Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 101–110
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 101–110
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द्वितीयमुण्डकम्] मुण्डकोपनिषत् ( 5 ) 59 कर्म से प्राप्त करने योग्य लोकों के स्वरूप को अच्छी तरह परखकर अर्थात् यज्ञादि के स्वरूप को पहचानकर ब्राह्मण ( ब्रह्मजिज्ञासु ) को त्याग का आचरण करना चाहिए । क्योंकि' कर्म करने से तो वह अकृत ( अजन्मा - अयोनिज) ब्रह्म प्राप्त नहीं किया जाता । उस अकृत ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करने के लिए तो उस जिज्ञासु को अपने हाथ में कुछ यज्ञकाष्ठ लेकर किसी वेदज्ञ और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना चाहिए ।
तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय ।
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥13 ॥
'इति प्रथममुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥2 ॥
S उस ब्रह्मज्ञानी गुरु ने शम- दमादि से युक्त शान्त चित्तवाले और ज्ञानप्राप्ति के लिए आये हुए उस शिष्य को ब्रह्म - विद्या का ऐसा सात्त्विक उपदेश दिया कि जिससे शिष्य ने उस सत्यस्वरूप अविनाशी ब्रह्म को जान लिया । इस प्रकार मुण्डकोपनिषद् के प्रथम मुण्डक में दूसरा खण्ड समाप्त हुआ । * द्वितीयं मुण्डकम् प्रथमः खण्डः तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः । तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥1 ॥
ब्रह्म सचमुच ही परमार्थसत्य है । जिस तरह प्रज्वलित अग्नि में से समान आकारवाली हजारों चिनगारियाँ निकलती हैं, उसी प्रकार हे सौम्य! इस अक्षर में से (ब्रह्म में से) विविध प्रकार के प्राणी उत्पन्न होते हैं और फिर उसी में विलीन हो जाते हैं ।
दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥2 ॥
वह प्रकाशमय पुरुष किसी रूपवाला नहीं है, वह बाहर और भीतर सर्वदा विद्यमान ही है, उसका कभी जन्म नहीं होता । वह श्वासोच्छ्वास नहीं करता; उसका कोई मन नहीं है, वह निष्कलंक है और वह अक्षरब्रह्म से भी उच्चतर है ।
एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥3 ॥
इस ब्रह्म में से ( सगुण ब्रह्म में से ) प्राण ( जीवनीशक्ति), मन और इन्द्रियाँ ( इन्द्रियों के अवयव), एवं आकाश, वायु, तेज, जल और विश्व के आधाररूप पृथ्वी प्रकट होती है ।
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60 उपनिषत्सञ्चयनम्
अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः ।
वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥4 ॥
इसका मस्तक स्वर्ग है, चन्द्र और सूर्य इसकी आँखें हैं, दिशाएँ इसके कान हैं, अभिव्यक्त वेद ( शब्द ) इसकी वाणी है, वायु इसकाश्वासोच्छ्वास है, जगत् इसका हृदय है, इसके पैरों के उपयोग के लिए पृथिवी है, वही सर्व प्राणियों के हृदय में रहनेवाला आत्मा है ।
तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः सोमात्पर्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् ।
पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात्सम्प्रसूताः ॥5 ॥
उससे सूर्यरूपी समिधा वाला स्वर्गरूप अग्नि उत्पन्न हुआ । वह स्वर्ग ( अग्नि ) परमपुरुष से जन्मा है और चन्द्र स्वर्ग ( अग्नि) में से जन्मा है । चन्द्र से वर्षा आती है । वह वर्षा पृथ्वी पर औषधियाँ उगाती हैं, वे औषधियाँ पुरुषों को वीर्य देती हैं । वे ( पुरुष ) वीर्य को स्त्री में सिंचित करते हैं और इस प्रकार उस परमपुरुष में से (हिरण्यगर्भ = सगुण ब्रह्म परमात्मा में से) क्रमश: बहुत प्राणी जन्म लेते हैं । ( यहाँ स्वर्गलोक को अग्नि कहा है । )
तस्मादृचः साम यजूषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च ।
संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥6 ॥
उस परमपुरुष - हिरण्यगर्भ में से ऋक्, यजुस् और सामवेद, दीक्षा (प्रतिज्ञाविधि), सभी यज्ञविधि, बलियज्ञ, धार्मिक कार्यों में दिये जाने वाले उपहार (दक्षिणा ), संवत्सर (विशिष्ट विधि के लिए शास्त्रविहित निश्चित समय ), यज्ञाधिकारी पुरुष - यजमान, यजमान द्वारा इच्छित उत्पन्न हुआ है | यजमान द्वारा इच्छित उन देवलोकादि को चन्द्र पवित्र करता है ( जैसेलोकपितृलोक— यह सब ) और सूर्य दुःख का कारण बनता है अर्थात् तपता है । को
तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयासि ।
प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च॥7 ॥
और भी इस ( ब्रह्म ) में से देवों और मनुष्यों के भिन्न- भिन्न वर्ग भी आए ( ),, ( = ( ), (मनुष्यखाद्यान्नस्त्रियाँ), तप और( श्रमपुरुष= तपश्चर्यापशु )पक्षी, श्रद्धाप्राण, सत्यश्वास, आत्मसंयमजीवनीशक्ति( कामत्याग), अपान (हैंनिःश्वास। साध्य), देवविशिष्टचावल, यव (, ) ) - साध्य एक विशिष्ट देववर्ग है वे बारह हैं । तथा विधि विधान आते हैं । सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्सप्तार्चिषः समिधः सप्तहोमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥8 ॥
इसी ब्रह्म में से सात इन्द्रियावयव ( दो आँखें हैं । ( और इन इन्द्रियावयवों के योग्य ) प्रत्यक्षीकरण, दो नाक, दो कान और एक मुख) आविष्कृत होते ( ),अनुसरण करती हुई सात समानताएँ चेतनाएँ की सात शक्तियाँ उनके विषय और उनका प्रत्येक प्राणी के शरीर में निहित चारों ओर घूमनेवालेतथा उनके स्थान आदि भी उसी से उत्पन्न होते हैं । हैं । सुषुप्ति की अवस्था में ये अवयव हृदयरूपी गुफा इनमें लीनअवयवों के स्थान भी तो उसी में से आए हो जाते हैं । अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वेऽस्मात्स्यन्दन्ते
अतश्च सर्वा ओषधयो रसाश्च येनैष सिन्धवः सर्वरूपाः ।
भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥१ ॥
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द्वितीयमुण्डकम् ] मुण्डकोपनिषत् ( 5 ) 61 और भी— इसी ब्रह्म से सब समुद्र और पर्वत आए हैं, इसी से ही, ( - निःसृत हुईं हैं और इस भी इसी से आए हैं । इससे ब्रह्म( यहमें सेनिश्चितही सभीहै किऔषधियाँ- ) ब्रह्मखाद्यान्नके अस्तित्व- वनस्पतियाँछोटी) आईबड़ीहैं । सभीमधुरादिनदियाँरस का अस्तित्व है | वही इन सभी वस्तुओं को एक साथ धारण करता के कारण ही इन सभी वस्तुओं है ।
पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् ।
एतद्यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य ॥10 ॥
इति द्वितीयमुण्डके प्रथमः खण्डः ॥1 ॥
यह ब्रह्म ही सम्पूर्ण जगत् है, ब्रह्म ही यज्ञादि कर्म है, ब्रह्म ही ज्ञानादि है और तप है । ब्रह्म ही परमतत्त्व ब्रह्म परम अमृतमय है । हे सौम्य! वही आनन्दमय शाश्वत ब्रह्म सबके हृदय में अधिष्ठित है । उसे जो जान लेता है, वह इसी जीवन में अज्ञान के बन्धनों को काट देता है । इस प्रकार मुण्डकोपनिषद् के द्वितीय मुण्डक में प्रथम खण्ड समाप्त हुआ । द्वितीयः खण्डः आविः संनिहितं गुहाचरं नाम महत्पदमत्रैतत्समर्पितम् । एजत्प्राणान् निमिषच्च यदेतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्वरिष्ठं प्रजानाम् ॥1 ॥
वह ब्रह्म स्वप्रकाशित है और सबके भीतर का चैतन्य है । उसे 'गुफा में रहनेवाला' कहा जाता है, क्योंकि वह सबके हृदयरूपी गुफा में स्थित है । यह ब्रह्म सबका आधार है । जो कुछ भी हिलता- चलता है, जो कुछ जीवित है, जो कुछ पलकें मार सकता है या नहीं मार सकता, उन सबका अर्थात् सभी अस्तित्वों का वह आधार है । हे सौम्य! यह ब्रह्म दृश्य भी है और अदृश्य भी है— दोनों है । वह आदरणीय ( वांछनीय - शाश्वत) है । वह ज्ञानेन्द्रियों से परे है । उसे तुम अपने आत्मा के रूप में पहचान लो । यदर्चिमद्यदणुभ्योऽणु च यस्मिँल्लोका निहिता लोकिनश्च । तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्यं विद्धि ॥2 ॥
जो प्रकाशित है, जो छोटे -से भी छोटा है, जिसके आधार पर सब लोक और लोकवासी अवस्थित हैं (जो सबकी संजीवनी शक्ति है ), जो वाणी है, जो मन है, जो सत्य है, जो शाश्वत ( अमर्त्य) है, वह लक्ष्य ( सब ) यह अक्षर (सनातन) ब्रह्म ही है ।
धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महान्तं शरं ह्युपासानिशितं सन्दधीत ।
आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥3 ॥
उपनिषत्प्राप्त संदेशरूपी बड़ा धनुष लेकर, ध्यान से तीक्ष्ण बनाए गए जीवात्मारूपी बाण का अनुसन्धान करना चाहिए । फिर उस धनुष को जोर से खींचो ( अर्थात् जागतिक विचारों से मन को
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62 उपनिषत्सञ्चयनम् वापिस भीतर खींच लो ) और फिर ब्रह्म की ओर देखो अर्थात् वह ब्रह्म ही तुम्हारा लक्ष्य है अत: अपने ( तीक्ष्ण किए हुए) मन से ब्रह्म को भेदो ।
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥4 ॥
‘ ॐ ’ यह धनुष् है, जीवात्मा बाण है । उस जीवात्मारूप बाण का लक्ष्य ब्रह्म है । अप्रमत्त ( सावधान ) रहकर उस लक्ष्य को बींध डालो । बाद में तुम उस ब्रह्म जैसे ही बन जाओ । ( अर्थात् व्यष्टि चैतन्य को चाहिए कि वह समष्टि चैतन्य को लक्ष्य कर उससे एकाकार हो जाए – यह बात इन मन्त्रों में रूपकात्मक ढंग से कही गई है ) ।
यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः ।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥5 ॥
यह स्वर्ग, यह पृथ्वी, यह अन्तरिक्ष ( स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का अवकाश) तथा यह जीवन, सभी इन्द्रियों के साथ मन आदि सब कुछ इस विश्वात्मा ( समष्टिचैतन्य) के ऊपर ही आधारित है । इसलिए इस आत्मा को पहचान लो, अन्य विषयों को छोड़ दो । यह आत्मा तो अमरत्व का सेतु है ।
अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः ।
ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥6 ॥
रथ की धुरी में जड़े अरों की भाँति जहाँ हृदय के साथ कई नाड़ियाँ जुड़ी हुई रहती हैं, वहाँ यह परमात्मा अनेक रूपों में अभिव्यक्त होता है और भीतर (हृदय - मन में ) घूमता -फिरता है । इस आत्मा का ‘ ओम्' के रूप में ध्यान करो । अन्धकार का अतिक्रमण करने के लिए तुम्हें आशीर्वचन ( स्वस्ति ) है । ( यहाँ हृदय में उठती हुई अनेक भावनाओं का संकेत है । )
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्यैष महिमा भुवि ।
दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः ॥
मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय ।
तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति ॥7 ॥
जो आत्मा सामान्यतः और विशेषत: भी सब कुछ जानता है, इस विश्व में जो सब कुछ है, वह उसी की महिमा के कारण ही है । वह आत्मा सभी के हृदयाकाश में प्रकाशित है । इस हृदयाकाश को ब्रह्म का निवासस्थान कहा जाता है । मन के रूप में अभिव्यक्त और जीवन एवं सूक्ष्म शरीर का संचालक वह आत्मा हृदय की नींव में है ( संनिहित है ) एवं स्थूल शरीर में प्रतिष्ठित है । जो विवेकशील हैं, वे “ यह आत्मा अमर है और आनन्दमय है ” – ऐसा अनुभव करते हैं । जब सकते हैं, तब उन्होंने उसे ( आत्मा को ) पूर्णतः जान लिया है (ऐसा कह सकते वेहैं ) ऐसा। अनुभव कर
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥8 ॥
जब मनुष्य उस परब्रह्म को कार्य- कारण सब कुछ के रूप में जान लेता है ( सर्वरूपों, ( )ही अनुभव करता है तब उसके हृदय की सभी वक्रताएँ सभी जटिलताएँ सरल में ब्रह्म काखुल जाती हैं, सभी शंकाएँ मिट जाती हैं और उसके सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं । हो जाती हैं, गाँठें
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तृतीयमुण्डकम् ] मुण्डकोपनिषत् ( 5 ) 63
हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् ।
तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥9 ॥
प्रकाशित और भव्य हृदयकक्ष में निर्मल और प्रकाशित ब्रह्म निवास करता है । वह, प्रकाश का भी प्रकाश है आत्मज्ञानी लोग ऐसे ही ब्रह्म का अनुभव करते हैं । ब्रह्म तो
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥10 ॥
ब्रह्म की उपस्थिति में सूर्य प्रकाशित नहीं होता (ब्रह्म ही प्रकाशित होता है ) । चन्द्र और तारे भी प्रकाशित नहीं होते । बिजली भी नहीं चमकती है, तो फिर अग्नि कैसे प्रकाशित हो सकता है? जब ब्रह्म प्रकाशित करता है, तभी सब प्रकाशित होता है, उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित होता है ।
ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण ।
अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥11 ॥
इति द्वितीयमुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥2 ॥
== यही आनन्दमय ब्रह्म तुम्हारे आगे है, पीछे है, वह दक्षिण में है, उत्तर में भी है, ऊपर भी है, नीचे भी फैला हुआ है । वह सर्वव्यापक है । यह सारा जगत् ब्रह्म ही है । इस प्रकार मुण्डकोपनिषद् के द्वितीय मुण्डक में द्वितीय खण्ड समाप्त हुआ । * तृतीयं मुण्डकम् प्रथमः खण्डः
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥1 ॥
एक ही वृक्ष पर दो पक्षी सदैव साथ में रहते हैं । दोनों सुन्दर पंखवाले और एक समान ही हैं । उनमें से एक (उस वृक्ष के ) मीठे फल खाता है, जबकि दूसरा बिना खाए केवल देखता ही रहता है ।
समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः ।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥2 ॥
व्यष्टिचैतन्य जीवात्मा समष्टिचैतन्य के साथ एक ही ( शरीररूपी ) वृक्ष पर (समान रूप से ) होने पर भी अपनी दिव्यता को जाने बिना अज्ञान से मोहित होकर दुःखी होता है । परन्तु वही जीवात्मा जब अपने इष्ट ( सही ) स्वरूप को पहचान लेता है, तब सभी दुःखों को पार कर लेता है और अपनी मूलगत महिमा को पहचान लेता है ।
यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।
तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥3 ॥
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64 उपनिषत्सञ्चयनम् जब आध्यात्मिक साधक अपने आत्मा को सही सर्जक के रूप से पहचान लेता है और हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) के भी जन्मदाता के रूप में उसे देख लेता है, उसे परमस्वामी समझता है, तब वह पुण्य- पाप दोनों को पार कर जाता है । वह विशुद्ध हो जाता है और उसके साथ ऐक्य का अनुभव करता है ।
प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन्विद्वान्भवते नातिवादी ।
आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥4 ॥
ईश्वर सभी प्राणियों में अभिव्यक्त हुआ है और सभी प्राणियों की वह जीवनी शक्ति है । मनुष्य को जब इस प्रकार का ज्ञान हो जाता है, तब वह ईश्वर के सिवा अन्य कोई भी बात कर ही नहीं सकता । वह अपने आत्मा के साथ ही रमण करता है । वह स्वयं ही अपने आनन्द का स्रोत है । ध्यानाध्ययनादि आध्यात्मिक कार्यों में वह सदैव रत रहता है । वह आत्मज्ञानियों में उत्तम माना जाता है ।
सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ।
अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥5 ॥
शरीर में कमलाकार हृदय में स्वयं प्रकाश और विशुद्ध आत्मा का सदैव अनुभव करते रहना चाहिए । ऐसा अनुभव करने का मार्ग मानसिक और शारीरिक तपश्चरण, आत्मसंयम, एकाग्रता, ध्यान द्वारा ईश्वर के सही स्वरूप का ज्ञान और ब्रह्मचर्यसेवन है । विशुद्ध चित्तवाले योगी ऐसे आत्मा का साक्षात्कार करते हैं ।
सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥6 ॥
सत्य ही विजय प्राप्त करता है, असत्य नहीं क्योंकि स्वर्ग की (देवों की) ओर जानेवाला चौड़ा मार्ग ( राजमार्ग ) सत्य से होकर ही जाता है । सब कामनाओं को लाँघकर ऋषि लोग सत्य द्वारा ही लक्ष्यसिद्धि प्राप्त करते हैं ।
बृहच्च तद्दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत्सूक्ष्मतरं विभाति ।
दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥7 ॥
ब्रह्म अनन्त है, इन्द्रियागम्य है, विचारातीत है, सूक्ष्मातिसूक्ष्म है, दूर से भी दूर परन्तु नजदीक से भी नजदीक है, हृदयकमल (हृदयगुहा ) में वह सुप्रतिष्ठित है ।
न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा ।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥8 ॥
आत्मा के निराकार होने से तुम उसे आँख से देख नहीं सकते । वाणी से अतीत होने से तुम उसका वर्णन नहीं कर सकते, इन्द्रियातीत होने से वह देखा नहीं जा सकता । तप से उसका नहीं होता, यज्ञादि कर्मों से वह पहचाना नहीं जा सकता । पर यदि तुम्हारा मन इन्द्रियजन्यसाक्षात्कार विमुख हो और तुम ब्रह्मध्यान करो, तब कहीं उस निराकार आत्मा का साक्षात्कार कर सकतेसुखोंहो । से
एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश ।
प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन्विशुद्धे विभवत्येष आत्मा॥१ ॥
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तृतीयमुण्डकम् ] मुण्डकोपनिषत् ( 5 ) 65 प्राण ( जीवनशक्ति) अपने पाँचों प्रकारों के साथ जिस शरीर में व्याप्त है, उसी शरीर में आत्मा भी अतिसूक्ष्म स्वरूप में व्याप्त है । वह आत्मा सूक्ष्म बुद्धि से जाना जा सकता है । सचमुच यह बुद्धि सभी प्राणियों के हृदय में व्याप्त होकर स्थित है । जब वह बुद्धि ( मन ) निर्मल ( पवित्र) हो जाती है, तब आत्मा स्वयं ही उसके आगे प्रकट हो जाता है ।
यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् ।
तं तं लोकं जयते तांश्च कामांस्तस्मादात्मनं ह्यर्चयेद्भूतिकामः ॥10 ॥
इति तृतीयमुण्डके प्रथमः खण्डः ॥1 ॥
विशुद्ध मनवाला मनुष्य अपनी इच्छानुसार किसी भी लोक को और चाही हुई किसी भी वस्तु को प्राप्त कर सकता है । अपना कल्याण चाहनेवाले किसी भी मनुष्य को ऐसे मनुष्य का आदर- सम्मान करना चाहिए | इस प्रकार मुण्डकोपनिषद् के तीसरे मुण्डक में प्रथम खण्ड समाप्त हुआ । द्वितीयः खण्डः
स वेदैतत्परमं ब्रह्म धाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् ।
उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥1 ॥
स्वात्मज्ञ पुरुष ब्रह्म को भी जान ही लेता है । वह ब्रह्म समस्त जगत् का आधार है । वह मनुष्य यह भी जानता है कि इस दृश्य जगत् का कारण भी तो वही है । वह ब्रह्म पर ही प्रतिष्ठित है । जो लोग ऐसे आत्मज्ञानी की उपासना करते हैं ( उनकी सेवा करते हैं ) और उनसे कोई कामना नहीं करते, वे निश्चित रूप से पुनर्जन्म को पार कर जाते हैं ।
कामान्यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र ।
पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्तु इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥2 ॥
भोगों को ही अच्छा माननेवाला पुरुष यदि ऐहिकामुष्मिक भोगों के लिए बेचैन होता है, तो वह मनुष्य कामनाओं से रगड़ खाता हुआ उस-उस जगह पर पैदा हुआ करता है (कि जहाँ ऐसे भोग मिल सकें ) । पर जिस मनुष्य को 'अपनी सारी कामनाएँ पूर्ण हो गई हैं ' ऐसी प्रतीति हो चुकी है, ऐसे आत्मज्ञानी पुरुष की तो सभी कामनाएँ यहीं शान्त हो गई होती हैं ।
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ॥3 ॥
यह आत्मा शास्त्रों के विवरण से प्राप्य नहीं है, बौद्धिक शक्ति से भी प्राप्य नहीं, गुरु से बार-बार श्रवण करने से भी वह नहीं मिलता । पर यह (साधक ) जिस ( आत्मा ) को निष्ठापूर्वक चाहता है उसी ( निष्ठा) से वह प्राप्त किया जा सकता है । यह आत्मा उसके आगे अपना स्वरूप उद्घाटित कर देता है । 5 उ०प्र०
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66 उपनिषत्सञ्चयनम् ( भक्तिमार्गी ऐसा अर्थ करते हैं — यह आत्मा जिस मनुष्य को पसन्द करता है अर्थात् जिसके ऊपर अनुग्रह करता है, उसके आगे अपना स्वरूप प्रकट कर देता है) ।
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् ।
एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥4 ॥
यह प्रस्तुत आत्मा निर्बल ( निष्ठाहीन ) के द्वारा नहीं पाया जा सकता । आत्मसाधना में प्रमाद करने से अथवा त्यागविहीन तपश्चर्या से ( या पाण्डित्य से ) भी मिलता नहीं है । पर जो विवेकशील पुरुष इन सभी उपायों से निष्ठापूर्वक और श्रमपूर्वक प्रयत्न करता है, तो यह आत्मा उसी का हो जाता है ( अर्थात् वह आत्मा को पा लेता है ) और वह ब्रह्मधाम में प्रवेश पाता है अर्थात् ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाता है ।
सम्प्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः ।
ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥5 ॥
आत्मज्ञ ऋषिलोग इस आत्मज्ञान से परितुष्ट हुए हैं । और वे इस इन्द्रियासक्ति से मुक्त हो गए हैं और शान्त हो गए है, क्योंकि वे धीर ( संतुलित) हुए हैं । सभी स्थानों में उस सर्वव्यापक आत्मा ( समष्टिचैतन्य) को प्राप्त करके उसके साथ वे मिल गए हैं । वे सभी जगह और सब कुछ होते हैं ।
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः ।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥6 ॥
वेदान्तशास्त्र के यथार्थ मर्म को सम्पूर्णतया पचानेवाले और संन्यास ( कर्मफलत्याग ) के द्वारा जो यति हुए हैं ( संयमी हुए हैं ), ऐसे शुद्ध मनवाले सभी लोग आत्मज्ञान से इसी जन्म में अमरत्व ( जीवन्मुक्ति ) पा लेते हैं और अन्तकाल में तो विदेहमुक्ति पा ही लेते हैं ।
गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु ।
कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥7 ॥
उसके बाद शरीर के पंद्रह विभाग फिर अपनी कारणावस्था में लौट जाते हैं । सभी इन्द्रियाँ भी अपने- अपने देवों की ओर लौट जाती हैं और आत्मा संचित कर्मों के साथ विशुद्ध अविनाशी ब्रह्म में मिलकर एकाकार हो जाता है ।
यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।
तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥8 ॥
जिस प्रकार दौड़ती हुई नदियाँ अपने नामों और आकारों को छोड़कर सागर में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार आत्मज्ञानी नाम और रूप ( आकार ) से मुक्त होकर, ऊँचे से भी ऊँचे ( हिरण्यगर्भ से भी ऊँचे ) स्वप्रकाशित ब्रह्म को प्राप्त करता है ।
स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति ।
तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥9 ॥
जो मनुष्य परमश्रेष्ठ ब्रह्म को जानता है वह ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म में ही रूपान्तरित हो ब्रह्मज्ञानी के वंश में कोई ब्रह्मज्ञान से रहित नहीं जन्मता । वह शोक (सांसारिक दुःख) कोजातापार करहै । लेताइस
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67तृतीयमुण्डकम्] मुण्डकोपनिषत् ( 5 ) है । पाप और पुण्य को भी लाँघ जाता है । आत्मा को अज्ञानजन्य बन्धनों से मुक्त कराकर अमर बन जाता है । तदेतदृचाऽभ्युक्तम्—
क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षिं श्रद्धयन्तः ।
तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद् यैस्तु चीर्णम् ॥10 ॥
तो यह सत्य वेदमंत्रों ने भी दर्शाया है– “शास्त्रोक्त साधनाएँ करनेवाले, शास्त्रज्ञ, सगुण ब्रह्म में निष्ठावाले जो मनुष्य ‘ एकर्षि' नाम के यज्ञ का स्वयं अनुष्ठान करते हैं और जिन्होंने शिर पर अग्नि लेकर अथर्ववेदनिर्दिष्ट विधि के अनुसार अनुष्ठान किया हो, उन्हीं मनुष्यों को यह ब्रह्मोपदेश कहना चाहिए ।
तदेतत्सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नैतदचीर्णव्रतोऽधीते ।
नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥11 ॥
इति तृतीयमुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥2 ॥
इति मुण्डकोपनिषत्समाप्ता ॥
ऋषि अंगिरा ने इस ब्रह्मज्ञान को पहले अपने शिष्य शौनक को दिया था । ' अचीर्ण' का व्रत नहीं करनेवाले लोग इसका अध्ययन नहीं करते । ज्ञानी परम ऋषियों को नमस्कार हो ( इस वाक्य का पुनरावर्तन ग्रन्थ- समाप्ति का सूचक है) । इस प्रकार मुण्डकोपनिषद् के तीसरे मुण्डक में दूसरा खण्ड समाप्त हुआ । इस प्रकार मुण्डकोपनिषत् समाप्त होती है । शान्तिपाठः ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवासस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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( 6 ) माण्डूक्योपनिषत् (उपनिषत्परिचय ) दस सुप्रसिद्ध उपनिषदों में यह सबसे छोटी उपनिषद् है । अथर्ववेद से सम्बद्ध इस उपनिषद् में केवल बारह मन्त्र हैं । इसमें सभी गद्यमन्त्र ( कण्डिकाएँ ) हैं फिर भी यह उपनिषद् अद्वैतवेदान्त के सिद्धान्तों की नींव मानी गई है । लीवात्मा की जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति- इन अवस्थाओं का पृथक्करण और उसके साथ ही प्रणव के 'अ', 'उ' और 'म' इन तीन वर्णों का सम्बन्ध तथा तुर्यावस्था की स्थापना और उसकी श्रेष्ठता का प्रतिपादन इस उपनिषद् की विशिष्टता है । इस उपनिषद् का 'माण्डूक्य' नाम शायद इसलिए पड़ा है कि इसके निर्माता उसी नाम के ऋषि थे । शंकाराचार्य के गुरु गोविन्दपाद के भी गुरु गौड़पाद ने इस उपनिषद् के ऊपर कारिकाएँ लिखी हैं ( ये कारिकाएँ श्लोकबद्ध सहायक ग्रन्थ जैसी हैं ) । ये कारिकाएँ संक्षेप में किन्तु पर्याप्त रूप से अद्वैत के पक्ष में स्पष्ट दलीलें हमारे सामने रखती हैं । कारिकाएँ कहती हैं कि आत्मा के सिवा कुछ है ही नहीं और वह आत्मा एक और समरस है । द्वैत का वे प्रबल खण्डन करती हैं । सृष्टि नाम की किसी चीज में और कार्य- कारणसम्बन्ध में इन कारिकाओं का विश्वास नहीं है । अतः संसार नाम का कोई अस्तित्व नहीं, हम जो देखते हैं वह मात्र भ्रम है । अपने इस मत के लिए ये कारिकाएँ शास्त्रों, तर्कों और अनुभव का प्रमाण देती हैं । ये कारिकाएँ बौद्धों के आत्मलक्षी आदर्शवाद के नजदीक आ जाती हैं । परन्तु यहाँ पर गौड़पाद चेतावनी देते हैं कि वे बौद्धमत को यहाँ प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं । वे अपने को एक दृढ़ अद्वैतवादी मानते हैं । विद्वानों के मत में यह ग्रन्थ गौड़पाद का लिखा हो, तो भी मूल उपनिषद् के साथ इसका कोई सम्बन्ध नहीं है, यह एक स्वतंत्र ग्रन्थ ही है । अन्य उपनिषदों की भाँति इस उपनिषद् के साथ किसी कथा का सम्बन्ध नहीं है, यहाँ सीधा उपदेश ही शुरू हो जाता है । 'ॐ ' के प्रतीक द्वारा ब्रह्मोपदेश यहाँ है किन्तु ब्रह्म का वर्णन नहीं है । प्रतीक में आरोपण है, आरोपित का वर्णन नहीं है । ॐ ब्रह्म का समुचित प्रतीक है, ॐ ब्रह्म की तरह सर्वव्यापक है, ॐ के उच्चारण में मुख के सभी भागों का स्पर्श होता है । इसीलिए ‘ॐ ' को शब्दब्रह्म कहा जाता है । हिन्दू-परम्परा का वह पवित्रतम वर्ण है । प्रतीकात्मक रूप से वह वेदतुल्य है । यहाँ पर उपनिषद् ब्रह्म और ॐ को एक मानती हैं । यह बात ठीक ढंग से उपनिषद् में समझाई गई है । हम यहाँ मूल उपनिषद् के बारह गद्यखण्डों के साथ गौड़पाद की कारिका का भी रूपान्तर दे रहे हैं । स्वतंत्र ग्रन्थ जैसी इस कारिका के चार प्रकरण गौड़पाद ने किए हिन्दी प्रथम प्रकरण का नाम ‘ आगमप्रकरण' है, और इस प्रकरण में 29 कारिकाएँ हैं, जिनमें ‘ ' 38प्रकरण का नाम वैतथ्यप्रकरण है और इस प्रकरण में कारिकाएँ हैं । द्वितीय ' ' 48नाम अद्वैतप्रकरण है और इस प्रकरण में कारिकाएँ हैं । तृतीय प्रकरण का‘ अलातशान्तिप्रकरण’ है, इस प्रकरण में 100 कारिकाएँ हैं । हैं और चौथे प्रकरण का नाम कारिकाएँ है । इन पर शंकराचार्य ने भाष्य भी लिखा है । इस प्रकार कुल मिलाकर 200