Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 131–140

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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अलातशान्तिप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 89 चित्त जब सुषुप्ति में लीन न हो अथवा तो फिर से विक्षेप में और द्वैत के किसी भी प्रकार के आभास से रहित हो गया हो, तब भी न पड़ा हो, निश्चल हो गया हो तो वह ब्रह्म ही है ( ऐसा समझना चाहिए) । स्वस्थं शान्तं सनिर्वाणमकथ्यं सुखमुत्तमम्

अजमजेन ज्ञेयेन सर्वज्ञं परिचक्षते ॥47 ॥

इससे होनेवाला अनुभव स्वस्थ, शान्त, निर्वाणयुक्त, अवर्णनीय, परमसुखमय अजन्मा ), ( अभिन्न और अनादि होता है ऐसा ज्ञानीलोग कहते हैं । ब्रह्म से

न कश्चिज्जायते जीवः सम्भवोऽस्य न विद्यते ।

एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किञ्चिन्न जायते ॥48 ॥

कोई जीव उत्पन्न नहीं होता, उसकी उत्पत्ति का कोई कारण नहीं है । यही परम सत्य बात है कि जहाँ कोई कहीं जन्म ही नहीं लेता । अद्वैत-प्रकरण समाप्त । अलातशान्तिप्रकरणम्

ज्ञानेनाकाशकल्पेन धर्मान्यो गगनोपमान् ।

ज्ञेयाभिन्नेन सम्बुद्धस्तं वन्दे द्विपदां वरम् ॥1 ॥

ऐसे श्रेष्ठ मानव को मैं प्रणाम करता हूँ जिसने आकाश के समान व्यापक अपने आत्मतत्त्व को ( अपने स्वरूप को ) जान लिया है । वही सच्चे रूप में आत्मज्ञ है । उसी आत्मज्ञान से वह आत्मा के गुणों को जान सकता है 1

अस्पर्शयोगो वै नाम सर्वसत्त्वसुखो हितः ।

अविवादोऽविरुद्धश्च देशितस्तं नमाम्यहम् ॥ 2 ॥

सर्व प्राणियों के लिए कल्याणकारी, सुखकारी, क्लेशहीन और अविरुद्ध यह अस्पर्शयोग शास्त्रों ने बताया है, उस ( अस्पर्शयोग) को मैं प्रणाम करता हूँ ।

भूतस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः केचिदेव हि ।

अभूतस्यापरे धीरा विवदन्तः परस्परम् ॥3 ॥

कुछ मत- वादी लोग अस्तित्ववाले पदार्थ की उत्पत्ति मानते हैं, जबकि कुछ ऐसे धीर विवादी (बुद्धिशाली ) लोग भी हैं, जो कि एक- दूसरे से विवाद करते हुए असत्पदार्थ की भी उत्पत्ति मानते हैं ।

भूतं न जायते किंचिदभूतं नैव जायते ।

विवदन्तोऽद्वया ह्येवमजातिं ख्यापयन्ति ते ॥4 ॥

कुछ लोग कहते हैं कि विद्यमान पदार्थ उत्पन्न नहीं होता । तो कुछ लोग कहते हैं कि अविद्यमान पदार्थ जन्मता नहीं है । इस प्रकार विवाद करते हुए वे दोनों अद्वैतवादी अजातिवाद का ही स्थापन करते हैं ।

पृष्ठ 132

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90 उपनिषत्सञ्चयनम्

ख्याप्यमानामजातिं तैरनुमोदामहे वयम् ।

विवदामो न तैः सार्धमविवादं निबोधत ॥ 15 ॥

उनके स्थापित किए हुए अजातिवाद का हम समर्थन करते हैं । हमारा उनसे कोई विवाद नहीं है । हमारे इस विवादरहित परमार्थदर्शन को आप समझ लें ।

अजातस्यैव धर्मस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः ।

अजातो ह्यमृतो धर्मो मर्त्यतां कथमेष्यति ॥16 ॥

विवादी लोग ‘ अजात’ वस्तु की ' उत्पत्ति' की कल्पना करते हैं । ( वैशेषिक लोग ) किन्तु जो उत्पन्न हुआ ही नहीं है और जो आत्मा अमर है, वह भला कैसे मृत्यु को प्राप्त होगा?

न भवत्यमृतं मर्त्यं न मर्त्यममृतं तथा ।

प्रकृतेरन्यथाभावो न कथञ्चिद्भविष्यति ॥7 ॥

मरणहीन कभी मृत्युशील नहीं बन सकता और मरणशील कभी अमर नहीं हो सकता । किसी भी प्रकार से स्वभाव के विपरीत बात तो हो ही नहीं सकती ।

स्वभावेनामृतो यस्य धर्मो गच्छति मर्त्यताम् ।

कृतकेनामृतस्तस्य कथं स्थास्यति निश्चलः॥8 ॥

जिनके मत में स्वभाव से अमृत वस्तु भी मृत्यु के वश में आ जाती हो, उनके अभिप्रायानुसार तो ‘ अमृत' पदार्थ भी कृतक (जन्मा हुआ ) होने से वह पदार्थ निश्चल ( अविनाशी ) कैसे रह सकता है?

सांसिद्धिकी स्वाभाविकी सहजा अकृता च या ।

प्रकृतिः सेति विज्ञेया स्वभावं न जहाति या ॥ १ ॥

‘ प्रकृति' तो इसे ही कहा जाता है कि जो योगसिद्धि से प्राप्त हो, जो जन्मजात ( सहज ) हो, जो बनाई हुई नहीं हो और जो अपने स्वरूप को कभी बदलती न हो ।

जरामरणनिर्मुक्ताः सर्वे धर्माः स्वभावतः ।

जरामरणमिच्छन्तश्च्यवन्ते तन्मनीषया ॥10 ॥

वास्तव में अपने स्वरूप से ही ये सभी जीव जरा और मरण से रहित ही हैं, परन्तु मृत्यु का चिन्तनकारणंकरतेयस्यहुए वैअपनेकार्यंस्वरूपकारणं कोतस्यखोजायतेबैठे और। गिर गए । वे जरा और जायमानं कथमजं भिन्नं नित्यं कथं च तत् ॥11 ॥

जिन ( सांख्यों) के मत में कारण ही कार्य है, उनके अनुसार तो कारण जो उत्पन्न होता है, वह जन्मरहित कैसे होगा? और यदि कार्य कारण से भिन्नहीहोउत्पन्न होता है । पर?,होने से नित्य कैसे होगा तो वह जन्मशील

कारणाद्यद्यनन्यत्वमतः कार्यमजं यदि ।

जायमानाद्धि वै कार्यात्कारणं ते कथं ध्रुवम् ॥12 ॥

तुम्हारे ( सांख्य के ) मतानुसार यदि कारण से कार्य अलग न हो, तो कार्यभी तो कारण की तरह

पृष्ठ 133

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अलातशान्तिप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 91 ही जन्मरहित हो जाएगा । यदि ऐसा हो तो उत्पत्तिशील कार्य से अभिन्न माना गया कारण अविचल?हो सकता है कैसे

अजाद्वै जायते यस्य दृष्टान्तस्तस्य नास्ति वै ।

जाताच्च जायमानस्य न व्यवस्था प्रसज्यते ॥13 ॥

' अजन्मा पदार्थ से (प्रधान से ) ही किसी कार्य की उत्पत्ति होती है' – ऐसा माननेवालों के पास कोई दूसरा दृष्टान्त नहीं है । और उत्पत्तिशील पदार्थ से ही अन्य पदार्थ ( कार्य) की उत्पत्ति मानने में अनवस्था दोष आता है, यह कोई तार्किक व्यवस्था नहीं है ।

हेतोरादिः फलं येषामादिर्हेतुः फलस्य च ।

हेतोः फलस्य चानादिः कथं तैरुपवर्ण्यते ॥14 ॥

जिनके मत में ( कर्मरूपी ) कारण से ( शरीररूप ) कार्य की उत्पत्ति होती है और ( शरीररूप ) कारण से ( कर्मरूप ) कारण की उत्पत्ति होती है, ( अर्थात् कारण कार्य बन जाता है और कार्य कारण बन जाता है) तब तो यह प्रश्न स्पष्ट हो गया कि ये ( सांख्यादि द्वैती लोग) ' अनादि' वस्तु को कैसे समझाएँगे?

हेतोरादिः फलं येषामादिर्हेतुः फलस्य च ।

तथा जन्म भवेत्तेषां पुत्राज्जन्म पितुर्यथा ॥15 ॥

जिनके मत में हेतु का कारण फल है (कारण का कारण 'कार्य ' है ) और फल का कारण हेतु है ( कार्य का कारण ‘ कारण' है ) उनकी मानी हुई उत्पत्ति तो पुत्र से पिता का जन्म हो, इस प्रकार है |

सम्भवे हेतुफलयोरेषितव्यः क्रमस्त्वया ।

युगपत्सम्भवे यस्मादसम्बन्धो विषाणवत् ॥16 ॥

कार्य- कारण के सम्बन्ध में तुम्हें (वादी को ) क्रम का स्वीकार तो करना ही होगा कारण यदि एक साथ ही उत्पन्न हों, तब तो किसी पशु के दो सींगों की तरह कार्य- कार- नहीं सकता ।

फलादुत्पद्यमान: सन्न ते हेतुः प्रसिध्यति ।

अप्रसिद्धः कथं हेतुः फलमुत्पादयिष्यति ॥17 ॥

हेतु यदि फल से उत्पन्न होता हो (कारण यदि कार्य से उत्पन्न होता हो ), तो वह हेतु प्रकट तो नहीं होता और जो हेतु प्रकट नहीं है, वह फल (कार्य) कैसे उत्पन्न कर सकता है?

यदि हेतोः फलात्सिद्धिः फलसिद्धिश्च हेतुतः ।

कतरत्पूर्वनिष्पन्नं यस्य सिद्धिरपेक्षया ॥18 ॥

यदि हेतु की सिद्धि फल में हो और फल की सिद्धि हेतु में हो, तब उनमें से पहले कौन पैदा हुआ कि जिसकी अपेक्षा से दूसरे की सिद्धि मानी जा सकती है?

अशक्तिरपरिज्ञानं क्रमकोपोऽथ वा पुनः ।

एवं हि सर्वथा बुद्धैरजातिः परिदीपिता ॥19 ॥

पृष्ठ 134

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92 22 उपनिषत्सञ्चयनम् ऐसी उत्तर देने की अशक्ति पूर्णज्ञानाभाव ही है अथवा तो इससे क्रम उलट जाता है ज्ञानी लोग सब तरह से अजातिवाद का स्थापन करते हैं ॥ इस प्रकार

बीजाङ्कुराख्यो दृष्टान्तः सदा साध्यसमो हि सः ।

न हि साध्यसमो हेतुः सिद्धौ साध्यस्य युज्यते ॥ 20 ॥

बीजाङ्कुर का उदाहरण तो तुम्हारे साध्य की तरह ही असिद्ध है और अभी असिद्ध साध्य के लिए तुम्हारा असिद्ध हेतु तो साध्य ही सिद्धि में उपयोगी नहीं हो सकता ।

पूर्वापरापरिज्ञानमजातेः परिदीपकम् ।

जायमानाद्धि वै धर्मात् कथं पूर्वं न गृह्यते ॥21 ॥

हेतु और फल के पूर्वापरत्व का अज्ञान तो उत्पत्ति के अभाव को ही प्रकट कर देता है । क्योंकि यदि धर्म ( कार्य = जीवत्व ) सचमुच ही उत्पन्न होता हो, तो उसके पूर्वकारण का स्वीकार क्यों नहीं किया जाता?

स्वतो वा परतो वापि न किञ्चिद्वस्तु जायते ।

सदसत्सदसद्वापि न किञ्चिद्वस्तु जायते ॥22 ॥

‘ स्व ’ में से या ‘ पर’ में से कोई भी पदार्थ उत्पन्न नहीं होता । क्योंकि 'सत्' ' ', ' ' सदसत् से कोई भी पदार्थ उत्पन्न नहीं होता । से असत् से और

हेतुर्न जायतेऽनादेः फलं चापि स्वभावतः ।

आदिर्न विद्यते यस्य तस्य ह्यादिर्न विद्यते ॥ 23 ॥

फल या हेतु — जो भी अनादि है, उसमें से जैसे कारण नहीं जन्मता,, हो सकता । जिसका कारण नहीं होता उसकी उत्पत्ति नहीं होती । वैसे फल भी उत्पन्न नहीं

प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वमन्यथा द्वयनाशतः ।

संक्लेशस्योपलब्धेश्च परतन्त्रास्तिता मता ॥ 24 ॥

विषयी नशब्दादिहो तोसंवेदनाद्वैत का कानाशनिमित्तहोगा और( आधारदुःखादि) कोईकी- नप्राप्ति- कोई होनेविषयसे होता ही है, क्योंकि विषय और में बाह्य वस्तु की (विषय की ) विद्यमानता को स्वीकार किया गया है भी। इन द्वैतवादी लोगों के शास्त्रों

प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वमिष्यते युक्तिदर्शनात् ।

निमित्तस्यानिमित्तत्वमिष्यते भूतदर्शनात् ॥25 ॥

पूर्वोक्त तर्कों के आधार पर तुम शब्दादि प्रतीति ( संवेदनाओं परन्तु पारमार्थिक दृष्टि से देखने पर हम तो विषय के अविषयत्व की ) योग्यता को स्वीकार करते हो, को ही मानते हैं ।

चित्तं न संस्पृशत्यर्थं नार्थाभासं तथैव च ।

अभूतो हि यतश्चार्थो नार्थाभासस्ततः पृथक् ॥26

चित्त किसी भी पदार्थ का स्पर्श नहीं पदार्थ स्वयं चित्तविवर्त के सिवा और कुछ नहींकरता और पदार्थ के आभास का भी तो स्पर्श नहीं करता । है । (यदि पदार्थ असत् है तो पदार्थाभास भी तोहै, असत्ऐसे ही अर्थाभास भी चित्त से कोई पृथक् वस्तु नहीं ही हुआ) ।

पृष्ठ 135

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अलातशान्तिप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 93

निमित्तं न सदा चित्तं संस्पृशत्यध्वसु त्रिषु ।

अनिमित्तो विपर्यासः कथं तस्य भविष्यति ॥27 ॥

तीनों मार्ग ( काल ) में चित्त किसी भी विषय (निमित्त) का स्पर्श नहीं करता और जहाँ निमित्त ( विषय ) ही न हो, वहाँ फिर चित्त को बिना कारण ही विपरीत ज्ञान भला क्यों होगा?

तस्मान्न जायते चित्तं चित्तदृश्यं न जायते ।

तस्य पश्यन्ति ये जातिं खे वै पश्यन्ति ते पदम् ॥28 ॥

इसलिए न तो चित्त उत्पन्न होता है, न वा कोई दृश्य ही उत्पन्न होता है । जिन लोगों को इनका जन्म दिखाई देता है, वे मानो आकाश में पदचिह्न देख रहे हैं ।

अजातं जायते यस्मादजातिः प्रकृतिस्तथा ।

प्रकृतेरन्यथाभावो न कथंचिद्भविष्यति ॥ 29 ॥

जन्मरहित चित्त का ही जन्म होता है । उसका स्वभाव ही जन्मराहित्य है और स्वभाव का बदलाव तो किसी भी तरह हो ही नहीं सकता ।

अनादेरन्तवत्त्वं च संसारस्य न सेत्स्यति ।

अनन्तता चादिमतो मोक्षस्य न भविष्यति ॥ 30 ॥

सृष्टि को अनादि माननेवालों को यह मानना होगा कि वह अनन्त भी है । तो मोक्ष को सादि मानने पर वह अनन्त (स्थायी ) भी नहीं हो सकेगा । क्योंकि जो सादि होता है वह सान्त होता है और जो अनादि होता है, वह अनन्त है ।

आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।

वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥31 ॥

जो पदार्थ पहले नहीं होते, वे बाद में भी नहीं होते । वे वर्तमान में भी वैसे ही अस्तित्वहीन हैं । वे मिथ्या होने पर भी अवितथ ( अमिथ्या ) हों, ऐसे लग रहे हैं ।

सप्रयोजनता तेषां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।

तस्मादाद्यन्तवत्त्वेन मिथ्यैव खलु ते स्मृताः ॥32 ॥

वास्तविकता जाग्रत् समय के उन पदार्थों की सप्रयोजनता निद्रा में उल्टी हो जाती है ( जाग्रत् की ही हैं । निद्रा में अवास्तविकता हो जाती है ) । अतः आदि और अन्त वाले होने से वे पदार्थ मिथ्या

सर्वे धर्मा मृषा स्वप्ने कायस्यान्तर्निदर्शनात् ।

संवृतेऽस्मिन्प्रदेशे वै भूतानां दर्शनं कुतः ॥33 ॥

। ऐसे संकुचित प्रदेश स्वप्नकाल में सभी पदार्थ शरीर के भीतर ही भासमान होने से मिथ्या ही हैं में प्राणियों का वास्तविक दर्शन कैसे हो सकता है?

न युक्तं दर्शनं गत्वा कालस्यानियमाद्गतौ ।

प्रतिबुद्धश्च वै सर्वस्तस्मिन्देशे न विद्यते ॥34 ॥

। क्योंकि देशान्तरगमन का दूरदेशस्थ पदार्थों का दर्शन वहाँ जाकर तो स्वप्न में नहींनहीं होहोसकतासकता | जाग्रत् अवस्था का कालव्यय का नियम स्वप्न में तो लागू

पृष्ठ 136

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94 उपनिषत्सञ्चयनम्

मित्राद्यैः सह सम्मन्त्र्य सम्बुद्धो न प्रपद्यते ।

गृहीतं चापि यत्किञ्चित्प्रतिबुद्धो न पश्यति ॥35 ॥

स्वप्न में मित्रों के साथ गोष्ठी करके जागने पर मनुष्य कुछ भी नहीं देख पाता । स्वप्न में जो कुछ पकड़ा हो, उसे जाग्रत् में मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता ।

स्वप्ने चावस्तुकः कायः पृथगन्यस्य दर्शनात् ।

यथा कायस्तथा सर्वं चित्तदृश्यमवस्तुकम् ॥ 36 ॥

स्वप्न में देखी गई काया असत्य है, क्योंकि वह अपनी मूल काया से अलग ही है । जिस तरह काया है, उसी तरह सब चित्त में देखा गया भी असत्य ही है ।

ग्रहणाज्जागरितवत्तद्धेतुः स्वप्न इष्यते ।

तद्धेतुत्वात्तु तस्यैव सज्जागरितमिष्यते ॥37 ॥

स्वप्न में पदार्थग्रहण तो जाग्रत् जैसा ही होने से जाग्रत् ही स्वप्न का कारण माना जाता है और इसी प्रकार वह स्वप्न तो केवल तुम्हारा अपना ही होने से, उस स्वप्न का कारण जाग्रत् भी केवल तुम्हारा अपना ही है । दूसरों का उससे कोई लेना- देना नहीं ।

उत्पादस्याप्रसिद्धत्वादजं सर्वमुदाहृतम् ।

न च भूतादभूतस्य सम्भवोऽस्ति कथञ्चन ॥38 ॥।

उत्पत्ति तो सिद्ध नहीं हो सकती, इसलिए उपनिषदों में सबको ' अज' कहा गया है । और ‘ सत्’ पदार्थ से ‘ असत्' का कभी भी जन्म नहीं हो सकता ।

असज्जागरिते दृष्ट्वा स्वप्ने पश्यति तन्मयः ।

असत्स्वप्नेऽपि दृष्ट्वा च प्रतिबुद्धो न पश्यति ॥ 39 ॥

जाग्रत् अवस्था में देखे गए असत् पदार्थ को, उन पदार्थों से एकाकार हुआ मनुष्य स्वप्न में उन्हीं को देखता है और स्वप्न में उन असार पदार्थों को देखने पर भी जागता हुआ मनुष्य उन्हें नहीं देखता ।

नास्त्यसद्धेतुकमसत्सदसद्धेतुकं तथा ।

सच्च सद्धेतुकं नास्ति सद्धेतुकमसत्कुतः ॥40 ॥

जिस प्रकार ‘ असत्’ वस्तु असत् कारणवाली नहीं होती (जो है ही नहीं, उसका कोई कारण नहीं होता ) उसी प्रकार विद्यमान पदार्थ का कारण कोई अविद्यमान वस्तु भी तो नहीं हो सकती । इसी प्रकार विद्यमान पदार्थ किसी दूसरे विद्यमान पदार्थ से भी उत्पन्न नहीं हो सकता । इसलिए कोई असत् पदार्थ किसी ‘ सत्’ पदार्थ से कैसे उत्पन्न हो सकता है?

विपर्यासाद्यथा जाग्रदचिन्त्यान्भूतवत्स्पृशेत् ।

तथा स्वप्ने विपर्यासाद्धर्मांस्तत्रैव पश्यति ॥41 ॥

जैसे मनुष्य भ्रमवश होकर जाग्रत् अवस्था में अवास्तविक पदार्थों में भी वास्तविकता मानकर व्यवहार करता है, उसी प्रकार स्वप्न में भी भ्रमवश होकर असत् पदार्थों में भी सत् का- सा व्यवहार करता है ।

पृष्ठ 137

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अलातशान्तिप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 95

उपलम्भात्समाचारादस्तिवस्तुत्ववादिनाम् ।

जातिस्तु देशिता बुद्धैरजातेस्त्रसतां सदा ॥42 ॥

जो लोग अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर अथवा प्रवर्तमान वर्णाश्रमादि के आधार पर बाहर की वस्तुओं की वास्तविकता को मानते हैं और जो अजाति( अजात )वाद से त्रस्त हो रहे हैं, उनके लिए ही ज्ञानियों ने जाति का बोध दिया है ।

अजातेस्त्रसतां तेषामुपलम्भाद्वियन्ति ये ।

जातिदोषा न सेत्स्यन्ति दोषोऽप्यल्पो भविष्यति ॥43 ॥

अजातवाद का सामना करने में डरनेवाले द्वैती लोग अद्वैतियों का विरोध करते हैं, क्योंकि वे सब जगह पर द्वैत ही देखते हैं । ऐसे लोग द्वैतमूलक उपासनाएँ करते हैं । उन्हें जाति मानने के दोष नहीं लगेंगे और यदि लगेगा तो भी थोड़ा ही लगेगा ।

उपलम्भात्समाचारान्मायाहस्ती यथोच्यते ।

उपलम्भात्समाचारादस्ति वस्तु तथोच्यते ॥44 ॥

व्यक्तिगत अनुभव और उससे मेल खाती हुई धारणा से ऐन्द्रजालिक हाथी सही मान लिया जाता है, इसी प्रकार वे लोग जो देखते हैं और उनकी धारणा के अनुकूल यदि वह हो तो उसे सत्य मान लेते हैं ।

जात्याभासं जलाभासं वस्त्वाभासं तथैव च ।

अजाचलमवस्तुत्वं विज्ञानं शान्तमद्वयम् ॥45 ॥

जो कुछ जन्मता-सा भासित होता है, चलता- सा भासता है, अस्तित्ववाला दिखाई देता है, वह वास्तव में जन्मरहित, अचल, शान्त, अद्वैत, विज्ञान ही है ।

एवं न जायते चित्तमेवं धर्मा अजाः स्मृताः ।

एवमेव विजानन्तो न पतन्ति विपर्यये ॥146 ॥

इस प्रकार चित्त उत्पन्न नहीं होता । ऐसे ही आत्मा ' अज' कहा गया है । इस प्रकार जाननेवाले लोग विपर्यय ( भ्रम) में कभी नहीं फँसते हैं ।

ऋजुवक्रादिकाभासमलातं स्पन्दितं यथा ।

ग्रहणग्राहकाभासं विज्ञानस्पन्दितं तथा ॥147 ॥

जिस प्रकार जलती लकड़ी की ही गति कभी सीधी, कभी वक्र और कभी किसी और आकारवालीहै । दीखती है, उसी प्रकार एक विज्ञान का ही स्फुरण ग्रहण एवं ग्राहक के रूप में प्रतीत होता

अस्पन्दमानमलातमनाभासमजं यथा ।

अस्पन्दमानं विज्ञानमनाभासमजं तथा ॥48 ॥

‘ अज' है, उसी जिस तरह चेष्टारहित जलती लकड़ी ऋजु ( और वक्र ) आदि आभासआभासहीनसे रहितऔरऔरजन्मरहित ही है । प्रकार स्पन्दनरहित विज्ञानस्वरूप आत्मा भी ग्रहण- ग्राहकभावरूप

अलाते स्पन्दमाने वै नाभासा अन्यतो भुवः ।

न ततोऽन्यत्र निःस्पन्दान्नालातं प्रविशन्ति ते ॥49 ॥

पृष्ठ 138

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96 उपनिषत्सञ्चयनम् जलती हुई लकड़ी के स्पन्दनकाल में ऋजु ( और वक्र) आदि आभास कहीं अन्यत्र से बनकर तो नहीं आते और उसका स्पन्दन बन्द हो जाने पर वहाँ से किसी दूसरे स्थान पर चले भी नहीं जाते और उसमें भी प्रविष्ट नहीं हो जाते ।

न निर्गता अलातात्ते द्रव्यत्वाभावयोगतः ।

विज्ञानेऽपि तथैव स्युराभासस्याविशेषतः ॥50 ॥

वे सीधे ( बाँके ) आभास तो द्रव्य नहीं हैं - उनमें द्रव्यत्व का अभाव ही मौजूद है । इसलिए वे उस जलती हुई लकड़ी से तो नहीं निकल सकते । इसी प्रकार विज्ञान में भी ऐसी ही परिस्थिति है, क्योंकि आभास तो इन दोनों ही स्थलों में समान हैं ।

विज्ञाने स्पन्दमाने वै नाभासा अन्यतो भुवः ।

न ततोऽन्यत्र निःस्पन्दान्न विज्ञानं विशन्ति ते ॥51 ॥

जब विज्ञान का स्फुरण होता है तब यह जगत् और उसके व्यवहार दीख पड़ते हैं । उनका अन्य कोई कारण नहीं है । यदि विज्ञान स्पन्दित नहीं होता, तब तो उन व्यवहारों का कोई आधार ही नहीं है और उनका उस विज्ञान में लय भी नहीं होता ।

न निर्गतास्ते विज्ञानाद्द्रव्यत्वाभावयोगतः ।

कार्यकारणताभावाद्यतोऽचिन्त्याः सदैव ते ॥152 ॥

उन आभासों में द्रव्यत्व नहीं होने से वे विज्ञान में से निकल नहीं सकते । क्योंकि उन दोनों में कार्य- कारणता का कोई सम्बन्ध नहीं है । इसलिए ये आभास अचिन्त्य ( अनिर्वचनीय) ही हैं ।

द्रव्यं द्रव्यस्य हेतुः स्यादन्यदन्यस्य चैव हि ।

द्रव्यत्वमन्यभावो वा धर्माणां नोपपद्यते ॥153 ॥

द्रव्य का कारण द्रव्य अर्थात् पदार्थ का कारण पदार्थ ही होता है और वह भी एक पदार्थ का कारण अन्य पदार्थ ही हो सकता है । परन्तु जीवात्मा में तो द्रव्यत्व नहीं होता और द्रव्यत्वभिन्न कोई दूसरा भाव भी तो नहीं होता ।

एवं न चित्तजा धर्माश्चित्तं वापि न धर्मजम् ।

एवं हेतुफलाजातिं प्रविशन्ति मनीषिणः ॥54 ॥

इस प्रकार विषय चित्त में से उत्पन्न नहीं होते और चित्त भी विषयों में से प्रकट नहीं होता । इसलिए ज्ञानी पुरुष हेतु और फल की अनुत्पत्ति ( कार्य - कारण सम्बन्ध का अभाव) ही मानते हैं ।

यावद्धेतुफलावेशस्तावद्धेतुफलोद्भवः ।

क्षीणे हेतुफलावेशे नास्ति हेतुफलोद्भवः ॥55 ॥

जहाँ तक कार्य- कारण सम्बन्ध माना जाता है, वहाँ तक वह कार्य- कारण सम्बन्ध दिखलाई पड़ेगा, परन्तु कार्य- कारणभाव के क्षीण होते ही वह कार्य- कारण नहीं रहेगा ।

यावद्धेतुफलावेशः संसारस्तावदायतः ।

क्षीणे हेतुफलावेशे संसारं न प्रपद्यते ॥56 ॥

पृष्ठ 139

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 139 का मूल पृष्ठ
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अलातशान्तिप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 97 जहाँ तक कार्य- कारण सम्बन्ध का भाव रहता है, वहाँ तक यह संसारबन्धन (दुःखादि बन्धन ) रहता है, पर कार्य - कारण भाव के क्षीण होने से मनुष्य संसार में नहीं आता ।

संवृत्या जायते सर्वं शाश्वतं नास्ति तेन वै ।

सद्भावेन ह्यजं सर्वमुच्छेदस्तेन नास्ति वै ॥57 ॥

वैश्विक अज्ञान से ही सब उत्पन्न होता है, कुछ भी शाश्वत नहीं है । पारमार्थिक दृष्टि से देखने पर सब कुछ जन्मरहित है । इसका नाश नहीं हो सकता । धर्मा य इति जायन्ते जायन्ते ते न तत्त्वतः । जन्म मायोपमं तेषां सा च माया न विद्यते 115811 जो पदार्थ उत्पन्न हुए कहे जाते हैं, वे वास्तव में उत्पन्न होते ही नहीं । उनकी उत्पत्ति तो ऐन्द्रजालिक है और वह इन्द्रजाल ( नजरबन्दी ) भी तो वास्तविक नहीं है ।

यथा मायामयाद्बीजाज्जायते तन्मयोऽङ्कुरः ।

नासौ नित्यो न चोच्छेदी तद्वद्धर्मेषु योजना । 159 ॥

जैसे मायारूप बीज में से तद्रूप ही अंकुर उत्पन्न होता है । ( माया जादूगरनी है अत: उससे उत्पन्न होनेवाला अंकुर भी तो जादूगर अर्थात् मायामय ही होगा न? ) वह नित्य भी नहीं होता और नाशशील भी नहीं होता । उसी प्रकार पदार्थों के विषय में भी समझ लेना चाहिए । नाजेषु सर्वधर्मेषु शाश्वताशाश्वताभिधा । यत्र वर्णा न वर्तन्ते विवेकस्तत्र नोच्यते 116011 जन्मरहित ही सभी धर्मों में (जीवात्माओं में ) नित्य या अनित्य जैसी संज्ञा का कोई स्थान नहीं। है । यहाँ वाणी की प्रवृत्ति काम नहीं करती है, वहाँ ( अनिर्वचनीयता के कारण) निर्णय नहीं हो सकता

यथा स्वप्ने द्वयाभासं चित्तं चलति मायया ।

तथा जाग्रद्द्वयाभासं चित्तं चलति मायया ॥61 ॥

जिस प्रकार स्वप्नावस्था में द्वैत का आभास माया के द्वारा चित्त का स्फुरण कराता है, उसी प्रकार जाग्रत् में भी द्वैत का आभास माया से ही चित्त को प्रवृत्त करता है ।

अद्वयं च द्वयाभासं चित्तं स्वप्ने न संशयः ।

अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ 62 ॥

यह तो निर्विवाद सत्य है कि स्वप्न में अद्वय चित्त ही द्वयाभासरूप से (द्वैताभासयुक्तभासित होता) हैहोता। है । उसी प्रकार जाग्रत् में भी स्व-रूप से अद्वय अन्तःकरण ही द्वैताकार

स्वप्नदृक्प्रचरन्स्वप्ने दिक्षु वै दशसु स्थितान् ।

अण्डजान्स्वेदजान्वापि जीवान्पश्यति यान्सदा ।163 ॥

आदि जीवों को सदैव देखता स्वप्नद्रष्टा जीव मानो दसों दिशाओं में घूमता हुआ अण्डज, स्वेदज रहता है ।

स्वप्नदृक्चित्तदृश्यास्ते न विद्यन्ते ततः पृथक् ।

तथा तद्दृश्यमेवेदं स्वप्नदृक्चित्तमिष्यत ॥64 ॥

7 उ०प्र०

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उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 140 का मूल पृष्ठ
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98 उपनिषत्सञ्चयनम् मनुष्य जो कुछ भी वस्तु स्वप्न में देखता है, वह चित्त के ही दृश्य हैं — चित्त से भिन्न उनका कोई अस्तित्व नहीं है । तो जैसा वह दृश्य ( मिथ्या) है वैसे ही उस दृश्य को देखनेवाला चित्त भी वैसा ( मिथ्या ) ही है |

चरञ्जागरिते जाग्रद्दिक्षु वै दशसु स्थितान् ।

अण्डजान्स्वेदजान्वापि जीवान्पश्यति यान्सदा ॥65 ॥

इसी प्रकार जाग्रदवस्था में जागता मनुष्य दसों दिशाओं में घूमता हुआ, अण्डज, स्वेदज आदि जीवों को सदैव देखता रहता है ।

जाग्रच्चित्तेक्षणीयास्ते न विद्यन्ते ततः पृथक् ।

तथा तद्दृश्यमेवेदं जाग्रतश्चित्तमिष्यते ॥66 ॥

ये सब भी जाग्रत् चित्त के द्वारा ही देखने में आते हैं, जाग्रत् चित्त से उनका अस्तित्व अलग नहीं है । अतः जाग्रत् आदि का चित्त ही उस दृश्यरूप में माना गया है ।

उभे ह्यन्योऽन्यदृश्ये ते किं तदस्तीति नोच्यते ।

लक्षणाशून्यमुभयं तन्मतेनैव गृह्यते ॥67 ॥

जीव और चित्त— दोनों एक-दूसरे के दृश्य हैं । वह क्या है, यह कहा नहीं जा सकता । दोनों ही प्रमाणहीन हैं । केवल मानने के लिए ( मन की कल्पना से) ही वह ग्रहण किया जाता है ।

यथा स्वप्नमयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।

तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥68 ॥

जैसे स्वप्न में किसी को जन्मते हुए और किसी को मरते हुए देखा जाता है वैसे ही ये सब जीव होते भी हैं और नहीं भी होते ।

यथा मायामयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।

तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥69 ॥

जिस प्रकार यह जादू जैसा जीव जन्मता भी है और मरता भी है, वैसे ही ये सभी जीव होते भी हैं और नहीं भी होते ।

यथा निर्मितको जीवो जायते म्रियतेऽपि वा ।

तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ 70 ॥

जिस प्रकार यह निर्मित ( कल्पित ) जीव जन्मता भी है और मरता भी है, उसी प्रकार ये सभी जीव होते भी हैं और नहीं भी होते ।

न कश्चिज्जायते जीवः सम्भवोऽस्य न विद्यते ।

एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किञ्चिन्न जायते ॥71 ॥

कोई जीव जन्मता नहीं है । इस जीव की कभी उत्पत्ति होती ही नहीं । यही उत्तम ( पारमार्थिक ) सत्य है कि यहाँ कुछ भी जन्म नहीं लेता ( कारिका 3.48 ) ।

चित्तस्पन्दितमेवेदं ग्राह्यग्राहकवद्द्वयम् ।

चित्तं निर्विषयं नित्यमसङ्गं तेन कीर्तितम् ॥72 ॥