Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 21–30
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 21–30
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( 19 ) साधना के लिए संघर्ष क्यों करें? इसीलिए इस सृष्टि के विषय में जानना जरूरी है कि यह सृष्टि कैसे बनी? अभी तक वह कैसे टिकी हुई है? और इसका अंतिम परिणाम क्या है? अतः हम उपनिषदों प्रस्तुत सृष्टि-विषयक वर्णन का अवलोकन कर लें । उपनिषदें कहती हैं कि प्रारंभ में तो केवल एक ब्रह्म ही (आत्मा ही 'सत्' ) था । वह ' एकमेवाद्वितीय' था । उसने बहुत होने की कामना की फिर उसने अपने में से ही आकाश ( अवकाश या देश - Space ) उत्पन्न किया । उस आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से उसने पृथ्वी को बनाया । इन पाँचों महाभूतों का ब्रह्म के साथ सम्बन्ध प्रत्येक स्तर और प्रत्येक अवस्था में रहता ही है । इन पाँचों तत्त्वों (महाभूतों ) का मिश्रण ( पंचीकरण ) और उनकी ब्रह्म के साथ संलग्नता का परिणाम ही यह विश्व है । इन भूतों में ब्रह्म अपने संकल्प से अंतर्यामी होकर प्रविष्ट हुआ । (' सोऽकामयत, एकोऽहं बहुस्याम प्रजायेय । तस्माद् वा एतस्मादाकाशः संभूतः ' आदि श्रुतियाँ तथा ' अनेन जीवेनात्मनानुप्राविशत्' - यह श्रुति का प्रामाण्य है ) । उपनिषद् के ही एक अन्य वर्णनानुसार जगत् के मूल तत्त्व के रूप में पहले अग्नि, जल और अन्न ( पृथ्वी )– ये तीन ही तत्त्व उत्पन्न किए गए थे । कुछ स्थानों पर तो केवल दो ही तत्त्वों का— 'रयि' और 'प्राण' का ही जगत् के मूलस्रोतों के लिए उल्लेख मिलता है । 'रयि' का अर्थ चन्द्र या अन्न होता है और ' प्राण ' का अर्थ सूर्य, शक्ति, अग्नि या चेतना होता है । विविध प्रमाण में इन तीनों का सम्मिश्रण करने से इस वैविध्यपूर्ण जगत् का निर्माण हुआ । जिस प्रकार संगीत के सात परस्पर पृथक् स्वरों के विशिष्ट संयोजन ( संमिश्रण ) से असंख्य राग- रागिनियों का जन्म होता है इसी प्रकार ही यह सारा खेल है । ‘ यह समस्त जगत् उस ब्रह्म के नियन्तृत्व में ही है । ' इतना कह देना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि यह कह देना चाहिए कि यह जगत् उससे अलग है ही नहीं । ब्रह्म में से उत्पन्न होने के या ब्रह्म में से उत्स्फुर्जित होने के बाद भी यह सृष्टि ब्रह्म में ही अपना अवस्थान गतिमान रखती है और प्रलय के समय उसी में मिल भी तो जाएगी । परब्रह्म और जगत् का सम्बन्ध कैसा है? इसके सम्बन्ध में उपनिषदों में दो दृष्टिकोण दिखाई देते हैं । एक को ‘ सप्रपंचवाद' तो दूसरे को 'निष्प्रपंचवाद' कहा गया है । सप्रपंचवाद का कहना है कि जगत् ब्रह्म का ही विकास (विस्तार) है, इसलिए जगत् भी ब्रह्म ही है । दूसरी ओर तो निष्प्रपंचवाद कहता है कि जगत् का अपना कोई खास अस्तित्व है ही नहीं । वह कहता है कि सही अस्तित्व अर्थात् पारमार्थिक हस्ती तो केवल ब्रह्म की ही है । ये दोनों ही उपनिषदों के दृष्टिकोण हैं । मुण्डक ने इस विषय में 'ऊर्णनाभि' का उदाहरण दिया है । कुछ उपनिषदों में उत्पत्ति का काम ‘ आकाशाद् वायुः ’ आदि कहकर बताया है 1 उपनिषदों में बन्धन और मुक्ति कुछ उपनिषदें जीवात्मा और परमात्मा का स्वरूप एक ही वृक्ष की डाली पर बैठे हुए दो पक्षियों के चित्रण द्वारा बताते हैं- "द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषष्वजाते । तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति । " अर्थात् एक ही वृक्ष ( शरीर) पर दो सुपर्ण युगल सखा पक्षी (जीव- ब्रह्म ) एक साथ बैठे हैं उनमें से एक वृक्ष के फल ( कर्मफल ) जो खट्टे- मीठे हैं खाता है, और दूसरा साक्षीभाव से देखता रहता है । अर्थात् एक सुख- दुःख भोगता है और दूसरा शान्त, निर्लेप, फलों को छूता तक नहीं । कर्मफल भोगनेवाला अर्थात् सुख-दुःखादि का अनुभवकर्ता जीव जब परब्रह्म परमात्मा की महिमा को पा लेता है, तब वह सांसारिक पीड़ाओं से मुक्त हो जाता है ।
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(20 ) पर प्रश्न तो यह है कि आत्मा को तो नित्यमुक्त माना गया है । वह जीव कब बना? कैसे बना? क्यों बना? किसलिए बना? इन प्रश्नों के उत्तर उपनिषदों ने नहीं दिए हैं । उन्होंने तो केवल इस भवचक्र से छूटने के लिए तरह- तरह के साधना- प्रकार बता दिए हैं, जिनका पालन या अनुष्ठान करने से जीव अपने मूलस्थान अर्थात् अपनी मूल अवस्था को पुनः प्राप्त कर सके । उपनिषदों के प्राचीन चिन्तकों ने भी जीव, ईश, विशुद्ध चैतन्य, जीव- ईश का भेद, विद्या और अविद्या तथा चित् का भेद- इनको नित्य मानकर ही परितोष कर लिया! हमारे प्रश्नों का सन्तोषपप्रद उत्तर अभी तक तो मिला नहीं है । शायद विश्व के किसी भी दार्शनिक के पास इसका दोषरहित बौद्धिक उत्तर अभी तक नहीं है । मुमुक्षु साधक को चाहिए कि वह साधना के प्रथम सोपान के रूप में अपने में कुछ नैतिक तथा समाज- हितकारी सद्गुणों को प्रविष्ट करे; उनका अपने जीवन में दृढ़ निष्ठा से पालन करे; अपनी विवेक बुद्धि द्वारा छानबीन करके वह समझ ले कि वैदिक विधिविधान इहामुष्मिक फल देनेवाले होने पर भी वे कभी भी स्थायी शाश्वत सत्य की ओर ले जाने के लिए सामर्थ्यपूर्ण नहीं हो सकते । इसलिए आध्यात्मिक साधक को अन्ततोगत्वा उन्हें छोड़ना ही पड़ेगा । आध्यात्मिक साधक को ' प्रेयस्' ( सुख ) को छोड़ने के लिए और श्रेयस् ( कल्याण ) को प्राप्त करने के लिए सर्वदा तत्पर होना चाहिए । दुराचार को छोड़कर संयम का पालन करते हुए साधक को बहिर्मुखता छोड़कर अन्तर्मुखी बनना चाहिए | अपने हृदय की विशालता को उसे देखना चाहिए और उसे भगवान् का आसन समझकर ध्यान करना चाहिए । सभी जीवित प्राणियों के प्रति साधक के हृदय में करुणा होनी चाहिए । उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसे हमेशा प्रयत्न करते रहना चाहिए । अपने आचार के विषय में उसे सर्वदा सावधान रहना चाहिए और सत्य ही बोलना चाहिए । उसे धर्माचरण ही करना चाहिए और अपने जीवन में शास्त्रीय आज्ञाओं को धारण करना चाहिए । साधक की साधना के महत्त्व के अंगरूप में उपनिषदों के अध्ययन, तपश्चरण और ब्रह्मचर्य ( स्त्री- त्याग) – ये तीन मुख्य बिन्दु माने जाते हैं । साधक को मुमुक्षुत्व का उदय होते ही नम्रतापूर्वक समित्पाणि होकर गुरु के पास जाना आवश्यक है । और गुरु के लिए भी उपनिषदों का यह अनिवार्य नियम है कि आए हुए शिष्य की योग्य कसौटी करके उसे योग्य आध्यात्मिक ज्ञान दे । गुरु के उपदेश के बाद शिष्य को चाहिए कि वह गुरु के दिए हुए उपदेश का चिन्तन- मनन करे और बाद में उसका ध्यान करे । इस ध्यान का फल अनुभूति होगा । यही साक्षात्कार है । तो इस अनुभूति का - इस साक्षात्कार का स्वरूप क्या है? साधक आत्मानुभूति में क्या पाता है? वह सभी प्राणियों में अपने - आप को और अपने - आप में सभी प्राणियों को देखने लगता होने से उसे किसी पर न तो कोई विशेष आकर्षण होता है अथवा न ही किसी पर कोई है । ऐसा | है अपने सभी विचारों के पीछे वह विशुद्ध आत्मशक्ति का अनुभव कर सकता घृणा होती दिखाई देता है कि इस भौतिक जगत् में उसको बाँधनेवाले सभी बन्धन इस ज्ञानहै । उसको यह स्पष्ट आत्माराम होता है । सदा आत्मानन्द में मग्न रहता है । जब वह बाहरी दुनिया कोसेदेखताटूट गए हैं वह है वह, अनन्यउसी स्वपर्याप्तहै, लोकोत्तरआत्माहै को। वहहीपरितुष्टदेखताऔरहै । विशोकउसका आत्माहो जाताही हैतो। ब्रह्मआनन्दविभोरहै । उसका आनन्द अवर्णनीयहै तब भी कभी घूमता भी रहता है और लोककल्याण के लिए अपने अनुभवों को सभी जगहअवस्था में वह सर्वत्रफिरता भी है । कदाचित् कहता-
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( 21 ) ऐसे मनुष्य को ‘ जीवन्मुक्त' कहा जाता है अर्थात् इस जगत् में रहते हुए भी वह? ऐसे जीवन्मुक्त की इस देह को छोड़ने के बाद क्या दशा होती है मुक्त ही है । उपनिषदों में इसके लिए दो दृष्टिकोण देखे जाते हैं । एक मत तो ऐसा है कि मरने के समय ऐसे जीवन्मुक्त का स्थूलशरीर और सूक्ष्मशरीर उसकी आत्मा से अलग हो जाते हैं और दोनों शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो जाते हैं और वह आत्मा ब्रह्म के साथ मिल जाता येहै । अलग हुए सागर में विलीन (एकाकार) हो जाती है, वैसे ही वह ब्रह्म में एकाकार हो जाता है । वह जैसेनदी नदीकी तरह ही अपना स्वतंत्र अस्तित्व खोकर ब्रह्म के साथ अद्वितीय हो जाता है । परन्तु उपनिषदों का एक दूसरा मत भी इस विषय में है । अधिकतर उपनिषदें जीवन्मुक्त पुरुष की ‘ अर्चिरादि मार्ग ' की यात्रा का वर्णन करती हैं । उपनिषदों में इस अर्चिरादि मार्ग को 'देवयान' और ' उत्तरायण ' भी कहा गया है । यह मार्ग जीवन्मुक्त मनुष्य को ' ब्रह्मलोक' अथवा ' सत्यलोक’ में पहुँचा देता है । मरने के बाद जोवन्मुक्त को इस मार्ग से यात्रा करनी पड़ती है - यह उपनिषदों का इस विषय में दूसरा मत है । जीवन्मुक्त इस यात्रा में अन्त में ब्रह्मलोक को पाकर वहाँ स्थायी रूप से अनन्त शान्ति में और अनन्त आनन्द में रहता है । जीवन्मुक्त की इस यात्रा में अग्नि, दिवस, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के छ: मास, वर्ष, सूर्य, चन्द्र और विद्युत् नाम के विरामस्थल आते हैं । वास्तविक रूप से ये सभी नाम उस स्थल के अधिष्ठाता देवताओं के ही हैं । जीवन्मुक्त यात्रा करते - करते जब अन्तिम विरामस्थान 'विद्युत्' में पहुँचता है, तब वहाँ ' अमानव पुरुष' (दिव्य पुरुष ) उसे ब्रह्मलोक में ले जाता है 1 यहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या यह ब्रह्मलोक कोई आन्तरिक अनुभूति की अवस्था है, अथवा कोई वास्तविक बाहरी लोक है, जहाँ यह जीवन्मुक्त निवास करता है? इस विषय में लगभग सभी उपनिषदें इस प्रश्न का उत्तर या तो देती ही नहीं हैं, और देती भी हैं तो उनका उत्तर धुँधला- सा ही रहता है । हाँ, छान्दोग्य ( 8.5.3 ) में कहा है कि यह कोई मानसिक अवस्था नहीं, परलोक ही है । पृथ्वी से ऊपर में वह तीसरा लोक है । वहाँ दो बड़े सरोवर हैं । एक का नाम ' अर' और दूसरे का नाम 'ण्य' है । वहाँ अन्नरस के छोटे-छोटे झरने हैं, उन्हें 'ऐरंमदीय सोमसवन' कहा जाता है । वहाँ एक पिप्पल का वृक्ष है और अपराजिता नाम की नगरी भी है, जिसमें एक सुवर्ण मण्डप भी है । कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् ( 1.3.4 और 8 ) में तो उनका सचित्र चित्रण किया गया है । उसमें इस लोक में एक विरजा नदी और इन्द्र तथा प्रजापति, दो द्वारपाल के रूप में तथा विचक्षण नाम का एक सिंहासन, अमितायुज नाम का शंख, पाँच सौ दिव्य अप्सराएँ आदि उस मुक्तात्मा की सेवा में और जोड़े गए हैं । ये सब मुक्तात्मा को सजाते - सँवारते हैं और ब्रह्मलोक में उसके प्रवेश के समय ब्रह्म का सौरभ उसमें प्रविष्ट हो जाता है । कुछ भी हो, ब्रह्मलोक नाम का कोई बाहरी लोक हो या भीतरी मानसिक अवस्था हो, पर वहाँ पहुँचा हुआ साधक इस संसार के जन्म- मरण के चक्र में फिर से नहीं आता । उपनिषदों में मरणोत्तर गति आत्मज्ञानी की मरणोत्तर स्थिति के बारे में उपनिषदों के दो मतों को हमने देखा । पर आत्मज्ञान नहीं पानेवाले जीवों की मरणोत्तर गति कैसी होगी? उपनिषदों में इस प्रश्न की चर्चा भी की गई है । जो लोग सकाम कर्म करनेवाले हैं, या जो लोग निम्न कक्षा की उपासनाएँ करनेवाले हैं, उनकी कामनाएँ उन-उन कर्मों के द्वारा पूर्ण होती हैं । उनमें से कुछ लोग स्वर्गलोक को प्राप्त करते हैं ।
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(22 ) यहाँ आश्चर्य की बात तो यह है कि उपनिषदों में स्वर्ग की बातें तो कई बार आयी हैं, परन्तु स्वर्ग के विरोधी नरक की बात तो कहीं भी वर्णित नहीं है । बाद के काल में लिखी गई एक गौण उपनिषद् में ही नरक की बात कही गई है । पुराणों में जिस प्रकार के नरक का वर्णन है, उससे उपनिषदें अनजान मालूम होती हैं । वैसे स्वर्ग में गए हुए लोग अपने पुण्यों के प्रमाण में भोगों को भोग कर पुण्य क्षीण होने पर वापिस मृत्युलोक में लौट जाते हैं । ऐसे लोगों की इस मरणोत्तर यात्रा को कहीं- कहीं ‘ धूमादिमार्ग ’ कहा गया है, तो कहीं- कहीं 'पितृयान ' और ' दक्षिणायन' भी कहा गया है । वहाँ आत्मा धूमादिमार्ग से चन्द्रलोक की ओर पहुँचाया जाता है । इस मार्ग के बीच धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन के छः मास आदि विश्रामस्थल आते हैं । वहाँ ( लक्ष्यस्थान ) पर पहुँचकर पुण्य के प्रमाण में चन्द्रलोक में सुख भोग कर पुण्य क्षीण होने पर वह फिर पृथ्वी पर आता है । वापिस आने के मार्ग में आकाश, वर्षा, वनस्पति और चेतना – इस प्रकार के रूपों का रूपान्तरण उसे करना पड़ता है । जो जीव इन दोनों मार्गों में से एक को भी नहीं जानते वे तो बार- बार पशु-पक्षी, जीव- जन्तुओं की कनिष्ठ योनियों अनन्तकाल तक जन्म-मरण के चक्र में आया-जाया करते हैं । इसी विषय के आनुषंगिक रूप में उपनिषदों में कर्म और पुनर्जन्म का वर्णन भी जगह -जगह पर पाया जाता है | पुण्यकर्मों का करनेवाला मनुष्य अपने कर्मों का अच्छा फल पाता है और निकृष्ट ( पाप) करनेवाला मनुष्य निकृष्ट फल पाता है । ( 'रमणीयचरणा रमणीयां योनिमापद्यन्ते कपूयचरणा कपूयां योनिमापद्यन्ते ' आदि । ) उपनिषदों में उपासनाएँ या विद्याएँ साधना के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग के रूप में उपनिषदों में कुछ उपासनाएँ दी गई हैं । उन उपासनाओं का दूसरा नाम 'विद्याएँ' हैं । जो मनुष्य यज्ञयागादि में ही डूबा रहता है, या वैदिक यज्ञों में ही रममाण होता है, उसे कभी- न- कभी धीरे- धीरे चिन्तन या मनोमन्थन की ओर जाना ही पड़ता है । चिन्तन में उसकी एकाग्रता पहले होती है और तभी ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है । वह ज्ञान धीरे- धीरे होता है, वह आत्मा का अनुभवात्मक ज्ञान है । ऐसा अनुभवात्मक आत्मज्ञान ही जीवन का चरम लक्ष्य है और मोक्ष का वही एकमात्र उपाय है (' नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' ) । उपनिषदों में वर्णित इन उपासनाओं (विद्याओं) के दो रूप हैं- पहले रूप में साधक से यह गया है कि यज्ञविधि के विविध भागों में वह अमुक प्रकार के विचारों का आरोपण करे । उदाहरणकहा के तौर पर बृहदारण्यक उपनिषद् में साधक से यज्ञीय अश्व के ऊपर ( अश्वमेध के मेध्य अश्व पर) ऐसा आरोपण करने को कहा गया है । वहाँ अश्व में प्रजापति का आरोपण करने को कहा गया है । जो लोग अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करने में समर्थ नहीं होते हैं, उनके लिए ऐसी उपासना अश्वमेध के बाह्य अनुष्ठान जैसा ही फल देनेवाला होता है । यज्ञीय पदार्थों का विभाग ( ऐसा आरोपण ) 1 पर वैचारिक आरोपण ही इस उपासना का स्वरूप है और उस विभाग उपासना का दूसरा प्रकार नाम, वाक्, बल और मन आदि कुछ विषयों चिन्तन करने का उपनिषदों में वर्णन किया गया है । इसमें उन विषयों पर ब्रह्मरूप से ध्यान-किसी प्रकार की समानता को खोजा जाता है । ऐसी उपासनाएँ साधक केऔरमनब्रह्म के बीच किसी- न-, ' ' -स्तर की ओर ले जाती हैं और अन्त में उच्चतम कक्षा ब्रह्म तक पहुँचा को धीरे धीरे उच्चतरसभी आध्यात्मिक अनुभव करवा देती हैं । देती हैं और उसे आवश्यक
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(23 ) उपनिषदों में बताई गई ऐसी उपासनाओं की संख्या बहुत बड़ी है । उपनिषदों में ये उपासनाएँ फैली हुई हैं । उपासनाओं की संख्या लगभग बत्तीस के आसपास मेंहैं व्यापक। प्रमाण महत्त्व की उपासनाओं की बात कहें तो छान्दोग्योपनिषद् में ही ऐसी बारह उपासनाएँ बताईकुछगईअधिकहैं— ( 1 ) अक्षिपुरुषविद्या, ( 2 ) भूमाविद्या, ( 3 ) दहरविद्या, (4 ) गायत्रीविद्या, ( 5 ) मधुविद्या, ( 6 ) पंचाग्निविद्या, ( 7 ) पुरुषविद्या, ( 8 ) सद्विद्या, (9 ) संवर्गविद्या, ( 10 ) शाण्डिल्यविद्या, ( 11 ) उपकोमलविद्या और ( 12 ) वैश्वानरविद्या । बृहदारण्यक उपनिषद् में ऐसी विद्याओं की संख्या चार हैं - ( 1 ) अन्तरादित्यविद्या, ( 2 ) पंचाग्निविद्या, ( 3 ) प्राणाग्निहोत्रविद्या और ( 4 ) उद्गीथविद्या । इसी तरह कौषीतकि उपनिषद् में भी— ( 1 ) पर्यंकविद्या और ( 2 ) प्रतर्दनविद्या नाम की दो विद्याएँ बताई गई हैं । ये सभी विद्याएँ रहस्यमय हैं और प्राचीन काल में ये गुप्त रूप से सिखाई जाती थीं । वे गोपनीय ही रहती थीं । उनका अनुष्ठान करने के लिए विशिष्ट अधिकार की आवश्यकता समझी जाती थी । विद्यार्थी की योग्यता की पहले कसौटी की जाती थी । यही कारण है कि इन उपासनाओं की पद्धतियों और विधियों का वर्णन न तो उपनिषदों में पाया जाता है, न ही उपनिषदों के भाष्यकारों के भाष्य में भी पाया जाता है । आज तो हम एक संचित निधि के केवल संरक्षण के रूप में उपनिषदों के साथ उन्हें संगृहीत कर रहे हैं, ऐसा ही समझना चाहिए । एक संभावना ऐसी हो सकती है कि बाद में विकसित विविध प्रकार के योगों के लिए इन उपासनाओं से काफी सामग्री उपलब्ध हुई हो । उपनिषत्कालीन सभ्यता और संस्कृति यहाँ पर हम प्राचीन दस उपनिषदों के बारे में ही सब कुछ कह रहे हैं; बाद में रचित अर्वाचीन साम्प्रदायिक, तान्त्रिक, अश्रौत और उपनिषद् नामधारी कृतियों की नहीं । अतः अब हम उन प्राचीनतम दस या ज्यादा- से- ज्यादा चौदह जिनके भाष्य शंकराचार्य ने किये हैं, अथवा उन्होंने अपने भाष्यों में जिन उपनिषदों का उल्लेख किया है उन्हीं उपनिषदों के काल की सभ्यता और संस्कृति के बारे में थोड़ा विचार करेंगे । ( श्रौत उपनिषदों में भी प्रणवोपनिषद् जैसी कुछ उपनिषदें तांत्रिक हैं, वह तो विषय ही अलग है अतएव यहाँ अप्रस्तुत है ) । उपनिषदों को देखने पर उस समय की अच्छी सामाजिक परिस्थिति का परिचय मिलता है । उस समय हमारे देश की उत्तर- पश्चिमी सीमा गान्धार तक ( अफगानिस्तान तक ) फैली हुई थी, और उसमें मद्र ( सियालकोट ), कुरु (दिल्ली), केकय ( पंजाब ), पाञ्चाल (बरेली और कन्नौज - उत्तरप्रदेश), कोसल ( उत्तरप्रदेश का अयोध्या विस्तार ), विदेह (बिहार का तिरहुट ), कौशाम्बी ( उत्तरप्रदेश का कोसाम और काशी ) आदि बहुत राज्य शामिल थे । इन प्रदेशों पर राज्य करने वाले सभी राजा क्षत्रिय थे । वे सब युद्ध-विद्या में और राज्यव्यवस्था में जैसे प्रवीण थे, वैसे ही वैदिक विद्याओं में भी पारंगत थे । वास्तविक बात तो यह है कि वे ही अमुक प्रकार की रहस्यविद्या की परंपरा से रखवाली करते आए थे । वे केवल विद्वान् ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मणों और ऋषियों की रक्षामात्र ही नहीं करते थे, अपितु वैदिक धर्म के प्रचार- प्रसार के लिए उन्हें प्रेरित भी करते थे, उन्हें आश्रय देते थे, उनकी मदद करते थे । सत्य और धर्म के स्तर की उच्चतम कक्षा को समाज में सतत चालू रखने के लिए वे कुछ भी करने के लिए सदैव सजग रहते थे । वर्ण- व्यवस्था तो उस समय प्रचलित थी, परन्तु आश्रम- व्यवस्था में ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम सर्वसामान्य थे, किन्तु संन्यासाश्रम का उल्लेख कम ही है । फिर भी यह मानने के लिए पूरे कारण हैं कि उस समय संन्यासाश्रम की प्रथा भी अस्तित्व में
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(24 ) थी । मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन में चारित्र्यशुद्धि और प्रामाणिकता पर बहुत जोर दिया जाता था । तत्त्वज्ञान, धर्म और नीतिशास्त्र के अलावा धर्मनिरपेक्ष कई विज्ञान-ज्ञान की शाखाएँ जैसे कि व्याकरण, संगीत, नृत्य, शिल्पविद्या, खगोलविद्या, ज्योतिर्विद्या, भूतविद्या, सुगन्धीपदार्थ बनाने की विद्या और ऐसी कई विद्याशाखाएँ भी उस समय में विकसित थीं । वैदिक यज्ञयागादि क्रियाएँ सर्वसाधारण रूप से उस समय हुआ करती थीं । इन यज्ञक्रियाओं में राजा लोग बड़ी धूमधाम से उत्सव मनाया करते थे । वे यज्ञ एक ओर तो राजाओं की कीर्ति को एवं उदरता को चारों ओर फैलने का अवसर उत्पन्न करते थे, तो दूसरी ओर विद्वानों को उनके ज्ञान को प्रदर्शित करने का और नाम- कीर्ति तथा कुछ धन की प्राप्ति का अवसर भी देते थे । सामान्यरूप से उस समय के लोग सन्तोषी जान पड़ते हैं । शुद्ध प्रामाणिक रूप से जो कुछ मिलता था, उससे आनन्द लेते थे । वे मानते थे कि जीवन में जो शोक या दुःख होता है, वह व्यक्ति के पूर्वजन्म के कर्मों का ही फल है । अपने जीवन के दुर्भाग्य, दुःख या शोक के लिए वे दूसरों को जिम्मेदार नहीं ठहराते थे । उपनिषदों की भाषा- शैली इन उपनिषदों की भाषा लगभग वैदिक संस्कृत है । हमारी आज की प्रशिष्ट संस्कृत भाषा इन प्राचीन उपनिषदों की नहीं है । इसलिए आज वह कालग्रस्त ही है, शब्दरूप और क्रियाओं का रूप भी ऐसा ही है । इस औपनिषदिक भाषा में वाक्प्रचार- मुहावरे आदि तथा प्रतीकात्मक प्रयोग भी वैदिक भाषा के ही हैं । इससे उन कालग्रस्त मुहावरों या प्रतीकों को आज सुलझाना कठिन- सा हो गया है । इसीलिए आज के पाठक को उपनिषदों में बहुत- सा धुँधलापन या अस्पष्टता दिखाई देना स्वाभाविक है । उपनिषदों के मन्त्र या कण्डिकाएँ विश्वतोमुखी हैं । इससे एक ही मंत्र से परस्पर- विरोधी अर्थ भी कहीं- कहीं किसी - किसी ने ढूँढ़ निकाले हैं और पश्चाद्वर्ती काल में वेदान्त की जो विविध शाखाएँ विकसित हुई हैं, उनका कारण भी यही है । उपनिषदों के सभी व्याख्याकारों को अपने - अपने विचारों के परिपोषक प्रमाण उपनिषदों में मिल ही गए हैं । इसका प्रसिद्ध उदाहरण– “ यमेवैष लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्” ( मुण्डक 3.2.3 ) जैसे अन्य मंत्र भी हैं । वृणुते तेन उपनिषद् साहित्य का एक आकर्षक तत्त्व उसमें दिए हुए उदाहरण और उसमें समानंहैं । जीवात्मावृक्षं परिषस्वजातेऔर परमात्मा। तयोरन्यका स्वरूप: पिप्पलंबतातीस्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्योहुई उपनिषद् कहतीअभिचाकशीतिहै- "द्वा सुपर्णाआयीसयुजाहुई सखायाउपमाएँ ( 1.3.1 ), (4.6 ) (3.1.1 ) - ” अर्थ यह हैमेंकिश्वेताश्वतर“एक ही वृक्ष परमें सुन्दरऔर मुण्डकपंखवाले दो पक्षी (मेंजीवात्माइस )प्रकार तीन बार ॥ आयायहहै मंत्र। इसकाकठ मीठे फल खाता है और दूसरा पक्षी ( परमात्मा ) न खाते हुए साक्षी भावबैठे हैं । एक पक्षी वृक्ष के खट्टे- के ध्यान के सम्बन्ध में मुण्डक- उपनिषद् में धनुष और बाण की सुन्दर से देखता रहता है । ” आत्मा में इस विश्व की ऊर्ध्वमूल और अवाक्शाखी अश्वत्थ से समानता उपमा दी गई है तो कठोपनिषद् उत्पत्ति समझाने के लिए मुण्डकोपनिषद् में मकड़ी के मुँह दिखाई गई है । ब्रह्म, से विश्व की| - उगते हुए रोम बाल आदि का उदाहरण दिया गया है से निकले हुए जाल और हमारे शरीर में द्वारवाले नगर से की गई है ( 5.1 ) । ईशावास्योपनिषद्। कठोपनिषद्में सूर्य में मानव शरीर की समानता ग्यारह के गोले की सत्यरूप परमात्मा को
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( 25 ) आवृत करनेवाले सोने के पात्र के साथ समानता दिखाई गई है ( 15 ), कठोपनिषद् में शरीर की रथ के साथ, इन्द्रियों की घोड़ों के साथ, मन की लगाम के साथ, बुद्धि की सारथि के साथ और आत्मा की रथ के स्वामी के साथ उपमा दी गई है ( 3.3.4 ) । मुण्डक ने भी ब्रह्म से विश्व की उत्पत्ति के विषय में पूर्वोक्त मकड़ी के जाल के साथ- साथ शरीर में उगते हुए रोम-बालों और औषधियों के उगने का उदाहरण प्रस्तुत किया है ( 1.1.7 ) । मुण्डकोपनिषद् ने वैदिक यज्ञों की अदृढ ( टूटी हुई) नौकाओं से तुलना करके उन्हें मुक्ति देने में असफल बताया है ( 1.2.7 ) । उसी उपनिषद् में आत्मा का ब्रह्म के साथ सायुज्य को समझाने के लिए नदियों और सागर का उदाहरण दिया गया है । जैसे बहती हुई नदियाँ सागर से मिलकर अपना अस्तित्व खो देती हैं, वैसे जीव भी ब्रह्म से मिलकर अपना जीवत्व खो देता है ( 3.2.8 ) । बृहदारण्यक उपनिषद् में तो उपमाओं की भरमार ही है । उसमें कहा है कि—‘ जैसे आर्द्र ईंधन को जलाने से धुआँ पैदा होता है, वैसे ही ब्रह्म से वेद निकल पड़े । ' ( 2.4.10 ), और भी 'जैसे चक्र की नाभि में अरे जड़े हुए होते हैं, ठीक उसी प्रकार सभी प्राणी भी परमात्मा के आधार पर ही हैं । ' ( 2.5.15 ) । हमारा आत्मा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति में आया-जाया करता है, इसे समझाने के लिए उपनिषद् ने सरोवर में एक किनारे से दूसरे किनारे तक तैरती हुई मछली का उदाहरण दिया है (4.3.18 ) । जब कोई मरता है तो वह बाद का सूक्ष्म शरीर कैसे पकड़ता है? इसका उदाहरण देते हुए उपनिषद् कहती है कि- 'जैसे घास का कीड़ा एक पत्ते से नजदीक के पत्ते को आसानी से पकड़ लेता है, वैसे ही मरता हुआ आदमी पहले को बिना छोड़े ही बाद सूक्ष्म शरीर को पकड़ लेता है' ( 4-4-3 ) । मुक्त आदमी के शरीर- त्याग की प्रक्रिया को साँप की त्वचा- त्याग के साथ तुलना करके बताया गया है । सामान्य मर्त्य आदमी के शरीर त्याग को टूटे - फूटे और बोझिल वाहन की यात्रा को दयाजनक स्थिति के समान बताया गया है (4.3.35 ) । उपनिषदों में कथाएँ सामान्यतया उपनिषदें तत्त्वज्ञान की बोधक हैं, फिर भी अपने तत्त्वज्ञान के अनुषंग में कुछ रमणीय और प्रेरक कथाएँ भी उपकारक ढंग से कहती रहती हैं । केन उपनिषद् में कहा गया है कि— स्वर्ग के देवलोग इन्द्र के नेतृत्व में किस तरह यक्षरूपधारी ब्रह्म के द्वारा उपदिष्ट हुए थे ( 3.1.11 ) । कठोपनिषद् का बहुत अंश तो यमराज और नचिकेता की कथा से ही भरा है । छान्दोग्योपनिषद् में भी अनेक कथाएँ वर्णित हैं — श्वानों का उद्गीथगान ( 1.12 ), रैक्व से जानश्रुति का उपदेश ग्रहण करना (4.1.3 ), सत्यकाम जाबाल के ज्ञानप्राप्ति के लिए हरिद्रुमत के पास गमन की कथा ( 4-4-9 ), सत्यकाम और उपकोसल की कथा ( 4.10-15 ), गर्विष्ठ श्वेतकेतु और उसके नम्र पिता गौतम और राजा प्रवाहण जैवलि की कथा ( 5.3-10 ), सनत्कुमार का नारद को उपदेश ( 7.1-26 ), आत्मज्ञान के लिए इन्द्र और विरोचन का प्रजापति के प्रति गमन ( 8.7-12 ) आदि । बृहदारण्यकोपनिषद् में भी कथाओं की कमी नहीं है । इसमें भी देव- दानवों का एक- दूसरे को हराने के लिए संघर्ष, ( 1.3 ), गर्विष्ठ बालाकि और अजातशत्रु की कथा ( 2.1 ), ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी और याज्ञवल्क्य की रसप्रद सुप्रसिद्ध कथा (2.4 और 4.5 ), राजा जनक और याज्ञवल्क्य ( अध्याय 3 और 4 ) आदि हैं । ये कथाएँ बड़ी रोचक, प्रेरक और विषयपोषक होने से उपनिषदों को पढ़ते समय तत्त्वज्ञान का मानसिक बोझ हल्का-सा कर देती हैं ।
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(26 ) उपनिषदों के चिन्तक उपनिषदों का अवलोकन करने से ऐसा मालूम होता है कि तत्त्वविद्या के सम्बन्ध में प्रथम चिन्तन आधिभौतिक दृष्टि से हुआ था । इसके बाद आधिदैविक और बाद में आध्यात्मिक दृष्टिकोण से तत्त्व- चिन्तन होने लगा था । अधिभूत दृष्टिबिन्दु में जगत् के अधिकरण के अनेक नाम दिए जाते थे । असत् ( अव्यक्त ), सत्, सत्य, ऋत, अक्षर आदि नाम हैं, पर अन्त में ब्रह्मतत्त्व नाम में उन नामों का पर्यवसान हुआ । उसं ब्रह्म की विश्वालीन - विश्वोत्तीर्ण सत्ता को 'परब्रह्म' कहा गया और उसकी विश्वान्तर्गत- विश्वमय सत्ता को 'अपरब्रह्म' नाम दिया गया गया । ये सब अधिभूत चिन्तक ब्रह्म की परत्व सत्ता की अपेक्षा उसके अपर अस्तित्व पर ज्यादा जोर देते थे । क्योंकि जहाँ तक उपासना का सम्बन्ध है- ' परब्रह्म' की अपेक्षा 'अपरब्रह्म' ही अधिकांश रूप में उपास्य हो सकता है । उपनिषदों के इन अधिभूत चिन्तकों में शाण्डिल्य और श्वेतकेतु के पिता उद्दालक आरुणि अपने कुछ मौलिक विचार बताते हैं । शाण्डिल्य की तो एक अपनी विद्या - उपासना- पद्धति ही छान्दोग्योपनिषद् में दी गई है । विश्व की ब्रह्ममयता समझाने के लिए ' तज्जलान्' रूप रहस्यमंत्र की उपासना उन्होंने बताई है । तज्ज = उसमें से जन्मता है, तल्ल = उसमें लय होता है । और तदन् = उससे जीता है— इन तीनों का समन्वय ही ब्रह्म है । और भी — अधिभूत दृष्टिकोण से कहा गया है कि—– “ यह पुरुष यज्ञमय - कर्ममय है । इस लोक ( ), में जैसे यज्ञवाला कर्मवाला होता है मरण के बाद ऐसा ही होता है । इसलिए कर्मनिष्ठपुरुष होना चाहिए । स्वरूप से यह पुरुष मनोमय प्राणरूप शरीरवाला, ज्योतिरूप, सत्यसंकल्पपुरुष को, आकाशात्मा, सर्वकर्मकर्ता, कार्यसिद्धिकर्ता, सर्वगन्ध, सर्वरस है । " संक्षेप में तात्पर्य यह है कि यह पुरुष बाह्य जगत् में ही प्रविष्ट है । ऋषि और आगे कहते हैं कि- " वह अक्षुब्ध है, इन्द्रियातीत है, वह मेरा आत्मा हृदयस्थ भी है । वह यव आदि अन्न के दाने से भी छोटा है, और साथ ही साथ पृथ्वी और आकाश से बड़ा भी है । स्वर्गादि सभी लोकों से बड़ा है । सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध --,,, सर्वरस संक्षेप में जो समस्त विश्वरूप आत्मा है वही हृदयस्थ अक्षुब्ध वागादिशून्य है ब्रह्मरूप होऊँगा' – जिसे यह निश्चय हुआ है, और वही ब्रह्म है । ‘ इस देह को छोड़ने के बाद मैं" है और उसे कोई शंका नहीं होती है । वह सत्यनिष्ठ शाण्डिल्य के उपर्युक्त अवतरण से यह स्पष्टरूप से समझमें आ जाता है कि वे जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय के कारण को ही ब्रह्मरूप में मानते हैं । यह अधिभूत दृष्टिकोण है और अन्य उद्दालक आदि द्रष्टा महर्षि इसी अधिभूत दृष्टिकोण से चिन्तन करनेवालों में हैं। शाण्डिल्य। उपर्युक्त कथन से यह स्पष्ट है कि श्वेतकेतु के पिता उद्दालक आरुणि थे । उन्होंने उपदेश के प्रारंभ में ही अपने पुत्र श्वेतकेतु को ऐसा समझाया इसी कोटि के चिन्तक ब्रह्म जगत्कारण है | उसने जगदाकार होने की कामना की और क्रमशः था कि एक ही सद्रूप अद्वितीय तेज (जल) पृथ्वी रूप जगत् में मूल सत् तत्त्व जीवरूप से प्रविष्ट हुआ यहऔरजगत् उत्पन्न हुआ । उस निर्माण का विस्तार से वर्णन किया है । इस प्रकार क्रमशः सृष्टि आरुणि उद्दालक की बताई हुई इस लम्बी- चौड़ी सृष्टि-स्थावर- जंगम सभी पदार्थों का निर्देश करके पिण्डस्थ आत्मा कोप्रक्रियाब्रह्माण्डमें भी ब्रह्मतत्त्व से आविर्भूत के आत्मा के साथ अभिन्न बताया गया है ।
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(27) इस प्रकार शाण्डिल्य और आरुणि- दोनों द्रष्टाओं के चिन्तन का प्रारंभ अधिभूत दृष्टिकोण से ही हुआ है, अर्थात् बाह्य जगत् के अवलोकन से ही उनके चिन्तन का उदय हुआ है । और बाद में वह अध्यात्म में परिणत (पर्यवसित) होता है । इस दृष्टिकोण में सृष्टि की स्वीकार्यता है, उसी से दृष्टि का उदय हुआ है । अधिभूत सृष्टि के समूह को 'विराट' नाम दिया गया है । उपनिषदों के कुछ चिन्तकों के चिन्तन का प्रारंभ देवता से होता है । उन्हें अधिभौतिक चिन्तक कहा जाता है । यह औपनिषदिक चिन्तन का दूसरा प्रकार है । श्रौत वाङ्मय में देवता शब्द का अर्थ मन, बुद्धि, प्राण तथा उसका समस्त विस्तार- ऐसा होता है । सभी इन्द्रियरूप देवों का समूह स्थूल शरीर का चालक है और उन इन्द्रियों की उपकारक सामग्री ब्रह्माण्ड से उस- उस इन्द्रिय के प्रेरक तत्त्व से मिलती है । ये प्रेरक तत्त्व भी देवता कहे जाते हैं । जैसे याज्ञवल्क्य काण्ड में प्राण ब्रह्मवादी के दृष्टिकोण से पहले तैंतीस देवताओं की कल्पना थी, फिर मुनि याज्ञवल्क्य ने उन तैंतीस का छः में अन्तर्भाव किया, फिर छः का तीन में और तीन का दो में तथा दो का एक ही मुख्य प्राणदेवता में अन्तर्भाव कर दिया है | यह मूल प्राणदेवता, मुख्य और गौण-इन दो रूपों में माना गया है । गौण प्राण इन्द्रियों को कहा जाता है और मुख्य प्राण संजीवनी शक्ति है । वही मुख्य प्राणरूप संजीवनी शक्ति गौणप्राण नामक इन्द्रियों को टिकाए रखती है । यह ठीक है कि श्वास-प्रश्वास मुख्य प्राण को अभिव्यक्त करनेवाली क्रिया है, परन्तु वास्तविक प्राण तो क्रियाप्रेरक एक स्वतंत्र तत्त्व ही है । गौणप्राणरूप इन्द्रियाँ पापों से आहत हो सकती हैं, पर मुख्य प्राण पाप से अस्पृष्ट ही रहता है । गौण प्राणों को 'रुद्र' कहा गया है । ये रुद्र ग्यारह हैं । पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक अंत: करण मिलकर ये ग्यारह रुद्र हैं । ये ग्यारह गौण प्राण अथवा रुद्र शुभाशुभ कर्मों के संपर्क में आकर स्वयं शुभाशुभ बनते हैं, पर मुख्य प्राण दोनों से परे रहता है । इसीलिए अधिदैव चिन्तक उसे ' सूत्रात्मा ' ऐसा नाम देकर प्रशस्त करते हैं । उपनिषदों में इस प्रकार का अधिदैव चिन्तन हमें प्रश्नोपनिषद् में पिप्लाद मुनि के छः शिष्यों को दिए गए उत्तरों में मिलता है और अपने को विद्वान् मानने वाले शाकल्य के याज्ञवल्क्य के साथ किए गए विवाद में भी मिलता है । ये अधिदैव चिन्तक स्थूल सृष्टि के जीवनदायक प्राणब्रह्म के दो स्वरूपों को मानते हैं - एक पिण्ड है और दूसरा ब्रह्माण्ड । वे कहते हैं कि पिण्ड में हृदय और ब्रह्माण्ड में आदित्यमण्डल प्राण की विशेष कला के स्थान हैं । इन दो स्थानों में प्राण विशेष ज्योतिरूप से जाग्रत् होता है और अन्य अधिभूत सृष्टि में वह सोया-सा रहता है । परन्तु है तो वह अणु- अणु में व्याप्त ही । इसलिए बाद में उसको ‘ हिरण्यगर्भ' ऐसा नाम दिया गया । उपनिषदों का पूरा उपासना काण्ड जो अनेक विद्याओं के नाम से प्रसिद्ध हुआ है, वह इस अधिदैव चिन्तन प्रकार के साथ ही सम्बन्ध रखता है । परन्तु, उपनिषदों के चिन्तक इन आधिभौतिक और आधिदैविक चिन्तन से भी आगे जाकर अन्त में आध्यात्मिक चिन्तन में अपने चिन्तन की चरम सीमा देखने लगे थे और अन्त में ही उस चिन्तन की परिसमाप्ति हुई है, ऐसा लगता है । इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि उनकी बताई भूतसृष्टिहै । ( अधिभूत ) और प्राणसृष्टि ( अधिदेव ) में चिन्तन है ही नहीं । अवश्य ही उन दोनों प्रकार में चिन्तनके चिन्तन इतना ही नहीं, भावि दर्शनशास्त्रों के बीज भी उन दृष्टिकोणों में निहित हैं । तथापि उपनिषदों की पराकाष्ठा तो आध्यात्मिक ही है ।
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( 28 ) अधिभूतवादियों का ब्रह्म विराट् विश्वशरीर में व्यापक है और अधिदेववादी का ब्रह्म भूतसृष्टि का चालक प्राणसृष्टि में सूत्रात्मा या हिरण्यगर्भ है । पर अध्यात्मवादी के अनुसार ये दोनों विकारी और छायारूप ही हैं । इन दोनों को यदि सत्य माना जाय तो उन दोनों के परे जो अविकारी है उसे 'सत्यस्य सत्यम्' ही कहना चाहिए और उसे ही अध्यात्मवादी पारमार्थिक सत्य मानते हैं । मूर्तामूर्तरूप अपर ब्रह्म से भी ऊपर ‘ परब्रह्म' ही अध्यात्मवाद का परमार्थ सत् तत्त्व है, और यह असीम ( अनन्त) है, सीमित नहीं । ‘ योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽहम्' ऐसा स्पष्ट रूप से ही अध्यात्मवादी के लिए कहा गया है । अध्यात्म चिन्तक के मत में भूतात्मदर्शी तो शोचनीय और कृपण ही है, प्राणात्मदर्शी ( अधिदेवचिन्तक ) थोड़ा बुद्धिमान है और इसलिए पारलौकिक सुख भोग लेता है, पर ब्रह्मात्मवादी तो यहाँ जीते जी ब्रह्मभाव भोगता है । इसी परमतत्त्व की खोज करना उपनिषदों के चिन्तन का अन्तिम लक्ष्य है । इस चिन्तन के उच्चतम आसन पर आरूढ होने वाले परम ऋषि द्रष्टा याज्ञवल्क्य हैं । बृहदारण्यकोपनिषद् में शाकल्य के सभी प्रश्नों का उत्तर देने के बाद जब याज्ञवल्क्य ने शाकल्य से उपनिषद्गम्य पुरुष के बारे में पूछा तब शाकल्य मौन रह गया । उपनिषद् की भाषा में वह मरण को प्राप्त हो गया । तब अन्त में याज्ञवल्क्य मर्म वचन कहते हैं- " यह पुरुष महावृक्ष- सा है, पत्ते उसके लोम हैं, छिलका उसकी त्वचा है, छिलके के छिद्र से जैसे रस झरता है, वैसे पुरुष की मेद से लहू निकलता है | वृक्ष की ग्रन्थियों जैसी पुरुष की मांसपेशियाँ होती हैं, वृक्ष की लकड़ीत्वचा के दिखाई देने वाली शिराएँ जैसे पुरुष के स्नायु हैं । वृक्ष के कठिन भाग जैसी पुरुष में -, - -, के आते जाते उगते झरते पत्तों की तरह ही पुरुष के जन्मते नष्ट होते रहते की हड्डियाँ वृक्ष से जन्मता है— यह कहना नहीं चाहिए । जन्म के बाद कैसे यह जन्मेगा अणु? ---हैंपुरुष। यह पुरुष वीर्य चिन्मय और आनन्दमय है । वह ब्रह्म है... वह स्वयं जीता है और अन्य को जिलाता का मूल तो है । ” इन्हीं तीन चिन्तनधाराओं में भारत के भावि दार्शनिक विकास की अर्थात् पड़ी हुई है । दर्शनशास्त्रों की नींव उपनिषत्कालीन चिन्तक अब तो केवल नामावशेष ही रहे हैं । आज ( - ) जानते हैं कि अमुक विद्या उपासना पद्धति के द्रष्टा अमुक मुनि या तो हम केवल इतना ही शाण्डिल्य, प्रवहण, जैवलि और उद्दालक आरुणि के नाम इतिहास-ऋषि थे । अधिभूत चिन्तकों में अधिदैव चिन्तकों में पिप्पलाद मुनि का मुख स्थान है । बालाकि और सागर के तीर पर आरूढ हैं । देता है, पर निष्ठा नहीं दीखती है । अध्यात्म चिन्तकों में याज्ञवल्क्य शाकल्य में पाण्डित्य तो दिखाई से आदि शंकराचार्य से पहले यदि कोई भी अध्यात्मविद्या में मुनि शीर्षस्थानीय हैं । हमारे विचार केवल योगीश्वर याज्ञवल्क्य ही हैं । उनका विचार स्वातंत्र्य, स्वतंत्र श्रौत चिन्तक हुआ है, तो वह शक्ति, उनका परिपक्व अनुभव– ये सब उन्हें सभी उपनिषद्उनका अद्भुत मनः संयम, उनकी निरीक्षण-तदुपरान्त अन्य ऋषियों में अंगिरा, भृगु, गार्गी, घोर आंगिरस विचारकों में सूर्य का स्थान देते हैं । रैक्व, सनत्कुमार, सत्यकाम जाबाल, वामदेव, वरुण आदि के, हरिद्रुमतनाम, महीदास, ऐतरेय, नारद, लिए जा सकते हैं । यह ठीक है कि उपनिषद् के ऋषियों में हम गौतम श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में, श्वेतकेतु आदि को श्रेष्ठ अनुशासक, आरुणिरूप, प्रजापति, प्रवहण, यम आदि को में और अन्यान्यों को अपनी- अपनी