Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 171–180
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 171–180
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प्रथमोऽध्यायः ] ऐतरेयोपनिषत् ( 8 ) 129 यदि उसने अन्न को त्वचा से पकड़ लिया होता तो आज भी मनुष्य अवश्य अन्न को स्पर्श करके ही तृप्त हो जाता । तन्मनसाऽजिघृक्षत् तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुम् । स यद्धैनन्मनसा- ऽग्रहैष्यद्ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥8 ॥
तब उस पुरुष ने अन्न को मन से पकड़ना चाहा । परन्तु मन से भी वह उसे न पकड़ सका । अगर उसने अन्न को मन से पकड़ लिया होता, तो अवश्य अभी भी मनुष्य अन्न का ध्यान करके ही तृप्त हो जाता । तच्छिश्नेनाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुम् । स यद्वैनच्छि- श्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥१ ॥
तब उस पुरुष ने अन्न को शिश्न (लिंग) से पकड़ना चाहा । परन्तु शिश्न से ( लिंग से ) वह उसे न पकड़ सका । अगर उसने अन्न को शिश्न से पकड़ लिया होता, तो आज भी मनुष्य अवश्य अन्न का त्याग करके तृप्त हो जाता । तदपानेनाजिघृक्षत् तदावयत् । सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद्वायुरन्नमायुर्वा एष यद्वायुः ॥10 ॥
अन्त में उस पुरुष ने अन्न को अपान से ग्रहण कराना चाहा । उस समय उसने पकड़ लिया । वह यह अपानवायु ही अन्न का ग्रहण करनेवाला है । जो वायु अन्न से जीवन की रक्षा करने के रूप में प्रसिद्ध है, वह यही अपानवायु है । सईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति । स ईक्षत यदि वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति ॥11 ॥
तब उस परमेश्वर ने सोचा कि निश्चय ही यह मेरे बिना कैसे रहेगा? इसका विचार करते हुए फिर से उसने सोचा कि यदि इस पुरुष ने मेरे बिना ही केवल वाणी के ही द्वारा बोलने की क्रिया कर ली हो, यदि केवल प्राण से ही सूँघने की क्रिया कर ली हो, यदि केवल आँख से ही देखने की क्रिया कर ली हो, यदि केवल श्रवणेन्द्रिय से ही सुनने की क्रिया कर ली हो, यदि त्वगिन्द्रिय द्वारा स्पर्शन की क्रिया कर ली हो, यदि मन से ही मनन कर लिया हो, यदि अपान के द्वारा अन्नग्रहणादि कर लिया हो और यदि उपस्थ से मूत्रादि का त्याग कर लिया हो, तो फिर मैं कौन हूँ? प्रवेशयह विचारकरूँ?कर उसने फिर से सोचा कि पैर और सर- इन दो मार्गों में से किस मार्ग से मैं उसमें स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विदृतिर्नाम द्वास्त- देतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्नाः अयमावसथोऽयमा- वसथोऽयमावसथ इति ॥12 ॥
प्रवेश किया । ऐसा सोचकर उसने इस मनुष्य शरीर की सीमा को ही चीरकर उसके द्वाराहै । उसशरीर परमेश्वरमें के तीन यह द्वार ‘ विदृति’ नाम से प्रसिद्ध है । वही यह आनन्ददायकयहब्रह्मद्वार( परमधाम) आश्रयस्थान और एक आश्रयस्थान हैं, तीन स्वप्न हैं, यह (हृदय ) आश्रयस्थान, एक यह (ब्रह्माण्ड ) आश्रयस्थान है । 9 उ० प्र०
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130 उपनिषत्सञ्चयनम्
स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् । किमिहान्यं वावदिष्यदिति ।
स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यदिदमदर्शमिति 3 ॥13 ॥
मनुष्य-रूप में उत्पन्न हुए उस पुरुष ने पंचमहाभूतों की रचना को चारों ओर सेपरब्रह्मदेखा केऔररूप‘ यहाँमें? ” –देखादूसरा औरक्या उसेहै प्रकट ऐसाकियाकहा। अरे। तबवाहउसने! बड़ेइससौभाग्यअन्तर्यामीकी पुरुषबात हैकोकिहीइससर्वव्यापीपरब्रह्म परमात्मा को मैं देख लिया । तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम । तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥14 ॥
इति तृतीयः खण्डः ॥3 ॥
इत्यैतरेयारण्यके चतुर्थोऽध्यायः ॥4 ॥
उपनिषत्सु प्रथमोऽध्यायः । इसलिए उसका नाम ‘इदन्द्र' (इदम् + इन्द्र) हुआ । 'इदन्द्र' नाम से प्रसिद्ध यह है, इसलिए ही ब्रह्मवेत्ता लोग इसे 'इन्द्र' कहते हैं । परोक्षरूप से इसे इन्द्र कहते हैं, क्योंकि देवगण परोक्षप्रिय ही होते हैं, देवगण परोक्षप्रिय ही होते हैं । ( यहाँ तृतीय खण्ड पूरा हुआ । ) यहाँ ऐतरेय उपनिषद् का प्रथम अध्याय समाप्त होता है । अथ द्वितीयोऽध्यायः चतुर्थः खण्डः पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद्रेतस्तदेतत्सर्वेभ्योऽङ्गेभ्य- स्तेजःसंभूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति । तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनज्जन- यति तदस्य प्रथमं जन्म ॥1 ॥
यह संसारी जीव निश्चयपूर्वक सबसे पहले पुरुष- शरीर में ही वीर्यरूपी गर्भ बनता है । पुरुष में यह जो वीर्य है, वह पुरुष के सभी अंगों से उत्पन्न हुआ तेज है । यह पुरुष पहले अपने स्वरूपभूत इस वीर्यरूप तेज को धारण करता है । बाद में जब वह उसे स्त्री में सिंचित करता है, तब वह गर्भरूप में उत्पन्न होता है । यह उसका पहला जन्म है । तत् स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति । यथा स्वमङ्गं तथा तस्मादेनां न हिनस्ति । साऽस्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति ॥2 ॥
वह गर्भ स्त्री के आत्मभाव को प्राप्त होता है अर्थात् जैसे अपना अंग हो, वैसा ही हो जाता है । इसीलिए वह स्त्री को पीड़ा नहीं पहुँचाता । वह स्त्री अपने शरीर में आए हुए पति के स्वरूप का पालन- पोषण करती है । सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भं बिभर्ति । सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति । स यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावय-
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द्वितीयोऽध्यायः ] ऐतरेयोपनिषत् ( 8 ) 131 त्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां लोकानां सन्तत्या । एवं सन्तता हीमे लोकास्तदस्य द्वितीयं जन्म ॥3 ॥
गर्भ का पोषण करती हुई स्त्री पालन- पोषण करने योग्य होती है । वह स्त्री ( माता ) उस गर्भ को प्रसव होने तक धारण करती है । जन्म होने के बाद वह पिता पहले ही कुमार को ( जातकर्मादि संस्कारों से ) अभ्युदयशील बनाता है— उसकी उन्नति करता है । वह पिता जन्म के बाद कुमार की उन्नति करता है | वह मानों इन लोगों की उन्नति करने से अपनी ही उन्नति करता है । क्योंकि इसी प्रकार ये सब लोग विस्तार को प्राप्त हुए हैं । वह उसका दूसरा जन्म है । सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते । अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति । स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म ॥4 ॥
पुत्ररूप में उत्पन्न हुआ उस पिता का ही आत्मा इसी के शुभकर्मों के लिए उसका प्रतिनिधि बना दिया जाता है । इसके बाद, इस पुत्र का यह पिता रूप दूसरा आत्मा अपना कर्तव्य पूरा करके आयुष्य पूरा होने पर मरने के बाद यहाँ से चला जाता है । यहाँ से जाकर ही फिर से उत्पन्न हो जाता है । वह इसका तीसरा जन्म है । तदुक्तमृषिणा-गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा । शतं मा पुर आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति । गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच ॥5 ॥
यही बात ऋषि ने कही है– “ अहो! मैंने गर्भ में रहकर ही इन देवों के बहुत जन्मों को जान लिया है । तत्त्वज्ञान होने से पहले मुझे सैकड़ों लोहमय शरीरों ने जकड़ रखावामदेवथा । अबने गर्भतत्त्वज्ञानमें शयनके प्रभाव से मैं बाज पक्षी की तरह उन्हें विदीर्ण कर बाहर निकल आया हूँ । " करते ही ऐसा कहा था । स एवं विद्वानस्याच्छरीरभेदादूर्ध्वं उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वामृतः समभवत्समभवत् ॥6 ॥
इति चतुर्थ खण्डः ॥4 ॥
इत्यैतरेयारण्यके पञ्चमोऽध्यायः ॥5 ॥
उपनिषत्सु द्वितीयोऽध्यायः ॥2 ॥
इस शरीर के नष्ट होने पर, इस प्रकार जन्म-जन्मान्तर का रहस्य जाननेवाला वह वामदेव ऋषि कर अमर हो ऊर्ध्व गति द्वारा परमधाम में पहुँच गया । सर्व भोगों को वहाँ प्राप्त संसार सेउठकर, गया । अमर हो गया । ( यहाँ चतुर्थ खण्ड पूरा हुआ ।) । यहाँ ऐतरेय उपनिषद् का द्वितीय अध्याय समाप्त हुआ
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132 उपनिषत्सञ्चयनम् अथ तृतीयोऽध्यायः पञ्चमः खण्डः कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे कतरः स आत्मा येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ॥1 ॥
हम जिसकी उपासना करते हैं, वह यह आत्मा कौन है? अथवा मनुष्य जिससे देखता है, अथवा जिससे सुनता है, अथवा जिससे गन्ध को सूँघता है, अथवा जिससे वाणी को स्पष्टरूप से बोलता है, अथवा जिससे स्वादयुक्त या स्वादरहित वस्तु को जानता है, वह आत्मा (प्रथम और द्वितीय अध्यायों में बताए गए आत्माओं में से ) कौन -सा है? यदेतद्बुदयं मनश्चैतत् । संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृति- र्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति । सर्वाण्ये- वैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥2 ॥
यह जो हृदय है वही मन भी है । संज्ञान ( चेतन ), आज्ञान (प्रभुत्व), विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, जूति ( रोगादिजनित दुःखवेग), स्मृति, संकल्प, क्रतु, असु ( प्राण ), काम, वश ( स्त्री- संसर्गादि की अभिलाषा)--ये सब प्रज्ञान (स्वच्छ ज्ञानस्वरूप ) परमात्मा के ही नाम अर्थात् उसी की सत्ता के बोधक लक्षण हैं । एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्च महाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव । बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥3 ॥
यह ब्रह्मा है, यह इन्द्र है, यही प्रजापति है । ये सभी देवता और पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज— ये पाँच महाभूत हैं । ( यह प्रज्ञानरूप आत्मा ही) क्षुद्र जीवों के साथ उनके बीज ( कारण) और अन्य अण्डज, जरायुज, स्वेदज, उद्भिज, घोड़े, गायें, मनुष्य एवं हाथी हैं । इसके अतिरिक्त और जो कुछ भी जंगम है, आकाश में उड़नेवाले ( पतत्रि) हैं, और वृक्षपर्वतादि स्थावर हैं — ये सब प्रज्ञानेत्र और प्रज्ञान में ही ( निरुपाधिक चैतन्य में ही ) स्थित हैं । यह समस्त ब्रह्माण्ड प्रज्ञास्वरूप परमात्मा से ही ज्ञानशक्ति से सम्पन्न हुआ है । प्रज्ञास्वरूप परमात्मा ही इस स्थिति का आधार है । अर्थात् प्रज्ञान ही इस स्थिति के केन्द्र में है । इसलिए प्रज्ञान ही ब्रह्म है । स एतेन प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान्
कामानाप्त्वामृतः समभवत्समभवत् । इत्योम् ॥4 ॥
इति पञ्चमः खण्डः ॥5 ॥
इत्यैतरेयारण्यके षष्ठोऽध्यायः ॥6 ॥
उपनिषत्सु तृतीयोऽध्यायः ॥3 ॥
इत्यैतरेयोपनिषत्समाप्ता । ++
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तृतीयोऽध्यायः ] ऐतरेयोपनिषत् (8 ) 133 वह इस लोक से ऊपर उठकर उस परमधाम में उस प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा के साथ सभी,भोगों को भोग कर अमर हो गया अमर हो गया । दिव्य ( यहाँ पञ्चम खण्ड पूरा हुआ । ) यहाँ ऐतरेय उपनिषद् का तृतीय अध्याय समाप्त होता है । इस प्रकार ऐतरेयोपनिषत् समाप्त होती है । COP शान्तिपाठः ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु तद्वक्तारमवत्ववतु मामवतु
वक्तारमवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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( 9 ) छान्दोग्योपनिषत् (उपनिषत्परिचय ) सामवेदान्तर्गत यह उपनिषद् सामवेद के छान्दोग्य ब्राह्मण से सम्बद्ध है | छान्दोग्य ब्राह्मण के कुल मिलाकर दस अध्याय हैं । उनमें से अन्तिम आठ अध्याय से यह उपनिषद् बनी हुई है । इस उपनिषद् का नाम ‘ छन्दस्' शब्द से निष्पन्न हुआ है । 'छन्दस्' सामवेद का नाम है । जो पुरुष उस ‘छन्दस्’ का गान करते हैं, उन्हें 'छन्दोगा' कहा जाता है । उन छन्दागाओं गानविषय और श्रद्धाविषय होने से इस उपनिषद् का नाम 'छान्दोग्योपनिषद्' पड़ा है । छान्दोग्योपनिषद् के सभी अध्याय महत्त्वपूर्ण हैं । पहले पाँच अध्याय उपासना ( ध्यान-पद्धति ) के विषय के हैं, अर्थात् वे द्वैतपरक हैं । और बाद के तीन अध्याय ब्रह्मपरक हैं । अर्थात् वे बहुधा अद्वैतपरक हैं । उपासना सम्बन्धी अध्यायों का हेतु चित्तशुद्धि पर जोर देने का है । जब चित्त विशुद्ध हो तभी ब्रह्मोपदेश प्रभावी हो सकता है । प्राचीनतम उपनिषदों में छान्दोग्योपनिषद् का महत्त्वपूर्ण स्थान है । उपनिषद् में कही गई विषयानुरूप रसमय कहानियाँ, सरल भाषा, विषय का गांभीर्य आदि सामान्य जनों में भी इस उपानषद् की उपादेयता को बढ़ा देते हैं । यह उपनिषद् सामान्य जनों को भी प्रेम से सत्पथ बताने में समर्थ है | उपनिषद् का प्रारंभ ही मनुष्यों को आध्यात्मिक उन्नति के उपदेश से होता है । यहाँ मनुष्य के लिए दो मार्ग बताए हैं । एक तो वैदिक विधिविधानों का अनुष्ठान और दूसरा शास्त्रविहित ब्रह्मोपासना । छान्दोग्योपनिषद् का कहना है कि ज्यादातर लोग तो पहला मार्ग ही पसंद करेंगे क्योंकि इन्द्रियातीत ब्रह्म का विचार उनकी पहुँच के बाहर का ही होता है । अवाङ्मनसगोचर ब्रह्म उनके लिए कुछ नहीं है । उनमें बहुत- सी इच्छाएँ होती हैं, और इच्छाओं की पूर्ति से ही वे खुश होते हैं । और उस इच्छापूर्ति के लिए वैदिक विधियों का अनुष्ठान सीधा सा उपाय है ही । पर उपनिषदें तो डंके की चोट कहती हैं कि ये ' धन- दौलत, सौन्दर्य, स्वास्थ्य, सत्ता और स्वर्ग भी स्थायी नहीं है, और वैदिक अनुष्ठान तो सिर्फ यही दे सकते हैं । यदि तुम शाश्वत आनन्द चाहते हो, तो वह तो इच्छाओं की अर्थात् संसार- बन्धनों की मुक्ति से ही मिल सकता है । और ऐसी मुक्ति तो केवल आत्मा के ज्ञान से ही हो सकती है । वैदिक विधियों में रचे - पचे लोगों के लिए यह उपनिषदों का आह्वान है । श्वेताश्वतरोपनिषद् की यह घोषणा ध्यानार्ह है— “तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते अयनाय । ” छान्दोग्योपनिषद् की भी यही चेतावनी है । चेतावनी देकर वह आत्मज्ञान की ओर हमारा ध्यान खींचती है । इस मार्गदर्शन के प्रथम सोपान में वह उद्गीथ का उपदेश करती है । अर्थात् ‘ ओम्' के रटन की बात करती है । यह उपासना की एक पद्धति है । मनोनिग्रह के लिए उपयुक्त उपासना- पद्धति का यह एक भाग है । हमारा लक्ष्य तो आत्मज्ञान ही है, परन्तु उसके पहले मनोनिग्रह करने के लिए कुछ उपासनाएँ करना अनिवार्य है, इस उपनिषद् का यही उपदेश है ।
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प्रथमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 135 उपनिषद् हमें उपासना ( विद्या) और यज्ञविधियों का अनुष्ठान ( अविद्या) दोनों का एक साथ आचरण करने की भी सूचना देता है । यह क्रमिक मुक्ति का मार्ग है । पहले पाँच अध्याय उपासनापरक ( द्वैतपरक ) हैं, किन्तु बाद के तीन अध्याय तो ब्रह्म के सिवा कुछ बात नहीं करते । वेदान्त का कोई भी तत्त्व ऐसा नहीं है, जो इसमें शामिल न किया गया हो । छान्दोग्योपनिषद् वेदान्त का एक कोश ही है । शान्तिपाठः ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य
उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
ॐ हे परब्रह्म परमात्मा! मेरे सभी अंग- वाणी, प्राण, नेत्र, कर्ण और सभी इन्द्रियाँ और शक्ति परिपुष्ट हों । यह जो सर्वरूप उपनिषत्प्रतिपादित ब्रह्म है, उस ब्रह्म का मैं अस्वीकार न करूँ । और ब्रह्म भी मेरा त्याग न करे । उसके साथ मेरा अटूट सम्बन्ध बना रहे । उपनिषद् में प्रतिपादित जो धर्मसमुदाय है, वे सभी परमात्मा में रत हममे प्रविष्ट हों, वे सभी धर्म हमारे में हों । ॐ हे परमात्मा! त्रिविध तापों की शान्ति हो । अथ प्रथमोऽध्यायः प्रथमः खण्डः ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति ह्युद्गायति तस्योपव्या- ख्यानम् ॥1 ॥
' ऐसा उच्चारण करके यज्ञ ‘ॐ ’ यह अक्षर उद्गीथ है । इसकी उपासना उद्गीथोपासनाकरनी चाहिए । की'ॐ यहाँ व्याख्या की जाती है । में उद्गाता उच्च स्वर से सामगान करता है । उस रसः । अपामोषधयो रस एषां भूतानां पृथिवी रसः, पृथिव्या आपो साम रसः ओषधीनां पुरुषो रसः । पुरुषस्य वाग्रसो वाच ऋगस ऋचः साम्न उद्गीथो रसः ॥2 ॥
सार) जल है, जल का रस ( स़ार ) इन चराचर भूतों का रस (सार) पृथ्वी हैसार, पृथ्वी) पुरुषकाहैरस। पुरुष( का सार वाणी है, वाणी का सार, ( ) ( सामवेद का रस ( सारसत्त्व) ( ) ऋचाऔषधियाँहै । हैंऋचाओंऔषधियोंका रसका (सारअन्नादि) सामकाहै रसऔर यह उद्गीथ ओंकार है । य उद्गीथः ॥3 ॥
स एष रसाना रसतमः परमः परार्थ्योऽष्टमो है । वस्तुओं का सार है, अतिश्रेष्ठ है, परमात्मस्थानीय जो यह आठवाँ ओंकार है, वह सारभूत
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136 उपनिषत्सञ्चयनम् कतमा कतमर्क्कतमत्कतमत्साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति ॥4 ॥
कौन- कौन- सी ऋचा है, कौन-कौन- सा सामवेद है, कौन- कौन- सा उद्गीथ है? — इसका विचार किया जा रहा है । वागेवर्क् प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथः । तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक् च प्राणश्च च साम च ॥5 ॥
वाणी ही ऋचा है और प्राण ही सामवेद है । इस प्रकार यह अक्षर ॐ (ओंकार ) उद्गीथ है । यह जो ऋक् और सामरूप वाणी और प्राण हैं, वे परस्पर मिथुन ( युगल ) हैं । तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे ससृज्यते । यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य कामम् ॥6 ॥
जब यह जोड़ा ( युगल) ‘ ओम्' इस अक्षर के साथ जुड़ जाता है, जिस समय उस युगल अवयव परस्पर जुड़ जाते हैं, तब निश्चय ही वे दोनों संयोग करते हैं और एक- दूसरे के मनोरथ को
पूर्ण करते हैं ।
आपयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमु- पास्ते ॥7 ॥
जो विद्वान् पुरुष इस अविनाशी ॐ कार का इस प्रकार निश्चित रूप से सेवन करता है, वह अवश्य हा यजमान के मनोरथों को पूर्ण करनेवाला होता है । तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धि किंचानुजानात्योमित्येव तदाहैषो एव समृद्धि- र्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति । य एतदेवं विद्वानक्षर- मुद्गीथमुपास्ते ॥8 ॥
यह वह ओंकार ही अनुज्ञा (स्वीकार) सूचक शब्द है । क्योंकि मनुष्य किसी को जब कोई अनुमति देता है, तब ‘ ओम्' ('हाँ' ) ऐसा ही कहता है । यह जो अनुज्ञा (स्वीकार ) है ( ),, संपदा है । इस प्रकार जाननेवाला जो पुरुष उद्गीथ की उपासना करता है वही समृद्धिकामनाओं को पूर्ण करनेवाला होता है । वह अवश्य ही सभी तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते ओमित्याश्रावयत्योमिति शः सत्योमित्युद्गाय- त्येतस्यैवाक्षरस्यापचित्यै महिम्ना रसेन ॥१ ॥
इस अक्षर से ही ये (ऋग्वेदादि) तीन विद्याएँ प्रवृत्त होती हैं । '( ) ' ' ' यजुर्वेदी ऋत्विज् देवता या यजमान को सुनाता है । ओम् ओम् ऐसा कहकर ही अध्वर्युप्रशंसा करता है । और ‘ॐ ' शब्द बोलकर ही उद्गाता ( सामवेदीकहकर ही होता (ऋग्वेदी ऋत्विज्) अक्षर की (ॐकार की ) पूजा के लिए ही ( अर्थात् ॐ काररूप परब्रह्मऋत्विज्) उद्गान करता है । इस ( यजमानादि ) से और यव, अक्षत, घी आदि होम द्रव्यों से सभी यज्ञादिके महत्त्व के लिए ही) ऋत्विज कर्म सम्पन्न होते हैं । तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद । नाना यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव तु विद्या चाविद्या च खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति ॥10 ॥ वीर्यवत्तरं भवतीति
इति प्रथमः खण्डः ॥
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प्रथमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 137 और जो पुरुष इस ओंकार अक्षर को इस तरह भलीभाँति जानता है और जो नहीं ये दोनों ओंकार का उच्चारण करके यज्ञादि कर्म के अधिकारी हैं । पर जो ज्ञानी ओंकारभी जानता—के रहस्य को समझकर यज्ञादि कर्म करते हैं, उनका यह कर्म विशेष फलप्रद होता है, क्योंकि विद्या अलग बात है और अविद्या भी अलग बात है । दोनों का फल भी अलग ही है । इसलिए जो मनुष्य विद्या, श्रद्धा और भक्ति से कर्म करता है, उसका फल अधिक होता है । इस प्रकार यह ( ओंकार अक्षर का) व्याख्यान 1 (यहाँ पहला खण्ड पूरा हुआ ।) द्वितीयः खण्डः देवासुरा ह वै यत्र संयेतिर उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथ- माजह्रुरनेनैनानभिभविष्याम इति ॥1 ॥
जिस समय प्रजापति की दो सन्तति– देव और असुर (श्रेष्ठता के लिए) एक- दूसरे के साथ झगड़ने लगीं, तब देवों ने ओंकार को अंगीकार किया और माना कि इस ' ओम्' के द्वारा हम असुरों को पराजित करेंगे । ( इस रूपकात्मक मंत्र में देव - सात्त्विक मनोवृत्तियों का और असुर - तामसी मनोवृत्तियों का प्रतीक है— अब आगे से लक्ष्यार्थ ही लेंगे ) । ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासांचक्रिरे तहासुराः पाप्मना विवि- धुस्तस्मात्तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥2 ॥
वे इन्द्रियों की सात्त्विक वृत्तियाँ ( वे देव ) नासिका सम्बन्धी प्राणचैतन्य रूप उद्गीथ की ही उपासना करने लगीं । और तामसवृत्तिरूप असुरों ने उस प्राणचैतन्य को स्पर्श करके अशुद्ध कर ही दिया । इसीलिए उसी पाप से जीव सुगन्ध और दुर्गन्ध– दोनों को सूँघता है । क्योंकि यह नासिक्याभिमानी देवता पाप से भी स्पृष्ट हो गया है । अथ ह वाचमुद्गीथमुपासांचक्रिरे ताहासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मा- त्तयोभयं वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥3 ॥
अब सात्त्विक वृत्तिरूप देव, वाणीस्थित चैतन्य की ओंकार के रूप में उपासना( संसर्गकरने) करलगेदिया—। पर तामसवृत्तिरूप असुरों ने उसे भी (वाणीस्थित प्राणचैतन्य को भी ) पाप से स्पर्श बोला करता है अशुद्ध बना दिया । इसीलिए यह जीव उससे (वाणी से ) सत्य और असत्य अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासांचक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मा-॥4 ॥
त्तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ने उसे भी पाप- फिर उन्होंने चक्षु के रूप में उद्गीथ की उपासना की । तामसीवृत्तिरूपीको भी देखताअसुरोंहै और न देखने योग्य संसर्ग से विद्ध ( अशुद्ध ) कर दिया । इसीलिए मनुष्य देखने योग्य वस्तु को भी देखता है । विविधुस्तस्मा- अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासांचक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥5 ॥
त्तेनोभयः शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना
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138 उपनिषत्सञ्चयनम् फिर उन्होंने श्रोत्र के रूप में उद्गीथ की उपासना की । तामसवृत्तिरूप असुरों ने उसे भी पाप से ( संसर्ग से ) बींध डाला ( अशुद्ध कर दिया) । इसलिए मनुष्य उस ( श्रोत्र ) से सुनने योग्य और न सुनने योग्य बातों को सुनता है । क्योंकि श्रोत्रेन्द्रिय भी स्पर्श के पाप से दोषयुक्त है । अथ ह मन उद्गीथमुपासांचक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्ते- नोभय संकल्पयते संकल्पनीयं चासंकल्पनीयं च पाप्मना ह्येत- द्विद्धम् ॥6 ॥
फिर उन्होंने मन के रूप में उद्गीथ की उपासना की । पूर्वोक्त असुरों ने उसे भी पाप से बींध डाला । इसी से मनुष्य संकल्प करने योग्य और संकल्प न करने योग्य दोनों का ही संकल्प किया करता है । क्योंकि यह मन भी पाप से दूषित ही है । अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे तहासुरा ऋत्वा विदध्वःसुर्यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वसेत् ॥7 ॥
और उसके बाद जो यह मुखस्थ प्राणचैतन्य है, उसकी वे सात्त्विक वृत्तिरूपी देव, उद्गीथ— ओंकार के रूप में उपासना करने लगे । परन्तु उसे पाकर (स्पर्श करके ) वे तामस वृत्तिरूप असुर (स्वयं) नष्ट हो गए । जैसे कठिन पत्थर को पाकर अर्थात् इससे टकराकर ( मिट्टी का बरतन) फूट जाता है । एवं यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वसत एव हैव स विध्वसते य एवंविदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माखणः ॥8 ॥
जो पुरुष इस प्राणज्ञाता पुरुष के प्रति पाप करना चाहता है, और जो इस प्राणवेत्ता को दुःख देता है, वह उसी प्रकार पूर्णतः नष्ट हो जाता है जिस प्रकार कठिन पत्थर पर गिरकर ( मिट्टी का बरतन ) नष्ट हो जाता है । क्योंकि ऐसा यह प्राणवेत्ता कठिन पत्थर जैसा ( अविकारी ब्रह्मरूप ) होता है । नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येष तेन यदश्नाति यत्पिबति तेनेतरान् प्राणानवति एतमु एवान्ततोऽवित्त्वोत्क्रामति व्याददात्येवान्तत इति ॥9 ॥
तामसवृत्ति से अविद्ध और नष्ट हुए पापवाला यह मुख्य प्राण इस नासिका से सुगन्ध और दुर्गन्ध को नहीं जानता और इसी विशुद्ध प्राण से पुरुष जो कुछ खाता और जो कुछ पीता है, उससे अन्य नासिकादि में स्थित देवताओं का ठीक तरह से पालन करता है । इस खानपान को बिना प्राप्त किए मरणसमय पर नासिकादि स्थित देवसमूह भागने लग जाते हैं । इसीलिए मरणसमय पर पुरुष अपना मुँह खोलकर चौड़ा कर देता है । तहाङ्गिरा उद्गीथमुपासांचक्र एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसः ॥10 ॥
इस मुख्य प्राण की ही अंगिरा ने उद्गीथ मानकर (ब्रह्म समझकर ) उपासना ' 'को आंगिरस कहते हैं क्योंकि वह अंगों का रस है । की । इस मुख्य प्राण तेन तह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासांचक्र एतमु एव बृहस्पतिं वाग्घि बृहती तस्या एष पतिः ॥11 ॥ मन्यन्ते