवहृत किया जाता है । उदाहरणार्थ यदि आम बहुत ही मिष्ट ( मीठा ) है तो उसे श्रम न कह कर " मिश्री की डली है ", " कलाकंद है " इत्यादि नामों से व्यवहृत करते हैं । यहाँ पर मिश्री की डली - यह सम्बोधन आम के लिए है । उसके माधुर्य्यातिशय का द्योतन करने के लिए ही उसे ( श्राम को ) मिश्री कह दिया जाता है । ठीक इसी प्रकार प्राचीन समय में " मधु सारघ है " यह कहा जाता था । " मधु सारधमिति वा श्राहुः " । " मिश्री की डली है " में श्रम के लिए मिश्री कहा जाता है, उसी प्रकार - याज्ञवल्क्य कहते हैं-" मधु सारध में जो मधु सारघ है वह यही यज्ञ है अर्थात् यज्ञ ही मधु सारघ है " । इसका तात्पर्य यह है कि लोक में " मधु सारघ है- मधु सारध है " कहते हैं वह इसी यज्ञ के लिए कहते हैं । खजूर - सांठा ( गन्ना ) - पुष्प, मधु - इत्यादि जितने भी मधुर रस हैं उन सबको ' मधु ' शब्द से व्यवहृत किया जाता है । मधुर रस का नाम ही मधु है । इन मधु रसों में से मधुमक्षिका से सति जो पुष्परस - मधु है, उसका नाम " सारघ मधु " है । " सरघा " - मधुमक्षिका का वैदिक नाम है । प्रत्येक पुष्प में से उसके रस को निचोड़ कर ( चूँसकर ) मधुमक्षिकाएँ अपने में संचित करती हैं- प्रतएव " सरन् सन्ध्नन्ति " इस व्युत्पत्ति से इसे " सरघा " कहा जाता है । इससे सञ्चित जो मधु है वही " सारघ मधु " कहलाता है । खजूर - सांठा ( गन्ना ) आदि में जो मधु होता है वह तो उनका अपना ही अर्थात् एक पदार्थ का ही रस होता है । खजूर में खजूर का ही मधु होता है, साँठे में साँठे का ही रस होता है, अर्थातु इनमें अन्य पदार्थों के रस का मिश्रण नहीं होता । किन्तु सारध मधु में कितने ही अन्य रस मिले रहते हैं, क्यों कि अनेकों पुष्पों के रसों से ही सारघ मधु बनता है । मधुमक्षियाँ अनेकों पुष्पों से रस को एकत्र करती हैं एवं इनके ( रसों के ) एकत्र करने के साथ ही उनकी ( मधुमक्षिकानों की ) जिह्वा की लाला ( लार ) भी उन रसों में मिल जाती है । इस प्रकार इस मधु में कई पुष्पों का रस रहता है और इसमें मक्षिकाओं का अपना हिस्सा भी मिश्रित हो जाता है । अन्य मधुत्रों की अपेक्षा सारघमधु में यही विशेषता है । [ ६१८ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण प्राकृतिक प्राण - देवताओं का यज्ञ भी ठीक इसी प्रकार का है । प्राण - देवताओं के यज्ञ में तीनों लोकों का रस शामिल रहता है । और जिस यजमान की ओर से यज्ञ होता है उसका आत्मा भी इस यज्ञ में शामिल रहता है । आत्म - सम्बन्ध से ही तो वह यज्ञ उसका कहलाने लगता है । प्रत्येक पिण्ड में भी - स्तोम्य त्रिलोकी विभाग की भाँति ही पृथिवी - अन्तरिक्ष द्यौ प्रापः ये चार लोक रहते हैं । इन चारों की समष्टि से ही यज्ञ होता है । सूय्यं में भी ये चारों लोक हैं । पृथिवी में भी ये चारों लोक हैं । चन्द्रमा में भी ये चारों लोक रहते हैं । यच्चयावत पिण्डों में ये सभी चारों लोक मौजूद रहते हैं । प्रत्येक पिण्ड का हृदयस्थ आत्मा - प्रजापति अपने यज्ञ में शामिल रहता है । सूर्य का आत्मा अपने यज्ञ में शामिल रहता है । पार्थिव आत्मा अपने यज्ञ में शामिल रहता है । कहने का तात्पर्य यही है कि समस्त पिण्डों के अपने - अपने प्रातिस्तिक यज्ञ भिन्न - भिन्न रूपेण ही रहते हैं और उनमें से प्रत्येक यज्ञ में सम्बद्ध पिण्ड का आत्मा बद्ध रहता है । प्रत्येक यज्ञ चारों लोकों के रसों से सम्पन्न होता है । स्तोम्य त्रिलोकी के अन्तर्गत जो पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यौ प्राप ये चार लोक हैं, उनके रसों को प्राण ऋत्विक् एकत्र कर उससे यज्ञ - मधु तय्यार करते हैं । चूंकि यज्ञ बिलकुल " सारध मधु " के समान ही है-उसी प्रकार उत्पन्न होता है - प्रतएव इसे ( यज्ञ को ) मधु न कह कर " सारध मधु " कहा गया है । त्रैलोक्य में ८ वसु - ११ रुद्र - १२ श्रादित्य- २ अश्विनी कुमार - ये ३३ देवता रहते हैं । यज्ञ - मधु को तीनों लोकों में से चूस कर निकालने वाले यही प्राण- देवता हैं । अतएव ये प्राण - देवता मधु - सारघ ( मधुमक्षिकाएँ ) हैं । इसीलिए इनके द्वारा सञ्चित हुए यज्ञ को अवश्य ही " मधु सारघ " कह सकते हैं । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" मधु सारघमिति वा आहुः । यज्ञोह वै मधु सारघम् " । जिस प्रकार प्रकृति - यज्ञ में प्राण - देवता - मधु सारघ ' हैं- एवमेव वैध - यज्ञ में ( मानुष यज्ञ में ) ब्राह्मण ऋत्विक् ही सारघ हैं । ये ऋत्विक् ही नाना पदार्थों में से रस निकाल कर यज्ञ का संभरण करते हैं । यज्ञ को यही निष्पन्न करते हैं--" अथैत एव सरघो मधुकृतो यदृत्विजः ” । जिस प्रकार मधुमक्षिका मधु एकत्र कर अपने छत्ते के कोष्ठकों को भर देती है - श्राप्यायित कर देती है - एवमेव ये प्राण देवता और मनुष्य - देवता यज्ञ रस को एकत्र कर यज्ञकोष्ठ को भर देते हैं । प्राण - देवता ( ऋत्विक् ) चारों लोकों के रसों को एकत्र कर उसे महिमामण्डल स्वरूप कोष्ठ में भर लेते हैं— " तद्यथा मधु मधुकृत प्राप्याययेयुः - एवमेवैतद्यज्ञमाप्याययन्ति ” ॥१४ ॥

ऋत्विक् किस प्रकार सोब का आध्यामन करते हैं? सोम में क्या कमी हो गई है? इसका समा-धान करते हैं - रोदसी त्रिलोकी में प्राण देवता अपराजेय हैं । यह अपराजेयता उन्हें ( देवतानों को ) । ६१६ ]

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण सोम यज्ञ से ही प्राप्त हुई है । सोम यज्ञ की महिमा के कारण ही सूर्य्य चन्द्र अग्नि वायु आदि ३३ देवताओं ने सर्वत्र अपना आधिपत्य जमा रक्खा है । इसका कारण सोम ही है । क्यों कि यदि सूर्य के ऊपर रहने वाला पारमेष्ठ्य सोम इन आग्नेय देवताओं में न आए तो अग्नीषोमात्मक यज्ञ बन्द हो जाए एवं उसी क्षण प्राण - स्वरूप श्राग्नेय ३३ देवता उच्छिन्न हो जाएँ-" यज्ञेन वै देवाः इमां जिति जिग्युः - येषामियं जितिः " । इस प्रकार सोमयज्ञ के द्वारा समस्त रोदसी त्रिलोकी पर अपना प्रभुत्व जमा कर देवताओं ने यज्ञ के प्रतिष्ठा - तत्त्व की रक्षा के लिए विचार किया कि " ऐसा क्या उपाय किया जाए कि यह यज्ञ - रहस्य मनुष्यों के लिए अनभ्यारो हो जाए । अर्थात् कोई इस प्रकार का उपाय करना चाहिए कि जिससे इस लोक - साधन - भूत यज्ञ - रहस्य को सामान्य मनुष्य न समझ सकें— " ते होचुः कथं न इदं मनुष्यै रनभ्यारोह्यं स्यादिति " । आखिरकार देवताओं को यज्ञ रहस्य बनाये रखने का मार्ग मिल गया । जैसे मधुमक्षिकाएँ अपने ऊपर आक्रमण होता देख कर पुष्पों के चूसे गए रस को साथ ले कर उड़ जाती हैं ठीक उसी प्रकार देवता भी यज्ञ के सार भाग का अवशोष कर, अर्थात् यज्ञ का दोहन कर, यूप ( सूर्य्य ) की प्रोट में ' छुपा कर अन्तर्हित हो गए । चूंकि सूर्य्य से ही उन्होंने यज्ञ को छुपाया था, अतः योपन - साघ-नत्वात् इस सूर्य्यं को " यूप " कहने लग गए । सूर्य्यं में सारे देवता रहते हैं । सूर्य्य में निरन्तर सोम आता रहता है । देवताओं की विजय का एकमात्र कारण यही निरन्तर आने वाला सोम अर्थात् सोम - यज्ञ है । यदि यह सोमयज्ञ ( सोमाहुति ) सूर्य्य में न हो तो उसमें रहने वाले रोदसी त्रिलोकी के समस्त आग्नेय प्राण - देवता उसी समय अपने मूल स्वरूप से उच्छिन्न हो जाएँ । पारमेष्ठ्य सोम से ही यज्ञ होता है - अतएव यही यज्ञ का " सार भाग " है । हमको सूर्य्य - पिण्ड के दर्शन तो होते हैं किन्तु सूर्य्य में आहुत होने वाले पारमेष्ठ्य सोम के दर्शन हम नहीं कर पाते हैं । यज्ञ का यह सार भाग हमारी दृष्टि से सर्वथा प्रोझल है । देवताओं द्वारा अवशोष किए हुए इस सार - भाग को हमारी दृष्टि से छुपाने का साधन सूर्य्य ही है । सूर्य की प्रखरता के कारण हमारी दृष्टि उसकी ओर ठहर ही नहीं सकती अतएव साधारण मनुष्य माहुत सोम को देख नहीं पाते हैं । चूँकि सूर्य्यं ही हम से यज्ञ के सार - भाग को छुपाता है अतएव इसे " यूप " कहते हैं । यह आख्यान अध्यात्म- अधिभूत- आधि-दैवत तीनों अर्थों में लागू है " ते यज्ञस्य रसं धीत्वा - यथा मधु मधुकृतो निर्द्धयेयुः - विदुह्य यज्ञं यूपेन

योपयित्वा तिरोऽभवन् । अथ यदनेनायोपयन् । तस्माद्यूपो नाम " ॥१५ ॥

* इन तीनों का विस्तृत विवेचन पूर्व के " दीक्षितव्रत " ब्राह्मण में कर दिया गया है । [ ६२० ]