Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 81–90

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 81–90

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्रग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण प्रखर पंडित हो जाय ' इसलिए इसके अतिरिक्त और किसी की वाञ्छा न थी अतः उसके मुँह से निकल पड़ा कि सर्वे वेदाः प्रतिभान्तु नः ' । " तथास्तु " कह कर पृथिवी अन्तर्हित हो गई । फिर क्या था, वर के प्रभाव से १६ वर्ष का इतरा - पुत्र “ ऐतरेय " जिसका कि नाम " महीदास " था – सारे शास्त्रों में पारंगत हो गया । उसी समय पञ्जा के किसी राजा ने बड़ी धूमधाम से यज्ञ की - सोमयज्ञ की तय्यारियाँ कर रक्खी थीं 1 । ऋत्विक् आ पहुँचे थे एवं यज्ञ का प्रारम्भ हो चुका था । देवयजन निर्माण हो चुका था । उसमें शाला बन चुकी थी एवं यजमान क्षौर बना, स्नान कर, वस्त्र पहिन यज्ञशाला में प्रविष्ट हो चुका था । वहाँ पर दीक्षा के लिए ' अपां प्रणय ' हो चुका था एवं तदनन्तर होने वाले श्रादित्य चरु की तैय्यारिएँ हो रहीं थीं । इतने ही में इतरा अपने पुत्र ऐतरेय को साथ ले कर उस यज्ञशाला में आ पहुँची । ऐतरेय थे १६ ही वर्ष के परन्तु वर प्रभाव से वेद के अद्वितीय तत्त्वज्ञ बन चुके थे । अतः जहाँ ऋत्विक् लोग " आदित्य चरु " की तैय्यारिएँ कर रहे थे, वहाँ पहुँच गए और एकदम बोल उठे कि ' इदमशुद्धम् इदमशुद्धम् ' । ऋत्विक् लोग भौंचक्के हो कर उस अबोध बालक की ओर झाँकने लगे, परन्तु इससे क्या हुआ - उम्र में वह छोटा अवश्य था परन्तु विद्या में सब से श्रेष्ठ था । " न एतस्य पलितं शिरः ' ' ' ' ' ' ' ' । यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवास्थविरं विदुः " यह उन महर्षियों का सिद्धान्त था अतः उन्होंने उसी समय यज्ञ बन्द करवा दिया और उस बालक ऐतरेय को - सब से ऊँचे सिंहासन पर बैठा दिया और समिधा हाथ में ले सारे वयोवृद्ध महर्षियों ने उसका शिष्यत्व स्वीकार करते हुए प्रश्न किया कि हे ऐतरेय! हमने सुना है कि आपने अपनी पूजनीया ब्रह्मवादिनी माता की उपासना द्वारा वेदविद्या प्राप्त की है । हमें विश्वास है कि अवश्य ही आप हमारे इस आदित्य चरु के सन्देह को दूर करेंगे । दीक्षरणीयेष्टि में आदित्य - चरु क्यों न किया जाय इसके करने में क्या हानि है - कृपा कर इसका उत्तर देकर हमारे सन्देह को मिटाइए । ऐतरेय वास्तव में इसी दर्जे के थे । वास्तव में इसी आदर एवं प्रतिष्ठा के अधिकारी थे । महर्षियों के प्रश्न करने पर - ऐतरेय ने सब से पहिले कहा कि -" अग्निवें देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवताः ” । श्रादित्य- चरु का खण्डन करते हुए सब से पहिले ऐतरेय ने यही कहा । ऐतरेय ने कहा कि हे महर्षियो यह सोम यज्ञ है । सोम परमेष्ठिमण्डल की वस्तु है - यह रोदसी के श्रग्नि में हुत होता रहता है-इसी से सारे विश्व का संचालन हो रहा है । रोदसी का अग्नि ही यज्ञ है । यह अग्नि अवस्था भेद से इन स्वरूपों में परिणत हो रहा है । इसकी अन्तिम अवस्था का ही नाम विष्णु है । यही यज्ञ का स्वरूप बस इस यज्ञ को आत्मसात् करने के लिए दीक्षणीयेष्टि में " श्राग्ना वैष्णव एकादश कपाल पुरोडाश करना चाहिए न कि आदित्य चरु । ऐतरेय के इस वैज्ञानिक उत्तर को तत्कालीन महर्षियों को मानना पड़ा । उन्होंने तब से पूर्व की पद्धति को छोड़ कर इस ऐतरेय - पद्धति का अनुसरण किया जो कि पद्धति श्राज ' ऐतरेय ब्राह्मण ' [ ६३ ]

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) _ शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण नाम से प्रसिद्ध है इसका प्रारम्भ " अग्निर्वै देवानामवमो विष्ण,; परमस्तदन्तरेण सर्वा श्रन्या देवता " यहीं से होता है । बस इसी ऐतरेय सम्मत प्राग्नावैष्णव एकादश कपाल पुरोडाश का निर्वाण बतलाते हुए याज्ञवल्क्य " अपः प्रणीय प्राग्ना वैष्णवमेकादशकपालपुरोडाशं निर्वपतिः ” यह कहते हैं । [ " ब्रह्म और यज्ञ " भारतीय विज्ञान इन्हीं दो भागों में विभक्त है । जो ब्रह्म है उसे हो मौलिक तत्त्व कहते हैं, जो यज्ञ है उसे ही यौगिक तत्त्व कहते है । बस यही दोनों हमारे सायंस के फिजिक्स और केमेष्ट्री हैं । संसार में जो दृश्य पदार्थ हैं वह सारा यज्ञ है, यौगिक तत्त्व है । एवं जिससे यह दृश्य प्रपन्च उत्पन्न हुआ है - इसी का नाम ब्रह्म है । ब्रह्म प्रति सूक्ष्म है— गन्ध, रस, रूप, स्पर्शादि से रहित है व अप्रत्यक्ष है । इन्द्रियागोचर है । मौलिक तत्त्व का आँखों से प्रत्यक्ष हो ही नहीं सकता । अतएव आधुनिक साइन्टिस्ट - जो गन्धक को मौलिक तत्त्व बतलाते हैं - हमारे हिसाब से यह उनकी नितान्त भ्रान्ति है ॥ जो दृश्य वस्तु है वह मौलिक हो ही नहीं सकती । यज्ञ ही का प्रत्यक्ष होता है, ब्रह्म का नहीं । यह यज्ञ, याग और योग भेदेन दो प्रकार का है । दो पदार्थ मिलकर भी अपने स्वरूप से स्थिर रहें – दोनों का स्वरूप नष्ट न हो - वह योग कहलाता है । जैसे - वस्त्र और रंग । रंग अब भी वस्त्र से भिन्न प्रतीत हो रहा है । कपड़े को धुलवा दीजिए कपड़ा सफेद का सफेद परन्तु जब दो वस्तु मिल कर किसी तीसरे स्वरूप में परिणत हो जाती है— पहिले के दोनों स्वरूप नष्ट हो जाते हैं — वह याग कहज्ञाता है । जैसे बारूद | सोरा और कोयला दोनों के मेल से बारूद बनी हैं । अब न इसमें आपको सोरा ही उपलब्ध हो सकता है ' एवं न कोयला ही । यही रासायनिक प्रक्रिया कहलाती है । श्रात्मा को श्रव्ययाक्षरक्षरसमष्टि के अभिप्राय से त्रैधातव्य बतलाया जाता है । इन तीनों में से जो क्षर है — वह आत्म, विकार, यज्ञ भेदेन तीन प्रकार का है । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि और सोम, यह पाँच अक्षर हैं । बस अक्षर के साथ - इ - इन्हीं पाँचों कलाओं को अपने में रखने वाला जो आत्मक्षर है— उससे ब्रह्मादि के क्रम से - प्राण, आप, वाक्, अन्नाद, अन्न यह पाँच विकारक्षर उत्पन्न होते हैं । यही पाँचों पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश नाम से प्रसिद्ध है । यही हमारे पाँच मौलिक तत्त्व हैं । अवीकृत जो विकारक्षर है — उन्हीं का नाम - प्राण आदि हैं । इस प्रपञ्चीकृत तत्त्व के स्वरूप को न पहचान कर -हमारी परिभाषाओं से अपरिचित २० वीं सदी का वैज्ञानिक जगत् हमारे इस पृथिवी जलादि को तत्त्व मानने की मजाक उड़ाता है । कहता है कि कहीं मिट्टी - जल - ऐसे स्थूल पदार्थ भी मौलिक हुए हैं । इनका यौगिकत्व तो सर्वसाधारण की दृष्टि में स्फुट है । उन्हें पता नहीं है कि जिन्हें वे पृथिवी - जल - तेज समझ रहे हैं – वे हमारे सायंस में यौगिक ही माने गए । पञ्जीकृत पृथिवी - तेज प्रपादि वास्तव में यौगिक हैं जिन्हें हम ' पञ्चमहाभूत ' कह कर पुकारते हैं । महाभूत को तो हम स्वयं यौगिक मानते हैं । जिन्हें हम तत्त्व कहते हैं वे पाँचों ही ' भूत ' शब्द से व्यवहृत होते हैं । एवं वे पाँचों ही अपवीकृत हैं । इन पाँचों में जब पाँचों की ग्राहुति होती है तो इन पाँचों यौगिक महाभूतों की उत्पत्ति होती है— जिन्हें कि हम ' यज्ञक्षर ' कहते हैं । यही पाँचों यौगिक हैं । इस प्रकार हमारे वैज्ञानिक तत्त्व को – हमारी परि-भाषा को न समझ कर जो कल्पना रसिक पाश्चात्य विद्वान् प्रपञ्चीकृत पाँचों भूतों पर अर्थात् विकार-क्षरों को तत्त्व मानने पर हमारी हँसी करते हैं - यह उनकी बड़ी भारी भूल है । भारत पराधीन है— [ ६४ ]

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावष्णवेष्टि ब्राह्मण यह उनकी कृपादृष्टि के कारण - अपने सायंस का प्रेक्टिकल वर्क करके नहीं दिखला सकता — प्रतएव मदमत जो कुछ कहे सो थोड़ा है । अधिक समय नहीं है— शीघ्र ही वह दिन आने वाला है - जिस दिन जगद्गुरु भारतवर्ष अपनी खोई हुई सम्पत्ति पुनः प्राप्त कर अपने जगद्गुरुत्व को—-“ एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्व मानवाः ॥ " भगवान मनु के इस वाक्य को चरितार्थ करेगा । हाँ तो हम बतला रहे थे कि - प्रात्मक्षर से पहिले पहल - प्राण, भाप, वाक्, अन्नाद और अन्न यह पाँच मण्डल उत्पन्न होते हैं । तदनन्तर जब इन पाँचों की पाँचों में आहुति होती है तो उस पञ्चीकरण प्रक्रिया से प्राण, आप, वाक्, अन्नाद एवं अन्न यह पाँच यज्ञक्षर उत्पन्न होते हैं । संसार के यच्चयावत् पदार्थ इन्हीं पाँचों से उत्पन्न होते हैं । यही सर्वहुत यज्ञ संसार के यच्चयावत् पदार्थों का उत्पादक है— इसीलिए श्रुति कहती है-" तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । धन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥ तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः । गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः || ” ( ऋ १०.९ ० ) चूंकि इन्हीं पाँचों से सारे पदार्थ बनते हैं— प्रतएव इन पाँचों को वेद में ' विश्वसृज् ' भी कहा जाता है । सर्वहुत यज्ञ से सर्वप्रथम होने वाले इन पाँचों यज्ञक्षरों को ही क्रमशः – स्वयम्भूः, परमेष्ठि, सूर्य, पृथिवी और चन्द्रमा इन नामों से व्यवहृत किया जाता है । जो स्वयम्भूमण्डल है— वही प्राणमण्डल है । परमेष्ठि आपोमण्डल है - सूर्य्य वाडं मण्डल है, पृथिवी अन्नादमण्डल है और चन्द्रमा अन्नमण्डल है | परमेष्ठि का वाय्वात्मक पानी ही - हाईड्रोजन है, इसे ही वेद में ' अम्भः ' कहा जाता । भगवति भागीरथी का और नदियों की अपेक्षा अधिक माहात्म्य - इसी प्रम्भः की बदौलत है । एवं जो पवमान सोम है वही प्राक्सिजन । इस हाईड्रोजन और प्राक्सिजन अर्थात् अम्भः श्रर पवमान सोम के मेल से ही यह स्थूल पीने का पानी उत्पन्न होता है । परमेष्ठि के पानी का नाम ' ग्रम्भः ' है । सू के पानी का नाम मरीचि है, पृथिवी के पानी का नाम मर है एवं चन्द्रमा के पानी का नाम भाप है - जिसे ' भया ' भी कहते हैं । सबसे पहिले स्वयंभू प्रजापति इन चारों लोकों को पैदा करता है, जो कि श्रापोलोक है । जैसा कि श्रुति कहती है— [ ६५ ]

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्राग्ना वैष्णवेष्टि ब्राह्मण " आत्मा वा इदमेकएवाग्र आसीत् । नान्यत् किंचन मिषत् । स ईक्षत लोनान् नु सृजा इति - सदमाँल्लोकाँनसृजत् - अम्भोमरीचिर्मर प्रापः ॥। ” ( ऐत ० उप ० ) सबसे पहिले स्वयम्भू के अनन्तर स्वयम्भू से पानी ही पैदा होता है— इसी श्रुति के अनुसार भगवान् मनु भी कहते हैं— " सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुविविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादौ तासु वीजमवासृजत् ॥ इति ॥ " ( मनु १८ ) संसार की पैदाइश पूर्वोक्त पाँचों मण्डलों से होती है । पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश— इन पाँच ही महाभूतों की समष्टि से यच्चयावत् पदार्थों का निर्माण होता है । इन पाँचों में जो प्राण है - वह असंग पदार्थ है । मानसी सृष्टि का अधिष्ठाता प्राण है – एवं मैथुनी सृष्टि का अधिष्ठाता पानी है । पानी ही बरस कर औषधि स्वरूप में परिणत होता है - उससे वीर्य्य होता है-वीर्य्य से सन्तानोत्पत्ति होती है । कहने का तात्पर्य यही है कि पानी से ही पुरुष की उत्पत्ति होती है । इसीलिए ' वेत्थयथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति " इस उद्दालक के प्रश्न करने पर श्रद्धा सोम वीर्य्य अन्न - रेतः एवं योनि इत्यादि क्रम से उत्तर में प्रवाहण ने ' इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ' ( छा ० ५। ३ ) यह कहा है । इससे स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि पानी ही से मैथुनी सृष्टि होती है । प्रकृतियज्ञ पानी ही से प्रारम्भ होता है— बस इसीलिए प्रकृतियज के अनुसार कल्पित मनुष्ययज्ञ में भी सबसे पहिले अपां प्रणयन ही किया जाता है । यज्ञ द्वारा नया आत्मा जो कि " दिव्यात्मा " नाम से प्रसिद्ध है बनाया जाता है । उसी के बन्धन में बंध कर यह मानुष प्रज्ञानात्मा १७ वें ( सप्तदश ) स्वर्ग में जाता है । एवं प्रजनन क्रिया में पानी ही प्रधान है । प्रकृत संसार को उत्पन्न करने वाला यज्ञ - पहिली संस्था पानी ही की रूपता है । अतएव इस दिव्यात्मप्रजनन स्वरूप इस सोमयाग में - प्रकृतियज्ञवार अवश्य अवश्य पानी के प्रणयन की आवश्यकता है । बस इसीलिए ' श्रपः प्ररणीय ' कहा गया है । यज्ञारम्भ में पानी ही का प्रणयन क्यों किया जाता है - इसका यही वैज्ञानिक रहस्य है । हम जो भोजन करते हैं यह भी यज्ञ हैं । यज्ञ में पहिला स्थान पानी का है अतएव भोजन के पहिले और अन्त में आचमन करने की महर्षि लोग संख्त हिदायत करते हैं । वेद में इसी आचमन की उत्पत्ति बतलाते हुए कहा जाता है— 1 " अनग्नतायाव बिभेमि । का ते अनग्नता - इति- आपो वा अनग्नता ॥ " शरीरस्थ प्राण कहता है कि मैं नग्नता के डर से डरता हूँ । महर्षि पूछते हैं कि तुम्हारी अनग्नता क्या है— प्राण उत्तर देता है कि पानी ही मेरी अनग्नता है । प्राण को यज्ञात्मा में शामिल करने का काम इसी ' पानी ' का है । पानी ही संघाता है - मल को हटाने वाला है - यज्ञ का पहिला [ ६६ ]

पृष्ठ 85

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण स्वरूप है । अतएव भोजन करने से पहिले एवं बाद में ब्रह्मावर्चस् की रक्षा चाहने वाले ब्राह्मण को अवश्य श्रवश्य ही आचमन करना चाहिए । प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि यह यजमान स्नान कर वस्त्र पहिन यज्ञशाला में प्रविष्ट वाला है । दीक्षा यज्ञाङ्ग है-- यज्ञ का प्रारम्भ पानी से है — अतः अर्थात् श्रपां प्रणयन करके तदनन्तर - प्राग्नावैष्णव एकादश कपाल हो चुका । अब यह दीक्षा लेने सर्वप्रथम अप प्ररणयन कर्म करके पुरोडाश का निर्वाण करता है । " अपः प्रणीय - प्राग्नावैष्णवमेकादशकपालं पुरोडाशं निर्वपति || " दीक्षा के पहिले क्यों श्राग्नावैष्णव एकादश कपाल पुरोडाश का निर्वाण किया जाता है— इसका कारण बतलाते हैं— अग्नि ही सारे देवता हैं । एवं अग्नि में ही सारे देवताओं के लिए आहुति दी जाती है । हम जितने भी पदार्थ देखते हैं - वे सब अग्निसोमात्मक है । पदार्थ दो प्रकार के हुआ करते हैं— स्थानावरोधि और स्थानानवरोधि । जो स्थानावरोधि पदार्थ हैं उन्हें ही वेद में धामच्छद शब्द से व्यवहृत किया जाता है । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र वह तीन तो अन्तर्य्यामि में अर्थात् हृद्य हैं - एवं प्रधामच्छद हैं । एवं अग्नि और सोम यह दोनों हृदय से बाहर की चीज हैं एवं धामच्छद हैं । उसी ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र के अन्तर के आधार पर इस धामच्छद अग्नि और सोम की स्थिति रहती है । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र तीनों अन्तर्यामी हैं, हृद्य हैं - इसी भाव को सूचित करने के लिए शरीर के केन्द्र का नाम ' हृदय ' रखा गया है । हृ - विष्णु के अभिप्राय से है, द - इन्द्र के अभिप्राय से है एवं य- ब्रह्मा के अभिप्राय से है । इन्द्र प्रक्षेपणधर्मा भी है । केन्द्र में आई हुई वस्तु को यह इन्द्र प्रतिक्षण बाहर फेंका करता है । इसीलिए ' ति - खण्डयति ' के अभिप्राय से इन्द्र के लिए " द " कहा जाता है । एवं विष्णु आहरण कर उस क्षति की पूर्ति किया करता है । बस इसीलिए श्राहरंति के अभिप्राय से हृ कहा जाता है । उस आए हुए अन्न का जो नियमन करता है, उसी का नाम ब्रह्मा है । एवं विष्ण जिसे बाहर से लाते हैं उसका नाम सोम है जो कि अन्न कहलाता है, एवं इन्द्र जिसे बाहर फेंकते हैं - वह अग्नि है । बस इस प्रकार इन पाँचों अन्तरों से सारा जगत् व्याप्त है । मायावच्छिन्न जो केन्द्रीय रस है - वह प्रारण कहलाने लगता है । उस प्रारण का कुछ हिस्सा बाहर जाता है, कुछ केन्द्र में ही प्रतिष्ठित रहता है । एवं कुछ हिस्सा अन्नदों से बाहर से केन्द्राभिमुख प्राता रहता है । बस इस प्रकार से एक ही प्राण, अवस्था भेद के कारण भिन्न - भिन्न कार्य्यं करता हुआ — ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र इन तीनों नामों में परिणत जाता है । कहने को तीन हैं - वास्तव में तीनों एक हैं— इसी अभिप्राय से पौराणिक कहा करते हैं— " एकमूतिस्त्रयो देवा ब्रह्माविष्णुमहेश्वराः ॥ " [ ६७ ]

पृष्ठ 86

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण इन्द्र ही को पौराणिक परिभाषा में महेश्वर कहते हैं । प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि यह तीनों ही ' ध ' हैं, अन्तर्य्यामी हैं, प्रधामच्छद हैं । संसार में जो वस्तु नाँव से व्यवहृत करने लायक है वह अग्नि सोम ही है । धामच्छद - यह दो ही तत्त्व हैं जिसे ' जगत् ' कहते हैं - बह इन्हीं दोनों की समष्टि है । यही दोनों जगत् कहलाते हैं । यद्यपि ब्रह्माविष्णुइन्द्र हैं अवश्य पर वे तो अन्तर्यामी हैं । वे तो जगन्नियन्ता हैं न कि जगत् । जगत् तो अग्नि और सोम ही है । इसीलिए तो ' अग्नी-सोमात्मकं जगत् ' कहा जाता है । यह अग्नि भी वायु स्वरूप है, एवं सोम भी वायु स्वरूप है । घन - विरल भेद से इसी वायु की अग्नि और श्रादित्य यह दो अवस्थाएँ और हो जाती हैं । एवं इन्हीं दो भेद से वायु की ( सोम की ) सोम और आपः – यह दो अवस्थाएँ हो जाती हैं । इस प्रकार एक ही अग्नि धन- तरल - विरल इन अवस्थाओं के भेद से अग्नि, वायु, आदित्य इन तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । अग्नि और श्रादित्य, आप और सोम वायुस्वरूप अग्नि की एवं वायुस्वरूप सोम की घन - विरल अवस्था भेद से— यह दो अवस्थाएँ होती रहती हैं । स्वभावतः अग्नि और सोम वायुस्वरूप ही हैं । बस यही अग्नि-वायु — आदित्य, अप् — वायु —– सोम षड्ब्रह्म कहलाते हैं । यही जगत् के कर्ता - धर्ता हैं । देवता, पितर, गन्धर्व, असुर, मनुष्य, पशु इत्यादि सारा प्रपञ्च - इन्हीं के आधार पर अवलम्बित है । जो आग्नेय प्राण हैं - वही देवता हैं, जो सोम्य प्रारण हैं - वही पितर एवं गन्धर्व हैं । जो प्राप्य प्रारण हैं-वही असुर हैं । जो वैश्वानराग्नि प्रारण हैं - वही मनुष्य हैं । गरज यह है कि सारा प्रपञ्च - इन्हीं छनों के अर्थात् अग्नि और सोम इन दो के आधार पर स्थित है । श्रव्यय रूपत्वबल्शा स्वरूप पञ्च पुण्डीर युक्त सारे ब्रह्माण्ड को स्वयंभू, परमेष्ठि, सूर्य्य, चन्द्र और पृथिवी इन पाँच मण्डलों में विभक्त बतलाया था । इन पाँचों मण्डलों में भूः भुवः स्वः, महः जनः तपः और सत्यम् - यह ( सात ) लोक - विभाग किए जाते हैं । एवं इन्हीं में तीन त्रिलोकिएँ मानी जाती हैं । [ जो पिण्ड जिसके चारों ओर घूमता है - उस घूमने वाले पिण्ड को पृथिवी कहते हैं । एवं जिसके चारों ओर वह घूमता है— उसे " द्यौ " कहते हैं । एवं इन दोनों के बीच जो खाली स्थान है — उसे अन्तरिक्ष कहते हैं । बस पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ इनकी यही सामान्य परिभाषा है । इसी परिभाषा के अनुसार - जिस पर हम बैठे हुए हैं वह गोला चूंकि सूर्य के चौतरफ घूम रहा है, अतएव इसे हम पृथिवी कहेंगे - और सूर्य्य को द्युलोक कहेंगे- एवं सूर्य्य और पृथिवी का जो बीच का भाग है - उसे ही अन्तरिक्ष कहेंगे । बस इस प्रकार पृथिवी से सूर्य्य तक एक त्रिलोकी हो जाती हैं । एवमेव सूर्य्य चूंकि - परमेष्ठिमण्डल की परिक्रमा करता है - प्रतएव उसी परिभाषा के अनुसार सूर्य हुआ पृथिवी और परमेष्ठि हुआ द्यौ और बीच का स्थान अन्तरिक्ष । बस यही दूसरी त्रिलोकी है । एवमेव परमेष्ठि चूँकि स्वयम्भू के चारों ओर परिक्रमा लगाता है - अतएव परमेष्ठि हुआ पृथिवी और स्वयम्भू हुआ द्यौ - एवं बीच का स्थान हुआ अन्तरिक्ष । बस यह तीसरी त्रिलोकी है । [ ६८ ]

पृष्ठ 87

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्रग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण बस चूँकि स्वयम्भू स्थिर है - वह किसी के परिक्रमा नहीं लगाता - अतएव त्रिलोकी व्यवस्था - तीन त्रिलोकी पर ही आ के समाप्त हो जाती है । इसीलिए लोक में जब परमावधि बतलाना होता है— तीन तिरलोकी दीख भाई ' यह कहा जाता है । इन तीनों त्रिलोकियों में तीन पृथिवी हैं, तीन ही अन्तरिक्ष हैं, तीन ही द्यो हैं । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-तित्रो द्यावः सवितुर्द्वा उपस्थाँ एकायमस्य भुवने विराषाट् । प्ररिंग न रथ्यमभृताधितस्थुरिह ब्रवीतु यद् तधिकेतत् ॥

तिलोभूमीर्धारयन् त्रीरुतद्यून् त्रीणि व्रताविदथे श्रन्तरेषाम् ।

ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥

तिस्रो द्यावो निहिता अन्तरस्मिन् तित्रो भूमीरुपराः षडविधानाः ।

गृत्सोराजा वरुणश्चक्रएनं दिविप्रेङ खं हिरण्ययं शुभेकम् ॥

वेद में पृथिवी को माता कहते हैं— एवं द्युलोक को पिता कहते हैं । चूँकि तीन पृथिवी हैं और तीन द्यौ हैं । अतएव श्रुति कहती है-— " तिस्रो मातृन् त्रीन् पितृन् बिभ्रदेक ऊर्ध्वस्तस्थौनमेव ग्लापयन्ति मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वविदं वाचं विश्वमिन्वाम् " तीन पृथिवी, तीन अन्तरिक्ष और तीन द्यु. 2 के हिसाब से लोक कुल ९ होने चाहिए थे परन्तु सूर्य्य और परमेष्ठि- दोनों पृथिवी श्रौर द्य बन जाते हैं । इन तीनों त्रिलोकियों का नाम क्रमशः— रोदसी, क्रन्दसी और संयती - यह है । जो रोदसी का द्य है - वही क्रन्दसी की पृथिवी बन जाती है - एवं जो क्रन्दसी की है - वही संयती की पृथिवी बन जाती है । इस प्रकार तीन त्रिलोकियों में से ७ ( सात ) ही लोक रह जाते हैं । यही सातों १ भूः, २ भुवः, ३ स्वः, ४ महः, ५ जनः, ६ तपः, और ७ सत्यम् नाम से प्रसिद्ध हैं । भगवान् प्रजापति की यह ७ ( सात ) ही व्याहृतिएँ हैं । इनमें से ६ तो चल हैं - एवं एक अर्थात् स्वयम्भू स्थिर है । इसी अभिप्राय से वेद भगवान् कहते हैं—

श्रचिकित्वाञ्चिकितुषश्चिदत्र कवीन् पृच्छामि विद्मने न विद्वान् ।

वि यस्तस्तम्भ षलिमा रजांसि अजस्यरूपे किमपि स्विदेकम ॥

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पृष्ठ 88

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावष्णवेष्टि ब्राह्मण सम्पूर्ण कथन का तात्पर्य यही है कि पांचों मण्डलों में – रोदसी, क्रन्दसी और संयंती यह तीन त्रिलोकिएँ हैं । इनमें से यज्ञ का सम्बन्य रोदसी और क्रन्दसी त्रिलोकी से है । क्रन्दसी सूर्य्य और परमेष्ठि का नाम है । रोदसी पृथिवी और सूर्य का नाम है । बस इन्हीं से हमारे यज्ञ का सम्बन्ध है | पृथिवी से सूर्य्य तक - निविड, तरल, विरल भेद से अग्नि, वायु, आदित्य स्वरूप में परिणत होता हुआ अग्नि रहता है । एवं सूर्य्य से ऊपर से परमेष्ठि तक तीनों अवस्थाओं में - ( अप्, वायु, सोम ) परिणत सोम रहता है । अग्नि में सोम की आहुति का नाम ही यज्ञ है । एवं अग्नि है रोदसी की वस्तु, एवं सोम है क्रन्दसी की वस्तु, अतएव हमने - यज्ञ में रोदसी और क्रन्दसी त्रिलोकी का सम्बन्ध है - यह कहा है । सूर्य भी अग्नि का पिण्ड है । पृथिवी भी अग्नि का पिण्ड है । सूर्य्याग्नि, सावित्राग्नि कहलाता है । पार्थिवाग्नि गायत्राग्नि कहलाता है । कहने को दो अग्नि हैं - वास्तव में गायत्र ही सावित्र है एवं सावित्र ही गायत्र है । सूर्य का अग्नि पृथिवी में प्रतिफलित हो पृथिवी की चीज बन जाता है तो वही गायत्राग्नि कहलाने लगता है । यह अग्नि मर्त्य - प्रमृत भेदेन दो प्रकार का है । जो श्रग्नि पिण्ड स्वरूप में परिणत हो रहा है - वह मर्त्य है - एवं २१ तक जाने वाला अग्नि अमृताग्नि है । अमृताग्नि: मण्डल को रथन्तर साम कहते हैं । जैसे — सूर्य्य में ज्योतिः, गौ, श्रायु - यह तीन भनोता हैं तद्वत्: पृथिवी में - वाग् - गौ और द्यौ यह तीन मनौता हैं । गौ क्या है - वाक् क्या है - और द्यौ क्या है - इसका विवेचन करना प्रकृत से दूर जाना है । हमें कहना यही है कि १००० गौत्रों में वितत जो वायु - मण्डल है— जो कि वषट्कार कहलाता है उसके ३३ विभाग हैं । केन्द्र में से जाने वाला जो अग्नि है - वह निविड- तरल - विरल भेद से २१ तक चला जाता है । ऊपर की पृष्ठ से ऊपर की ओर जाता हुआ जो अग्नि है— उसकी जहाँ घनावस्था समाप्त हो जाती है— वहीं तक वह अग्नि- अग्नि नाम से व्यवहृतः होता है । पूर्वोक्त वषट्कार मण्डल में ३-३ ' गो के हिसाब से ३३ अहर्गण होते हैं । इनमें कुल ६ स्तोम रहते हैं । १ २ ३ ४ ५ ६ ३।६।६।६।६।६ — यह ६ स्तोम रहते है । एक -एक स्तोम में १८ - १८ गौ रहती हैं । बाकी १० गौ बच जाती हैं - वही प्रजापति है । पूर्वोक्त स्तोमों के नाम हैं- त्रिवृत्स्तोम, पञ्चदशस्तोम, एकविशस्तोम, त्रिणवस्तोम, त्रयस्त्रिशत्स्तोम एवं एक पहिला । इस प्रकार ६ स्तोम होते हैं । पूर्वोक्त अग्नि की घनावस्था - पृथिवी के त्रिवृतस्तोम पर जा के समाप्त जाती है - प्रतएव अग्नि को त्रिवृत् कहा जाता है । पृथिवी के 8 तक अग्नि घनावस्था में परिणत होकर रहता है यही तात्पर्य्य है | एवं जो १५ तक अग्नि तरलावस्था में रहता है- जो कि वायु कहलाता है - एवं २१ तक अग्नि विरलावस्था में रहता है- जो कि आदित्य नाम से व्यवहृत होता है बस २१ पर जाकर अग्नि की मात्रा समाप्त हो जाती है । २१ के बाहर सोम ही सोम है । एक ही अग्नि - धन- तरल - विरल भेद से- अग्नि, वायु, आदित्य स्वरूप में परिणत हो जाता है - यही तात्पर्य है । [ ७० ]

पृष्ठ 89

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्रग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण फिर इन तीनों में अवान्तर भेद होने लगते हैं- जो त्रिवृत अग्नि है -८ संस्था रखता है । अवस्थाविशेष से वही अग्नि- आठ नामों से व्यवहृत होने लगता है - यही आठों वसु हैं । एवं वायु ११ भागों में परिणत हो जाता है - यही ११ रुद्र हैं । परमेष्ठि का जो वायु है - वह पानी में प्रोत - प्रोत रहता है - अतएव वह बदन में चुभता नहीं - इसीलिए उसको साम्बसदाशिव कहा जाता है, परन्तु सूर्य्य के नीचे का यह वायु पानी के प्रभाव से रुक्ष रहता है- बदन में चुभ कर पीड़ा पहुँचाया करता है अतएव - ' रोतयन्ति जनान् ' इस व्युत्पत्ति से इसे रुद्र कहते हैं । एवमेव १५ से ऊपर का वह प्रादित्य-१२ अवस्थाओं में परिणत रहता है । यही १२ आदित्य कहलाते हैं । इनमें जो बारहवाँ श्रादित्य है - उसे ही विष्णु कहते हैं । कहने का तात्पर्य यही है कि वह एक ही अग्नि अवस्था भेद से -८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य - इन ३१ स्वरूपों में परिणत हो जाता है । ३२ वां है प्रजापति - जो कि सर्व-प्रजापति नाम से प्रख्यात है एवं ३३ वाँ है - वषट्कार । इस प्रकार ३३ देवता कहने को ३३ हैं-वास्तव में देवता एक है - जिसका कि नाम " अग्नि " है । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य - शाकल्य संवाद बतलाती हुई श्रुति कहती है-" अथ हैनं विदग्धः शाकल्य पप्रच्छ - कतिदेवा - याज्ञवल्क्येति । स मैनिविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शताच, त्रयश्च त्री चसहस्र े त्यो मिति होवाच " | कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति । त्रयस्त्रिंशादित्योमिति होवाच । कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति - षडित्यो मिलि होवाच । कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रयइत्योमिति होवाच । कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्योमिति होवाच । कत्येव देवा याज्ञ-वल्क्येति — प्रध्यर्ध इत्योमिति होवाच । कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति – एक इत्यो-मिति होवाच । " श्रुति के अन्त में एक ही देवता बतलाया है । वास्तव में ऐसा ही है । अग्नि की अवस्था विशेष का नाम ही तो देवता है । बस इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर - भगवान याज्ञवल्क्य कहते हैं— " अग्निर्वै सर्वा देवताः । " इति । इस २१ तक वितत रहने वाले अग्नि में हर वख्त - पारमेष्ठ्य सोम की आहुति होती रहती है । बस पृथिवी के १७ वें स्थान से २२ तक का जो एक यज्ञ होता हैं - वही नवाह यज्ञ कहलाता है | १७ वां स्थान आहवनीय है — क्योंकि पार्थिव अग्नि यहीं तक रहता है । चूँकि इसमें सोम हुत होता है-अतएव इसे " श्राहवनीय " कहते हैं । इस सोम के पड़ने से श्रग्नि को ज्वाला चूँकि. २१ तक जाती है अतएव अग्नि की सत्ता - २१ तक मान ली जाती है । बस इस अग्नि में हर वख्त सोम की बाहुति पड़ा [ ७१ ]

पृष्ठ 90

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तृतीय काण्ड ( ०१ ) शैतपर्थं ब्राह्मणं श्रग्निावैष्णवेष्टि ब्राह्मण करती हैं । इन्द्र - वसु - रुद्र - प्रादित्य सारे देवता अग्नि में ही रहते हैं । रहते क्या हैं - श्राग्नेय हैं - एवं इसी अग्नि में पड़ती है - सोमाहुति - - बस इसी अभिप्राय से कहते हैं— " अग्नौ हि सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुह्वति । " सम्पूर्ण कथन का सारांश यही हुआ कि - पारमेष्ठ्य भृगु की ( क्रन्दसी त्रिलोकी के सोम की ) हर वख्त पार्थिव अङ्गिरा ( रोदसी की अग्नि ) में प्राहुति होती रहती है । इस प्रकार से संसार का स्वरूप बनाने वाला यह प्राकृतिक सोमयाग अनवरत होता रहता है । हमने कहा था कि देवता कुल ३३ हैं । इनमें ८ वसु हैं, ११ रुद्र हैं एवं १२ श्रादित्य हैं । जो ८ वसु हैं - उनमें पहिला वसु — अग्नि है - जैसा कि श्रुति कहती है-" कतमे वसव इति – अग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षंच प्रादित्यश्च द्यौश्च चन्द्रमाश्च नक्षत्राणि च । एते वसवः एतेषुहीदं सर्वं वसुहितम् । एतेहीवं सर्वं वासयन्ते । तद्यदिदं सर्वं वासयन्ते तस्माद् वसवः । " एवं १२ वाँ आदित्य विष्णु है । अग्नि ही को यज्ञ कहते हैं क्यों कि इसमें जब क्रन्दसी के सोम की प्राहुति होती है— तभी तीन - यज्ञ का स्वरूप बनता है । इसीलिए - " ग्निवें यज्ञः " कहा जाता है । इस रोदसी के अग्नि यज्ञ के प्रारम्भ में तो — प्रग्नि है - प्रर अन्त में विष्णु है । इस छोर श्रग्नि है, उस छोर विष्णु है । सारे देवताओं के आदि में अग्नि है, एवं अन्त में विष्णु है । इसीलिए - ' विष्णु व बेवानां द्वारपाल ' कहा जाता है । अपिच इसीलिए " प्रग्नि च ह वै विष्णुश्च देवानां दीक्षा पालो " कहा जाता है । बस इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" श्रग्निवै यज्ञस्यावरार्थ्यो विष्णुः परार्ध्यः । " इसीलिए तो - प्रादित्यचरु का खण्डन करते हुए भगवान् ऐतरेय कहते हैं— " अग्निर्वे देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा श्रन्या देवताः । " इति । सोमयज्ञ में सोम को आत्मसात किया जाता है— एवं सारी रोदसी के देवताओं को दिव्यात्मा बना श्रात्मसात किया जाता है । बस सम्पूर्ण देवताओं को एवं यज्ञ को आत्मसात करके — मैं दीक्षा लू-इसीलिए — दीक्षा से पहिले एवं अपांप्रणयन् के अनन्तर - श्रग्नावैष्णव एकादश कपाल पुरोडाश होता है । [ ७२ ]