Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 121–130
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 121–130
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वैतथ्यप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 79 विशेषता ( भेद ) केवल यही है कि भीतर के पदार्थ अन्तरिन्द्रिय द्वाराऔर बाहर के पदार्थ बाह्येन्द्रिय के द्वारा काम में लाये जाते हैं ।
जीवं कल्पयते पूर्वं ततो भावान्पृथग्विधान् ।
बाह्यानाध्यात्मिकांश्चैव यथाविद्यस्तथास्मृतिः ॥16 ॥
वह चैतन्यात्मा सबसे पहले जीव की कल्पना करता है और बाहरी और भीतरी पदार्थों की कल्पना करता है । ( अर्थात् चैतन्यकल्पितबाद जीवमें वह जीव तरह- तरह के कर्ता- सुखी- दुःखी आदि हूँ' । ) इसके बाद वह जीव शब्दादि बाह्य पदार्थों की भीही सोचता है कि ‘मैं यह प्रस्तुत जीवात्मा अपनी कल्पना के अनुसार बाह्य और भीतरी पदार्थों का अनुभवकल्पनाकर सकताकरता है । है ।
अनिश्चिता यथा रज्जुरन्धकारे विकल्पिता ।
सर्पधारादिभिर्भावैस्तद्वदात्मा विकल्पितः ॥17 ॥
किसी अन्धकारमय स्थान में आप देखते हैं तो रज्जु को, फिर भी आप यह निश्चय नहीं कर पाते कि यह रज्जु ही है | आप समझ रहे हैं कि यह तो साँप है या तो जल की धारा है या और कुछ है । ये सब भ्रम हैं । तो इसी प्रकार जब आप विश्वात्मा (विश्वचैतन्य ) को कर्ता के रूप में देखते हैं या उसे सुखी-दुःखी जीव के रूप में देखते हैं, वह आपका भ्रम ही है ।
निश्चितायां यथा रज्ज्वां विकल्पो विनिवर्तते ।
रज्जुरेवेति चाद्वैतं तद्वदात्मविनिश्चयः ॥18 ॥
जिस प्रकार उस भ्रम में ' यह तो रज्जु ही है' –इस प्रकार से रज्जु का स्वरूप निश्चित हो जाता है और विकल्प ( भ्रम) चला जाता है, उसी प्रकार आत्मा- सम्बन्धी निश्चय के विषय में भी होता है । जब आत्मा के सच्चे स्वरूप के बारे में निश्चित रूप से ज्ञान हो जाता है, तब जीव आदि विकल्प ( भ्रम ) सब नष्ट हो जाते हैं, तब केवल अद्वैत आत्मा ही प्रतीत होता है ।
प्राणादिभिरनन्तैस्तु भावैरेतैर्विकल्पितः ।
मायैषा तस्य देवस्य ययायं मोहितः स्वयम् ॥19 ॥
आत्मा तो अद्वय है । फिर वह प्राणादि रूपों में अलग- अलग क्यों दिखाई देता है? इसका कारण यह माया है ( आत्मा की अनिर्वचनीय शक्ति है ) । हमारे द्वारा देखे जाने वाले अनेक विषय तो भ्रमरूप ही हैं । यह अद्वैत आत्मा ही अपनी विशिष्ट शक्ति से मोहित हो जाता है ।
प्राण इति प्राणविदो भूतानीति च तद्विदः ।
गुणा इति गुणविदस्तत्त्वानीति च तद्विदः ॥20 ॥
जो लोग प्राण ( जीवनीशक्ति = हिरण्यगर्भ) की उपासना करते हैं, वे मानते हैं कि हिरण्यगर्भ ही आत्मा ( परमार्थतत्त्व) है । (वैशेषिक लोग ऐसे ईश्वर को विश्व के कर्ता के रूप में मानते हैं ) जो लोग भौतिकवादी हैं ( जिन्हें लौकायतिक चार्वाक कहा जाता है ) वे चार भूतों को ही जगत् का घटक (परमार्थतत्त्व) मानते हैं । जो लोग सांख्यमतानुयायी हैं, वे गुणों को ( सत्त्व, रजस् और तमस् को) ही परमतत्त्व ( आत्मा) के रूप में मानते हैं और जो शैव हैं, वे तीन तत्त्वों को ( शिव, अविद्या और आत्मा को ) मूल परमार्थतत्त्व ( आत्मा ) के रूप में मानते हैं ।
पादा इति पादविदो विषया इति तद्विदः ।
लोका इति लोकविदो देवा इति च तद्विदः ॥21 ॥
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80 उपनिषत्सञ्चयनम् जो लोग आत्मा के पादों को (अंशों को = अवस्थाओं को ) ही मानते हैं, वे विश्व, तैजस और प्राज्ञ को (जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के अभिमानी आत्मा को ) आत्मा के अंशों को ही पूरा आत्मस्वरूप मान लेते हैं । वात्स्यायन जैसे विषयज्ञ कुछ लोग शब्द- स्पर्शादि विषयों को ही आत्मा के रूप में मानते हैं । केवल सांसारिक लोग दुनिया के व्यवहार को ( संसार को ) ही सब कुछ परमतत्त्व के रूप में मानते हैं । ( अथवा तो लोकविद् भूः, भुवः स्वः आदि लोकों को ही आत्मरूप में मानते हैं ) । ऐसे अन्य भी लोग हैं जो देव-देवियों को ( अनेक देवों को ) मानते हैं और उन देवों को ही विश्व का मूलस्रोत ( आत्मा) मान लेते हैं ।
वेदा इति वेदविदो यज्ञा इति च तद्विदः ।
भोक्तेति च भोक्तृविदो भोज्यमिति च तद्विदः ॥22 ॥
वेदों में निष्ठा रखने वाले ( वैदिक ) लोग वेदों को ही आत्मा ( परमतत्त्व ) मानते हैं । यज्ञों का अनुष्ठान करनेवाले लोग यज्ञ को ही आत्मा (परमतत्त्व) मानते हैं और जो भोक्तृभाववाले हैं वे भोक्ता को और जो स्वादपरस्त हैं वे पांचक आदि लोग स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों को ही सबसे श्रेष्ठ ( परमतत्त्व ) आत्मा के रूप में मान लेते हैं ।
सूक्ष्म इति सूक्ष्मविदः स्थूल इति च तद्विदः ।
मूर्त इति मूर्तविदोऽमूर्त इति च तद्विदः ॥23 ॥
कुछ लोग कहते हैं कि आत्मतत्त्व सूक्ष्म ( अणु - परमाणु) है, तो कुछ लोग कहते हैं कि वह तो स्थूल है । कुछ मूर्तविद् ( सगुणोपासक) उसे मूर्त बताते हैं तो कुछ लोग उसे अमूर्त कहते हैं ।
काल इति कालविदो दिश इति च तद्विदः ।
वादा इति वादविदो भुवनानीति तद्विदः । 24 ॥
कालोपासक ज्योतिषी लोग उसे कालस्वरूप कहते हैं, जबकि दिशाएँ जाननेवाले स्वरोदय वाले उसे दिशारूप कहते हैं । यंत्र- तंत्र- धातु आदि वाद वाले लोग उसे अपने- अपने वाद के अनुकूल परम सत्य मान लेते हैं । भुवनों को माननेवाले उसे भुवन के रूप में परमतत्त्व मानते हैं ।
मन इति मनोविदो बुद्धिरिति च तद्विदः ।
चित्तमिति चित्तविदो धर्माधर्मौ च तद्विदः ॥25 ॥
मन को जाननेवाले मानसशास्त्री उसे मन के रूप में, बुद्धि में रचे- बसे लोग उसे चित्त को जाननेवाले उसे चित्तरूप में और धर्माधर्म ( पाप- पुण्य ) को माननेवाले उसे उसी रूपबुद्धिरूपमें मानतेमें, हैं । ( जैसी जिसकी समझ होती है, वह उसी प्रकार उस परमतत्त्व को जानता है ) ।
पञ्चविंशक इत्येके षड्विंश इति चापरे ।
एकत्रिंशक इत्याहुरनन्त इति चापरे ॥2611
कुछ लोग ( सांख्यादि) इस सृष्टि को पच्चीस तत्त्वों वाली मानते हैं । पतंजलि सत्य सृष्टि के छब्बीस तत्त्व मानते हैं । कुछ लोग इकत्तीस तत्त्व मानते हैं और कुछ के अनुयायी इसमानते हैं । लोग असंख्य तत्त्व
लोकाँल्लोकविदः प्राहुराश्रमा इति तद्विदः ।
स्त्रीपुंनपुंसकं लैङ्गाः परापरमथापरे ॥27 ॥
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वैतथ्यप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 81 व्यवहारदक्ष लोग तो लोकव्यवहार को ही परमतत्त्व मान लेते हैं । आश्रमों के आग्रही लोग आश्रमों को, लिङ्गवादी लोग स्त्री- पुरुष को एवं नपुंसक को तथा कुछ लोग कारणब्रह्म को और कुछ कार्यब्रह्म को परमतत्त्व ( आत्मा) मानते हैं ।
सृष्टिरिति सृष्टिविदो लय इति च तद्विदः ।
स्थितिरिति स्थितिविदः सर्वे चेह तु सर्वदा ।28 ॥
सृष्टि को सत्य माननेवाले सृष्टि को, प्रलय को माननेवाले प्रलय को और स्थिति को मानने वाले स्थिति को आत्मा मानते हैं ( अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु या महेश को परमतत्त्व मानते हैं ) ।
यं भावं दर्शयेद्यस्य तं भावं स तु पश्यति ।
तं चावति स भूत्वाऽसौ तद्ग्रहः समुपैति तम् ॥29 ॥
गुरु शिष्य को जिस भाव को ( आदर्श को ) परमतत्त्व का रूप बताते हैं, उसी भाव ( आदर्श पदार्थ) को शिष्य परमतत्त्व के रूप में देखता है और वह भाव (आदर्श - पदार्थ ) भी शिष्यरूप होकर उसकी रक्षा करता है वह भाव उसे जोर से पकड़े रहता है और वह भाव उसे बहुत ही अनुकूल हो जाता है ।
एतैरेषोऽपृथग्भावैः पृथगेवेति लक्षितः ।
एवं यो वेद तत्त्वेन कल्पयेत्सोऽविशङ्कितः ॥ 30 ।
इन सभी पदार्थरूप विकल्पों का एकमात्र आधाररूप आत्मा उन पदार्थों से भिन्न है ही नहीं । फिर भी भिन्न रूप से केवल मूर्ख लोगों को दिखाई ही दे रहा है । जो व्यक्ति इस बात को जान लेता है, वह पदार्थों की यथेच्छ कल्पना करे तो भी उसका कुछ बिगड़ता नहीं ।
स्वप्नमाये यथा दृष्टे गन्धर्वनगरं यथा ।
तथा विश्वमिदं दृष्टं वेदान्तेषु विचक्षणैः ॥31 ॥
जिस प्रकार स्वप्न और जादू दिखाई देते हैं, जैसा गंधर्वनगर दिखाई देता है वैसा ही इस जगत् का दर्शन बुद्धिमानों ने वेदान्त में किया है ।
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः ।
न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥32 ॥
कोई नाश ( प्रलय ) नहीं है, कोई उत्पत्ति भी नहीं है, कोई बद्ध भी नहीं, न ही कोई साधक ही है, कोई मुमुक्षु भी नहीं है और काइ मुक्त भी नहीं है— यही पारमार्थिकता है ।
भावैरसद्भिरेवायमद्वयेन च कल्पितः ।
भावा अप्यद्वयेनैव तस्मादद्वयता शिवा ॥33 ॥
यह आत्मा प्राणादि मिथ्या भावों से अद्वय रूप से भी कल्पित होता है और ये भाव भी अद्वय ( आत्मा) के द्वारा ही कल्पित होते हैं । इसलिए अद्वैत ही मंगल है ।
नात्मभावेन नानेदं न स्वेनापि कथंचन ।
न पृथङ् नापृथक्किञ्चिदिति तत्त्वविदो विदुः ॥ 34 ॥
6 उ० प्र०
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82 उपनिषत्सञ्चयनम् यह सब कुछ आत्मस्वरूप से भिन्न नहीं है । नामरूपात्मक जगत् स्वप्रकाश आत्मा से वास्तव में अलग नहीं है | कोई अलग नहीं, कोई अभिन्न नहीं, ऐसा ही तत्त्वज्ञानी लोग जानते हैं ।
वीतरागभयक्रोधैर्मुनिभिर्वेदपारगैः ।
निर्विकल्पो ह्ययं दृष्टः प्रपञ्चोपशमोऽद्वयः ॥ 35 ॥
वेदों के पारंगत, आसक्ति, भय और क्रोध से रहित मुनियों ने इस अपरिवर्तनशील, अभिन्न, संसार का उपशमन करने वाले, अद्वैत आत्मतत्त्व को देखा है ।
तस्मादेवं विदित्वैनमद्वैते योजयेत्स्मृतिम् ।
अद्वैतं समनुप्राप्य जडवल्लोकमाचरेत् ॥36 ॥
अत: इस आत्मा का ऐसा अभेदरूप जानकर चित्त को अद्वैतभाव में जोड़ना चाहिए | अद्वैतभाव को ठीक तरह से अपनाकर संसार में जड़वत् ( बुद्ध की तरह ) होकर के आचरण करना चाहिए ।
निःस्तुतिर्निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च ।
चलाचलनिकेतश्च यतिर्यादृच्छिको भवेत् ॥137 ॥
इस यति को न किसी की स्तुति चाहिए, न नमस्कार । उसके लिए कोई श्राद्ध -क्रिया भी नहीं है । वह शरीर को चल ( विनाशी ) और आत्मा को अचल ( अविनाशी ) जानता है । ऐसा मुनि परिस्थिति अनुकूल आचरण करता है । ( वह मुनि स्वयं किसी की खुशामद नहीं करता, किसी को प्रणाम नहीं करता - ऐसा. अर्थ भी लिया जा सकता है ) ।
तत्त्वमाध्यात्मिकं दृष्ट्वा तत्त्वं दृष्ट्वा तु बाह्यतः ।
तत्त्वीभूतस्तदारामस्तत्त्वादप्रच्युतो भवेत् ॥38 ॥
शरीर के आन्तरिक भागों एवं बाह्य जगत् का तत्त्व—दोनों को सही रूप में अच्छी तरह से जानकर स्वयं तत्त्वरूप बना हुआ और तत्त्व में ही रममाण पुरुष की स्थिति तत्त्व में ही अचल हो जाएगी । वैतथ्य--प्रकरण समाप्त । अद्वैतप्रकरणम्
उपासनाश्रितो धर्मो जाते ब्रह्मणि वर्तते ।
प्रागुत्पत्तेरजं सर्वं तेनासौ कृपणः स्मृतः ॥1 ॥
उपासना पर आश्रित धर्म तो कार्यब्रह्म (जीव ) में ही हो सकता है । वह उपासक कार्यब्रह्म ( जगत् को) उत्पत्ति के पहले ( जगत् रूप भ्रम उत्पन्न होने से पहले ) सब ब्रह्मरूप था, ऐसा मानता को ( पर अब उपासना काल में तो वह उत्पन्न हुआ ही है, ऐसा भ्रम चालू ही है न? ) इसलिए ऐसाहै । उपासक कृपण माना जाता है ।
अतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमजाति समतां गतम् ।
यथा न जायते किञ्चिज्जायमानं समन्ततः ॥ 2 ॥
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अद्वैतप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 83 इसलिए मैं अब ब्रह्म का स्वरूप कहूँगा । जो ब्रह्म समान रूप से सर्वत्र व्याप्त है, जिसका कभी जन्म नहीं होता । जिस किसी जन्म लिए हुए पदार्थ को तुम देखते हो, वह सब भ्रम ही है । (ब्रह्म जन्महीन है ) उत्पन्न होते देखे गए पदार्थ भी उत्पन्न नहीं होते ।
आत्मा ह्याकाशवज्जीवैर्घटाकाशैरिवोदितः ।
घटादिवच्च संघातैर्जातावेतन्निदर्शनम् ॥3 ॥
आत्मा तो आकाश की तरह निरवयव और निःसीम है, पर घटाकाशों की तरह जीवों के रूप में ‘ उत्पन्न’ हुआ है और घटादि की तरह ही देहादि संघातों से जन्मा-सा हुआ है । आत्मा की उत्पत्ति में यह एक उदाहरण है ।
घटादिषु प्रलीनेषु घटाकाशादयो यथा ।
आकाशे सम्प्रलीयन्ते तद्वज्जीवा इहात्मनि ॥4 ॥
जिस तरह घट आदि का नाश होने से घटाकाश का नाश नहीं होता, वह तो महाकाश में सम्पूर्णतया लीन हो जाता है । उसी तरह शरीर के चले जाने पर जीव नष्ट नहीं होते, अपितु यहाँ आत्मा में लीन हो जाते हैं ।
यथैकस्मिन्घटाकाशे रजोधूमादिभिर्युते ।
न सर्वे सम्प्रयुज्यन्ते तद्वज्जीवाः सुखादिभि: ।15 ॥
जैसे किसी एक घटाकाश में धूल- धुआँ आदि मिलने से, सभी घटाकाशों में तो कहीं ऐसा मिलन हो नहीं सकता न? ठीक उसी तरह एक जीव सुख या दुःख भोगता है, तो सभी जीव तो ऐसे भोगने वाले नहीं हो जाते | रूपकार्यसमाख्याश्च भिद्यन्ते तत्र तत्र वै 1 आकाशस्य न भेदोऽस्ति तद्वज्जीवेषु निर्णयः ॥ 6 ॥
घटादि उपाधियों के कारण प्रतीत होने वाले भिन्न -भिन्न आकाशों के रूप, कार्य और नाम में तो भेद पड़ जाते हैं, परन्तु उपाधिरहित स्वयं आकाश में तो कोई भेद उत्पन्न नहीं होता । उसी प्रकार जीवों का भी निर्णय करना चाहिए ।
नाकाशस्य घटाकाशो विकारावयवौ यथा ।
नैवात्मनः सदा जीवो विकारावयवौ तथा ॥7 ॥
जिस प्रकार घटाकाश, महाकाश का न तो विकार है और न तो कोई अवयव ही है, उसी प्रकार किसी भी समय में जीव आत्मा का विकार भी नहीं और अवयव भी नहीं है ।
यथा भवति बालानां गगनं मलिनं मलैः ।
तथा भवत्यबुद्धानामात्मापि मलिनो मलैः ॥8 ॥
जैसे बच्चों को बादल आदि से घिरा आकाश मैला मालूम होता है, वैसे ही अज्ञानियों को यह आत्मा क्रोध- लोभादि मलिनताओं से मैला मालूम पड़ता है ।
मरणे सम्भवे चैव गत्यागमनयोरपि ।
स्थितौ सर्वशरीरेषु आकाशेनाविलक्षणः ॥9 ॥
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84 उपनिषत्सञ्चयनम् यह आत्मा सभी शरीरों में मृत्यु, जन्म, परलोकगमन, पुनरागमन, स्थायी रहना आदि सभी बातों में आकाश से अविलक्षण ( आकाश जैसा ) ही है । अर्थात् उन सभी व्यवहारों में रहता हुआ भी वह आकाश की ही तरह व्यापक और विकारशून्य ही रहता है ।
सङ्घाताः स्वप्नवत्सर्वे आत्ममायाविसर्जिताः ।
आधिक्ये सर्वसाम्ये वा नोपपत्तिर्हि विद्यते ॥10 ॥
सभी देहादि संघात ( आत्मा की मायारूप) अविद्या शक्ति से ही स्वप्न की तरह बने हैं, ऐसा जानना चाहिए । उनमें से किसी को श्रेष्ठ मानने में या किसी को समान मानने में कोई तर्कसंगति नहीं है ।
रसादयो हि ये कोशा व्याख्यातास्तैत्तिरीयके ।
तेषामात्मा परो जीवः खं यथा सम्प्रकाशितः ॥11 ॥
तैत्तिरीय उपनिषद् में जो अन्नरसमय आदि कोशों का वर्णन किया गया है, उन सभी का निर्वहन करता हुआ भी यह आत्मा उनसे परे ( आकाश के समान व्यापक ) ही है, ऐसा वहाँ स्पष्ट कर दिया गया है ।
द्वयोर्द्वयोर्मधुज्ञाने परं ब्रह्म प्रकाशितम् ।
पृथिव्यामुदरे चैव यथाऽऽकाशः प्रकाशितः ॥12 ॥
जिस प्रकार पृथ्वी पर आकाश है, उसी प्रकार शरीर के भीतर उदर में भी वही आकाश है, उसी प्रकार यह ब्रह्म भीतर भी है और बाहर भी है ( सर्वत्र है ) । इस प्रकार भीतर- बाहर ( के युगलों में) आधिदैविक और आध्यात्मिक ( दो - दो में ) ब्रह्म के होने की बात बृहदारण्यकोपनिषद् के मधुब्राह्मण में कही गई है ।
जीवात्मनोरनन्यत्वमभेदेन प्रशस्यते ।
नानात्वं निन्द्यते यच्च तदेवं हि समञ्जसम् ॥13 ॥
जीव और आत्मा की अद्वयत्व के रूप में अभेद के निश्चय की प्रतीति हो और भेदभाव का तिरस्कार हो, यही बात प्रशंसनीय है ।
जीवात्मनोः पृथक्त्वं यत्प्रागुत्पत्तेः प्रकीर्तितम् ।
भविष्यद्वृत्त्या गौणं तन्मुख्यत्वं हि न युज्यते ॥14 ॥
पूर्व उपनिषदों में सृष्टि की उत्पत्त्यादि सम्बन्धी वाक्यों में जीव-ब्रह्म की बताई है, वह तो भावि कथन की अपेक्षा वाली होने से गौण है । यह कोई मुख्यभिन्नता ठीक तरह से नहीं है ।
मृल्लोहविस्फुलिङ्गाद्यैः सृष्टिर्या चोदितान्यथा ।
उपायः सोऽवताराय नास्ति भेद: कथञ्चन ॥15 ॥
मिट्टी, लोहा, चिनगारी आदि दृष्टान्तों के माध्यम से तरह- तरह है, वह तो केवल ब्रह्मात्मैक्य के दुर्बोध विषय में बुद्धि को प्रवेश करानेसे सृष्टि की उत्पत्ति समझायी गई -इनमें जरा सा भेद है ही नहीं । के लिए तर्क है । वास्तव में
आश्रमास्त्रिविधा हीनमध्यमोत्कृष्टदृष्टयः ।
उपासनोपदिष्टेयं तदर्थमनुकम्पया ॥16 ॥
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अद्वैतप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 85 शास्त्रों में जो कर्माधिकारानुसार हीन, मध्यम, उत्तम आश्रम- धर्म बताए हैं, वे धर्म (उपासनाएँ ) तो उन लोगों के ऊपर अनुकम्पा करने के लिए ही बताए हैं । (ज्ञान के अनधिकारियों के ऊपर कृपा की है, जिसमें वे उपासना करते - करते आगे बढ़ते हैं ) । (द्वैत तो अधिकार- भेद से अद्वैत की ओर जाने का एक सोपान ही है ) ।
स्वसिद्धान्तव्यवस्थासु द्वैतिनो निश्चिता दृढम् ।
परस्परं विरुध्यन्ते तैरयं न विरुध्यते ॥17 ॥
द्वैती लोग अपनी - अपनी सिद्धान्तयोजना में सुदृढ़ हैं । इसलिए परस्पर झगड़ते हैं । पर इस अद्वैती का तो किसी से भी विरोध नहीं है ।
अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं तद्भेद उच्यते ।
तेषामुभयथा द्वैतं तेनायं न विरुद्ध्यते ॥18 ॥
अद्वैत ही पारमार्थिक है, द्वैत तो उसके भेद कहलाते हैं । द्वैतियों का तो परमार्थ और अपरमार्थ—दोनों द्वैत ही है । पर द्वैत तो अद्वैत पर आधारित है, इसलिए द्वैतियों से हमारा ( अद्वैतियों का) कोई विरोध नहीं है ।
मायया भिद्यते ह्येतन्नान्यथाजं कथञ्चन ।
तत्त्वतो भिद्यमाने हि मर्त्यताममृतं व्रजेत् ॥19 ॥
अद्वैत में माया से ही भेद होता है । यह अजन्मा आत्मा कभी भी भिन्न नहीं हो सकता । क्योंकि यदि वास्तव में उसमें भेद हो जाए, तब तो ' अमृत' ही ' मर्त्य' हो जाएगा ।
अजातस्यैव भावस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः ।
अजातो ह्यमृतो भावो मर्त्यतां कथमेष्यति ॥20 ॥
जो कभी जन्मा ही नहीं, उसकी उत्त्पत्ति की ये वादी ( द्वैती ) अपेक्षा करते हैं । पर जो जन्मा ही नहीं, जो इसलिए अमर है, उसकी मर्त्यता ( मरणशीलता) भला कैसे हो सकती है?
न भवत्यमृतं मर्त्यं न मर्त्यममृतं तथा ।
प्रकृतेरन्यथाभावो न कथंचिद्भविष्यति ॥21 ॥
अमर पदार्थ कभी मरणशील नहीं हो सकता और मरणशील कभी अमर नहीं हो सकता । प्रकृति .से विरुद्ध परिस्थिति कभी हो नहीं सकती ।
स्वभावेनामृतो यस्य भावो गच्छति मर्त्यताम् ।
कृतकेनामृतस्तस्य कथं स्थास्यति निश्चलः ॥22 ॥
जिन लोगों के मत में पारमार्थिक अमरता का स्वरूप भी मरणशीलता को प्राप्त होता है, उनके कृतक ( कपोलकल्पित मत) से अमृत मोक्ष भी तो भला कैसे शाश्वत रह सकता है?
भूततोऽभूततो वापि सृज्यमाने समा श्रुतिः ।
निश्चितं युक्तियुक्तं च यत्तद्भवति नेतरत् ॥23 ॥
सृष्टिपरक श्रुतियाँ तो पारमार्थिक और प्रातिभासिक – दोनों अर्थों में ठीक बैठती हैं । इसलिए उन दोनों में जो नि: संदेह और तर्कपूर्ण हो, वही मानना चाहिए अन्य नहीं । ( तात्पर्य है कि आत्मतत्त्व की अद्वितीयता ही नि: संदिग्ध और तर्कपूर्ण है ) ।
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86 उपनिषत्सञ्चयनम्
नेह नानेति चाम्नायादिन्द्रो मायाभिरित्यपि ।
अजायमानो बहुधा मायया जायते तु सः ॥ 24 ॥
‘ नेह नानास्ति’ इत्यादि तथा 'इन्द्रो मायाभि: ' इत्यादि वाक्यों में कहा गया है कि वास्तव में अजन्मा यह आत्मा माया के द्वारा मानो जन्म-सा लेता है ।
सम्भूतेरपवादाच्च सम्भवः प्रतिषिध्यते ।
को न्वेनं जनयेदिति कारणं प्रतिषिध्यते ॥ 25 ॥
श्रुति में 'संभूति' ( उत्पत्ति ) का निषेध किया गया है, इसलिए आत्मा का संभव तो प्रतिषिद्ध है ही । और ' इसे कौन उत्पन्न कर सकता है'– ऐसे श्रुतिवाक्यों से कारण का निषेध किया गया है ।
स एष नेति नेतीति व्याख्यातं निह्नुते यतः ।
सर्वमग्राह्यभावेन हेतुनाजं प्रकाशते ॥26 ॥
' यह आत्मा नहीं, यह आत्मा नहीं' -– इस प्रकार आत्मा की अग्राह्यता के ऊपर जोर देकर सबको नकार दिया है । इस निषेध से यह अजन्मा आत्मा प्रकाशित हो जाता है ।
सतो हि मायया जन्म युज्यते न तु तत्त्वतः ।
तत्त्वतो जायते यस्य जातं तस्य हि ज्ञायते ॥27 ॥
‘ सत्’ तत्त्व का जन्म तो माया से ही होना सम्भव है, पारमार्थिक रूप से तो उसका जन्म हो ही नहीं सकता । जिनके मत में ' सत्' का जन्म पारमार्थिक रूप से होता है, उन्हें भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि उत्पत्तिशील पदार्थ की ही उत्पत्ति हो सकती है, अन्य की तो नहीं ही हो सकती ।
असतो मायया जन्म तत्त्वतो नैव युज्यते ।
बन्ध्यापुत्रो न तत्त्वेन मायया वापि जायते ॥28 ॥
स्वभावत: असत् वस्तु की उत्पत्ति तो पारमार्थिक रूप से हो ही नहीं सकती । तीनों काल | अभाववाला बाँझ का पुत्र तो माया से भी उत्पन्न नहीं हो सकता में
यथा स्वप्ने द्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः ।
तथा जाग्रद्द्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः ॥29 ॥
स्वप्न में जैसे माया के द्वारा मन द्वैताभास रूप से प्रस्फुटित होता है, ( ) भी मन ही द्वैताभास के रूप में स्पन्दित स्फुरित होता है । वैसे ही जाग्रत् अवस्था में
अद्वयं च द्वयाभासं मनः स्वप्ने न संशयः ।
अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥30 ॥
यह निश्चित है कि मूलत: अद्वैत मन ही स्वप्न में द्वैतरूप अवस्था में भी वही अद्वैत मन द्वैतरूप में भासमान होता है । में भासमान होता है । उसी प्रकार जाग्रत्
मनोदृश्यमिदं द्वैतं यत्किञ्चित्सचराचरम् ।
मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥31 ॥
जो यह कुछ स्थावर- जंगम देखा जाता है, वह केवल ही चला जाय ( संकल्प - विकल्पात्मकता नष्ट हो जाए) तो द्वैतमन का ही दृश्य है । यदि मन का मनोरूप जैसा कुछ लगेगा ही नहीं ।
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अद्वैतप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 87
आत्मसत्यानुबोधेन न सङ्कल्पयते यदा ।
अमनस्तां तदा याति ग्राह्याभावे तदग्रहम् ॥ 3211
गुरूपदेशादि द्वारा आत्मा के सत्यत्वादि रूप का ज्ञान होने पर जब मन संकल्प- विकल्प नहीं करता, तब वह ‘ अमनस्कता' को (मनस्तत्त्व के अभाव को) प्राप्त होता है । क्योंकि तब उसे ग्रहण करने के लिए कुछ नहीं होता । इसलिए वह मन ' अग्रह' ( ग्रहणभाव से रहित ) हो जाता है ।
अकल्पकमजं ज्ञानं ज्ञेयाभिन्नं प्रचक्षते ।
ब्रह्मज्ञेयमजं नित्यमजेनाजं विबुध्यते ॥ 33 ॥
कल्पनारहित केवल वह अनादि ज्ञान ज्ञेय से अभिन्न है- ऐसा ज्ञानी लोग कहते हैं । ऐसा ब्रह्म विषयक ज्ञान नित्य है, अनादि है । इसलिए अनादि ही अनादि को जानता है अर्थात् अनादि ज्ञान को अनादि परमतत्त्व जानता है I
निगृहीतस्य मनसो निर्विकल्पस्य धीमतः ।
प्रचारः स तु विज्ञेयः सुषुप्तेऽन्यो न तत्समः ॥34 ॥
निरुद्ध, कल्पनाशून्य और विवेकसम्पन्न मन की जो प्रवृत्ति होती है, वह विशेष जानने योग्य है | सुषुप्तावस्था की बात उससे अलग है । चित्तनिरोध की स्थिति निद्रा में नहीं होती ।
लीयते हि सुषुप्ते तन्निगृहीतं न लीयते ।
तदेव निर्भयं ब्रह्म ज्ञानालोकं समन्ततः ॥ 35 ॥
निद्रासमय में मन अविद्या में लीन हो जाता है, पर निरुद्धावस्था में ऐसा नहीं होता । उस समय तो चारों ओर से ज्ञानरूपी प्रकाशाला निर्भय ब्रह्म अकेला ही रहता है ।
अजमनिद्रमस्वप्नमनामकमरूपकम् ।
सकृद्विभातं सर्वज्ञं नोपचारः कथञ्चन ॥36 ॥
- उस ब्रह्म का जन्म, निद्रा, स्वप्न, नाम, रूप–कुछ भी नहीं है । वह सर्वदा भासमान, सर्वज्ञ है । उसमें किसी उपचार (क्रियाविधि ) की कोई आवश्यकता नहीं है ।
सर्वाभिलाषविगतः सर्वचिन्तासमुत्थितः ।
सुप्रशान्तः सकृज्ज्योतिः समाधिरचलोऽभयः ॥37 ॥
है ), सभी चिन्तन से वह सब प्रकार के वाणी व्यापार से रहित है (इन्द्रियव्यापारों से भी रहितअभय है । परे है । वह सर्वदा प्रशान्त, सर्वदा प्रकाशमान, अनुभूतिगम्य, निश्चल और
ग्रहो न तत्र नोत्सर्गश्चिन्ता यत्र न विद्यते ।
आत्मसंस्थं तदा ज्ञानमजाति समतां गतम् ॥38 ॥
की कोई अपेक्षा नहीं वहाँ नाममात्र का भी चिन्तन नहीं है । वहाँ किसी का ग्रहण हीया होतात्यागहैकरने। है । ऐसी स्थिति में वह आत्मज्ञान जन्मादिरहित और एकसमान
अस्पर्शयोगो वै नाम दुर्दर्शः सर्वयोगिभिः ।
योगिनो बिभ्यति ह्यस्मादभये भयदर्शिनः ॥39 ॥
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88 उपनिषत्सञ्चयनम् इस अमनीकरण का नाम 'अस्पर्शयोग' कहा गया है । यह ' अस्पर्शयोग' के लिए भी दुर्विज्ञेय है । यह पद निर्भय होने पर भी भेद देखनेवाले योगी इससेसचमुचडरते महान्रहते हैंयोगियों।
मनसो निग्रहायत्तमभयं सर्वयोगिनाम् ।
दुःखक्षयः प्रबोधश्चाप्यक्षया शान्तिरेव च ॥40 ॥
आत्मसाक्षात्कार के इच्छुक योगी इस अस्पर्शयोग से (मन के निग्रह से ),, ज्ञानोपलब्धि और अमरशान्ति पा सकते हैं । अभय दुःखनाश
उत्सेक उदधेर्यद्वत्कुशाग्रेणैकबिन्दुना ।
मनसो निग्रहस्तद्वद्भवेदपरिखेदतः ॥41 ॥
घास के तिनके की नोक से बिन्दु- बिन्दु करके सागर उलीचना जैसे असीम धैर्य की है, वैसे ही खेद छोड़कर अर्थात् प्रसन्नता से धैर्यपूर्वक मनोनिग्रह किया जा सकता है अपेक्षा करता ।
उपायेन निगृह्णीयाद्विक्षिप्तं कामभोगयोः ।
सुप्रसन्नं लये चैव यथा कामो लयस्तथा ॥42 ॥
कामभोग में पड़े ( विक्षिप्त) मन को उपाय से निगृहीत और प्रसन्न करना लय की लत लगाए मन का भी निग्रह करना चाहिए । क्योंकि कामभोग की तरहचाहिएलय भीऔरअनर्थकारीसाथ ही ही है ।
दुःखं सर्वमनुस्मृत्य कामभोगान्निवर्तयेत् ।
अजं सर्वमनुस्मृत्य जातं नैव तु पश्यति ॥43 ॥
दुःखमय द्वैत का स्मरण करते हुए कामभोग से मन को वापस जन्मरहित ब्रह्मस्वरूप ही है- ऐसा स्मरण करके मनुष्य उत्पत्तिशील अनित्यलौटाना चाहिए । सब कुछ को देखता ही नहीं है ।
लये सम्बोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः ।
सकषायं विजानीयात्समप्राप्तं न चालयेत् ॥ 44 ॥
सुषुप्ति ( आलस्य), निद्रादि में लीन चित्त को अच्छी तरह से जाए तो पुनः उसे शान्त करना चाहिए । यदि चित्त सकषाय जगाना चाहिए । वह विक्षिप्त हो ( ( ), कर देना चाहिए । चेतावनी देकर पुनः आत्मस्थ कर इन्द्रियविषयासक्त हो तो उसे सावधान को सम- प्राप्त कर लिया ( संयत या स्थिर कर लिया ) होदेना, चाहिए) । एक बार यदि तुमने अपने मन नहीं करने देना चाहिए । तो पुनः उसे बाह्य पदार्थों की ओर आकर्षित
नास्वादयेत्सुखं तत्र निःसङ्गः प्रज्ञया भवेत् ।
निश्चलं निश्चरच्चित्तमेकीकुर्यात्प्रयत्नतः ॥45
॥
साम्यावस्थारूप समाधि में भी वह समाधिजन्यअवस्था में भी अपनी विवेकशील बुद्धि सुख के आस्वाद की अपेक्षा न करे और उसप्रयत्न करे, तो उसे फिर से प्रयत्नपूर्वक सेनिश्चलवह नि:औरसंगएकाग्रही रहे । यदि उसका चित्त बाहर भटकने का करे । यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा ॥46 ॥।