Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 111–120

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 111–120

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आगमप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 69 शान्तिपाठः ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवासस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ हे देवो! हम अपने कानों से केवल कल्याणकारी बातें ही सुना करें । जिन्हें हम पूजते हैं, ऐसे! अपने सुदृढ़ अंगों युक्त हे देवो हम अपनी आँखों से केवल शुभ दृश्यों को ही देखा करें । हम से शरीर के द्वारा आपकी स्तुति करते रहें । हम देवों का दिया हुआ जितना आयुष्य है, उसे भोगते रहें । वैयक्तिक शान्ति हो, पर्यावरणीय शान्ति हो, प्राणीजगत् की शान्ति हो । आगमप्रकरणम् (उपनिषद्) ओमित्येतदक्षरमिद सर्वं तस्योपव्याख्यानभूतं भवद्भविष्यदिति सर्व- मोङ्कार एव । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥1 ॥

‘' ओम्'– यह आत्मलक्षी शब्द है, इसका यह आख्यान है । वही यह सब कुछ है । ( कार्य-कारण रूप सारा जगत् वही है । ज्यादा स्पष्ट कहें तो— ) वह भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल

भी है । इतना ही नहीं, जो कुछ भी त्रिकालातीत है, वह ‘ ओम्कार' ही है ।

सर्वश्र्ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥2 ॥

यह सारा घटनामय भौतिक विश्व ब्रह्म ही है । यह व्यष्टिगत आत्मा भी तो ब्रह्म ही है । इस व्यष्टि-चैतन्य की चार अवस्थाएँ देखने में आती हैं । जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥ 3 ॥

जब तुम जागते होते हो, तब बाह्य विश्व में तुम्हारी समानता होती है । तब तुम अपनी इन्द्रियों से स्थूल पदार्थ भोगते रहते हो । तब तुम अपने सात अंगों और प्रत्यक्षीकरण के उन्नीस द्वारों का उपयोग करते हो । तब तुम्हारा अपना स्थूल शरीर होता है । यह वैश्वानर आत्मा का प्रथम अंश है । ( सात अंग — मस्तक, दो आँखें, नाक, मूत्रपिण्ड और दो पैर । और उन्नीस द्वार - पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण और मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार कुल मिलाकर उन्नीस द्वार । ) स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः ॥ 4 ॥

जब तुम स्वप्न में होते हो तब तुम्हारी सारी क्रियाएँ केवल मानसिक ही होती हैं । तुम्हारी जाग्रत् अवस्था की तरह इस अवस्था में भी वे सात अवयव और उन्नीस द्वार तो रहते ही हैं, परन्तु इस अवस्था के तुम्हारे अनुभव तो मानसिक स्तर पर ही होते हैं । यह मानसिक अनुभव ब्रह्म का दूसरा अंश है । यह अंश स्वप्नावस्था है । इस समय तुम्हारा आत्मा अन्तःकरण में रहता है एवं अकेला ही होता है । इसे ‘ वैश्वानर ' कहा गया है । यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् ।

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70 उपनिषत्सञ्चयनम् सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥5 ॥

जब तुम गाढ़ निद्रा में होते हो तब तुम्हारे मन में कोई इच्छा नहीं रहती । कोई स्वप्न भी नहीं होता । इसको ' सुषुप्ति अवस्था' कहते हैं । तब तुम केवल ' अद्वैत' को ही देखते हो । चैतन्यघन के सिवा तब कुछ नहीं होता । तब तुम केवल आनन्दमय और आनन्द भोगने वाले ही होते हो । मानो तब तुम चैतन्य की ओर अग्रसर गए हो । यह ब्रह्म का तृतीय अंश है । इसको 'प्राज्ञ' कहा जाता है I एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥6 ॥

यह प्राज्ञ सबका ईश्वर है, वह सब कुछ जानता है, वह अंतर्यामी है, वह सभी पर शासन करनेवाला है । सभी पदार्थ उसी में से उत्पन्न होते हैं एवं उसी में लीन होते हैं । वह सबका कारण (मूल) है । गौडपाद- कारिका अत्रैतस्मिन्यथोक्तेऽर्थ एताः कारिकाः— अब ऊपर कही गई बात पर यहाँ प्रसंगोचित ये कारिकाएँ स्पष्टता के लिए दी जा रही हैं—

बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्त:प्रज्ञस्तु तैजसः ।

घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः ॥1 ॥

जाग्रत् अवस्था में बाहर की दुनिया का हमें जब भान होता है, तब हम 'विश्व' कहलाते हैं (यह हमारी प्रथम अवस्था है ) । जब हम स्वप्न में होते हैं, तब हमें भीतर ( मन) की ही भान होता है, तब हम ‘ तैजस ’ कहलाते हैं ( यह हमारी दूसरी अवस्था है ) । उसी तरह जब हमें भान तो कोई भीतर- बाहर का विषय नहीं होता और हम केवल गाढ सभानता वाले ही होते हैंहोता, है पर हमारा हीकहलातेहोता हैंहै (। यहभलेहमारीही वहतीसरीतीनअवस्थाअलग- हैअलग) । परस्वरूपोंइन तीनों( अवस्थाओंअवस्थाओं) मेंमें दिखाईविभु (व्यापकदेता हो) आत्मातब। हमतो'प्राज्ञएक'

दक्षिणाक्षिमुखे विश्वो मनस्यन्तस्तु तैजसः ।

आकाशे च हृदि प्राज्ञस्त्रिधा देहे व्यवस्थितः ॥2 ॥

वस्तुओंजाग्रत्को ग्रहणअवस्थाकरतामें जबहै । जबवह 'आत्मातैजस्' 'संज्ञकविश्व' संज्ञकहोता हैहोता, तबहै,स्वप्नावस्थातब वह अपनी दाहिनी आँख से स्थूल करता है और जब ‘ प्राज्ञ ' संज्ञावाला होता है, तब उसका भान ( चेतना) केवलमें मानसिक रूप से अनुभव हृदय में ही होता है ।

विश्वो हि स्थूलभुनित्यं तैजसः प्रविविक्तभुक् ।

आनन्दभुक्तथा प्राज्ञस्त्रिधा भोगं निबोधत ॥3 ॥

‘विश्व' सदा स्थूल पदार्थ का भोक्ता होता है, ' तैजस' सदा आनन्द का भोक्ता होता है । इस प्रकार भोग के तीन सदा सूक्ष्म का भोक्ता होता है और ‘प्राज्ञ’ प्रकार समझने चाहिए ।

स्थूलं तर्पयते विश्वं प्रविविक्तं तु तैजसम् ।

आनन्दश्च तथा प्राज्ञं त्रिधा तृप्तिं निबोधत ॥4 ॥

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आगमप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 71 'विश्व' को स्थूल पदार्थ परितुष्ट कर देते हैं, ' तैजस' को सूक्ष्म पदार्थ सन्तोष देते हैं और उसी प्रकार ‘प्राज्ञ' को आनन्द परितृप्त करता है । इस तरह तृप्ति भी तीन प्रकार की है, ऐसा समझना चाहिए ।

त्रिषु धामसु यद्भोज्यं भोक्ता यश्च प्रकीर्तितः ।

वेदैतदुभयं यस्तु स भुञ्जानो न लिप्यते ॥5 ॥

(जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) तीनों अवस्थाओं में जो भोगने योग्य पदार्थ हैं और जो अन्य भोक्ता है, उन दोनों को जो विवेकपूर्वक जान लेता है, वह पदार्थों को भोगता हुआ भी उन पदार्थों में लिप्त नहीं होता ।

प्रभवः सर्वभावानां सतामिति विनिश्चयः ।

सर्वं जनयति प्राणश्चेतोंऽशून्पुरुषः पृथक् ॥6 ॥

यह तो निश्चित है कि दृश्य या अव्यक्त रूप में भी जिस किसी का अस्तित्व हो, उसी की उत्पत्ति (प्रकटीकरण = आविष्कार) होती है । अतः पूर्ववर्णित प्राण ही सबकुछ उत्पन्न करता है और जो समष्टिचेतन पुरुष है, वह अलग- अलग (जैसे सूर्य अपनी किरणों को प्रकाशित करता है वैसे ) जीवों का आविष्कार करता है ।

विभूतिं प्रसवं त्वन्ये मन्यन्ते सृष्टिचिन्तकाः ।

स्वप्नमायासरूपेति सृष्टिरन्यैर्विकल्पिता ॥7 ॥

सृष्टि की रचना पर विचार करने में कुछ लोग इस सृष्टि को ईश्वरं का विस्तार ( महिमा ) ही मानते हैं, जब कि कुछ आध्यात्मिक साधक इस सृष्टि को स्वप्न जैसा भ्रम ही मानते हैं ।

इच्छामात्रं प्रभोः सृष्टिरिति सृष्टौ विनिश्चिताः ।

कालात्प्रसूतिं भूतानां मन्यन्ते कालचिन्तकाः ॥8 ॥

कुछ लोग सृष्टि के विषय में ऐसा निश्चय कर बैठे हैं कि यह सृष्टि प्रभु की केवल इच्छा ही है, तो फिर कालचिन्तक ( ज्योतिषी ) 'जीवों की उत्पत्ति काल से ही हुई है' –ऐसा मानते हैं ।

भोगार्थं सृष्टिरित्यन्ये क्रीडार्थमिति चापरे ।

देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा ॥9 ॥

तो और कुछ लोग ‘ यह सृष्टि ईश्वर के भोग के लिए है ' – ऐसा मानते हैं तो दूसरे लोग भगवान् की लीला के लिए ही इस सृष्टि का जन्म मानते हैं । परन्तु वे सब भ्रान्त ही हैं, क्योंकि परमात्मा कातो ‘ आप्तकाम’ स्पृहाहीन ( पूर्णकाम) हैं । सही बात तो यह है कि सृष्टिरचना उस ज्योतिर्मय परमात्मा स्वभाव ही है । (उपनिषद्) अब फिर से उपनिषद् के मंत्र लिए जा रहे हैं— नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं नोभयतः प्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं॥ 7 ॥ प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः

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72 उपनिषत्सञ्चयनम् विवेकसम्पन्न प्रमाणभूत आत्मज्ञानी मानते हैं कि पूर्वोक्त तीनों अवस्थाओं से ( ), हैतुरीय। वह अवस्थावालान तो अन्त:प्रज्ञहै उसे( तैजस्ही) परमार्थरूपहै, न वा सेबाह्यप्रज्ञआत्मा (विश्वमानना) हैचाहिए। उन। दोनोंवह आत्माअवस्थाओंअवाङ्मनसगोचरपरेकेजो चौथी ( ) रहनेवालाहै | वह इन्द्रियागोचरभी कोई नहींहोनेहै । सेवहव्यवहारयोग्यप्रज्ञानघन प्राज्ञनहीं हैभी, उसेनहीं कर्मेन्द्रियाँहै । वह प्रज्ञपकड़भी नहींनहीं है और अप्रज्ञ भीबीचनहींमें संज्ञा नहीं है । इसीलिए उसका विचार भी नहीं किया जा सकता । वाणी सकतीं । उसकी कोई ऐक्यानुभव का वह सारस्वरूप है । प्रपंच के वैविध्य को वह अपने में समासे वहलेताकहा नहीं जा सकता । शिव( कल्याण)स्वरूप, अद्वैत चतुर्थ अवस्थावाला है । वही साक्षात्कार करने योग्यहै ।हैवह। सुखस्वरूप, (कारिका)

निवृत्तेः सर्वदुःखानामीशानः प्रभुरव्ययः ।

अद्वैतः सर्वभावानां देवस्तुर्यो विभुः स्मृतः ॥10 ॥

ज्ञानियों ने इस तुर्य को अद्वैत, अव्यय, सर्वव्यापक, स्वप्रकाशक और सभी I निवृत्ति के लिए समर्थ माना सांसारिक दुःखों से

कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतैजसौ ।

प्राज्ञः कारणबद्धस्तु द्वौ तौ तुर्ये न सिध्यतः ॥11 ॥

विश्व और तैजस — ये दोनों तो कार्य और कारण से बँधे कार्य) और जो प्राज्ञ है, वह भी कारण से ( माया से ) बद्ध ही हैहुए। हैं ( माया = कारण और जगत् = ) - ( कारण सिद्ध नहीं हो सकते हैं ही नहीं । परन्तु तुर्य में ये दोनों कार्य और

नात्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम् ।

प्राज्ञः किञ्चन संवेत्ति तुर्यं तत्सर्वदृक्सदा ॥12 ॥

प्राज्ञ अपने आपको नहीं जानता और दूसरा भी कुछ जानता और असत्य को भी नहीं जानता । परन्तु जो तुर्य है वहनहीं जानता । वह सत्य को भी नहीं I तो सब कुछ और सर्वदा जानता ही द्वैतस्याग्रहणं तुल्यमुभयोः प्राज्ञतुर्ययोः ।. बीजनिद्रायुतः प्राज्ञः सा च तुर्ये न विद्यते ॥13 ॥

‘ प्राज्ञ' और ' तुर्य' में एक वस्तु समान है, परन्तु फर्क यह है कि प्राज्ञ कारणरूप माया की निद्रावह यह कि दोनों में जगत् के द्वैत का भान नहीं होता । ( ), ( ) में नहीं होती । से युक्त मूढ है जबकि वह निद्रा मूढता तुर्य

स्वप्ननिद्रायुतावाद्यौ प्राज्ञस्त्वस्वप्ननिद्रया ।

न निद्रां नैव च स्वप्नं तुर्ये पश्यन्ति निश्चिताः॥14 ॥

पहले दो ( जाग्रत् का अभिमानी विश्व और स्वप्न का अभिमानी तैजस आत्मा) स्वप्न से युक्त होते हैं और प्राज्ञ स्वप्नरहित केवल और निद्रा स्वप्न भी नहीं है 1। ( यहाँ निद्रा अज्ञान है औरनिद्रास्वप्नसे ही युक्त होता है, पर तुर्य में निद्रा भी नहीं है और विपर्यय = विक्षेप है । )

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आगमप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 73

अन्यथा गृह्णतः स्वप्नो निद्रा तत्त्वमजानतः ।

विपर्यासे तयोः क्षीणे तुरीयं पदमश्नुते ॥15 ॥

वस्तु में अवस्तु का ग्रहण स्वप्न है और निद्रा वस्तु का (तत्त्व का उन दोनों का जब लोप होता है, तब तुरीय पद की प्राप्ति होती है । ) अज्ञान ही है । परस्पर विरोधी

अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुध्यते ।

अजन्मानिद्रमस्वप्नमद्वैतं बुध्यते तदा ॥16 ॥

अनादि माया से निद्रित हुआ जीव जब ठीक रीति से जग जाता स्वप्नरहित ( आवरण = विक्षेपरहित ) अद्वैत का साक्षात्कार करता है है।, तब वह अजन्मा, निद्रारहित,

प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।

मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥17 ॥

यदि संसार सचमुच सत्य होता तो उसका अवश्य निवारण होता, इसमें कोई सन्देह नहीं । परन्तु वास्तविक रूप में यह जगत् केवल दिखाई देनेवाला मायामय द्वैत ही है और पारमार्थिक रूप से तो केवल अद्वैत ही है ।

विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।

उपदेशादयं वादो ज्ञाते द्वैतं न विद्यते ॥18 ॥

गुरु- शिष्य उपदेश आदि विकल्प (वैविध्य) किसी के द्वारा किसी हेतु के लिए केवल कल्पित ही होता, तो वह कुछ समय के बाद ऐसे ही चला जाता (नष्ट हो जाता है । यह बात तो केवल उपदेश के लिए ही है । जब ज्ञान प्राप्त हो जाता है तब गुरु- शिष्य आदि का द्वैत रहेगा ही नहीं | (उपनिषद्) सोऽयमात्माऽध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा ' अ' कार 'उ'कारो ' म'कार इति ॥8 ॥

यह पूर्वोक्त आत्मा अक्षरों के रूप में ओंकार ( अ, उ, म) है । अक्षरों के रूप में उनके तीन पाद ( अंश – अ, उ और म ) हैं, वे मानो आत्मा के तीन अंश हैं ( अर्थात् ये तीन मात्राएँ आत्मा की पूर्वोक्त तीन अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व कर रही हैं ) । जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राऽऽप्तेरादिमत्त्वाद्वाऽऽप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥9 ॥

जागरित स्थान के ‘ वैश्वानर' आत्मा का प्रतिनिधित्व 'अ'कार करता है । " वह वैश्वानर और ‘ अ’ दोनों सर्वव्यापक हैं ” ऐसा जो जानता है, वह साधक अवश्य ही अपनी सभी कामनाओं को पूर्ण कर सकता है और वह सब लोगों में श्रेष्ठ (आदि) स्थान प्राप्त करता है । स्वप्नावस्थस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वाद्द्वोत्कर्षति ह ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति । नास्याऽब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥10 ॥

स्वप्नस्थानीय तैजस् आत्मा का प्रतिनिधित्व 'उ'कार करता है । क्योंकि ( तीन मात्राओं में से ) वह उत्कृष्ट है और उसका स्थान भी ( स्वप्नावस्था की तरह) मध्य में ही है । जो साधक इस प्रकार से जानता

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74 उपनिषत्सञ्चयनम् है (उपासना करता है ), वह ज्ञान के सातत्य में उत्कर्ष को प्राप्त करता है, सर्वत्र समान व्यवहार करनेवाला बनता है और उसके कुल में कोई बिना ब्रह्मज्ञानवाला (ब्रह्मज्ञानरहित) उत्पन्न नहीं होता । सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ॥11 ॥

सुषुप्तिस्थानीय प्राज्ञ का प्रतिनिधित्व 'म'कार करता है । वह विश्व ( तैजस ) के बाद लयोन्मुखी ॐ की तीसरी मात्रा है । जो साधक इस प्रकार उसकी उपासना करता है, वह इस समग्र जगत् को नाप लेता है और वह सबका अपने में लय करनेवाला होता है । (कारिका)

विश्वस्यात्वविवक्षायामादिसामान्यमुत्कटम् ।

मात्रासम्प्रतिपत्तौ स्यादाप्तिसामान्यमेव च ॥19 ॥

जैसे ‘विश्व' प्रथम है, उसी तरह ' अ' भी तो प्रथम ही है । ये दोनों प्रथम होने से एक ही हैं और समान ही हैं । यदि आपने 'विश्व' को एक बार 'अ' ( मात्रा ) मान लिया, तो उनके साम्य और उनकी व्याप्ति भी स्पष्ट ही है ।

तैजसस्योत्वविज्ञान उत्कर्षो दृश्यते स्फुटम् ।

मात्रासम्प्रतिपत्तौ स्यादुभयत्वं तथाविधम् ॥20 ॥

यदि तुम ' तैजस' में 'उ' को देख लेते हो तब तो तुम उसकी उत्कृष्टता भी स्पष्टरूप से देख ही लेते हो । ( अर्थात् ' उ' जिस तरह 'अ' और ' म' के बीच में आता है, उसी तरह तैजस भी जाग्रत्- सुषुप्ति के बीच में आता है । तीनों वर्ण क्रमशः आत्मा की तीनों अवस्थाओं के प्रतीक हैं ) ।

मकारभावे प्राज्ञस्य मानसामान्यमुत्कटम् ।

मात्रासम्प्रतिपत्तौ तु लयसामान्यमेव च ॥21 ॥

'प्राज्ञ' आत्मा की तृतीय अवस्था है, जो कि मात्रा के क्रम से ' ओम्' के ' म' समान है । दोनों में यह ( अन्त्य स्थान = तीसरे स्थान की ) समानता है । जिस प्रकार 'म' के साथ ‘ ओम्' की समाप्ति हो जाती है, उसी प्रकार 'प्राज्ञ' भी आत्मा की अन्तिम अवस्था है । दोनों ही इस बात में भी साम्य रखते हैं ।

त्रिषु धामसु यस्तुल्यं सामान्यं वेत्ति निश्चितः ।

स पूज्यः सर्वभूतानां वन्द्यश्चैव महामुनिः ॥22 ॥

विवेकी और स्थिर बुद्धिवाला मनुष्य इन तीनों अवस्थाओं में एक ही समान आत्मा को देख लेता है, तो वह मनुष्य सचमुच बड़ा ऋषि ही है, वह सबका पूजनीय और वन्दनीय हो जाता है ।

अकारो नयते विश्वमुकारश्चापि तैजसम् ।

मकारश्च पुनः प्राज्ञं नामात्रे विद्यते गतिः ॥ 23 ॥

‘ अ’कार ( प्रथम मात्रा) पर ध्यान करने से हम 'विश्व' होने का अनुभव करते हैं । 'उ' ) ' ' ' (उपासनामात्रा कीकरनेउपासनापर हमकरने‘ प्राज्ञपर' होनेहम कीतैजसअनुभूतिहोने करतेका अनुभवहैं, पर जबकरतेहमहैं तुरीयऔर (म'कारचौथी अवस्था(तृतीय मात्राद्वितीय) की, ( ) )करते हैं तब तो हम अमात्र असीम अनन्त हो जाते हैं । का ध्यान

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आगमप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 75 (उपनिषद्) अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद ॥12 ॥

इति माण्डूक्योपनिषत् समाप्ता । पूर्वोक्त प्रकार से ‘ ओम्’ की चौथी अवस्था (चौथा पाद) विश्वात्मा की है । यह आत्मा अनन्त,,,, वाणी और मन से परे है अद्वैत है मंगलकारी है समस्त विश्व का इसमें लय हो जाता है । है व्यष्टिचेतन ( जीवात्मा) को ही विश्वात्मा मानते हैं । जो साधक इस प्रकार जान लेता है, वहज्ञानीजनअपने आत्मा को विश्वात्मा में मिला देता है । (तात्पर्य यह है कि वह कभी अपने को व्यष्टिचैतन्य के रूप में देखता ही नहीं है । इस प्रकार माण्डूक्योपनिषत् समाप्त होती है । शान्तिपाठः ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ नोट- इसका हिन्दी रूपान्तर आरम्भ में दिया गया है । * (कारिका)

ओङ्कारं पादशो विद्यात्पादा मात्रा न संशयः ।

ओङ्कारं पादशो ज्ञात्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ 24 ॥

ओंकार को पादों के अनुसार जानना चाहिए । नि: संदेह रूप से ये पाद ( अवस्थाएँ) और मात्राएँ एक ही हैं । यदि इन अवस्थाओं के द्वारा तुम ओंकार को जान लेते हो, तब फिर तुम्हारे लिए किसी चिन्ता की आवश्यकता नहीं रह जाती । ( तब तो तुम कृतार्थ हो गए 1)

युञ्जीत प्रणवे चेतः प्रणवो ब्रह्म निर्भयम् ।

प्रणवे नित्ययुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥ 25 ॥

प्रणव के ऊपर चित्त को केन्द्रित करो । प्रणव ही ब्रह्म है और वह निर्भय है । यदि तुम अपने मन को प्रणव के साथ सदैव जोड़ सकते हो, तो कभी भी तुमको भय नहीं होगा ।

प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म प्रणवश्च परः स्मृतः ।

अपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्योऽनपरः प्रणवोऽव्ययः ॥26 ॥

प्रणव सगुण ब्रह्म ( अपरब्रह्म ) भी है और निर्गुण ब्रह्म (परब्रह्म ) भी है । उसके पहले (उसके कारण के रूप में ) कुछ भी नहीं था अर्थात् वह कारणरहित है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं है । वह

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76 उपनिषत्सञ्चयनम् अनन्तर ( सर्वव्यापक ) है, वह अबाह्य है (उससे बाहर कुछ भी नहीं है ) । वह अनपर है (उसके बाद कुछ नहीं है ) । वह कार्यरूप भी नहीं है । वह अव्यय ( गतिहीन 1 अजर) है ।

सर्वस्य प्रणवो ह्यादिर्मध्यमन्तस्तथैव च ।

एवं हि प्रणवं ज्ञात्वा व्यश्नुते तदनन्तरम् ॥ 27 ॥

आरंभ, मध्य और अन्त— सब कुछ प्रणव ही है । इस प्रकार यदि प्रणव को पहचाना जाए, तो शीघ्र ही पूर्ण ब्रह्म को जाना जा सकता है ।

प्रणवं हीश्वरं विद्यात्सर्वस्य हृदि संस्थितम् ।

सर्वव्यापिनमोङ्कारं मत्वा धीरो न शोचति ॥28 ॥

प्रणव को सबके हृदय में रहता हुआ और सबका नियमन करता हुआ ईश्वर ही समझ लो । विचारशील पुरुष प्रणव को सर्वव्यापी मानता है और ऐसा धीर (विवेकी ) पुरुष कभी शोक नहीं करता अर्थात् वह सुख- दुःख से परे हो जाता है ।

अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः ।

ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः ॥29 ॥

जिसने ओंकार को अपरिच्छिन्न, अनन्त, अद्वैत और कल्याणकारी स्वरूप में जान लिया है, वही सच्चा मुनि है; अन्य नहीं । आगम-प्रकरण समाप्त । * वैतथ्यप्रकरणम्

वैतथ्यं सर्वभावानां स्वप्न आहुर्मनीषिणः ।

अन्तःस्थानात्तु भावानां संवृतत्वेन हेतुना ॥1 ॥

ज्ञानी लोग कहते हैं कि स्वप्न में देखे गए सभी पदार्थ मिथ्या ही होते हैं । ये सभी स्वाप्न पदार्थ तुम्हारे अन्त: करण में ही होते हैं और छोटे शरीर में स्वप्नदृष्ट बड़े पदार्थ तो समा नहीं सकते । इस संवृतत्व ( परिच्छिन्नता) के कारण से वे पदार्थ मिथ्या ( वितथ) ही हैं ।

अदीर्घत्वाच्च कालस्य गत्वा देशान्न पश्यति ।

प्रतिबुद्धश्च वै सर्वस्तस्मिन्देशे न विद्यते ॥2 ॥

स्वप्न में समय तो बहुत कम होता है, इसलिए स्वप्न में देशान्तर में पदार्थदर्शन होने शरीर से बाहर जाकर तो आत्मा अन्य देशों में होता ही नहीं है । सचमुच(इसलिएउन्हेंसभीदेखास्वप्नदर्शननहीं होतावितथऔर जबअर्थात्वहमिथ्याजागताहीहैहोते, तब वहपरद्रष्टाभी हैं ) ।

अभावश्च रथादीनां श्रूयते न्यायपूर्वकम् ।

वैतथ्यं तेन वै प्राप्तं स्वप्न आहुः प्रकाशितम् ॥3 ॥।

स्वप्न में देखे गए रथ आदि का अभाव तो तर्क से है | शरीरस्थ अवकाश तो रथादि को रखने के लिए बहुत भी और शास्त्रों से भी कहा- सुना जा सकता को सिद्ध ही कर देता है | ज्ञानी लोग कहते हैं कि यह बातहीतर्कोंछोटा पड़ता है । यह रथादि के मिथ्यात्व से और शास्त्रों के बार- बार कहने "सिद्ध हो जाती है । से

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वैतथ्यप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 77

अन्तःस्थानात्तु भेदानां तस्माज्जागरिते स्मृतम् ।

यथा तत्र तथा स्वप्ने संवृतत्वेन भिद्यते ॥4 ॥

शरीर में उतना अवकाश नहीं होने से स्वप्नस्थ रथादि जाग्रत् अवस्था में भी देखे गए पदार्थ मिथ्या ही हैं, भेद केवल इतनाको तुम मिथ्या मानते हो । उसी तरह के लिए अवकाश की कमी नहीं होती । पर जाग्रत् के विषय तो स्वप्नही है कि जाग्रत् अवस्था में विषयों के ये विषय मिथ्या सिद्ध हुए हैं, तो जाग्रत् के वे ही विषय भी मिथ्याजैसेहीहीहोहोते हैं । अब जब स्वप्न सकते हैं ।

स्वप्नजागरितस्थाने ह्येकमाहुर्मनीषिणः ।

भेदानां हि समत्वेन प्रसिद्धेनैव हेतुना ॥5 ॥

आत्मा स्वप्नइन दोऔरअवस्थाओंजाग्रत् (मेंदोनोंजिन) अवस्थाविषयों कोमें भोगताविषय औरहै, वेविषयीविषय काभी सम्बन्धतो समानतोहीसमान ही रहता है । है इसीलिए ज्ञानी जन कहते हैं कि ये ( अस्थायी ) विषय मिथ्या हैं । भले ही वे स्वप्नहैं । मेंयहदेखेप्रसिद्धगए हीहों या जाग्रत् में ।

आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।

वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥6 ॥

जो वस्तु पहले नहीं थी और भविष्य में नहीं रहेगी, उसे मिथ्या ही कहा जाता है । ऐसी वस्तु का वर्तमान काल में दिखाई देना भी तो मिथ्या ही है । ऐसा दिखाई देनेवाला विषय मरु- मरीचिका के समान भ्रम ही है । अवितथ ( सत्य) तो वह है, जो तीनों काल में वैसा ही रहता है ।

सप्रयोजनता तेषां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।

तस्मादाद्यन्तवत्त्वेन मिथ्यैव खलु ते स्मृताः ॥7 ॥

जाग्रत् अवस्था में हमें सभी पदार्थ उपयोगी ( आवश्यक ) दिखाई पड़ते हैं । परन्तु स्वप्नावस्था में उन पदार्थों की उपयोगिता ( सप्रयोजनता ) हमें मालूम नहीं पड़ती । इसका अर्थ तो यही होगा कि उन वस्तुओं का प्रारंभ भी होता है और नाश भी होता है और ऐसी वस्तुएँ मिथ्या ही होती हैं ।

अपूर्वं स्थानिधर्मो हि यथा स्वर्गनिवासिनाम् ।

`तानयं प्रेक्षते गत्वा यथैवेह सुशिक्षितः ॥8 ॥

जिस किसी स्थान में रहनेवालों की अपनी- अपनी स्थानिक विलक्षणताएँ (विशिष्टताएँ ) तो होती ही हैं । जैसे स्वर्गनिवासी इन्द्रादि देवों की अनिमिषता, सहस्राक्षता, विशेष प्रकार की सिद्धियाँ आदि होती हैं और ऐसी ही कई विचित्र वस्तुओं को तुम अपने स्वप्न के स्थान में भी देख सकते हो । जिस प्रकार कौन - सी वस्तु कहाँ मिलती है यह रास्ता अगर तुम जानते हो, तो तुम सरलता से उस स्थान ( अवस्था ) में जाकर उसे देख सकते हो, उसी तरह जब तुम स्वप्न में होते हो, तो बहुत - सी विचित्र वस्तुओं को चिरपरिचित रूप से देखते हो । परन्तु ये सब चीजें मरुमरीचिका की ही तरह मिथ्या हैं ।

स्वप्नवृत्तावपि त्वन्तश्चेतसा कल्पितं त्वसत् ।

बहिश्चेतोगृहीतं सद्दृष्टं वैतथ्यमेतयोः ॥9 ॥

स्वप्न में तुम सभी मनोजनित विचित्र वस्तुओं को भीतर ही देखते हो । वे सब मिथ्या हैं । बाहर भी तुम उन्हीं सब वस्तुओं को देखते हो, पर उन्हें तो तुम सत्य मानते हो । यह तुम्हारा किया गया भेद

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उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 120 का मूल पृष्ठ
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78 उपनिषत्सञ्चयनम् त्रुटिपूर्ण है, क्योंकि तुम किसी अवस्था में जो कुछ भी देखते हो, वह मिथ्या ही है, भले तुम उसे सत्य मान बैठे हो ।

जाग्रवृत्तावपि त्वन्तश्चेतसा कल्पितं त्वसत् ।

बहिश्चेतोगृहीतं सद्युक्तं वैतथ्यमेतयोः ॥10 ॥

जाग्रत् अवस्था में भी तुम अपने अन्तःकरण में विषयों की कल्पना कर सकते हो । तब तुम जानते भी हो कि ये कल्पित विषय मिथ्या हैं । पर जब तुम बाह्य पदार्थ ( विषय ) देखते हो, तब उन्हें सत्य मान लेते । पर वास्तव में ये भीतर- बाहर अर्थात् दोनों के अनुभव मिथ्या ही हैं । तर्क भी यही कहता है ।

उभयोरपि वैतथ्यं भेदानां स्थानयोर्यदि ।

क एतान्बुध्यते भेदान् को वै तेषां विकल्पकः ॥11 ॥

यदि जाग्रत् और स्वप्न— दोनों अवस्थाएँ मिथ्या हैं, तब तो विषय और विषयी का सम्बन्ध हो ही नहीं सकता और उन दोनों अवस्थाओं में हमारे किए हुए अनुभव जब व्यर्थ हो गए, तब उन अनुभवों को करनेवाला और धारण करनेवाला भी कौन है?

कल्पयत्यात्मनात्मानमात्मा देवः स्वमायया ।

स एव बुध्यते भेदानिति वेदान्तनिश्चयः ॥12 ॥

स्वप्रकाशक आत्मा अपनी माया की शक्ति से स्वयं अपने को कर्ता के रूप में, कार्य के रूप में और सभी रूपों में प्रकट करता है । स्वयं विशुद्ध चैतन्यस्वरूप होने पर भी माया की सहायता से विविध रूपों को धारण करता है, यह वेदान्त का निश्चय ( सार) है ।

विकरोत्यपरान्भावानन्तश्चित्ते व्यवस्थितान् ।

नियतांश्च बहिश्चित्त एवं कल्पयते प्रभुः ॥13 ॥

जैसे मन के भीतर स्थित यह समर्थ आत्मा स्वयं को ही इच्छाओं और विचारों के रूप में प्रकट करता है, उसी तरह बाहर भी वही आत्मा (बहिर्मुख होकर) सुस्पष्ट इन्द्रियग्राह्य पदार्थों को स्वयं प्रकट करता है । ( कुछ लोग 'चित्ते व्यवस्थितान्' इस पाठ के बदले 'चित्तेऽव्यवस्थितान्' ऐसा पाठान्तर करके - भीतर (चित्त ) की इच्छाओं और विचारों को ' अस्पष्ट' बताते हैं ) ।

चित्तकाला हि येऽन्तस्तु द्वयकालाश्च ये बहिः ।

कल्पिता एव ते सर्वे विशेषो नान्यहेतुकः ॥14 ॥

मन के भीतर जो कल्पित पदार्थ हैं, वे तो कल्पना के समय तक ही टिकनेवाले होते हैं और जो बाह्य पदार्थ हैं, वे भले ही दो काल तक ( अर्थात् अपने अस्तित्व के काल तक ) टिकने वाले होते हों, पर ये दोनों कल्पित तो हैं ही । दोनों के कल्पित होने के विषय में विशेष- भेद करने का तो कोई कारण नहीं मिलता ।

अव्यक्ता एव येऽन्तस्तु स्फुटा एवं च ये बहिः ।

कल्पिता एव ते सर्वे विशेषस्त्विन्द्रियान्तरे ॥15 ॥

मन में अवस्थित विचार - वासनाएँ और पदार्थ भले ही अनभिव्यक्त हों और बाह्य पदार्थ चाहे कितने भी अभिव्यक्त और सुस्पष्ट हों फिर भी वे दोनों ही ( बाहरी - भीतरी ) केवल कल्पित ही हैं । उनमें