Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 631–640
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 631–640
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण यज्ञ के इस सार - भाग को सामान्य मनुष्य नहीं पहचान सकते । परन्तु वैज्ञानिक महर्षियों ने इस यज्ञ - रहस्य को पहचान कर जिस प्रकार प्राण - देवताओं का यज्ञ हो रहा है उसी प्रकार यहाँ यज्ञ का संभरण किया । अर्थात् प्राण - देवताओं के यज्ञ के आधार पर भारतीय महर्षियों - वैज्ञानिकों ने यज्ञ-विद्या का आविष्कार किया । ब्रह्म और क्षत्र में ब्रह्म की दो विभूतियाँ हैं । " चतुष्टयं वा इदं सर्वम् " ( को २।१ ) के अनुसार ये दोनों ही चार - चार भागों में विभक्त हैं । राजा सम्राट् - स्वराट् - विराट् " ये चार क्षत्र के विभाग हैं । ये चारों विभाग ही दो - दो प्रकार के हैं । भोज और महाभोज ये दोनों विभाग राजा के हैं- इनमें " भोज ” राजा तथा महाभोज महाराजा कहलाता है । जिसके अधिकार में सौ ग्राम होते हैं वे " भोज " कहलाते हैं । तथा सो भोजों ( प्रत्येक के पास सौ - सौ ग्राम हों ) पर जिनका अधिकार हो वे महाभोज अर्थात् " महाराजा " कहलाते हैं । जिनके अधिकार में अनेकों महाराजा हों वह " सम्राट् " कहलाता है । सम्राट् भी “ चक्रवर्ती ” और “ सार्वभौम " भेदेन दो प्रकार के होते हैं । जिसके पास १४ रत्न हैं वह " चक्रवर्ती " कहलाता है एवं जिसका पृथिवी - मण्डल में दबदबा हो वह " सार्वभौम " कहलाता है । कई सम्राट् जिसके अधीन हों वह " स्वराट् ' कहलाता है । सम्राट् बादशाह को कहते हैं । सार्वभौम शहनशाह को कहते हैं । वर्तमान में सम्राट् तक ही क्षत्र की समाप्ति है । अर्थात् कोई भी सार्वभौम है ही नहीं । अस्तु-जो स्वराट् है वह " इन्द्र " और " महेन्द्र " भेदेन दो प्रकार का है । प्र सपत्न राज्य - भोक्ता महेन्द्र है - सपत्न राज्य - भोक्ता इन्द्र है । जब तक असुरेन्द्र जीवित रहा तब तक देवेन्द्र - इन्द्र ही कहलाए - परन्तु जब उन्होंने असुरेन्द्र को मार डाला, तो वे महेन्द्र हो गए - श्रतएव " इन्द्रो वै वृत्रं हत्वा महेन्द्रोऽभवत् " ( शत ० १।६।४-२१ ) यह कहा जाता है । चोथा दर्जा है विराट् का । इसके " ब्रह्मा " और " विष्णु " ये दो भेद हैं । इन्द्र तक सात प्रकृतियाँ हैं - फौजें हैं - सब कुछ है । इसके बाद अर्थात् विराट् श्रेणी में कुछ नहीं है । ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही लँगोटिया ( गहरे मित्र ) हैं । इनकी कोई सम्पत्ति नहीं है एवं सारी सम्पत्ति इन्हीं की है । इस सारे प्रपश्च से कहने का तात्यर्थ्य यही है कि क्षत्र वीर्य्य - राजा सम्राट् -स्वराट् - विराट् इन चार सीगों ( विभागों ) में विभक्त है । ब्रह्मवीर्य्य — ब्राह्मण - विप्र ऋषि देवता इन चार भागों में विभक्त है । संस्कारावच्छिन्न षट्कर्म्मा जो ब्राह्मण है वह “ ब्राह्मण " कहलाता है । विद्यातपोयुक्त ब्राह्मण " विप्र " कहलाता है । अष्टसिद्धि-नवतुष्टि प्राप्त एवं साक्षात्कृतधर्म्मा ब्राह्मण - " ऋषि " कहलाते हैं । जो पृथिवी के श्राकर्षण से छूट कर श्रमा में देवता बन जाते हैं - जिनके लिए – “ दिवं पृथिव्या अध्यासहाम " यह कहा जाता है, वह " देवता " है । ऋषि भी तिरोहित हो सकते हैं - परन्तु " यावदधिकारमवस्थितिरधिकारिकारणम् ” के अनुसार उन्हें पृथिवी की पकड़ में रहना पड़ता है जब कि देवता पृथिवी की पकड़ में नहीं रहते । यही " ब्रह्म चतुष्पदी " है । इन चारों में, देवता सिद्धावस्था में हैं - अतएव उनके विषय में हमें कुछ नहीं कहना है । बाकी रहे ऋषि । यही ( ऋषि ) यज्ञ - विद्या के श्राविष्कर्ता हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " तद्वा ऋषीणामनुश्रुतमास । ते यज्ञं समभरन् । यथाऽयं यज्ञः सम्भृतः ” । [ ६२१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण जिस प्रकार ऋषियों ने यज्ञ का संभरण किया था - उसी प्रकार यह ( दीक्षा लेने वाला यजमान ) भी यज्ञ का सम्भरण करता है । यज्ञ का सम्भरण वही करता है जो कि दीक्षा लेता है । जिस प्रकार ऋषियों ने यज्ञ का सम्भरण किया था अर्थात् यज्ञ किया था वैसे ही, उसी पद्धति के अनुसार, यजमान भी यज्ञ करता है-" एवं वा एष यज्ञं सम्भरति यो दीक्षते " । त्रिलोकी में व्याप्त जो इन्द्र वाक् है उसी पर अग्नीषोमात्मक यज्ञ प्रतिष्ठित रहता है । इसी वाक् के लिए कहा जाता है—
" सहस्रधा पञ्चदशान्युक्था यावद्यावापृथिवी तावदित्तत् ।
सहस्रधा महिमानः सहस्रं यावद्द्ब्रह्म विष्ठितं तावती वाक् " ॥
( ऋग्वेद मं ० १० ११४।८ ) वाङ्मण्डल को वषट्कार- मण्डल कहते हैं । इसमें ३३ अहर्गण हैं । ३३ में से २१ तक अग्नि रहता है | २७ तक भास्वर सोम रहता है । ३३ तक दिक् सोम रहता है । वाङ्मण्डल पर ही अग्नी-षोमात्मक यज्ञ होता है । अतएव हम वाक् को यज्ञ कहने के लिए तय्यार हैं । “ वाग् वै यज्ञः ” । इस प्रकार सारे प्रपञ्च से बतलाना यही है कि यज्ञ का जो सार - भाग निर्धीत हो गया है अर्थात् चूस लिया गया है एवं विदुह्य हो गया है— उसे ही पुनः प्राप्यायित किया जाता है । सोम इन्द्र की ' घनिष्ठता है । इन्द्र सोम का अवशोष ( चूषण ) कर लेता है । सम्भव है कि यज्ञ के सार भाग - भूत बहुत हमारे वल्ली - सोम को भी प्राण- इन्द्र चूस गया हो । निदानेन उसी क्षति की पूर्ति करते हैं । सोम के श्राप्यायन का यही कारण है-" तद्यदेवात्र यज्ञस्य निर्धोतं, यद्विदुग्धं तदेवैतत्पुनराप्याययति ” ॥१६ ॥
६ ऋत्विक् सोम का प्राप्यायन करते हैं - इसीलिए कहा गया है— " ते वै षड्भूत्वा श्राप्याययन्ति " । ६ ऋत्विक् सोमाप्यायन क्यों करते हैं इसका कारण बतलाते हैं - वाङ्मण्डल में २१ अहर्गण तक वितत अग्नि एवं ३३ तक वितत सोम के सम्बन्ध का नाम ही " यज्ञ " है । २१ अहर्गण तक वितत अग्नि का पृथिवी के केन्द्र से ले कर २१ अहर्गण तक जो मण्डल बनता है — उस श्राग्नेय मण्डल को " संवत्सर चाहिए । * वाक् कैसे यज्ञ है - इसका विस्तृत विवेचन प्रस्तुत ग्रन्थ के " दीक्षणीयेष्टि " प्रकरण में देखना [ ६२२ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण मण्डल ” कहते हैं । इस सम्वत्सर मण्डल में वसन्त ग्रीष्म - वर्षा शरत् - हेमन्त शिशिर ये ६ ऋतुएँ हैं । इसका तात्पर्य यह है कि संवत्सराग्नि ६ अवयवों में विभक्त है । छहों ऋतुएँ पारमेष्ठ्य सोम को प्राप्या-यित करती रहती हैं । इन ऋतुओं का सम्पूर्ण संवत्सर से सम्बन्ध ३६० दिनों में पूर्ण होता है । क्योंकि संवत्सर के ६ अवयव हैं — प्रतएव कह सकते हैं कि ये ऋतुएँ ही सोमाप्यायन करती रहती हैं- " यद्वै देवा अकुवं तत् करवाणि " - यह हमारा मूल मन्त्र है -- अतएव प्रकृति - यज्ञानुसार यहाँ ( मानुष यज्ञ में ) भी ऋतु स्वरूप ६ हीं ऋत्विक् सोमाप्यायन करते हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं— “ षड् वा ऋतवः । ऋतव एवैतद् भूत्वा प्राप्याययन्ति ” ॥१७ ॥
सोम का आप्यायन क्यों करना चाहिए इसकी उपपत्ति बतला दी गई है - अब पद्धति बतलाते हैं - ऋत्विक् निम्नलिखित मन्त्र से सोम को प्राप्यायित करते हैं-" त श्राप्याययन्ति " । " अंशुरंशुष्टे देव सोमाप्यायतामिन्द्रायैक धनविदे । श्रातुभ्यमिन्द्रः प्याय-तामा त्वमिन्द्राय प्यायस्व । श्राप्याययास्मान्त सखीन्त्सन्या मेधया । स्वस्ति ते देव सोम सुत्यामशीय " । ( वा ० सं ० ५/७ ) हे सोम देवता! आपका अंशु - अंशु तृप्त हो जाए । प्राप सर्वात्मना तृप्त हो जाएँ- यही तात्पर्य्यं है । इस मन्त्र - भाग से ऋत्विक् सोम के सम्पूर्ण अंशुत्रों को आप्यायित करता है । सोम - वल्ली के प्रादेश मात्र टुकड़े काट - काट कर उसकी एक - एक फली बना ली जाती है । इस फली का नाम ही " अंशु " है । प्राण प्रादेशमित होते हैं - प्रतएव " प्रादेशमित वै प्राणः " यह कहा जाता है । इस सोम द्वारा दिव्यप्राण उत्पन्न होते हैं । दिव्य - प्राण प्रादेशमित हैं । इनका साधक सोम ही है - प्रतएव प्रादेशमात्र ही अंशु होते हैं । इन्हीं अंशुत्रों को ऋत्विक् आध्यायित करते हैं— " तदस्यांशुरंशुमेवाप्याययन्ति " ( ऋत्विजः ) । घृत से सोमांशुओं का श्राप्यायन होता है । इससे यद्यपि सारे अंशुत्रों का आप्यायन नहीं होता तथापि भावना द्वारा समस्त अंशुत्रों को तृप्त कर देते हैं । इसी बात को दिखलाने के लिए " अंशु -रंशु ” अर्थात् " अंशु - प्रत्यंशु " कहा गया है । वीप्सा ( स्पृहा - कामना ) का यही तात्पर्य है । देवता धन-विद् होते हैं । सोम ही देवताओं का धन है । अग्नि की सम्पत्ति मात्र सोम ही है । यदि सोम की आहुति अग्नि में न हो तो - उसी समय आग्नेय देवता नष्ट हो जाएं । चूँकि इनकी एकमात्र सम्पत्ति सोम ही है-* आचार्य सायण ' अंशुरंशु ' वाले मन्त्र के प्रकरण में " वीप्साभिधानसामर्थ्येनैव प्रत्यंशु श्राप्याय-यन्तो भवन्तीत्यर्थः " के द्वारा यजमान एवं ऋत्विज् की वीप्सा ( इच्छा ) का संकेत करते हैं । [ ६२३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण अतएव इन्हें ' एकधनवित् ' कहा जाता है । ये सारे देवता इन्द्र के अधीन रहते हैं- जैसा कि - तानून-ब्राह्मण में बतला दिया गया है । ये सारे देवता सदा इन्द्र के साथ रहते हैं । इसीलिए " इन्द्रः सर्वा देवता " ( शत ० ३।४।२।२ ) यह कहा जाता है । इन्द्र निरन्तर सोम पीया करते हैं । क्यों कि उन्हें ( इन्द्र को ) सोम अत्यधिक प्रिय है । हम जो सोमाहुति देते हैं वह देवतायुक्त इन्हीं इन्द्र के लिए देते हैं । इसी अभि-प्राय से कहते हैं कि हे सोम! एक धनविद् - देवता युक्त जो इन्द्र है उसके लिए आपके अंशु अंशु प्राप्या-यित हों । अर्थात् हम अपने निजी काम के लिए आपको आध्यायित नहीं करते हैं - प्रपितु यज्ञ के ( सोम के ) जो देवता युक्त इन्द्र हैं- उन्हीं के लिए आपको प्राप्यायित करते हैं । इन्द्र ही यज्ञ - साधक, अतएव यज्ञस्वरूप सोम के देवता हैं एवं वे एकधनविद् हैं अर्थात् समस्त ३३ देवताओं के साथ रहते हैं - उन्हीं के लिए सोम को श्राप्यायित किया जाता है । पूर्व - पश्चिम कपाल - स्वरूप जो द्रोणकलश है - उसमें सोम भरा रहता है । यही मात्र इन्द्र का धन है । यह आन्तरिक्ष सोम ही इन्द्र की सम्पत्ति है । इसीलिए तो ' एकधनविदे ' कहा गया है । " इन्द्रो वै यज्ञस्य देवता । तस्मादाह-- इन्द्राय इति । एकधनविदे " - इति । एक ही सोम इन समस्त देवताओं को तृप्त कर देता है - प्रतएव देवतात्रों को एकधनविद् कहते हैं । एक - एक ही अंशु १००-१०० की किंवा १०-१० की संख्या में देवताओं को आध्यायित कर देता है । प्रकृति में एक ही सोम समस्त देवताओं को प्राप्यायित कर देता है । तदैव हमारा जो अंशु है - वही १००-१०० देवताओं को तृप्त कर देता है । देवता महिमा १००० ( सहस्र ) है । इसीलिए " सहस्रधा " इत्यादि कहा जाता है । ये समस्त महिमाएँ १०० के हिसाब से अथवा १०-१० के हिसाब से इस सोम से तृप्त हो जाती हैं । १०० के हिसाब से भी १० बार श्राप्यायन होता है एवं १०-१० को मिला कर जो आप्या-न है वह भी १० बार ही आप्यायन होता है । सहस्र नाम है - पूर्ण का । पूर्ण सम्पत्ति उभयथा प्राप्त हो जाती है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" शतं शतं ह स्म वा एष देवान् प्रत्येकैक एवांशुः | एक धनानाप्यायते, दश – दश वा " । सोम का एक - एक अंशु समस्त देवताओंों को तृप्त कर देता है - यही तात्पर्य है । हे सोम! आपके लिए इन्द्र आप्यायित हों - अर्थात् इन्द्र प्रापको पीने में समर्थ हों । आप इन्द्र के लिए आप्यायित हों । अर्थात् आपका जो यह आप्यायन है वह इन्द्र के लिए ही हो । इन्द्र ही यज्ञ के देवता हैं - प्रधिष्ठाता हैं । जो यज्ञ के देवता हैं उन्हें ही ऋत्विक् आप्यायित करते हैं, अर्थात् सोम के लिए समर्थ करते हैं । निम्न श्रुति का यही तात्पर्य है— " तुभ्यमिन्द्रः प्यायताम् ' । सोम इन्द्र के लिए ही प्राप्यायित होता है । सोम की पुष्टि का इन्द्र का इससे ( सोम से ) इसीलिए प्राध्यायन करते हैं-उपयोग करता है । इन्द्र [ ६२४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण ग्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण " ग्रा त्वमिन्द्राय प्यायस्व " । सोम में प्राप्यायन करते हैं - अर्थात् - पुष्टि का आधान करते हैं— " तदेतस्मिन्नाप्यायनं दधाति " । हे सोम! आप मात्र इन्द्र ही का आप्यायन करके मत रुक जाना - प्रपितु हमारे जो सखा अर्थात् मित्र हैं- कुटुम्बी हैं - उनको भी सनि अर्थात् सम्पत्ति और मेधा से प्राप्यायित कीजिए । प्रकृति - यज्ञ के अधिष्ठाता इन्द्र के साथ ही उनके साथ रहने वाले समस्त देवता भी तृप्त हो जाते हैं । इस यज्ञ का यजमान इन्द्र है । मय सखाओं के जैसे श्राप उस प्रारण - देवता इन्द्र को श्राप्यायित करते हैं - तथैव मय कुटुम्ब के हमें भी प्राप - धन - दौलत और बुद्धि से प्राप्यायित कीजिए । सोम यज्ञ से कुछ न कुछ मिलता ही है । यज्ञ से ( सोम से ) ही सब कुछ मिलता है अर्थात् सोम ही यज्ञ फल देता है अतएव उसे " सन्या " कहा है । इस सोम की महिमा से मन्त्र बोला जाता है । कारण इसका यह है कि मन्त्रवाक् सोम से ही श्राती है | जब तक सोम की आहुति शरीराग्नि में होती रहती है तभी तक मुँह से शब्द उच्चरित होता रहता है एवं शरीर चैतन्य रहता है । पहले अमुक मन्त्र तथा बादमें अमुक मन्त्र ही बोलना है — इस प्रकार पूर्वापरभूत जो अनुवचन - क्रम है वह बिना मेधा के हो नहीं सकता एवं मेधा शक्ति भी सोम पर अवलम्बित है - प्रतएव इसे " मेघया " कहा है-" स यत् सनोति तत् ( धनम् ) तदाह यत् सन्येति । अथ यदनुब्रूते । तदु तदाह - यत् मेधयेति " । हे सोम! आपकी स्वस्ति हो । आपका कभी विनाश न हो; बाल भी बाँका न हो-" स्वस्ति ते देव सोम सुत्यामशीय " । . हे सोम! मैं आपके अनुग्रह से यह जो सुत्या है - अर्थात् सोमाभिषव है उसे सम्पन्न कर सकू - ऐसा आशीर्वाद दीजिए | यज्ञ को सम्पूर्णता से निर्विघ्न सम्पन्न कर सकूँ - यही ग्राशीर्वाद दीजिए । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यजमान और ऋत्विक् दोनों की एकमात्र यही आशा रहती है कि हम सकुशल यज्ञ की समाप्ति पर पहुँच जाएँ । इसीलिए " सुत्यामशीय " कहा है-" एका वाऽएतेषामाशीर्भवति - ऋत्विजां च यजमानस्य च यज्ञस्योदृचं गच्छेम - इति । यज्ञस्योहचं गच्छानीत्येवैतदाह " ॥ १८ ॥
सोमाप्यायन के अनन्तर दोनों हाथ जोड़े हुए, उन्हें वेदी पर रक्खा हुआ जो प्रस्तर रख कर, निम्नलिखित मन्त्र से अपराध को क्षमा करने हेतु निवेदन करता है— उस पर " अथ प्रस्तरे निनुवते " - ( प्रस्तरे पारणी संपुष्टिकृत्य मन्त्रेरण अपराध-मलयति क्षमापयति ) । [ ६२५ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ४ ) उद्गाता उत्तर अध्वर्य होता शतपथ ब्राह्मण श्राहवनीय-) are: ( -मार्ग-गार्हपत्य पश्चिम [ ६२६ ] श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण अध्वर्यु यजमान दक्षिण ब्रह्मा यजमान पत्नी वह कौन सा अपराध था, जिसके कारण क्षमा करवाने की आवश्यकता हुई, उसी के विषय में बतलाते हैं - आहवनीय पूर्व में होता है । गार्हपत्य पश्चिम में होता है । वेदी दोनों के मध्य में होती है । आहवनीय सूर्य्य स्थानापन्न है । गार्हपत्य पृथिवी स्थानापल है । दोनों ही अग्निमय हैं । अग्नि ही को देवता कहते हैं । गार्हपत्यानि पार्थिव देवता है - जिससे यजमान का शरीर बना हुआ है । आहवनीय श्रग्नि सौर देवता है - जिससे यजमान का श्रात्मा बना हुआ है । इस वेदी के उत्तर भाग में होता - अध्वर्युं -उद्-गाता बैठते हैं । पश्चिम उत्तर के कोने में ' होता ' बैठता है । उसके बराबर पूर्व की ओर अध्वर्यु बैठता है-उसके आगे उद्गाता बैठता है । यह तो हुआ उत्तर का भाग । अब चलिए दक्षिण की ओर । दक्षिण में सबसे पहले यजमान पत्नी का आसन रहता है । बाद में ब्रह्मासन रहता है - उसके बाद यजमानासन रहता है - तदनन्तर अध्वर्यु का श्रासन रहता है । जब तक कर्म नहीं होता तब तक तो अध्वर्यु उत्तर में स्थित अपने उत्तरासन पर बैठा रहता है एवं जब कर्म्म प्रारम्भ करता है तो वेदी और गार्हपत्याग्नि के बीच में हो कर अपने दक्षिण वाले आसन पर आ बैठता है ।
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मरण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण अग्नि को यज्ञ कहते हैं । यह यज्ञ सदा दक्षिण से उत्तर की ओर जाता रहता है । जिस प्रकार सोम उत्तर से दक्षिण की ओर आता रहता है ठीक इसके विपरीत यज्ञ - स्वरूप अग्नि दक्षिण से उत्तर की ओर जाया करता है - इसका तात्पर्य यह है कि सोम ऊपर से नीचे की ओर तथा अग्नि ऊर्ध्वमुखी होने के कारण नीचे से ऊपर की ओर जाता है । चूंकि यज्ञ उत्तर की ओर जा रहा है अतएव उत्तर की झोर से जो उपचार करना है वही वास्तविक यज्ञ स्वरूप है । उत्तर की ओर से उपचार करना यज्ञस्वरूप को सुरक्षित रखना है— " उत्तरतउपचारो वै यज्ञः " । प्राप्यायन कम्मं में ऋत्विजों को दक्षिण में आना पड़ता है क्यों कि सोम का अपना स्थान दक्षिण में है - श्रतएव वेदी के दक्षिण भाग में ही सोम का श्राप्यायन किया जाता है । इस आप्यायन- कर्म के लिए अध्वर्युवेदी और गार्हपत्य के मध्य में बने हुए संचर ( मार्ग ) में से हो कर अपने दक्षिणभागस्थ प्रासन पर ना कर बैठता है । ऋत्विज दक्षिण की ओर जा कर ही ( अन्वित्य ) सोमाप्यायन करते हैं— " अथैतद् दक्षिणेवान्वित्याप्याययन्ति " । अग्नि यज्ञ - स्वरूप है । यह अग्नि उत्तर की ओर जा रहा है । ऐसी अवस्था में दक्षिण की ओर जाते हुए ऋत्विक् गार्हपत्याग्नि को अर्थात् यज्ञ को अपने पृष्ठ भाग में करते हैं, गार्हपत्य की ओर पीठ रखते हुए दक्षिण भाग में जाते हैं-" अग्निर्वै यज्ञः । तद् यज्ञं पृष्ठतः कुर्वन्ति ” । गार्हपत्य की ओर पीठ करने के दोष से ऋत्विक् श्रनचाहे भी प्रकृत ( मिथ्या ) कर्म्म के दोषी हो जाते हैं । इसी दोष के कारण ऋत्विजों से गार्हपत्याग्नि देवताओं का विच्छेद हो जाता है । प्रर्थात् उत्तर की ओर जाते हुए ऋत्विजों की श्रात्मा से गार्हपत्याग्निस्वरूप पार्थिव देवता वियुक्त हो जाते हैं— " तन्मिथ्या कुर्वन्ति, देवेभ्य श्रावृश्च्यन्ते " । प्रस्तर यज्ञका वस्रूप है । प्रस्तर हवि का आधार है । इसी पर हवि रक्खा जाता है । हवि ही यज्ञ है - अतएव ' तन्निवर्त्तकृत्वेन ' हम अवश्य ही प्रस्तर को यज्ञ कह सकते हैं । प्रस्तर का स्पर्श करते हुए ऋत्विक् श्रात्मा से वियुक्त यज्ञ ( गार्हपत्याग्नि ) को आत्मसात् करते हुए यज्ञ का पुनः आरम्भरण करते हैं । दक्षिण की ओर जाते समय गार्हपत्य की ओर पीठ करने के कारण जो दोष हो जाता है उसका प्राय-श्चित्त प्रस्तर का स्पर्श ही है । इस दोष का प्रायश्चित्त करने से यह कर्म मिथ्याकृत नहीं होता और ऋत्विक् श्राग्नेय देवताओं से वियुक्त भी नहीं होता है । प्रस्तर पर हाथ रख कर बोलने का यही कारण. है । इस प्रस्तर- स्पर्श कर्म से ही ऋत्विक दोग का प्रायश्चित्त करते हैं— " यज्ञो वै प्रस्तरः । तद् यज्ञं पुनरारभन्ते । तस्यो हैषा प्रायश्चित्तिः । तथो हैषामेतन्न मिथ्याकृतं भवति । न देवेभ्य श्रावृश्च्यन्ते । तस्मात् प्रस्तरे निह्नुवते ” ॥१ ९ ॥ [ ६२७ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राहाण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण यहाँ पर कितने ही याज्ञिक पूर्व पक्ष प्रस्तुत करते हैं - घृताक्त ( घी चुपड़े हुए ) प्रस्तर भाग में निह-नव करना चाहिए अथवा अनक्त ( कोरे ) प्रस्तर भाग में निनुव करना चाहिए? " क्ते निनुवीरान् ( निनुवीर रन् ) अनक्ते - इति ( प्रश्ने श्रुतिः ) " । इसका समाधान करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि अनक्त प्रस्तर में ही निनुव कर्म्म करना चाहिए । जो अक्त प्रस्तर है; उससे अनुप्रहरण करना चाहिए । तात्पर्य्यं यही है कि वेदी पर रक्खे हुए प्रस्तर ( कुशामुष्टि ) के दो विभाग कर देने चाहिए । दोनों में से एक हिस्से को घृत से चुपड़ कर घृताक्त कर देना चाहिए । दूसरे को श्रनक्त ही रखना चाहिए । जो अनक्त प्रस्तर है उस पर तो निनुव कर्म्म ( नमन ) करना चाहिए एवं घृताक्तो प्रस्तर - भाग से अनुप्रहरण कर्म्म करना चाहिए ---" अनक्ते हैव निनुवीरन् । न नु प्रहरणं ह्येवाक्तस्य ” ॥२० ॥
क्यों निह्नव करना चाहिए - इसकी उपपत्ति बतला दी गई है - अब पद्धति बतलाते हैं ऋत्विक् प्रस्तर पर दोनों हाथ रख कर ' ते निह्नुते ' मन्त्र से दोष के लिए क्षमा - याचना करता है " -" ते निनुवते । एष्टा रायः प्रेषे भगायऋतमृतवादिभ्यो नमो द्यावा-पृथिवीभ्याम् " - इति । " है एष्टः! ( कल्याणं दातुमिच्छन् अग्ने! ) इषे ( अन्नाय ) भगाय -( सौख्याय ) रायः ( धनानि ) प्रयच्छ " । हे अग्ने! ऐश्वर्य और अन्न के लिए हमें धन प्रदान कीजिए । बहिरन्तरङ्ग भेदेन सम्पत्ति दो प्रकार की होती है । जो अन्नादि पेट में चले जाते हैं, उन भुक्त पदार्थों को अन्तरङ्ग सम्पत्ति कहते हैं । उन्हे ही " इद " कहा जाता है । एवं हाथी घोड़े वस्त्र - नौकर चाकर इत्यादि सम्पत्ति बहिरङ्ग सम्पत्ति कह-लाती है । इसे भग ( ऐश्वर्य ) शब्द से व्यवहृत किया जाता है । धन ही दोनों सम्पत्तियों का साधन है । प्रत-एव उसी की याञ्चा करते हैं । अथवा एष्टा का दूसरा श्रर्थ समझना चाहिए । भग और अन्न के लिए ही राय ( धन ) की इच्छा है । हे अग्ने! दौलत की अपेक्षा है - यही ' एष्टा ' ( अभीष्टाः ) का तात्पर्य है । ग्रपि च हे अग्ने! –ऋतवादी जो हम हैं, उन्हें ऋत प्रदान कीजिए । प्रापः - वायु - यज्ञ ( सोम ) - धन-सत्य ये पाँच ही ऋत पदार्थ होते हैं । पाँचों में जो सत्य ऋत है वह अनृत का अभाव है । ऋत और सत्य में जो सत्य है - वह सत्य यह ऋत नहीं है अपितु ग्रनृताभाव - स्वरूप है - यह सत्य है । मिथ्या को अनृत कहते हैं तो ऋत सत्य है - यह सुतरां सिद्ध हो जाता है । इसी सत्य का यहाँ ग्रहण है । हमारा कर्म्म व्यर्थ न हो जाए अर्थात् सत्य ही रहे । हम सत्य रूप से च्युत् न हो जाएँ इसी अभिप्राय से कहते हैं-" सत्यं सत्यवादिभ्य इत्येवैतदाह " । [ ६२८ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) द्यावापृथिवी से अपराध क्षमा करवाता है— अवान्तरदीक्षा ब्राह शतपथ ब्राह्मण " नमो द्यावापृथिवीभ्याम् ” । अग्नि से ही ( गार्हपत्य देवताओं से ही ) क्षमा चाही जाती है क्योंकि अग्नि - सोम - सूर्य्य - चन्द्र जो कुछ प्रपञ्च है - वह सब द्यावापृथिवी ही के पेट में है तथा यच्चयावत यज्ञ भी इस द्यावापृथिवी में ही प्रति-ष्ठित है । अतः ऋत्विक् से जो अज्ञात दोष हो गया है - वे उस के लिए अग्नि से ही क्षमा माँगते हैं— “ तद् आभ्यां द्यावापृथिवीभ्यां निनुवते; ययोरिदं सर्वमधि " ॥ २१ ॥
इसके बाद अध्वर्यु प्रस्तर को हाथ में ले कर अग्नीत् से कहते हैं- " अग्नीन् मदन्ति श्रापा " इति । अर्थात् हे अग्नीत्! क्या पानी गरम हो गया? अग्नि उत्तर देता है- मदन्ती! हाँ, पानी गरम हो गया । यहाँ पर प्रकरण से तात्पर्य्यं ज्ञान होना है । लोक में जब एक मनुष्य किसी से पूछता है - " यज्ञदत्त सिद्धम् '? देवदत्त उत्तर देता है - " सिद्धम् " । पूर्व प्रश्न में भी सिद्धम् है और उत्तर में भी सिद्धम् है । परन्तु दोनों का तात्पर्य भिन्न - भिन्न है । यही बात यहाँ पर भी है । दोनों स्थानों पर मदन्ती है । परन्तु एक स्थान पर प्रश्न है - दूसरे स्थान पर उत्तर । जब अग्नीत् कहता है कि हाँ, गरम पानी तैय्यार है तो अध्वर्यु कहता है- प्रच्छा तो उसे ले श्राश्रो । यह कह कर अध्वर्यु उस प्रस्तर को आहवनीय अग्नि के ऊपर बिखेर देता है । एकदम से न डाल कर बिखेर - बिखेर कर जो डालता है - उसे " अनुप्रहरण ' कहते हैं । सारे ही प्रस्तर का अनुप्रहरण नहीं होता है - कुछ बचा भी लिया जाता है । जिस प्रस्तर का अनुप्रहरण नहीं करता है - उसे दूसरे दिन काम लिया जाता है । अग्नि में - अध्वर्यु उपरि- उपरि जो प्रस्तर डालता है, इसका यह प्रस्तर डालना प्रस्तर — भाजन ( स्थानीय ) समझना चाहिए । अन्यान्य कर्म्मो में जैसे प्रस्तर अनुप्रहरण किया जाता है वैसे ही इसे-आप्यायन का प्रस्तर अनुप्रहरण - कर्म्म समझना चाहिए - यही तात्पर्य्यं है । जो प्रस्तर बच जाता है - उसे अध्वर्यु अग्नीध्र को दे देता है । ग्रग्नीध्र उस अपशिष्ट प्रस्तर को जो कि दूसरे दिन काम में आने वाला है - जापते ( सावधानी ) से सुरक्षित स्थान पर रख देता है—. " अथाह समुल्लुप्य प्रस्तरम् अग्नीन्मदन्ति - श्रापा " ३ इति । मदन्तीत्यग्नी-दाह । ताभिरेहीत्युपर्य्युपर्य्यग्निमतिहरति । स यन्नानुप्रहरति; एतेन ह्यत ऊर्ध्वा न्यहानि प्रचरिष्यन्भवति । अथ यदुपर्य्युपर्य्यग्निमतिहरति; तदेवास्यानुप्रहृत-भाजनं भवति । तमग्नीधे प्रयच्छति । तमग्नीन्निदधाति ॥ २२ ॥
॥ इति अवान्तरदीक्षाब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति चतुर्थाध्याये तृतीयं ब्राह्मणम् समाप्तम् ॥ -8-[ ६२६ ]
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