Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 161–170

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

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119भृगुवल्ली - 3 ] तैत्तिरीयोपनिषत् ( 7 ) जहाँ से मन सहित सभी इन्द्रियाँ उसे प्राप्त किए बिना ही वापिस लौट जाती हैं, उस ब्रह्म के आनन्द को जाननेवाला महापुरुष किसी से भी डरता नहीं है । ऐसे विद्वान् को ' मैंने अच्छा काम क्यों नहीं किया? ’ अथवा ‘ मैंने पापाचरण क्यों किया? ' –ऐसी चिन्ताएँ नहीं सताती हैं । ‘ पुण्य और पापवाले सभी कर्म आवरणकारी ही हैं'– ऐसा माननेवाला यह विद्वान् उनसे अपने आत्मा की रक्षा करता है । पुण्य और पाप आत्मस्वरूप ही दिखाई देते हैं । जो पुरुष उपर्युक्त प्रकार से अद्वैत को जान लेता है, वह आनन्दस्वरूप को जान लेता है । ऐसी यह उपनिषद् विद्या है । ( यहाँ नवाँ अनुवाक पूर्ण हुआ । ) यहाँ तैत्तिरीयोपनिषद् में ब्रह्मानन्दवल्ली समाप्त हुई । + अथ भृगुवल्ली ( 3 ) प्रथमोऽनुवाकः ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । नोट–इसका हिन्दी रूपान्तर ब्रह्मानन्दवल्ली में दिया गया है । भृगुर्वै वारुणिः । वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तस्मा एतत्प्रोवाच । अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति । तःहोवाच । यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभि- संविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥1 ॥

इति प्रथमोऽनुवाकः ॥1 ॥

यह प्रसिद्ध है कि वरुण का पुत्र भृगु अपने पिता वरुण के पास गया और विनयपूर्वकयह कहा बोलाकि अन्नकि, हे भगवन्! मुझे ब्रह्म का उपदेश दीजिए । इस प्रकार प्रार्थना करने से उसे केवरुणद्वारनेहैं । वरुण ने उससे प्राण, नेत्र, श्रोत्र, मन और वाणी- इस प्रकार ये सब ब्रह्म की उपलब्धि होकर जीते हैं, तथा प्रयाण, कहाके अंतकि मेंये जिसमेंसब प्रत्यक्षमिलदिखाईजाते हैंदेने- उसकीवाले प्राणीजिज्ञासाउत्पन्नकरोहोते, वहीहैं ब्रह्मऔर हैउत्पन्न। पिता की आज्ञा सुनकर उसने तप किया । और फिर तप करके- ( यहाँ पहला अनुवाक पूरा हुआ । ) द्वितीयोऽनुवाकः जायन्ते । अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् । अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि। तद्विज्ञाय । अन्नेन जातानि जीवन्ति । अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तहोवाच । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहिब्रह्मेतिभगवो। सब्रह्मेतितपोऽतप्यत । स तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो तपस्तप्त्वा ॥ 1 ॥

इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥2 ॥

पृष्ठ 162

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120 उपनिषत्सञ्चयनम् ' अन्न ब्रह्म है’— इस प्रकार उसने जाना क्योंकि अन्न से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर अन्न से जीते हैं और अन्त में प्रयाण करके अन्न में ही विलीन होते हैं । इस प्रकार जानकर वह फिर से अपने पिता वरुण के पास गया और बोला कि-हे भगवन्! मुझे ब्रह्म का उपदेश दीजिए । तब उसने कहा कि तप से ब्रह्म को जानो । तप ही ब्रह्म है । तब उसने फिर से तप किया और तप कंरके— ( यहाँ दूसरा अनुवाक पूरा हुआ । ) तृतीयोऽनुवाकः प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात् । प्राणाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । प्राणेन जातानि जीवन्ति । प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार ॥ अधीहि भगवो ब्रह्मेति ॥ त’होवाच तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥1 ॥

इति तृतीयोऽनुवाकः ॥3 ॥

उसने 'प्राण ब्रह्म है ' ऐसा जाना । क्योंकि प्राण से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं और जन्मे हुए प्राण से ही जीवित रहते हैं और प्रयाण काल में अन्त में प्राण में ही विलीन हो जाते हैं । ऐसा जानकर वह फिर से अपने पिता वरुण के पास गया और कहने लगा कि-हे भगवन् । मुझे ब्रह्म का उपदेश दीजिए । तब उसने उससे कहा कि तप से ब्रह्म को जानो, तप ही ब्रह्म है । उसने तप किया और तप करके— ( यहाँ तीसरा अनुवाक पूर्ण हुआ । ) चतुर्थोऽनुवाकः मनो ब्रह्मेति व्यजानात् । मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । मनसा जातानि जीवन्ति । मनःप्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तहोवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत! तपस्तप्त्वा ॥ 1 ॥

इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥4 ॥

उसने ' मन ब्रह्म है ' ऐसा जाना । क्योंकि मन ही से ये प्राणी उत्पन्न होते हैं, मन से उत्पन्न होकर ये जीते हैं और प्रयाणकाल के अन्त में मन में ही मिल जाते हैं । ऐसा जानकर वह फिर से अपने पिता वरुण के पास गया और बोला कि- हे भगवन् । मुझे ब्रह्म का उपदेश दीजिए । तब उसने उससे कहा कि तप से ब्रह्म को जानो, तप ही ब्रह्म है । उसने तप किया और तप करके— ( यहाँ चौथा अनुवाक पूर्ण हुआ । पञ्चमोऽऽनुवाकः विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात् । विज्ञानाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि विज्ञानेन जातानि जीवन्ति । विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति जायन्ते ।

पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तद्विज्ञाय ।

तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत। तहोवाच ॥

तपस्तप्त्वा ॥ 1 ॥

इति पञ्चमोऽनुवाकः ॥5 ॥

पृष्ठ 163

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121भृगुवल्ली - 3 ] तैत्तिरीयोपनिषत् ( 7 ) तब उसने ‘ विज्ञान ही ब्रह्म है' ऐसा जाना । क्योंकि विज्ञान से ही ये सब प्राणी जन्मते हैं, विज्ञान से उत्पन्न होकर विज्ञान से ही ये जीते हैं और प्रयाणसमय ( अन्त में ) विज्ञान में ही विलीन जाते हैं । ऐसा जानकर वह फिर से अपने पिता वरुण के पास गया और बोला कि- हे भगवन्! ब्रह्म का उपदेश दीजिए । तब उसने उससे कहा कि तप से ब्रह्म को जानो, तप ही ब्रह्म है । उसने फिर तप किया और तप करके— (यहाँ पाँचवाँ अनुवाक पूर्ण हुआ । ) षष्ठोऽनुवाकः ·. आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । सैषा भार्गवी वारुणी विद्या । परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता । य एवं वेद । प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभि- ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥1 ॥

इति षष्ठोऽनुवाकः ॥6 ॥

उसने ‘ आनन्द ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चित रूप से जाना क्योंकि सचमुच आनन्द से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, आनन्द से जन्म लेकर ये सब जीते हैं और अन्त में (प्रयाणकाल में) आनन्द में ही मिल जाते हैं । ऐसा जानकर उसने पूरा ब्रह्म जान लिया । भृगु की जानी हुई और वरुण के द्वारा उपदिष्ट यह विद्या विशुद्ध आकाश- सदृश परमात्मा में पूर्णतया प्रतिष्ठित है । यदि कोई अन्य साधकनहींभी, यहाँइस लोगोंतरह, आनन्दस्वरूप ब्रह्म को जान लेता है तो वह भी ब्रह्म में स्थित हो जाता है । इतना ही से की दृष्टि में भी बहुत अन्नवाला और अन्न को पचानेवाला होता है । और सन्तान, पशु तथा ब्रह्मतेज युक्त होकर महान बन जाता है । वह उत्तम कीर्तिमान हो जाता है । (यहाँ छठा अनुवाक पूर्ण हुआ । ) सप्तमोऽनुवाकः अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणेय शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठिति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्

भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥1 ॥

इति सप्तमोऽनुवाकः ॥7 ॥

ही अन्न है । शरी अन्न की निन्दा नहीं करनी चाहिए । वह ब्रह्मज्ञ का व्रत हैं,परस्पराश्रितप्राण होने से अन्न ही अन्न है । प्राण में शरीर रहा है और शरीर में प्राण रहा है । इस प्रकार है वह प्रतिष्ठित होता है | अन्नवान प्रतिष्ठित है | इस प्रकार जो मनुष्य अन में स्थित अन्न को जानतामहान् हो जाता है और कीर्ति से भी महान् और अन्नभोक्ता बन जाता है । प्रजा, पशु और ब्रह्मतेज से हो जाता है । ( यहाँ सातवाँ अनुवाक पूर्ण हुआ । ) अष्टमोऽनुवाकः । अप्सु अन्नं न परिचक्षीत । तद्व्रतम् । आपो वा अन्नम्। तदेतदन्नमन्ने। ज्योतिरन्नादम्प्रतिष्ठितम् ।

ज्योतिः प्रतिष्ठितम् । ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः । अन्नवान्नादो भवति ।

स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठतिमहान्कीर्त्या ॥

महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन इत्यष्टमोऽनुवाकः ॥8 ॥

पृष्ठ 164

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122 उपनिषत्सञ्चयनम् अन्न की अवहेलना नहीं करनी चाहिए । वह ब्रह्मज्ञ का एक व्रत है । जल ही अन्न है और ज्योति उस अन्न का भोक्ता है । जल में ज्योति प्रतिष्ठित है और ज्योति में जल प्रतिष्ठित है । इस तरह अन्न में ही अन्न प्रतिष्ठित है । जो मनुष्य इस प्रकार अन्न में प्रतिष्ठित अन्न को जानता है, वह प्रसिद्ध हो जाता है । वह अन्नवान और अन्नभोक्ता हो जाता है । प्रजा, पशु और ब्रह्मवर्चस से महान् हो जाता है । कीर्ति से भी महान् होता है । ( यहाँ आठवाँ अनुवाक पूर्ण हुआ । ) नवमोऽनुवाकः अन्नं बहु कुर्वीत । तद्व्रतम् । पृथिवी वा अन्नम् । आकाशोऽन्नादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो

भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान्कीर्त्या ॥1 ॥

इति नवमोऽनुवाकः ॥9 ॥

अन को बढ़ाना चाहिए । यह एक व्रत है । अथवा पृथ्वी अन्न है और आकाश अन्नभोक्ता है । पृथ्वी में आकाश स्थित है और आकाश में पृथ्वी स्थित है इस प्रकार अन्न ही अन्न में प्रतिष्ठित है । जो मनुष्य इस तरह अन्न में ही प्रतिष्ठित अन्न के रहस्य को जानता है, वह प्रसिद्ध हो जाता है । वह अन्नवान और अन्नभोक्ता बनता है । वह प्रजा, पशु और ब्रह्मवर्चस से महान् बन जाता है, वह कीर्ति से भी महान् बन जाता है । (यहाँ नवाँ अनुवाक पूर्ण हुआ । ) दशमोऽनुवाकः न कंचन वसतौ प्रत्याचक्षीत । तद्व्रतम् । तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् । आराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते । एतद्वै मुखतोऽन्न राद्धम् । मुखतोऽस्मा अन्न राध्यते । एतद्वै मध्यतोऽन्नः राद्धम् । मध्यतोस्मा अन्न राध्यते । एतद्वा अन्ततोऽन्नः राद्धम् । अन्ततोऽस्मा अन्नः राध्यते ॥1 ॥

अपने घर पर आए आश्रयवांछु अतिथि को अयोग्य उत्तर नहीं देना चाहिए । यह इसलिए अतिथिसत्कार के लिए जिस किसी भी प्रकार से यथेष्ठ अन्न प्राप्त करना चाहिए एक व्रत है । ' '– पर आए अतिथि को गृहस्थ लोग भोजन तैयार हैं ऐसा कहते हैं । इस । क्योंकि घर ( प्रधानवृत्ति - श्रद्धा व आदर से) से पकाया हुआ अन्न देनेवाले को बड़े आदर के साथप्रकार मुख्य वृत्ति -, मध्यम श्रद्धा आदर से यह पकाया हुआ अन्न जो देता है वह निश्चित ही मध्यम प्राप्त होता है । - - प्राप्त करता है और जो मनुष्य अधम श्रद्धा आदर से अतिथि को पकाया हुआ श्रद्धा आदर से अन्न ही ऐसे दाता को निकृष्ट ( हलके ) प्रकार की श्रद्धा से अन्न मिलता है । भोजन देता है, तो निश्चय य एवं वेद । क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति प्राणापानयोः हस्तयोः । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । कर्मेति समाज्ञाः । अथ दैवीः । तृप्तिरिति वृष्टौ । बलमिति विद्युति। इति॥2 मानुषीः ॥ जो इस प्रकार जानता है, वह अतिथियों के प्रति सद्व्यवहार ( ),कर्मशक्तिक्षेमरूप रक्षकरूपके रूप में हैहै, दोप्राणपैरोंऔरमें गतिशक्तिअपान मेंके प्राप्तिरूप मेंऔरहै, गुदारक्षा ( दोनोंकरते) स्वरूपोंहैं । वहमें परमात्माहैं । दो वाणीहाथों मेंमें में मलत्याग की शक्तिरूप में है — इस

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123भृगुवल्ली - 3 ] तैत्तिरीयोपनिषत् ( 7 ) प्रकार ये मानुषी आध्यात्मिक उपासनाएँ हैं । अब दैवी उपासनाओं का वर्णन किया जाता है । वह परमात्मा वृष्टि में तृप्तिशक्ति के रूप में रहते हैं और विद्युत् में बलशक्तिरूप में अवस्थित हैं । यश इति पशुषु । ज्योतिरिति नक्षत्रेषु । प्रजापतिरमृतमानन्द इत्युपस्थे । सर्वमित्याकाशे । तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठावान् भवति । तन्मह

इत्युपासीत । महान् भवति । तन्मन इत्युपासीत । मानवान् भवति ॥3 ॥

( वह परमात्मा) पशुओं में यशरूप में स्थित है । नक्षत्रों में ज्योति के रूप में स्थित है । उपस्थ में प्रजननशक्ति के रूप में स्थित है । वीर्यरूप अमृत और आनन्ददायक शक्ति के रूप में रहता है । और आकाश में सर्वाधार होकर स्थित है । वह उपास्य देव सर्व का आधार है । इस प्रकार यदि कोई उपासना करे, तो वह महान् हो जाता है । 'वह उपास्य देव मह: है'– ऐसा समझकर यदि कोई उपासना करता है, तो वह महान् से सम्पन्न हो जाता है । कोई यदि 'वह उपास्य देव मन: है' – ऐसा समझकर उपासना करे, तो वह मन: शक्ति से पूर्ण हो जाता है । तन्नम इत्युपासीत । नम्यन्तेऽस्मै कामाः । तद्ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्मवान् भवति । तद्ब्रह्मणः परिमर इत्युपासीत । पर्येणं प्रियन्ते द्विषन्तः

सपत्नाः । परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः । स यश्चायं पुरुषे । यश्चासावादित्ये ।

स एकः ॥ 4 ॥

वह उपास्य देव ‘ नमनयोग्य' है, ऐसा जानकर यदि उपासना की जाए तो ऐसे उपासक को सभी भोग्यपदार्थ विनीत हो जाते हैं । वह उपास्यदेव 'ब्रह्म' है, ऐसा मानकर यदि साधक उपासना करे, तो हैं'- वह ब्रह्मयुक्त हो जाता है | यदि वह ब्रह्म 'सर्व को मारने के लिए नियुक्त कियाहैं । औरगया उसकेअधिकारीजो सर्वतः,, ऐसाअनिष्टसमझकरचाहनेवालेउपासनाभाई- पितृव्यकी जाएआदितो हैंउस, वेउपासकभी मर केजातेद्वेषीहैं शत्रु। वहमरपरमात्माजाते जो इस मनुष्य में है वह जो सूर्य में है, उन दोनों का अन्तर्यामी एक ही है । स य एवंवित् । अस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतंएतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रम्य ॥ इमाँ- विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्यहा 3 वु

ल्लोकान्कामान्नी कामारूप्यनुसंचरन् । एतत्साम गायन्नास्ते ।

हा 3 वु हा 3 वु ॥5 ॥

करके इस अन्नमय जो मनुष्य इस प्रकार तत्त्वज्ञानी है, वह इस लोक से, इस( शरीरमनोमयसे) उत्क्रमणआत्मा को प्राप्त करके, इस आत्मा को प्राप्त करके, इस प्राणमय आत्मा को प्राप्त करके को प्राप्त करके इच्छानुसार भोक्ता और विज्ञानमय आत्मा को प्राप्त करके, इस आनन्दमयलोकोंआत्मामें विचरण करता हुआ वह साम ( वेद ) के इच्छानुसार रूपधारी हो सकता है । और इनहा सभीआश्चर्य! हा आश्चर्य! हा आश्चर्य! ( ‘ आश्चर्यवत्पश्यति उद्गारों को गाया करता है—'हा 3 वु' – कश्चिदेनम्’ – गीता) ॥ अह श्लोक- अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् । अहमन्नादोऽहमन्नादोऽहमन्नादःप्रथमजा ऋता 3 स्य ।्

श्लोककृत् । अहमस्मि पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना 3 भायि । यो मा 3 कृदह श्लोककृदह ददाति स इदेव मा वाः ।

पृष्ठ 166

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124 उपनिषत्सञ्चयनम् अहमन्नमन्नमदन्तमा 3 द्मि । अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा3 म् । सुवर्ण- ज्योतिः । य एवं वेद ॥ इत्युपनिषत् ॥6 ॥

इति दशमोऽनुवाकः ॥10 ॥

इति तैत्तिरीयोपनिषत्समाप्ता ॥ मैं ही अन्न हूँ, अन्न हूँ, अन्न हूँ । मैं ही अन्न का भोक्ता हूँ, भोक्ता हूँ, भोक्ता हूँ । मैं ही उनका ( भोक्ता और अन्न का ) संयोग कराने वाला हूँ, संयोग करानेवाला हूँ, संयोग करानेवाला हूँ । मैं ही तो सत्य का सत्य प्रत्यक्ष जगत् से परे, सर्वमुख्य हिरण्यगर्भ और देवताओं से भी पहले अवस्थित अमृत का केन्द्र हूँ । जो कोई मनुष्य अन्नस्वरूप मुझे देता है, तो वह अपने उस कार्य से ही मेरी रक्षा करता है । मैं अन्नस्वरूप होकर अन्न खानेवाले को निगल जाता हूँ । मैं समस्त ब्रह्माण्ड का पराभव करता हूँ । मेरे प्रकाश की एक झलक सूर्य जैसी है । नित्यप्रकाशित है । यह उपनिषद् (ब्रह्मविद्या) है । जो इसको इस प्रकार जानता है, वह पूर्वोक्त फल पाता है । (यहाँ दसवाँ अनुवाक हुआ । ) यहाँ तैत्तिरीयोपनिषद् की भृगुवल्ली यहाँ पूर्ण हुई । इस प्रकार तैत्तिरीयोपनिषत् समाप्त होती है । शान्तिपाठः शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।

त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि ।

तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

पृष्ठ 167

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( 8 ) ऐतरेयोपनिषत् (उपनिषत्परिचय ) ऋग्वेद के ऐतरेय आरण्यक के दूसरे आरण्य का चौथा, पाँचवाँ और छठा अध्याय ही यह उपनिषद् है । विख्यात दस या बारह उपनिषदों में ऐतरेयोपनिषद् भी एक है । इसके ऊपर भी शंकराचार्य ने भाष्य लिखा है । महीदास ऐतरेय, जिनका छान्दोग्योपनिषद् ( 3.16.9 ) में उल्लेख है, वे इस उपनिषद् के ऋषि हैं । इस आरण्यक का पूर्व भाग तो वैदिक कर्मोपासना और प्राणोपासना के विषयों से युक्त है । अगर किसी साधक ने निष्ठापूर्वक प्राणोपासना की हो और ठीक तरह से आरण्यक में बताए गए कर्म गंभीरता से किए हों, तो वह ब्रह्मज्ञान के लिए योग्य हो जाता है । इसलिए पहले यह सब बताकर बाद में 4, 5 और 6 इन तीन अध्यायों में यह उपनिषद् कही गई है । इसके तीन अध्याय हैं और पाँच खण्ड हैं । ( पहले अध्याय में तीन खण्ड तथा द्वितीय और तृतीय अध्याय में एक- एक खण्ड है) । इनमें कुल 33 मंत्र ( कण्डिकाएँ ) हैं । प्रथम अध्याय में आत्मा की ईक्षणपूर्वक सृष्टि, सृष्टिक्रम, लोकपालरचना, इन्द्रियों और उनके अधिष्ठाता देवों की उत्पत्ति, उनका निवास, खाद्य, पश्वादि देहों की देवों द्वारा अस्वीकृति, मनुष्यदेह का स्वीकार, देवों का स्वस्थान प्रवेश आदि विषयों के उपरान्त अन्न की रचना, अन्न का ग्रहण, परमात्मा का शरीर- प्रवेश, जीव का मोह और उसकी निवृत्ति और इन्द्र शब्द की व्युत्पत्ति सम्मिलित है । द्वितीय अध्याय में पुरुष के तीन जन्म बताए गए हैं और अन्त में वामदेव की उत्ति दी गई है । तीसरे अध्याय में आत्मा सम्बन्धी अनेक प्रश्न किए गए हैं । प्रधान संज्ञक मन के अनेक नाम बाद में बताए गए हैं । तथा प्रज्ञान की सर्वरूपता बताने के साथ आत्मा की एकता को जानने वालों की अमृत की प्राप्ति का वर्णन है । शान्तिपाठः ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु तद्वक्तारमवत्ववतु मामवतु शान्तिः ॥ वक्तारमवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः , हे परमात्मन्! मेरी वाणी मन में स्थिर हो तथा मन वाणी में स्थिर हो । हे प्रकाशरूप परमात्मन् । वेदविषयक ज्ञान को लानेवाले हो मेरे लिए तुम प्रकट हो । (हे वाणी और हे मन! ) तुम मेरे लिएदिनों और रात्रियों को एक कर दूँ । मैं मेरा श्रुतज्ञान मेरे से कभी विस्मृत न हो । इस स्वाध्यायमेरीसे रक्षामैं करे । वह ब्रह्म आचार्य की रक्षा करे, परमसत्य ही बोलूँगा, सत्य ही बोला करूँगा । वह ब्रह्म तापों की शान्ति हो । रक्षा करे मेरी और रक्षा करे आचार्य की । ॐ त्रिविध

पृष्ठ 168

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126 उपनिषत्सञ्चयनम् अथ प्रथमोऽध्यायः प्रथमः खण्डः ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् । नान्यत्किञ्चन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥1 ॥

ॐ परमात्मा का नामोच्चारण करके उपनिषद् का प्रारंभ होता है । इस जगत् के प्रकट होने से पहले एकमात्र परमात्मा ही था । दूसरा कोई चेष्टा करनेवाला नहीं था । उस परम पुरुष परमात्मा ने 'अवश्य ही मैं लोकों का सर्जन करूँ' – इस प्रकार का विचार किया । स इमाँल्लोकानसृजत अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः

प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः । पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः ॥2 ॥

उसने अम्भ ( द्युलोक से ऊपर के लोक ), मरीची ( अन्तरिक्ष), मर ( मर्त्यलोक ) और आप. ( पृथ्वी के नीचे के लोक )—इन लोकों की रचना की । जो द्युलोक से परे है और स्वर्ग जिसकी प्रतिष्ठा है, वह ‘ अम्भ' है । अन्तरिक्ष (भुवर्लोक ) ' मरीची' है और जो पृथ्वी के नीचे है, वह ‘ आप’ है । स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति । सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत् ॥3 ॥

उसने फिर से संकल्प किया कि ' ये लोक तो तैयार हो गए, अब लोकपालों की रचना करूँ'-ऐसा सोचकर उसने जल में से एक पुरुष को निकालकर मूर्तिमान (अवयववाला) बनाया । तमभ्यतपत्तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं मुखाद्वाग्वाचो- ऽग्निर्नासिके निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुरक्षिणी निरभि- द्येतामक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुष आदित्यः कर्णौ निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्राद्दिशस्त्वनिरभिद्यत त्वचो लोमानि लोमभ्य औषधिवनस्पतयो हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा नाभिर्निरभिद्यत नाभ्या अपानोऽपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत शिश्नाद्रेतो रेतस आपः ॥4 ॥

इति प्रथमः खण्डः ॥1 ॥

परमात्मा ने उस हिरण्यगर्भ पुरुष को लक्ष्य करके संकल्पात्मक तप किया । उस तप से तप्त ( ) ( ) प्रभावित हिरण्यगर्भ के शरीर से प्रथम अण्डे की तरह फूटकर मुख छिद्र पैदा से वागिन्द्रिय और वागिन्द्रिय से अग्नि पैदा हुआ । बाद में नाक के दो छिद्र प्रकट हुए ।हुआनाक । केमुखछिद्रों से प्राण पैदा हुआ और प्राण से वायु उत्पन्न हुआ । बाद में आँखों के दो छिद्र उत्पन्न हुए । आँखों के दो छिद्रों से चक्षुरिन्द्रिय प्रकट हुई और नेत्रेन्द्रिय से सूर्य पैदा हुआ । फिर कानों के दो छिद्र उन छिद्रों से कर्णेन्द्रिय उत्पन्न हुई । श्रोत्रेन्द्रिय से दिशाएँ प्रकट हुईं । फिर त्वचा उत्पन्न हुए । सेसे मनरोंगटेऔरपैदामनहुएसे । चन्द्ररोंगटोंउत्पन्नसे औषधियाँहुआ । फिरऔरनाभिवनस्पतियाँप्रकट हुईपैदा। नाभिहुईं ।सेफिरअपानवायुहृदय उत्पन्नउत्पन्नहुआहुई ॥ त्वचाहृदय अपानवायु से मृत्युदेव पैदा हुए । बाद में लिङ्ग उत्पन्न हुआ । लिंग से वीर्य और वीर्यउत्पन्नसे हुआजल ।उत्पन्नऔर हुआ । ( यहाँ प्रथम खण्ड पूरा हुआ ।)

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प्रथमोऽध्यायः ] ऐतरेयोपनिषत् ( 8 ) 127 द्वितीयः खण्डः ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतंस्तमशनायापिपासाभ्या- मन्ववार्जत् । ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन्प्रतिष्ठिता अन्न- मदामेति ॥1 ॥

परमात्मा के द्वारा रचे गए ये सब देव इस संसाररूपी महासागर में जब प्रकट हो गए तब परमात्मा ने उस देवसमुदाय को भूख और प्यास से युक्त कर दिया । तब इन सब देवों ने उससे कहा— "हमारे लिए एक-एक स्थान की व्यवस्था कीजिए, जिसमें रहकर हम अन्न का भक्षण करें । ” ताभ्यो गामानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति । ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ॥2 ॥

परमात्मा ने देवताओं के लिए गाय का शरीर दिया । उसे देखकर उन्होंने कहा— “ हमारे लिए यह पर्याप्त नहीं है । ” उनके ऐसा कहने से परमात्मा ने उनके लिए घोड़े का शरीर बनाया । उसे देखकर भी उन्होंने फिर भी वैसा ही कहा कि "हमारे लिए यह पर्याप्त नहीं है । " ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति पुरुषो वाव सुकृतम् । ता अब्रवीद्यथाऽऽयतनं प्रविशतेति ॥3 ॥

बाद में परमात्मा उनके लिए पुरुष का शरीर बनाया । उसे देखकर वे ( देव) बोले— “ वाह! वाह! यह तो बहुत सुन्दर बन गया! ” सचमुच मनुष्य- शरीर परमात्मा की सुन्दरतम रचना है । फिर - देवों से परमात्मा ने कहा– “ तुम अपने - अपने योग्य आश्रयों में प्रविष्ट हो जाओ । " अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् ॥4 ॥

तब अग्नि वागिन्द्रिय बनकर मुख में प्रविष्ट हो गया । वायु प्राण बनकर नासिका में दाखिल हुआ । सूर्य नेत्रेन्द्रिय बनकर अक्षिगोलक में चला गया । दिग्देवताएँ श्रोत्रेन्द्रिय बनकर कानों में प्रविष्ट हुईं औषधियों और वनस्पतियों के देव रोंगटे बनकर त्वचा में दाखिल हुए । चन्द्रमा मन बनकरहोहृदयगयामें। प्रविष्ट हुआ । मृत्यु अपानवायु बनकर नाभि में प्रविष्ट हुआ । जल वीर्य बनकर लिंग में दाखिल तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति । ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति । तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः ॥5 ॥

इति द्वितीयः खण्डः ॥2 ॥

तब उस परमात्मा से भूख और प्यास ने कहा– “हमारे लिए भीको निवासस्थानमैं इन सभी कीदेवताओंसुविधामेंकरही दीजिए । ” यह सुनकर उन दोनों से परमात्मा ने कहा- "तुम दोनोंहो) इसीलिए जिस किसी भी देवता भाग प्रदान करता हूँ । ( अर्थात् उन्हीं देवों में तुम दोनों भागीदारकी भागीदारी होती ही है । के लिए हवि दी जाती है, उस देवहवि में भूख और प्यास ( यहाँ द्वितीय खण्ड पूरा हुआ । )

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128 उपनिषत्सञ्चयनम् तृतीयः खण्डः सईते नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति ॥1 ॥

उस परमात्मा ने सोचा कि- " ये लोक और लोकपाल तो हो गए । अब मैं उनके लिए अन्न की रचना करूँ । ” सोऽपोऽभ्यतपत् ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत । या वै सा मूर्तिरजायताऽन्नं वै तत् ॥2 ॥

उसने ( परमात्मा ने ) जलों को लक्ष्य कर तप किया ( अर्थात् परमात्मा ने जलादि पाँच सूक्ष्म महाभूतों को अपने संकल्प द्वारा तपाया— उनमें क्रिया उत्पन्न की ) । तपे हुए (क्रियाशील ) उन सूक्ष्म महाभूतों में से एक मूर्त्ति उत्पन्न हुई । वह जो मूर्ति उत्पन्न हुई, वह सचमुच अन्न ही है ।

तदेतत्सृष्टं पराङत्यजिघांसत् तद्वाचो जिघृक्षत्तन्नाशक्नोद्वाचा ग्रहीतुम् ।

स यद्वैनद्वाचाग्रहैष्यदभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥3 ॥

उत्पन्न किया गया यह अन्न भोक्ता से विमुख होकर भागने की चेष्टा करने लगा । तब उस पुरुष ने उसे वाणी द्वारा पकड़ने की इच्छा की । परन्तु वह उसे वाणी द्वारा ग्रहण न कर सका । यदि पुरुष ने इसे वाणी द्वारा ग्रहण कर लिया होता, तो आज मनुष्य अवश्य ही (वाणी द्वारा ) अन्न का वर्णन करके ही तृप्त ( तुष्ट ) हो जाता । तत्प्राणेनाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुम् । स यद्धैनत्प्राणेना- ग्रहैष्यदभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥4 ॥

तब उस पुरुष ने उस अन्न को प्राण द्वारा पकड़ना चाहा, परन्तु प्राण के द्वारा भी वह उसे पकड़ नहीं सका । अगर उसने अन्न को प्राण के द्वारा पकड़ लिया होता तो आज मनुष्य अवश्य ही अन्न को सूँघकर ही तृप्त हो जाता । तच्चक्षुषाऽजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुम् । स यद्वैनच्चक्षुषा- ऽग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥5 ॥

तब उस पुरुष ने अन्न को आँखों से पकड़ना चाहा । परन्तु आँखों से भी वह उसे पकड़ न सका । यदि उसने अन्न को आँखों से पकड़ लिया होता, आज भी मनुष्य अवश्य ही अन्न को आँखों से देखकर ही तृप्त हो जाता | तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्छ्रोत्रेणा- ग्रहैष्यच्छुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥6 ॥

तब उस पुरुष ने अन्न को श्रोत्र से पकड़ना चाहा । परन्तु श्रोत्रों से भी वह उसे न पकड़ सका । यदि उसने अन्न को श्रोत्र से पकड़ लिया होता आज भी मनुष्य अवश्य ही अन्न को सुनकर ही तृप्त हो जाता । तत्त्वचाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोत्त्वचा ग्रहीतुम् । स यद्वैनत्त्वचाऽग्रहैष्य- त्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥7 ॥

तब उस पुरुष ने अन्न को त्वचा से पकड़ना चाहा । परन्तु त्वचा से भी वह उसे न पकड़ सका ।