Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 671–680

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 671–680

पृष्ठ 671

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मणे “ स वै तिल उपसद उपेयात् " । संवत्सरस्वरूप वज्ज्र का संस्कार करने के लिए अग्नि - सोम - विष्णु का यजन किया जाता है - उप-सद् किया जाता है । इस संवत्सर की उष्ण ( ग्रीष्म ) - वर्षा - शीत यह तीन ऋतुएँ हैं । उष्ण अर्थात् ग्रीष्म के अधिष्ठाता अग्नि हैं, शीत के अधिष्ठाता सोम हैं तथा वर्षा के अधिष्ठाता भगवान् विष्णु हैं । वर्षा आपो-मण्डल का नाम है — प्रापोमण्डल को ही परमेष्ठिमण्डल कहते हैं । यही विष्णु का स्थान है । तीन देवताओं की तीन ऋतुएँ हैं— तीनों का यजन किया जाता अतएव तीन उपसत् करने चाहिए । इस प्रकार तीन उपसत् करता हुआ यह अध्वर्यु संवत्सर का ही स्वरूप बनाता है । तीन उपसत् करना - संवत्सर वज्र को निष्पन्न करना है; संवत्सर को संस्कृत करना है-“ त्रयो वा ऋतवः संवत्सरस्य । संवत्सरस्यैवैतद् रूपं क्रियते । संवत्स-रमेवैतत् संस्करोति । अग्नि - सोम - विष्णु इझैँ तीनों के यजन से एक उपसत् का स्वरूप बनता है । ऐसे उपसत् प्रतिदिन दो करने पड़ते हैं । प्रातःकाल भी तीनों का यजन करना पड़ता है - सायंकाल भी तीनों का यजन करना पड़ता है । इस प्रकार प्रतिदिन दो उपसत् हो जाते हैं । एक उपसत् से दो बार प्रचारण करता है । तीन दिन तक उपसत् होता है— तीनों ही दिन दो - दो होते हैं— इस वीप्सा को बतलाने के अभि-प्राय से कहते हैं-" द्विरेकया प्रचरति द्विरेकया " ॥१७ ॥

" एकया उपसदा प्रतिदिवस द्विः प्रचरति प्रतिदिनमुपसदं द्वयं करोति- इतिभावः " । इस प्रकार तीन दिन में छः उपसत् हो जाते हैं— " ताः षट् सम्पद्यन्ते " । वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत, हेमन्त और शिशिर ये छः ऋतुएँ संवत्सर की हैं अर्थात् संवत्सर में छः ऋतुएँ होती हैं । ऐसी अवस्था में छः उपसत् करता हुग्रा अध्वर्युं संवत्सर के स्वरूप को निष्पन्न करता है एवं इससे संवत्सर को संस्कृत करता है— " षड् वाऽऋतवः संवत्सरस्य संवत्सरस्यैवैतद् रूपं क्रियते । संवत्सर-मेवैतत् संस्करोति । " ॥१८ ॥

कितने ही महर्षियों का मत है कि बारह उपसत् करने चाहिए । अध्वर्युळे बारह उपसत् करता है- - तब भी संवत्सर संपत्ति में कोई बाधा नहीं इस मत के अनुसार यदि पड़ती । उपसत् संवत्सर [ ६६३ |

पृष्ठ 672

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपंथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण प्राप्ति के लिए किया जाता है । चूँकि बारह उपसत् से संवत्सर संपत्ति प्राप्ति में कोई बाधा नहीं पड़ती अतएव इस मत में कोई विरोध नहीं है । संवत्सर के बारह महिने होते हैं तो बारह उपसत् करता हुआ यह अध्वर्यु संवत्सर के स्वरूप को निष्पन्न करता है एवं द्वादशावयवात्मक संवत्सर को द्वादश उपसत् कर्म्म से संस्कृत करता है । बारह भागों में से उपसद् वज्र द्वारा असुरों को निकालता है । जिस प्रकार तीन उपसत् यज्ञ की व्यवस्था में प्रति दिन दो उपसत् करने का विधान बतलाया गया था तथैव यहाँ भी प्रतिदिन दो उपसत करने चाहिए - इसी अभिप्राय से कहते हैं-“ यद्यु द्वादशोपसद उपेयात् - द्वादश वै मासाः संवत्सरस्य । संवत्सरस्यैवैतद् रूपं क्रियते । संवत्सरमेवैतत् संस्करोति- ' द्विरेकया प्रचरति - द्विरेकया ” ॥१ ९ ॥ इस प्रकार बारह उपसत् यज्ञ में प्रतिदिन दो उपसदों के हिसाब से कुल चौबीस उपसत् हो जाते हैं-" ताश्चतुर्विंशतिः सम्पद्यन्ते " एक संवत्सर के चौबीस प्रर्द्धमास हैं अर्थात् एक संवत्सर में बारह महीने होते हैं- शुक्ल तथा कृष्ण भेद से चौबीस पक्ष होते हैं । इस प्रकार चौबीस उपसत् करता हुआ - संवत्सर स्वरूप को निष्पन्न कर लेता है एवं चौबीस पक्षों से युक्त चतुर्विंशत्यवयवस्वरूप संवत्सर को संस्कृत कर देता है । चौबीस पक्षों में वज्र - प्रयोग कर सारे संवत्सर में से असुर निकाल देता है—

" चतुर्विंशतिर्वै संवत्सरस्यार्द्धमासाः । संवत्सरस्यैवैतद् रूपं क्रियते ।

संवत्सरमेवैतत् संस्करोति " ॥२० ॥

एक उपसत् प्रातःकाल तथा एक सायकाल करना होता है । उपसत् शत्रु के विनाश के लिए किया जाता है । श्रध्वर्युं चूँकि सायं प्रातः दोनों समय उपसत् करता है; अतएव जिस प्रकार मनुष्य लोग युद्ध करके संपत्ति प्राप्त कर लेते हैं तथैव यह भी संपत्ति प्राप्त कर लेता है । लोक में देखा जाता है कि पहले शत्रु पर हमला किया जाता है - हमला करके उसे मारा जाता है - उसकी सत्ता नष्ट की जाती है एवं बाद में उस पर अपना अधिकार जमाया जाता है । शत्रु के शासन को तोड़ना और अपना शासन स्थापित करना - ये दो ही तो काम होते हैं । यही वास्तविक संपत्ति - प्राप्ति है । यदि शत्रु हार गया परन्तु उसकी संपत्ति हाथ न आई अपना शासन वहाँ न जमा तो लड़ाई करना व्यर्थ है । बस संपत्तिद्वय प्राप्त करने के लिए ही प्रातः सायं दोनों समय उपसत् करता है - इससे यजमान वास्तविक संपत्ति को प्राप्त कर लेता है - इसी अभिप्राय से कहते हैं— “ स यत् सायं प्रातः प्रचरति तथा ह्येव सम्वत् संपद्यते " । इस कर्म से यह श्रध्वर्यु जो कि पूर्वाह्न में उपसत् का प्रचरण करता है - उससे शत्रुओं को जीत लेता है । आनुपूर्वी से समाप्ति पर्य्यन्त श्रग्नि- सोम- विष्णु के याग की जो इतिकर्तव्यता है - उसीका नाम [ ६६४ ]

पृष्ठ 673

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मरण प्रचरण है । बस यही एक उपसत् का स्वरूप है । इस पहले - पूर्वाह्न के - उपसत् से यह शत्रुओं को अपने वश में कर लेता है - जीत लेता है एवं जो अपराह्न में उपसत् करता है - वह ' सुजित ' हो जाए इसलिए करता है, अर्थात् दूसरे से उस विजय को सुविजय बनाता है । पहले से हमला करके शत्रु को मार भगाता है, दूसरे से शत्रु को साकल्येन निःशेष कर देता है । इस प्रकार शत्रु नाश इन दोनों उपसद् यागों से हो जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " स यत् पूर्वाह्णे प्रचरति तज्जयति ( पूर्वाह्न प्रचारः शत्रुजयमात्र रूपः ) अथ यदपराह्णे प्रचरति - सुजितमसदिति " ( अपराह्न प्रचारः साकल्येन जयात्मकः ) । इस अपराह्न उपसत् के अन्त में उपसद् होम और होता है- बैठ कर जो होम किया जाता है उसे होम कहा जाता है एवं खड़े होकर जो होम किया जाता है उसे याग कहा जाता है । यहाँ ' होम ' और ' याग ' दोनों होते हैं । उपसद् याग - सायं प्रातः होता है - उपसद् होम सायंकाल उपसद् यागानन्तर होता है । इसमें भी इन्हीं तीनों को आहुति दी जाती हैं । उपसद् याग से जो संपत्ति शत्र - रहित हो गई थी-उसे उपसद् होम से कब्जे में कर लेता है । उपसद् याग से उसे अपनी बना लेता है और उपसद् होम से अपनी बनी हुई पर अपना अधिकार कर लेता है - इसी अभिप्राय से कहते हैं— " अथ यज्जुहोति - इदं वै पुरं युद्धयन्ति तां जित्वा स्वां सतों प्रपद्यन्ते " । जीतने वाले पहले शत्रुश्नों के साथ युद्ध करते हैं - युद्ध करके उसका किला तोड़ते हैं- बाद में उसकी संपत्ति को - राज्य को जीत लेते हैं । इसके अनन्तर सुजित संपत्ति पर अपना अधिकार जमा लेते हैं । इस प्रकार तीन कम्र्मों से शत्रु पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेते हैं । एवमेव यहाँ भी प्रातःकाल के उपसत् से उन्हें सर्वात्मना निःशेष करना है । उपसद् होम से सारी संपत्ति को अधिकृत करना है— " इदं वै पुरं युद्धयन्ति तां जित्वा स्वां सतीं प्रपद्यन्ते ॥२१ ॥

इसी लौकिक प्रकार का स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं - यह अध्वर्यु जो प्रचरण करता है अर्थात् प्रातःकाल का उपसत् करता है - वह युद्धस्थानीय है । प्रातः काल में उपसत् करना- शत्रु के साथ युद्ध करना है एवं जो उपसत् की समाप्ति है अर्थात् सायंकाल का उपसत् है — उससे शत्रु पर विजय प्राप्त करता है एवं जो उपसद् होम करता है - उससे सारी संपत्ति पर अपना अधिकार जमाता है— " स यत् प्रचरति तद् युध्यति । अथ यत् संतिष्ठते तज्जयति प्रथ यज्जुहोति स्वामेवैतत् सतीं प्रपद्यते " - इति ॥२२ ॥

उपसत् याग क्यों करना चाहिए इसका नाम उपसत् क्यों हुआ- कितने उपसत् करने चाहिए-इत्यादि प्रश्नों का उपपत्तिपूर्वक समाधान कर दिया गया - अब आवृत्त पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्यु [ ६६५ ]

पृष्ठ 674

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण [ ६६६ ] उपसदिष्टि ब्राह्मण ( शत ० ६।१।३।५ ) ( तै ० ब्रा ० १।५।६।६ ) निम्नलिखित मन्त्र से आहुति देता है । प्रतिदिन जिस ऋचा से दो बार आहुति देगा उसी से आहुति देता है । उपसत् याग तो पहले ही बतला दिया गया - ' स जुहोति ' से उपसद् होम बतलाते हैं । यह भी दो ही बार करना चाहिए - प्रातः काल भी उपसद्यागानन्तर उपसद् प्रेम होता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " स जुहोति यया द्विरेकस्याह्नः प्रचरिष्यन् भवति ” ॥२३ ॥

प्रातः काल भी इसी मन्त्र से उपसद् होम होगा और सायंकाल भी इसी मन्त्र से उपसद् होम होगा यही ' द्विरेकस्याह्नः प्रचरिष्यन् भवति ' का तात्पर्य है । वह मन्त्र यह है— " या तेऽश्रग्नेऽयः शया तनूर्वषिष्ठा गह्वरेष्ठा । उग्रं वचोऽपावधीत्त्वेषं वचो अपावधीत्स्वाहा " ॥ इति ( वा ० स ० ५८ ) हे अग्नि! आप की जो श्रयः शया - लोहमयी - तनु है वह बहुत ही बड़ी है । एवं गह्वरेष्ठा ( अंधकारमयी ) है - अति कठिन है - वह तनू - मेरा जो उग्र वचन है और त्वेष वचन है— उसे तोड़ डाले-ऐसे श्रापके लिए स्वाहा है । पृथिवी से त्रिवृत्स्तोम तक पार्थिव काला प्राण घनरूप से रहता है एवं वही लोहा बनता है । लोहा असल में अग्नि का शरीर है । अग्नि ही तो लोहा बन गया है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि जब लोहे को तपाया जाता है तो वह अग्नि - सदृश हो जाता है । श्रतएव — " तस्मादयो बहुध्मात हिरण्यसंकाशमिवैव भवति " । इस अग्नि से परोक्षभाव से कहा जाता है कि हे अग्नि! लोहे की जो पुरी है उसके अधिष्ठाता भी तो आप ही हैं - आप हमारे हो कर - ( देवता हो कर ) असुरों को मदद क्यों देते हो? आपको चाहिए कि हमारे जो उग्र वचन हैं और त्वेष वचन हैं उनको तोड़ दें । किले को जब शत्रु घेर लेता है तो रसद बन्द हो जाती है । उस समय भूख - प्यास के मारे किले में रहने वाले मनुष्य ' अरे हमें कोई बचाओ - हम भूखों मर रहे हैं ' – इस प्रकार चिल्लाने लगते हैं । बस भूख - प्यास सम्बन्धी जो चिल्लाहट है उसे ' उग्र – वचः ’ कहते हैं एवं शत्रु के शस्त्र का जो प्रहार है उससे जो वेदना - युक्त चिल्लाहट होती है उसे ' त्वेषं वचः ’ कहते हैं । इसी अभिप्राय से तैत्तिरीय श्रुति कहती है-" अशनयापिपासे ह वा उग्रं वचः । एनश्च वैरहत्यं च त्वेषं वचः ” आज शत्रुनों से दबे हुए तथा उग्र वचन बोलते हुए जो हम हैं - ऐसे हमारे उम्र वचन को अर्थात् चिल्लाहट को आप दूर करो - यही तात्पर्य है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वह पुरी वास्तव में एवंरूपा थी अर्थात बहुत बड़ी थी और गह्वरेष्ठा एवं लोहमयी थी । इतिहास के सम्बन्ध की ओर लक्ष्य कराने के लिए यह कहा है-

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण यह है— " एवंरूपा हि सासीद् रजता हि सासीत् ॥२४ ॥

इसके बाद दूसरे मन्त्र से आहुति देता है । इससे भी प्रातः सायं दोनों बार देगा । वह मन्त्र " या तेऽग्ने रजःशया तनूर्वषिष्ठा गह्वरेष्ठा । उग्रं वचोऽपावधीत्त्वेषं वचोऽप्रपावधीत् स्वाहा " ॥ ( वा ० स ० ५।८ ) इसके बाद तीसरे मन्त्र से आहुति देता है - इससे भी दोनों बार दी जाएगी— " या तेऽग्ने हरिशया तनूर्वषिष्ठा गह्वरेष्ठा । उग्रं वचोऽअपावधीत्त्वेषं वचोऽप्रपावधीत् स्वाहा ॥ ( वा ० स ० ५।८ ) इस मन्त्र का भी अर्थ स्पष्ट ही है । इस प्रकार तीन उपसत् के वक्त में - प्रति दिन छ मन्त्रों को बोलना पड़ता है । प्रत्येक को दो बार बोलना पड़ता है । यदि बारह उपसत् करें तो एक - एक मन्त्र से चार - चार दिन तक प्रचार करे अर्थात् आदि के चार दिन तक " यातेऽश्रग्नेऽश्रयः शयाः " यही बोले, मध्य के चार दिनों तक प्रतिदिन ' या ते अग्नेऽरजः शयाः ' यही बोले एवं अन्त के चार दिन तक ' या तेऽग्ने हरिशयाः ' यह बोले – " यद्यु ( यदि पुनः ) द्वादशोपसद उपेयात् - चतुरहमेकया प्रचरेत् चतुरह-मेकया " ॥२५ ॥

जिन उपसदों में यजमान पय का व्रत करता है अर्थात् उपसत् के दिनों में यजमान जो दूध ( व्रत ) पीता है - वे उपसत् ' व्रतोपसद ' कहलाते हैं । अब इन की मीमांसा की जाती है । व्रतोपसदों में किस क्रम से दूध पीना चाहिए - यह बतलाते हैं— " अथातो व्रतोपसदामेव ( मीमांसा क्रियते - इति शेषः ) " । धर्मशास्त्रों में आठ प्रकार का चान्द्रायण बतलाया जाता है— उनमें एक का नाम है - वर्धिष्णु चान्द्रायण व्रत, एक का नाम है— क्षयिष्णु चान्द्रायण व्रत । दोनों ही का प्रकृत से सम्बन्ध है । कार्तिक कृष्ण अमावस्या को सर्वथा उपवास करे- बाद में चन्द्रमा की कला के अनुसार एक - एक ग्रास बढाता जाए-पूर्णिमा तक १५ ग्रास हो जाएँ तो फिर एक - एक ग्रास घटाता आए - अन्त में मार्गशीर्ष अमावस्या को निराहार हो जाएगा । इस चान्द्रायण व्रत को ' वर्धिष्ण ' चान्द्रायण कहते हैं । इसकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती है । दूसरा है - क्षयिष्णु चान्द्रायण व्रत । आश्विन् की पूर्णिमा को १५ ग्रास खाता है - प्रतिपदा को १४ ग्रास- इस प्रकार घटाते चले जाओ - जिस दिन अमावस्या हो उस दिन कुछ नहीं खाम्रो - अन्त में [ ६६७ ]

पृष्ठ 676

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तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मणे कार्तिक की पूर्णिमा को १५ ग्रास खा लो । बस इस वर्धिष्णु चान्द्रायण का नाम वेद में ' परउर्वी ' है-क्षयिष्णु का नाम " परोह्वीः " है । इस उपसत् के विषय में महर्षियों के दो मत हैं । एक संप्रदाय का मत है - उपसद् परउर्वी होते हैं अर्थात् वर्धिष्णु क्रम से दूध पीना चाहिए । दूसरा संप्रदाय कहता है कि नहीं-परोह्वी उपसद् करना चाहिए - इसी अभिप्राय से कहते हैं— " परउर्वी वा अन्या उपसदः । परोऽह्वीरन्या ": । इन दोनों का लक्षण बतलाते हुए कहते हैं - जिन उपसदों की व्रत - क्रिया में पहले दिन एक थन दोहते हैं - दूसरे दिन दो दोहते हैं- तीसरे दिन तीन दोहते हैं - यह उपसत् ' परउर्वी ' कहलाते हैं । पहले दिन एक स्तन का दूध पीएँ- दूसरे दिन दो स्तनों का पीएँ- तीसरे दिन तीन स्तनों का पीएँ यही ' परोर्वी ' उपसद् है । जिन उपसदों में एक - दो - तीन इस प्रकार से व्रत वृद्धि है वे उपसत् ' परउर्वी ' हैं - यही तात्पय्यं है— “ स यासामेकं प्रथमाहं दोग्धि - अथ द्वौ -प्रथ त्रीन्, ताः परउर्वीः ” । जिन उपसदों की व्रत - क्रिया में पहले दिन तीन स्तन दोहते हैं- दूसरे दिन दो स्तन दोहते हैं-तीसरे दिन एक ही स्तन दोहते हैं - ऐसे उपसत् ' परोही ' कहलाते हैं— " अथ यासां त्रीन् प्रथमाहं दोग्धि । अथ द्वौ । अथैकम् । ताः परोऽह्वीः ” । याज्ञवल्क्य कहते हैं - इस प्रकार परउर्वी और परोह्वी में अन्तर मालूम पड़ता है परन्तु वास्तव में देखा जाए तो दोनों का स्वरूप एक ही है । दोनों में समान दूध मिलता है अतएव फल की ओर देखते हुए हम कह सकते हैं कि जो परोह्वी है - वह परउर्वी है और जो परऊर्वी है - वह परोह्वी है ।

" या वै परोह्वीस्ताः परउर्वीः । याः परउर्वोस्ताः परोह्वीः ॥२६ ॥

यद्यपि दोनों में फरक नहीं है तथापि हमारी ( याज्ञवल्क्य की राय यही है- परोह्वी उपसत् ही करें अर्थात् क्षयिष्णुक्रम का ही आलम्बन लें । ऐसा क्यों करें? इसका कारण बतलाते हैं - तप से - परिश्रम से - तपोबल से ही देवता और मनुष्य - लोक जीतते हैं अर्थात् श्रय प्राप्ति परिश्रम से ही होती है । जो उत्तरोत्तर कम खाता है — उसका तप उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है— उत्तरोत्तर कम खाने से प्राणमात्रा अधिक खर्च होती है— एतद्वै तप इत्याकुर्यत् स्वं ददाति " - - यही तो तप का लक्षण है । जो क्षयिष्णु उपसत् करता है — उसका तप उत्तरोत्तर बढ़ता है एवं उत्तरोत्तर उत्तम लोकों को अपने वश में करता है । एवमेव जो विद्वान परोह्वी करता है वह वसीयान् होता है । अतः परोसी ही करना चाहिए । यह तो हुई तीन उपसत् की कथा । यदि बारह उपसत् करें तो तीन स्तनों को चार दिन तक दो - दो को मध्य के चार दिन तक दोहें - एक को अन्त के चार दिन तक दोहें इसी अभिप्राय से कहते हैं— [ ६६८ ]

पृष्ठ 677

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तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण " तपसा वै लोकं जयन्ति । तदस्यंतत् परः । पर एव वरीयस्तपो भवति । परः परः श्रेयांसँल्लोकं जयति । वसीयानु हैवास्मिँल्लोके भवति । य एवं विद्वान् परोऽह्वीरुपसद उपैति । तस्मादु परोऽह्वीरेवोपसद उपेयात् । यद्यु द्वादशोपसद उपेयात् त्रींश्चतुरहं दोहयेद् द्वौ चतुरहम् एकं चतुरहम् ॥२७ ॥

॥ इति उपसविष्टिब्राह्मरणं समाप्तम् ॥ ॥ इति चतुर्थाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति तृतीयकाण्डे चतुर्थोऽध्यायश्च समाप्तः ॥ - * -[ ६६ ९ ]

पृष्ठ 678

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पृष्ठ 679

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शुद्धि - पत्र [ प्रस्तुत शुद्धि पत्र में शुद्धियों की प्रविष्टियाँ पृष्ठसंख्या एवं पृष्ठगत पंक्तियों की संख्या के आधार पर की गयी हैं । पंक्ति की गणना प्रत्येक पृष्ठ में समाहित पंक्तियों के क्रम के अनुसार है । किसी भी प्रकार के टाइप में मुद्रित हो, और कितनी ही छोटी - बड़ी दीर्घता में हो, प्रत्येक पंक्ति, संख्या - गणना की दृष्टि से, पूर्ण पंक्ति मानी गई है । उद्धरणों के नीचे मुद्रित सन्दर्भ - पंक्तियाँ गणना में सम्मिलित नहीं हैं । प्रत्येक पृष्ठ परशुद्धियाँ क्रमश: ( १ ) मूलकण्डिका ( २ ) श्रनुवाद - भाग ( ३ ) व्याख्या - भाग तथा कण्डिका अंश के अतिरिक्त उस पृष्ठ के प्रस्तर्भुक्त ( ४ ) संस्कृतनिष्ठ अंश - इस क्रम से चार चरणों में अंकित हैं । शब्दों के संक्षिप्त रूप ये हैं - ककण्डिका उ ० = उद्धरण, प्र = अनुवाद - भाग, भा = व्याख्या ( भाष्य ) भाग तथा सं = संस्कृतनिष्ठ अंश ( कण्डिका - इत्तर ) । – सम्पादक ] पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / प्रनुवाद / शुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ भाय / पंक्ति संख्या ३ उ ०।१ वाचं देवा " 1 उ ० । २ वागक्षरं तै ० ब्रा ० २२८ | ८ | ४ तै ० ब्रा ० २२८ | ८ | ५ " 1 क ० १।१ येरन्यद्भू " 1 क ० २११ समं सविभ्रंशि " 1 क ० ३।१ ४ क ०५।१ 31 क ० ६।१ क ० ११।१ ५ भा ०११ @ भा ०।२७ १० " 11 ११ भा ० । १३ भा ०२८ भा ० | ३१ उ ० १।३ उ ०।१ देवयजमात्र ऋत्विजी प्राचीन वंशं मिन्वन्ति स्थूण राजमभिपद्यत पचा सकता फसिल सामस्वरूप उसी का नाम अग्निवें येरन्यदन्यद्भू समं सदविभ्रंशि देवयजनमात्र ऋत्विजो प्राचीनवंशं मिन्वन्ति स्थूणा राजमभिपद्येत पचा सकती फसलें साम का स्वरूप उसी का नाम है श्रग्निवे ऋग्वेद मं १।३५।२ अकेले 12 " 1 उ ० २२ देवो रथेनाऽयाति रथेना देवो याति [ १ ]

पृष्ठ 680

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / पृष्ठ संख्या भाष्य / पंक्ति संख्या भा ० । १३ 19 भा ०।१७ " 1 भा ० । १७ " " भा ० २५ 19 ६ " } ७ 11 ८ " २३।२४ " " १२ उ ०।१।२ सत्रस्य उ ० १२ " 1 उ ० २।१ भा ०।१० " 1 भा ०।१२ 11 १८ " १५ " सं ०।२३ १३ १४ उ ० | १ उ ० २ " 1 २1१ " 1 २।१ " " उ ०१३ उ ० ३ | १ 11 भा ० ५ " " भा ० | १४ 13 भा ०१६ १५ स । ८ 33 भा ०।१२ " १८ भा ०।२५ भा ० २६ " } सं ।२१ " 1 शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) शुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ ( १७ वें ) ज्योतिर्भाग ( १७ वें ग्रहगरण में ) ज्योतिर्भाग तेतीसों ३३ सौ फरक फक तस्यां तस्मिन् ( ऐ. ब्रा. २।१।१० ) तस्या तस्या ( ऐ. ब्रा. ) संदर्भ नहीं है । ऋग्वेद १।३।६ यजुः सं. ८।५२ ३३ पृ. यजुः सं. अध्यारुहामा विदाम देवान्त्स्व-मध्यारुहा माविदाम देवानुश्च ज्योतिः ज्योतिः उक्थः उक्थ्यः पश्वाशर पश्वाशर विकृतियाग विकृति भाग अध्यारुहा मा देवानृश्च ज्योतिः अध्यारुहामा देवान्त्स्वज्योंतिः देवान्त्स्वर्ज्या " कुरुक्षेत्रं वं देवयजनमास " " कुरुक्षेत्र वं देवयजनमास " चित्रं देवानामुदगादनीकं आयं गौः ऋग्वेद मं. १।११५।१ ऋग्वेद मं. १०।१८ ९ ।१ क्रमीद सदनमातरं पृश्निरक्रमी दसदन्मातरं प्रयन्तवः प्रयन्त्स्वः ऋग्वेद मं १०।१८।२ प्राणादपानती अन्तश्चरति प्राणदपानती आपत्तिप्रत्य भापतिप्राप्त प्राणपानत् प्राणदपानत् यज्ञ करना है । यज्ञ करता है " स सदेवं देवयजने यजते " " स सदेवे देवयजने यजते " यजमान जो यज्ञ यजमान तो यज्ञ उतथशास्त्र श्रुतशास्त्र श्रच्युता प्रह्नता जो मै मै [ २ ]