Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 191–200
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 191–200
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149प्रथमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) दशमः खण्डः मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास ॥1 ॥
चक्र ऋषि का पुत्र उषस्ति जब ओले- पत्थर आदि गिरने से कुरुप्रदेश की खेती बिगड़ गई, तब अपनी छोटी उम्र की पत्नी के साथ किसी धनिकों के गाँव में दीनहीन होकर रहने लगा । स हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तं बिभिक्षे त होवाच । नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये इम उपनिहिता इति ॥2 ॥
उस उषस्ति ने उस गाँव में सड़े हुए उड़द को खाते हुए महावत से वे सड़े उड़द माँगे | अतः महावत ने उससे कहा- " मेरे इस बरतन में जो उड़द हैं, इनके सिवा मेरे पास दूसरे उड़द नहीं हैं । ” एतेषां मे देहीति होवाच तानस्मै प्रददौ हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै पीतस्यादिति होवाच ॥3 ॥ ७
उषस्ति ने कहा— “ ये उड़द मुझे दे दो । ” “ठीक है अच्छी बात' ऐसा कहकर महावत ने उसे उड़द दे दिए । फिर महावत बोला- “खाने के बाद पानी पीओ " तब उषस्ति ने कहा— “ तब तो मुझे उच्छिष्ट ( जूठा ) जल पीने का दोष लगेगा” । न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति न वा अजीविष्यमिमां न खादन्निति होवाच कामो म उदपानमिति ॥4 ॥
- “तो क्या उड़द उच्छिष्ट नहीं हैं? ” – महावत के ऐसा कहने पर उषस्ति बोला— “ यदि मैंने ये उच्छिष्ट उड़द नहीं खाये होते तो मैं जीवित नहीं रहता । पानी का पीना या न पीना तो मेरी इच्छा की बात है । क्योंकि पानी तो मेरी इच्छानुसार कहीं भी मिल जायेगा । अतः यदि मैं उच्छिष्ट पानी नहीं पीऊँगा तो मरूँगा नहीं । स ह खादित्वातिशेषाञ्जायाया आजहार । साग्र एव सुभिक्षा बभूव तान्प्रतिगृह्य निदधौ ॥5 ॥
उषस्ति अच्छी तरह उड़द खा गए । बाद में बचे हुए उड़द अपनी स्त्री के लिएके पासले गएसे लेकर.और उसे दिए । परन्तु, उसको पहले से ही भिक्षा मिल चुकी थी, अतः उसने वे उड़द पति रख दिए । धनमात्राश् स ह प्रातः संजिहान उवाच यद्वतान्नस्य लभेमहि लभेमहि राजासौ यक्ष्यते स मा सर्वैरार्त्विज्यैर्वृणीतेति ॥6 ॥
भी अन्न उस उषस्ति ने सुबह विस्तर से उठते ही खेदपूर्वक अपनी स्त्री से ।कहासुनाकिहै अगरकि नजदीकथोड़ा में एक हम प्राप्त करें, तो चलने की शक्ति पाकर कहीं से थोड़ा धन प्राप्तपदकरेंके लिए पसंद करेगा । राजा यज्ञ कर रहा है । वह ऋत्विक् कर्म जाननेवाला मुझे उस तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति तान्खादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय ॥7 ॥
- "हे पति! ये तो सड़े हुए उड़द हैं! ” तब उन उड़दों को खाकर वह " पत्नी ने उससे कहा- ऋत्विजों के द्वारा किए जानेवाले यज्ञ की ओर गया ।
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150 उपनिषत्सञ्चयनम् तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेश स ह प्रस्तोतारमुवाच ॥8 ॥
वहाँ आस्ताव ( स्तुति करने के स्थल) में उद्गीथगान करनेवाले उद्गाताओं के पास वह (उषस्ति ) बैठा और प्रस्तोता ऋषि से कहने लगा— प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥9 ॥
“हे प्रस्तोता! जो देवता प्रस्ताव कर्म के साथ सम्बन्ध रखनेवाला है, उसे न जानते हुए यदि तुम गान करोगे, तो तुम्हारा मस्तक गिर पड़ेगा । " एवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानु- द्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥10 ॥
उसी तरह उद्गाता से भी उषस्ति ने कहा - "हे उद्गाता! जो देवता प्रस्ताव कर्म के साथ सम्बन्ध रखनेवाला है, उसे बिना जाने ही यदि तुम यदि उद्गीथगान करोगे तो तुम्हारा मस्तक गिर पड़ेगा । ” एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेद- विद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासा- ञ्चक्रिरे ॥11 ॥
इति दशमः खण्डः ॥ इसी तरह उसने प्रतिहर्ता से भी कहा- "हे प्रतिहर्ता! जो देवता प्रतिहारकर्म के साथ सम्बन्ध रखनेवाला है, उसे बिना जाने ही यदि तू प्रतिहार कर्म करेगा, तो तेरा सर नीचे गिर पड़ेगा । " यह सुनकर सभी ऋत्विज अपने- अपने कामों से रुक गए और मौन धारण किए हुए बैठे रहे । ( यहाँ दसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) एकादश: खण्ड: अथ हैनं यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच ॥1 ॥
बाद में यजमान उससे ( उषस्ति से ) इस प्रकार कहने लगा- " आप महानुभाव को मैं जानना चाहता हूँ । ” तब उसने उत्तर दिया – “मैं चक्रपुत्र उषस्ति हूँ । ” स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरार्त्विज्यैः पर्येषिषं भगवतो वा अहमवित्त्यान्यानवृषि ॥2 ॥
उस महानुभाव ( उषस्ति) से वह यजमान कहने लगा—-"मैंने इन ऋत्विजों के साथ आपकी बहुत खोज की, पर आपके न मिलने से मैंने दूसरों का वरण किया । ” भगवास्त्वेव मे सर्वैरात्र्त्विज्यैरिति तथेत्यथ तर्ह्येत एव समतिसृष्टाः स्तुवतां यावत्त्वेभ्यो धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥3 ॥
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प्रथमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 151 " अब आप ही मेरे सभी ऋत्विक कार्यों के लिए बनें । " तब उषस्ति ने कहा- "हाँ, पर इन सब उपस्थित ऋत्विजों को मेरी आज्ञानुसार स्तुति करनी होगी । और जितना धन तुम उन्हें देते हो, उतना ही धन मुझे देना होगा ।" तब यजमान (राजा ) ने कहा- 'ठीक है' । अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद । प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥4 ॥
उषस्ति ने उससे कहा--"' हे प्रस्तोता! इसके बाद जो प्रस्तोता था, वह उषस्ति के पास आया । प्रस्तावभक्ति का अधिष्ठाता जो देवता है, उसे बिना जाने ही तुम यदि यज्ञ में स्तुति करोगे, देवतो हैतुम्हारा, वह मस्तक अवश्य ही नीचे गिर पड़ेगा ।" तब प्रस्तोता बोला- "हे भगवन्! वह कौन- सा तो आपने कहा ही नहीं । ” प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते । सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रास्तोष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥5 ॥
से उत्पन्न होकर प्राण में –“ उषस्ति ने कहा वह देवता प्राण है । क्योंकि ये सभी। प्राणी प्राण जाने ही स्तुति कर ही विलीन हो जाते हैं । यह प्राणदेवता ही प्रस्तावानुगत है । यदि तुम उसे बिना देते, तो मेरे कहने से तेरा सर नीचे गिर जाता । अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ताभगवानवोचत्कतमातां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा सा देवतेति ॥6 ॥
हे उद्गाता! जो देव उद्गीथ का पुनः उद्गाता उषस्ति के पास गया । उषस्ति ने कहा- ("स्तुति) करोगे, तो तुम्हारा सर नीचे सम्बन्धी है, उसे बिना जाने ही यदि तुम यज्ञ में उसकाकौनउद्गान- सा देव है, वह तो आपने कहा ही नहीं । ” ” – “! गिर पड़ेगा । तब उद्गाता बोला भगवन् वह सन्तं आदित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः ते गायन्ति सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुदगास्यो मूर्धा व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ 7 ॥
उसकी बहुत स्तुति करते हैं । वही उषस्ति ने कहा— “वह देव आदित्य है । सभीहीस्थावरजंगमअगर तुमने उसकी स्तुति कर दी होती तो मेरे सूर्य उद्गीथ का अधिष्ठाता देव है । उसे बिना जाने पड़ता । ” कथनानुसार तुम्हारा मस्तक नीचे गिर प्रतिहारमन्वायत्ता तां अथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता मा भगवानवोचत्कतमा चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति - "! अब प्रतिहर्तासा देवतेतिउषस्ति॥8के ॥ पास गया । उषस्ति ने करोगेउससे, कहातो तुम्हाराहे मस्तकप्रतिहर्तानीचे जोगिरदेवजाएगाप्रतिहार। ” से सम्बद्ध है, उसे बिना जाने ही यदि तुम प्रतिहारकर्म-सा देव है, वह तो आपने कहा ही नहीं । ” तब प्रतिहर्ता बोला— “ भगवन्! वह कौन
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152 उपनिषत्सञ्चयनम् अन्नमिति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैषा देवता प्रतिहारमन्वायत्ता । तां चेदविद्वान्प्रत्यहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥१ ॥
इत्येकादशः खण्डः ॥ तब उषस्ति ने कहा— “ वह देवता अन्न है, क्योंकि सब प्राणी अन्न खाकर ही तो जीते हैं । इसलिए अन्नदेव प्रतिहारकर्म का अधिष्ठाता है । इस अन्न को बिना जाने ही यदि तुम प्रतिहारकर्म करते तो तुम्हारा मस्तक मेरे कथनानुसार नीचे गिर पड़ता । ” ( यहाँ ग्यारहवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) * द्वादश: खण्ड: अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वा- ध्यायमुद्वव्राज ॥1 ॥
( अब अन्नलाभ की इच्छा से कुत्तों द्वारा देखा गया उद्गीथ यहाँ आरंभ किया जाता है ) । दल्भ्यपुत्र बक अथवा ग्लाव एवं मित्रापुत्र मैत्रेय ( दोनों एक ही व्यक्ति हैं ) स्वाध्याय (उद्गीथाध्ययन ) के लिए किसी पवित्र स्थान में गया | [अन्नाभावपीड़ित कुत्तों का रुदन सुनकर, भूख के दुःख का अनुभव करके, उसके निवारणार्थ यह बक ऋषि उद्गीथगान किया करते थे । इसलिए इस उद्गीथ का नाम 'शौव उद्गीथ' अर्थात् ' कुत्तों का उद्गीथ' पड़ा है ] । तस्मै श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव । तमन्ये श्वान उपसमेत्योचुरन्नं नो भगवाना- गायत्वशनायाम वा इति ॥2 ॥
बक ऋषि के पास एक श्वेत कुत्ता ( कुत्ते के रूप में एक ऋषि ) उपस्थित हुआ । उस सफेद कुत्ते के आसपास अन्य छोटे- मोटे कुत्ते जाकर उसे कहने लगे- "आप हमारे लिए अन्न उत्पन्न करने के लिए गान कीजिए जिससे हम खाकर भूख मिटाएँ । ” तान्होवाचेहैव मा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाञ्चकार ॥3 ॥
यह सुनकर श्वेतश्वानरूपधारी उस ऋषि ने उन कुत्तों से कहा– “कल सुबह तुम सब मेरे पास आओ । ” यह सुनकर बक ऋषि भी (दल्भ्यपुत्र = दालभ्य अथवा मित्रापुत्र मैत्रेय = गाल्व ) उस स्थान पर उस श्वेतश्वान की राह देखने लगा । ते ह यथैवेदं बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः सश्रब्धाः सर्पन्तीत्येवमास- सृपुस्ते ह समुपविश्य हिंचक्रुः ॥4 ॥
जैसे किसी यज्ञकर्म में बहिष्पवमान स्तोत्र के गान के लिए, स्तुति करते ऋत्विज एक साथ पंक्तिबद्ध होकर चलते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी सभी छोटे कुत्ते हुए अध्वर्यु आदि चलने लगे । और फिर अच्छी तरह से बैठकर “ हीं हीं” —ऐसी आवाज करने लगेएक साथ पंक्ति में “ अलंकार का प्रयोग करके समझाया गया है कि श्वेतश्वान मुख्य प्राण है, छोटे कुत्ते वागिन्द्रिय। (यहाँ हैंअन्योक्ति। ऐसा कुछ लोग कहते हैं । )
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प्रथमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 153 ओ३मदा ३ मों ३ पिबा ३ मों ३ देवो वरुणः प्रजापतिः सविता३ऽन्नमिहा२- ऽऽहरदन्नपते २ऽन्नमिहा २ ऽऽहरा २ ऽऽहरो ३ मिति ॥5 ॥
इति द्वादशः खण्डः ॥ 'ॐ तब कुत्ते बोलने लगे- 66 हम खाएँ, ॐ हम पीएँ । प्रकाशमान वृष्टिदाता, सृष्टिपालक सविता देव हमारे लिए इस संसार मेंअन्न उत्पन्न करें । " वे फिर बोले– “हे अन्नोत्पादक सूर्य! यहाँ हमारे लिए अन्न लाइए । हम ॐ बोलकर खाएँ-पीएँ ” । ( यहाँ बारहवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) त्रयोदशः खण्डः अयं वाव लोको हाउकारो वायुर्हाइकारश्चन्द्रमा अथकारः । आत्मे- हकारोऽग्निरीकारः ॥ 1 ॥
यह लोक 'हाउ' अक्षर में प्रतिष्ठित है । वायु ' हाइ' अक्षर में आरोपित है । चन्द्रमा ‘ अथ ’ अक्षर में आरोपित है । आत्मा 'इह' अक्षर में आरोपित है । और अग्नि 'ई' अक्षर में आरोपित है । ( साम के अवयवभूत ‘ स्तोभाक्षर' उपासना यहाँ बताई गई है । ये स्तोभाक्षर 'हाऊ', ' हाई', ' अथ', ‘ इह’, ‘ ई’ आदि हैं । अर्थरहित गानसिद्ध्यर्थ अक्षर ही स्तोभाक्षर हैं । ) आदित्य ऊकारो निहव एकारो विश्वेदेवा औहोइकारः प्रजापतिर्हिकारः प्राणः स्वरोऽन्नं या वाग्विराट् ॥2 ॥
सूर्य 'उ' अक्षर है ( उष्णता से ), आह्वान 'ए' अक्षर है ( इन्द्रनिर्देशक ), विश्वेदेवा ‘ औहोइ' अक्षर है, प्रजापति 'हि' अक्षर है, प्राण स्वर है, अन्न 'या' अक्षर है और वाणी विराट् है । अनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः संचरो हुंकारः ॥ 3 ॥
कार्यकारणरूपी आत्मा जो 'हुम्' अक्षर है, वह तेरहवाँ स्तोभाक्षर है । इस स्तोभ अक्षरही काहै । भी कोई निर्वचन नहीं होता । इस अक्षर के द्वारा की गई उपासना का फल भी अनिर्वचनीय दुग्धेऽस्मै वाग्दहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेव- साम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद इति ॥4 ॥
इति त्रयोदशः खण्डः ॥ इति छान्दोग्योपनिषदि प्रथमोऽध्यायः ॥1 ॥
जो वाणी का फल है, वही फल यह +स्तोभाक्षर== उपासना उपासक को देतीऔर हैभोजनशक्तिवाला। जो उपासक सामवेद के स्तोभाक्षरविषयक समुचित ज्ञानवाला होता है, वह अत्रसम्पत्तिवाला होता है । (यहाँ तेरहवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) । यहाँ छान्दोग्योपनिषद् का प्रथम अध्याय समाप्त हुआ
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154 उपनिषत्सञ्चयनम् अथ द्वितीयोऽध्यायः प्रथमः खण्डः ॐ समस्तस्य खलु साम्न उपासनः साधु यत्खलु साधु तत्सामेत्या- चक्षते यदसाधु तदसामेति ॥1 ॥
अंगों सहित सामवेद की उपासना करने योग्य है । जो अंगसहित साम है, वही सचमुच साम है । जो अंगों के सहित साम नहीं है, वह साम नहीं है । ऐसा सामवेदज्ञ लोग कहते हैं । तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुरसाम्नै- नमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ 2 ॥।
और स्पष्ट कहते हैं कि कोई पुरुष राजादि के पास 'साम' से (नम्रवचन से ) गया, सब लोग कहते हैं कि वह उसके पास ' साधुभाव' से गया । और जब वह उसके पास ' असाम' ( कठोर- गर्व से ) से जाता है तब लोग कहते हैं, वह असाधुभाव से वहाँ गया था । अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ॥3 ॥
फिर ऐसा भी कहते हैं कि हमारा ' साम' ( शुभ) हुआ । जब ' साम ( शुभ) होता है, तब ' साधु' अर्थात् ‘ अच्छा हुआ ' ऐसा कहते हैं, और जब ऐसा कहते हैं कि हमारा ' असाम' ( अशुभ) हुआ, तब ' असाधु' अर्थात् बुरा हुआ ऐसा भी कहते हैं । स य एतदेवं विद्वान्साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेन साधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥4 ॥
इति प्रथमः खण्डः ॥ अतः जो उपासक उस साम- असाम के भेद को जानते हुए, इस शोभन अंग सहित साम को उक्त प्रकार से जानकर उपासना करता है, उसे श्रुतिस्मृति- प्रतिपादित धर्म प्राप्त होते हैं, और उपस्थित होते हैं । ( यहाँ पहला खण्ड पूरा हुआ । ) द्वितीयः खण्डः लोकेषु पञ्चविधः सामोपासीत । पृथिवी हिंकार अग्निः प्रस्तावोऽन्त- रिक्षमुद्गीथः आदित्यः प्रतिहारो द्यौर्निधनमित्यूर्ध्वेषु ॥1 ॥
ऊर्ध्व लोकों के उपासक को पाँच प्रकार के साम की उपासना इस प्रकार करनी चाहिए— पृथिवी हिंकार है, अग्नि प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, आदित्य प्रतिहार है और द्युलोक निधन है अर्थात् गए हुए उपासक का स्थान है । अथावृत्तेषु द्यौर्हिंकार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी निधनम् ॥2 ॥
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द्वितीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 155 उसके बाद नीचे के लोकों में उसी उपासक को साम के पाँच अंगों की यहाँ कहे अनुसार उपासना करनी चाहिए | जैसे स्वर्ग हिंकार है, आदित्य प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, अग्नि प्रतिहार है और पृथ्वी निधन अर्थात् स्वर्ग से आए लोगों का स्थान है । कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च य एतदेवं विद्वाँल्लोकेषु पञ्च- विध सामोपास्ते ॥3 ॥
इति द्वितीयः खण्डः ॥ लोकों में जो उपासक इस स्तोभाक्षरयुक्त पाँच प्रकारवाले साम की पूर्वोक्त प्रकार से जानकर उपासना करता है, वह ऊपर के स्वर्गादि तथा नीचे के पृथ्वी आदि लोकों को भोग सहित प्राप्त करता है । ( यहाँ दूसरा खण्ड पूरा हुआ । ) * तृतीयः खण्डः वृष्टौ पञ्चविधः सामोपासीत पुरोवातो हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः ॥1 ॥
उपासक को सृष्टि में पाँच प्रकार के साम की उपासना करनी चाहिए । उसमें वर्षापूर्व का पवन हिंकार है, जो मेघ उत्पन्न होता है वह प्रस्ताव है, बरसात उद्गीथ है, जो प्रकाश के साथ चमकता है और आवाज करता है वह प्रतिहार है । उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान्वृष्टौ पञ्चविधः सामोपास्ते ॥2 ॥
इति तृतीयः खण्डः ॥ वृष्टि में पाँच प्रकार मेघ जो जल ग्रहण करता है, वह निधन है । इस प्रकार जाननेवालाहै औरजोबरसातापुरुष है । उस उपासक के साम की उपासना करता है उस उपासक के लिए ही वह बरसतापाता है ) । के लिए ऊपर और नीचे के लोक उपस्थित रहते हैं ( वह उन्हें (यहाँ तीसरा खण्ड पूरा हुआ । ) चतुर्थः खण्डः स हिंकारो यद्वर्षति सर्वास्वप्सु पञ्चविधः सामोपासीत मेधो यत्सम्प्लवतेयाः प्रतीच्यः स प्रतिहारः स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो समुद्रो निधनम् ॥1 ॥
साम की उपासना करनी चाहिए । उपासक को सब प्रकार के जलों में इस प्रकार पाँच प्रकारप्रस्तावकेहै, पूर्व में बहने वाला जल उद्गीथ मेघ जो घनीभूत होता है वह हिंकार है, जो हैबरसताऔर समुद्रहै वह निधन है । है और पश्चिम में बहनेवाला जल प्रतिहार
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156 उपनिषत्सञ्चयनम् न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान्भवति । य एतदेवं विद्वान्सर्वास्वप्सु पञ्चविधः सामोपास्ते ॥2 ॥
इति चतुर्थः खण्डः ॥ पूर्वोक्त प्रकार से जो साधक पंचांग सहित सामोपासना सर्व जलों में ज्ञानपूर्वक करता है, वह कभी जल में डूबकर नहीं मरता । वह जल का स्वामी हो जाता है । ( यहाँ चौथा खण्ड पूरा हुआ । ) * पञ्चमः खण्डः ऋतुषु पञ्चविधः सामोपासीत वसन्तो हिंकारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनम् ॥1 ॥
साधक को इस प्रकार ऋतुओं में पाँच प्रकार की सामोपासना करनी चाहिए । जैसे वसन्त हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरद् प्रतिहार है और हेमन्त निधन है । कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान्भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधः सामोपास्ते ॥2 ॥
इति पञ्चमः खण्डः ॥ जो साधक ऋतुओं में इस पंचविध साम की पूर्वोक्त प्रकार से ज्ञानपूर्वक उपासना करता है, उसके लिए ऋतुएँ सभी फल देती हैं और वह ऋतुओं का सुख भोगनेवाला होता है । ( यहाँ पाँचवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) षष्ठः खण्डः पशुषु पञ्चविध सामोपासीताजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथो- ऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनम् ॥1 ॥
उपासक को पशुओं में पंचविध साम की उपासना करनी चाहिए । जैसे बकरे हिंकार है,,, प्रस्ताव है गायें उद्गीथ हैं घोड़े प्रतिहार हैं और पुरुष निधन है । भेड़ें भवन्ति हास्य पशवः पशुमान्भवति य एतदेवं विद्वान्पशुषु सामोपास्ते ॥2 ॥ पञ्चविधञ्
इति षष्ठः खण्डः ॥ जो उपासक ज्ञानपूर्वक पूर्वोक्त प्रकार से पशुओं में पंचविध सामोपासना,पशुवाला हो जाता है अर्थात् पशुओं( यहाँसे समृद्धछठा खण्डहोतापूराहै ।हुआ । ) करता है वह अनेक * सप्तमः खण्डः प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत क्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयासिप्राणो हिंकारो वैतानिवाक्प्रस्तावश्च- ॥1 ॥
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द्वितीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 157 उपासक को प्राणों में अतिश्रेष्ठ पंचविध सामोपासना करनी चाहिए । जैसे — प्राण हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है और मन निधन है, इस प्रकार उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है । ये उपासनाएँ सचमुच उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं । परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान्प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥ 2 ॥
इति सप्तमः खण्डः ॥ जो उपासक इस प्रकार जानकर इन्द्रियों में अंगों के साथ साम की उपासना करता है, उसका जीवन अतिश्रेष्ठ बन जाता है । और वह उत्कृष्ट लोकों को प्राप्त करता है । ( यहाँ सातवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * अष्टमः खण्डः अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविध सामोपासीत यत्किञ्च वाचो हुमत सहिंकारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिः ॥1 ॥
अब सात प्रकार के साम की उपासना इस प्रकार कही जाती है । (इस मंत्र के तीन अंग और आगे कहे गए चार अंग- सब मिलकर सात होते हैं । अब सातों की उपासना कही जा रही है— ) जो कुछ वाणी है वह हुंकार है, और जो हुंकार है वह 'हिंकार' है, और जो 'प्र ' उपसर्ग है वह प्रस्ताव है, और जो 'आ' उपसर्ग है वह आदि है । दिति उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपेति स उपद्रवो अन्विति तन्निधनम् ॥2 ॥
जो ‘उत्' उपसर्ग है वह उद्गीथ है, जो 'प्रति' उपसर्ग है वह प्रतिहार है, जो ‘ उप' उपसर्ग है वह उपद्रव है और जो ' अनु ' उपसर्ग है वह निधन है । दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नदो भवति य एतदेवं विद्वान्वाचि सप्तविध सामोपास्ते ॥3 ॥।
इत्यष्टमः खण्डः ॥ यह उपासना, जो वाणी का फल है, उस फल को प्राप्त करासेदेतीऔरहै उसे। जोपचानेउपासककीज्ञानपूर्वकशक्ति से वाणी में सातों अंगों से साम की उपासना करता है, वह अन्नशक्ति पूर्ण हो जाता है । ( यहाँ आठवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * नवमः खण्डः समस्तेन साम अथ खल्वमुमादित्यः सप्तविध सामोपासीत सर्वदा मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम ॥ 1 ॥
उपासना करनी चाहिए । वाणी में सामोपासना के बाद, उस आदित्यरूप में सप्तविधसमानसाम हैकी, अतः साम सर्वरूप है । यह सूर्य सर्वदा एकरूप ( सम) है, इसी से साम सबके लिए
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158 उपनिषत्सञ्चयनम् सूर्य, ' मेरे सामने है ' 'मेरे सामने है ”–इस प्रकार अनुभव से सबके प्रति 'सम' है, इसीलिए वह 'साम' है । तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात्तस्य यत्पुरोदयात्स हिंकारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात्ते हिंकुर्वन्ति हिंकारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥2 ॥
‘उस आदित्य में ही ये सब प्राणी अनुगत हैं ' - ऐसा जानना चाहिए । आदित्य के उदय के पहले जो है, वह हिंकार है । उसके हिंकार के अनुगत पशु हैं, इसीलिए वे "हीं हीं ” किया करते हैं इसीलिए वे आदित्यरूप साम के हिंकार के पात्र हैं । अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तमात्ते प्रस्तुति- कामाः प्रशसाकामाः प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥3 ॥
अब अन्य रीति से सामोपासना कही जाती है । उदयपूर्व सूर्य का जो रूप है, वह प्रस्ताव है । उस प्रस्ताव में मनुष्य शरण में हैं । अतः इस सूर्यरूप साम के प्रस्ताव के उपासक प्रशंसा चाहनेवाले होते हैं । अथ यत्सङ्गववेलाया स आदिस्तदस्य वयाःस्यन्वायत्तानि तस्मात्ता- न्यन्तरिक्षेऽनारम्भणान्यादायात्मानं परिपतन्त्यादिभाजीनि ह्येतस्य साम्नः ॥ 4 ॥
अब अन्य उपासना कहते हैं । सूर्योदय के बाद तीन मुहूर्त बीतने पर जो सूर्य का रूप है, वह सामवेद का एक भाग ( भक्तिविशेष) है । इस भक्तिविशेष ॐकार का जो रूप है, उसमें पक्षी प्रविष्ट हैं । अत: पक्षी आकाश में किसी की सहायता के बिना, अपनी ही शक्ति ग्रहण करके उड़ते हैं । क्योंकि ये पक्षी उस भक्तिविशेष ॐ कार रूप संगवकाल के आदि की उपासना करनेवाले हैं । अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने स उद्गीथस्तदस्य देवा अन्वायत्तास्तस्मात्ते सत्तमाः प्राजापत्यानामुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥5 ॥
अब अन्य प्रकार की उपासना कही जाती है । मध्याह्न काल में जो सूर्यरूप है, वह उद्गीथ है | उस उद्गीथ में देव अनुस्यूत हैं । इसीलिए प्रजापति की सन्तानों में वे श्रेष्ठ हैं । क्योंकि वे ( देवता ) इस साम के उद्गीथ के उपासक हैं । अथ यदूर्ध्व मध्यन्दिनात्प्रागपराह्णात्स प्रतिहारस्तदस्य गर्भा अन्वाय- त्तास्तस्मात्ते प्रतिहृता नावपद्यन्ते प्रतिहारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥16 ॥
अब मध्याह्नकाल के बाद और अपराह्नकाल के पूर्व सूर्य का जो रूप है, वह प्रतिहार है । उस प्रतिहार में गर्भ प्रविष्ट है । इसीलिए गर्भाशय में प्राप्त गर्भ च्युत नहीं होते है ॥ क्योंकि वे गर्भ इस साम के प्रतिहार के उपासक हैं । अथ यदूर्ध्वमपराह्णात्प्रागस्तमयात्स उपद्रवस्तदस्यारण्या अन्वायत्तास्त- स्मात्ते पुरुषं दृष्ट्वा कक्षः श्वभ्रमित्युपद्रवन्त्युपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ 7 ॥
अपराह्णकाल के बाद और अस्तकाल के पूर्व जो सूर्य का रूप है, वह उपद्रवस्तोभ है । वन्य