Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 141–150
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 141–150
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अलातशान्तिप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 99 चित्त का स्पन्दन ही ग्राह्य- ग्राहकभाव रूप द्वैतभाव है । चित्त तो पारमार्थिक रूप से निर्विषय ही है । इसीलिए तो उसे नित्य और असंग कहा जाता है ।
योऽस्ति कल्पितसंवृत्या परमार्थेन नास्त्यसौ ।
परतन्त्राभिसंवृत्या स्यान्नास्ति परमार्थतः ॥73 ॥
जो वस्तु लौकिक व्यवहार के लिए ( उपयोग के लिए) मन में कल्पित है, वह पारमार्थिक रूप सेतो है ही नहीं । यदि अन्य शास्त्रों (द्वैतशास्त्रों ) के लिए वह भले ही उपयोगी हो, पर पारमार्थिक रूप में वह नहीं है ।
अजः कल्पितसंवृत्या परमार्थेन नाप्यजः ।
परतन्त्राभिनिष्पत्त्या संवृत्या जायते तु सः ॥74 ॥
आत्मा भी कल्पित भौतिक दृष्टि से ' अज' कहा गया है, वास्तविक रूप से तो उसे ' अज' भी नहीं कहा जा सकता | अन्य द्वैतवादी शास्त्रों के अनुसार अज्ञान से ही वह उत्पन्न हुआ- सा होता है |
अभूताभिनिवेशोऽस्ति द्वयं तत्र न विद्यते ।
द्वयाभावं स बुद्ध्वैव निर्निमित्तो न जायते ॥75 ॥
मनुष्य को अभूत ( असत्य) में अभिनिवेश है, अर्थात् सत्य मानने का भ्रम हो गया है,निमित्तसचमुचसे वहाँ द्वैत नहीं होता । जीवात्मा वास्तविक रूप में द्वैत के अभाव को जानकर ही धर्माधर्मादि रहित होकर फिर से यहाँ उत्पन्न नहीं होता ।
यदा न लभते हेतूनुत्तमाधममध्यमान् ।
'तदा न जायते चित्तं हेत्वभावे फलं कुतः 1176 ॥
ही न हो, तब जब उत्तम, मध्यम या कनिष्ठ हेतुओं के (कारणों के ) निमित्त( कार्यकी) कोईकैसे गुंजाइशबन सकेगा? मनुष्य जन्म नहीं लेता । क्योंकि जब कारण ही नहीं है तो फल
अनिमित्तस्य चित्तस्य याऽनुत्पत्तिः समाऽद्वया ।
अजातस्यैव सर्वस्य चित्तदृश्यं हि तद्यतः 1177 ॥
जन्मरहित पदार्थों का ऐसा निमित्तरहित चित्त की जन्मरहितता समान और अद्वैत होती है । सभी ही है । क्योंकि वह सब चित्त के ही दृश्य हैं ।
बुद्ध्वाऽनिमित्ततां सत्यां हेतुं पृथगनाप्नुवन् ।
वीतशोकं तथाकाममयं पदमश्नुते ॥78 ॥
किसी भी कारण को सब पदार्थों की पारमार्थिक ( सत्य ) नियमरहितता को पहचान कर उसके को प्राप्त कर लेता है । नहीं मानता हुआ मनुष्य शोकरहित, कामरहित होकर अभयपद
अभूताभिनिवेशाद्धि सदृशे तत्प्रवर्तते ।
वस्त्वभावं स बुद्ध्वैव निःसङ्गं विनिवर्तते ॥79 ॥
डूब गया हो, तब तो वह चित्त यह चित्त अभूत ( असत् = द्वैत ) के अभिनिवेश ( आसक्तिजब )उसमेंसे पारमार्थिकता का अभाव जान उसी द्वैत में ( भ्रम में) प्रवर्तमान होता रहेगा । परन्तु मनुष्यहो जाएगा । लेगा, तब आसक्तिरहित होकर एकदम उससे अलग
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100 उपनिषत्सञ्चयनम्
निवृत्तस्याप्रवृत्तस्य निश्चला हि तदा स्थितिः ।
विषयः स हि बुद्धानां तत्साम्यमजमद्वयम् ॥ 80 ॥
इस प्रकार विषयों से निवृत्त होकर, प्रवृत्तिभाव की मन:स्थिति को छोड़कर रहनेवाले मनुष्य की स्थिति निश्चल होती है और वही स्थिति ज्ञानियों का विषय होती है । वह जन्मरहित, समरस और अव्यय है ।
अजमनिद्रमस्वप्नं प्रभातं भवति स्वयम् ।
सकृद्विभातो ह्येवैष धर्मो धातुस्वभावतः ॥81 ॥
यह आत्मा जन्मरहित, स्वप्नरहित, निद्रारहित और स्वयंप्रकाश है । यह धर्म ( आत्मा ) अपने मूल स्वभाव से ही सर्वदा प्रकाशवान रहता है ।
सुखमाद्रियते नित्यं दुःखं विव्रियते सदा ।
यस्य कस्य च धर्मस्य ग्रहेण भगवानसौ ॥ 82 ॥
यदि तुम किसी और वस्तु को चाहना शुरू करो तो वह चिरकाल तक आत्मा को आवृत ही करती रहेगी । पर अगर तुम आत्मा को देखना चाहते हो तो तुम्हें बहुत परिश्रम करना पड़ेगा । ( “ यस्य कस्यचन धर्मस्य ग्रहेण असौ भगवान् सदा सुखम् आव्रियते, दुःखं विव्रियते ” अर्थात् जिस किसी धर्म के ग्रहण से यह भगवान सरलता से छिपाया जाता है और मुश्किल से प्रकट किया जा सकता है ) ।
अस्ति नास्त्यस्ति नास्तीति नास्ति नास्तीति वा पुनः ।
चलस्थिरोभयाभावैरावृणोत्येव बालिशः ॥83 ॥
‘ है ' ( वैशेषिक ), ‘ नहीं है ' ( योगाचार ), 'है भी और नहीं भी' ( जैन ), ' नहीं है, नहीं है ' ( शून्यवादी बौद्ध ))-– इस प्रकार आत्मा के विषय में चल, स्थिर या उभय भावों से कल्पना करके मूढ लोग आत्मा को ढँक ही देते हैं ।
कोट्यश्चतस्र एतास्तु ग्रहैर्यासां सदावृतः ।
भगवानाभिरस्पृष्टो येन दृष्टः स सर्वदृक् ॥84 ॥
ऊपर की बालिशों की चार कोटियों से आवृत इस भगवान् को जिसने कोटियों से मुक्त स्वरूप में देख लिया है, वह सर्वद्रष्टा है ।
प्राप्य सर्वज्ञतां कृत्स्नां ब्राह्मण्यं पदमद्वयम् ।
अनापन्नादिमध्यान्तं किमतः परमीहते ॥ 85 ॥
संपूर्ण सर्वज्ञानस्वरूप परम अद्वैत, आदि-मध्य- अन्तरहित ब्रह्मपद की जब प्राप्ति हो गई तब इससे और अधिक क्या हो सकता है?
विप्राणां विनयो ह्येष शमः प्राकृत उच्यते ।
दमः प्रकृतिदान्तत्वादेवं विद्वाञ्शमं व्रजेत् ॥86 ॥
वह परमपदस्थिति विप्रों का विनय है, वही उनका सहज ' शम' है । उनकी सहज जितेन्द्रियता ही उनका 'दम' है । इस प्रकार ज्ञानी शम ( शान्ति ) को प्राप्त करे ।
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अलातशान्तिप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 101
सवस्तु सोपलम्भं च द्वयं लौकिकमिष्यते ।
अवस्तु सोपलम्भं च शुद्धं लौकिकमिष्यते ॥87 ॥
वस्तु का होना और उसका ग्रहण होना– ये दो भौतिक वास्तविकता जाग्रदवस्था कहलाती है, और वस्तु के न होने पर भी उसका ग्रहण हो, तो ये दो बातें शुद्ध लौकिक (स्वप्न) कहलाती हैं |
अवस्त्वनुपलम्भं च लोकोत्तरमिति स्मृतम् ।
ज्ञानं ज्ञेयं च विज्ञेयं सदा बुद्धैः प्रकीर्तितम् ॥ 88 ॥
जहाँ पदार्थ का अस्तित्व ही नहीं होता और उसकी उपलब्धि भी नहीं होती, ऐसी अवस्था को ‘ लोकोत्तर' ( भौतिक जगत् के परे की ) सुषुप्ति अवस्था कहा गया है । ज्ञानी लोगों ने ( तीनों अवस्थाओं को परखकर ) जो सदैव ज्ञान, ज्ञेय और विशेषज्ञेय है ( जो तुरीय है ) उसकी प्रसिद्धि की है ।
ज्ञाने च त्रिविधे ज्ञेये क्रमेण विदिते स्वयम् ।
सर्वज्ञता हि सर्वत्र भवतीह महाधियः ॥89 ॥
जब भौतिक ज्ञान और तीनों अवस्थाओं का ज्ञान मनुष्य को हो जाता है, तब वह बुद्धिमान् व्यक्ति इसी जन्म में सभी विषयों में सर्वज्ञता प्राप्त कर लेता है ।
यज्ञेयाप्यपाक्यानि विज्ञेयान्यग्रयाणतः ।
तेषामन्यत्र विज्ञेयादुपलम्भस्त्रिषु स्मृतः ॥90 ॥
जाग्रदादि अवस्थारूप त्याज्य, आत्मरूप ज्ञेय, पाण्डित्यादि रूप प्राप्य और मल आदि पाक्य किए जाने वाले1))-– इन सबको सबसे पहले जान लेना चाहिए । परन्तु विज्ञेय ( आत्मा ) (पकाकर नाश के सिवा बाकी के तीनों में जो ग्रहण होता है, वह तो उपलम्भ ( मिथ्या = दिखावे मात्र का अस्तित्व ) I
प्रकृत्याकाशवज्ज्ञेयाः सर्वे धर्मा अनादयः ।
विद्यते न हि नानात्वं तेषां क्वचन किञ्चन ॥91 ॥
अजन्मा ) ही है । उनमें सभी आत्मा ( जीवात्मा) आकाश जैसा ही निर्लेप है और सभी अनादि। ( नानात्वं ( भिन्नता ) नहीं है अर्थात् कहीं भी किसी भी प्रकार का भेद नहीं है आदिबुद्धाः प्रकृत्यैव सर्वे धर्माः सुनिश्चिताः यस्यैवं भवति क्षान्तिः सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥92 ॥
सभी आत्मा स्वरूप से ही पूर्णज्ञानरूप हैं, यह निश्चित कियाहै । गया है । जो साधक निश्चित रूप से यह जान लेता है, वह अमरत्व ( मोक्ष) को प्राप्त कर लेता
आदिशान्ता ह्यनुत्पन्नाः प्रकृत्यैव सुनिर्वृताः ।
सर्वे धर्माः समाभिन्ना अजं साम्यं विशारदम् ॥ 93 ॥
, समान, सभी जीवात्मा पहले से ही नित्य, निरन्तर, शान्त, जन्मरहित, स्वभाव से ही वृत्तिरहित अभिन्न और अज - साम्य ( विशुद्ध आत्मतत्त्व) ही हैं ।
वैशारद्यं तु वै नास्ति भेदे विचरतां सदा ।
भेदनिम्नाः पृथग्वादास्तस्मात्ते कृपणाः स्मृताः ॥ 94 ॥
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102 उपनिषत्सञ्चयनम् सर्वदा भेदभाव में ही रममाण लोगों को किसी काल में विशुद्धि प्राप्त नहीं होती । भेदवादी लोग भिन्नता की ओर ही जाया करते हैं, इसलिए वे कृपण कहे जाते हैं । अजे साम्ये तु ये केचिद्भविष्यन्ति सुनिश्चिताः । ते हि लोके महाज्ञानास्तच्च लोको न गाहते 119511 यदि कोई मनुष्य उस जन्मरहित साम्य में दृढ निश्चयवाले होंगे, तो वे ही इस जगत् में बड़े ज्ञानी माने जाएँगे । क्योंकि इस आत्मज्ञान में सामान्य लोगों की बुद्धि तो चलती नहीं है ।
अजेष्वजमसङ्क्रान्तं धर्मेषु ज्ञानमिष्यते ।
यतो न क्रमते ज्ञानमसङ्गं तेन कीर्तितम् ॥96 ॥
जन्मरहित जीवात्माओं में जन्मरहित ( अनादि ) ज्ञान का उचित मेल बैठता है (ऐसा ज्ञान असंक्रान्त = अमिश्रित = विशुद्ध ही है) । क्योंकि ऐसा ज्ञान अन्यत्र कहीं प्रवर्तमान नहीं होता । इसीलिए उसे असंग कहा गया है ।
अणुमात्रेऽपि वैधर्म्ये जायमाने विपश्चितः ।
असङ्गता सदा नास्ति किमुतावरणच्युतिः ॥97 ॥
द्वैतमतानुसार आत्मा में यदि लेशमात्र भी वैधर्म्य ( परिवर्तन) हो, तो वहाँ आत्मा की असंगता का मेल नहीं बैठेगा । और जब आत्मा असंग नहीं रहा, तब तो माया के आवरण को हटाने की बात ही कहाँ रही?
अलब्धावरणाः सर्वे धर्माः प्रकृतिनिर्मलाः ।
आदौ बुद्धास्तथा मुक्ता बुध्यन्त इति नायकाः ॥98 ॥
सभी जीवात्मा आवरणहीन तथा स्वभाव से ही विशुद्ध हैं । सदैव वे ज्ञानस्वरूप हैं, सदैव वे मुक्त ही हैं । ज्ञानी लोग कहते हैं कि उन्हें जाना जा सकता है ।
क्रमते न हि बुद्धस्य ज्ञानं धर्मेषु तायिनः ।
सर्वे धर्मास्तथा ज्ञानं नैतद्बुद्धेन भाषितम् ॥99 ॥
परमार्थदर्शी ज्ञानी का ज्ञान कभी किसी भी जीवात्मा में (जीवात्माओं में ) संक्रान्त नहीं होता और सभी जीवात्मा और ज्ञान तो नित्य है ( तायिनः = नित्याः ) । बुद्ध ने इस नित्यता की बात नहीं कही है ।
दुर्दर्शमतिगम्भीरमजं साम्यं विशारदम् ।
बुद्ध्वा पदमनानात्वं नमस्कुर्मो यथाबलम् ॥100।1
यह परमार्थतत्त्व बड़ा दुर्विज्ञेय है, बड़ा गहन है, जन्म (आदि) रहित है, सर्वत्र समरस है;,परमशुद्ध है ऐसे अद्वैत पद को जानकर हम उसे यथाशक्ति नमस्कार करते हैं । अलातशान्ति-प्रकरण समाप्त । माण्डूक्यकारिका सहित माण्डूक्योपनिषद् यहाँ समाप्त होती है । *
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(7 ) तैत्तिरीयोपनिषत् ( उपनिषत्परिचय ) यजुर्वेद सामान्यतया वैदिक विधियों का सन्दर्भ -ग्रन्थ माना जाता है । यजुर्वेद की दो शाखाएँ हैं — कृष्णयजुर्वेद और शुक्लयजुर्वेद । कृष्णयजुर्वेद को तैत्तिरीय भी कहा जाता है । अन्य वेदों की तरह इस शाखा के भी ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ग्रन्थ हैं । इस वेद के आरण्यक के 7 से 9 प्रकरणों में यह उपनिषद् समायी है । और इसका दसवाँ प्रकरण सुप्रसिद्ध महानारायणोपनिषद् ( याज्ञिकी उपनिषद्) है । तैत्तरीयोपनिषद् में गृहीत तीन प्रकरणों का नाम ( 1 ) शीक्षावल्ली, ( 2 ) ब्रह्मानन्दवल्ली और ( 3 ) भृगुवल्ली है । शीक्षावल्ली में बारह अनुवाक ( उपविभाग) हैं, ब्रह्मानन्दवल्ली में उन्नीस अनुवाक हैं और भृगुवल्ली में दस अनुवाक हैं । कुल एकतालीस अनुवाक हैं और प्रत्येक अनुवाक में कुछ गद्य- कण्डिकाएँ होती हैं । ‘ तैत्तिरीय' नाम के पीछे एक किंवदन्ती है कि–एक बार याज्ञवल्क्य ने अपने गुरु वैशम्पायन का कुछ अपराध किया । यों तो याज्ञवल्क्य बड़े बुद्धिमान मेधावी युवा छात्र थे सबपर अभिमानवश उनसे कुछ अपराध हो गया और गुरु ने क्रुद्ध होकर कहा - "मेरा दिया कर ज्ञान मुझे वापिस दे दो । ” याज्ञवल्क्य ने वमन करके गुरु से लिया हुआ ज्ञानचाहिएवापिस, इसलिए दिया । पर वह ज्ञान पवित्र, मूल्यवान और गूढ था, वह व्यर्थ नहीं जानातित्तर का रूप धारण वैशम्पायन ने अपने शिष्यों को उसे निगल जाने को कहा । शिष्यों ने आत्मस्वरूप होने कर उसे निगल लिया । इस किंवदन्ती का तात्पर्य यह है कि ज्ञान हमेशा उसका रक्षण से विशुद्ध ही है । ज्ञान की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए । किसी भी उपाय से करना चाहिए । तैत्तिरीय उपनिषद् कृष्णयजुर्वेद से सम्बद्ध है और कृष्ण का अर्थ तो काला या अशुद्ध अधिष्ठान (आश्रय ) काला होताहो सकताहै, परहै बात। यहाँयहतित्तरोंहै किनेज्ञानजिसकभीवमनअशुद्धकिए हुएनहीं ज्ञानहोताको। ज्ञाननिगलकरकास्वयंबादअशुद्धमें अन्योंथे को। फिरदियाभी, उसे वैशम्पायन ने ‘ कृष्ण' ( मैला- काला) कहा, क्योंकि शिष्यसूर्योपासना की और सूर्य की तरह याज्ञवल्क्य उनमें अपवाद थे । वेदों के ज्ञान के लिए उन्होंने प्राप्त किया वही 'शुक्ल' (शुद्ध ) प्रकाशित हो उठे । फिर सूर्य की कृपा से उन्होंने जो ज्ञान कहा गयापहली। शीक्षावल्ली उच्चारण ( शुद्ध उच्चारण) विषयकगएहै वेद। योग्यसाहित्यउच्चारणमें शुद्धनहींउच्चारणकरने से अर्थ का अनर्थ हो जाता है । कण्ठोपकण्ठ से जतन किए चालू रही है । साथ - ही - साथ यह का बड़ा महत्त्व था | आज तक मंत्रोच्चारण मेंहैवह। उपासकपरंपरा के हाथ- पैर- आँखें आदि के स्थान वल्ली प्रार्थना या उपासना की विधि भी बताती
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104 उपनिषत्सञ्चयनम् तथा विधि भी दी गई । उपासना का फल भी तत्तत् स्थान पर बताया गया है । शरीर - मन के संयम पर जोर दिया गया है । इस शीक्षावल्ली में ओम् को ब्रह्म का प्रतीक मानकर उसे सबमें ओत-प्रोत माना है । अन्य उपासनाएँ, शिष्योपदेश, मोक्षमीमांसा आदि अनेक विषय हैं । दूसरी ब्रह्मानन्दवल्ली में पाँच कोशों का वर्णन किया गया है । सब कोशों की महिमा भी बताई गई है । ब्रह्म को सत् और असत् मानने वालों का भेद भी दिखाया गया है | ब्रह्म और ब्रह्मवेत्ता का वर्णन किया गया है । ब्रह्मानन्द प्राप्त करने वालों की अभय प्राप्ति का वर्णन किया गया 1 तीसरी भृगुवल्ली है | इसमें भृगु को उसके पिता द्वारा दिए गए ब्रह्मोपदेश का वर्णन है । भृगु अपने पिता के पास बार- बार जाकर क्रमश: ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करते हैं- प्राण, मन, विज्ञान, आनन्द और अन्त में अपार ब्रह्म पर जाकर भृगु की ज्ञानयात्रा स्थिर होती है । किस- किस रूप की उपासना से किस -किस प्रकार का फल मिलता है, वह भी बताया गया है । शान्तिपाठः ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ वक्तारम् । नोट— इसका हिन्दी रूपान्तर अगले मन्त्र में दिया गया है । ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्य करवावहै ।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
नोट-- इसका हिन्दी रूपान्तर आगे ब्रह्मानन्दवल्ली के शान्तिपाठ में दियागया है । शीक्षावल्ली ( 1 ) प्रथमोऽनुवाकः ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥1 ॥ । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ।
इति प्रथमोऽनुवाकः ॥1 ॥
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शीक्षावल्ली - 1 ] तैत्तिरीयोपनिषत् ( 7 ) 105 हमारे लिए मित्र ( सूर्य) सुखकर हो, वरुण हमारे लिए सुखदायी हो हो, हमारे लिए इन्द्र और बृहस्पति शान्तिदायक हों । हमारे लिए बलवान, कदमोंहमारे लिए अर्यमा सुखकर हो । ब्रह्मरूप वायु को नमस्कार, हे वायु तुमको नमस्कार! तुम्हीं प्रत्यक्ष ब्रह्म हो, वालेइसलिएविष्णुतुम्हेंसुखकरही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा । तुम्हीं को मैं शास्त्रोक्त निश्चित अर्थ कहूँगा । तुम्हीं को मैं सत्य के रूप में उद्घोषितमैं करूँगा । तुम मेरी रक्षा करो और मेरे उपदेशक की भी रक्षा करो । रक्षा करो, मेरी रक्षा करो, वक्ता भी रक्षा करो । आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक— तीनों प्रकार के तापों की शान्ति होकी। ( यहाँ प्रथम अनुवाक पूरा होता है) । द्वितीयोऽनुवाकः
ॐ शीक्षां व्याख्यास्यामः । वर्णः स्वरः । मात्रा बलम् । साम सन्तानः ।
इत्युक्तः शीक्षाध्यायः ॥1 ॥
इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥2 ॥
अब हम शिक्षा की —उच्चारणशास्त्र की व्याख्या करेंगे । इसमें अकारादि वर्ण, उदात्तादि स्वर, ह्रस्वादि मात्रा, शब्दोच्चारण में आवश्यक प्राण का प्रधान रूप बल, नियमानुसार उचारण की पद्धति रूप साम तथा सन्तान ( संहिता- सन्धि) आदि विषय सीखने योग्य हैं । इसे शीक्षाध्याय कहा गया है । (यहाँ दूसरा अनुवाक पूरा हुआ) । तृतीयोऽनुवाकः सह नौ यशः । सह नौ ब्रह्मवर्चसम् । अथातः संहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः । पञ्चस्वधिकरणेषु । अधिलोकमधिज्योतिषमधिविद्य- मधिप्रजमध्यात्मम् । ता महासंहिता इत्याचक्षते । अथाधिलोकम् ।
पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । आकाशः सन्धिः । वायुः सन्धानम् ।
इत्यधिलोकम् ॥1 ॥
हम दोनों को ( गुरु और शिष्य को ) एक साथ ही यश प्राप्त हो । और हम दोनों को एक साथ ही ब्रह्मतेज की प्राप्ति हो । (क्योंकि शास्त्राध्ययन से परिमार्जित बुद्धि वाले लोग भी परमार्थ तत्त्व को समझने में सहसा समर्थ नहीं होते, अतः ) हम अब पाँच अधिकरणों में संहिता के उपनिषद् ( अर्थात् संहिता- सन्धि सम्बन्धी तात्त्विक उपासना) की व्याख्या करेंगे । ये पाँच अधिकरण हैं- ( 1 ) अधिलोक, ( 2 ) अधिज्यौतिष, (3 ) अधिविध, ( 4 ) अधिप्रज और ( 5 ) अध्यात्म । इन पाँचों अधिकरणों को विद्वान् लोग महासंहिता कहते हैं । इन अधिकरणों में से पहले हम अधिलोक सम्बन्धी उपासना की बात करेंगे । संहिता का प्रथम वर्ण पृथिवी है, अन्तिम वर्ण द्युलोक है, सन्धिभाग आकाश है और वायु सन्धान ( जोड़नेवाला ) है । ( अर्थात् 'अधिलोक' की उपासना करनेवाले मनुष्य को पूर्वोक्त संहिता में इस प्रकार की दृष्टि करनी चाहिए) । इस प्रकार यह ' अधिलोक का दर्शन' कहा गया । अथाधिज्यौतिषम् । अग्निः पूर्वरूपम् । आदित्य उत्तररूपम् । आपः सन्धिः । वैद्युतः सन्धानम् । इत्यधिज्यौतिषम् । में संहिता अधिलोक की उपासना के बाद अब अधिज्यौतिष दर्शन कहा जाता है । इस उपासना ) है का प्रथम वर्ण अग्नि है, अन्तिम वर्ण सूर्य, सन्धिभाग जल है, विद्युत् सन्धान (जोड़नेवाला
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106 उपनिषत्सञ्चयनम् ( अधिज्यौतिष के उपासक को संहिता में इस प्रकार की दृष्टि रखनी चाहिए) । इस प्रकार यहाँ ' अधिज्यौतिष दर्शन' कहा गया । अथाधिविद्यम् । आचार्यः पूर्वरूपम् । अन्तेवास्युत्तररूपम् । विद्या
सन्धिः । प्रवचन सन्धानम् । इत्यधिविद्यम् ॥2 ॥
ज्योतिविषयक दर्शन के बाद अब विद्याविषयक दर्शन ( उपासना ) कहा जाता है । यहाँ इस संहिता का प्रथम वर्ण आचार्य है । अन्तिम वर्ण अन्तेवासी ( शिष्य) है । दोनों के मिलन से उद्भूत विद्या ही सन्धि ( जोड़नेवाली ) है और प्रवचन ( परिप्रश्न- उत्तर ) आदि सन्धान ( जोड़ने का साधन ) है । इस प्रकार विद्याविषयक संहिता कही गई है । अथाधिप्रजम् । माता पूर्वरूपम् । पितोत्तररूपम् । प्रजा सन्धिः । प्रजननश्
सन्धानम् । इत्यधिप्रजम् ॥3 ॥
जब प्रजाविषयक दर्शन कहा जाता है । इस उपासनादर्शन में माता संहिता का प्रथम वर्ण है । पिता अन्तिम वर्ण है । प्रजा (सन्तति) उन दोनों को जोड़नेवाली सन्धि है । प्रजनन ( शास्त्रविहित काल का स्त्रीसंभोग ) सन्धान ( जोड़ने का साधन ) है । इस प्रकार प्रजा सम्बन्धी संहिता का रहस्य यहाँ बताया गया है । अथाध्यात्मम् । अधरा हनुः पूर्वरूपम् । उत्तरा हनुरुत्तररूपम् । वाक् सन्धिः । जिह्वा सन्धानम् । इत्यध्यात्मम् । इसके बाद अब इस पंचाधिकरणी संहिता के पाँचवें अध्यात्माधिकरण का ( आत्मविषयक संहिता अर्थात् उसके रहस्य का ) वर्णन किया जाता है — यहाँ इस संहिता में प्रथम वर्ण नीचे का जबड़ा है और अन्तिम वर्ण ऊपर का जबड़ा है । इन दोनों के मिलने से उत्पन्न हुई वाणी यहाँ सन्धि है | और जीभ वाणी की उत्पत्ति का कारण (साधन ) है । इस प्रकार यहाँ अध्यात्मविषयक संहिता कही गई ।
इतीमा महासहिताः । य एवमेता महासहिता व्याख्याता वेद ।
सन्धीयते प्रजया पशुभिः । ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन सुवर्गेण लोकेन ॥4 ॥
इति तृतीयोऽनुवाकः ॥3 ॥
इस तरह ये महासंहिताएँ कही जाती हैं । जो मनुष्य ऊपर वर्णित की गई इन महासंहिताओं की उपासना की पद्धति और रहस्य को जान लेता है और उसका अनुष्ठान करता है, वह मनुष्य प्रजा, ब्रह्मतेज, अन्नादि सम्पत्ति और स्वर्ग को प्राप्त कर लेता है । ( यहाँ तीसरा अनुवाक पूरा हुआ) । चतुर्थोऽनुवाकः यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः । छन्दोभ्योऽध्यमृतात्सम्बभूव । स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य देवधारणो भूयासम् । शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे मधुमत्तमा । कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम् । ब्रह्मणः कोशोऽसि
मेधया पिहितः । श्रुतं मे गोपाय ॥1 ॥
जो वेदों में सर्वश्रेष्ठ है, जो सर्वरूप है, जो वेदरूपी अमृत से उत्पन्न हुआ है, वह ओंकाररूप परमात्मा मुझे मेधा ( विश्लेषक तीक्ष्ण बुद्धि) से प्रसन्न (बलिष्ठ ) बना दे । हे देव! मैं अमृतत्व ( ब्रह्मज्ञान को ) धारण करनेवाला हो जाऊँ । मेरा शरीर विशेष स्फूर्तिवाला हो, मेरी जिह्वा अत्यन्त
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शीक्षावल्ली - 1 ] तैत्तिरीयोपनिषत् ( 7 ) 107 मधुरभाषिणी हो, मैं अपने कानों से बहुत सुनता रहूँ । हे ओंकार! तुम तो ब्रह्म का कोश ( खजाना हो । तुम लौकिक वुद्धि से आवृत हुए हो, इसलिए पहचाने नहीं जाते हो । मेरे द्वारा सुनी गई विद्या का) तुम रक्षण करो । आवहन्ती वितन्वाना । कुर्वाणा चीरमात्मनः । वासासि मम गावश्च । अन्नपाने च सर्वदा । ततो मे श्रियमावह । लोमशां पशुभिः सह स्वाहा । आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । विमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । दमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । शमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ॥2 ॥
हे ( अग्नि के अधिष्ठाता) देव! मेरे लिए आवश्यकता पड़ने पर तुरन्त ही तरह - तरह के वस्त्र, गायें, खाद्यान्न सामग्री — ऐसी- ऐसी बहुत- सी चीजें ला देने वाली और उन्हें बढ़ानेवाली तथा बनानेवाली ' श्री' को ला दो । जो रोमवाले पशु आदि हमें प्राप्त कराएँ । इस उद्देश्य से आपको यह आहुति दी जाती है । ब्रह्मचारी ( विद्यार्थी ) मेरे पास आएँ, वे निष्कपट हों, वे प्रामाणिक और ज्ञानधारक हों, वे इन्द्रियों का संयम करनेवाले हों, वे मन को वश में करनेवाले हों— इन सबके लिए ये पाँच आहुतियाँ दी जाती हैं ( यहाँ एक-एक उद्देश्य के लिए एक- एक आहुति है ) । यशो जनेऽसानि स्वाहा । श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा । तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा । स मा भग प्रविश स्वाहा । तस्मिन् सहस्त्रशाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा । यथाऽपः प्रवता यन्ति । यथा मासा अहर्जरम् । एवं मा ब्रह्मचारिणः । धातरायान्तु सर्वतः स्वाहा । प्रति- वेशोऽसि प्रमा भाहि प्रमा पद्यस्व ॥3 ॥
इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥4 ॥
मैं लोगों में यशस्वी होऊँ । मैं बहुत ही प्रशस्य और धनवान बनूँ । हे भगवन्! मैं ब्रह्मकोशरूप आप में समा जाऊँ । और हे भगवन्, तुम भी मुझमें समा जाओ । हे भगवन्,• हजारों शाखावाले तुममें ध्यान के द्वारा निमग्न होकर मैं अपने आपको विशुद्ध कर लूँ । ( तत्तद् उद्देश्यों से ये आहुतियाँ दी जाती हैं) । जिस प्रकार नदी आदि का समग्र जलप्रवाह निम्न स्तर पर होकर सागर से मिल जाता है, और जिस तरह दिनों को निगलने वाले महीने वर्ष में समा जाते हैं, ठीक इसी तरह हे विधाता! इसी तरह मेरे पास चारों ओर से ब्रह्मचारी आते रहें, और मैं उन्हें विद्या देता रहूँ । तुम सबके विश्रामस्थल हो । मेरे लिए तुम प्रकाशित हो । मुझे तुम प्राप्त हो जाओ । ( इन सभी प्रत्येक उद्देश्य के लिए एक- एक आहुति देनी चाहिए । ) ( यहाँ चौथा अनुवाक पूरा हुआ । ) पञ्चमोऽनुवाकः भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्त्रो व्याहृतयः । तासामु ह स्मैतां चतुर्थीम् । महाचमस्यः प्रवेदयते । मह इति । तद्ब्रह्म । स आत्मा । अङ्गान्यन्या
देवताः । भूरिति वा अयं लोकः । भुव इत्यन्तरिक्षम्लोका महीयन्ते। सुवरित्यसौ॥1 ॥
लोकः । मह इत्यादित्यः । आदित्येन वाव सर्वे से भिन्न चौथी व्याहृति ‘ मह: ’ भूः, भुवः और सुवः — ये तीन व्याहृतियाँ तो प्रसिद्ध हैं । इन तीनोंब्रह्म है । वह सभी व्याहृतियों उसको महाचमस केपुत्रहै । ने सर्वप्रथम जाना था । चौथी व्याहृति ही
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108 उपनिषत्सञ्चयनम् का आत्मा है । अन्य देवता उसके अंग हैं । ' भू' व्याहति पृथ्वी लोक है, ' भुव: ' व्याहृति अन्तरिक्ष है और ‘ सुवः ’ यह प्रसिद्ध स्वर्गलोक है । 'मह: ' सूर्य है, क्योंकि सूर्य से सब लोक वृद्धि प्राप्त करते हैं । भूरिति वा अग्निः । भुव इति वायुः । सुवरित्यादित्य । मह इति चन्द्रमाः । चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतीष महीयन्ते । भूरिति वा
ऋचः । भुव इति सामानि । सुवरिति यजूषि ॥2 ॥
अथवा ‘ भू' व्याहति अग्नि है, ' भुव: ' व्याहृति वायु है, ' सुवः ' व्याहृति सूर्य और 'महः ’ व्याहृति चन्द्रमा है । क्योंकि चन्द्र से ही सब ज्योतियाँ वृद्धि को प्राप्त करती हैं । अथवा तो 'भू: ' व्याहृति ही ऋग्वेद है, ‘ भुव: ’ ही सामवेद है, 'सुव: ' ही यजुर्वेद है । ' मह ' इति ब्रह्म । ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते । भूरिति वै प्राणः । भुव इत्यपानः । सुवरिति व्यानः । मह इत्यन्नम् । अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते । ता वा एताश्चतस्त्रश्चतुर्धा । चतस्त्रश्चतस्त्रो व्याहृतयः । ता यो
वेद । स वेद ब्रह्म । सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति ॥3 ॥
इति पञ्चमोऽनुवाकः ॥5 ॥
यह ‘ मह: ’ ब्रह्म है क्योंकि ब्रह्म से ही सब वेद वृद्धि प्राप्त करते हैं । यह 'भू:' की व्याहृति ही प्राण है, ' भुवः ' यह अपान है, 'सुवः' यह व्यान है, ' मह:' यह अन्न है । अन्न से ही ये सभी प्राण वृद्धि प्राप्त करते हैं ( तृप्त होते हैं; अर्थात् ये तीन व्याहृतियाँ मानो प्राण ही हैं और महः = अन्न चौथी व्याहृति है ) । ये चार व्याहृतियाँ चार-चार प्रकार (कुल सोलह प्रकार) की हैं । जो उन्हें तत्त्वतः जानता है, वह ब्रह्म को जानता है । ऐसे ब्रह्मवेत्ता को सभी देव बलि ( भेंट ) उपहार देते हैं । ( यहाँ पाँचवाँ अनुवाद पूरा हुआ ।) षष्ठोऽनुवाकः स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः । तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः । अमृतो हिरण्मयः । अन्तरेण तालुके । य एष स्तन इवावलम्बते । सेन्द्रयोनिः । यत्रासौ केशान्तो विवर्तते । व्यपोह्य शीर्षकपाले । भूरित्यग्नौ
प्रतितिष्ठति । भुव इति वायौ ॥1 ॥
इस हृदय में पूर्वोक्त जो यह आकाश है, उसमें यह विशुद्ध प्रकाशमय अविनाशी मनोमय पुरुष रहता है । दोनों तालुओं के बीच जो यह स्तन जैसा लटक रहा है, इसके भी भीतर जहाँ यह बालों का मूल स्थान ( ब्रह्मरन्ध्र ) स्थित है, वहाँ मस्तक के दोनों कपालों को भेद कर जो सुषुम्णा नाम की नाड़ी निकली है, वह इन्द्रयोनि ( परमात्मा की प्राप्ति का द्वार) है । महापुरुष अन्तकाल में ‘ भू: ' इस व्याहति के अर्थरूप अग्नि में स्थित होता है, और ' भुव:' इस व्याहृति के अर्थरूप वायु देवता में स्थित होता है । सुवरित्यादित्ये । मह इति ब्रह्मणि । आप्नोति स्वाराज्यम् । आप्नोति मनसस्पतिम् । वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः । श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः । एतत्ततो
भवति । आकाशशरीरं ब्रह्म । सत्यात्म प्राणारामं ब्रह्मआनन्दम् ।
शान्तिसमृद्धममृतम् । इति प्राचीनयोग्योपास्स्व ॥2 ॥
इति षष्ठोऽनुवाकः ॥6 ॥