Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 151–160

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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शीक्षावल्ली - 1 ] तैत्तिरीयोपनिषत् ( 7 ) 109 उसके बाद वह महापुरुष ' स्व: ' इस व्याहृति के अर्थरूप सूर्य में इस व्याहृति के अर्थरूप ब्रह्म में स्थित होता है । वह मनुष्य स्वाराज्य स्थित होता है । बाद में ‘महः ’ स्वामी को प्राप्त कर लेता है । वह वाणी का स्वामी हो जाता है, वह को प्राप्त कर लेता है । मन विज्ञान का स्वामी हो जाता है । वह पूर्वोक्त साधन के द्वारा इस फलनेत्रोंकोका स्वामी हो जाता है, वह आकाश की तरह ही निराकार और सर्वव्यापी है । वह एकमात्र सत्तारूप हैप्राप्त। वहकरता है । वह ब्रह्म, आराम देनेवाला शान्ति से सम्पन्न और अविनाशी है । ऐसा मानकर हे सभी इन्द्रियों को ( ), उसकी उपासना करो । यहाँ छठाँ अनुवाक पूरा हुआ । प्राचीनयोग्य शिष्य तुम सप्तमोऽनुवाकः पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशाः । अग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि । आप ओषधयो वनस्पतय आकाश आत्मा । इत्यधिभूतम् । अथाध्यात्मम् । प्राणो व्यानोऽपान उदानः समानः । चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक् । चर्म मास स्नावास्थिमज्जा । एतदधिविधाय ऋषिर- वोचत् । पाङ्ग्ङ्क्तं वा इदः सर्वम् । पाङ्केनैव पाङ्क स्पृणोतीति ॥1 ॥

इति सप्तमोऽनुवाकः ॥।7 ॥ पृथ्वी, अंतरिक्ष, स्वर्ग, दिशाएँ, ईशानादि दिशाकोण- ये पाँच लोगों की आधिभौतिक पंक्ति है । अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र—ये पाँच ज्योतिसमुदाय की पंक्ति है । जल, वनस्पति, औषधियाँ, आकाश और आत्मा (और उनका संधान रूप स्थूल शरीर ) ये सब मिलकर स्थूल पदार्थों की पंक्ति है । इस प्रकार आधिभौतिक दृष्टि से वर्णन हुआ । अब आध्यात्मिक दृष्टि बताते हैं — प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान- ये पाँचों प्राणों की पंक्ति है । चक्षु, श्रोत्र, मन, वाक् और त्वक्— यह करणों की पंक्ति है | त्वचा, मांस, स्नायु, अस्थि और मज्जा— यह शरीरगत धातु की पंक्ति है । इस तरह ठीक तरह से कल्पना करके ऋषि ने कहा कि यह सब पांक्त ही है । साधक (उपासक ) आध्यात्मिक पांक्त से बाह्य पांक्त को और बाह्य से आध्यात्मिक पांक्त को पूर्ण करता है । ( यहाँ सातवाँ अनुवाक पूर्ण हुआ । ) अष्टमोऽनुवाकः ओमिति ब्रह्म । ओमितीद÷सर्वम् । ओमित्येतदनुकृतिर्ह स्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति । ओमिति सामानि गायन्ति । ओशोमिति शस्त्राणि शःसन्ति । ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रसौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति । ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्न- वानीति । ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥1 ॥

इत्यष्टमोऽनुवाकः ॥8 ॥

‘ ओम् हकारसूचक है ', यहयह शब्दब्रह्मतो प्रसिद्धहै, हैक्योंकि। यज्ञ 'करानेवालेॐ ' सर्वरूपलोगहै'ॐ। 'ॐश्रावय' यह' ऐसाअनुकृतिकहकर( अनुकरणही बोलते— सम्मतिहैं । ॐका) बोलकर ही सामगान किया जाता है । 'ॐ शोम्' ऐसा बोलकर ही गतिहीन ( अछांदस? ) ऋचाओं पाठ किया जाता है । उध्वर्यु लोग प्रत्येक कर्म के प्रति 'ॐ ' का उच्चारण करते हैं । 'ॐॐ' काबोलकरउच्चारणही करके ही ब्रह्मा— यह चौथा ऋत्विक् अनुमति देता है । वेदाध्ययन करनेवाला ब्राह्मण

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110 उपनिषत्सञ्चयनम् कहता है कि— ‘ मैं ब्रह्म को ( वेद को या परब्रह्म को) प्राप्त करूँ ।' और इसीलिए वह ब्रह्म को प्राप्त करता है । ( यहाँ आठवाँ अनुवाद पूरा हुआ । ) नवमोऽनुवाकः ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च । तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च । दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । शमश्च स्वाध्याय- प्रवचने च । अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्निहोत्रं च स्वाध्याय- प्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्याय- प्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः । तप

इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः ।

तद्धि तपस्तद्धि तपः ॥1 ॥

इति नवमोऽनुवाकः ॥१ ॥

शास्त्रादि द्वारा बुद्धि में किया गया निश्चय अर्थात् 'ऋत' और अध्ययन- अध्यापन करना8चाहिए । सत्य और अध्ययन- अध्यापन करना चाहिए । तप और अध्ययन- अध्यापन करना चाहिए । इन्द्रियसंयम और अध्ययन- अध्यापन करना चाहिए । मनोनिग्रह और अध्ययन- अध्यापन करते रहना चाहिए । अग्नि का आधान और अध्ययन- अध्यापन करना चाहिए । अग्निहोत्र और अध्ययन- अध्यापन करते रहना चाहिए । अतिथि- सत्कार और अध्ययन- अध्यापन करते रहना चाहिए । मनुष्योचित कार्यों के साथ अध्ययन- अध्यापन करते रहना चाहिए । सन्तानोत्पत्ति और अध्ययन- अध्यापन करते रहना चाहिए । शास्त्रोक्त रीति से स्त्रीसंग और अध्ययन- अध्यापन करना चाहिए । पौत्रों की उत्पत्ति और अध्ययन- अध्यापन करना चाहिए । रथीतर का पुत्र सत्यवक्ता मानता है कि सत्य का ही आचरण करना चाहिए । परन्तु सदैव तपोनिष्ठ ऐसे पुरुशिष्ट का मत है कि तप ही सदैव अनुष्ठान करने योग्य ( आचरण करने योग्य) है । परन्तु मुद्गल के पुत्र नाक मुनि का मत तो यही है कि स्वाध्याय और प्रवचन ( अध्ययन और अध्यापन ) ही करना चाहिए । इसलिए स्वाध्याय और प्रवचन ही वास्तव में तप हैं । सचमुच वही तप है । ( यहाँ नवाँ अनुवाक पूरा हुआ । ) दशमोऽनुवाकः अहं वृक्षस्य रेरिवा । कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव । ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव- स्वमृतमस्मि । द्रविणः सवर्चसम् । सुमेधा अमृतोक्षितः । इति त्रिशङ्को- र्वेदानुवचनम् ॥1 ॥

इति दशमोनुवाकः ॥10 ॥

“ मैं इस जन्ममरणरूप वृक्ष का उच्छेदक हूँ । मेरी कीर्ति पर्वतशिखर की तरह उन्नत और विशाल है । अन्नोत्पादन की शक्तिवाले सूर्य में जैसे अमृत है, वैसे मैं भी पवित्र अमृतस्वरूप ही हूँ । और मैं प्रकाशयुक्त भी हूँ, मैं धन का भण्डार हूँ । मैं परमानन्दमय अमृत से अभिषिंचित हूँ । मैं परम बुद्धिमान हूँ । ” — इस प्रकार त्रिशंकु ऋषि का वेदानुभव है ( अर्थात् मोक्षप्राप्ति होने के बाद उनके अन्तस् की यह आवाज है । ) ( यहाँ दसवाँ अनुवाक पूर्ण हुआ । )

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शीक्षावल्ली - 1] तैत्तिरीयोपनिषत् ( 7 ) 111 एकादशोऽनुवाकः वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्या- यान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः ।

सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् ।

भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् ॥1 ॥

वेदों का अध्ययन कराने के बाद आचार्य शिष्य को उपदेश देते हैं कि— सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो । स्वाध्याय में प्रमाद नहीं करना चाहिए । आचार्य को मनवांछित धन लाकर उनकी आज्ञा से गृहस्थाश्रम का प्रारंभ करके सन्तान - परम्परा चालू रखो । उसका उच्छेद मत करो । सत्य से कभी विचलित न हो, धर्म से कभी विचलित नहीं होना चाहिए । कुशलमंगल के कार्यों से कभी दूर नहीं रहना चाहिए । ऐश्वर्यदायक कर्मों में कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए । वेद के पठन- पाठन में प्रमाद नहीं करना चाहिए | देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि

सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकः सुचरितानि । तानि त्वयोपा- स्यानि ॥2 ॥

देवकार्य और पितृकार्य को कभी भूलना नहीं । माता में देवबुद्धि रखनेवाले बनो, पिता में देवबुद्धि रखनेवाले बनो, आचार्य में देवबुद्धि रखनेवाले बनो । जो दोषरहित कर्म हों, उन्हीं का तुम अनुसरण करो, दूसरों का नहीं । तुम अच्छे कर्मों का ही अनुसरण करो । नो इतराणि । ये के चास्मच्छ्रेया सो ब्राह्मणाः । तेषां त्वयाऽऽसनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयाऽदेयम् । श्रिया देयम् । हिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् । अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् ॥3 ॥

इसके विपरीत कर्मों का अनुसरण मत करना । जो कोई भी हमसे श्रेष्ठ ब्राह्मण हों, उन्हें तुम आसनादि देकर विश्राम देते रहो । श्रद्धापूर्वक दान करना चाहिए, श्रद्धारहित दान नहीं देना चाहिए | आर्थिक स्थिति के अनुसार दान करना चाहिए । शर्म रखकर भी देना चाहिए । भय से भी देना चाहिएहो। और विवेकपूर्वक दान करना चाहिए । और उसके बाद यदि तुम्हें अपने कर्तव्यनिर्णय में कोई शंका या आचारसम्बन्धी कोई शंका हो तो— ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु । तेयथातत्रते ब्राह्मणाः संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । वेदो- तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः । एष उपदेशः । एषा ॥4 ॥

पनिषत् । एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् इत्येकादशोऽनुवाकः ॥1 1 ॥ स्वभाववाले, वहाँ जो उत्तम विचारवाले, योग्य सलाहकार, समुचित आचारवाले, सरलमधुरउसी प्रकार का व्यवहार केवल धर्माभिलाषी ब्राह्मण हों, वे जिस प्रकार उस क्षेत्र में वर्तन करें, वहाँ तुम्हें

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112 उपनिषत्सञ्चयनम् करना चाहिए । और भी यदि कहीं किसी दूषित कलंकवाले मनुष्य के साथ काम करने में संदेह हो, तो भी वहाँ जो उत्तम विचारवाले, योग्य सलाह देनेवाले, सदाचारी, मधुर स्वभाववाले, केवल धर्माभिलाषी ब्राह्मण हों, वे जिस तरह उनके साथ बर्ताव करें, उसी प्रकार तुम्हें व्यवहार करना चाहिए । यह शास्त्र की आज्ञा है, यही गुरुजनों का उपदेश है । यही वेदों का रहस्य है । यही परंपरागत बोध है । इसी तरह व्यवहार करना चाहिए । यही आचरण करना चाहिए । ( यहाँ ग्यारहवाँ अनुवाक पूरा हुआ । ) द्वादशोऽनुवाकः शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।

त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् । ऋतमवादिषम् । सत्यमवादिषम् ।

तन्मामावीत् । तद्वक्तारमावीत् । आवीन्माम् । आवीद्वक्तारम् ॥1 ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।

इति द्वादशोऽनुवाकः ॥12 ॥

दिन और प्राण के अधिष्ठाता देव -मित्र, सूर्य हमारे लिए कल्याणकारी हों । तथा रात्रि और अपान के अधिष्ठाता वरुण देव हमारे लिए कल्याणकारी हों । चक्षु और सूर्यमण्डल के अधिष्ठाता अर्यमा देव हमारा कल्याण करें । बल और भुजाओं के अधिष्ठाता इन्द्रदेव हमारे लिए कल्याणकारी हों । वाणी और बुद्धि के अधिष्ठाता देव बृहस्पति हमारे लिए कल्याणकारी हों । त्रिविक्रमरूपी विशाल कदम भरनेवाले विष्णु हमारे लिए कल्याणकारी हों । (वे चरणों के अधिष्ठाता हैं ) । उपर्युक्त सभी देवताओं के आत्मस्वरूप ब्रह्म को मेरा नमस्कार हो । हे वायुदेव! आपको नमस्कार हो । आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं । आपको ही हमने प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा है । आपको ही 'ऋत' कहा है । आपको ही सत्य कहा है । उन सर्वेश्वर परमात्मा ने मेरी रक्षा की है । उन्होंने वक्ता की ( आचार्य की ) भी रक्षा की है । मेरी और मेरे आचार्य की रक्षा की है । तीनों प्रकार के तापों की शान्ति हो । ( यहाँ बारहवाँ अनुवाक पूरा होता है । ) यहाँ तैत्तिरीयोपनिषद् में शीक्षावल्ली समाप्त हुई । I अथ ब्रह्मानन्दवल्ली ( 2 ) प्रथमोऽनुवाकः ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ।

तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

हे परमात्मा! आप हम गुरु-शिष्य – दोनों की एक साथ रक्षा करें, दोनों का एक साथ ही पालन करें | हम दोनों एक साथ ही शक्ति प्राप्त करें । हमारी दोनों की पढ़ी हुई विद्या तेजस्वी हो । हम दोनों कभी परस्पर द्वेष न करें । ॐ त्रिविध तापों की शान्ति हो । ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम् । तदेषाऽभ्युक्ता । सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह । यो ब्रह्मणा

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ब्रह्मानन्दवल्ली - 2 ] तैत्तिरीयोपनिषत् ( 7 ) 113 विपश्चितेति । तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । आकाशा- द्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी । पृथिव्या ओषधयः । ओषधीभ्योऽन्नम् । अन्नात्पुरुषः । स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः । तस्येदमेव शिरः । अयं दक्षिणः पक्षः । अयमुत्तरः पक्षः । अयमात्मा । इदं पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥1 ॥

इति प्रथमोऽनुवाकः ॥1 ॥

ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है । इस भाव को बताने वाली यह श्रुति कही गई है । ब्रह्म सत्य, ज्ञानरूप और अनन्त है । जो मनुष्य परमशुद्ध आकाश में रहने पर भी प्राणियों की हृदयरूपी गुफा में छिपे हुए ब्रह्म को जानता है, वह विज्ञानस्वरूप ब्रह्म के साथ सब भोगों का अनुभव करता है 1 उसी इस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ । आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी, पृथ्वी से औषधियाँ, औषधियों से अन्न पैदा हुए । वह यह पुरुष अन्नमय और रसमय ही है । ( पुरुष में पक्षी की कल्पना करके कहते हैं कि— ) उसका जो मस्तक है वह शिर है, यह दाहिना पंख ही दक्षिण भुजा है, यह बाँया पंख है वही बाँया हाथ है । शरीर का मध्यभाग ही उसका आत्मा है । और निम्नभाग ही पुच्छ और प्रतिष्ठा है । इस विषय में यह कहा जानेवाला श्लोक है । ( यहाँ पहला अनुवाक पूरा हुआ । ) द्वितीयोऽनुवाकः अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याः काश्च पृथिवीश्रिताः । अथो अन्नेनैव जीवन्ति । अथैनदपि यन्त्यन्ततः । अन्न हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति । येऽन्नं ब्रह्मोपासते ।

अन्नहि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । अन्नाद्भूतानि जायन्ते ।

जातान्यन्नेन वर्धन्ते । अद्यतेऽत्ति च भूतानि तस्मादन्नं तदुच्यत इति ॥

तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्राण एव शिरः । व्यानो दक्षिणः पक्षः । अपान उत्तरः पक्षः । आकाश आत्मा । पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥1 ॥

इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥2 ॥

पृथ्वी का आश्रय लेकर रहनेवाले जो सब प्राणी हैं, वे सब अन्न से ही उत्पन्न होते हैं ही, औरसर्वभूतोंबाद में अन्न से ही जीते हैं, और अन्त में वे इस अन्न में ही विलीन हो जाते हैं । इसलिए अन्न करते हैं, में श्रेष्ठ है । इसीलिए उसे ' सर्वोषधरूप' कहते हैं । जो साधक अन्न की भूतोंब्रह्मभावमें श्रेष्ठसे उपासनाहै । इसलिए उसे वे अवश्य सभी प्रकार के अन्न को प्राप्त कर लेते हैं । क्योंकि अन्नहोतेहीहैं और उत्पन्न होकर अन्न से ही ‘ ' सर्वौषध नाम से कहा गया है । अन्न से ही सभी प्राणी उत्पन्न अन्न भी प्राणियों को खाता है । वृद्धि को प्राप्त करते हैं । वह अन्न प्राणियों द्वारा खाया जाता है और इसलिए वह ‘ अन्न' शब्द से कहा जाता है । एक प्राणमय पुरुष है । अवश्य ही उस अन्नरसमय शरीर से अलग ही, उसी के अन्दरआत्मारहनेवालाअवश्य ही इस पुरुष के उस प्राणमय पुरुष से यह अन्नरसमय व्याप्त है । यह प्राणमय 8 उ० प्र०

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114 उपनिषत्सञ्चयनम् परिमाणवाला है । इस प्राणमय आत्मा का प्राण ही मानो मस्तक है । व्यान उसका दाहिना पंख है, अपान उसका बाँया पंख है, आकाश उसके शरीर का मध्य भाग है, पृथ्वी पूँछ और आधार है । इस प्राण की महिमा बताने के लिए भी यह आगे कहा जानेवाला एक श्लोक है । ( यहाँ दूसरा अनुवाक पूर्ण हुआ । ) तृतीयोऽनुवाकः प्राणं देवा अनु प्राणन्ति । मनुष्याः पशवश्च ये । प्राणो हि भूतानामायुः ।

तस्मात्सर्वायुषमुच्यते । सर्वमेव त आयुर्यन्ति । ये प्राणं ब्रह्मोपासते ।

प्राणो वै भूतानामायुः । तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति ॥

तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य यजुरेव शिरः । ऋग् दक्षिणः पक्षः । सामोत्तरः पक्षः । आदेश आत्मा । अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥1 ॥

इति तृतीयोऽनुवाकः ॥3 ॥

जो देव, मनुष्य और पशु आदि प्राणी हैं, वे सब प्राण का अनुसरण करके ही चेष्टा करते हैं ( जीवित रहते हैं ) । क्योंकि प्राण ही प्राणियों का आयुष्य है; इससे यह प्राण 'सर्वायुष' कहा जाता है । प्राण ही प्राणियों का जीवन है; इससे वह सबका आयुष कहा जाता है । ऐसा मानकर यदि कोई साधक प्राण की ब्रह्मरूप में उपासना करता है, तो वह सब प्रकार के आयुष्य को प्राप्त कर लेता है । उसका पहले का जो अन्नरसमय आत्मा है, वही यह अन्तरात्मा है । तो इस प्राणमय पुरुष से अलग ही भीतर में रहनेवाला मनोमय आत्मा अवश्य है । उस मनोमय आत्मा से यह प्राणमय शरीर पूर्णतः व्याप्त है । यह मनोमय आत्मा निश्चित ही उस पुरुष के ही आकारवाला है । उसकी पुरुषतुल्य आकृति में व्याप्त होने से ही यह मनोमय आत्मा पुरुषाकार है । इस मनोमय पुरुष का मस्तक मानो यजुर्वेद है, ऋग्वेद मानो दाहिना पंख है, सामवेद मानो बायाँ पंख है, विधिवाक्य शरीर का मध्यभाग है, और अंगिरा ऋषि द्वारा देखे गए अथर्ववेद के मंत्र ही पुच्छ और आधार हैं । इसकी महिमा के विषय में आगे कहा जानेवाला एक श्लोक है । ( यहाँ तीसरा अनुवाक पूर्ण होता है । ) चतुर्थोऽनुवाकः यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति ॥ तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं

दक्षिणः पक्षः । सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा ।

तदप्येष श्लोको भवति ॥1 ॥

इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥4 ॥

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ब्रह्मानन्दवल्ली - 2] तैत्तिरीयोपनिषत् ( 7 ) 115 जहाँ से मन सहित वाणी आदि इन्द्रियाँ उसको प्राप्त किए बिना ही वापिस लौट आती हैं, उस ब्रह्म के आनन्द को जाननेवाला पुरुष कभी भी भय को प्राप्त नहीं होता । ऐसा श्लोक है । इस मनोमय शरीर का भी यही परमात्मा शरीर में प्रतिष्ठित आत्मा है । पूर्वनिर्विष्ट इस मनोमय पुरुष से भी अलग एक और भीतर स्थित आत्मा 'विज्ञानमय' है । उस विज्ञानमय आत्मा से मनोमय शरीर व्याप्त है । यह विज्ञानमय आत्मा निःसन्देह पुरुषाकार है । उसके पुरुषाकार में अनुगत होने से ही यह विज्ञानमय पुरुषाकार बताया जाता है । उस विज्ञानमय आत्मा का 'श्रद्धा ' ही मानो मस्तक है, 'ऋत' मानो दाहिना पंख है, सत्य मानो बायाँ पंख है, योग उसका मध्यभाग है, और महत्तत्त्व पुच्छ और आधार भाग है | इसके विषय में भी यह आगे कहा जानेवाला श्लोक है । ( यहाँ चौथा अनुवाक पूरा हुआ । ) पञ्चमोऽनुवाकः विज्ञानं यज्ञं तनुते । कर्माणि तनुतेऽपि च । विज्ञानं देवाः सर्वे । ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते । विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद । तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति । शरीरे पाप्मनो हित्वा । सर्वान्कामान्समश्नुत इति ॥ तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा आनन्दमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो

दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ॥

तदप्येष श्लोको भवति ॥ 1 ॥

इति पञ्चमोऽनुवाकः ॥5 ॥

विज्ञान ही यज्ञों का विस्तार करता है और कर्मों का भी विस्तार करता है । सभी इन्द्रियरूपी देव सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म के रूप में विज्ञान की सेवा करते हैं । कोई भी साधक यदि विज्ञान को ब्रह्मरूप से जान लेता है और उससे प्रमाद नहीं करता तथा अपने निश्चय से विचलित नहीं होता, तो शरीराभिमान से जन्में पापों के समूह को शरीर में ही छोड़कर सब लोकों का अनुभव करता है ' ( ) के । ऐसा यह श्लोक है । उस विज्ञानमय का यह परमात्मा ही शरीरान्तर्गत आत्मा है कि जो पूर्ववर्ती मनोमय शरीर का ही आत्मा है | निश्चय ही वह पूर्वोक्त विज्ञानमय जीवात्मा से अलग और उसके भी भीतर रहनेवाला आत्मा आनन्दमय परमात्मा है । उससे यह विज्ञानमय पूर्णतः व्याप्त है । वह यह आनन्दमय परमात्मा भी पुरुष सदृश आकारवाला है । वह विज्ञानमय की पुरुषाकारता में अनुगत होने से ही यह आनन्दमयपंख है, परमात्माआनन्द पुरुषाकार कहलाता है । उस आनन्दमय का शिर मानो 'प्रिय' है, 'मोद' मानो दाहिना भी यह श्लोक ही शरीर का मध्य भाग है और ब्रह्म ही पुच्छ तथा आधार है । इसकी महिमा के विषय में है । ( यहाँ पाँचवाँ अनुवाक पूर्ण हुआ । ) षष्ठोऽनुवाकः असन्नेव स भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद । सन्तमेनं ततो विदुरिति । तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य । अथातोऽनुप्रश्नाः । उताविद्वानमुंप्रेत्य । लोकं प्रेत्य । कश्चन गच्छती3 । आहो विद्वानमुं लोकं कश्चित्समश्नुता 3 उ ॥

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116 उपनिषत्सञ्चयनम् सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । इदः सर्वमसृजत । यदिदं किंच । तत्सृष्ट्वा । तदेवानुप्राविशत् । तदनु- प्रविश्य । सच्च त्यच्चाभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चानि- लयनं च । विज्ञानं चाविज्ञानं च । सत्यं चानृतं च । सत्यमभवत् । यदिदं

किंच । तत्सत्यमित्याचक्षते । तदप्येष श्लोको भवति ॥1 ॥

इति षष्ठोऽनुवाकः ॥6 ॥

जो मनुष्य 'ब्रह्म नहीं है ' – इस प्रकार मानता है, तो वह असत् ही हो जाता है । और यदि कोई 'ब्रह्म है ' – इस प्रकार मानता है, तो उसको ज्ञानी लोग सन्तपुरुष मानते हैं । ऐसा यह श्लोक है । उस आनन्दमय का भी यही शरीरान्तर्वती आत्मा है, जो कि पूर्वोक्त विज्ञानमय का है । तब यहाँ से अनुप्रश्न शुरू होते हैं ( आचार्योपदेश के बाद शिष्यद्वारा पूछे गए प्रश्न शुरू होते हैं ) । पहला प्रश्न है कि यदि ब्रह्म है तो उसे न जाननेवाला कोई भी मनुष्य मरण के बाद परलोक में जाता है या नहीं? और दूसरा प्रश्न यह है कि ब्रह्म को जाननेवाला कोई विद्वान् भी मरने के बाद परलोक को प्राप्त करता है या नहीं? (इन प्रश्नों के उत्तर में ब्रह्मस्वरूप का वर्णन करते हुए श्रुति कहती है कि— ) उस परमेश्वर ने संकल्प किया कि मैं प्रकट होऊँ और (नामरूपात्मक ) बहुत हो जाऊँ । उसने तप किया और अपने संकल्प का विस्तार किया । तप करके यह जो कुछ है, उसे उत्पन्न किया । जगत् की रचना करने के बाद वह स्वयं ही उसमें प्रविष्ट हो गया । उसके साथ ( उसमें प्रविष्ट होने के बाद ) स्वयं ही मूर्त और अमूर्त हो गया । आश्रय- अनाश्रय, चेतन- अचेतन, व्यावहारिक सत्य और असत्य हो गया । यह जो कुछ भी है, उसे ब्रह्मज्ञानी 'सत्य' ही समझते हैं । इसके विषय में यह (कहा जानेवाला) श्लोक है । ( यहाँ छठा अनुवाक पूरा हुआ । ) सप्तमोऽनुवाकः

असद्वा इदमग्र आसीत् । ततो वै सदजायत । तदात्मानः स्वयमकुरुत ।

तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति ॥

द्वै तत्सुकृतम् । रसो वै सः । रसः ह्येवायं लब्ध्वाऽनन्दी भवति । को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात्। यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयति । यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयने- ऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते । अथ सोऽभयं गतो भवति । यदा ह्येवैष एतस्मि- नुदरमन्तरं कुरुते । अथ तस्य भयं भवति । तत्त्वेव भयं विदुषोऽमन्वा- नस्य । तदप्येष श्लोको भवति ॥1 ॥

इति सप्तमोऽनुवाकः ॥7 ॥

उत्पन्न ( अभिव्यक्त) होने से पहले यह जगत् अव्यक्त ब्रह्मरूप ही था । उसी में से यह नामरूपात्मक जगत् उत्पन्न हुआ । उस (आत्मा ) ने स्वयं को ऐसा बनाया, इसलिए वह ' सुकृत' कहलाया । ( ऐसा वह श्लोक है ) । जो वह ‘ सुकृत' है, वह रस ही है । इस रस को पाकर पुरुष आनन्द युक्त हो जाता है आकाश की भाँति आनन्दरूप व्यापक परमात्मा न होता, तो कौन जीवित रह सकता था? कौन । प्राणोंयदि

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ब्रह्मानन्दवल्ली - 2 ] तैत्तिरीयोपनिषत् ( 7 ) 117 की चेष्टा कर सकता था? सचमुच यह परमात्मा ही सबको आनन्दित करता है । जिस समय साधक इस अदृश्य, अशरीरी, अनिर्वाच्य, पराश्रयरहित, परब्रह्म परमात्मा में निर्भयतापूर्वक स्थिति प्राप्त करता हैं, उस समय वह अभयपद को प्राप्त करता है । क्योंकि जब तक लेशमात्र भी परमात्मा से वियोग रहता है, वहाँ तक मनुष्य को जन्म- मरणरूप भय बना रहता है । ऐसा भय केवल मूर्ख को ही नहीं होता, अभिमानी विद्वान् को भी होता है । इसी अर्थ में यह कहा जानेवाला श्लोक है । ( यहाँ सातवाँ अनुवाक पूर्ण हुआ) । अष्टमोऽनुवाकः भीषाऽस्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूर्यः । भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च । मृत्युर्धावति पञ्चम इति । सैषाऽऽनन्दस्य मीमासा भवति । युवा स्यात्साधुयुवाध्यायकः । आशिष्ठो दृढिष्ठो बलिष्ठः । तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् । स एको मानुष आनन्दः । ते ये शतं मानुषा आनन्दाः ॥1 ॥

उसी के भय से पवन चलता है, उसी के भय से सूर्य उगता है, उसी के भय से अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ यम अपने - अपने कार्य यथासमय कर रहे हैं । अब यह ब्रह्मानन्द की मीमांसा ( कही जाती ) है । जो सदाचारी, वेदज्ञ, आशाओं से भरा (कभी निराश नहीं होनेवाला), बहुत दृढ़ और बलवान नवयुवक होता है, यह धनधान्यपूर्ण समग्र पृथिवी उसी की हो जाती है । उसका जो आनन्द है, वह मानुष आनन्द है | मनुष्य के ऐसे सौ आनन्द हों, तो— स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः । स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः । स एकः पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दाः । स एक आजानजानां देवानामा- नन्दः ॥2 ॥

वह मनुष्यगन्धर्वों का एक आनन्द (के तुल्य ) होता है । ऐसा आनन्द कामना से दूषित नहीं होनेवाले ब्रह्मवेत्ता को तो सहज प्राप्त ही है । और मनुष्यगन्धर्वों के ऐसे जो सौ आनन्द होते हैंको, वहतो देवगन्धर्वों का एक आनन्द होता है । वह आनन्द भी कामना से अदूषित चित्तवाले ब्रह्मज्ञानीमें रहनेवाले सहज ही होता है । और देवगंधर्वों के ऐसे सौ आनन्द जो हैं, वह चिरस्थायी पितृलोकब्रह्मज्ञानी के लिए तो पितृओं का मात्र एक ही आनन्द होता है । यह आनन्द भी कामनाओं से अदूषित हों, तब ‘ आजानज ’ सहज प्राप्त ही है । चिरस्थायी पितृलोक में रहने वाले पितृओं के ऐसे सौ आनन्द नाम के देवों का वह एक ही आनन्द होता है ॥ स श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः। श्रोत्रियस्य एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः । ये कर्मणा देवानपि यन्ति । स एको चाकामहतस्य । ते ये शतं कर्मदेवानां । देवानामानन्दाःते ये शतं देवानामानन्दाः । देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य स एक इन्द्रस्यानन्दः ॥3 ॥

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118 उपनिषत्सञ्चयनम् यह आनन्द भी कामनाओं से अदूषित ब्रह्मज्ञानी के लिए स्वभावसिद्ध ही है । आजानज देवों के ऐसे जो सौ आनन्द होते हैं, उनके बराबर ' कर्मदेव' नाम के देवों का एक ही आनन्द होता है । वे कर्मदेव कर्म से देवत्व को प्राप्त हुए हैं । वह आनन्द भी कामनाओं से मुक्त ब्रह्मवेत्ता को सहज ही मिलता है । और उन कर्मदेवों के जो सौ आनन्द हैं, उसके तुल्य देवों का एक ही आनन्द होता है और ऐसा आनन्द भी निष्काम ब्रह्मज्ञानी को स्वाभाविक रूप से प्राप्त है । और देवों के ऐसे सौ आनन्दों के तुल्य इन्द्र का एक आनन्द होता है । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतमिन्द्रस्यानन्दाः । स एको बृहस्पतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः । स एकः प्रजापतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं प्रजापते- रानन्दाः । स एको ब्रह्मण आनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥4 ॥

वह आनन्द भी निष्काम ब्रह्मज्ञानी को स्वयंसिद्ध होता है । इन्द्र के ऐसे सौ आनन्दों के समान बृहस्पति का एक ही आनन्द होता है । ऐसा आनन्द भी निष्काम ब्रह्मवेत्ता के लिए स्वभावसिद्ध है । बृहस्पति के ऐसे जो सौ आनन्द होते हैं, वह प्रजापति का एक ही आनन्द होता है । पर ऐसा आनन्द भी निष्काम ब्रह्मवेत्ता के लिए स्वभावसिद्ध ही होता है । और प्रजापति के ऐसे जो सौ आनन्द होते हैं, उनके बराबर ब्रह्म का एक ही आनन्द होता है, पर वह ( सर्वश्रेष्ठ ) आनन्द भी कामनाओं से अदूषित चित्तवाले ब्रह्मज्ञानी के लिए तो सहज रीति से प्राप्य ही है । स यश्चायं पुरुषे । यश्चासावादित्ये । स एकः । य स एवंवित् । अस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं प्राणमय- मात्मानमुपसंक्रामति । एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं विज्ञान- मयमात्मानमुपसंक्रामति । एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति । तदप्येष

श्लोको भवति ॥5 ॥

इत्यष्टोऽनुवाकः ॥8 ॥

इस तरह जो यह पुरुष पंचकोशात्मक देह में है, और जो आदित्य के भीतर है — वे दोनों एक ही हैं । जो मनुष्य इस प्रकार जान लेता है, वह इस दृष्ट और अदृष्ट लोक से निवृत्त होकर अन्नमय कोश को प्राप्त होता है । तात्पर्य यह है कि वह विषयसमूह को अन्नमय कोश (एक आवरण) से अलग नहीं समझता । और इसी तरह प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्मा को प्राप्त करता है । अर्थात् वह उन कोशों को आवरणमात्र ही समझता है— शुद्ध आत्मा नहीं समझता । इस विषय ( )श्लोक है । यहाँ आठवाँ अनुवाक पूर्ण हुआ । में यह नवमोऽनुवाकः यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दंब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कुतश्चेनेति । एतः ह वाव न तपति किमहं पापमकरवमिति । स य एवं विद्वानेतेकिमहःआत्मानःसाधु नाकरवम् । ह्येवैष एते आत्मानः स्पृणुते । य एवं वेद । इत्युनिषत् ॥ 1 ॥स्पृणुते । उभे

इति नवमोऽनुवाकः ॥१ ॥