Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 691–700

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 691–700

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पथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति - संख्या १४७ ४ भा । १ १४८ भा । १६ " } भा । २४ " भा । १६ १४६ सं । १२ 11 सं । १३ 11 सं । १४ 13 सं ।१४ 19 क ० " } १५१ क ० ३।२ क ० ४११ क ०५।१ " 1 " 1 17 " 1 ५।३ " 1 क ० ६।२ 19 " 1 " क ० ७।२ १५२ क ० ८११ 12 " } 11 " क ० ६।२ " 1 क ० १०।१ " 1 " 1 १०।२ 22 1 ) " " 3 " १०१३ " क ० ११११ " 1 क ० ११।२ " क ० ११।३ " अशुद्ध मुद्रित पाठ वाग्धि यह मन्त्र पङ्कित पाङ्कत चन्द जुहायात् पूर्णां सर्वमेवनयै तदाप्नोप्ति अथयत् छन्दान्सि यान्त्येव बभ्रुणीव प्रत्त्यसेत् जघनेन जान्वान्क इत्येतदाह तस्मान्न्यन्काङ्ग लिवि न्यन्काङ्ग लय वाम्प्रविशामीत्ये वैतदाह श्रेयांख मध्य तत्राऽनुव्या बल्यमविन्दत्तेनाऽस्यद् मद्धत समानुवस्तथो मृद्धय गर्भो यवस्य [ १३ ] शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ वाग्धि इस मन्त्र का पङ्क्ति पाङ्क्त छन्द सर्वमेवनयैतदाजोति अथ यत् छन्दांसि यान्न्येव कृष्णानि तानि दिवो रूपं यानि शुक्लानि तान्यम्यं यान्येव बभ्रुणीव प्रत्यसेत जघनेन जान्वाक्न तस्मान्त्यक्नाङ्ग लिरिव न्यक्नाङ्ग लय्. वाम्प्रविशामीत्येवैतदाह नमस्तेऽस्तु श्रेयांसं मध्य तत्रानुष्ठ्या बल्यमविन्दंस्तेनाऽन्यद् मध्य समाप्नुवस्तथो मृद्वघ गर्भो यद्वस्य

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- ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धिपत्र ( प्रथम खण्ड ) पृष्ठ संख्या' कण्डक / उद्धरण / अनुवाद / अशुद्ध मुद्रित पाठ: वांखित शुद्ध पाठ भाष्य / पंक्ति संख्या १५२ क ० ११।४ भवति यथैवाऽतः भवति स यथैवाऽतः 21 क ०१२।१ क ० १२१२ त्रिवृद्ध त्रिवृद् " तस्माद्भवति तस्माद्विद्भवति 21 क ० १४।१ स्याङ्गिरसीत्यङ्गिरसो कर्गस्याङ्गिरसीत्यङ्गिरसो 11 क ० १५।१ विमुद् " १५२ - १६० तक पृष्ठ ( भ्र ० १ ) ( अ ० २ ) शीर्ष संख्या १५३ क ० १६०१ वाडएव वाऽएष " 1 क ० १६।२ तस्मार्द्ध तस्माद्वै क ० १५/२ " } 19 11 " प्रजायतेः पितुर्दा-यमुपेयुम्न प्रजापतेः पितु-क ० -१८।२ 22 मासुरा मसुरा यज्ञमेवतद्देवा उपाय-१५३ क ० २०१२ निपालाशमिवोवाद श्वाचमसुरा निपलाशमिवोवाद क ० २१ २ " " ह्वयन्त क ० २२ २ प्रतिबूतादिति क ० २३।२ " } स्वकुर्वत १५४ क ० २४ २ हैषा वा वागेवमेवैष 19 " 1 वाचन्ते 11 क ० २५।१ 37 सम्बभूव ' क ० २६।२ 19 " 1 क ० २८ | २ क ० २८ | ३ " 1 क ० २६ | ३ " क ० ३० | १ कृषि धोति " क ० ३१।३ भवितोर्दीक्षितं 11 १५५ क ० ३४।२ यन्नमुखसम्मितः क ० ३५।१ " वनस्पतऊद्धवो क ० ३५।२ " स्वोदृचइत्यूर्द्ध वो 11 क ० ३६।१ हिव " 1 क ० ३६।२ क ०४०१२ " 1 भूवन्मिथुनं यो सा श्रावेष्ट्या विशत्यतो दितमेवैनमेवसन्तं श्रादधतीत्य थात्रा द्वा [ १४ ] ह्वयत प्रतिप्रब्रूतादिति व्यकुर्वत हैषा वागेवमेवैष वाचं ते सम्बभूव भूवैतन्मिथुनं योषा आवेष्ट्या प्रविशत्यतो कृषि कृषीति भवितोर्दी क्षितं यन्मुखसम्मितः वनस्पतऽऊद्धर्वो स्योदृच इत्यूव हि न कि दितमेवं नमेतत्सन्तं श्रादधतीत्ययात्राद्वा

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति - संख्या शुद्धि पत्र ( प्रथम खड ) । अशुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ १५६ क ० ४०।१ राजन्य वा वंश्य राजन्यं वा वैश्यं कं ०. ४०, २ " ब्रह्मणो 11 भा । २६ १५७ भा ७ मृगचमों रूप हैं मृगचर्मो रूप है सं ।२ वहिंलो वह लम् १५८ भा ।२ चो जो " भा । २३, २५, २७ ऋक् ऋक् उ ० | ४ " " 1 भा । २ १५ & भा १६ पाद द्विगुणम् ऋक् चेतना चेतन. पाद द्विगुणम् ऋक् चेतनाचेतन-" } भा । २८ मारे मारें पातमासम पतिमास्य " 1 १६० 12 १६२ 11 1 ।१४ भा । ५ भा ३० भा ॥४ हिंसी तस्माज्जधमा श्री गर्मी श्राते लगतेः व्यभवत् बन जाता है क्योंकि देवाना देवता ( चन्प्रमा ) प्रकाशमय न विचार किया चाहिए । पार्थिव ।११ १६३ भा । १० १६३ भा । २२ १६३. भा । २३ १६४ भाद १६५ भा । १४ भा ।२७ १६६ भा ।७ १६७ भा । ३ १६७ भा । ५ १६७ १६८ भा । ५ हो १६८ भा । १० उठासा १६८ भाग १२ भा ।२३ अपहतवाक प्रविष्ठ कर ललाट कर देगी । हिंसी: तस्माज्जनार्थ गर्भी आने लगते व्यभजत् बन जाता है क्योंकि देवानाम् देवता ( चन्द्रमा ) प्रकाशमय है ने विचार किया: चाहिए जो पार्थिव अपहतवाक्ः प्रविष्ट कर से ललाट कर देगा । कितने न कुछ [ १.५ ] उठाता किसी को न कुछ

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति संख्या शुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ १६८ भा । ३० वाज्ञा गलती से यदि वाला गलती से कुछ १६८।२ तव ततः १६६ भा ।४ ऋत्विक् १६६ भार वंश्य मी यदि १६६ भा | ३१ पुरुष नहीं १६६ सं । १३ निरूचः ऋत्विक् वंश्य भी यदि पुरुष को नहीं उच्चे!. १७० भा । २ पुरषोत् पुरीषोत्सर्ग. १७० भा । २६ यत्रोपवीत यज्ञोपवीत १७१ सं ।२३ १७२ भा । ५ खुलासा १७२ भा । द प्राचीन ग्रीवे कृष्णा जिने दीक्षा देना है... के बाद जोड़िए ' तदेनमनयोलोकयोरधिदीक्षयति प्राचीनग्रीवे कृष्णाजिने खुलासा १७२ भा । १३ लोगों लोकों १७२ भा । १७, १८ सम्बद्ध १७२ भा । २० छोटा तो १७२ भा | २३ स्दार्थों छोटा हो पदार्थों १७३ भाद तथा तथैव १७३ भा! १० भाग हो भाग ही " भा । २३, २६ तर्दम तद्ं म १७४ भा । १६ शुक्ल है काली है तथैव द्यलोक स्वरूप से शुक्ल है । १७५ उ ० १।१ वर्त्तमानो वर्तमानो " } उ ० १।२ हिरण्यमयेन हिरण्ययेन " 1 उ ०1१ - आ कृष्णेन यजुः ३३।४३ " 1 भा । ५ मूष मूष भा । २८ " जाता है है यह जाता है यह १७५ उ ०१२ सविता रथेना सविता रथेना १७५ उ ०२।२ बभ्रुणीव १७६ सं ०१३ १७७ ( संकोचयत् ) उ ०।१ तस्मात् कृष्णाजिन बीव ( संकोचयेत् ) शत ० १ | १ | ४ | ३ [ १६ ]

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति संख्या अशुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ १७८ भा । ५ ऋक् १७८ भा । २८ १७८ सं । १ दोनों को विनाश तवामारभे १७६ उ ०।१ ऋक् सामयोः उ ० १।१ पातमस्य १७६ सं ।४ १७६ सं । १२ श्रेयांस १८० भा । ६ 11 भा २३ १८० सं ।२६ " " } १५१ सं ।२७ सं । २८ उ ० १२ तदस्यतन्मानुषम् रखती है ( देवता ) ऋक् दोनों का विकास वा ० स ० ४१६ पातमाऽस्य तदस्यैतन्मानुषम् श्रेयांसं ( देवताओं को ) उपविशेद्य एनं तत्रानुव्याहरेत् उपविशोधन तत्रानुव्याहरेत् तस्माज्जधनार्द्ध तस्माज्जघना तमु तमयं ते वामारमे रहती है " " उ ० | १ अग्निर्जागर उ ०।१ ब्रह्मा देवानां " 1 19 १८२ उ ० ११ व्रतं १८३ सं । ७ १८४ सं ।२२ १८५ सं । २० १८६ उ ०१ मम योनिर्महद्ब्रह्म न्योका ".... पश्वयन्त् समाप्तिम् प्रजानामुदपायेष सूर्य्यः न्योकाः ऋग्वेद मं ५।४४ । १५ मु ० उ ० १।१।१ शत ० ३।१।२।१ ".... पश्यन्त्समाप्तिम् ” " प्रजानामुदयायेष सूर्य्य ": यद्वस्य गीता १४ | ३ मूर्तयः सम्भवन्ति गीता १४ | ४ सम्भवन्ति यद् वस्य 31 उ ०२।१ मूर्त्तयः सम्भवन्ति 31 उ ०।२ सर्वयोनिषु १८६ सं ।२७ सम्भवन्ति १८७ भा । १५ अन्न है १८८ उ ० १1१ स्याङ्गिरसो ह्यतामूर्ज-ऊर्गस्याङ्गिरसो ह्ये तामूर्जं-पश्यन्नर्णम्रदा अन्न हैं " 1 १६० " उ ० ऊर्गस्याङ्गिरसो उ ० १।१ १ एष [ १७ ] मपश्यन् ऊम्रदा वा ० सं ० ४।१० एष वं शत ० १ | ६ | ४ | ५

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / अशुद्ध मुद्रित पाठ बांछित शुद्ध पाठ भाष्य / पंक्ति - संख्या ११ उ ०।१ चित्रं देवानामुद-ऋग्वेद मं ० १।११५५१ गादनीकं ११ भा । ४-५ घट - घटादि घटपटादि भा ।३१ तुझे तुम्हें १ ९ ३ ३१४ " ऐक्षत योषाचा इयं वाक् " ऐक्षत योषा वाऽइयं १६३ सं । ११........ १ ९ ३ सं । १३........ १ ९ ४ भा ।७ १ ९ ४ भा ।२२ उपमन्त्रये हविष्यते वैभेति " दिवाग्नेऽसूयति भवतयो मत्रयस्व ह्वायिष्यते बुलान हे देवताओं | वागुपमन्त्रयं वै मा " इति । दिवैवाग्रेऽसूयति ... भगवो मन्त्रयस्व ह्वयिष्यते बुलान १ ९ ४ सं । १ निपलाश मिवोवाद १ ९ ४ सं । १४ सा हे देवता भी! निपलाशमिवोवाद सा हैनं १ ९ ५ भा । २६ उसे उसकी १६५ भो । २७ १६५ सं । ७ यज्ञ आहुत्ि नविता यज्ञ आहुति बिता १६५ सं । १३ तिष्ठन्तम्ये हि तिष्ठन्तमभ्येहि १६७ भा | ४ उन्होंने देवताओ से वे देवताओं द्वारा १६७ भा १ क देवी भाषा देवी भाषा १६७ सं । १ तदेवास्वकुर्वन् १६७ सं । १४ १६७ सं । १८ असूर्या यामेवानुष्टुभाजुहुवुस्तदेवैनां यामेवामूमनुष्टुभाजुहुवस्तदेवनां ' तत्रैतामपि बाच मूदूरु-पजिज्ञास्याम् " सुर्या तद्देवाः स्वयकुर्वत तत्रैतामपि वाचमूदुः उप-जिज्ञास्याम् " १६७ सं ।२३ एवमेतद्वेद एवमेतद्वेद १६८ भा । ११ योऽदक्षिणैक्षिणि १६६ भा २ कही १६१ भा ३ १६६ सं । १ अभिभव कर दे ! " वा इयं योनि मा या मदीघरत " [ १८ ] यो दक्षिण अभिभव न कर दे .......... वा इयं योनिय मामदीघरत ". कहीं

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति - संख्या अशुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ १६६ सं । १२ एवतत् सं । १६ प्रत्यधात २०० भा । ११ आत्मप्रजन २०० सं । १५ सिथि २०० सं । १६ शोषः २०० सं ।२५ ......... यो निगमं २०० सं । २५ ( तस्मात्तामुत्तमाभिव ' ' ' ' ) २०० सं ।२८ एव तत् प्रत्यदघात् आत्मप्रजनन सिलि शेषः योनिगमं ( तस्मात्तामुत्तमामिव........ ) वमुपर्युपरि २०१ सं वाह्येन तया वनांत वा सं । १ " कण्डूयते मा । १५ वृष्टया दि 31 वृष्ट्यादि २०२ सं ।१ कण्डूय कण्डूयेत् सं । ६ कण्डूयते " कण्डूयेत् २०२ भा । १५ पहुँचाती पहुँचाता भा । २६ 31 अनुसार में एव यदि अनुसार यदि भा २६ 11 भा | ३० " 1 २०३ भा । १ भा । ११ बोलतां यजमान न उस " 1 भा । २४ दोड़ " 1 सं । १० उच्छयस्व " 1 " 1 सं । १८ सं ।२७ जलकरण का नाम है । उदम्बरः, श्रदम्बर अड़गलीश्व यथापराञ्चैद्यावन्तमनु-लिप्सते ते............ बल करण का नाम ही अन्नं उदुम्बर:, श्रदुम्बर बोलता, यजमान उस उच्छ यस्व अड़ गुलीश्व यथा पराञ्चं धावन्तमनुः " २०४ भा । २ जब नि भा । द " होता लिप्सेत तं ***** जब कि होत भा " नहीं हैं नहीं है " 1 भा । १६ ऋचा ऋचा भा । २५ " 1 निवेदन निवेदित सं । ६ i यजु बा यजुर्वा [ १६ ]

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति संख्या अशुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ २०५ भा । १८ " भा ।२२ सं । १ " 1 सं । ४ 11 सं । २८ " 1 ऋतुमती ऋतुमती चिदात्म चिदात्म " निवेदितमेवेतत्सन्तं निवेदित मे वैनमेतत्सन्तं प्रापत्प्रयं प्रापत् इत्ययं सं ।२३ " 1 २०६ सं ।५ २०७ पृष्ठ शीर्ष क ० २।१ " 1 " इदं ह्याहु: रक्षांसि योषितम " इदं ह्याहुः रक्षांसि नुसंचन्ते तदुत्तरस्यवपरित योषितमनुसचन्ते तदुत प्रादघतीति ब्राह्मणो स्यात् हन्यादे हैव सवनकृता दीक्षित ब्राह्मण जिग्युषामियं रक्षांस्येव रेत श्रादधति- " इति ब्रह्मणो हन्यादेनस्वी है व सवनकृतेति दीक्षितव्रत ब्राह्मण जिग्युमियं क ० २।१ कथन्न " 1 क ० ४।३ 11 क ० ६।१ " 1 क ० ७।१ प्रातप्स यज्ञः माप्याययामो कृणुताग्निब्रह्मग्मर्यज्ञो कथं न प्रापत्स यज्ञमाप्याययामो कृताग्निब्रह्मग्निर्यज्ञो २०८ क ० ७ १ सम्भुत्य सम्भृत्य क ०८।१ यज्ञ मात्याययति यज्ञमाप्याययति " क ०८।२ प्रथम प्रथमं " 1 क ० १० २ 19 हविन " क ० १० १३ तथदेष तद्यदेष " क ० ११।१ देवा देवाः 19 क ० ११०२ धोत्वा धीत्वा " क ० १२।१ ऋषीणाननुश्रुत मास ऋषीणामनुश्रुतमास 11 क ० १२।२ नं 19 क ० १२।३ तदेवैतत्पुनराप्यायति तदेवैतत्पुनराप्याययति " क ० १२।४ हाप्यायमेद्यदग्नी " क ० १४।१ प्रथम प्रथमे " क ० १४।२ यद्दिदुग्धं तत्पुनराप्ययाम यद्विदुग्धं तत्पुनराप्याययाम " क ० १४।२ व्रतदुधा व्रतदुधा [ २० ]

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति संख्या क ० १४ | ४ २०६ " क ० १५।१ " क ० १५।४ 23 क ० १६।५ २१० क ० १६।१ " क ० २०१४ " क ० २०१५ 11 क ० २०।५-६ " 1 क ० २१।३ क ० २२१४ 11 क ० २३।५ २११ क ० २३ | १ " क ० २४।३ " क ० २४ | ५ 11 क ० २५ | २ 11 क ० २६।३ " 1 क ० २७।२ " 9 क ० २७।४ 11 क ० २७१४ " } क ० २८।२ 11 क ० २६।१ २१३ भा ।५ 11 भा । १५ " " भा ।३० सं ० | ४ २१४ सं ०1११ २१७ २१८ भा । ३० भा ।३० 11 " भा ।३१ भा । २ २१६ बुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ अशुद्ध मुद्रित पाठ व्रतदुधा व्रतदुघा सर्वोषधं सर्वोषधं त्सिञ्चन् सिन् सुशेवाः सुशेवा महोमुचः महोमुचः गु तस्मादाहाहोमुच तस्मादाही होमुच म्यक्षित्तामेवास्या भ्यमिक्षत्तामेवास्या स्वपस्याम स्वप्स्याम श्रद्धस्तनूपा श्रदब्धस्तनूपा दुरितादव दुरिताव यज्ञेष्वीद्धय इति यज्ञेष्वीङय यज्ञेष्वीड्य यद्दीक्षितया भिहरन्ति यद्दीक्षितायाभिरन्ति वैतद्रात्रया सन्तनोत्यह्ना वैतद्राव्या सन्तनोत्यन्हा दिया ह मभिवर्षेदनवत्कृप्तं मभ्युदियान मभिवर्षेदन वक्लप्तं मभिवर्षेदथ भभिवर्षेदथ मनुष्यैरनाभ्यारोह्य मनुष्यै रनभ्यारोह्य ऋषीणामनुश्रुतमास ऋषीणामनुश्रूतमात लोम सोम चाक चिक्य चकविच अहर्गण के ऊपर सोम " एतस्याने वगेवोपनिषद् ' अहर्गण से ऊपर तक सोम " एतस्याऽनेर्वागेवोपनिषद् ....... सर्वाभ्यो एताभ्यो ' ' ' ....... सर्वाभ्यो ऐताभ्यो स्वात्माग्नि दुग्धरूप हुति दिव्यात्मा स्वत्माग्नि में दुग्धरूप आहुति से दिव्यात्मा श्रग्नि आग भाग की भाग का [ २१ ] दीक्षितमातिव्विन्देद्यनैवातः दीक्षित मार्त्तिव्विन्देद्येनैवातः

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ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुबाद / भाष्य / पंक्ति संख्या भा । १७ 31 सं ।२५ " २३४ भा +२ ९, ३० " सं । ४ २२१ भा । २,१०,१४ भा । ६ " भा । २५ " भी ।२१ २२२ भा / २८ " भा ।२८ " २२३ भा ।७ भाद 11 भी । ३१ " मा । १ २२४ भाद " " भा । १२ " 1 भा । १५ भा । २६ " २२५ भा । २० २२५ अनु ०।१६ २२६ भा । १ २२६ भा / २६ २२७ भा २६ २२८ भा । ११ भा ।२३ " भाग २७ 12 उ ०।१ प्रजापतिस्त्वेदं २२उ ०१२ द्वयं वा इदं 22 अशुद्ध मुद्रित पाठ इन्द्रियों मनांषि व्रतदुंधा व्रतदुधा सध इन्दु दर: देवताओं, आप पीने पर हमारे पोषक बनें । करता हुआ करना चाहिए है, उसे नष्ट क्योंकि पृथ्वी " इय..... पृथ्वी यह मूल लोष्ट को नहीं करनी जगे । करते वाले यज्ञेष्वीद्यः करता हैं । सूर्यास्त में समय त्यादि मंत्र यह ब्रह्माण्ड पाटों में [ २२ ] शुद्धि - पत्र ( प्रथम खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ इन्द्रियाँ मनांसि व्रतदुधा व्रत दुधा व्रीहि सर्वोषधि इन्द्र उदर देवताश्री! आपको पी कर हम आपसे पुष्ट हों । करता हुआ-.... करना चाहिए-कर; उसे नष्ट क्योंकि " इयं.... पृथिवी यह मूत्र लोष्ट के लिए नहीं करना जागें । करने वाले यज्ञेष्वीड्यः करता है । सूर्यास्त के समय इत्यादि मन्त्र यह ब्रह्माण्ड भागों में शत ० ६।१।२।११ शत ० १।६।२।२३