Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 681–690
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 681–690
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201 ( शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति - संख्या सं ।२२ " 1 सं १ ९ उ ० / १ २० उ ० / १1१ " उ ०१।१ " उ ० / २ " 1 उ ०।२।१ " " उ ०।२।१ उ ० १२ " उ ० १।२ " 1 भा ० / १५ 11 भा ० / २५ JD उ / १ २४ १।१ " 1२६ क ० १।१ क ० २११ " 1 क ० २०३ " क ० ४।१ " क ० ६।३ 11 क ० १०।१ २७ क ० १४ । १ 39 क ० १५।१ " 1 क ० १८।२ २८ क ० २०१३ " 1 क ० २१।५ " क ० २१।३ अनु ० / ३-४ " 1 २६ शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ अशुद्ध मुद्रित पाठ देवी देवा प्राचीन वंशत्वमुपद्यते प्राचीन वंशत्वमुपपद्यते प्रायं गौः ऋग्वेद मं ० १०।१८ ९ १ क्रमीदी सदन् मी दसन् पितरं च प्रयन्त्स्वः पितरंच प्रयन्तः ऋग्वेद मं ० १०।१८६।२ अन्तश्चरति प्राणादपानती प्राणदपानती महिष दिवम् महिषोदिवम् ऋक् ऋ यजुर्भिः रायस्पोषेण यजुभिरायस्पोषेण शूशुवान अनूचान् ऋक्सामयजु शुश्रूवान अनुचान ऋक्सामयजु यो ह व समुद्रा महदुक्थऋचाम् शत ० ६।५।२।१२ महदुक्थमृचाम् पुरा केशश्म प्रयोत्तरेण शालां पुराकेशश्म ce अथोत्तरेणशालां c: वाऽस्य वाऽप्रस्य वाऽअग्रे वाऽग्रे ततदेतमेवैतद्वजं तत्तदेतमेवैतद्वज पुरुषो यदनृतं गौर्वाऽइदं सर्व पुरुषो गोर्वाऽइदं सवं त्वचमधु स्तयैया प्रधातो परिदधइत्येवैतदाह भद्रं तस्मादाह प्रघातो परिदध ऽइति तां त्वा शिवां साध्वीं परिदध इत्येतदाह भद्रं वरणं पुष्यमिति पापं वा su षोऽग्रे वर्णं पुष्यति यममुम-दीक्षितो यात्र भद्रं तस्मादाह हादद्भुतमभिजनितोर्जायाचं कीर्तिस्तस्माद् क्रिया होती हैं । हाद्भुतमभिजनितोजीयार्थं कीर्तिस्तस्माद् क्रिया होती है [ ३ ]
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / अशुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ भाष्य / पंक्ति संख्या ३२ भा / ३१ दीक्षाङ्ग फर्क ३३ भा / १३ II सं । १६ भेद भाव प्राप्त्यर्थ ( केशवपनादुर्ध्वम् ) दीक्षाङ्ग कर्म देवभावप्राप्त्यर्थं ( केशवपनादूर्ध्वम् ). सं ।२५ " } वपने वपते ३४ उ ० | १ | २ मानुष्यश्चर्क विध 13 " 1 पृष्ठ - शीर्षक भा / १० दोक्षा ब्राह्मण: दीक्षा ब्राह्मण स्य 11 भा / १५ ३७ भा / १८ 91 ३६ " 1 ४० " सं २० उ ० २२ उ / २ उ ० ११ भा / ६ देने वाले ' वज्रो वा प्रापः ' भाववृत्रन्सवमादृतस्यादिद् ऋक् सं ० १।१६५ नि ० ४ | ३ | ५ कई कम बलवद्द देवयजन ब्राह्मण स्वयम्भू के हैं यह परमेष्ठिमण्डल देने वाली. ' वज्रो वा आपः ' आवृत्रन्त्सवनादृतस्यादिद् ऋग्वेद मं ० १।१६४।४७ नि ० ४।२१।२ कई कर्म बलीवर्दो दीक्षा ब्राह्मण के हैं इस परमेष्ठिमण्डल I " भा / २४ पृष्ठ - शीर्षक ४२ उ०- २/२ पथ द्यामङ्गिरसो पथोद्यामङ्गिरस 11 उ / २ इत एत साम ० सं ० पू ० १।२ साम ० सं ० पू ० १।१०।२ ४४ उ ० १।१ यान्तं यन्तं उ ० १२ मध्य मध्यं उ ।१ नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं " " मनु ४ | ३७ ४५ उ ० ११४ भूतानांपति गृहपतिरासीत् भूतानां पतिगृहपतिरासीत् उ ० ११४ तद्यानितानि तद्यानि तानि 11 उ ० ११५ ऋतवस्ते | प्रथ ऋतवस्तेऽथ 11 उ । १ श ० ६।१।३।६ शत ० ६।१।३।६-८ २।१ " उ ०२ तस्येतान्यष्टावग्नि-श ० ६।१।३।१८ 11 रूपाणि ४६ भा | २३ ४७ भा | १८ ४८ भा । १३ तस्येतान्यष्टावाग्नि रूपाणि तान्येतान्यष्टावग्निरूपाणि नरा नरा भावों का कहा कहा गया. पहिने कैसे [ ४ नए - नए भावों का कहा गया. पहने कैसे शत ० ६।१।३।१८-१९
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शपथे ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्यं / पंक्ति संख्या भा । २२ " II सं । ७-८ ५० 33 ५१ ५३ " 1 " = x ५४. उ ० १।१ उ ० १।१ सं । १ " 1 १३ क ० २।२ क ० ५१२ कं ० ११।२ अशुद्ध मुद्रित पाठ भाव उठ जाते " अज्ञात प्रकृतिकादनिष्ट संभावना भयम् ज्ञात द्रोहादनिष्ट संभावना-त्रासः ( " एम्योलोम गर्तेभ्यो ज्योतींष्यायन् तद्यानि मेध्यमसंदत् परिगृह्य सर्व यज्ञं परिगृह्य देवाँ उप प्रत्सप्तभिः राष्नोति परिभाषते शुद्धि - पत्र ( प्रथम खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ भाव हट जाते " अज्ञातप्रकृतिकादनिष्ट-संभावनाभयम् ज्ञातद्रोहादनिष्टसंभावना त्रासः ॥ ” एयो लोग भ्य मेध्यमसत् परिगृह्य सर्व यज्ञं परिगृह्य देवउपसप्तभि रौघूमोति परिभासते " " क ० ११।३ तद्यज्ञमुपप्रयन्सर्वतोऽश्म पुरां तद्यज्ञमुपप्रयन्त्सर्वतोऽश्मपुरा क ० १२/२ 11 त्रिककुदंमकरोत्तद्यत्र ककुदं त्रिककुदमकरोत्तद्यत्त्रैककुदं ५५ क ० १३।१ शरेषीकया अनक्ति शरेषीयानक्ति ५६ क ० २५।१ श्रथाङ्गलिर्न्यचति श्रथाङ्गगुलिं चति ५७ क ० २८ | २ संचरो भवत्यासुत्यायै तद्यदस्येष संचरो भवत्या संचरो भवत्यासुत्याया सुत्यायन 11 कं ० २६ | ४ त्वरि त्वत्परि ५७ सं । १६ श्रदितिर्ये श्रदितेर्ये ५१ अनु । - १ अञ्जना लगाना अञ्जन लगाना ६१ अनु ।२१ स्वाहो स्वाहो-१३ उ ।१ अग्निर्वै ऐ ० ब्रा ० १।१ ६५ उ ।१ एतद्देश मनुस्मृति २२० उ ० २२ " " धन्दांसि छन्दांसि " उ ०१२ तस्माद्यज्ञात् 31 उ ।३ तस्मादश्वा ६६ उ ०।१ श्रात्मा वा ऋग्वेद मं. १०1०18 ॠग्वेद मं. १०।१०।१० ऐत ० उ ० १।१ " उ ० १।२ सदर्भांल्लोक निसृजत् स इदमलोक नसृजत [ ५ ]
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ave ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति - संख्या " " " 1 उ ०२ उ ० २ 21 ६५ ६ ९. " } " 1 उ ०७ सं । ५।६ उ ० १।२ 11 " " 1 उ ०।१ तिस्रो द्यांवः शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) अशुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ अम्भोमरीचिर्मर अम्भो मरीचीमर लोनान् लोकान् सदमल्लो बीजमवासृजत् सदिमल्लो श्रग्नीसोमात्मकम् रंध्य मभृताषितस्थुरिह यद् उधिकेतत् बीजमवासृजत् अग्नीषोमात्मकम् मृता तर उचिकेतत् ऋग्वेद मं. १।३५।६ 11 उ ०।२ तिस्रो ऋग्वेद मं. २२७/८ " " उ ० ३।२ एनं " 1 उ ०।३ तिस्रो द्यावो ऋग्वेद मं. ७८७५ " 1 उ ०१४ तिस्रो ऋग्वेद मं ० १।१६४।१० " उ ० ५।२ बलिमा पळिमा " 19 " स्विदेकम स्विदेकम् उ ०।५ श्रचिकित्वावि 21 ७१ उ ० १।१ शाकल्य उ ० १२ हैन मैव 11 उ ०।१ अथ हैनं उ ० २।१ - " 1 उ ०।२ कत्येव देवा 11 ७२ उ ०।१ कतमे वसवः उ ० | २ अग्निव " " भा । १३ " ७३ उ ० ११ उ ० १।२ तभी तीन यज्ञ का पुरोडाशो गायत्रमग्नेच्छन्दः " 1 " } उ ०।१ तदाहुर्यदेकादशकपालः ऐ ० ब्रा ० प्र ० प्र ० त्रयस्त्रिंशादित्यो मिति ऋग्वेद मं ० १।१६४।६ शाकल्यः हैनमेव शत ० १४ | ६ || १ त्रयस्त्रिंशदित्यो मिति शत ० १४ | ६ || २ शत ० १४ । ६।६।४ ऐ ० ब्रा ० १।१ तभी तो यज्ञ का पुरोळाश गायत्रमग्नेश्छन्दः " भा । ३ " 1 भा ४ ७४ भा । १५ श्रध्याय ८।६ देवता ब्रह्म यज्ञ से यह ही ऐ ० ब्रा ० १।१ देवता से ब्रह्म यज्ञ से यज्ञ ही सूर्य्यं ३६० दिन में अपने सूर्य्यं ३६० दिन में अपनी [ ६ ]
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति - संख्या शुद्ध मुद्रित पाठ वृत्त की जो कि क्रान्तिवृत्त नाम से प्रसिद्ध है - परिक्रमा लगा लेता है । शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ धुरी पर परिभ्रमण करता हुआ अपने वृत्त से जो कि क्रान्तिवृत्त नाम से प्रसिद्ध है-पूर्ण संयोग कर लेता है । शत ० २।१।४१३ ७५ उ ०।२ तर्द्धकेऽजमुपघ्नन्ति " भा । १६ तीनों भागों के तीनों मार्गों के ७६ उ ० १।१ एष " 1 उ ०।१ एष वै सोमोराजा शत ० १।६।४।५ 11 उ ० २।२ ७७ उ ० २१ विज्ञेयतस्य शुक्ल हयोत्तमैः विज्ञेयस्तस्य शुक्लर्हयोत्तमैः उ ० ४।२ " } 11 नित्यशः || ४ || " } रश्मिनेकेन भास्करः 11
उ ० ६।१
भागमनुक्रमान् ॥५ ॥
11 उ ० ६।२ तनुः । उ ० ७।१ 11 उ ०७२ उ ० १ से ७ 11 " 1 उ ० सर्वं ( १।१ ) गहणेत्रीयेव उ ० ५।१ उ ०५।२ नोट: - कृपया जोड़िए + मण्डलः || ६ || लिङ्ग पुराण प्र ० ५६ श्रापूर्यते परस्यांतः सततं दिव-सक्रमात् ॥४ ॥
नित्यशः रश्मिनकेन भास्करः ॥५ ॥
भागमनुक्रमात् । तनुः || ६ || मण्डलः एवमाप्याधितं सोमं शुक्लपक्षे दिनक्रमात् ॥७ ॥
लिङ्ग पुराण अ ० ६५ ग्रहणां त्रीण्येव " " उ ० अश्विनी । २ तिशष्टिता " " उ ० पुष्यश्लेषा । १ " 3 उ ० ३।१ ७७ उ ०५।२ ७८ उ ० १।१ ७६ उ ० १२ उ ० ३।१ " 1 ५० उ ० १२ उ ०२ कतम श्रादित्या " ८३ उ ०।१ अष्टौ पुत्रासो वीथीचैरावती द्वेचार्थे घनिष्ठा च भुवनामि रजसावर्त्तमानो जगतस्तस्थुषश्चे शत ० १४।३।७।६ ति शब्दिता वीथीचंरावती द्वेचा निष्ठा च भुवनाधि रजसा वर्तमानो जगतस्तस्थुषश्च शत ० ११।६।३।८ ऋग्वेद मं ० १०।७२।८ [ ७ 1
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) शुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ भाष्य / पंक्ति संख्या ४ ७०।९ सर्वतः पाणिपादं भा । १६ 9 ) ५६ वीर्य की पिण्ड होती है । ०१।१ श्रयन्नर्यः कृण्वन्नपांसि 11 उ ० । १ नूनं जनाः गीता ० १३ । १३ वीर्य का पिण्ड... ' होता है । अयन्नर्थानि कृणवन्नपांसि ऋद्र मं ० ७।६३।४ " 1 उ ०१२११ श्रसद्वेदमग्र असद्वाऽड्रदमन उ ०।२1१ तदासीदिति " 1 तदसदासीति २१ 21 तदग्रेसदासीत् दासीत् ६० उ ० | १ | १ यतेन " 1 11 ६२ ६३ उ ० / १२ उ ० | १ | २ भा १० उ ०११ / २ समिष्टाः यत्तासु समिष्टासु समिष्टा यत्तासु सर्वासु समिष्टासु रहित्व भाव " ३०१११२ गर्भाणम् रहितत्व भाव पितॄणां गर्भाणाम् 17 उ ० । १ नवनीतेनाभ्यञ्जन्ति ऐ ० ब्रा ० प्र ० ३ ख ० ऐ. ब्रा, १1३ " योऽसिति योऽसीति " १।२ भा -५ वोपाब्दिस्तं वोपब्दिस्तं " दोष ' भिया ' दोषभिया ३६ उ ० । १ अथाप्यपिधाय ऐ ० आ ० तृ ० अ ० २ ख ० ४ ऐ ० प्रा ० ३।२।४ ६ पृष्ठ शीर्ष • श्राग्नावष्णवेष्टि " 1 भा २१ श्रनखग्निभ्य अनावष्णवेष्टि श्रानखाग्रेभ्य ६७ उ०- १।२ पुरूषः पाप्मनामनुषक्तः उ०- १२ * भा । २३ £ 5 भा | २४ १०१ १०२ " भा । १० उ०- १।१ उ०-२।१ छायापुरूष असुर प्राणों भी यदस्माऽशनायास इस भ्रम में कनीनिक एतदश्मोर्य दाङजनम् 11 33 " 1 त्वत् " 27 ,, २।२ ॥१५ ॥ ( ऐ ० ब्रा ० प्र ० श् ४०
३ खण्ड | १८ 5 1 पुरुषः पाप्मनानुषक्तः छायापुरुष असुर प्राणों में भी यदन्यस्माऽप्रशनायास इस भ्रम में कनीनक एतदक्ष्मीर्यदाञ्जनम् तत् ऐ ० ब्रा ० १।३
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति संख्या १०२ सं । ४ १०२ सं । ५ १०३ उ ० | १ | १ उ ०।१ सप्तदशो वै प्रजापतिः " भा ।११-१२ " } भा । २२ सं ।४ 11 शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) अशुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ " स दक्षिणमेवाग्रे प्रानक्ति " ".... अन माजुषे.... " पञ्चतवः ऋतु द्वयर्थक पञ्जकृत्व " स दक्षिणमेवाग्रऽ प्रानक्ति " ".... श्रग्रे मानुषे.... " पञ्चर्तवः ऐ ० ब्रा ० १।१ ऋतु पञ्चकृत्व " १०४ सं ।२४ सं ।२० सं ।२१ दर्भ पवित्ररण दर्भ पवित्रेण दोक्ष इति । पवित्रं वैदर्भा; दीक्षा इति । पवित्रं व दर्भाः । दीक्षं इति दीक्षा इति । " १०५ उ०- १।१ डिमा ऋषयो देवजाः षकिद्यमा ऋषयो देवजा उ ०।१ साकखानां 11 उ०- २।१ " 1 " " " } २२ ऋग्वेद मं ० १।१६४।१५ जाताः देवेभ्यस्तु जाता देवेभ्यश्च " } उ ० | २ ऋषिभ्यः पितरो मनुस्मृति ३।२०१ " } भा । १ ९; २७ ऋषि ऋषयो ऋषि ऋषयो १०५ १४ साकंजानां १०६ भा । २२,३० सूय्याग्नि ऋत १०७ उ ०११ द्वाविमो पुरुषो 1 ) २२ विभर्त्यव्यय साकञ्जानाम् सूर्याग्नि ऋत गीता १५।१६ बिभर्त्यव्यय उ ०।२ - उत्तमः " J गीता ० १५।१७ १०७ भा ॥२ १०७ भा ॥४ ऋतु रूधिर ऋतु रुधिर १०७ भा ३० मेरूदण्ड मेरुदण्ड १०८ उ०- ११२ पुरुष: प्रतिष्ठक पुरुषः पक्षः पुरुषः प्रतिष्ठक उ ० | १ | ३ " समुदौहंस्तदतस्य " 1 श्रियं " } समुदीहंस्तदस्य यच्छियं " उ ० १११५ प्राणा प्राणाः " 1 11 उ ० १५ " " १।५ सर्वस्मिन्न श्रयन्त पुरुषो सर्वस्मिन्नश्रयन्त पुरुषो [ 8 ]
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति संख्या अशुद्ध मुद्रित पाठ. वांछित शुद्ध पाठ " उ ० । १. एतान् सप्त शत ० ६।१।१।४-६ शत ० ६ १ १ ३, ४, ६ 11 भाँ । २ रस भग ' से १०६ भा आत्मक्ष कहते सं ० २० ११० उ०- १।१ सप्तथमेकमाहुः षडिद्यमा रस भाग से आत्मक्षर कहते एष यदग्निः सत्तथमाहुरेक जंषळिद्यमा उ०- १ | १ देवजाः " देवजा उ ०।२ साकंजानां " ॠग्वेद मं ० १।१६४।१५ 12. उ ०१२ सप्त प्राणाः-मु ० २-१ उ ०।१४ साकंजानां " ११३ भा । २०, २१ ऋत भा । २६ " रश्मि नहीं हीं ११४ " उ०- १।२ सं । १० अतप्ततननं तदामोसमश्नते मुण्डक २।११८ साकञ्जानां ऋत रश्मियाँ ही नहीं प्रतप्ततनूनं तदामो अश्नुते पुनः ११५ 11 ११७ 11 ११८ " भा. ५ ऋत्विक न्यचति सं । ६ सं ।६. सं ।१,४ सं।१७-भा । १ उ ० १।१ ११६ उ ० ।१ मम योनिर्महद् " स यदाह........ स्वमहोत ' यज्ञ मेववैतदात्मन्धत्ते ' स जघनेन '... ' ' मन्त्रात्मक गर्भ मूर्तयः तद्यत् यजुभिरूद्गृभ्णीते प्रत्यक्ष मौद्ग्रभरणनुष्टभा ऋत्विक् न्यञ्चति, “ स यदाह '....... ' ' स्वमन्वीही ति ' यज्ञमेवैतदात्मन्धत्ते ' " स जघनेन मन्त्रात्मक गर्भ गीता ० १४ | ३ मूर्तयः गीता ० १४ | ४ तद्यजुभिरुद्गृद्गृभ्णीते प्रत्यक्ष मौद्ग्र भरण मनुष्टभा 11 उ०- २।१ " उ ० । २ सर्वयोनिषु १२१ क ० - १।२ क०-२२ 31 क ० - २३ १२२ क ०.६ / ३. कुरूते: कुरुते I क ० १४ | ४ तस्मादाघोतमजूंषि तस्मादाश्रीतयजूंषि [ १ ]
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शतपथब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति संख्या अशुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ " 1 क ० १५२ अन्तरिक्ष " क ० १५/४ क ० १६।२ } } १२३ क ० १७।२ 11 क ० १६ १ क ० २२ २ " } " क ० २३।२ क ० २३।४ १२५ " 7 १२६ भा ।५ भा । १६ एतेन दीयो गृह्णाति यत्तृतीयंगृह्णाति पाण्या - गुलयो तावन्तमेवैनमयं तदाप्नोति उन देवताओं ने अन्तरिक्ष एतेन हैषा नेदीयो वाग्ध्यनुष्टुब्वा घ गृह्णाति यत्तृतीयंगृह्णाति पङ्क्तिर्भवति यद्येकां पाण्याऽङ्गुलयो तावन्तमेव नयेतदाप्नोतिः वे देवत रथन्तर अग्नये सं ।२२ रयन्तर अग्नेय १२८ भा । १५ की अन्त मे भा । १६ " 1 १२६ भा । ५ भा | २८ 13 शान्त्यू ऋक् साक्षात् कि अन्त में ऋग्म्यो शान्त्य ऋक् साक्षात् " " " 1 सं । ११ अनु ० २५ गर्भ गर्मम् बृहस्पति बृहस्पतिः 11 अनु ० २५ १३० भा । १८ भा २६ " 1 घृत भाग भा ॥३१ श्रति 11 सं ।२ उरोऽन्तरिक्ष " सं । ११ विधेय 2. इन्द्र उत्तरेषां ध्रुवा पात्र इन्द्रोत्तरेषां ध्रुवा पात्र घृत भाग श्रुति उरोऽन्तरिक्षम् विधेम " 1 सं । १३ सुवे त्रवेण सं । २४ " 1 ....... ध्रौव मासिच्य द्विदच ....... ध्रौवं मांसिच्य द्विच सं ।२६ १३१ भा ।७ 21 भा । १५ विश्वोदेवस्य..... राय इषुध्यति स्वाहा ' १४ वां ऋचा [ ११ ] राय इषुध्यति स्वाहा ' १४ वीं ऋचा ' विश्वो देवस्य........
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / शुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ भाष्य / पंक्ति संख्या १३२ 19 भा ६,१० सं ।२८ १३३ उ ० १।२ उ ० १४४ " " उ ० ११४ उ ० १५ ऋषि " प्रग्नि स्थानो... " वान्तरिक्ष स्थानः " आदित्यश्चतुर्भुत्वाऽक्षिणी तमशाना पिपासे श्रावम्यामभिप्रजानी यस्य च कस्यै ऋषि अग्नि स्थानो वान्तरिक्षस्थान:..... १ ) प्रादित्यश्चक्षुर्मूत्त्वाऽक्षिणी तमनापिपासे आवाम्याममिप्रजानी यस्मै च कस्मै ऐ ० उ ० २।४-५ यज्ञ विद्या " 1 " उ ०।१ अग्निर्वाक् ऐ ० उ ० १।२ भा । १७ " यज्ञ विद्या १३४ सं । १।१ देवलोकककमभि देवलोकमभि १३५ सं ।२७ संपदेव संपदेव वै सं ।२४ " 1 अथयत् अथ यत् १३६ सं ७ इमांसि इमां १३७ " 3 भा । २३ ऋतु ऋतु सं । १ १३६ सं १ सं १ 11 कु ( आ कुर्वते ) यजमानं " १४१ १४२ X = X = = X " १४३ सं ।२६ भा । २६ १६ भा ८, ११ भा । २७ भ TIRE भा । १३ " तद्वाऽऋषीणाममुश्रुतमास " " तद्वाऽऋषीणामनुश्रुतमास " कुव ( कुवते ) यजमान सही वही विश्वशंभुवो ऋक् कर देता है । विश्वशं भुवो ऋक् हैं । है । लिहाज से में लिहाज से कर देता हैं । भा । १८ 11 वह वह वह १४४ भा । ३,५,२६ ऋचा ऋचा १४५ उ ० १२,२१,२६ विद्येम १४६ उ ० १।२ स्वनोपराधात् उ ० २३ " स्वनोपराधात् विधेम स्वरतोऽपराधात् स्वरतोऽपराधात् [ १२ ]