Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 651–660

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 651–660

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्रह्मण १२ उपसत् कर्मों को दिन में दो बार करने से २४ उपसत् कर्म हो जाते हैं । मास संवत्सर में २४ अर्ध होते हैं । २४ अर्धमासों का उपसद् द्वारा संस्कार करने से २४ अर्धमास समष्टिरूप संवत्सर का संस्कार हो जाता है ॥ २० ॥

यजमान सायंकाल व प्रातःकाल आनुपूर्वी से समाप्ति पर्यन्त जो उपसद्याग करता है उस से सम्पत्ति को प्राप्त कर लेता है । यजमान जो पूर्वाह्न में उपसद्याग करता है उस से शत्रु को जीत लेता है और अपराल में जो उपसद्याग करता है उस से उस पर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त कर लेता है । शत्रु को साकल्येन जीत लेना ही वास्तविक सम्पत्ति - प्राप्ति है । इसलिए प्रातः व सायं अर्थात् पूर्वाह्ण तथा अपराह्न में उपसद्याग किया जाता है । दोनों उपसद्यागों द्वारा शत्रु की सम्पत्ति पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेने के बाद सायं-कालिक उपसयाग के बाद एक उपसद् होम और किया जाता है । खड़े हो कर जो हवन किया जाता है उसे याग कहते हैं और बैठ कर जो हवन किया जाता है उसे होम कहते हैं । उपसद् होम के द्वारा यजमान शत्रु- सम्पत्ति पर अपना पूर्ण अधिकार कर लेता है । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि - ' अथ यज्जुहोति इदं वै पुरं युध्यन्ति तां जित्वा स्वां सतीं प्रपद्यन्ते ' इति ॥ २१ ॥

अध्वर्यु जो प्रचरण करता है ( अर्थात् प्रातः कालिक उपसद्याग करता है ) वह शत्रु के साथ युद्ध करता है और जो सायंकाल उपसद्याग करता है उस से शत्रु पर विजय प्राप्त कर लेता है । जो उपसहोम करता है उससे शत्रु- सम्पत्ति पर अपना अधिकार कर लेता है ॥२२ ॥

उपसद् होम भी उपसद्याग की तरह एक दिन में दो बार किया जाता है । प्रथम दिन के उपसहोम के लिए निम्न मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए: -" या ते ऽअग्नेऽयः शया तनूर्वषिष्ठा गह्वरेष्ठा । उग्रंवचो अपावधीत्त्वेषं वचोऽपावधीत् स्वाहा " ॥ इति । अर्थात् हे अग्नि! जो तुम्हारी श्रयः तनू ( शरीर ) शया ( लोहमयी ) है जो कि वर्षिष्ठा ( बहुत विशाल ) है और गह्वरेष्ठा ग्रर्थात् अन्धकारमयी है वह तनू मेरे जो उग्र तथा त्वेष वचन हैं उन्हें नष्ट कर दे । ऐसे ग्राप के लिए स्वाहा है । उग्र तथा त्वेष वचनों का स्वरूप तैत्तिरीय में बतलाया गया है । चूँकि लोहा श्रग्नि का शरीर है अतः हे अग्नि! असुरों की लोहमयी पुरी के अधिष्ठाता आप ही हैं । अतः आप इसे तोड़ दें । तात्पर्य यह है कि हम शत्रु के लोहमय किले में घिरे हुए भूख - प्यास से व्याकुल होकर चिल्ला रहे हैं तथा शत्रु के प्रहार से वेदनायुक्त चीत्कार कर रहे हैं | आप हमारी इन दोनों प्रकार की चिल्ला-हटों को दूर कर दें । ये दोनों प्रकार के वचन ही उग्र एवं त्वेष वचन हैं । जैसा कि [ ६४१ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण तैत्तिरीयश्रुति में बतलाया गया है: - ' प्रशनायापिपासेह ' वा उग्रं वचः एनश्च वैरहायञ्च त्वेषं वचः इति ' ॥ २३ ॥

दूसरे दिन जाने वाले उपसद्होम मन्त्र है - " याते अग्ने रजः शया....... " वचोऽअपावर्धीत् स्वाहा ' इस मन्त्र का अर्थ भी पूर्व मन्त्र के समान हीं है । केवल इतना अन्तर है कि पहिला पुर लौहमय था और यह रजत का बना हुआ था । इसीलिए मन्त्र में अग्नि की इस तनू को ' रजःशया ' कहा जाता है । यह दूसरे दिन का उपसहोम दिन में दो बार अर्थात् प्रातः व सायं किया जाता है ॥२४ ॥

तीसरे दिन जो उपसद् होम किया जाता है वह भी पूर्ववत् दिन में प्रातः व सायं दो बार किया जाता है । उस उपसद् होम का मन्त्र है— “ या तेऽअग्ने हरिशया... वचोऽअपावधीत् स्वाहा " इति असुरों की यह पुरीहरिणी अर्थात् हिरण्मयी थी । अतः मन्त्र में ' हरिशया ' पद दिया गया है । मन्त्रार्थं पूर्ववत् ही है । उपसद् करनी चाहिए । प्रथम दिन दोनों समय प्रथम मन्त्र का, द्वितीय दिन दोनों समय दूसरे मन्त्र का तथा तृतीय दिन दोनों समय तृतीय मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए क्यों कि एक दिन में दोनों समय एक ही देवता के लिए उपसंद् होम होगा । इस प्रकार तीनों दिनों में ६ उपसद् होम होंगे । किन्तु १२ उपसद् करनी चाहिए- इस पक्ष में एक - एक मन्त्र से चार - चार दिन तक प्रचारण करना चाहिए । आदि के चार दिनों में ' या तेऽअग्ने अयः शया ' इस मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए । मध्य के चार दिनों में ' या तेऽग्ने रजः शया ' इस मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए । अन्त के चार दिनों में " या ते अग्ने हरिशया " इस मन्त्र का उच्चारण उपसद्होम करते समय करना चाहिए ॥ २५ ॥

जिन उपसदों में यजमान दूध पीने का क्रम रखता है उन्हें व्रतोपसद् कहते हैं । इस विषय में दो मत हैं । एक सम्प्रदाय वाले कहते हैं कि प्रथम दिन गाय के एक स्तन का दूध पीना चाहिए । दूसरे दिन दो स्तनों का तथा तीसरे दिन तीन स्तनों का दूध पीना चाहिए । इस में दुग्धपान ' में उत्तरोत्तर वृद्धि है अतः इसे परउर्वी उपसद् कहा जाता है । दूसरे सम्प्र-दाय वालों का मत है कि प्रथम दिन तीन स्तनों का दूध पीना चाहिए, दूसरे दिन दो स्तनों का तथा तीसरे दिन एक स्तन का । इस प्रकार इस मत में पयःपान का उत्तरोत्तर ह्रास होने से इस क्रम को परोह्वी उपसद् कहते हैं । किन्तु वस्तुतः देखा जाए तो तीनों दिनों में मिला कर समान ही दूध पीया जाता है । अत: परउर्बी तथा परोऽह्वी समान ही हैं । उन में कुछ भेद नहीं है । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं- " या वै परोऽह्वीस्ताः परउर्वीयाः परउवस्ताः परोऽह्वीः ” इति ॥२६ ॥

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तृतीय काण्ड ( ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण यद्यपि परउर्वीः तथा परोऽह्वीः इन दोनों में दूध समान ही मिलता है अतः कोई अन्तर नहीं, तथापि याज्ञवल्क्य का कथन है कि परोऽह्वीः पक्ष ही श्रेयस्कर है । क्योंकि तब से ही मनुष्य को कल्याण की प्राप्ति होती है । परोही पक्ष में उत्तरोत्तर दूध की कमी होने से मनुष्य का प्रारणबल अधिक खर्च होता है और इसी का नाम तप है जैसा कि " एतद्वै तप इत्याहुर्यत् स्वं ददाति " से स्पष्ट है । अतः इस रहस्य को जानता हुआ जो परोऽह्वी उपसदु करता है वह इस लोक में वसीयान्, ( अधिक वसुमान् ) होता है । इसी क्रम से १२

उपसदें करनी चाहिएँ । परोऽही उपसद् ही विहित है ॥ २७ ॥

[ विज्ञान भाष्य ] प्रातिथ्येटि, तानूनप्त्रेष्टि, अवान्तरदीक्षेष्टि - तीनों श्रातिथ्य के अन्तर्गत हैं । प्रातिष्य के अनन्तर ही देवतानों ने अहमहमिका में पड़ कर अपनी संघ शक्ति तोड़ डाली थी । उसके प्रायश्चित्त के लिए उन्हें पहले " तानूनप्त्रेष्टि " करनी पड़ी एवं साथ ही श्रवभृतान्तस्नानपर्यन्त अक्षुण्ण रहने वाली दीक्षा के इस मिथ्या कर्म के कारण - भङ्ग हो जाने से - प्रवान्तर दीक्षा करनी पड़ी । इस प्रकार इसके बाद घर में श्राए हुए अतिथि सोम का आध्यायन किया गया । श्राप्यायन करना श्रातिथ्य के अन्तर्गत है । यह श्राप्यायन होता है - प्रवान्तर दीक्षा के अनन्तर - अन्त में । अतएव हम यहाँ तक " प्रातिथ्येष्टि " की ही इतिकर्तव्यता कहने के लिए तैयार हैं । कहना यही है कि श्रागत सोम के स्वागत के लिए " आतिथ्य " कर्म कर दिया गया । प्रातिथ्य इष्टि के प्रारम्भ में ही लिखा है कि इस यज्ञ का मस्तक यह प्रातिथ्य है । किस यज्ञ का आतिथ्य मस्तक है - यह जिज्ञासा होती है । इसका एकमात्र उत्तर है - ' दिव्यात्मा ' ही - जिसे कि यज्ञात्मा भी कहते हैं - वह यज्ञ - पुरुष है कि प्रातिथ्य जिसका मस्तक है । प्रकृतियज्ञवत् यजमान आहुति द्वारा नया दिव्यात्मा उत्पन्न करता । यही दिव्यात्मा यज्ञसाधनोत्पन्न-त्वात् ' यज्ञात्मा ' कहलाता है । इसे ही ' यज्ञ ' कह दिया करते हैं । यह यज्ञात्मा पुरुष स्वरूप है । मस्तक-हस्त पादादि सारे अवयव यज्ञात्मा में होते हैं । इसी यज्ञात्मा के कारण - यजमान - आत्मा देहोत्क्रान्त्यन-तर सीधा सत्रहवें स्वर्ग में चला जाता है - जो कि स्वर्ग ' आहवनीय ' नाम से प्रसिद्ध है । यह आत्मा पुरु-षाकार है । प्राकृतिक सृष्टि क्रम में सबसे पहले मस्तक उत्पन्न होता है । अतएव मस्तक - स्थानीय प्रति-येष्टि करनी पड़ती है । प्रातिथ्य कर्म्म में जो बाहुति दी जाती है - उससे यज्ञात्मा का शिरोभाग बनता है । प्रतएव ' शिरो वै यज्ञस्यातिथ्यम् ' यह कहा जाता है । एक समय विष्णु भगवान् महामाया ( निद्रा ) के वशीभूत हो कर गहरी नींद में सो गए । उस समय सिरहाने लगाने के लिए उनके पास कुछ न था । प्रतएव उन्होंने अपनी धनुष की प्रत्यश्वा को ही अपना सिरहाना बनाया । उसे सिरहाना बना कर उस पर मस्तक रख कर सो गए । विष्णु ही जगत् के पालनकर्त्ता हैं । उन्हें घोर निद्रा में निमग्न देख कर-सृष्टिकर्त्ता भगवान् ब्रह्मा को बड़ी चिन्ता हुई । इस चिन्ता को दूर करने के लिए उन्होंने एक ' दीमक ' नाम का कीट उत्पन्न किया और उसे आज्ञा दी कि " तुम जाओ और जिस डोरी को सिरहाने लगा कर पालनकर्त्ता विष्णु सो रहे हैं उसे काट दो " । दीमक ने वैसा ही किया । ब्रह्माजी ने तो ऐसा करके अच्छा ही किया था परन्तु दुर्दैववशात् - फल इसका सर्वथा विपरीत हो गया । प्रत्यवा के कटते ही उस पर लगा हुआ विष्णु का मस्तक कट कर आकाश में उड़ गया । हिङ्कार करती हुई प्रत्यश्वा ने विष्णु का मस्तक काट गिराया । वह मस्तक उड़ कर आकाश में जा कर गायब हो गया । विष्णु यज्ञ - स्वरूप [ ६४३ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण हैं- जब यज्ञ का मस्तक कट गया तो ब्रह्माजी को फिर चिन्ता हुई कि अब हम यज्ञ कैसे करेंगे - क्योंकि मुख - भाग में ही तो आहुति दी जाती है । ब्रह्मा की यह चिन्ता भी शीघ्र ही दूर हो गई । उन्होंने एक अश्व का मस्तक काट कर - विष्णु के धड़ पर लगा दिया । बस, यही ' हयग्रीव ' भगवान् कहलाए । विष्णु का मस्तक कट कर गिर गया था - प्रवृक्त हो गया था - प्रतएव इसे वापस जोड़ने के लिए ' हयग्रीव ' अव-तार के लिए - देवताओं ने जो यज्ञ किया था वह ' प्रवर्ग्य ' यज्ञ कहलाया । चूँकि इससे मस्तक जोड़ा जाता है अतएव इसे ' शिरोयज्ञ ' भी कहते हैं । इसी का नाम ' धर्म्मयाग ' है । इसी को महावीरोपासना कहते हैं । पहले आतिथ्येष्टि की जाती है - आतिथ्यानन्तर प्रवर्ग्य - याग किया जाता है - प्रवर्ग्यानन्तर उप-सत् होता है- बाद में ग्रह - याग होता है । यद्यपि दीक्षा - सुत्या - उपसत् के क्रम से दीक्षान्तर सुत्या ही होना चाहिए था, परन्तु किसी विशेष कारण से सुत्या अर्थात् ग्रहयाग के पहले ही उपसत् होता है । अतएव भगवान् कात्यायन कहते हैं- ' प्रवर्थोपसदावतः ' ( का ० श्र ० ८।२।१५ ) अतः ( आतिथ्यानन्तरम् ) प्रवर्ग्यो-पसदौभवत: ' यही इस सूत्र का अर्थ है । आतिथ्य के अनन्तर प्रवर्ग्य होना चाहिए एवं प्रवर्ग्य के अनन्तर उपसत् होना चाहिए - यही तात्पर्य है । हमने बतलाया कि प्रवर्ग्ययाग यज्ञ के कटे हुए मस्तक को जोड़ने के लिए किया जाता है । सोमयाग प्रतिवर्ष हो सकता है । एक सोमयाग से एक यज्ञ का स्वरूप बन जाता है । जब यजमान पहले - पहल प्रारम्भ का ही सोमयाग करता है- उसमें इसे प्रवर्ग्ययाग करने की कोई आवश्यकता नहीं होती । यज्ञस्वरूप बने बाद उसका प्रत्यश्वा से मस्तक कटता है । उसको जोड़ने के लिए प्रयाग किया जाता है । परन्तु अभी तक तो यजमान का ' यज्ञ ' ही उत्पन्न नहीं हुआ । यज्ञ स्वरूप बन जाए – बने बाद उसका मस्तक कटे एवं बादमें उसे जोड़ने के लिए प्रवर्ग्ययाग की आवश्यकता हो; परन्तु अभी तो यज्ञ ही उत्पन्न नहीं हुआ । अतएव पहले सोमयज्ञ में जो प्रातिथ्य है उसके अनन्तर प्रवर्ग्य याग करने की कोई आवश्यकता नहीं है । अभी तो यज्ञ बन रहा है । जब माथा बना ही नहीं तो कटने की क्या कथा? कटा ही नहीं तो फिर तत्संधानस्वरूप ' प्रवर्ग्य याग ' की आवश्यकता ही नहीं रहती । अतएव कात्यायन कहते हैं - ' न प्रथम यज्ञे प्रवृञ्ज्यात् ' इति । पहले सोमयज्ञ में - प्रवर्ग्ययज्ञ करने की कोई आवश्यकता नहीं है । यदि एक सोमयज्ञ किए बाद- दूसरे वर्ष दूसरा सोमयाग किया जाता है तो उसमें प्रवर्ग्ययाग अवश्य ही करना पड़ता है क्यों कि पूर्व के संवत्सरयज्ञ से यज्ञ का स्वरूप पूरा बन जाता है एवं बनने के साथ ही - प्रत्यञ्चा से मस्तक कट जाता है । अतएव उसके सन्धान के लिए - प्रवर्ग्ययज्ञ अवश्य ही करना पड़ता है । इस सारे प्रपञ्च से निष्कर्ष यही निकला कि यदि यजमान प्रथम याजी हो और उसने पहले - पहल ही सोमयाग किया हो तो आतिथ्य के अनन्तर उपसत् करे और उपसत् के अनन्तर ग्रहयाग करे । इस पहले याग में यज्ञ का मस्तक - यही प्रातिथ्य बनेगा । बस, इसी प्रथम पक्ष को बतलाने के लिए ' शिरो वं यज्ञस्यातिथ्यम् ' ( शत ० ३।२।३।२० ) यह कहा गया है । प्रातिथ्य यज्ञ प्रारम्भ के सोमयाग का मस्तक बनता है एवं यदि दुवारा या तिबारा सोमयाग करना हो तो प्रातिथ्य के अनन्तर प्रवर्ग्ययाग करे - प्रवर्ग्य के अनन्तर उपसत् करे - उपसत् के अनन्तर ग्रहयाग करे । इन द्वितीय तृतीय सोमशगों में - प्रवर्ग्य ही मस्तक स्थानीय है एवं प्रातिथ्य कर्म्म इस प्रवर्ग्य का प्रङ्ग बन जाता है । यद्य प्रवर्ग्य का स्वरूप यहीं तक बतलाना चाहिए था किन्तु यह प्रवर्ग्ययाग सबसे निराला है । यह हविर्यज्ञादि से ताल्लुक नहीं रखता । [ ६४४ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मणे यह स्वतन्त्र कर्म है - प्रतएव इसकी इतिकर्तव्यता श्रागे बतलाई जाएगी । १ - पाकयज्ञ २ - हविर्यज्ञ ३ - महायज्ञ ४ - प्रतियज्ञ ५ - शिरोयज्ञ - भेद से यज्ञ पाँच प्रकार के होते हैं अतएव ' पाङ्क्तो वै यज्ञः ' ( ऐ ०१।५ ) यह कहा गया है । इन पाँचों में से जो शिरोयज्ञ है - वही हमारा प्रवर्ग्ययज्ञ है । प्रथम यज्ञ में प्रवर्ग्य नहीं होता अतएव ऐतरेय महर्षि सोमयज्ञ की इतिकर्तव्यता बतलाते हुए - " प्रारम्भको सोमयज्ञः " को लक्ष्य में रख कर आतिथ्य को ही शिरस्थानीय मान कर कहते हैं— “ शिरो वा एतद्यज्ञस्य यदातिथ्यं - ग्रीवा उपसदः " । ( ऐ ० ब्रा ० ४।८ ) परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य उस द्वितीय सोमयज्ञ को लक्ष्य में रख कर कहते हैं— " ग्रीवा वं यज्ञस्योपसदः । शिरः प्रवर्ग्यः " । वास्तव में द्वितीय यज्ञ में शिर - प्रवर्ग्य यज्ञ ही बनता है । इसीलिए इसका स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं कि - यजमान यदि प्रवर्ग्यवान् होता है - तो पहले प्रवर्ग्य से युक्त हो कर - प्रवर्ग्ययाग करके - बाद में उपसद्याग करता है । ' प्रवयवान् ' कहा है - इससे स्पष्ट हो जाता है कि द्वितीय यज्ञ वाला ही प्रवयं करे क्यों कि प्रवर्ग्यवान् वही होता है-" तस्माद् यदि प्रवर्ग्यवान् भवति, प्रवर्येण प्रचर्थ्य अथोपसद्भिः प्रच-रन्ति ( प्रयुज्यते ) " । आतिथ्य और प्रवर्ग्य तो यज्ञात्मा का शिरस्थानीय है- इन दोनोंसे तो यज्ञात्मा का मस्तक बनता है एवं उपसंत् से यज्ञात्मा की ग्रीवा बनती है । विष्णु- सोम- अग्नि- तीनों ही देवताओं से ग्रीवा बनती है । विष्णु बारहवें आदित्य हैं - सोम अन्तरिक्ष की वस्तु है- अग्नि पृथिवी की वस्तु है । इस प्रकार त्रिलोकी के प्राण से ग्रीवा का निर्माण होता है । पृथिवी में अग्नि है विष्णु में अग्नि है- इन दोनों अग्नियों का संश्लेष करने वाला यही आन्तरिक्ष्य सोम है । इसी से दोनों प्राण बद्ध रहते हैं । बस ग्रीवा - निर्माता यही तीनों - प्राणदेवता हैं | उपसत् में इन्हीं तीनों का यजन किया जाता है । अतएव -" ग्रीवा वै यज्ञस्योपसदः " । यह कहा है । उपसत् से यज्ञपुरुष की ग्रीवा बनती है । मस्तक के अनन्तर ग्रीवा का ही नम्बर आता है एवं ग्रीवा बनती है— अग्नि - सोम - विष्णु के यजन - स्वरूप उपसत् से । अतएव आज यह यजमान प्रतिध्यानन्तर - किंवा प्रवर्ग्यानन्तर " उपसत्याग " करता है एवं ऐसा करता हुआ प्रातिथ्य से उत्पन्न यज्ञपुरुष के मस्तक में - ग्रीवा का सन्धान करता है । मस्तक के साथ ग्रीवा को मिलाता है । ग्रीवा में अनेक अवयव होते हैं - अतएव अवयवापेक्षया ' ग्रीवा ' कह दिया गया है । बस उपसत्याग का यही रहस्य है— " तद् ग्रीवा: प्रतिदधति " ( शिरसा सह योजितवान् भवति ) ॥१ ॥

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मणे उपसदिष्टि ब्राह्मण हमने बतलाया है कि उपसत् में अग्नि- सोम - विष्णु इम तीनों देवताओं का यजन किया जाता है । अग्नि- सोम - विष्णु- ये तीनों ही उपसदेवता हैं । इन तीनों का जो समष्टियाग है - वह एक उपसत् कह-लाता है । तीनों के यजन से एक उपसत् का स्वरूप बनता है । यह उपसत्याग सायं प्रातः करना पड़ता है । प्रातःकाल भी तीनों देवताओं का यजन करना पड़ता है- सांयकाल भी तीनों देवताओं का यजन करना पड़ता हैं । इस प्रकार एक दिन में दो उपसत् करने पड़ते हैं । देवता के यजन में - धनुवाक्या और याज्या दो मन्त्रों का उपयोग होता है । प्रत्येक देवता के यजन में अनुवाक्या और याज्या करनी पड़ती हैं । अनुवाक्या को ही ' परोऽनुवाक्या ' कहा जाता है । याज्या से पहले होने के कारण ही इसे पुरोऽनुवाक्या कहा जाता है । पुरोऽनुवाक्या होता करता है - याज्या " अध्वर्यु " करता है । देवता को यज्ञ में बुलाने का जो मन्त्र है - वही ' अनुवाक्या ' कहलाता है । अग्नि - स्वरूप " होता " ही देवता के लिए अनुवाक्या बोलता है - प्रर्थात् होता अनुवाक्या मन्त्र से देवता का यज्ञ में श्राह्वान करता है एवं प्रागत देवता को प्राहुति से मिलाने का अर्थात् देवता का आहुति से सम्बन्ध कराने वाला जो मन्त्र है - उसे " याज्या " कहते हैं । यह काम अध्वर्यु का है । याज्या मन्त्र बोल कर वौषट् के साथ प्राहुति देना अध्वर्यु का ही काम है । जिस मन्त्र के पहले चरण में देवता का नाम रहता है - वह अनुवाक्या मन्त्र कहलाता है जैसे- ' अग्निवेवं वृणी-महे........ ' इत्यादि । जिस मन्त्र के चौथे चरण में देवता का नाम रहता है - वह आज्या कहलाती है । इस सारे प्रपञ्च से बतलाना हमें यही है कि प्रत्येक देवता के यजन में अनुवाक्या और याज्या- इन दो मन्त्रों की आवश्यकता पड़ती है । प्रकृत में विष्णु - अग्नि - सोम ये तीन देवता हैं । अतएव तीनों की तीन ही अनुवाक्या होती हैं - तीन ही याज्या होती हैं । किसका कौन सा अनुवाक्यामन्त्र है, कौनसा याज्यामन्त्र है - यह समझ लेना आवश्यक है— " अग्निर्वृत्राणि जंघनत् द्रविरणस्युविपन्यया । समिद्धः शुक्र श्राहुतः " । ( अनुवाक्या मन्त्र ) ( ऋग्वेद मं. ६ | १६ | ३४ ) " य उग्र इव शर्यहा तिग्मशृंगो न वंसगः । श्रग्ने पुरो रुरोजिथ " । ( याज्या मन्त्र ) ( ऋग्वेद मं ० ६।१६।३ ९ ) " त्वं सोमासि सत्पतिस्त्वं राजोत वृत्रहा । त्वं भद्रो असि क्रतुः ” । ( अनुवाक्या मन्त्र ) ( ऋग्वेद मं. १६१।५ ) " गयस्फानो अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः । सुमित्रः सोम नो भव " । ( याज्या मन्त्र ) ( ऋग्वेद मं. १।१।१२ ) " इदं विष्णुविचक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूळहमस्य पांसुरे " । ( अनुवाक्या मन्त्र ) ( ऋग्वेद मं. १।२२।१७ ) ( ऋग्वेद मं ० १।२२।१८ ) " त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा प्रदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ” । ( याज्या मन्त्र ) [ ६४६ ]

पृष्ठ 657

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मणे इस प्रकार तीन देवतानों के तीन याज्यामन्त्र हैं - तीन अनुक्वायामन्त्र हैं । तीनों का प्रातः- सायं दोनों बार यजन होता है । प्रातःकाल भी याज्यानुवाक्यों से तीनों का यजन होता है - सायंकाल भी याज्या-नुवाक्यों से तीनों का यजन होता है । यह परिस्थिति है - इसमें एक विशेष बात बतलाते । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि उपसत्यज्ञ में - पूर्वाह्न में अर्थात् प्रातः काल में - जो अनुवाक्या होती हैं - वे सायंकाल में याज्या-स्थानीय हो जाती हैं । एवं जो याज्या होती है - वह अपराह्न में अनुवाक्या हो जाती है । इस प्रकार मन्त्र-विनिमय हो - क्रिया - विनिमय हो जाता है । इसी अभिप्राय से ऐतरेय कहते हैं— " जघ्निवतीर्याज्यानुवाक्याः कुर्यात् । अग्निर्वृत्राणि जंघनद्य उग्र इव शहा त्वं सोमासि सत्पत्तिर्गयस्फानो श्रमीवहेदं विष्णुर्विचक्रमे त्रीणि पदा वि चक्रम इत्येता । विपर्यस्ताभिरपराह्णे यजति " । ( ऐ ० ब्रा ० ४।८ ) पूर्वाह्न में आदि के तीन मन्त्रों से अनुवाक्या होती है - अन्त के तीन से याज्या होती है एवं सायं-काल में उन आदि के मन्त्रों से याज्या होती है - अन्त के तीन मन्त्रों से अनुवाक्या होती है - इस प्रकार विपर्यय करा दिया जाता है । ऐसा करने से याज्या- अनुवाक्या दोनों परस्पर व्यतिषक्त हो जाती हैं - गुथ जाती हैं । प्रकृतियज्ञ के अनुसार मनुष्य - यज्ञ का वितान होता है - यह बात हमने कई बार बतला दी है । प्रकृति - यज्ञ में वायु अध्वर्यु है- अग्नि होता है - चन्द्रमा ब्रह्मा है - आदित्य उद्गाता है । ये चारों प्राण-देवता प्रजापति - स्वरूप यजमान के साथ अधिदैवत यज्ञ किया करते हैं । इसी यज्ञ से यच्चयावत् प्राणि-मात्र की सृष्टि होती है । इस प्राकृतिक यज्ञ में भिन्न - भिन्न प्रारण हैं उनका सन्निवेश - क्रम भिन्न - भिन्न प्रकार से होता है । श्रतएव हाथ अलग निकल जाते हैं । मस्तक धड़ से ऊपर निकल जाता है । विचित्र प्रकार की संस्थाएँ बन जाती हैं । इसका एकमात्र कारण प्रारण सन्निवेश - क्रम ही है । उन प्राणों के प्रेरक प्रारणाधिष्ठाता वही चारों प्राण ऋत्विक् हैं । चारों में अग्नि पुरोऽनुवाक्या करते हैं- देवप्राण को प्रेरित करते हैं - जिससे कि सृष्टि ( सन्तान ) होने वाली है एवं वायु याज्या करते हैं । बस इस पुरोऽनुवाक्या याज्या से संसार के सारे प्राणियों की सृष्टि होती है । इस पुरोऽनुवाक्या याज्या के तारतम्य से ही शरीर धारी प्राणियों के स्वभाव नाना प्रकार के हो जाते हैं । जब पुरोऽनुवाक्या मिल जाती है - व्यतिषक्त हो जाती है - तो ग्रीवा की हड्डियाँ बन जाती हैं । चूंकि पुरोऽनुवाक्या मिली हुई हैं एवं उन्हीं से ग्रीवा की हड्डियाँ बनती हैं प्रतएव हड्डियाँ भी परस्पर व्यतिषक्त हो जाती हैं । ग्रीवा की अस्थियाँ यद्यपि अनेक हैं परन्तु सब- सब में गुँथ रही हैं- एक से एक बद्ध हो रही हैं । प्रकृति - यज्ञ में - पुरोऽनुवाक्या मिली रहती हैं - इसका यही प्रत्यक्ष प्रमाण है । हमें इस यज्ञ से - यज्ञ - पुरुष उत्पन्न करना है । प्रातिथ्येष्टि से उसका मस्तक बन गया । अब तीनों देवताओं का यजन कर पुरोऽनुवाक्या युक्त उपसत् से उस यज्ञ - पुरुष की ग्रीवा बनानी है । पुरोऽनुवाक्या प्रकृति में गुथी हुई है अतएव ' यद्वै देवा अकुर्वस्तत् करवारिण ' के अनुसार यह यजमान पुरोऽनुवाक्या को व्यतिषक्त करने के लिए पूर्वाह्न में जो अनुवाक्या होती है उसे सायंकाल में याज्य बना डालता है । सायंकाल में जो याज्या होती है उसे प्रातः काल में अनुवाक्या बना डालता है— [ ६४७ ]

पृष्ठ 658

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मणं उपसदिष्टि ब्राह्मणे " तद्याः पूर्वानुवाक्या भवन्ति ता अपराह्णे याज्याः । या याज्या-स्ता अनुवाक्याः । तद् व्यतिषजति " । प्रकृति - यज्ञ के रहस्य को परोक्ष भाव से मनुष्य - यज्ञ की ओर से बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यजमान के ऐसा करने से - ग्रीवा के जो पर्व हैं - वे व्यतिषक्त होते हैं - एक से एक गुथ जाते हैं । यहाँ यजमान का नाम है - प्रकृति ही निर्दिष्ट है । प्रकृति में चूँकि पुरोऽनुवाच्या और आज्या व्यतिषक्त होती हैं । इसीलिए हमारी गर्दन की हड्डियाँ भी - परस्पर व्यतिषक्त होती है । यहाँ पर इतना और समझ लेना चाहिए कि पुरोऽनुवाक्या से स्थूल अस्थि का निर्माण होता है - याज्या से सूक्ष्म अस्थि का निर्माण होता है | चूंकि प्राकृतिक अस्मदादि प्रजनन यज्ञ में - पुरोऽवाक्या व्यतिषक्त होती है, अतएव यह यजमान भी-यज्ञात्मा की ग्रीवा बनाता हुआ दोनों को व्यतिषक्त कर देता है । इसी लिए इस यज्ञ - पुरुष की ग्रीवा के पर्व व्यतिषक्त होते हैं । ' पर्व ' शब्द से लोक में - अंगुलि के पर्व प्रसिद्ध हैं । यहां पर उन पर्वों का अर्थ कोई न समझ ले - इसलिए ' अस्थीनि ' पद दे दिया गया है । अंगुलि की जो अस्थि है - वही पर्व शब्द से प्रसिद्ध है । ग्रीवा की हड्डियाँ ' पर्व ' शब्द से प्रसिद्ध नही हैं - अतएव खाली हर्व शब्दो पापदन से - चूंकि ग्रीवा - पर्व का बोध नहीं हो सकता था - प्रतएव " अस्थीनि " कह दिया गया है । इस प्रपञ्च से बतलाना हमें यही है कि यह यजमान प्रकृतिवत् याज्यानुवाक्यों को व्यतिषक्त कर देता है - अतएव ग्रीवा के अस्थि-पर्व- एक दूसरे से गुथे रहते हैं— " तस्मादिमानि ग्रीवाणां पर्वारिण व्यतिषक्तानीमान्यस्थीनि " ॥२ ॥

श्रातिथ्य से उत्पन्न जो यज्ञ का मस्तक है - उसमें उपसत् से ग्रीवा का सम्बन्ध किया जाता है-यही उपसत् की पहली उपपत्ति है । उपसत् का इतना ही प्रयोजन नहीं है - प्रपितु इसके और भी फल मिलते हैं अतः उपसत् अवश्य ही करना चाहिए । उपसत् के करने से ग्रीवा - निर्वाण के अलावा और क्या फल हैं- इसका नाम उपसत् क्यों पड़ा इसकी उपत्ति बतलाते हैं । देवता और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान हैं । प्रकाशमान प्राण का नाम देवता है - तमोमय प्राण का नाम असुर है । अन्धकार और प्रकाश दोनों उसी स्वयम्भू ब्रह्म से उत्पन्न होते हैं । सूर्य्य प्रकाश साधन है, परमेष्ठि तमोधन है अतएव परमेष्ठि को असुर मण्डल कहा जाता है -सूर्य को देवमण्डल कहा जाता है । स्वयम्भू भगवान् से परमेष्ठि अर्थात् असुर उत्पन्न होते हैं एवं उसी स्वयम्भू से ही सूर्य अर्थात् सारे देवता उत्पन्न होते हैं इसीलिए ' प्रजापति स्त्वेवेदं सर्वम् सृजत् यदिदं किंच " - यह कहा जाता है । देवता और असुर दोनों - उसी स्वयम्भू प्रजापति की सन्तान हैं । ये दोनों ही परस्पर सदा लड़ते रहते हैं । प्रकाश, अन्धकार का शत्रु है; अन्धकार, प्रकाश का शत्रु है । जहाँ उजाला रहता है वहाँ अँधेरा नहीं रहता; जहाँ अँधेरा रहता है - वहाँ उजाला नहीं रहता । इन दोनों में सदा स्पर्धा चलती रहती है । दिन, रात से लड़ता है, रात, दिन से लड़ती है । दोनों में अनवरत संघर्ष चलता रहता है - इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं--[ ६४८ ]

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 659 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण " देवाश्च वाऽअसुराश्च, उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे " । आगे जा कर याज्ञवल्क्य कहते हैं कि असुरों ने त्रिलोक में अपना कब्जा करने के लिए पृथिवी-अन्तरिक्ष- द्यौ - इन तीनों लोकों में अपने तीन शहर बना लिए; तीनों लोकों में तीन किले बना लिए । पृथिवीलोक में लोहमयी श्रायसीपुरी का निर्माण किया - अन्तरिक्षलोक में रजतमयी राजतीपुरी का निर्माण किया एवं द्युलोक में हिरण्यमयीपुरी का निर्माण किया । इस प्रकार तीनों लोकों में क्रमशः लोहा - चांदी-सोने का शहर बना कर, असुर लोग तीनों लोकों में बस गए— " ततोऽसुरा एषु लोकेषु पुरश्चक्रिरे - प्रयस्मयीमेवास्मिल्लोके । रजतामन् तरिक्षे । हरिणीं दिवि " ॥३ ॥

सोमाख्यान ब्राह्मण में- हमने पृथिवी को कद्रू बतलाया है एवं सौर वाक् को सुपर्णी बतलाया है । पौराणिक परिभाषा में सुपर्णी को ' विनता ' कहा जाता है । कद्रू सर्पों की माता है- विनता गरुड़ और अरुण की माता है । इन सारे विषयों का रहस्य हमने - सोमाख्यान ब्राह्मण में विशद रूपेरण बतला दिया है । इस कद्रू सन्दर्भ में सर्पों की माता है - इसका अर्थ यही है कि पृथिवी प्रातिश्विक रूपेण सर्वथा काली है - प्रतएव इसके जो प्राण निकलते हैं - वे भी शुद्ध काले ही निकलते हैं । पृथिवी के ये काले प्राण-सर्पण करते हुए - चलते हैं - अतएव उन्हें सर्प कहा जाता है । चूंकि ये पृथिवी के केन्द्र से निकल कर चारों प्रोर फैलते हैं श्रतएव इन्हें कद्रू का अर्थात् पृथिवी का पुत्र कहा जाता है । पृथिवी चूंकि सर्पण करती हुई चलती है अतएव ' इयं वै पृथिवी सार्पराज्ञी ' ( शत ० २ | १ | ४ | ३० ) यह कहा जाता है । इस प्रपञ्च से बतलाना हमें यही है कि पृथिवी प्रातिस्विकरूपेण सर्वथा काली है - अतएव इससे चारों ओर बड़ी दूर तक वितत होने वाले प्राण भी सर्वथा काले ही हैं । बस, प्रकृत आख्यान में असुर शब्द से यही पार्थिव काले प्रारण अभिप्रेत हैं, जैसे - पृथिवी काली है - ठीक इसके विरुद्ध सूर्य प्रकाशमान् है इसीलिए तो सुपर्णी को उच्चैःश्रवा घोड़ा सफेद दीखा था । बस, देवता शब्द से यही सौरप्रकाश अभिप्रेत है । इस सौरप्रकाश में और पार्थिव काले प्राण में - सदा लड़ाई होती रहती है । कद्रू और बिनता अर्थात् सुपर्णी में सदा युद्ध चलता रहता है । पृथिवी का जो काला प्राण है - वह पृथिवी के सत्ताईसवें ( २७ वें ) अहर्गण तक जाता है जहाँ पर कि सूर्य भगवान् स्थिर रूप से तप रहे हैं । यह काला प्राण ज्यों - ज्यों ऊपर जाता है, त्यों - त्यों मण्डल के अधिक बड़े होने के कारण - उस सारे मण्डल में व्याप्त होता हुआ पतला पड़ता जाता है । आखिर होते - होते सूर्य तक पहुँचने वाला काला प्राण तो एकदम ही पतला हो जाता है । पृथिवी से जाने वाले - २१ अहर्गण तक वितत रहने वाले इस काले प्राण की घन - तरल- विरल तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । पृथिवी से कुछ दूर ऊपर तक चूँकि काला प्राण अधिक स्थूल रहता है - प्रतएव इस अवस्था को ' घनावस्था ' कहते हैं । इसके ग्रनन्तर जब यह और पतला पड़ जाता है तो इस अवस्था को ' तरला-वस्था ' कहते हैं एवं अन्त की अतिसूक्ष्म अवस्था को ' विरलावस्था ' कहते हैं । पृथिवी का जो वषट्कार मण्डल है - उसमें ३३ ( तैंतीस ) अहर्गण होते हैं । इनमें ७-७ ग्रहणों का एक - एक स्तोम माना जाता जो है । पहले स्तोम को त्रिवृत् स्तोम कहते हैं । पृथिवी के लोक में -तीन अहः चले जाते कि ब्रह्मा-[ ६४६ ]

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण [ ६५० ] उपसदिष्टि ब्राह्मण । ( ऋग्वेद मं ० १।३५।२ ) विष्णु - इन्द्र - सम्बन्धेन हृद्य कहलाने लगते हैं । इन तीन में जब ६ प्रहर्गण और मिलाए जाते हैं तो त्रिवृत् स्तोम हो जाता है । बस, यहाँ तक अर्थात् ६ अहर्गण तक असुर प्राण - पृथ्वी का काला प्राण घन रूप में रहता है - यहाँ तक पृथ्विलोक माना जाता है । इसके बाद 8 में ६ अहर्गण और मिला दिए जाते हैं तो पञ्चदश स्तोम हो जाता है - इसमें काला प्राण तरल अवस्था में परिणत हो जाता है - इसी का नाम अन्तरिक्षलोक है । इसमें जब ६ और मिला दिए जाते हैं तो एकविंशस्तोम हो जाता है - यही श्रासुर प्राण की विरला-वस्था है - इसी को द्युलोक कहते हैं । त्रिवृत् स्तोम पर्य्यन्त पृथिवीलोक है - पञ्चदशस्तोम तक अन्तरिक्षलोक है - एकविंश तक द्युलोक है । इस प्रकार उस असली अन्तरिक्ष - युलोक के अलावा स्तोम विभाग से केवल इस पृथिवी के ही तीन लोक हो जाते हैं । कहने को तीनों के नाम पृथिवी - अन्तरिक्ष - यो हैं । वास्तव में तीनों पृथिवी ही हैं । इस पृथिवी त्रिलोकी का जन्म स्तोमों से होता हैं अतएव इसे स्तोम्य त्रिलोकी कह हैं । जो वास्तविक त्रिलोकी है वह ' उवूढ़ त्रिलोकी ' कहलाती है । पूर्वोक्त तीनों प्रासुर अवस्थाओं से लोहा - चांदी - सोना ये तीन धातुएँ उत्पन्न होती हैं । पृथिवी का, अर्थात् त्रिवृत् स्तोम का, जो घनावस्था-स्वरूप काला प्राण है— उससे लोहा उत्पन्न होता है । लोहा असुर है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण तो उसका अपना रूप बतला रहा है । लोहा चूँकि असुर तत्व की घनावस्था से बनता है अतएव चांदी - सोने की अपेक्षा इसमें घनता भी अर्थात् मजबूती भी अधिक होती है एवं काला भी होता है । लोहा शुद्ध आसुर है । चाँदी - सोने की शलाका शीघ्र मुड़ जाती है - लोहे की शलाका इतनी जल्दी नहीं मुड़ती । अन्तरिक्ष का ' तरलावस्थायुक्त ' जो तमोमय पार्थिवासुर प्राण है - उससे चाँदी बनती है । अन्तरिक्ष में वायु की प्रधानता रहती है - यह वायु सूर्य्यं में से आने वाले - आन्तरिक्ष्य रुद्र प्राण को पिघला देता है - बस उस प्राण के और इस तरलावस्थायुक्त श्रासुर प्राण के मेल से ही चाँदी उत्पन्न होती है । चाँदी में पार्थिव काला प्रारण है - वायु में पिघला हुआ रुद्र प्राण एवं साथ ही इसमें चन्द्रमा का भास्वर सोम भी घुल पड़ता है— प्रतएव यह सफेद हो जाती है । अन्तरिक्ष में ही चन्द्रमा रहता है । उसके शुक्ल प्राण के सम्बन्ध से ही यह चाँदी आसुर तमोमय प्राण युक्ता होते हुए भी सफेद हो जाती है । चन्द्रमा के सम्बन्ध के कारण ही तो- लोक में इसे ' चाँदी ' कहा जाता है । बस, असुर प्राण से अन्तरिक्ष में उत्पन्न होने वाली यही दूसरी धातु है । चाँदी पिघले हुए रुद्र से बनी है । इसी विज्ञान के आधार पर पौराणिक कहा करते हैं कि रुद्र के प्रसुनों से चाँदी बनी है । रुद्र प्राणविघातक है - चाँदी इसी से बनी है श्रतएव मीमांसा में बहि के साथ चाँदी के दान का ' बर्हिषि रजतं न देयम् ' इन शब्दों में विरोध किया गया है । अस्तु श्रन्त-रिक्ष के बाद है - द्युलोक । यहाँ असुरप्राण विरलावस्था में रहता है । इससे सुवर्ण बनता है । इसी लोक में सूर्य्यं रहते हैं । सूर्य्य का मण्डल हिरण्मय है - जैसा कि श्रुति कहती है— " हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् इस तमोमय प्राण में चूँकि सूर्य्य का हिरण्यतेज प्रविष्ट हो जाता है प्रतएव इससे बनने वाला धातु सोना बन जाता है । पार्थिवासुर प्राण में बद्ध जो सूर्य्य - रश्मियाँ हैं वही स्वर्ण कहलाती हैं । इस प्रकार यह शुद्ध पार्थिव प्राण घन - तरल - विरल भेद से तीन अवस्थाओं में परिणत होता हुआ अन्योन्य प्राण - योग से लोहा - चांदी - सोना - ये तीन धातुएँ बना डालता है । लोहा त्रिवृत् स्तोम की वस्तु है अतएव