Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 641–650

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 641–650

पृष्ठ 641

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चतुर्थाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणम् ' उपसदिष्टि ब्राह्मण ' [ मूल ] ग्रीवा वै यज्ञस्योपसदः । शिरः प्रवर्ग्यः । तस्माद्यदि प्रवर्ग्यवान्भवति प्रवरण प्रचर्याथोपसद्भिः प्रचरन्ति तद् ग्रीवाः प्रतिदधति ॥ १ ॥

तद्याः पूर्वानुवाक्या भवन्ति । ता अपराह्णे याज्या या याज्यास्ता अनुवाक्यास्तद्वयतिषजति तस्मादिमानि ग्रीवाणां पर्वारिण व्यतिषक्तानीमान्य-स्थोनि || २ || देवाश्च वाऽअसुराश्च । उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे ततोऽसुरा एषु लोकेषु पुरश्चक्रिरेऽयस्मयीमेवास्मिंल्लोके रजतामन्तरिक्षे हरिणों दिवि ॥ ३ ॥

तद्वै देवा श्रस्पृण्वत । तएताभिरूपसद्भिरुपासीदंस्तद्यदुपासीदंस्तस्मादु-पसदो नाम ते पुरः प्राभिन्दन्निमाँल्लोकान्प्राजयंस्तस्मादाहुरुपसदा पुरं जयन्तीति यदहोपासते तेनेमां मानुषीं पुरं जयन्ति ॥ ४ ॥

एताभिर्वै देवा उपसद्भिः । पुरः प्राभिन्दन्निमाँल्लोकान्प्राजयंस्तथोऽएवैष एतन्नाहैवास्मा s स्मिल्लोके कश्चन पुरः कुरुतऽइमानेवैतल्लोकान्प्रभिनत्तीमाँ-ल्लोकान्प्रजयति तस्मादुपसद्भिर्यजते ॥५ ॥

ता वाऽआज्यहविषो भवन्ति । वज्रो वाऽआज्यमेतेन वै देवा वज्रेरणा-ज्येन पुरः प्राभिन्दन्निमाँल्लोकान्प्राजयंस्तथोऽएवैष एतेन वज्रेणाज्ये नेमाँल्लोका-प्रभिनत्ती माँल्लोकान्प्रजयति तस्मादाज्यहविषो भवन्ति || ६ || स वाऽष्टौ कृत्वो जुह्वां गृह्णाति । चतुरुपभृत्यथोऽइतरथाहुश्चतुरेव कृत्वो जुह्वां गृह्णीयादष्टौ कृत्व उपभृतीति ॥७ ॥

स वाऽअष्टावेव कृत्वो जुह्वां गृह्णाति । चतुरुपभृति तद्वज्रमभिभारं करोति तेन वज्रेणाभिभारेणेमाँल्लोकान्प्रभिनत्ती माँल्लोकान्प्रजयति ॥८ ॥

[ ६३१ ]

पृष्ठ 642

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसंदिष्टि ब्राह्मण अग्नीषोमो वै देवानां सयुजौ । ताभ्यां साधं गृह्णाति विष्णव एका-किनेऽन्यतरमेवाधारमाघारयति यं स्रुवेण प्रतिक्रामति वाऽउत्तरमाघारमाघार्या-भिजित्याश्रभिजयानीति तस्मादन्यतरमेवाधारमाघारयति यं सुवेण ॥९ ॥

अथाश्राव्य न होतारं प्रवृणीते । सीद होतरित्येवाहोपविशति होता होतृषदन उपविश्य प्रसौति प्रसूतोऽध्वर्युः स्रुचावादत्ते ॥१० ॥

स आहातिक्रामन्नग्नयेऽनुब्रूहीति । आश्राव्याहाग्नि यजेति वषट्कृते जुहोति ॥११ ॥

अथाह सोमायानुब्रूहीति । श्राश्राव्याह सोमं यजेति वषट्कृते जुहोति ॥१२ ॥

अथ यदुपभृत्याज्यं भवति । तत्समानयमान ग्रह विष्णवेऽनुब्रूहीत्या-श्राव्याह विष्णुं यजेति वषट्कृते जुहोति ॥१३ ॥

स यत्समानत्र तिष्ठञ्जुहोति । न यथेदं प्रचरन्त्सञ्चरत्यभिजित्याऽग्रभि-जयानीत्यथ यदेता देवता यजति वज्रमेवैतत्संस्करोत्यग्निमनीकं सोमं शल्यं विष्णुं कुल्मलम् ॥१४ ॥

संवत्सरो हि वज्रः अग्निर्वाऽअहः सोमो रात्रिरथ यदन्तरेण तद्विष्णुरेतद्वै परिप्लवमानं संवत्सरं करोति ॥ १५ ॥

संवत्सरो वज्रः । एतेन वै देवाः संवत्सरेण वज्रेण पुरः प्राभिन्दनिमाँ-ल्लोकान्प्राजयंस्तथोऽएवैष एतेन संवत्सरेण वज्रेणेमाँल्लोकान्प्रभिनत्तीमल्लो-कान्प्रजयति तस्मादेता देवता यजति ॥१६ ॥

सवै तिन उपसद उपेयात् । त्रयो वाऽऋतवः संवत्सरस्य संवत्सरस्यै -वैतद्रूपं क्रियते संवत्सरमेवैतत्संस्करोति द्विरेकया प्रचरति द्विरेकया ॥१७ ॥

ताः षट् सम्पद्यन्ते । षड्वाऽऋतवः संवत्सरस्य संवत्सरस्यैवैतद्रूपं क्रियते संवत्सरमेवैतत्संस्करोति ॥१८ ॥

[ ६३२ ]

पृष्ठ 643

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मणे यद्यु द्वादशोपसदऽउपेयाद् । द्वादश वै मासाः संवत्सरस्य संवत्सरस्यैवंत-द्रूपं क्रियते संवत्सरमेवैतत्संस्करोति द्विरेकया प्रचरति द्विरेकया ॥१ ९ ॥ ताश्चतुर्विंशतिः सम्पद्यन्ते । चतुर्विंशतिर्वै संवत्सरस्यार्धमासाः संवत्स-रस्यैवैतद्रूपं क्रियते संवत्सरमेवैतत्संस्करोति ॥२० ॥

स यत्सायम्प्रातः प्रचरति । तथा ह्येव सम्पत्सम्पद्यते स यत्पूर्वाह्न प्रचरति तज्जयत्यथ यदपराह्णे प्रचरति सुजितमसदित्यथ यज्जुहोतीदं वै पुरं युध्यन्ति तां जित्वा स्वां सतीं प्रपद्यन्ते ॥२१ ॥

स यत्प्रचरति । तद्युध्यत्यथ यत्सन्तिष्ठते तज्जयत्यथ यज्जुहोति स्वामे -वैतत्सत प्रपद्यते ॥२२ ॥।

स जुहोति । यया द्विरेकस्याह्नः प्रचरिष्यन्भवति या तेऽअग्नेऽयः शया तनूर्वषिष्ठा गह्वरेष्ठा । उग्रं वचोऽअपावधीत्त्वेषं वचोऽपावधीत्स्वाहेत्येवंरूपा हि सासदयस्मयी हि साऽऽसीत् ॥२३ ॥

अथ जुहोति । यया द्विरेकस्याह्नः प्रचरिष्यन्भवति या ते अग्ने रजःशया तनूर्वषिष्ठा गह्वरेष्ठा । उग्रं वचोऽप्रपावधीत्त्वेषं वचोऽप्रपावधीत्स्वाहेत्येवंरूपा हि सासीद्रजता हि साऽऽसीत् ॥२४ ॥

श्रथ जुहोति । यया द्विरेकस्याह्नः प्रचरिष्यन्भवति या ते अग्ने हरिशया तनूर्वषिष्ठा गह्वरेष्ठा । उग्रं वचो अपावधीत्त्वेषं वचोऽअपावधीत्स्वाहेत्येवंरूपा हिसा ss सीद्धरिणी हि साऽऽसीद्यद्यु द्वादशोपसद उपेयाच्चतुरहमेकया प्रचरेच्चतुरह-मेकया ॥२५ ॥

अथातो व्रतोपसदामेव । परउर्वीर्वाऽअन्या उपसदः परोऽह्वीरन्याः स यासामेकं प्रथमाहं दोग्ध्यथ द्वावथ त्रींस्ताः परउर्वीरथ यासां त्रीन्प्रथमाहं दोग्ध्यथ द्वावथैकं ताः परोऽह्वीर्या वै परोऽह्वीस्ताः परउर्वीर्याः परउर्वीस्ताः परोऽह्वीः ॥२६ ॥

[ ६३३ ]

पृष्ठ 644

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण तपसा वै लोकं जयन्ति । तदस्यैतत्परः पर एव वरीयस्तपो भवति परः परः श्रेयांसं लोकं जयति वसीयानु हैवास्मिँल्लोके भवति य एवं विद्वान्परोऽह्वी-रुपसद उपैति तस्मादु परोऽह्वीरेवोपसद उपेयाद्यद्यु द्वादशोपसद उपेयान्त्रींश्च-तुरहं दोहयेद् द्वौ चतुरहमेकं चतुरहम् || २७ || [ अनुवाद ] प्रकृतियज्ञ की तरह यजमान आहुति द्वारा नवीन दिव्यात्मा उत्पन्न करता है । यह दिव्यात्मा ही यज्ञ से उत्पन्न होने के कारण यज्ञात्मा कहलाता है । इस नवीन दिव्यात्मा की गिनती स्वर्ग के देवताओं में है । इस दिव्यात्मा ( यज्ञ से उत्पन्न होने से यज्ञात्मा ) से बद्ध होने के कारण ही यजमानात्मा स्थूलशरीरत्यागानन्तर स्वर्ग में चला जाता है । पुरुष के समान ही इस यज्ञात्मा के भी मस्तक, ग्रीवा, हस्त, पाद आदि अवयव होते हैं 1 । इनमें इस यज्ञात्मा का मस्तक प्रातिथ्य है, जिसका निरूपण " शिरो वै यज्ञस्यातिथ्यम् " इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा आतिथ्येष्टि में कर दिया गया है । अर्थात् आतिथ्य कर्म में जो आहुति दी जाती है उस से यज्ञात्मा का मस्तक बनता है । केवल आतिथ्य ही यज्ञात्मा का मस्तक नहीं है, अपितु प्रवर्ग्य भी यज्ञात्मा का मस्तक है । इसी बात को बतलाने के लिए एक कथानक का यहाँ निरुपण किया जा रहा हैः-एक समय भगवान् विष्णु महामायारूप निद्रा के वशीभूत होकर प्रत्यञ्चा का सिर-हाना ( शिरोघान ) लगा कर सो रहे थे । विष्णु ही जगत् के पालनकर्ता हैं । उन्हें घोर निद्रा में निमग्न देख कर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को चिन्ता हुई कि सृष्टि का पालन कैसे होगा । अतः उन्होंने विष्णु को जगाने के लिए उपाय करते हुए एक दीमक नामक कीट को उत्पन्न किया तथा उसको आज्ञा दी कि तुम विष्णु के सिरहाने लगी हुई इस प्रत्यञ्चा को काट दो जिस से भगवान् विष्णु जग जायेंगे । दीमक ने उस आज्ञा का पालन किया किन्तु उसका फल यह हुआ कि प्रत्यच्चा के कट जाने से विष्णु का मस्तक कट कर आकाश में चला गया । तब ब्रह्मा ने अश्व का मस्तक काट कर विष्णु के धड़ के साथ उसका सन्धान कर दिया । यही भगवान् हयग्रीव कहलाये । कटे हुए विष्णु के मस्तक का सन्धान करने के लिए जो यज्ञ किया था वही प्रवर्ग्ययाग कहलाता है । शिरोयाग को धर्मयाग व महावीरोपासना भी कहा जाता है । यद्यपि दीक्षा, सुत्या, उपसत् यह क्रम होने से दीक्षा के बाद सुत्या ( ग्रहयाग ) होनी चाहिए न कि उपसत्, तथापि विशेष कारणवश दीक्षा के बाद उपसत् इष्टि की जाती है । इसीलिए सूत्रकार कात्यायन ने ' प्रवयपसदोवत: ' इस सूत्र के द्वारा दीक्षा के बाद प्रवर्ग्य और उपसत् इष्टि का विधान बतलाया है । प्रथम याग के समय आतिथ्य कर्म ही यज्ञ का मस्तक है— ' शिरो वा एतद् यज्ञस्य यदातिथ्यम् ' किन्तु दूसरी बार या तीसरी बार [ ६३४ ]

पृष्ठ 645

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण या उससे भी अधिक बार ग्रहयाग करने पर प्रवर्ग्ययाग ही यज्ञ का मस्तक है; जैसा कि ' ग्रीवा वै यज्ञस्योपसदः शिरः प्रवर्ग्य: ' इस उक्ति के द्वारा बतलाया गया है । और आतिथ्य कर्म प्रवर्ग्य का अङ्ग बन जाता है । इस प्रकार यज्ञ में प्रातिथ्येष्टि के बाद प्रवर्ग्ययाग करना या न करना ये दो पक्ष हैं । प्रथम ग्रहयाग में प्रवर्ग्ययाग नहीं किया जाता है तथा दुबारा तिबारा ग्रहयाग करते समय आतिथ्य के अनन्तर प्रवर्ग्य किया जाता है । इन दोनों पक्षों में महर्षि ऐतरेय ने प्रथम पक्ष को लक्ष्य में रख कर प्रातिथ्य को ही यज्ञ का मस्तक माना है-जैसा कि ' शिरो वा एतद् यज्ञस्य यदातिथ्यं ग्रीवा उपसद: ' ( ऐ. ब्रा. ४ अध्याय ८ खण्ड ) इस वचन से सिद्ध है । परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य दूसरे पक्ष को मान कर ' ग्रीवा वै यज्ञस्योपसदः शिरः प्रवर्ग्य: ' इस उक्ति के द्वारा प्रवर्ग्य को यज्ञ का मस्तक बतला रहे हैं । इसी का स्पष्टी-करण करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यदि यजमान प्रवर्ग्यवान् होता है तो प्रवर्ग्य से प्रचरण करके अर्थात् पहिले प्रवर्ग्ययाग करके बाद में उपसदिष्टि करे । तात्पर्य यह है कि आतिथ्य व प्रवर्ग्य दोनों ही यज्ञ के मस्तक हैं । इन प्रातिथ्य व प्रवर्ग्य से यज्ञात्मा का मस्तक बनता तथा उपसत् से यज्ञ की ग्रीवा बनती है । यज्ञ की ग्रीवा विष्णु, सोम व अग्नि तीनों से बनती है । विष्णु १२ आदित्यों में अन्तिम आदित्य हैं । वह द्युलोक की वस्तु हैं । सोम अन्तरिक्ष की वस्तु है तथा अग्नि पृथिवीलोक की वस्तु है । इस प्रकार त्रिलोकी के प्राणों से यज्ञात्मा की ग्रीवा का निर्माण होता है । उपसत् में इन्हीं तीनों देवताओं का यजन किया जाता है । प्रातिथ्यकर्म अथवा प्रवर्ग्ययाग के बाद उपसत् करता हुआ यजमान यज्ञ पुरुष के मस्तक में ग्रीवा का सन्धान करता है ॥१ ॥

उपसदिष्टि में ग्रग्नि, सोम व विष्णु तीनों देवताओं का यजन प्रातःकाल व सायंकाल दोनों समय होता है । यजन में अनुवाक्या व याज्या दोनों होते हैं । अनुवाक्या मन्त्र के याज्या पूर्ववर्ती होने से अनुवाक्या को ही पुरोऽनुवाक्या कहा गया है । उपर्युक्त तीनों देवताओं के अनुवाक्या मन्त्र व याज्या मन्त्र भिन्न - भिन्न हैं । इसी प्रकार ' इदं विष्णुविचक्रमे मेधा निदधे पदम् । समूहमस्य पांसुरे ' - यह विष्णु का अनुवाक्या मन्त्र है तथा ' त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गावया प्रदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् " - यह विष्णु का याज्या मन्त्र है । किन्तु विशेषता यह है कि प्रातः काल जो अनुवाक्या मन्त्र हैं वे सायं काल याज्या बन जाते हैं तथा जो प्रातः याज्यामन्त्र हैं वे सायं काल अनुवाक्या मन्त्र बन जाते हैं । इस विपर्यास से अनुवाक्या मन्त्र व याज्यामन्त्र परस्पर सम्बद्ध हो जाते हैं । इन्हीं अनुवाक्या याज्यामन्त्रों से क्रमशः जो ग्रीवा की स्थूल अस्थियाँ व सूक्ष्म अस्थियाँ बनती हैं वे परस्पर सुश्लिष्ट व सुसम्बद्ध हो जाती हैं । मूल में ' तस्मादिमानि ग्रीवाणां पर्वारिण व्यतिषक्तानी-[ ६३५ ]

पृष्ठ 646

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तृतीय काण्ड ( अ ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण मान्यस्थीनि ' - इस वाक्य में पर्वशब्द से प्रसिद्धिवशात् कोई अङ्गुलि की अस्थियों को न समझ ले- अत: स्पष्ट प्रतिपत्यर्थ ' पर्वारिण ' के बाद ' इमानि अस्थीनि ' का प्रयोग कर दिया है || २ || परमेष्ठी के तपोधन होने से ही परमेष्ठी को आसुर मण्डल कहा जाता है । प्रकाश-धन होने से सूर्य को देवमण्डल कहा जाता है । प्रकाशमय व तमोमय प्राणों के विरोधी होने से देवता व असुरों में सदा से संघर्ष चला आ रहा है । असुरों ने पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोकरूप पृथिवी पर अपना अधिकार करने के लिए तीनों लोकों में क्रमशः लौहमयी, राजती तथा हिरण्मयी तीन पुरियों अर्थात् तीन दुर्गों का निर्माण कर उन पर अपना अधि-कार कर लिया । पृथिवी कृष्णवर्णा है । अतः उसके केन्द्र से काली किरणें निकला करती हैं । त्रिवृत्स्तोम तक पृथिवी का प्रारण धन होने से अधिक काला है । उसे ही पृथ्वी लोक कहते हैं । उसी से कृष्णवर्ण लोहा बनता है । उससे आगे विशकलित होने से वह तरला-वस्था में परिणत हो जाता है । १५ वें स्तोम तक जो पृथिवी की तरलावस्था है उसे ही अन्तरिक्ष लोक कहते हैं । अन्तरिक्ष लोक का अधिष्ठाता वायु है । यह वायु सूर्य से आने वाले रुद्र प्राण को पिघला देता है । उस पिघले हुए रुद्र प्रारण तथा तरलावस्थापन्नवायुमुक्त आसुर प्राण से चाँदी बनती है । इसमें प्रान्तरिक्ष्य चन्द्रमा का श्वेतवर्ण भी मिल जाता है । अतः उससे उत्पन्न चाँदी सफेद होती है । १५ वें स्तोम से आगे यह पार्थिव कृष्ण अधिक विकसित हो कर विरलावस्था में आ जाता है । इसमें पृथिवी की कालिमा बहुत कम रह है । पृथिवी की यह विरलावस्था ही द्युलोक कहलाती है । द्युलोक में सूर्य्य की सत्ता है और सूर्य्य हिरण्मय है । इस हिरण्मय सूर्य्य की किरणों के सम्पर्क से द्यलोक की पुरी या दुर्ग हिरण्मय हो उठते हैं । पृथिवी में बद्ध सूर्य्य- रश्मियाँ ही सुवर्ण कहलाती हैं । इसीलिए वैशेषिकों ने भी सुवर्ण को तेजस बतलाया है । पृथिवी के कृष्ण वर्ण - रश्मिरूप असुरों ने इस प्रकार घन, तरल, विरल अवस्था - भेद से आयसी, राजती तथा हिरण्मयी पुरियाँ बना कर त्रिवृत्, पञ्चदश, एकविंश सोमरूपा स्तौम्या त्रिलोकी में अपना अधिकार कर लिया || ३ || अधिकार को देवता न सह सके । उन्होंने क्रोधा-असुरों के इस प्रकार त्रैलोक्य पर विष्ट होकर असुरों के इन तीनों पुरों को नष्ट कर दिया । उन्होंने असुरों के तीनों पुरों को नष्ट - भ्रष्ट कर अपने तीन पुर बनाये और उनमें वे प्रतिष्ठित हो गए । किन्तु पृथिवी का जो आधा भाग सूर्य्य के सम्मुख होता है उस पर सूर्य्य की श्वेतरश्-ि मयों के पड़ने से अन्धकार का सर्वथा विनाश हो जाता है, इसी को सूर्य्यरश्मिरूप प्रकाशी प्रारण के वर्चस्व को - देवताओं का असुरों की पुरियों का नाश करना व अपने अधिकार में उन्हें कर लेना कहा जाता है । तात्पर्य्य यह है कि पुर तो वे ही रहे जिनमें तमोमय आसुर प्राणों की सत्ता थी किन्तु असू के प्रकाश की व्याप्ति के कारण उन से तम का सर्वथा विनाश होकर प्रकाशी प्राण की सत्ता हो गई । यही असुरों की तीनों पुरियों का विनाश तथा उन पुरियों पर देवताओं [ ६३६ ]

पृष्ठ 647

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण की विजय है । अतः ' उपासीदन् देवता श्रभि: - इस व्युत्पति से वे पुरियाँ उपसद् कहलाने लगीं । इसीलिए इस रहस्य के अभिज्ञ लोग कहते हैं कि देवताओं ने इन उपसदों के द्वारा असुरों की तीन पुरियों को तोड़ कर नष्ट भ्रष्ट कर दिया, उनको जीत लिया । किन्तु इस समय वैध यज्ञ में इस यजमान का कोई शत्रु नहीं है अतः उपसद् इष्टि करने की क्या आवश्यकता ? तथापि आगे कोई शत्रु हो सकता है, वह भी नहीं रहे, इसलिए इस वैध यज्ञ में भी प्रकृति-भाग की तरह उपसदिष्टि की जाती है । इसीलिए भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है – “ तस्मा-दाहुरुपसदा पुंरजयतीति यदहोपासते तेनेमा मानुषीं पुरं जयन्ति " इति || ४ || प्रकृति में प्राण - देवताओं ने तथा भौमस्वर्ग में मनुष्य देवताओं ने इन्हीं उपसदों के द्वारा असुरों के पुरों को नष्ट किया तथा इन्हीं उपसदों से उन असुरों पर विजय प्राप्त की । उसी प्रकार उपसद् याग करने वाले यजमान का त्रिलोकी में कोई शत्रु नहीं रहता । अतः शत्रु - पुरों को नष्ट करने के लिए तथा उन पर विजय प्राप्त करने के लिए यजमान उपसदों से, अग्नि व विष्णु का यजन करता है ॥ ५ ॥

अग्नि, सोम व विष्णुरूप उपसद् देवताओं का यजन करते समय उन्हें श्राज्य की हवि दी जाती है न कि पुरोडाश की । क्योंकि ओषधियों को खाकर तथा जल पीकर गायें दूध देती हैं, अतः वह दुग्ध सोमात्मक है और उससे उत्पन्न प्राज्य भी सोम है । देवताओं ने सोम रूप वज्र के द्वारा असुरों के पुरों का भेदन किया था तथा उन्हें जीता था । आज यजमान भाज्य हवि की आहुति देता हुआ आज्यरूप वज्र के द्वारा शत्रु पुरों का भेदन करता है,

तथा उन्हें जीत लेता है । अतः प्राज्य की हवि देनी चाहिए ॥ ६ ॥

जिस आज्य की आहुति दी जाती है । वह प्राज्य ध्रुवा पात्र में रहता है । ध्रुवा पास जुहू व उपभृत् रखे रहते हैं । घृत की प्राहुति जुहू से दी जाती है । जुहू पात्र के नीचे उपभृत् पात्र रहता है । वह इसलिए है कि जुहू से घृताहुति देते समय यदि घृत कुछ बिखर जाय तो वह उपभृत् में गिरे न कि नीचे जमीन पर । एक- एक देवता को चार - चार बार घृत देना पड़ता है; और उपसद् भाग में अग्नि, सोम व विष्णु तीन देवता हैं — अतः १२ बार घृत देना पड़ता है । इसमें दो मत हैं । एक सम्प्रदाम वाले आठ बार जुहू घृत का ग्रहरण करते हैं और चार वार उपभृत् में दूसरे सम्प्रदाय वाले इस से विपरीत चार बार जुहू में घृत लते हैं तथा आठ बार उपभृत् में ॥७ ॥

भगवान् याज्ञवल्क्य का कथन है कि आठ वार जुहू में तथा चार वार उपभृत् में घृत लेना चाहिए । क्यों कि आहुति जुहू से दी जाती है अतः वह अग्रभाग है तथा उपभृत् मूल भाग है । शस्त्र का मूल भाग पतला होने से वह अच्छी तरह पकड़ में आ सकता है तथा अग्रभाग भारी होने से गहन प्रहार कर सकता है । अतः शत्रुपुरों का अधिक चोट के द्वारा अच्छी तरह भेदन कर सकता है तथा शत्रुओं को भली प्रकार जीत लेता है । इसी से जुहू में आठ बार तथा उपभृत् में चार बार घृत ग्रहण करना चाहिए ॥८ ॥

[ ६३७ ]

पृष्ठ 648

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण जुहू में आठ बार तथा उपभृत् में चार बार घृत ग्रहण करने का दूसरा कारण भी बतला रहे हैं । क्यों कि अग्नि और सोम साथ रहने वाले देवता हैं अतः उन दोनों की एक साथ ही हवि देनी है । विष्णु एकाकी है अतः उपभृत् में उसके लिए पृथक् चार बार घृत ग्रहण किया जाता है । उपसद् भाग विकृति भाग है और विकृति भाग में भी प्रकृतिभाग की तरह पूर्बाधार व उत्तराधार दोनों प्राप्त हैं । किन्तु इस विकृतिभाग में स्रुक् द्वारा उत्तरा-घार नहीं करना चाहिए क्यों कि उत्तराधार के बाद शत्रु को जीत कर लौटना पड़ता है । जिस में शत्रु को पीठ दिखाई जाती है; अतः वह पराजय के समान है । अतः पूर्वाधार ही करे ॥ ॥ कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड, ज्ञानकाण्ड भेद से त्रिधा विभक्त वेद में कर्मकाण्डरूप मीमांसा में पुरुषार्थ तथा क्रत्वर्थ भेद से कर्म द्विधा विभक्त है । ऋत्वर्थ कर्मों को अङ्ग कर्म व आरभ्याधीतविधि कहते हैं । पुरुषार्थंकर्म प्रर्थात् प्रधान कर्म को प्रकृतियाग कहा जाता है तथा क्रत्वर्थक कर्मों या अङ्गकर्मों को विकृतियाग कहते हैं । “ प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या " इस सिद्धान्त के अनुसार विकृतियाग में प्रकृतियाग की तरह कर्मों का विधान है । किन्तु प्रकृतियाग के सारे कर्म विकृतियाग में नहीं होते । कुछ प्रकृतियाग की अपेक्षा नवीन कर्म भी विकृतियाग में होते हैं । जैसे प्रकृत में ग्रह याग में होने वाला श्रावरण कर्म उपसद्याग रूप विकृतियाग में होता है; किन्तु ग्रहयाग में होने वाला होतृवरणकर्म उपसयाग में नहीं होता । जो कर्म किया जाता है उसे देवताओं को सुना देना आश्रावण कर्म होता है । उप-सद्यागरूप अवान्तर कर्म में श्राश्रावण आवश्यक है । किन्तु ऋत्विक् प्रवान्तर कर्म में भी वे ही रहते है जो कि प्रधान कर्म में । अतः होतृवरण कर्म की उपसद्याग में आवश्यकता नहीं है 1 । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है- " प्रथाश्राव्य होतारं न प्रवृणीते " इति । आश्रावण कर्म में अध्वर्यु, आग्नीध्र व होता ये तीन ऋत्विक् सम्मिलित रहते हैं । सर्वप्रथम होता अनुवाक्या मन्त्र बोल कर आग्नीध्र को " प्रश्रावय " ऐसा कहता है । तब आग्नीध्र कहता है “ अस्तु श्रौषट् " इति । श्राश्रावण कर्म में " ओश्रावय " अस्तु श्रौषट् ', ' यज: ' ‘ ये यजामहे, ' वौषट् ' ये १७ अक्षर होते हैं । इस अश्राव्या कर्म के बाद अध्वर्यु होता को कहता है - ' सी होत: ' तब होता होतृषदन पर बैठ कर होता श्रध्वर्यु को प्राज्ञा देता है । यह कर्म “ प्रसव ” कहलाता है । तत् पश्चात् होता से प्रसव प्राप्त कर अध्वर्यु यज्ञ के लिए जुहू और उपभृत् को ग्रहण कर लेता है ॥१० ॥

अध्वर्यु जब कर्म नहीं करता है तब वेदी के उत्तरभाग में होतृषदन से पूर्व में बैठा रहता है । और कर्म करते समय उत्तर से वेदि के दक्षिण भाग में ब्रह्मा से पूर्व आहवनीय के पास आकर बैठता है क्योंकि आहुति आहवनीय में ही देनी होती है । अतः उपसद्याग में अग्नि आदि देवताओं को आहुति देने के लिए वेदी के दक्षिण भाग में आता हुआ अध्वर्यु होता से अग्नि के लिए अनुवाक्या करने को कहता है । देवता का आवाहन मन्त्र अनुवाक्या कहलाता है । [ ३३८ ]

पृष्ठ 649

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण उससे अग्नि का आवाहन करता है । पश्चात् होता आग्नीध्र को " ओश्रावय " इस रूप से आश्रावण करने के लिए कहता है । आग्नीध्र द्वारा " अस्तु श्रौषट् " इस रूप से आश्रावण कर देने पर होता अध्वर्युं से ' अग्नि यज ' - अग्नि देवता का यजन करो - ऐसा कहता है । इसके बाद होता जब “ वौषट् ” का उच्चारण करता है तब अध्वर्यु अग्नि के लिए आहुति दे देता हैं ॥ ११ ॥

अग्नि के लिए आहुति देने के बाद अध्वर्यु होता से सोम के लिए अनुवाक्या करने के लिए कहता है । अनुवाक्या करने के बाद होता अग्नीध्र को प्रो श्रावय इस रूप से सोम के लिए श्रावण करने के लिए कहता है । अग्नीध्र के द्वारा ' अस्तु श्रौषट् ' इस रूप से आश्रावण करने के बाद होता अध्वर्यु से सोम का यजन करने के लिए कहता है । और सोम के लिए आहुति देने के लिए अध्वर्यु के तैयार हो जाने पर जब होता ' वौषट् ' का उच्चा-रण करता है तव अध्वर्यु सोम के लिए आहुति दे देता है ॥ १२ ॥

उपर्युक्त दोनों आहुतियाँ स्रवा से जुहू में प्राठ बार घृत ले कर दी गई हैं । अग्निव सोम दोनों के लिए आधा - आधा करके अर्थात् चार - चार बार आहुति दी गई है । अब विष्णु के लिए आहुति देनी है । विष्णु को आहुति देने के लिए उपभृत में से घृत लेना होता है; किन्तु आहुति जुहू से ही होती है । जुहू में घृत लेता हुआ अध्वर्यु होता से विष्णु के लिए अनुवाक्या करने को कहता है । अनुवाक्या करने के बाद होता अग्नीध्र से आश्रावण करने के लिए कहता है । आश्रावण के बाद होता अध्वर्यु से ' विष्णुं यज ' ' विष्णु ' का यजन करो ऐसी आज्ञा देता है । पश्चात् अध्वर्यु होता के द्वारा वौषट् का उच्चारण करने पर विष्णु के लिए उस घृत की आहुति दे देता है ॥१३ ॥

वेदी पर प्रस्तर रहता है और उसमें हवि रक्खी रहती है । प्रकृतिभाग में अध्वर्यु जब हवि की आहुति देता है तब वेदी के दक्षिण देश में आ जाता है । ' प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या ' - किन्तु इस उपसदिष्टि - रूप विकृति भाग में अध्वर्यु ग्राहवनीय के दक्षिण प्रदेश में ही खड़ा रह कर तीनों देवताओं के लिए आहुति देता है । उस दूसरी आहुति के समय " प्रत्या-क्रमण " ( प्रत्यावर्तन ) नहीं करना पड़ता; क्योंकि उपसद् भाग में असुरों पर विजय प्राप्त करने के लिए तीनों देवताओं की आहुति दी जाती है । एक आहुति के बाद प्रत्याक्रमण करना ( पीछे लौटना ) पराजय होगा अतः " प्रत्याक्रमण " ( प्रत्यावर्तन ) नहीं करना चाहिए अध्वर्यु इस उपसदिष्टि में अग्नि, सोम व विष्णु इन तीनों देवताओं का यजन करता है । वह संवत्सराग्निरूप वज्र का असुरों के विनाश के लिए संस्कार करता है । स्तौम्यत्रिलोकी एकविंशनी ही घु लोक है । और यही उसी संवत्सराग्नि का अन्तिम पुच्छ भाग है, कुल्मल है । वह पुच्छ भाग विष्णु देवताक है जैसे कि संवत्सराग्नि का मुखभाग अग्निदेवताक तथा मध्यभाग सोमदेवताक है । असुर विनाशक इस संवत्सराग्निरूप वज्र का निर्माण अग्नि, सोम और विष्णु इन तीनों देवताओं से होता है । इस संवत्सराग्निरूप वज्र में ८ वसु, ११ रुद्र, [ ६३ ९ ]

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 650 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मरण १२ आदित्य तथा २ अश्विनीकुमार - रूप सांध्यदेवता इन ३३ देवताओं की सत्ता है । जिन आदि का देवता अग्नि है क्या अन्तिम देवता १२ आदित्यों में विष्णु है इसीलिए शतपथ में कहा है - ‘ अथ यज्ञो देवता यजति वज्रमे वैतत संस्करोति, अग्निमनीकं सोमं शल्यं, विष्णुं कुल्मलम् इति ' ॥१४ ॥

पृथिवी केन्द्र से निकल कर एकविंश स्तोम तक वितत रहने वाला संवत्सराग्नि या संवत्सरमण्डल ही तमोमय असुरों का विनाशक वज्र है । अग्नि में सोम की आहुति ही यज्ञ है । किन्तु दिक्ात्रिरूप अग्नि- सोम का सम्बन्ध कराने वाला विष्णु प्राण इन दोनों के मध्य में रहता है । विष्णु ही यज्ञ है । जैसा कि ' यज्ञों वै विष्णुः ' विष्णुर्वै यज्ञः ' इत्यादि ब्राह्मण श्रुतियाँ बतला रही है । संवत्सराग्नि ही तमोमय असुरों का विनाशक है, अतः वज्र है । अतः इन तीनों देवताओं का संवत्सररूप ही वज्र का संस्कर्ता कहा गया है ॥ १५ ॥

इसी संवत्सराग्नि- वज्र से प्रारणदेवताओं तथा भौमस्वर्गवासी मानवदेवताओं ने तमोमय असुरों की तीनों पुरियों को नष्ट कर दिया और उन पर विजय प्राप्त कर ली । इसी प्रकार आज यह यजमान इस संवत्सर - वज्र से स्तौम्य त्रिलोकी आदि तीनों लोकों की कठिनता को नष्ट करता है और जीत लेता है । इसीलिए वह संवत्सररूप वज्र का संस्कार करने वाले अग्नि, सोम व विष्णु - इन तीनों देवताओं का यजन किया करता है ॥१६ ॥

वह यजमान तीन उपसत् करे । क्यों कि संवत्सररूप वज्र का संचार करने के लिए ही अग्नि, सोम विष्णु इन तीनों देवताओं का यजन करता है । संवत्सर में ग्रीष्म शरद व वर्षा ऋतुएँ होती हैं । इनमें ग्रीष्म ऋतु का अधिष्ठाता अग्नि, शरद ऋतु का अधिष्ठाता सोम तथा वर्षा का अधिष्ठाता विष्णु है । तीनों देवताओं का यजन ग्रीष्म, वर्षा, शरद इन तीनों ऋतुनों का संस्कार है और संवत्सर ऋतुत्रयसमष्टि ही है । तीनों देवताओं के यजन से एक उपसत् का स्वरूप बनता है । ऐसी उपसत् एक दिन में प्रातः सांय ही करनी पड़ती है । तीन दिन तक उपसत् याग होता है । यही बात ' द्विरेकया ' इस वीप्सा के द्वारा बतलायी गई है ॥१७ ॥

उपर्युक्त रीति से तीन दिनों में ६ उपसत् हो जाते हैं । संवत्सर में वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा शरद, हेमन्त, शिशिर, ये ६ ऋतुएँ होती हैं । ६ उपसदों द्वारा ६ हों ऋतुओं का संस्कार हो जाता है । और ६ ऋतुओं की समष्टि ही संवत्सर है । इस रीति से षड्ऋतुसमष्टि संवत्सर-रूप वज्र का संस्कार हो जाता है ॥ १८ ॥

कितने ही याज्ञिकों का मत है कि १२ उपसदें करनी चाहिए । क्योंकि एक संवत्सर में १२ मास होते हैं । इस तरह द्वादश मासों का संस्कार हो जाता है और द्वादशमाससमष्टि ही संवत्सर है । इस प्रकार १२ उपसत्सकर्म करने से संवत्सर का संस्कार हो जाता है । उपसत्कर्म दिन में दो बार करने चाहिएँ जैसा कि तीन उपसत् पक्ष में बतलाया गया है ॥ १६ ॥

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