Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 701–710

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 701–710

पृष्ठ 701

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति संख्या उ ० । ३ सूर्य एवाग्नेयः 11 उ ० १४ः सोऽमिध्याय " भा ।२६ " उ०-११२ २३० उ ०।१ ऋतमेव " उ ० २११ " ०२ तदण्डम् 1 ) उ ०१३ ऋतं च सत्यं " 1 भा । १, ३, ४ 11 भा । १६ " } उ ०।२ देवाश्च वा २३१ भा । १८ 11 २३२ मा । ६ २३३ भा ७ सं १ " २३४ भा ।५ भा! १२ " भा । २२ " 1 भा । २८ " } सं । १८ २३४ २३५ भा । ११ भा । १६ २३७ उ ० १।१ उ ० १।३ " 33 उ ० १।४ उ ० १ वायुरग्निरिति " भा । २५ " २३७ भा । ३० शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ शुद्ध मुद्रित पाठ मनुस्मृति १६ शत ० १।६।२४२४ ऋत ऋत श्राहितः श्राहितं तं ० ब्रा ० १३५।५।१ सहस्त्रांशुसमप्रभम् सहस्रांशुसमप्रभम् मनुस्मृति १४ ९ महानारा ० उ ० ५।५ ऋत ऋत ऋग्वेद ऋग्वेद शत ० ११७१२।२२ घृत घत सूड है । सूर्य में है । वे पर्दगी " यज्ञेन वे देवा इयां जिति-जिज्ञुर्या एषामियं जितिः ” उन्होंने यज्ञ के " यज्ञेन वै बेक़ा इयां जिति जिज्ञयेषामियं जितिः " वे यज्ञ के एवं देवताओं ने उस यज्ञ का सार भाग राज्य कायम कर लिया अथ यदेनेनाप-एवं कैसे एवं देवताओं ने जिस ज्ञापन से यज्ञ का सार राज्य का कर लिया अथ यदेने नायोप-यज्ञसृत ऋषियों यज्ञस्मृत ऋषियों उपासते उपासत शरतुर्मध्यम शरच्चतुर्मध्यम प्रतिष्ठा प्रतिष्ठां शत ० १०।४।५।१-२ श्रनिरुक्त व्याप्त रहता है । व्याप्त करता है । [ २३ ]

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति - संख्या अशुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ २३८ भा । २२ भा । २६ " 1 २३६ सं ε सं । १० नतः दीक्षा दी है । रात्रि प्रापत् । यावानेव रात्रिं प्रापत् । स गावानेव-तावन्तमेवे तान्त मे वे......... अहः दीक्षा ली है " } सं । १७ ..... अनुष्ठया 17 २४० सं । १२ विसर्जयति सं । १५ " 1 ..... अत्रानुष्ठया विसर्जयति विसर्जयति । वृतं कृणुताग्नि विसर्जयेत् । वृतं कृणुत वृतं २४१ भा २ २४२ भा । २ 11 भा । २६ " 1 सं ।२ २४३ भा । ११ २४४ 19 उ ०।१ तद्यदोभयं उ ०२ / २ उ ० २ स वै यः " " } उ ० ३।१ " " 1 उ ० ३।२ श्रग्निहोत्रयत् कृणत ऋत्विजः व्रतं कुरणत निऋति, नैर्ऋतो चन्द्रमसंह्यादित्येऽप्रादधति शत ० १०।६।२।१ कर्ण एषोऽग्नेखि रथरस्येवोशन्दिस्तं 11 " 1 विषात् " 1 उ ०१३ - प्रथाप्य 19 भाई ऐ ० आ ० अग्निीषोमात्मक २४५ भा ।७ श्रग्निषोमात्मक भाद " " न खॉय " " सं । १६ २४६ = = उ ० । १ न प्राणेन उ ० २।१ उ ०।२ मध्ये वामन " अन्नोर्क प्रारणा नामन्योनय परिग्रहोयज्ञ: " सर्व [ २४ ] श्रग्निहोत्रं तत् कृणुत ऋत्विजः व्रतं कृणुत निऋति, नैऋतो शत ० १०।६।२।१ चन्द्रमसंह्यादित्यऽप्रादधति शत ०१०।६।२।२-३ sa रथस्येवोपब्दिस्तं विद्यात् ऐ ० आ ० ३।२।४।१० श्रग्नीषोमात्मक अग्नीषोमात्मक न खाए अन्नोर्क प्राणानामान्योऽग्न्य-परिग्रहोयज्ञ: " कठ ० उ ० ५।५ विश्वे कठ ० उ ० ५।३

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प्रय ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पुत्र ( प्रथम खण्ड ) पृष्ठ संख्या कडका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति संख्या शुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ 31 भा । १४ प्रधान. 11 मुख्य के प्रधान मुख के २४७ भ्रा । १२ 31 सं । ३१ सोमभाग में यज्ञ बना रहा है. सोमभाग से यज्ञ रचा रहा है । तद्य देवानृतद्विदुग्धं तद्यदेवात्र हिदुग्धं २४८ उ ० २२ 11 २४६ २५० " " 1 " } २५१ ९ ०२ प्रवित्रं ते विततं उ ० ११ उ ०११ मम योनिर्महद् सं ० ३ सं ।२३ लोकप्रिय लोकत्रयमा विजय महत, हैं वे कैसे से ही मण्डल में हैं. वे वैसे ही ऋ ० ७१३८ योनि ब्रह्म " मम योनिसहद्ब्रह्म इमे वै प्राणा । १११ निर्वाग् ऐ ० उ ० २।४ शब्दान्स्पशृश्चि उ ० २।१ शब्दान्स्पशशिच स्वेदजानि च चोद्भिजानि ऐ ० उप ०.५।१ वरूण श्रहमित्रम् इमे वे प्रारणा,......... n " 1 संग ३२ उ ०.१८ " 22 उ ०।१ कोयसात्मेति " 1 २६, ३१ " भा । ३१ " 1 सं । १8 २५३ भाग १ " 1 भा ।३ भा । १७ " " भा २१, २२ व्रतदुधा " सं ।२३ व्रत व्रतदुधा वरुण मित्रावरुणौ यज्ञ प्राप्यायित ऋश्वेव मं ०६८३ | १ योनिर्महद्ब्रह्म गीता १४/३ मम योनिर्महद्ब्रह्म इमे वै प्राणाः । ऐ ० ० २।४।२।२२ शब्दान्स्पर्शाश्त्र शब्दान्स्पर्शाश्चि स्वेदजानि चोद्धिजानि ऐ ० उप ० ५०१ - ३ वरुण श्रहमित्रम् इमे वै प्राणाः वरुण मित्रावरुणी यज्ञ को प्राप्यायित व्रतदुधा व्रतं व्रतदुधा २५४ " " " 2 भा । ३ भा भा | ३० सं १० अवश्य ही को व्रीहि बतलाते है. कि व्रीहियवान्वारब्धो अवश्य ही व्रीहि बतलाते हो कि व्रीहियवान्वाधी २५५ भाद व्रतदुधा व्रतदुधा " सं । १.१ दघुवत दुधा यद्युव्रतदुघा [ २५ ]

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति - संख्या शुद्ध मुद्रित पाठ बांछित शुद्ध पाठ २५५ सं । ११ सं । १२ सवोषधं व्रतेनमिषज्येत् २५६ उं ०1१ देवीं धियं २५६ सं । १ मानुषं हते..... सं ।२८ " २५७ उ ० ११२ अवतारषिजुष्टम्भः " उ ०१२ श्वात्राः " भा । १ देवी बुद्धि २५८ भा ।३२ सं । १८ " 1 स्वरुप “ ता........ अनागसः सर्वोषधं व्रतेनाभिषज्येत् वा ० सं ०.४।११ मानुषं हते... नो असदृशे अवतारषिजुष्टाम्भः वा ० स ० ४।१२ देवी बुद्धि स्वरूप: “ ता....... “ अनागसः ” २५६ उ ०।१ श्रहमस्मि " " भा । ३ भा । ७ 31 " भा | १० भा । १५ " " 1 भा । २४ २६० " 11 २६१ " २६२ " 1 २६३ " 1 उ ० १।१ भाः । २२ भा । २६ भाद्र सं । १३ सं । १५ सं ।३० सं ।१८ सं ।२१ " यह कहा है " यह कहा है । तै ० उ ० ३ | १० | ६ कोइ कोई परिणत हो गया ऋत, ऋता परिणत हो गया ऋत, ऋता त्वगिन्द्रिय त्वग्गन्द्रिय चन्द्रमा के पकड़ संरक्षेत् व्रतप्रद ने दूध कहा जाता है । कि कृष्णा विषाण उपहन्ति " अहस.... तस्माहांतोमुच इति " अनवरूद्धो अग्ने त्वं स्वप्स्याम ' इत्यैतदाह । गोपायनोऽप्रमत्त इत्येवैतदाहुः- ” हो जाता है । २६४ भार [ २६ ] चन्द्रमा की पकड़ संरक्ष्येत् व्रतप्रद दूध कहा जाता है कि कृष्णविषारण उपहन्ति " अंहस " ' मुश्चन्ति तस्मादाहांहोमुच इति " अनवरुद्ध " अग्ने त्वं स्वप्स्याम " इत्येवैतदाह " गोपायनोऽप्रमत्त इत्येवैतदाह ” हो जाते हैं ।

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति - संख्या भाद " भा ।२७ " सं ।२० " सं ३० 11 २६५ भा ।७ सं ।२१ " 1 सं ।२५ " 1 भा । १ २६६ भा ।७ " भा । १५ " } भा । २२ 11 भा।२४-" भा । २६ " भा । ३१ 11 सं । १८ भा । १६ सं ।२६ २६७ " सं । १ " 1 २६८ भा ।७ भा | २३ " 1 सं । १० " " सं । १० २६क ० २।१ २७१ क ०५।२ " क ०७२ " } क ०६१ २७२ क ० १०१२ " " क ० ११।२ 11 क ० १३।१ 11 अशुद्ध मुद्रित पाठ जागृत समय ने लिए “ ' कितुम खाली समय में सर्वस्मग्निं गपायंत् द्वितीयेऽहनि " यमौ दीक्षित ' वाक् तच्छकेषं यज्ञष्वी s यः व्रतं भेंट के लिए इससे पूछता कमों को जरूरी भी है मही रहता अब्वर्यु S दिन में बद्ध न स्वपन्तमम्युपदयात् " } " " अहर्भाग से गप्प समझ स्वपन्तमन्तरिया हदन् घीक्षते ह वै..... यज्ञमतं महि प्रज्ञास्य वेति चरू यज्ञस्याऽसत्तिदपश्यन् श्यन्दद्वा हविनिरूप्तमासीत्तामयजन् पञ्चभिर्देवता निः [ २७ ] शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) बांछित शुद्ध पाठ I जाग्रत समय के लिए कि खाली - समय में सर्वस्याग्निगपाय तु द्वितीयेऽहनियमो दीक्षित का वाक् I I तच्छकेयं 1: यज्ञेष्वी s यः व्रत भेंट लिए इसे पूछता कम्मों के " जरूरी हैं नहीं रहता अध्वर्य १ एतद्यते " दिन रात्रि में बद्ध स्वपन्तमभ्युदियात् 31 13 अहर्भाग के गप्प- सप्प स्वपन्तमस्युदियां दह्न भीक्षतो हैं........ यज्ञमतंस्महिं ': प्रज्ञास्यथेति चरु यज्ञस्या ss सी सदपश्यन् श्यन्न्यद्वा हविनिरुप्तमासीत्तामयजन् पञ्चभिर्देवताभि

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति संख्या उ ० ३।२ अशुद्ध मुद्रित पाठ वायुर्वेन्द्रो ऽन्तरिक्षस्थानः वायुवेन्द्रो वान्तरिक्षस्थान: उ ० । ३ तिस्र एव " नि. दैवतकाण्ड प्र. ७ ख ५ भा । ११ त्रैलोक्यवस्था " त्रैलोक्य व्यवस्था भा । २५ 37 ब्रह्म ब्रह्मा २८० उ ० १।१ अस्माल्लोकात्परो २६० भा । २५ अपौरूषेय 11 भा । ३० इकतीस में ' श्रस्माल्लोकात्परो अपौरुषेय: इकतीस शाखाओं में भा ३१ 11 शाखा है । की शाखा है । २६१ भा १५, १७, १८ चरू चरु २६२ सं ०।२१ बालानामुपलालना: -बालानामुपलालना २ ९ ३ भा । १५ शुरु शुरू भा । २२ जाय जाएँ " 1 भा । २३ " } इसका तलाश २६३ सं ० २० न प्रजानीम् २६४ भा ।७ प्राण की सं ०१५ " 1 यज्ञयमूहन । इसका कारण तलाश न प्रजानीमः प्राण को सं ०।११ " 1 प्रजानीम् यज्ञममूमुहत । प्रजानीमः सं ०।२१ यज्ञादन्तरागायत " 1 सं ०।२२ " 1 कल्पयत् २६५ उ ०१।१ जागति " 1 उ ०।१ या निशा " 1 भा । २५ स्थिति रहती २६५ सं ०।५ उदयनीय २६६ उ०- १।२ समाचरेत् उ ०।१ न बुद्धिभेदं भा । ३ " 1 रहना भा । १४ जिनसे जिनका " 1 भा । ३०,३१ घन्टे घण्टे " } सं ०११२ " २६७ भा ।५ बृहती मध्य ध्रुवप्रातवृत्त यज्ञादन्तरगायत कल्पयत जागति गीता ० २।६६ स्थिति कुछ रहती उदयनीय समाचरेन् गीता ० ३।२६ स्थित रहना जिससे जिसका बृहतीमध्यूढ-ध्रुवप्रोतवृत्त. [ ३० ]

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति संख्या २६७ भा ।२४ सं ०।१२ " } २८ भा । १ भा । १४ 13 भा । २३ " २६६ उ ० | १ भा । २० " भा । ३ ३०० ३०१ उ ०.१।१ उ ०१२ " 1 . उ ०।१ प्रजापतिश्चरति " 1 ३०१ भा ।७ भा । १६ " उ०- १।१ ३०२ उ ०।१ तद् विष्णोः " भा । २१ " 1 भा ।२६ " 1 भा । २६ 21 भा । १ ३०३ भा । २३ " 3 ३०४ भाव भा | ३० " 1 उ ० १।१ ३०५ उ ० १।२ " } उ ० १ अष्टौ पुत्रासो " उ ० २।२ 31 भा । २६ " भा । ११ ३०६ भा । १५ " भा । २५ !! ' अशुद्ध मुद्रित पाठ घन्टे बृहती मध्यू.. " घन्टे दक्षिण की और माचे कृत्तिकास्वग्नी इसका रहस्य क्रान्तिवृन्त ब्यजायत विश्वाः ज्योति, घन्टे सुमेरू चक्षुरानतम् यही भगवान् कदम्ब से चारों और प्रतिबिन्दु आहुति हो पितरों को विरूद्ध ये जातास्तन्यस्परि परामार्तण्डमास्थत् पूष्णोः हस्ताभ्यम् चरण पड़ता यज्ञ के पहले पुनः रहस्य हवि को देवता [ ३१ ] शुद्धि - पत्र ( प्रथम खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ घण्टे बृहती मध्यूढ -घण्टे दक्षिण की र मार्च घात ० २।१।२।१,३ यही इसका रहस्य है क्रान्तिद्वत्त विजायते विश्वा यजुः ३१।१ ९ ज्योतिष, घण्टे चक्षुराततं ऋग्वेद मं ० १।२२।२०. यहीं भगवान् केदकम्ब चारों श्रीर प्रतिबिन्दु हुत होते V पितरों की विरुद्ध जातास्तन्वस्परि परामार्ताण्डमास्यत् ऋग्वेद मं. १०७२।८ पूष्णो हस्ताभ्याम् चरण में पड़ता यज्ञ में पहले रहस्य पुनः हवि को वही देवता

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति संख्या शुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ ३२४ भा ० | १३ भा ० | ८ | १४ ऋत्विज ऋत्विज " बह के यथेच्छ, डाल के बहियथेच्छ, डालदे 11 भा ०।१५ " } भा ०।१७ यदि व उसी यदि तुम उसी भा ० | २३ 71 संयुवाक् युवाक् भा ० | २४ पूर्वाद्ध पूर्वार्द्ध ३२५ क ० ६।३ स्तुवद्भयः स्तुवद्भ्यः ३२६ क ० ११।३ लग्लमिव लग्लामिय 11 क ० १४।३ वैश्वदेव वैश्वदेवं ३२७ क ० १८०१ क ० १८।२ वरुण्या अवरुष्यं वरुण्या क ० १८।३ " } क ० १६ २ तस्य न का " ऽश्रवरुण्यं बनी भवति तस्य न का ३२८ क ० २२।१ " भा । १० व्यह्वयन्त शर्मणायत व्यह्वयश्ते शर्याणवत सं । १६ " 1 बुद्धि: शौर्य-बुद्धिः शौर्य सं ।२६ S " ३२६ भा ।७ 11 सं ।२१ ३३० भा । १ दिवी सोम् वस्तुनों दिवि सोम वसुन " भा । १० कद्र सं ।१ ε ३३१ भा । १३ 5, भा । २६ सं ०1२ नेन्द्राद " 11 सं०।६-७ सं ०।१८ " इयं वै... सौपर्णेयाः । ".... वयम् - इति । ३३२ सं ०।१५ " ३३५ सं ०।१६ भा । २६ " सहस्त्र व पूर्णम् " पृथिवी सौमरूप गायन्त्रण "... छन्दसा । इति । पारमेष्ठय [ ३४ ] कद्र " सहस्र ं वै पूर्णम् " पृथिवी सोम - रूप नेन्द्रात् " इयं वै कद्रू ' ' सौपर्णेयाः । " ".... वयम् - इति । ” गायत्रण 66.... छन्दसा । इति । " पारमेष्ठ्य

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धिपत्र ( प्रथम खण्ड ) 11 उ ०१२ द्यौर्वः पिता 11 ३५२ उ ० | ३ | १ उ ०।१।२ ३५३ सं । १५ ३५६ उ ०१२ प्रापो मृग्व-ङ्गिरोपमापो ३५७ भा । ६ 21 ३५६ सं ।६ --उ ०१४ सं । २८ ".... अग्नेहि रेत इति । ” जा रही हूँ ' ' ' ' मुझ से पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति - संख्या अशुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ ३३५ सं ०।१८ ".... श्रग्नेहि रते इति । ३३६ भा । २० जा रही है ' ' ' ' उससे सं ।२१ सवसः " 1 सं । ३१ " } ३३६ सं ।२३ ३५१ उ०- २१२ तन्वो... स्वाहा । " सुप्रतीची वा एधि विश्वदृष्टा स्तिष्ठतेळयाता ऋ ०१।१६१।६ तिस्त्रो तदाहुः ऋषय तन्महाव्रत । देवानामुदगा हनीकम् देवानामुदगाहनीकम् चतस्त्रोऽरिष्टनेमिये चतस्त्रोऽरिष्टनेमिये शवसः " तन्वो.... स्वाहा । " " सुप्रतीची वा एि विश्वदृष्टास्तिष्ठते यता ऋ ०।१।१६१।६ तिस्रो तदाहु: के तऋषय तन्महाव्रतम् । गो ० ब्रा ० पू ० १।३देवानामुदगादतीकम् देवानामुदगादनी कम् चतत्त्रोऽरिष्टतोमिने चतस्रोऽरिष्टनेमिने गो ० ब्रा ० १।३३६० सं । ५ ३६१ उ ० | १ | १ अंतिम " एष वै सविताय एष तपति " यावद्यावापृथिवी " एष वै सविता य एष तपति " " 1 ३६४ ३६६ सं ।२।३ " ब्रह्म कृष्णश्चनोवडाद ' उ ०।२ इत एत उदारुहन्दिदव सामवेद पू ० १२ यावत् द्यावापृथिवी “ ब्रह्म कृष्णश्चनोऽवतु सामवेद पू ० १।१०।२ तमहं । तमेव सं । १८ त महं । त मेव तमहं तमहं त्वमेव पत त्वं त्वमेव तत्वं " " सं । १६ 11 त्वमजंषी सं । २० " } ३७६ सं । ३ ३८० ०।१ जूरसि घृता सं ।२६ ता मागता मध्युवाद त्वमिति.... क्राद्रव मिति सम्भव तथा तामागता मम्युवाद त्वमिति.... काद्रवमिति सम्भवतया वा ० सं ० ४।१८ यद्ध " [ ३५ ]

पृष्ठ 710

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) T कण्डिका / उद्धरण / अनुवा ख्य भाष्य / पंक्ति - संख्या पृष्ठ स द ३८१ स ।२१ 13 सं । १३ ३८४ ३८५ सं । १३ ३८८ सीईद " 1 ०४२ ३१ क ० १४।२ ३६२ अनुह ३६३ अनु ३६५ ४०० भाग १६ ४०१ ४०३ भरेट ४११ भाँ १ि ० ४१३ ०४४३ ४१५ ४१६ क ०७३ " 1 ०१४१-४१७ अनु ० / २ ९. ४२५ संद ४२८ सं ४३७ ४४३ उ०- १।१ भा / २४ ४४७ ११ तपसस्तनूर सि ४६४ सं ।६ ४६६ उ ०११ स्वोम भ्राजा ४६८ सं । १ 11 ४७१ उं ०1१ थ प्रतिपाम सं ।२१ " अंशुद्धः मुद्रित पाठ ( पेतिशेष प्रहिता मित् देविदेव देवयजने जित्वोदास्तेऽथ वस्त्र प्ररूण गाभावे करता IIIII III गृहतीगर्भा सोमोपन हमादत्ते बधायेत्यपेत्य विचिन्वन्तिति एंक्तिद उचारण तस्माददेवमृशेत् वर्तमानो प्रजावाणन्तु तामेत्यलक्षम ' त्वमात्मो तद्यजुः [ ३६ ] पुत्र ( स कति शुद्ध पाठी ( प्रभाविति शेषः ) इत्युक्तमिति प्रहितामेत सर्वं देविदेवम रुद्रस्त्वावर्तय देवगा जित्वोदकुतिय सोमा बस्वी अरुणाभावे : वा ० सं ० ४ | ३१ बभ्रु गृह सभी सोमोन वधायेत्य त्या विचिन्वत्विति एवं तदः उच्चारण बाह कुरुयम् तस्मादन्यवभूत् वर्तमानो प्रजास्त्वानुप्राणन्तु वा ० सं ० ४।२६ तामेतत्परोक्षम् वा ० सं ० ४।२७ वा ० सं ० ४।२८ तद्यजुः