Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 181–190

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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प्रथमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 139 वाणी ' बृहती ' (बड़ी ) है । अत: यह बृहस्पति वाणी का स्वामी है । इसलिए इस की ओंकाररूप से बृहस्पति उपासना करने लगे । इसीलिए ऋषि लोग इस मुख्य प्राण कोमुख्यबृहस्पतिप्राण मानते हैं । तेन तहायास्य उद्गीथमुपासांचक्र एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद्यदयते ॥12 ॥

आयास्य ( नामक ) ऋषि मुख से उत्पन्न हुए हैं । इसीलिए उस मुख्य प्राण की ही ओंकाररूप में उपासना करने लगे और उस मुख्य प्राण को इसीलिए ही मुनि लोग ' आयास्य' इस नाम से जानते हैं । तेन तह बको दाल्भ्यो विदांचकार । स ह नैमिषीयानामुद्गाता बभूव स ह स्मैभ्यः कामानागायति ॥13 ॥

दल्भ्य ऋषि का पुत्र बक ऋषि उस मुख्य प्राण को अच्छी तरह जानता था । उसकी उपासना करने से बक ऋषि नैमिष क्षेत्र के यज्ञकर्ता ऋषियों का उद्गाता बना था । उसी उद्गाता बक ऋषि ने यज्ञकर्त्ता उन ऋषियों के मनोरथ पूर्ण किए थे । आगाता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ॥14 ॥

इति द्वितीयः खण्डः ॥ जो पुरुष इस प्रकार मुख्य प्राण को जाननेवाला है और इस अविनाशी ओंकार की उपासना करता है, वह सब मनोरथों को अवश्य ही पूर्ण करनेवाला होता है । इस प्रकार यह अध्यात्मविद्या समाप्त हुई । ( यहाँ दूसरा खण्ड पूरा हुआ । ) * तृतीयः खण्डः अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीतोद्यन्वा एषभवतिप्रजाभ्यय उद्गायति उद्यस्तमो भयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो एवं वेद ॥1 ॥

सूर्य उदय होकर प्रत्यक्ष अब देवताविषयक उद्गीथ की उपासना का प्रारंभ होता हैलिए। यहउद्गीथजो गाता है और जो उदित तपता है और जो यह उदय होता हुआ सूर्य प्रजा ( कल्याणसूर्य )कीके ओंकाररूप से उपासना करनी चाहिए । होकर अन्धकार और उसके भय को दूर करता है,भयउसीका और अज्ञान का निश्चयपूर्वक नाश करनेवाला जो मनुष्य इस प्रकार जानता है, वही संसार के होता है । स्वर इतीममाचक्षते स्वर समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयमुष्णोऽयंचोद्गीथमुपासीत ॥2 ॥

इति प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं समान हैं । और जैसे इस शरीर में स्थित इस शरीर में स्थित प्राण और सूर्यस्थउष्णप्राण-है । जैसेदोनों इस शरीर में स्थित प्राण को लोग ' स्वर' प्राण उष्ण है, वैसे ही सूर्यस्थित प्राणभी लोगभी 'प्रत्यास्वर' कहते हैं । इसलिए इस शरीर में स्थित प्राण कहते हैं, वैसे ही सूर्यस्थ प्राण को - ओंकाररूप की उपासना करनी चाहिए । में और सूर्यस्थ प्राण में उद्गीथ की

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140 उपनिषत्सञ्चयनम् अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानः । अथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः सा वाक् तस्मादप्राणन्ननपानन्वाचमभिव्याहरति ॥3 ॥

इसके बाद व्यानरूप उद्गीथ की उपासना करनी चाहिए । पुरुष जिस वायु का प्राणन करता है ( मुख-नासिका द्वारा वायु को बाहर निकालता है ) वही 'प्राण' है और जिस वायु को भीतर खींचता है, वही ‘ अपान ' है । और जो वायु प्राण- अपान की संधि है, वही ' व्यान' है । जो व्यान है, वह वाणी है | अतः प्राणक्रिया नहीं करनेवाला और अपानक्रिया नहीं करनेवाला होने पर भी पुरुष वाणी को बोलता है । या वाक्सर्न्तस्मादप्राणन्ननपानन्नृचमभिव्याहरति यत्साम तस्माद- प्राणन्ननपानन्साम गायति यत्साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्ननपानन्नु- द्गायति ॥4 ॥

जो वाणी है, वही ऋचा । अतः प्राणव्यापार को रोकता हुआ, अपानव्यापार को रोकता हुआ पुरुष ऋचा का उच्चारण करता है । जो ऋचा है, वही सामवेद है । अतः प्राणव्यापार को रोकता,, और अपानव्यापार को रोकता हुआ पुरुष साम गाता है । जो साम है वही उद्गीथ को रोकता हुआ और अपानव्यापार को रोकता हुआ पुरुष व्यान के द्वारा उद्गीथ है - । गानअत:करताप्राणव्यापारहुआहै । अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाग्नेर्मन्थनमाजेः सरणंदृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्ननपानस्तानि निकरोत्येतस्य हेतोर्व्यानमेवो- द्गीथमुपासीत ॥5 ॥

इसीलिए ऐसे जो अन्य प्रबल कार्य हैं, जैसे- अग्निमंथन, का खींचना आदि । ऐसे जो कर्म हैं, उन्हें प्राणव्यापार को रोकता कुछहुआहद तक दौड़ना, मजबूत धनुष मेंउपासना करनी चाहिएहुआ पुरुष। व्यान के द्वारा कर सकता है । इसलिए व्यान की ही ओंकारऔरके अपानव्यापाररूप को रोकता अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीतोद्गीथ इति प्राण एवोत्प्राणेन सर्वः स्थितम् ॥6 ॥ वाग्गीर्वाचो ह गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदः ह्युत्तिष्ठति

इसके बाद उद्गीथ के अक्षरों की उपासना करनी चाहिए मुख्य प्राण है, क्योंकि प्राणवायु से पुरुष उठता है । 'गी' अक्षर । 'उद्गीथ' पद में 'उत्' अक्षर का अर्थ कहा जाता है । ‘ थम्’ अक्षर का अर्थ अन्न होता है । अन्न में हीका अर्थ वाणी है । गिरा को ही वाणी यह सारा जगत् स्थित है । द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्थः वानन्नादोएवोद्यजुर्वेदोभवतिगीर्ऋग्वेदस्थंय एतान्येवंदुग्धेऽस्मैविद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्तवाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्न-सामवेद इति ॥7 ॥ उद्गीथ

‘ उत्’ अक्षर ही स्वर्ग है, ‘गी’ अक्षर आकाश है, ' ', ' ', ' ' ‘ ’‘हैथ' गीअक्षरअक्षरऋग्वेदवायुहै है । वाणीथम् काअक्षरफलअग्निजो हैमोक्ष। 'उत्है', ऐसाअक्षरथम्वाणीहीअक्षरसामवेदपृथ्वीहै, है'गी। 'उत्अक्षरअक्षरयजुर्वेदही आदित्यहै और का फल इस प्रकार के उपासक को

पृष्ठ 183

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प्रथमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 141 वह उपासना देती है । उपासक उक्त प्रकार से उद्गीथ के इन अक्षरों को जानकर है, वह अन्नसम्पत्ति और भोगशक्तिवाला होता है । इस प्रकार उद्गीथ की यह उपासनाउपासना करता है । अथ खल्वाशीः समृद्धिरुपसरणानीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन्स्या- त्तत्सामोपधावेत् ॥8 ॥

इसके बाद अच्छी तरह जो फलसिद्धि होती है, वह बताते हैं । जो ध्येय- ध्यान करने योग्य है, उसकी इस तरह उपासना करनी चाहिए । अर्थात्जिन सामवेदमंत्रों से स्तुति करता हुआ मनुष्य हो (स्तुति करना चाहता हो ), साधक उस मंत्र का प्रथम चिन्तन करे । यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां देवतां तामभिष्टोष्यन्स्यात्तां देवतामुपधावेत् ॥१ ॥

साधक सामवेद की बहुत-सी ऋचाओं में से जिस विशिष्ट ऋचा द्वारा स्तुति करना चाहता हो उसका उसे पहले चिन्तन करना चाहिए । फिर उस ऋचा के ऋषि (द्रष्टा ) जो हो, उसका चिन्तन करना चाहिए और उस मंत्र के देवता का भी चिन्तन करना चाहिए । येन च्छन्दसा स्तोष्यन्स्यात् तच्छन्द उपधावेद्येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्तः स्तोममुपधावेत् ॥10 ॥

साधक गायत्र्यादि जिस छन्द से स्तुति करनेवाला हो, उस छन्द का चिन्तन उसे करना चाहिए । जिस स्वर से वह स्तुति करनेवाला हो उस स्वर का भी चिन्तन कर लेना चाहिए ( अर्थात् उनकी

जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए ) ।

यां दिशमभिष्टोष्यन्स्यात्तां दिशमुपधावेत् ॥11 ॥

उद्गीथोपासक जिस दिशा की स्तुति करनेवाला हो, उस दिशा के अभिमानी देव का भी उसे चिन्तन कर लेना चाहिए । आत्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्रमत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः समृद्ध्येत यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥12 ॥

इति तृतीयः खण्डः ॥ सावधान होकर अपने मनोरथ का चिन्तन करता हुआ वह उद्गाता साधक, अन्त में अपने आत्मा का चिन्तन करते हुए स्तुति करता है । जिस फल की इच्छा से वह स्तुति करता है, वह फल उसे अवश्य ही मिलता है (तत्काल मिलता है ) । ( यहाँ तीसरा खण्ड पूरा हुआ । ) चतुर्थः खण्डः

ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति । ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥1 ॥

'ॐ यह अक्षर उद्गीथ है ।'– इस प्रकार इसकी उपासना करनी कीचाहिएव्याख्या। 'ॐ की’ काजातीउच्चारणहै । करके ही उद्गाता यज्ञ में उपगान करता है । यहाँ उस उद्गीथोपासना देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशस्ते छन्दोभिरच्छादयन्यदे- भिरच्छादयस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ॥2 ॥

पृष्ठ 184

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142 उपनिषत्सञ्चयनम् एक बार इन्द्रियों की सात्त्विक वृत्तिरूप देवों ने तामस वृत्तिरूप मृत्यु के संसर्गजन्य पाप से डरकर वेदत्रयी में प्रवेश किया ( वेदों की शरण में गए ) । वेदों ने उन्हें छन्दों से ढँक दिया । उसी से ( आच्छदन से ) छन्दों का छन्दस्त्व है ( छन्दों का छन्द नाम अन्वर्थक है ) ।

तानु तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेवं पर्यपश्यदृचि साम्नि यजुषि ।

ते नु विदित्त्वोर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ॥3 ॥

( माछीमार ) जिस तरह पानी में मछली को देखता है, इसी प्रकार तमोगुणवृत्तिरूपी मृत्यु ने वहाँ (ऋक्, यजुस्, साम सम्बन्ध कर्मों में ) उन सात्त्विक वृत्तिरूपी देवों को देखा । वे देव ( सात्त्विक वृत्तियाँ) मृत्यु की कामना को जानकर, ऋक् - यजुस्- साम के कर्मों से उपरत हो गए ( निवृत्त हो गए ) और ॐ कार की शरण में गए । यदा वा ऋचमाप्नोत्योमित्येवातिस्वरत्येव सामैवं यजुरेष उ स्वरो यदेतदक्षरमेतदमृतमभयं तत्प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन् ॥4 ॥

जब उपासक ऋग्वेद के मन्त्रों को 'ॐ ' – इस प्रकार प्राप्त होता है, तब इस तरह ‘ ओम्’ ( ॐ ) —ऐसा बोलकर सामवेद के और यजुर्वेद के मन्त्रों का उच्चारण करता है, सब यह 'ॐ ' स्वर ( स्वतंत्र ) है । क्योंकि वह अक्षररूप है, इसीलिए मृत्युहीन है । इसलिए ॐ रूप ब्रह्म को प्राप्त करके सात्त्विक वृत्तिरूप देव अमर और अभय हो गए । स य एतदेवंविद्वानक्षरं प्रणौत्येतदेवाक्षर स्वरममृतमभयं प्रविशति तत्प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥5 ॥

इति चतुर्थः खण्डः ॥ जो पुरुष पूर्वोक्तानुसार इस 'ॐ ' अक्षर को जानता हुआ उपासना करता है, वह पुरुष अमर और अभयरूप स्वर को ( अर्थात् ॐकार को ) प्राप्त होता है । क्योंकि सात्त्विक वृत्तिरूप देवलोग ॐकार का ध्यान करके अमर और अभय हो गए । अतः जो पुरुष ओंकार की उपासना करता है, वह अमर और अभय हो जाता है । ( यहाँ चौथा खण्ड पूरा हुआ । ) * पञ्चमः खण्डः अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणव ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥1 ॥

पूर्वोक्तानुसार सचमुच जो उद्गीथ है वह प्रणव है और जो प्रणव है वह उद्गीथ है । इस तरह यह प्रत्यक्ष सूर्य भी उद्गीथ है, वही प्रणव है । क्योंकि यह सूर्य ॐ ॐ ऐसे बोलता हुआ ही उदित होता है । एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्र- मुवाच रश्मी स्त्वं पर्यावर्तयाद्बहवो वै ते भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥2 ॥

और ‘“ मैं कौषीतकि इस सूर्य के आगे ही उद्गीथ का गान करने लगा । इसी से पुत्र हुआ । ” ऐसा कौषीतकि अपने पुत्र से कहने लगे । सूर्य की किरणों की और सूर्य की मेरा ‘ तू’ एक उद्गीथ बुद्धि से करो । अवश्य तुम्हें बहुत पुत्र प्राप्त होंगे । इस प्रकार अधिदैवत उपासनाउपासनाहै । तुम

पृष्ठ 185

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प्रथमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 143 अथाध्यात्मम् । य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥3 ॥

अब आध्यात्मिक उपासना कही जाती है । जो यह मुखसम्बन्धी चैतन्य प्राण है, उसे उद्गीथ से अभिन्न मानकर उपासना करनी चाहिए । क्योंकि यह प्राण ही सूर्य की तरह ' ओम् ओम्'--यह उच्चारण करता हुआ वागिन्द्रियादि की प्रवृत्ति के लिए चलता है । एतमु एवाहमभ्यागासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच प्राणाःस्त्वं भूमानमभिगायताद्बहवो वै मे भविष्य- न्तीति ॥4 ॥

और “ मैं कौषीतकि ने इसी प्राण के सामने उद्गीथ का गान किया ( उपासना की ) । इससे तुम एक पुत्र मुझे प्राप्त हुए हो । तुम सूर्य और सूर्यकिरणों की उपासना उद्गीथ के रूप में करो । तुम्हारे अवश्य ही बहुत पुत्र होंगे" - ऐसा कौषीतकि ने अपने पुत्र से कहा । अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति होतृषद- नाद्धैवापि दुरुद्गीथमनुसमाहरतीत्यनुसमाहरतीति ॥5 ॥

इति पञ्चमः खण्डः ॥ जो उद्गीथ है वही प्रणव है, और जो प्रणव है वही उद्गीथ है । इसलिए उद्गीथ का गान करनेवाला ऋत्विज् होम करके अपने स्वरवर्णादि दूषित उद्गीथगान को भी सम्हाल लेता है— दूर कर देता है । इस प्रकार उद्गीथ की उपासना पूरी हुई । ( यहाँ पाँचवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) षष्ठः खण्डः इयमेवर्गग्निः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयत इयमेव साऽग्निरमस्तत्साम ॥1 ॥

यह ( पृथ्वी ) ऋग्वेद है, अग्नि सामवेद है, वह यह सामवेद ऋग्वेदरूपी पृथ्वी में अवस्थितजाता हैहै |। अतः ऋग्वेद में आधेय भाव से स्थित है, ऐसा मानकर सामवेद (सामवेदियों द्वारा ) गाया ‘ साम ’ यही पृथ्वी ‘सा’ है । और अग्नि ' अम' है । इसलिए वह अग्नि और यह पृथ्वी – दोनों मिलकर अर्थ होता है । अन्तरिक्षमेवर्व्वायुः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढश् साम गीयतेऽन्तरिक्षमेव सा वायुरमस्तत्साम ॥2 ॥

आकाश ही ऋग्वेद है और वायु सामवेद है । यह वायुरूपी( सामवेदियोंसामवेद आकाशरूपीके द्वारा ) गायाऋग्वेदजातामें — ‘ ’ हैआधेयरूप। आकाशसे हीअवस्थित' सा' है हैऔर। इसलिएवायु हीऋग्वेद'अम' हैमें । अवस्थितवह आकाशसामवेदऔर वह वायु दोनों मिलकर साम शब्द का अर्थ है । द्यौरेवर्गादित्यः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढ साम गीयते द्यौरेव साऽदित्योऽमस्तत्साम ॥3 ॥

पृष्ठ 186

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144 उपनिषत्सञ्चयनम् स्वर्ग ही ऋग्वेद है और आदित्य ही सामवेद है । यह आदित्यरूपी सामवेद स्वर्गरूपी ऋग्वेद में आधेयरूप से अवस्थित है । इसलिए ऋग्वेद में अवस्थित सामवेद ( सामवेदियों द्वारा) गाया जाता है | स्वर्ग ही ‘ सा’ है और आदित्य ही ' अम' है । वह स्वर्ग और यह आदित्य– दोनों मिलकर ' साम' का अर्थ होता है । नक्षत्राण्येवर्क् चन्द्रमाः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्य- ध्यूढ साम गीयते नक्षत्राण्येव सा चन्द्रमा अमस्तत्साम ॥4 ॥

नक्षत्र ही ऋग्वेद है और चन्द्रमा ही सामवेद है । यह चन्द्रमारूपी सामवेद नक्षत्रोंरूपी ऋग्वेद में आधेयरूप से अवस्थित है । इसलिए ऋग्वेद में अवस्थित सामवेद गाया जाता है । नक्षत्र ही 'सा’ है और चन्द्रमा ही ' अम' है । वे नक्षत्र और यह चन्द्रमा- दोनों मिलकर 'साम' का अर्थ होता है । अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते ॥5 ॥

जो सूर्य का श्वेत प्रकाश है, वही ऋग्वेद है और जो नील और श्याम वर्ण है, वह सामवेद है । यह नील और कृष्णवर्ण सम्बन्धी सामवेद इस शुक्लवर्णरूपी ऋग्वेद में आधेयरूप से अवस्थित है । ऐसा समझकर गान किया जाता है । अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव साऽथ यन्नीलं परः कृष्णं तद- मस्तत्सामाऽथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्म- श्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ॥6 ॥

सूर्य का जो यह शुक्ल प्रकाश है, वही 'सा' है और जो नीलवर्ण अतिश्याम है, वही ‘ अम’ है । ये दोनों मिलकर ही साम हैं । और आदित्यमण्डल के भीतर जो यह सुवर्णमय दाढीवाला और सुवर्णमय केशवाला, सुवर्णमय नखशिख, सुवर्णमय देहवाला पुरुष है, वही यह पुरुष है I तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥7 ॥

सूर्य-मण्डलस्थ उस सुवर्णपुरुष की आँखें बन्दर की गुदा सदृश लालवर्ण वाले कमल जैसी हैं । उसका नाम ' उत्' है । क्योंकि उसने सर्वपापों का उत् ( लंघन किया है । जो उपासक इस तरह उस सूर्यमण्डलस्थ पुरुष को जानता है, वह सभी पापों से ऊपर उठकर उनसे युक्त हो जाता है । तस्यर्क् च साम च गेष्णौ तस्मादुद्गीथस्तस्मात्त्वेवोद्गातैतस्य हि गाता स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यधि- दैवतम् ॥४ ॥

इति षष्ठः खण्डः ॥ उस आदित्यस्थ ‘ उत्’ पुरुष को ऋग्वेद और सामवेद गाते हैं । अत: वही ' उत्' उद्गीथ है । और इसी से ही इस पुरुष को गानेवाला 'उद्गाता' है । और वही यह ' उत्' पुरुष इस सूर्य जो लोक हैं, उनका अधिपति है । वह देवताओं की कामनाओं को पूर्ण करता है । ऐसा यह अधिदैवतके ऊपर उपासना का फल है । ( यहाँ छठा खण्ड पूरा हुआ ।)

पृष्ठ 187

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प्रथमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 145 सप्तम: खण्ड: अथाध्यात्मम् । वागेवर्क् प्राणः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते वागेव सा प्राणोऽमस्तत्साम ॥1 ॥

अब आध्यात्मिक उपासना कही जाती है - वाणी ऋग्वेद है और नासिकास्थ प्राण सामवेद है । वही साम वाणीरूपी ऋग्वेद में आधेयरूप से अवस्थित है । इसलिए ऋग्वेद में स्थित सामवेद गाया जाता है । वाणी ही 'सा' है और प्राण ही ' अम' है । वे दोनों मिलकर 'साम' हो जाता है । चक्षुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते । चक्षुरेव सात्माऽमस्तत्साम ॥2 ॥

चक्षु ही ऋग्वेद है और उसका प्रतिबिम्ब ही सामवेद है । सही साम चक्षुरूपी ऋग्वेद आधेयरूप से अवस्थित है | इसलिए ऋग्वेद में स्थित सामवेद गाया जाता है । चक्षु ही 'सा' है और उसका प्रतिबिम्ब ही ' अम' है । दोनों मिलकर 'साम' हो जाता है । श्रोत्रमेवंमनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते । श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत्साम ॥3 ॥

श्रोत्र ही ऋग्वेद है और मन ही सामवेद है । वही साम श्रोत्ररूपी ऋग्वेद में आधेयरूप से अवस्थित है । इसीलिए ऋग्वेद-स्थित सामवेद गाया जाता है । श्रोत्र ही 'सा' है और मन ही ' अम' है । दोनों मिलकर 'साम' होता है । अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम तदेत- देतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते । अथ यदेवै- तदक्ष्णः शुक्लं भाः सैव साऽथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्साम ॥4 ॥

नेत्र में जो श्वेतवर्ण है, वह ऋग्वेद है और जो अत्यन्त नील-काला वर्ण है, वह सामवेद है । यह सामवेद ऋग्वेद में अधिष्ठित है । इसलिए ऋग्वेद में अवस्थित उस सामवेद को गाया'सामजाता' अर्थहै । नेत्रस्थ श्वेतवर्ण ही ' सा' है और जो अतिनील श्यामवर्ण है, वह ' अम' है । दोनों मिलकर होता है । अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते सैवर्त्तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्- ब्रह्म तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम ॥15 ॥

है, वही जो यह नेत्रस्थ पुरुष है, वही ऋग्वेद है, वही सामवेद है, वहीहै ऋचा(चक्षुःस्थहै, वहीपुरुषयजुर्वेदका भी) । जो ब्रह्म है । जो सूर्यस्थित पुरुष का रूप है, वही इसका भी रूप। और जो उसका नाम है, वह इसका सूर्यमण्डलस्थ पुरुष का अंग है वही चक्षुःस्थ पुरुष का अंग है भी नाम है । स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां चेति । तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात्ते धनसनयः ॥6 ॥

है । वैसा ही चक्षुःस्थ इस सूर्य के नीचे -ऊपर, दाईं- बाईं ओर जो लोकान्तर हैं, । उनकासाधकवहविधिपूर्वकस्वामी सूर्यस्थित पुरुष का पुरुष का भी है । वह सब मनुष्यों की कामनाएँ पूर्ण करता है 10 उ० प्र०

पृष्ठ 188

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146 उपनिषत्सञ्चयनम् वीणा से गान करते हैं, वे चक्षुःस्थ पुरुष का ही गान करते हैं । इसलिए वे गान करनेवाले धनवान होते हैं । अथ य एतदेवं विद्वान्साम गायत्युभौ स गायति । सोऽमुनैव स एष चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्ताश्श्चाप्नोति देवकामास्ताश्च ॥7 ॥

जो पुरुष ज्ञानपूर्वक और विधिपूर्वक सामवेद का गान करता है, वह चक्षुःस्थ पुरुष और सूर्यस्थ पुरुष — इन दोनों का गान करता है । वह पुरुष दोनों की अभेदोपासना द्वारा, जो लोक इस उपास्य सूर्य के ऊपर- नीचे, बायें - दायें हैं, उन सबको प्राप्त होता है । और वह पुरुष यजमान की कामना के लिए देवों की इच्छा को भी प्राप्त करता है । अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्ताश्श्चाप्नोति मनुष्यकामाश्च तस्माद् हैवंविदुद्गाता ब्रूयात् ॥8 ॥

और बाद में, इस लोक से ऊपर - नीचे -दायें - बायें जो लोक हैं, उन्हें वह प्राप्त करता है । जो मनुष्यसम्बन्धी कामनाएँ हैं, उन सबको इसी चक्षुःस्थ पुरुष के द्वारा ही अपने यजमान के लिए प्राप्त करता है । अत: इसे जानने वाला उद्गाता यजमान से (इस निम्न प्रकार से) कहता है । कं ते काममागायानीत्येष ह्येव कामागानस्येष्टे य एवं विद्वान्साम गायति साम गायति ॥9 ॥

इति सप्तमः खण्डः ॥ " मैं तेरे किस मनोरथ की सिद्धि के लिए सामवेद का गान करूँ? ” जब वह यजमान की कामनाओं को सुन लेता है, तब वह सामवेद का गान करता है । ( यहाँ सातवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) अष्टमः खण्डः यो होद्गीथे कुशला बभूवुः शिलकः शालावत्यश्चैकितायनो दाल्भ्यः प्रवाहणो जैवलिरिति । ते होचुरुद्गीथे वै कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति ॥1 ॥

शालावान का पुत्र शिलक, जिलक का पुत्र प्रवाहण और चिकितायन का पुत्र दाल्भ्य– ये तीनों उद्गीथ के ज्ञान में निपुण थे । ये तीनों ऋषि एक- दूसरे से कहने लगे कि अगर सबकी इच्छा हो, तो विशेष ज्ञान के लिए उद्गीथ में हम वादप्रतिवाद करें । तथेति ह समुपविविशुः । स ह प्रवाहणो जैवलिरुवाच भगवन्तावग्रे वदतां ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचः श्रोष्यामीति ॥2 ॥

‘ठीक’ ऐसा कहकर सब बैठे । तब जिवल का पुत्र प्रवाहण बोला— ‘ आप दोनों महानुभाव पहले बोलिए । बोलते हुए आप दोनों ब्राह्मणों की वाणी को मैं सुनूँगा । स ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छानीति पृच्छेति होवाच ॥3 ॥

पृष्ठ 189

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प्रथमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 147 यह सुनकर शालावान के पुत्र शिलक, चिकितायन के पुत्र दाल्भ्य से कहने लगे कि “ मैं ( आपसे कुछ ) पूछँ! ” दाल्भ्य ने कहा–' हाँ पूछिए ।' तब वह बोले । का साम्नो गतिरिति स्वर इति होवाच स्वरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच प्राणस्य का गतिरित्यन्नमिति होवाचान्नस्य का गतिरित्याप इति होवाच ॥4 ॥

शिलक ने पूछा-' सामवेद का आश्रय कौन है?' उसने कहा 'स्वर' | उसने पूछा— ' स्वर का आश्रय कौन है? ' उसने उत्तर दिया-'प्राण । ' उसने पूछा- 'प्राण का आश्रय कौन है? ' उसने उत्तर - ' अन्न' | उसने पूछा- ' अन्न का आश्रय क्या है? ' उसने उत्तर दिया ' जल’ । दिया- अपां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति न स्वर्गं लोकमतिनयेदिति होवाच स्वर्गं वयं लोक सामाभि- संस्थापयामः स्वर्गसस्ताव हि सामेति ॥5 ॥

शिलक ने पूछा- 'जल का आश्रय कौन है? ' दाल्भ्य ने कहा- 'स्वर्ग है ।' उसने फिरनहीं पूछा-है । मैं 'स्वर्ग का आश्रय कौन है?' उसने कहा– “सामवेद का आश्रय स्वर्ग से इतर लोक गई है । ” स्वर्गलोक की प्रतिष्ठा सामरूप से करता हूँ । क्योंकि सामवेद की स्तुति स्वर्गरूप में ही की त’ ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाचाऽप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपते- दिति ॥6 ॥

! साम स्वर्ग शालावान का पुत्र शिलक, चेकितायन के पुत्र दाल्भ्य से कहने केलगा-आगे 'हेतू दाल्भ्यऐसा कहेगा तो वह का आश्रय है'.'- यह जो तू कह रहा है, वह योग्य नहीं पड़ेहै '।, किसीतो उसी समय तेरा मस्तक नीचे गिर ( सुनने वाला ) यदि यह कह देगा कि 'तेरा मस्तक गिर पड़ेगा । का हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाचामुष्य लोकस्यन प्रतिष्ठां गतिरित्ययं लोक इति होवाचास्य लोकस्य का गतिरिति लोकमतिनयेदिति होवाच प्रतिष्ठां वयं लोक सामाभिसःस्थापयामः प्रतिष्ठास÷स्ताव हि सामेति ॥ 7 ॥

हूँ । तब शिलक ने कहा कि दाल्भ्य ने कहा कि आपसे मैं सामवेद का आश्रय जानना चाहता। सुनो । वह मृत्युलोक है । ” तब “इस स्वर्गलोक का क्या आश्रय है, वह तुम ठीक तौर से"जानोतब शिलक ने कहा– “ इस मृत्युलोक दाल्भ्य ने कहा कि “इस मृत्युलोक का कौन आधार करताहै? । इसीलिए हम सब साम को मृत्युलोक को लाँघकर साम का दूसरा आश्रय कोई प्राप्त नहीं पृथ्वीरूप में की गई है ” । का आश्रय मानते हैं । क्योंकि वेद में साम की स्तुति साम यस्त्वेतर्हि त’ ह प्रवाहणो जैवलिरुवाचान्तवद्वै किल ते शालावत्य ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाच ॥8 ॥

इत्यष्टमः खण्डः ॥

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148 उपनिषत्सञ्चयनम् जिवल का पुत्र प्रवाहण शिलक से कहने लगा कि– “हे शालावत्य! तेरा साम नाशवान है 1। यदि कोई साम को न जाननेवाला तुझसे कह दे कि तेरा मस्तक गिर जाएगा, तब उसी समय अवश्य तेरा मस्तक गिर पड़ेगा । ” ऐसा सुनकर शिलक ने कहा- “हाँ, तो मैं उस अविनाशी साम को आप महानु-भाव से सीखूँ! ” ऐसा सुनकर प्रवाहण ने कहा--'हाँ, जान लो । ' तब शिलक ने कहा कि- ( यहाँ आठवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) नवमः खण्डः अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच । सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ॥1 ॥

शिलक ने पूछा— “ इस लोक का आश्रय कौन है? ” प्रवाहण ने उत्तर में कहा— “ वह आकाश है । आकाश से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, और अन्त में आकाश में ही लीन हो जाते हैं । अत: सर्व का आधार आकाश ही है । क्योंकि आकाश सबसे श्रेष्ठ है । " स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान् परोवरीयाःसमुद्- गीथमुपास्ते ॥2 ॥

वही यह आकाश उद्गीथरूप परमात्मा है । वही यह आकाश अनन्त ब्रह्म है । इस आकाश का ज्ञाता श्रेष्ठ और पूजनीय होता है । जो आकाशरूप उद्गीथ ब्रह्म जानता है, वह श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होता है । त हैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच । यावत्त एनं प्रजायामुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिँल्लोके जीवनं भविष्यति ॥3 ॥

शुनक ऋषि का पुत्र अतिधन्वा अपने शिष्य उदरशाण्डिल्य को उद्गीथ का अनुभव कराकर कहता है कि— “ हे उदरशाण्डिल्य! तूने मेरे कथनानुसार उद्गीथ पहचान लिया है । अत: तुम्हारे वंशज जहाँ तक उद्गीथोपासना करते रहेंगे, वहाँ तक संसार में उत्कृष्ट जीवन जीएँगे । तथामुष्मिँल्लोके लोक इति स य एतमेवं विद्वानुपास्ते । परोवरीय ह्येवास्यास्मिँल्लोके जीवनं भवति तथाऽमुष्मिँल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥4 ॥

इति नवमः खण्डः ॥ जो कोई भी उपर्युक्त प्रकार से उद्गीथोपासना करता है, वह उस लोक में श्रेष्ठ पदवी प्राप्त करता है और शरीर का त्याग करने के बाद उसे उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है । यह उद्गीथ महिमा सर्वलोकहितार्थ कही गई है । ( यहाँ नौवाँ खण्ड पूरा हुआ । )