Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 661–670
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 661–670
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण उसे हम पृथिवीलोक की वस्तु कहेंगे । चांदी अन्तरिक्ष प्राण से उत्पन्न होती है - अतएव चाँदी के पृथिवी पर उपलब्ध होने पर भी हम इसे अन्तरिक्ष लोक की ही वस्तु कहेंगे । सुवर्णं द्युलोकस्थ पार्थिव प्राण सम्बन्धात् उत्पन्न होता है अतएव इसे द्युलोक की वस्तु कहेंगे । इस प्रकार वह पार्थिव आसुर प्रारण अपने तीन विलक्षण स्वरूप धारण कर लेता है । इन्हीं तीनों के आधार पर पार्थिवासुर तीनों लोकों में व्याप्त हो रहे हैं । बस यही - प्रसुरों का पुरी - निर्माण है । असुरों ने पृथिवी में लोहे की पुरी बनाई - अन्तरिक्ष में चांदी की बनाई और द्युलोक में सोने की बनाई - इस कथा का यही वैज्ञानिक रहस्य है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर याज्ञवल्क्य कहते हैं— " देवाश्च वाऽअसुराश्च उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे । ततोऽसुरा एषु लोकेषु पुरश्चक्रिरे । अयस्मयीमेवास्मिल्लोके - रजतामन्तरिक्षे । हरिणों दिवि " ॥३ ॥
भला, असुरों का यह प्रभाव - यह आधिपत्य देवता कैसे सह सकते थे? देवताओं ने क्रोध में श्रा कर असुरों के इन तीनों पुरों को नष्ट कर डाला । तोड़ - फोड़ कर उनके स्थान में अपने तीन पुर बनाए । तीनों लोकों में तीन पुर बना कर देवता लोग तीनों में प्रतिष्ठित हो गए । तीनों लोकों में अपना राज्य कायम कर लिया । वास्तव में देवतानों ने असुरों की इस त्रिलोकी को नष्ट - भ्रष्ट कर अपना राज्य जमा लिया । पार्थिव प्राण का नाम श्रसुर है- एवं सौर प्रारण का नाम देवता है, अतएव --“ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुणस्याग्नेः ” । ( ऋग्वेद मं. १।११५।१ ) यह कहा जाता है । असुर लोग निश्चित ही अपना राज्य कायम कर लेते - यदि देवता उनके नगरों को न तोड़ डालते । सूर्य्य का प्रखर ताप - इस पृथिवी पर पड़ा करता है । पृथिवी के आधे भाग पर सूय्यं रश्मियों का राज्य रहता है । सूर्य्यं पृथिवी के समसामुख्य को अपने अधिकार में किए हुए है । सूय्यं प्रकाश से - पार्थिव प्रासुर प्राण छिन्न - भिन्न हो जाते हैं । जिस प्रकार असुरों ने तीन पुरियाँ बनाई थीं, उसी प्रकार देवताओं ने इन तीनों लोकों में अपने तीन उपसत् अर्थात् किले बनाए । तीनों में तीन-तीन श्रधिष्ठाता रख दिए । द्युलोक का जो किला है - उसके अधिष्ठाता विष्णु बने, अन्तरिक्ष के अधि-ष्ठाता सोम अर्थात् चन्द्रमा बने एवं पृथिवीलोक के अधिष्ठाता श्रग्नि बने । तीनों ने तीनों लोकों से असुरों को मार भगाया । असुरों ने जिस त्रिलोकी में अपना राज्य जमा रखा था, उसको नेस्तनाबूद कर दिया । पृथिवी जो प्रग्नि है - वह सूर्य की वस्तु है । अन्तरिक्ष में जो चन्द्र का प्रकाश है - वह भी सूर्य की वस्तु है । विष्णु तो बारहवें ( १२ वें ) प्रादित्य हैं । अग्नि ३३ देवताओं में पहले देवता हैं- विष्णु अन्तिम देवता हैं । इसीलिए तो —-" अग्नि देवानामवम विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवताः " । ( ऐ ० ब्रा ० १ | १ ) यह कहा जाता । देवताओं ने अपने तीन उपसत् बनाए - वे भी सोने - चांदी प्रोर लोहे के ही थे- जैसा कि पुराणों में कहा गया है । इससे विरोध नहीं समझना चाहिए । वास्तव में वे तीनों [ ६५१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण इन देवताओं के पुर बन गए - यही पुर तोड़ने का तात्पर्य है । वहाँ आसुर प्राण की प्रधानता न रही अतएव पुरों का नष्ट होना मान लिया गया । इस प्रकार देवता इन तीनों उपसदों ( किलों ) को बना कर उनमें प्रतिष्ठित हो गए अतएव इन तीनों का माम ' उपसत् ' पड़ गया । ' उपसीदन् यत्र देवा ' इस व्युत्पत्ति से तीनों लोकों को उपसत् कहा जाता है । इस प्रकार देव-तानों ने प्रग्नि - सोम - विष्णु ने अपने तीन उपसत् बनाए श्रर्थात् असुरों के तीनों किलों को नष्ट कर दिया और सारे असुरों को जीत लिया । पृथिवी का जो भाग सूर्य्यं की ओर रहता है - उसमें काले प्राण का नाम - निशान भी नहीं रहता । चूँकि प्राकृतिक प्राण - देवता जो रश्मि - स्वरूप हैं - प्रपनी तीन प्रतिमाओं से - तीन उपसदों से असुरों को मार भगाते हैं - अतएव प्राकृतिक विज्ञान के जानने वाले विज्ञ लोग कहते हैं - देवता लोग उपसदों से ही पुर जीतते हैं - उपसद् ही देवताओं की विजय का एकमात्र कारण है । श्राज त्रिलोकी में इन्हीं अग्नि - सोम - विष्णु का राज्य हो रहा है । सारी कथा का सारांश यही है कि पृथिवी का काला प्राण सूर्य्यं की ओर जा कर अपना प्रभाव जमाना चाहता है परन्तु सूर्य्यं उस नोर के काले प्राणों को नष्ट कर देता है उतने स्थान में अग्नि - सोम - विष्णु प्राणों का ही राज्य हो जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं— " तद्वै देवा अस्पृण्वत ( पुरत्रये हिंसितवन्तः ) । तएताभिरूपसद्भिरु-पासीदन् ( न्यवसन ) । तस्मादुपसदो नाम । ते पुरः प्राभिन्दन् - इमॉडल्लोकान् प्राजयन् । तस्मादाहुः - उपसदा पुरं जयन्तीति " । यह कथा जैसे अधिदैवत में लगती है तथैव अधिभूत से भी सम्बन्ध रखती है । प्राकृतिक त्रिलोकी के अनुसार साध्य जाति में उत्पन्न ब्रह्म- पथ - प्रदर्शक भगवान् ब्रह्मा ने - वही लोक - व्यवस्था इस पृथ्वी-लोक में भी की है । जिनकी आत्मा में श्रासुर भाव अधिक मात्रा में प्रविष्ट होता है - वे असुर कहलाते हैं एवं जो दिव्य संपत्तिवान् हैं वे देवता कहलाते हैं । जिन्होंने अपने प्राणों को देवता से युक्त कर देवमय बना लिया वही देवता हैं । जो शक्ति प्राणदेवता में होती है - वही शक्ति इन मनुष्य - देवताओं में श्रा जाती है । प्राकृतिक प्राणदेवता वसु - रुद्रादि भेदेन ३३ जाति के हैं - अतएव भुवनदेवता भी कुल ३३ जाति के हैं । प्रकृति में देव - प्राण की अपेक्षा परमेष्ठि- मण्डल में रहने वाले असुर अधिक थे अतएव यहाँ भी असुर बहुत थे । देवताओं में विद्या बल था, असुरों में कला - बल था । असुर शरीर में बलिष्ठ होते थे; देवता कमजोर होते थे । इन असुरों की कुल ३३ खाँप ( शाखाएँ ) थीं । कालक - दौर्हद - मौर्य - पौंड्र-मय - त्रिपुर - वृत्र - तारक - इत्यादि कुछ चुनी हुई खाँपें बहुत ही बलवान थीं । इनसे देवता प्रति भयभीत रहते थे । कोई समय ऐसा था जब देवता और असुर दोनों एक जगह रहते थे- इनमें लोक - विभाग नहीं था । असुर दुष्ट थे - धूर्त थे - उन्होंने विचार किया कि सारी पृथिवी पर कब्जा जमा कर देवताओं को यहाँ से निकाल देना चाहिए । यह विचार कर असुरों ने सारी पृथिवो अपने कब्जे में कर ली । जब यह खबर देवताओं को मिली तो वे घबराए । उन्होंने कहा - यह तो गजब हो गया; यदि सारी पृथिवी पर असुरों का [ ६५२ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मरण श्राधिपत्य हो जाएगा तो हम कोई चीज ही न रहेंगे । यह विचार कर - विष्णु को आगे कर - देवता असुरों के पास जाए और अपना हिस्सा माँगने लगे । अन्त में ब्रह्मा के निर्णयानुसार असुरों को देवताओं के लिए जमीन छोड़नी पड़ी । इसका विस्तृत विवेचन शतपथ के प्रथमकाण्ड में ' वेदिब्राह्मण ' में देखना चाहिए । बस, विभाग होते ही - देवताओं ने अपनी त्रिलोकी में से असुरों को निकालना शुरू किया । उस समय अदरु नाम का असुर बहुत ही प्रबल था । जब उसे देवता अपनी त्रिलोकी के पृथिवीलोक से निका लने लगे तो वह द्युलोक की ओर जाने को उद्यत हुआ । यह देख कर " प्रारोदिवं मापाप्त " – इस प्रकार घुड़की दे कर - उसे वहाँ जाने से रोक दिया । बस, यहीं देवासुर में वैर का बीज - वपन हुआ | देव-ताओं को भी त्रिलोकी दी गई थी- असुरों को भी त्रिलोकी दी गई थी । देव- त्रिलोकी का प्रारम्भ निरक्ष देश से होता है और समाप्ति उत्तर समुद्र पर जा कर होती है । निरक्ष वृत्त से शरणावत पर्वत तक - जिससे कि रावी ( इरावती ) नदी निकलती है- मनुष्य लोक है - यहाँ के अधिष्ठाता अग्नि हैं, यहाँ से हिरण्यश्वङ्ग पर्वत तक जिसे कि पामीर कहते हैं - प्रन्तरिक्ष लोक है एवं उत्तर समुद्र तक - स्वर्गलोक है । जिसे आज एशिया कहा जाता है - यही प्राचीन समय में देव - त्रिलोकी थी । यही भुवनस्वर्ग - त्रिलोकी कहलाती थी - इसके अधिष्ठाता देवता हैं । इसी प्रकार अफ्रीका, अमेरिका, यूरोप - तीन प्रासुर त्रिलोकी हैं । इस प्रकार दोनों का स्थान सर्वथा विभक्त था । जिसे आज एशिया माइनर कहते हैं; वहाँ स्वयम्भू प्रजापति रहते थे । असुर दुष्ट थे अतएव प्रजापति को प्रणाम करने के बहाने - वे धीरे - धीरे देवत्रिलोकी में घुस गए एवं मौका पाकर त्रिवासुर ने देवत्रिलोकी में तीन नगर बना लिए । तीनों नगर सोने - चाँदी श्रोर लोहे के थे । जिसे टॉरेसमाउण्ट कहते हैं - उस पर स्वर्ण का नगर बनाया - यह द्युलोक है, आदर्श पर्वत पर - जिसे शिनाई और तूर कहा जाता है- लोहे की पुरी बसाई - यह पृथिवीलोक में थी एवं तीसरी चांदी की पुरी भूमध्य सागर के तट पर बनाई । इस प्रकार तीनों लोकों में अपना कब्जा कर लिया । अन्त-तोगत्वा तीनों का देवताओं ने विध्वंस किया और अपनी त्रिलोकी में से असुरों को निकाल दिया । इसका विस्तृत विवेचन - इन्द्रविजय में देखना चाहिए । प्रकृत कर्म में वैज्ञानिक कथा का ही सम्बन्ध समझना चाहिए । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - जो यजमान इस पुर- भेदन के विज्ञान को जान कर इस प्रकार उपसत् की उपासना करता अर्थात् उपसत् - यज्ञ करता है, वह इस उपसत् से- इस मानुषी पुरी को जीत लेता है अर्थात् शत्रु के नगरों को नष्ट - भ्रष्ट कर देता है । सारे शत्रुनों पर विजय प्राप्त कर लेता है । उपसत् यज्ञ का ग्रीवा के अलावा यह दूसरा महाफल है--" यदहोपासते तेन ( उपसदा ) इमां मानुषीं पुरं जयन्ति ” ॥४ ॥
एक विशेष बात बतलाते हुए पूर्वोक्त कथन का अनुवाद करते हैं- प्राण - देवताओं ने और मनुष्य-देवताओं ने इन्हीं उपसदों से असुरों के पुरों को नष्ट किया था एवं इन्हीं से उन पर विजय प्राप्त की थी । उसी प्रकार उपसत् करने वाले इस यजमान के लिए कोई भी शत्रु इस पृथिवीलोक में-- पुर नहीं बना सकता । तात्पर्य्यं इसका यही है कि यदि यजमान के शत्रु न हों तो फिर उपसत् करने की क्या आव श्यकता है? - यह प्रश्न हो सकता है । इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा जाता है- हमने माना कि उन देवताओं की तरह यजमान का कोई शत्रु नहीं है परन्तु सम्भव है – आगे इसका कोई शत्रु बन जाए और [ ६५३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मणं “ स वाऽअष्टावेव कृत्वो जुह्वां गृह्णाति चतुरुपभृति " । यही सिद्धान्त है । ऐसा क्यों न करें कि आठ बार उपभृत में और चार बार जुहू में लिया जाए-इसका कारण बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं -" तद् वज्रमभिभारं करोति " । जो शस्त्र मूल पर ( जहाँ से पकड़ा जाता है ) हल्का होता है और अन्त में भारी होता है-वह अधिक चोट करता है । यह जुहू वज्र है क्यों कि इसी से तो आज्याहुति दी जाएगी । चूँकि वज्र आगे की ओर भारी होने से अधिक मार करता है अतएव जूहू स्वरूप वज्र के अग्रभाग को भारी बनाने के लिए- उसमें नाठ बार ही लेना चाहिए । इस प्रकार जुहू में आठ बार करके घृत लेता हुना यह ऋत्विक् वज्र के अग्र भाग को भारी बनाता है - ठोस बनाता है । इस ठोस वज्र से असुरों का समूलोच्छेद करता है । आठ बार जुहू में लेने का यही पहला लौकिक कारण है ---" तेन वज्रेणाभिभारेणेमाँल्लोकान् प्रभिनत्ति । इमाँल्लोकान् प्रजयति " ॥८ ॥
श्रपिच इसका दूसरा वैज्ञानिक कारण और भी है । अग्नि और सोम के लिए इस जुहू में प्राज्य लिया जाता है । श्रग्नि और सोम दोनों देवता सयुक् हैं । दोनों श्रविनाभूत हैं, प्रतएव श्रुति कहती है-" अग्निर्जागार तमृचः कामयन्तेऽग्निर्जागार तमु सामानि यंति । अग्निर्जागर तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योका: " ॥ ( ऋग्वेद मं ० ५।४४: १५ ) जब प्रकृति - यज्ञ में दोनों साथ हैं तो उनके लिए हमें भी एक साथ मिला कर ही आहुति देनी चाहिए एवं विष्णु अकेले हैं अतएव एकाकी विष्णु के लिए उपभृत में चार बार लेता है अर्थात् सयुक् अग्नि-सोम के लिए एक साथ आठ का जुहू में ग्रहण करता है । चार बार उपभृत में लेने का प्राठ बार जुहू में लेनेका यही दूसरा कारण है— " अग्नीषोमो वै देवानां सयुजौ । ताभ्यां सार्द्धं गृह्णाति । विष्णवऽएकाकिने ” । ' प्रकृतिवद् विकृतिः कर्त्तव्या ' यह सिद्धान्त है । प्रकृति यज्ञ में - पूर्वाधार तथा उत्तराधार - दो आधार होते हैं । पूर्वाधार त्र.वि से होता है – उत्तराधार स्रवा से होता है । यही दोनों प्राघार इस विकृत उपसत् यज्ञ में भी प्राप्त होते हैं । उनका निषेध करते हुए कहते हैं - ' अथ तामाघारयति यं सवेरा ' वह अध्वर्यु दोनों में से एक ही आधार करता है । उत्तराधार करके वह जीत कर वापस लौटता है । उत्तराधार में प्रत्याक्रमण करना पड़ता है । इस समय इस यजमान ने सुरों को जीत लिया है । ऐसी अवस्था में उत्तराधार के लिए प्रत्याक्रमण करना वापस हारना है - पीठ दिखाना है । ऐसा न हो, हम विजित नहीं रहें, अतएव उत्तराधार नहीं करता है । दोनों में से एक ही आधार करता है— [ ६५६ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण “ श्रन्यतरमेवाधारमाघारयति - यं स्रुवेण । प्रतिक्रामति वाऽउत्तरमाघा-माघार्य । श्रभिजित्याऽअभिजयानीति । तस्मादन्यतरमेवाधारमाघारयति यं स्रुवेण ” ॥९ ॥
सारे वेद के ज्ञान – काण्ड, उपासना - काण्ड और कर्म - काण्ड- ये तीन काण्ड हैं । तीनों में से ब्राह्मण-ग्रंथ कर्म्मकाण्ड का प्रतिपादन करते हैं— श्रारण्यक उपासनाकाण्ड का प्रतिपादन करते हैं - उपनिषत् ज्ञानकाण्ड का प्रतिपादन करते हैं - इन तीनों का विवेचन मीमांसा कहलाती है । जैमिनि - व्यास- शाण्डिल्य ने तीनों की मीमांसा की है । चूँकि तीनों काण्डों की मीमांसा की गई है अतएव मीमांसा के ब्रह्म, उपा-सना भोर कर्म्म- तीन भाग हो गए हैं । इनमें से कम्मं - मीमांसा ' मीमांसा ' नाम से ही प्रसिद्ध है - इसके कर्त्ता भगवान् जैमिनी हैं । उपासना - मीमांसा के कर्त्ता महर्षि शाण्डिल्य हैं । श्राज यह मीमांसा सूत्र नाम से ही प्रसिद्ध है । तीसरा ' ब्रह्म - मीमांसा ' चूँकि वेदों के अन्तःभाग - उपनिषदों की मीमांसा है अतएव ' वेदान्त ' नाम से प्रसिद्ध है । इन शारीरक सूत्रों के कर्त्ता भगवान् व्यास हैं । इस प्रकार सारा निगम - तीन भागों में विभक्त है । हम ब्राह्मण का विवेचन कर रहे हैं - ब्राह्मण ग्रंथ कर्मकाण्ड का प्रतिपादन करते हैं अतएव प्रकृत में - कर्ममीमांसा का सम्बन्ध है । मीमांसा में सारे कर्मों को सारे यज्ञों को क्रत्वर्थ और पुरुषार्थ दो भागों में विभक्त बतलाया गया है । जो कर्म्म प्रधान होता है - उसे पुरुषार्थं कहते हैं एवं जो कर्म्म इस पुरुषार्थ के अनुषंगी हैं - वे चूँकि इस प्रधान ऋतु के लिए हैं अतएव उन्हें क्रत्वर्थ कहा जाता है । ' ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत ' यह पुरुषार्थ कर्म्म है एवं इसके अन्तर्गत जो प्रायणीय- दीक्षणीय आतिथ्य अवान्तर इत्यादि कम हैं - वे चूँकि अग्निष्टोम के लिए हैं- प्रधान के लिए हैं- प्रतएव क्रत्वर्थ कहलाते हैं । श्रङ्गी को ' पुरुषार्थ - कर्म्म ' कहते हैं - प्रङ्ग को क्रत्वर्थ कर्म्म कहते हैं । वेद में जो ' यजेत् - जुहुयात् ' इत्यादि विधि वाक्य आते हैं, उन्हें ' विधि ' शब्द से व्यवहृत किया जाता है । पुरुषार्थ क्रत्वर्थ - भेद से वह विधि भी दो प्रकार की हो जाती हैं - एक का नाम है - ' प्रारथ्याधीत श्रुति '; दूसरी का नाम है - ' श्रनारथ्याधीत श्रुति ' । जो अपूर्वकर्म्म प्रतिपादक श्रुति है - वह अनारथ्या-धीत श्रुति कहलाती है, उदाहरणार्थ - ' दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत् ज्योतिष्टोमेनापवर्गकामो यजेत् ' इत्यादि । इन प्रधान कर्मो के अन्तर्गत जो अनन्त विधिवाक्य ( लिङ्लकार ) आते हैं- ये चूँकि अपूर्व नहीं हैं — प्रधान कर्म्म के पश्चात ही अधीत हैं प्रतएव वे ' आरध्याधीत ' कहलाती है । ' दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत् ' यह अनारथ्याधीत है एवं इसके अन्तर्गत जो व्रतोपायन, पात्रासादन, स्रुगादापन, इडाप्राशन, ग् यूहन, याजमान एवं पत्नीसंयाज इत्यादि कर्म्म प्रतिपादक श्रुतिवाक्य हैं - वे सब रथ्याधीत है । इन आरथ्याधीत कर्म्मो में वे ही ऋवित्क् होते हैं - जो कि उस प्रधान कर्म में अनारथ्याधीत कम्मं में होते हैं क्यों कि नारथ्याधीन नया कर्म नहीं है - पुरुषार्थ नहीं है - प्रङ्ग कर्म है । अङ्ग अङ्गी के अधीन रहता है अतएव जो ऋत्विक् प्रङ्गी कर्म में होते हैं - वे ही प्रङ्ग कम्मों में भी होते हैं । अङ्ग कर्म्म को विकृति एवं श्रङ्गी कर्म्म को प्रकृति कहते हैं । दोनों का परस्पर प्रति घनिष्ठ सम्बन्ध है अतएव ' प्रकृतिवद् विकृतिः कर्त्तव्या ' यह कहा जाता है । इनमें कितने ही कर्म्म तो विकृति में करने पड़ते हैं-कितने ही नहीं करने पड़ते । प्रकृति में होतृप्रवरण होता है । होता का ' अग्निर्देवो देव्यो होता ' इत्यादि [ ६५७ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) प्रातपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण मन्त्र से प्रवरण किया जाता है । यह कर्म विकृति में नहीं होता क्यों कि होता का जब अङ्गी के लिए प्रवरण किया गया हैं तो वह अङ्गों में भी अवश्य शामिल रहेगा परन्तु प्रकृति में जैसे प्राश्रावण कर्म्म होता है वैसे विकृति में श्राश्रावण अवश्य होता है । जो कर्म किया जाता है उसे प्राणदेवताओं को सुना देने का नाम ' श्रावण ' । यद्यपि अवान्तर कर्म्म उसी प्रधान कर्म का प्रङ्ग है परन्तु कर्म्म तो भिन्न है । प्रत्येक इष्टि के देवता और कर्म्म भिन्न - भिन्न होते । अतएव कर्म - देवता भेदात् देवताओं को सूचना देना अत्यावश्यक है । ' अब हमने यह किया है ' तथा ' अब हमने यह किया है ' इस प्रकार की सूचना का नाम ' श्राश्रावण ' है । अंगी कम्मों की अवस्था में नए कर्म में आश्रावण अवश्य ही करना पड़ता है । हाँ, ऋत्विक् वही रहेंगे - होतृ प्रवरण नया नहीं होगा । श्राज हम आरथ्याधीत कर्म्म कर रहे हैं । उपसद् याग - प्रग्निष्टोम का प्रङ्ग है अतएव अग्निष्टोम में जो ऋत्विक् होते हैं - वे ही इस उपसद् - विकृति यज्ञ में होते हैं । इसमें होता का प्रवरण नहीं किया जाता परन्तु कर्म्म नया है - देवता नए हैं-अतएव श्राश्रावण तो अवश्य ही करना पड़ता है । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" अथाश्राव्य न होतारं प्रवृणीते " । अध्वर्यु, आग्नीध्र और होता ये तीन ऋत्विक् प्रश्रावण कर्म में शामिल रहते हैं । सबसे पहले अनुवाक्या बोलकर होता श्राग्नीध्र के प्रति कहता है - ' ओश्राव ' । उत्तर में श्राग्नीध्र बोलता है ' प्रस्तु श्रौषट् ' । बाद में होता श्रध्वर्यु ' से कहता है – ' यज ' । तदनन्तर ' यजामहे ' बोलकर ' वौषट् ' बोलता हुआ प्राहुति दे देता है । इस प्रकार आश्रावरण कर्म में सत्रह अक्षरों से सप्तदश उद्गीथ प्रजापति स्वरूप यज्ञ ' ग्रस्तु श्रीषट् ' ये भी चार ही को श्रात्मसात कर लिया जाता है । ' प्रश्रायव ' ये चार अक्षर हैं । ' यज ' दो अक्षर हैं । ‘ ये यजामहे - पाँच हैं । ' वौषट् ' में दो अक्षर हैं । इस प्रकार सत्रह अक्षर हो जाते हैं,
अतएव यह कहा जाता है-" चतुभिश्च चतुभिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च ।
हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तस्मै यज्ञात्मने नमः " ॥
इस आश्रावण कर्म्म के अनन्तर अध्वर्युं होता से - ' उपसीद होता ' ( हे होता! आप अपने प्रसन पर बैठ जाइए ) यह कहता है । याज्ञवल्क्य कहते हैं - अध्वर्यु केवल श्राश्रावण कर्म्म ही करता है- होता का प्रवरण नहीं करता है । केवल ' उपसीद होता ' यह कह देता है--" प्रथा श्राव्य ( श्रध्वर्युः ) न होतारं प्रवृणीते -सीद होतरित्येवाह " । इस प्रैष से होता उत्तर पश्चिम की श्रोणि में बना हुआ जो अपना होतृसदन है उसमें बैठ जाता है— " उपविशति होता होतृषदने ” । [ ६५८ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण वहाँ बैठकर होता प्रध्वर्यु को आज्ञा देता है । अध्वर्युं करता है - प्रसव होता करता है । कर्म का प्रसव ' घृतवतीमध्वर्यो त्र ुचमास्यस्व ' यह कहता है । हे अध्वर्यु! यही प्रसव करना है । ' उपविश्य प्रसौति ' इति । होता से प्रसूत होकर अध्वर्यु जुहू में उठाता है--याज्या और प्रसव दो काम होते हैं । याज्या करना - प्रारम्भ करना होता का काम है— अब यज्ञ के लिए जुहू - उपभृत को लीजिए-और उपभृत को हाथ " प्रसूतोऽध्वर्युः स्रुचौ ( जुहूपभृतौ ) प्रादत्ते ॥ १० ॥
ब्राह्मण के प्रारम्भ में हमने बताया है कि जब अध्वर्यु कर्म नहीं करता है तो वेदि के उत्तर तृषदन से पूर्व बैठता है एवं जब कर्म्म करता है तो वेदि से दक्षिण- ब्रह्मा से पूर्व - ग्राहवनीय के पास बैठता है । अब वह उपसत् याग के लिए आहुति देने वाला है श्रतएव उत्तर भाग में से श्राक्रमण कर दक्षिण भाग में आ कर बैठता है । बस उत्तर से आक्रमण करता हुआ अध्वर्यु होता को ' अग्नये ऽनुब्रूहि ' यह प्रैष करता है । अध्वर्यु स्वयं याज्या करने के लिए जा रहा है परन्तु याज्या - बिना अनुवाक्या के – हो नहीं सकती । देवता को बुलाने का नाम ही तो ' अनुवाक्या ' है । जब देवता ही नहीं आएँगे तो याज्या किस की होगी? अतएव होता अनुवाक्या करने के लिए प्रैष करता है । इसका भाव यही है कि है होता! मै उत्तर से दक्षिण की ओर याज्या करने के लिए जाता हूँ एवं अग्नि - सोम - विष्णु - इन तीनों में से पहले अग्नि देवता का यजन करूँगा अतएव तुम अग्नि के लिए अनुवाक्या मन्त्र बोलो - अग्नि देवता को यज्ञ में बुलाओ-" स ( अध्वर्यु ) ग्रह प्रतिक्रामन् - श्रग्नयेऽनुब्रूहि " - इति । इसके अनन्तर ' आश्रावय ' बोलता है - इसके प्रत्युत्तर में प्राग्नीध ' अस्तु श्रीषट् ' बोलता है । इसके बाद होता अध्वर्यु से कहता है - ' अग्नि यज ' अर्थात् श्रव श्राप याज्या मन्त्र बोलिए । इसके वाद होता जिस समय ' वौषट् ' यह बोलता है उसी समय अध्वर्युं प्रग्नि में अग्नि के लिए उस श्राघे घृत की प्राहुति डाल देता है । जुहू में आठ बार अग्नि - सोम दोनों के लिए घृत लिया जाता है अतएव श्राधे की आहुति देनी चाहिए और आधा सोम के लिए बचा लेना चाहिए-" आश्राव्याह- अग्निं यजेति । वषट्कृते ( होत्रा ) जुहोति ” ॥११ ॥
अग्नि के बाद है- सोम । अतः तदनन्तर अध्वर्यु फिर होता को " सोमायानुब्रूहीति " ॥१२ ॥
यह प्रैष करता है । इसके बाद उसी पूर्व क्रमानुसार वषट्कार के साथ जुहू में अवस्थित उस आधे घृत की प्राहुति दे देता है । • हमने बतलाया था कि अध्वर्यु स्रवा में से अग्नि - सोम के लिए आठ बार जुहू में घृत लेता है और अकेले विष्णु के लिए चार बार उपभृत में लेता है । इसमें जो जुहू का आठ बार लिया हुआ घृत था-[ ६५ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण उसकी अग्नि और सोम के लिए आधा - आधा करके आहुतियाँ दे दी गईं । बाकी उपभृत में घृत रह गया । आहुति जुहू से ही होती है । अतएव उपभृत के घृत को भी जुहू में ही लेना पड़ता है एवं इससे विष्णु के लिए आहुति दी जाती है । बस, वह अध्वर्यु अग्निसोम यजनानन्तर उपभृत में जो आज्य होता है उसे जुहू में डालता हुआ होता से कहता है- ' विष्णवे - अनुब्रूहि ' इति । इसके बाद पूर्वोक्त क्रम से नाश्रावण प्रत्याश्रावण कर ' वौषट् ' के साथ विष्णु के लिए श्राज्याहुति श्राहुत कर देता है— " अथ यदुपभृत्याज्यं भवति तत् समानयमान आह ( जुह्यां प्रक्षिपन् श्राह )
विष्णवेऽनुब्रूहि " - इति । श्राश्राव्याह विष्णुं यजेति वषट्कृते जुहोति ॥१३ ॥
प्रकृति - यज्ञ में आक्रमण - प्रत्याक्रमण होता है । वेदी पर प्रस्तर रहता है - उस पर हवि रखी रहती है । बाहुति देने जाता है तो उसमें से हवि लेता है - बाद में दुबारा आहुति देने के लिए वेदी पर से हवि लेने हेतु प्रत्याक्रमण करता है । इस प्रकार प्रकृतियज्ञ में आक्रमण - प्रत्याक्रमण होता है । वही इस विकृतियाग में भी प्राप्त है उसका निषेध करते हैं । यह अध्वर्यु आहवनीय के दक्षिण प्रदेश में ही खड़ा रह कर आहुति देता है अर्थात् प्रकृतिवत् प्रारोहण प्रत्यारोहण नहीं करता है । दर्श-पूर्णमासेष्टि में जिस मार्ग से गया है, पुन: हवि लेने के लिए फिर उसी मार्ग से लौटता है - ऐसा • संचार यहाँ नहीं करता । इसका एक मात्र कारण अभिजिति ही है । ग्रभिजिति के लिए शत्रु पर विजय-प्राप्त करने के लिए - यह अध्वर्युं वापस प्रत्याक्रमण नहीं करता अपितु वहीं एक स्थान पर खड़े रहकर ही आहुति देता है--" स यत् समान ( एतस्मिन्नेवाहवनीय दक्षिणप्रदेशे ) तिष्ठन् जुहोति -न यथेदं प्रचरन्त्सञ्चरति - श्रभिजित्याः ( अभिजित् ) " । “ दर्शपूर्णमासेष्ट्यां - यथेतं येन मार्गेण गतः तेनैव पुनरपि हविरवदानाय गच्छति तथात्र न कसं-व्यमिति भावः ” । मैं शत्रुओं को जीत लू - उन्हें पीट दूँ -युद्ध से पीछे पैर न दूँ - इसलिए एक ही स्थान पर स्थित होकर आहुति देता । सच है - उपसत् से शत्रुओं के किले का नाश किया जाता है । ऐसे समय में प्रत्याक्रमण करना युद्ध को पीठ देना है - यह पराजय का काम है अतः ऐसा नहीं करना चाहिए । मैं श्रवश्य ही जीतू गा - इस भावना के लिए एक स्थान पर जम कर ही शत्रु से मुकाबला करना चाहिए— " अभिजयानि इति ( एकत्रैव तिष्ठन् जुहुयात् ) " । इस यज्ञ में यह अध्वर्यु अग्नि- सोम - विष्णु - इन तीन देवताओं का प्रजन करता है । इस यजन से संवत्सर - रूप जो बज्र है, उसे संस्कृत बनाता है - शानदार बनाता है । वज्र - ग्रग्नि, सोम और विष्णु इन तीन प्राणों से बनता है । वज्र का जो मुख भाग है - जो कि जा कर शरीर में घुस जाता है - वह अग्नि का स्थान कहलाता है । वज्र का श्रनीक श्रग्नि है, मध्य का भाग शल्य है - यह सोम देवताक है एवं पुच्छ - भाग [ ६६० ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) श्रनीक सत्य श्रग्निः सोम शतपथ ब्राह्मणं कुल्मल विष्णु उपसदिष्टि ब्राह्मणं विष्णु देवताक है । वज्र संवत्सरयज्ञ का नाम है । यह यज्ञ संवत्सराग्नि स्वरूप है । पृथिवी से वितत् रहने वाला जो संवत्सराग्नि है वही तमोमय प्राण के असुरों के विनाश के लिए वज्र है । उस अग्नि की वसु, रुद्र आदित्यादि ३३ अवस्थाएँ हैं । उनमें से जो यज्ञ का प्रारम्भक वसु है - वह श्रग्नि कहलाता है, मध्य स्थान में अर्थात् पञ्चदशस्तोम में ( अन्तरिक्ष में ) सोम रहता है और अग्नि की अर्थात् यज्ञ की जो अन्तिम अवस्था है - उसी का नाम विष्णु है । वह इस यज्ञवज्र के पुच्छ भाग में रहता है । अग्नि यज्ञ के प्रारम्भ में है - मध्य में सोम है । विष्णु अन्त में है इसीलिए तो कहा जाता है-" अग्निवें देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा श्रन्या देवताः ” । ( ऐ ० ब्रा ० १०१ ) बस, संवत्सर यज्ञ का -जो कि असुरों के लिए वज्र है- प्रग्नि, सोम और विष्णु - तीन ही प्राणों से संस्कार होता है । प्रकृति में संवत्सर वज्र का तीन ही देवताओं से संस्कार होता है । अतएव आज यह यजमान - इन तीनों का यजन कर इनसे संवत्सरवज्र का जिसकी रक्षा में इसका श्रात्मा स्वर्ग में जाने वाला है - संस्कार करता है—
" अथ यदेता देवता यजति वज्रमेवैतत् संस्करोत्यग्निम् श्रनीकम् ।
सोमं शल्यम्, विष्णुं कुल्मलम् " ॥ १४ ॥
यह वज्र कौन सा है और उसका संस्कार इन तीन देवताओं से कैसे होता है - इसकी दूसरे प्रकार से उपपत्ति बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं - जिसे हमने वज्र कहा है वह यही संत्वसर | पृथिवी को केन्द्र में रख कर पृथिवी से चारों ओर तक रथन्तर साम तक व्याप्त होने वाला जो घन - तरल - विरलावस्था-त्रययुक्त अग्निमण्डल है - उसी का नाम संवत्सरमण्डल है और यही वज्र है । संवत्सर अग्नि - स्वरूप है । प्रसुर तमोमय हैं । तम को अग्नि- प्रकाश फाड़ देता है - विदीर्ण कर देता है- प्रतएव हम इस संवत्सर को अर्थात् संवत्सराग्निमण्डल को वज्र कहने के लिए तैय्यार हैं-" संवत्सरो हि वज्रः ” 1 जो दिन है - वह अग्निस्वरूप है, सोम - रात्रिस्वरूप है— एवं इन दोनों के बीच में जो प्रारण है— वह विष्णु है । देवताओं का जो परस्पर संगम है उसी का नाम यज्ञ है - इस सम्बन्ध का नाम ही यज्ञ है । अग्नि भी देवता है - सोम भी देवता है । अग्नि ग्रहः स्वरूप है— सोम रात्रि स्वरूप है । दोनों का जो परस्पर सम्बन्ध हो रहा है - उसे ही यज्ञ कहते हैं । सम्बन्धकर्त्ता प्राण - जिसे कि यज्ञ कहते हैं - हो-[ ६६१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण रात्रस्वरूप अग्निसोम के बीच में बैठा हुआ है । दो कागजों को यदि जोड़ा जाता है तो दोनों के बीच में गोंद लगाया जाता है । मध्यस्थ गोंद ही संघानकर्त्ता हैं । एवमेव अहोरात्र का मध्यप्राण ही संधाता है | इसी ने देवतानों का संगम करा रखा है अतएव इसे हम ' यज्ञ ' कहने के लिए तैय्यार हैं । ' यज्ञो व विष्णुः ' ( शत ० १३।१।८८ ) विष्णु वै यज्ञः ' ( ऐ ० ब्रा ० १।१५ ) यह सिद्धान्त है । अतएव इस मध्यस्थ संधाता को हम विष्णु कहने के लिए तैयार हैं । इससे सिद्ध हो जाता कि रात्रि - सोमदेवता है, दिन- अग्निदेवता है, मध्यस्थासन्धि - विष्णुदेवता है । इस प्रकार अहोरात्र में तीनों देवता मौजूद हैं । " अग्निर्वाग्रहः । सोमो रात्रिः । अथ यदन्तरेण तद् विष्णुः " । ये तीनों अर्थात् अग्नि- सोम - विष्णु ( अहोरात्र सन्धि ) पुनः पुनरावर्त्तमान होकर संवत्सर का स्वरूप बना देते हैं । दिन के बाद रात - रात के बाद दिन इस प्रकार अहोरात्र की समष्टि का नाम ही तो संवत्सर है— " एतत् ( त्रयम् ) वै परिप्लवमानं ( पुनः पुनरावर्त्तमानम् ) संवत्सरं
करोति " । ॥१५ ॥
संवत्सर बज्र है । इसी संवत्सर वज्र से जो कि अग्नि- सोम - विष्णु इन तीन देवताओं से संस्कृत है— देवताओं ने - अर्थात् प्रकृति - पक्ष में प्राणदेवताओं ने और लोक - पक्ष में मनुष्यदेवताओं ने तीनों लोकों को तोड़ा और तीनों को अपने वश में कर लिया । तीनों पुरों को तोड़ कर सारे संवत्सर - प्राण देवताओं ने उन पर अपना आधिपत्य जमा लिया-" एतेन वै देवाः संवत्सरेण वज्रेण पुरः प्राभिन्दन् । इमाँल्लोकान् प्राजयन् ” । प्रतिज्ञानुसार निगम न करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि तथैव यह यजमान इस संवत्सरवज्र से इन तीनों लोकों की कठिनता को तोड़ता है और तीनों को जीत लेता है; इसलिए वज्र - संस्कर्त्ता अग्नि-सोम - विष्णु देवताओं का यजन करता है । यजमान का आत्मा सूर्य्य से बना हुआ है । तमोमय प्राण सूय्यं का विरोधी प्राण है । यह भी तीनों लोकों में घुसा रहता है । जिस समय यजमान मर कर जाने लगता है । तो लोकत्रयव्याप्त असुर- प्रारण इसे पीड़ा पहुँचाता है । बस, इसके विनाश के लिए वह अपनी दिव्यात्मा में तीनों देवताओं का आधान कर उसे सबल बना लेता है । ऐसी अवस्था में १७ वें स्वर्ग में जाते हुए यज-मानात्मा का आसुरप्राण कुछ नहीं बिगाड़ सकते - बस यही उपसत्यज्ञ का रहस्य है-" तथो एवैष एतेन संवत्सरेण वज्रेणेमाँल्लोकान् प्रभिनत्ति - इमाँल्लो-कान् प्रजयति - तस्मादेता देवता यजति " ॥१६ ॥
उपसत् क्यों करना चाहिए - इसकी उपपत्ति बतला दी गई । अब संख्या सम्बन्धी नियम बतलाते हैं - वह श्रध्वर्यु तीन उपसत् करे उसे तीन उपसत् करने चाहिए-[ ६६२ ]