Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 91–100

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 91–100

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चतुर्थ: प्रश्न: ] प्रश्नोपनिषत् ( 4 ) 49 जब मन आत्मा के प्रकाश से अभिभूत हो जाता है तब, ( अर्थात् जब कामनाओं के प्रवेश के लिए मन का दरवाजा बन्द हो जाता है तब ) और जब तुम गाढ निद्रा की अवस्था में होते हो, तब मन किसी भी स्वप्न को नहीं देख सकता । तब तुम्हारे समग्र शरीर में और मन में बड़े ( विस्तृत ) सुख का भाव होता है । स यथा सोम्य वयांसि वासो वृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते । एवं ह वै तत्सर्वं पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥7 ॥

हे सौम्य! उदाहरणार्थ कह सकते हैं कि संध्या समय में जिस तरह पक्षी अपने घोंसले की ओर जाने का प्रयत्न करते हैं, उसी तरह इस जगत् के सभी पदार्थ आत्मा में वापिस लौटने का प्रयत्न करते हैं । अर्थात् वे आत्मचैतन्य में विलीन हो जाते हैं । पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक् च स्पर्शयितव्यं च वाक् च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं . चाहङ्कारश्चाहंकर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च ॥8 ॥

पृथ्वी और पृथ्वी की सूक्ष्म मात्रा, जल और जल की सूक्ष्म मात्रा, अग्नि और अग्नि की सूक्ष्म मात्रा, वायु और उसकी सूक्ष्म मात्रा, आकाश और उसकी घटक सूक्ष्म मात्रा, आँख और जो देखा जाता है, कान और जो सुना जाता है, नाक और जो सूँघा जाता है, जीभ और जिसका स्वाद लिया जाता है, त्वचा और जिसका स्पर्श किया जा सकता है, वाणी और जो बोला जाता है, दो हाथ और ग्रहण की जाने वाली वस्तु, जननेन्द्रिय और आनन्दक्रिया, गुदेन्द्रिय और मलत्याग की क्रिया, दो पैर और गन्तव्य स्थान, मन और विचार, बुद्धि और बुद्धिगम्य विषय, अहंकार और अहंकार के विषय, स्मृति और स्मृतियोग्य विषय, तेज (ज्ञान ) और ज्ञेय विषय, प्राण और प्राण के द्वारा जीवित पदार्थ ( —यह सब उस समय आत्मा में विलीन हो जाता है ) । एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः । स परेऽक्षर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥१ ॥

जो देखता है, स्पर्श करता है, सुनता है, सूँघता है, स्वाद लेता है, सोचता है, अनुभव करता है और कार्य करता है, जो इन्द्रियों को वश में रखता है और जो जीवात्मा ( व्यष्टि चैतन्य ) के रूप में पहचाना जाता है, वह वही है, यह जीवात्मा (व्यक्ति-चैतन्य ) जो है, वह उच्चतम अविनाशी आत्मा पर अधिष्ठित है । ( अपने स्वस्वरूप में जीवात्मा मिल जाता है अर्थात् उसका मोक्ष होता है ) । परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं

वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वो भवति । तदेष श्लोकः – ॥10 ॥

हे सौम्य, यह आत्मा निष्कलंक है, रूपरहित (निराकार) है, वर्णरहित है और अविनाशी है । जो मनुष्य इस आत्मा को जानता है, वह उसी की ( आत्मा की ही ) तरह का हो जाता है अर्थात् वह स्वयं उच्चतम ( परम) आत्मरूप और अविनाशी हो जाता है! ऐसा मनुष्य सर्वज्ञ एकहोता श्लोकहै । उसेहै—ऐसा अनुभव होता है कि वह मानो सबके साथ एकाकार हो गया है । इसके विषय में 4 उ ० प्र०.

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50 उपनिषत्सञ्चयनम्

विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र ।

तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥11 ॥

इति चतुर्थः प्रश्नः ॥4 ॥

हे सौम्य! गाढ निद्रा की ( सुषुप्ति की ) अवस्था में यह जीवात्मा इन्द्रियों के देवों के साथ, इन्द्रियों के साथ तथा अन्य तत्त्वों के साथ अविनाशी आत्मतत्त्व में विश्रान्ति लेता है । जब मनुष्य जाग्रत् अवस्था में भी ऐसा ( सुषुप्ति जैसा ही) अनुभव करे कि वह अविनाशी परमात्मा के साथ एकरूप ही है, तब वह सर्वरूप हो जाता है और सबमें वह प्रविष्ट हो जाता है । इस प्रकार प्रश्नोपनिषद् में चौथा प्रश्न यहाँ समाप्त हुआ । ** अथ पञ्चमः प्रश्नः अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ । स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत । कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति । तस्मै स होवाच ॥1 ॥

इसके बाद शिवि का पुत्र सत्यकाम ऋषि पिप्पलाद से पूछता है कि- "हे गुरो! यदि कोई मनुष्य जीवनपर्यन्त ओम्कार का ध्यान करता रहे, तो वह इस ध्यान के द्वारा किस विशिष्ट लोक को प्राप्त करता है? " तब पिप्पलाद ने कहा—

एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः ।

तस्माद्विद्वानेतेनैवाऽयतनेनैकतरमन्वेति ॥2 ॥

हे सत्यकाम! यह सुविख्यात 'ॐ ' दोनों प्रकार के ब्रह्म के लिए - सगुण ( अपर) ब्रह्म और निर्गुण ( पर ) ब्रह्म के लिए भी प्रतीक रूप में है । जो इसको जानता है, वह (ज्ञानी ) इस ‘ॐ ’ का ( अनिवार्य ) प्रतीक के रूप में उपयोग करता है और इसका ध्यान करता है और अन्त में उन दोनों के ब्रह्म में से एक को प्राप्त होता है । प्रकार स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभि- सम्पद्यते । तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते । स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति ॥3 ॥

जो कोई मनुष्य ॐ के तीन अक्षरों में से ' अ' जैसे किसी,तो वहकरेगा । उसे‘ॐ ज्ञानी’ का बनाने‘ अ’ अक्षरके लिएऋग्वेदपर्याप्तका प्रतिनिधित्वहै । ऐसा ज्ञानीकरताफिर से तुरन्तभी एकही अक्षरइस जगत्का ध्यानमें जन्मकरताधारणहै लेने के लिए ले जाता है । इस प्रकार मनुष्य योनि में जन्मा हुआहै । वह उसे फिर से मनुष्ययोनि में जन्म करता है तथा ईश्वर और शास्त्रों में निष्ठा रखता है । ऐसे सद्गुणोंवह मनुष्य तप और ब्रह्मचर्य का सेवन' ' विशिष्ट होता है । की वजह से वह अन्य लोगों से अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं सोमलोकम् । स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते यजुर्भिरुन्नीयते ॥4 ॥

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पञ्चमः प्रश्न: ] प्रश्नोपनिषत् ( 4 ) 51 यदि कोई साधक ‘ ॐ ’ के द्वितीय अक्षर ' उ' पर ध्यान धरता है, तो वह स्वयं समृद्ध होता है, अर्थात् अक्षर के साथ तादात्म्य की भावना से भर जाता है और उसके मृत्यु -समय में वह अक्षर (' उ' ) उसे अन्तरिक्ष में ( स्वर्ग और पृथ्वी के बीच के अवकाश में ) ले जाकर चन्द्रलोक की ओर ले जाता है । यह द्वितीय अक्षर यजुर्वेद का प्रतिनिधित्व करता है । वह साधक वहाँ चन्द्रलोक में प्राप्य कई अद्भुत भोग भोगता है । बाद में फिर से पृथ्वी पर मानव प्राणी के रूप में वापस लौटता है । यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः । यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं

पुरियं पुरुषमीक्षते । तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥5 ॥

जो साधक तीन अक्षरवाले 'ॐ' के ध्यान द्वारा समष्टि चैतन्य की उपासना करता है, वह प्रकाशित सूर्य में लीन हो जाता है । जिस प्रकार साँप अपनी पुरानी केचुल को उतारकर मुक्त हो जाता है, उसी तरह यह साधक भी अपने सभी पापों से मुक्त होने में समर्थ हो जाता है । तब साम के मन्त्र उसे ब्रह्मलोक की ओर ले जाते हैं । वहाँ उसे ऐसी अनुभूति होती है कि वह ब्रह्म के साथ एकरूप हो गया है । वह हिरण्यगर्भ से भी उच्चतर है । उसे लगता है कि वह सर्वत्र और सभी प्राणियों में है । इस विषय में यहाँ दो श्लोक हैं-

तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनुविप्रयुक्ताः ।

क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥6 ॥

जो साधक ‘ॐ ’ की तीनों मात्राओं का अलग- अलग ध्यान करता है, वह अन्त में मृत्यु के अधीन होकर ही रहता है । परन्तु यदि तीनों मात्राओं को एक साथ ही लिया जाए, तो उसका वही ध्यान सही रूप में होता है | जाग्रत् अवस्था, गाढ सुषुप्ति की अवस्था और उन दोनों के बीच की अवस्था (अर्थात् स्वप्नावस्था ) का प्रतिनिधि ( अध्यक्ष ) देव तो एक ही है । यदि तुम इस देव का ठीक तरह से ध्यान करने में समर्थ हो, तब तो तुम 'ॐ' का सही अर्थ जान सकोगे और जब एक बार तुमने वह अर्थ जान लिया, तब तुम भय का अतिक्रमण कर जाओगे । ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत् तत्कवयो वेदयन्ते । तमोङ्कारेणै- वाऽऽयतनेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥7 ॥

इति पञ्चमः प्रश्नः ॥5 ॥

यदि तुम ‘ॐ ’ का ब्रह्मस्वरूप में (ब्रह्म के प्रतीक रूप में ) ध्यान करो, तो ऋग्वेद के मंत्र तुम्हें मानवीय लोक ( स्त्री और पुरुष के लोक ) की प्राप्ति कराने में सहायक होंगे । यजुर्वेद के मंत्र चन्द्रलोक की प्राप्ति करवाने में तुम्हारी सहायता करेंगे । सामवेद के मन्त्र ब्रह्मलोक की प्राप्ति में तुम्हारे सहायक होंगे । उस ब्रह्मलोक को तो केवल ज्ञानी मनुष्य ही प्राप्त कर सकते हैं । और भी — इस ‘ॐ ’ के द्वारा ही तुम शान्ति और निर्भयता प्राप्त कर सकते हो और उसी से तुम अपनीस्थापितजीर्णता करको सकतेदूर करहोसकते। हो । अमरता प्राप्त कर सकते हो, विश्वचैतन्य ( परमात्मा ) के साथ ऐक्य इस प्रकार प्रश्नोपनिषद् में पाँचवाँ प्रश्न यहाँ समाप्त हुआ ।

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52 उपनिषत्सञ्चयनम् 52 अथ षष्ठः प्रश्नः अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ । भगवन्हिरण्यनाभः कौसल्यो राज- पुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत् । षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ । तमहं कुमारमब्रवं नाहमिमं वेद । यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति ।

समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्नार्हाम्यनृतं वक्तुम् ।

स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज । तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति ॥1 ॥

अब भरद्वाज के पुत्र सुकेशा ने पिप्पलाद से पूछा कि– “हे भगवन्! कोसल के राजपुत्र हिरण्यनाभ ने एक बार मेरे पास आकर मुझसे पूछा था कि 'हे भरद्वाजपुत्र! क्या तुम सोलह कला ( अवयव) वाले उस पुरुष को जानते हो? ' तब मैंने राजपुत्र से कहा था कि ' उसके विषय में मैं तो कुछ नहीं जानता । यदि जानता होता तो तुमसे भला क्यों नहीं कहता? और मैं यदि कुछ झूठा- सा बोल भी दूँ, तब तो मेरा मूलसहित नाश ही हो जाएगा! इसलिए मैं झूठ तो बोल नहीं सकता । ' (यह सुनकर) राजपुत्र तो शान्ति से अपने रथ पर चढ़ कर चला गया । तो अब मैं आपसे पूछता हूँ कि वह पुरुष है कहाँ? ” तस्मै स होवाच । इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडश- कलाः प्रभवन्तीति ॥2 ॥

पिप्पलाद ने उससे कहा कि –हे सौम्य, वह सोलह कला वाला पुरुष ( आत्मा) यहीं शरीर में हृदयकमल के बीच के अवकाश में अवस्थित है और (प्राण आदि) सोलह कलाएँ ( अंश) इस आत्मा में से फूट निकलती हैं । स ईक्षांचक्रे । यस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥3 ॥

उस पुरुष ने ( अन्तःस्थ आत्मा ने सोचा कि इस शरीर में से कौन- सा ऐसा कुछ ( तत्त्व ) ( )जाताइसी तरहहै किसेजिससेशरीर मुझेमें ऐसाऐसाकौनलग हैरहा, जिससेहै कि मुझेमानोलगतामैं ही हैशरीरकि मेंमानोसे चलामैं ही छोड़ेशरीर जामें हूँरहा? हूँ? चलाऔर स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं ॥ अन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु नाम च ॥4 मनः । उस पुरुष ने ( सर्वसद्गुणसम्पन्न सगुण ब्रह्म ने ) प्राणात्मारूप बाद उस हिरण्यगर्भ से श्रद्धा उत्पन्न हुई और उस श्रद्धा में से अवकाशहिरण्यगर्भ का सर्जन किया । इसके,,,उसनेवायु (वायुसगुणसे ब्रह्मअग्निने ) अग्निमन औरसे जलबाद मेंजलअन्नसे कोपृथ्वीउत्पन्नऔरकियापृथ्वी से इन्द्रियावयवप्रकट हुआउत्पन्न। उसहुए ।अवकाशइसके बादसे यज्ञ, स्वर्गादि लोक और उन लोकों की अलग- अलग कक्षाएँ और बाद में अन्न में से वीर्य, तप, वेद, और उनके नाम —ये सब प्रकट किए । स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यतेसमुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतोगच्छन्तिभवति भिद्येते तासां नामरूपे । तदेष श्लोकः ॥5 ॥

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षष्ठ: प्रश्न: ] प्रश्नोपनिषत् ( 4 ) 13353 इसका एक उदाहरण यह है कि नदियाँ जब तक सागर से नहीं मिलती हैं, तब तक तो अपना प्रवाह चालू ही रखती हैं, पर ज्यों ही सागर से मिलती हैं कि तुरन्त उनका प्रवाह अस्त हो जाता और उनके नाम और रूप नष्ट हो जाते हैं । बाद में तो वे सागर के ही नाम से पहचानी जाती हैं । ठीकहै इसी तरह अपने सही स्वरूप को जाननेवाला ज्ञानी उस पुरुष की ( सगुण ब्रह्म की ) ओर गति करता हुआ जब उससे मिल जाता है, तब उसकी ये प्राण आदि सोलहों कलाएँ अस्त हो जाती हैं और वह स्वयं ' पुरुष' ( सगुण ब्रह्म ) ही हो जाता है । वह प्राणादि कलाओं से रहित हो जाता है । यहाँ एक श्लोक है—

अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन्प्रतिष्ठिताः ।

तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥6 ॥

जैसे रथ के पहियों की धुरी पर उसके आरे आश्रित होते हैं, उसी प्रकार उस पुरुष ( जीवचैतन्य ) में गुण आधारित रहते हैं | बाहर और भीतर (दोनों स्थलों में ) वे गुण उसी पर आधारित हैं । इस पुरुष के सच्चे स्वरूप को जानने का प्रयत्न करो । यदि तुम उसे जान लोगे तो मृत्यु तुम्हारा स्पर्श करने में

समर्थ नहीं होगी ।

तान्होवाचैतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद नातः परमस्तीति ॥7 ॥

पिप्पलाद ने अपने उन शिष्यों से कहा कि– “परब्रह्म के सम्बन्ध में इतना ही जानता हूँ | इसके सम्बन्ध में और अधिक जानना कुछ बाकी नहीं रहता ” ।

ते तमर्चयन्तस्त्वं हिनः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति ।

नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥8 ॥

इति षष्ठः प्रश्नः ॥6 ॥

इति प्रश्नोपनिषत् समाप्ता ॥

=== इसके बाद उन शिष्यों ने उन पिप्पलाद ऋषि की पूजा करते हुए कहा कि– “आप तो हमारे पिता हैं, जिन्होंने अविद्या के उस पार तक पहुँचा दिया है । परमर्षि ऐसे आपको हमारा नमस्कार हो, नमस्कार हो । ” इस प्रकार प्रश्नोपनिषद् में छठा प्रश्न यहाँ समाप्त होता है । इस प्रकार प्रश्नोपनिषत् समाप्त होती है । शान्तिपाठः ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

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(5) मुण्डकोपनिषत् (उपनिषत्परिचय ) यह मुण्डकोपनिषद् अथर्ववेदान्तर्गत होने से ' आथर्वणोपनिषद्' के नाम से भी पहचानी जाती है । आकर्षक कवित्व, रोचक और स्पष्ट अभिव्यक्ति तथा उच्चतम विचारों के कारण यह बहुत लोकप्रिय है । इस उपनिषद् के प्रकरणों का नाम 'मुण्डक ' रखा गया है । उपनिषद् में ऐसे तीन मुण्डक हैं । प्रत्येक मुण्डक के दो- दो उपविभाग हैं, उन उपविभागों को 'खण्ड ' नाम दिया गया है । इस उपनिषद् में मन्त्रों की कुल संख्या 65 है । यह मुण्डकोपनिषद् भी अन्यान्य उपनिषदों की ही तरह केवल पारमार्थिक अर्थात् उच्चतम ज्ञान की ही चर्चा- विचारणा करती है । कौन - सा है यह ज्ञान, कौन- सा है यह सत्य शंकर तो कहते हैं वह सत्य केवल एक ब्रह्म ही है, शेष सारा जगत् तो मिथ्या ही है । यह सत्य पारमार्थिक- उच्चतम-त्रिकालाबाधित सत्य है । यह कोई सापेक्ष सत्य ( नियतकालिक सत्य ) नहीं है । परिवर्तनशील और नियतकालिक को 'मिथ्या ' कहते हैं । जैसे समय की सापेक्षता है, वैसी ही देश (स्थल ) की भी सापेक्षता है । एक स्थल में दिखाई देने वाली सत्य वस्तु अन्य स्थल में सत्य नहीं भी हो सकती । जैसे काल- सापेक्ष वस्तु मिथ्या है, वैसे देश-सापेक्ष वस्तु भी तो मिथ्या ही है । यह जगत् काल- सापेक्ष और देश- सापेक्ष दोनों है, इसलिए ‘मिथ्या' है । वह भावात्मक होने पर भी मिथ्या है— यह वैचित्र्य है । उपनिषद् ग्रन्थ अन्य एक बात का भी विचार करते हैं । वह यह कि तुममें, मुझमें और हम सब में जो व्यक्तिगत चैतन्य है, वह अलग- अलग दिखाई देता है, परन्तु वास्तव में चैतन्य सर्वव्यापी ब्रह्मरूप ही है; दिखाई देना तो मिथ्या है । वास्तव में हम सब दिव्य वहहैं, परन्तु हमें अपना सही स्वरूप मालूम नहीं है । इसीलिए तो हम दुःखी हुआ करते हैं । उपनिषदें हमारे इस अज्ञान को दूर करने का प्रयत्न करती हैं । वे हमें कहती हैं—' तत्त्वमसि' - वह तू ही है । तुम्हीं वह सत्- तत्त्व हो । तुम दिव्य हो, तुम यह शरीर नहीं हो, तुम मन भी नहीं हो । तुम्हारे अस्तित्व का सत्त्व पारमार्थिक सत्ता ही है । तुम कभी भी मरते नहीं हो । आत्मा कभी नहीं मरता । वह कभी जन्मा भी नहीं है । तुम कभी परिवर्तन प्राप्त नहीं करते हो । तुम्हें कभी दुःख नहीं होता । तुम सदा के लिए एकसमान, विशुद्ध, आनन्दमय उपनिषदों का सन्देश है । सभी उपनिषदें और मुख्य रूप से यह ‘ मुण्डकोपनिषद्आत्मा ही हो । यह | 'कराती है यह बोध ‘ मुण्डक' शब्द का वाच्यार्थ तो 'मुण्डन करने वाला' अर्थात्करनेदिया होवाला, ऐसेहोतालोगोंहै । काइसकायह भावार्थज्ञान है तो। अर्थात्यह निकलताजिन लोगोंहै किने जिन लोगोंमस्तकने अपनाको सिरकेशविहीनमुंडवा,,होपरन्तुमस्तक, सन्दर्भमुँडवादेखनेदिएमें ‘होंमुण्डकसंन्यासी' शब्द होका गएएकहों, उन्हीं के संसारलिए केयहसर्वस्वउपनिषद्का उपादेयत्याग कियाहै | का दूसरा अर्थ है —‘ दूर करने वाला' । इस प्रकारदूसरा अर्थ भी प्राप्त होता है । 'मुण्डक' शब्द अज्ञान को दूर करती है । किसका है यह अज्ञान का? यहअर्थ लें तो यह ‘ मुण्डकोपनिषद्' हमारे अज्ञान जगत् के सही स्वरूप का

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प्रथममुण्डकम् ] मुण्डकोपनिषत् ( 5 ) 55 अज्ञान है और साथ - ही- साथ अपने सच्चे स्वरूप का अज्ञान है । कुछ भी हो, पर हम वास्तविक रूप में ब्रह्म ही हैं । दु:खद यह है कि यह हम जानते नहीं । हम दिव्य हैं — यह हमें मालूम नहीं । इसका हमें पूर्ण अज्ञान है । इस मुण्डकोपनिषद् से हमें अपना वह अज्ञान दूर करना है । COD शान्तिपाठः

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

ॐ हे देवो! हम अपने कानों से अच्छी बातें ही सुना करें । जिन्हें हम पूजते हैं ऐसे हे देवो! हम अपनी आँखों से सदैव शुभ दृश्यों को ही देखा करें । हम अपने सुदृढ़ अंगों से युक्त शरीर के द्वारा आपकी स्तुति करते रहें । हम देवों का दिया हुआ जितना आयुष्य है, उसे भोगते रहें । व्यक्तियों के लिए शान्ति हो, पर्यावरणीय शान्ति हो, प्राणी जगत् के लिए शान्ति हो ( अर्थात् सबके लिए शान्ति हो) । प्रथमं मुण्डकम् प्रथमः खण्डः

ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता ।

स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥1 ॥

देवों में सबसे पहले ब्रह्मा प्रकट हुए । वे विश्व के सर्जक थे और विश्व के आधार भी थे । ब्रह्मा ने अपने सबसे बड़े पुत्र अथर्वा को सर्वज्ञानों में श्रेष्ठ ऐसी ब्रह्मविद्या दी ।

अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माऽथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् ।

स भारद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥2 ॥

जो ब्रह्मज्ञान ब्रह्मा ने अथर्वा को दिया था, बाद में अथर्वा ने वह ज्ञान अंगिरा को दिया । इसके बाद अङ्गिरा ने वही ज्ञान भारद्वाजकुल में उत्पन्न हुए सत्यवाह नाम के ऋषि को दिया था । इसी ज्ञान को बाद में सत्यवाह ने गुरु- शिष्य परम्परा के अनुसार अङ्गिरस को दिया ।

शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ ।

कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥3 ॥

उन अंगिरस के पास (एक दिन) विशाल घर वाला ( विशिष्ट धनिक गृहस्थ ) (शौनकअंगिरसविधिपूर्वकसे ) पूछा अर्थात् शास्त्रविहित नियमानुसार जिज्ञासु के रूप में आ पहुँचा । आकरयहवहसबउनसेजाना जा सकता है? '! -कि— हे भगवन्तस्मै सऐसाहोवाचकौन सा। द्वेएकविद्येतत्त्ववेदितव्येहै कि जिसकेइति ह जाननेस्म यद्ब्रह्मविदोसे वदन्ति परा चैवापरा च ॥4 ॥

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56 उपनिषत्सञ्चयनम् अंगिरस ने शौनक से कहा- “जिन्होंने ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त किया है, वे कहते हैं कि विद्याएँ (ज्ञान ) दो प्रकार की हैं । एक प्रकार ब्रह्मज्ञान-परकं है, और दूसरा प्रकार भौतिकज्ञान-परक है । ( परा= उच्चतम ब्रह्मविषयक और अपरा = भौतिक ज्ञानविषयक है । ) तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं

निरुक्त छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥5 ॥

‘ अपरा' ( भौतिक ) और 'परा' ( आध्यात्मिक)– इन दो विद्याओं में से जो 'अपरा' है उसमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा (स्वरशास्त्र ), कल्प ( यज्ञीय विधि -विधान ), व्याकरण, निरुक्त ( व्युत्पत्तिशास्त्र ), छन्द और ज्योतिष (खगोलशास्त्र) का समावेश होता है । जबकि जो परा विद्या है, वह ऐसी है कि जिससे मनुष्य ब्रह्म को जान सकता है, जो ब्रह्म ' अक्षर' ( अविनाशी ) है ।

यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुः श्रोत्रं तदपाणिपादम् ।

नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं तद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥6 ॥

वह अदृश्य तत्त्व है ( अवाङ्मनसगोचर है ), उसे कर्मेन्द्रियाँ कभी पकड़ नहीं पातीं । उसका कोई मूल कारण नहीं होता । वह नीरूप अर्थात् निर्गुण है । उसकी चक्षुः श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ और हाथ - पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ भी नहीं होतीं । वह अविनाशी है और आकाश की तरह सबको आच्छादित कर स्थित है । वह बहुत ही सूक्ष्म है । सभी प्राणियों का वह उपादान कारण ( मूलस्रोत ) है । ऐसे ब्रह्म विवेकशील पुरुष सभी स्थानों और सभी प्राणियों में देखते हैं । को

यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति ।

यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम् ॥7 ॥

जिस प्रकार मकड़ी अपने शरीर में से ही जाल बाहर निकालती है और फिर उसको; ( में ही वापस खींच लेती है पृथ्वी में भी जिस तरह वनस्पतियाँ तरह पुरुष के केश आदि भी उसके शरीर के भीतर से ही उग निकलते वृक्ष ) आदि उत्पन्न होती हैंअपनेऔर शरीरजिस ( ), में से ब्रह्म में से फूट निकलता है । हैं ठीक उसी तरह जगत् अक्षर

तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते ।

अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम्॥8 ॥

ब्रह्म स्वयं अपने चिन्तन से आप ही अभिव्यक्त होता होता है ) । उस बीज में से ( अन्न में से = सक्रिय मायाशक्तिरूपहै । (प्रथम वह सर्जनबीज के रूप में प्रकट ) ) ( =का प्रथम व्यक्तिरूप उत्पन्न होता है । उस प्राण सर्जनबीज में से प्राण हिरण्यगर्भ ब्रह्मऔर चौदह लोक आविष्कृत होते हैं और उनमें फलमें से वैश्विक मन आता है । उसके बाद पाँच महाभूत तक चलती रहती है । से सदैव जुड़े हुए कर्मों की प्रक्रिया अनन्तकाल यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः

तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥१॥

इति प्रथममुण्डके प्रथमः खण्डः ॥1 ॥

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प्रथममुण्डकम् ] मुण्डकोपनिषत् ( 5 ) 57 वह ब्रह्म सामान्यत: सब जानता तप है । उस परब्रह्म में से यह अपरब्रह्म है (औरहिरण्यगर्भविशेषरूप) आतासे भी सब कुछ जानता है । ज्ञानरूप उसका तथा नाम, रूप और अन्न जैसी कुछ कक्षाएँ भी आती हैं | इस प्रकार मुण्डकोपनिषद् के प्रथम मुण्डक में प्रथम खण्ड समाप्त हुआ । * द्वितीयः खण्डः तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा सन्ततानि । तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥1 ॥

यहाँ सच बात तो यह है कि वेदमन्त्रों में विद्वानों ने बहुत- से अनुष्ठान कर्म ( अश्वमेधादि यज्ञकर्म) देखे हैं । इतना ही नहीं, उन तीनों वेदों के मन्त्रों को उन्होंने भाँति - भाँति प्रकार से समझाया भी है । अगर तुम अपनी मनचाही वस्तु प्राप्त करना चाहते हो, तो सदैव उन यज्ञकर्मों का आचरण करते रहो । सत्कार्य करनेवालों के लिए इष्टप्राप्ति का यह मार्ग है ।

यदा लेलायते ह्यर्चिः समिद्धे हव्यवाहने ।

तदाज्यभागावन्तरेणाहुतीः प्रतिपादयेत् ॥2 ॥

जब अग्नि प्रज्वलित होकर उसकी ज्वालाएँ धधक उठें, तब उस अग्नि की दोनों ओर की करवटों के बीच के भाग में घी की आहुतियाँ प्रदान करें ।

यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमासमचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च ।

अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुतमासप्तमांस्तस्य लोकान्हिनस्ति ॥3 ॥

जिस मनुष्य का अग्निहोत्रानुष्ठान दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रयण आदि आनुषंगिक यज्ञों से रहित हो और जहाँ अतिथि सत्कार न होता हो, होम न किया जाता हो, वैश्वदेव न किया जाता हो, अनुष्ठानों में शास्त्रीय विधि में क्षतियाँ होती हों तो वहाँ ऐसे लोगों के सातों लोक नष्ट हो जाते हैं |

काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा ।

स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥4 ॥

इस यज्ञाग्नि की सात जिह्वाएँ — काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी और विश्वरुची देवी नाम की हैं । ऐसे नामों वाली ये जिह्वाएँ विशिष्ट आहुतियों के लिए हैं ।

एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याददायन् ।

तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥5 ॥

चारों ओर घूमती हुई इन तेजस्वी अग्निज्वालाओं में शास्त्रविहित समय पर जो मनुष्य अग्निहोत्र का अनुष्ठान करता है, उस मनुष्य के लिए ये आहुतियाँ सूर्यकिरणों में रूपान्तरित हो जाती हैं और उसे ऊपर उठाकर देवों के एकमात्र अध्यक्ष ( इन्द्र) के उच्चतम लोक में ले जाती हैं ।

एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति ।

प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥6 ॥

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58 उपनिषत्सञ्चयनम् वे तेजोमय आहुतियाँ उसको “ आओ आओ, अपने कर्मों के परिणामरूप यह स्वर्गलोक तुमने प्राप्त किया है ” –ऐसे अच्छे- अच्छे शब्दों से उसका अभिनन्दन करती हुई, उसके प्रति बहुत आदरभाव प्रकट करती हुई सूर्यकिरणों में रूपान्तरित हो जाती हैं और उस यज्ञकर्ता को स्वर्ग में ले जाती हैं 1

प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोत्तमवरं येषु कर्म ।

एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति ॥7 ॥

अठारह ऋत्विज् के समूह ( यज्ञ में यजमान, यजमान- पत्नी और अन्य सोलह यज्ञसहायक ) द्वारा किए जाने वाले यज्ञरूपी तरापे तो दुर्बल हैं । ये निर्दिष्ट यज्ञ तो निम्नकोटि के कर्म ही हैं । मूढ लोग (इन निम्नकोटि के कर्मों को ) श्रेयस्कर अर्थात् कल्याणकारी मानकर उनकी प्रशंसा करते हैं, वे बार-बार वृद्धावस्था और मृत्यु के दुःख भोगते हैं ।

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।

जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥8 ॥

ऐसे कुछ लोग हैं, जो अज्ञान में ही डूबे हुए हैं, फिर भी वे मूर्ख लोग अपने आपको धीर, विवेकी और पण्डित ( सर्वज्ञ) मानते हैं । ऐसे लोग एक दूषण में से दूसरे दूषण में जाया करते हैं और अंधे आदमी के द्वारा प्रेरित अन्धों की तरह चारों ओर भटका करते हैं ।

अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः ।

यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात्तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥१ ॥

कई प्रकार के अज्ञान में डूबे हुए ये लोग बच्चों की तरह मूर्ख होते हुए भी, “हम तो धन्य- धन्य हो गए हैं ” – ऐसा ( झूठा) गर्व करते हैं । पर वास्तव में तो ऐसे लोग आसक्ति से ही काम करनेवाले हैं और आत्मज्ञान के सही मार्ग को जानते ही नहीं । इसलिए उनके किए हुए कर्मों के फल भोगने के बाद दुःखी हो जाते हैं और स्वर्गनिवास के अधिकार को गँवा देते हैं ।

इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।

नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥10 ॥

कुछ अत्यन्त मूर्ख लोग यज्ञानुष्ठानादि इष्टकर्मों और गृह- उद्यान निर्माणादि लोकहित के कार्यों ( आपूर्त ) को ही सबसे श्रेष्ठ समझते हैं, पर उन्हें यह पता नहीं है कि इससे भी अधिक उत्तम काम है | ठीक है, अपने सत्कर्मों से वे कुछ समय स्वर्गसुख भोग तो लेते हैं, पर वहाँ नियत समय पूरा करके इस मनुष्यलोक में मनुष्ययोनि में अथवा तो उससे भी निम्न पशु आदि की योनियों में वापिस लौट आते हैं ।

तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्षचर्यां चरन्तः ।

सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥1 1 ॥

जो लोग शान्त और विद्वान् हैं, भिक्षा माँगकर जीनेवाले हैं, वन में ( रहकर) तपश्चर्या, होकरजीवनलक्ष्यउत्तरायणकी उपासनाके मार्ग मेंकरनेवाले, जहाँ वहहैं शाश्वतवे लोगऔरविशुद्धअविनाशीचित्तवालेपुराणपुरुषहो जाते(हिरण्यगर्भहैं । वे सूर्य के दरवाजेऔर चरमसे ),जाते हैं । रहता है वहाँ परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥12 ॥