Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 201–210

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

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159द्वितीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) पशु उसी के आश्रय में जीते हैं । इसीलिए वे पशु पुरुष को देखकर भागने लगते हैं । और भयमुक्त वन में चले जाते हैं । क्योंकि ये पशु उपद्रवस्तोभ के उपासक हैं । अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात्तान्निद- धति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न एवं खल्वमुमादित्यः सप्तविधः सामोपास्ते ॥8 ॥

इति नवमः खण्डः ॥ और भी एक उपासना कहते हैं— प्रथम अस्तकाल में जो सूर्यरूप है, वह निधन है । उस सूर्यरूप में पितृलोग प्रविष्ट है | अतः दर्भ पर पितृओं को (पिता, पितामह आदि के रूप में) रखा जाता है । क्योंकि वे पितृ साम के निधनस्तोभ के उपासक हैं । इसलिए जो उपासक सात प्रकार के साम की सूर्य-रूप में उपासना करता है, सूर्यतुल्य ही हो जाता है । ( यहाँ नौवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) दशम: खण्ड: अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविध सामोपासीत हिंकार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं तत्समम् ॥1 ॥

अब समान अक्षरों वाले मृत्यु से अतीत सप्तविध साम की उपासना करनी चाहिए — यह कहते। हैं । 'हिंकार' तीन अक्षरों वाला है और 'प्रस्ताव' भी तीन अक्षरोंवाला है । अतः दोनों समान हैं आदिरिति द्व्यक्षरं प्रतिहार इति चतुरक्षरं तत इहैकं तत्समम् ॥2 ॥

'आदि' दो अक्षरवाला है और 'प्रतिहार' चार अक्षरवाला है । यदि प्रतिहारऐसासेचिन्तनएक अक्षरकरके निकालकर आदि में जोड़ा जाय, तो दोनों समान होंगे । उपासक को चाहिए कि वह ही इन दोनों की उपासना करे I उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षर- मतिशिष्यते त्र्यक्षरं तत्समम् ॥3 ॥

दोनों में तीन अक्षरों की तो 'उद्गीथ ' तीन अक्षरवाला है और ' उपद्रव' चार अक्षरवालाभीहैतीन। अक्षर होने की समानता तो समानता है, पर ‘ उपद्रव' में एक अक्षर बढ़ जाता है । पर उसमें है ही । निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविशतिरक्षराणि ॥4 ॥

। ये सब मिलकर बाईस अक्षर 'निधन' यह तीन अक्षरों वाला नाम है । वह तो समान ही है होते हैं । (छः स्तोभों के 19 और निधन के 3 = 22 ) द्वाविशेन एकविशत्यादित्यमाप्नोत्येकविशो वा॥5इतोऽसावादित्यो॥ परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् सूर्यलोक, इस लोक से इक्कीसवाँ उपासक इक्कीस अक्षरों से आदित्य को प्राप्त होता है । वह

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160 उपनिषत्सञ्चयनम् है । बाइसवें अक्षर से सूर्यलोक से ऊपर के लोक को उपासक जीतता है । वह लोक सुखरूप और शोकरहित है | आप्नोति हादित्यस्य जयं परो हास्यादित्यजयाज्जयों भवति य एतदेवं विद्वानात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविध सामोपास्ते सामोपास्ते ॥6 ॥

इति दशमः खण्डः ॥ जो उपासक पूर्वोक्त प्रकार से ज्ञानपूर्वक परमात्मतुल्य, मृत्युजयी, सात प्रकार के साम की उपासना करता है, वह अवश्य सूर्य पर विजय पा लेता है और आदित्यजय के बाद भी जय (ब्रह्मलोक ) की प्राप्ति उसे अवश्य होती है । ( यहाँ दसवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) * एकादश: खण्ड: मनो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधन- मेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतम् ॥1 ॥

मन हिंकार है, वाणी प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है, प्राण निधन है । यह गायत्र (साम) प्राणों में पिरोया हुआ है । स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या महामनाः स्यात्तद् व्रतम् ॥2 ॥

इत्येकादशः खण्डः ॥ जो महात्मा इस गायत्रसाम की उपासना इन्द्रियसहित प्राण में करता है, वह इन्द्रियशक्ति से सम्पन्न होता है, पूर्ण आयुष्य पाता है, उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, सन्तान - पशु आदि से बड़ा होता है, बड़ा यशस्वी होता है, उदारहृदय होता है, यह उसका व्रत है । ( यहाँ ग्यारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * द्वादश: खण्ड: अभिमन्यति स हिंकारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथो- ऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनः सशाम्यति तन्निधन- मेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतम् ॥1 ॥

अरणिमन्थन से उत्पन्न अग्नि हिंकार है, धूम प्रस्ताव है, जलता है वह उद्गीथ है, जो अंगारे हैं वह प्रतिहार है, शान्त होना वह निधन है, पूर्ण शान्त होना भी निधन है । यह ‘ रथ्यन्तर' नामक साम अग्नि में अनुस्यूत है । स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न प्रत्यङ्ङग्निमा- चामेन्न निष्ठीवेत्तद्व्रतम् ॥2 ॥

इति द्वादशः खण्डः ॥

पृष्ठ 203

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द्वितीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 161 जो साधक अग्नि में अनुगत इस 'रथ्यन्तर' साम को इस तरह जानता है, वह विद्यावान और ज्ञानवान बनता है । पुष्ट शरीर और पूर्ण आयुष्य पाता है, उज्ज्वल जीवन जीता है, पशु - संतान से महान् और बड़ा यशस्वी होता है । उनका ऐसा व्रत है कि जिसमें अग्नि के सामने मुँह रखकर भोजन नहीं करते और उसके आगे थूकते नहीं हैं । (यहाँ बारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * त्रयोदशः खण्डः उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥1 ॥

संकेत करते हैं वह हिंकार है, मीठी- मीठी बातें प्रस्ताव है, स्त्री के साथ सोता है वह उद्गीथ है, अनेक पत्नियों में से एक पत्नी के साथ सोता है वह प्रतिहार है, मैथुन में समय व्यतीत करता है वह निधन है, मैथुनक्रिया की समाप्ति भी निधन ही है । यह वामदेव्य साम मिथुन में ओतप्रोत ( सम्बद्ध ) है । स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनीभवति मिथुनान्मिथुना- त्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महा- कीर्त्या न कांचन परिहरेत्तद्व्रतम् ॥2 ॥

इति त्रयोदशः खण्डः ॥ , वह सदा स्त्री के जो उपासक इस वामदेव्य नामक साम की पूर्वोक्त रीति से उपासना करता है उज्ज्वल जीवन साथ ही रहता है । प्रत्येक मैथुन से सन्तानोत्पत्ति करता है, पूर्ण आयुष्य भोगतास्त्रीहै,का त्याग न करना जीता है, सन्तान- पशुओं से बड़ा होता है, बहुत यशस्वी होता है । अपनी किसी ही उसका व्रत होता है । ( यहाँ तेरहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) चतुर्दशः खण्डः उद्यन्हिंकार उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उद्गीथोऽपराह्नः प्रतिहारोऽस्तं यन्निधनमेतद् बृहदादित्ये प्रोतम् ॥1 ॥

का सूर्य उद्गीथ है, अपराह्न का उगता हुआ सूर्य हिंकार है, उदित सूर्य प्रस्ताव सूर्यहै, मध्याह्नमें स्थित है । सूर्य प्रतिहार है, और अस्त निधन है । यह बृहत्साम भवति सर्वमायुरेति स य एवमेतद् बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादोमहान्कीर्त्या तपन्तं न निन्देत् ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति तद्व्रतम् ॥2 ॥

इति चतुर्दशः खण्डः ॥ 11 उ० प्र०

पृष्ठ 204

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162 उपनिषत्सञ्चयनम् जो साधक आदित्य में इस बृहत्साम की उपासना करता है, वह तेजस्वी अन्न पचानेवाला होता है, पूर्ण आयुष्य पाता है, संतान- पशुओं से बड़ा होता है, बहुत यशस्वी होता है, उज्ज्वल जीवन जीता है । तपते सूर्य की निन्दा न करना ही यहाँ व्रत है । ( यहाँ चौदहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) पञ्चदश: खण्ड: अभ्राणि सम्प्लवन्ते स हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतम् ॥1 ॥

बादल एकत्रित होते हैं वह हिंकार है, मेघ उत्पन्न होता है वह प्रस्ताव है, बरसता है वह उद्गीथ है, चमकता और गड़गड़ाहट करता है वह प्रतिहार है, वृष्टि का उपसंहार निधन है । वह वैरूप नामक साम मेघ में ओतप्रोत है । स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपाश्च सुरूपाश्च पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥2 ॥

इति पञ्चदशः खण्डः ॥ जो पुरुष इस ‘ वैरूप ’ साम को इस प्रकार पर्जन्य में ओतप्रोत जानकर उपासना करता है, वह कुरूप और सुरूप पशु प्राप्त करता है, पूर्ण आयुष्य भोगता है, तेजस्वी जीवन जीता है, प्रजाओं और पशुओं से बड़ा होता है, बहुत यशस्वी होता है । बरसते हुए की निन्दा न करना यहाँ नियम है । ( यहाँ पंद्रहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * षोडशः खण्डः वसन्तो हिंकारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतम् ॥1 ॥

वसन्त हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरत् प्रतिहार है, हेमन्त निधन है— वह वैराज साम ऋतुओं में अनुस्यूत है । स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्यतून्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥2 ॥

इति षोडशः खण्डः ॥ जो उपासक वैराज साम को पूर्वोक्त प्रकार से ऋतुओं में अनुगत मानकर उपासना करता है, वह सन्तानों, पशुओं और ब्रह्मतेज से शोभित होता है । पूर्ण आयु भोगता है, उज्ज्वल जीवन जीता है, सन्तानों, पशुओं और कीर्ति से बड़ा होता है । ऋतुओं की निन्दा न करना ही नियम है । (यहाँ सोलहवाँ खण्ड पूरा हुआ ।)

पृष्ठ 205

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द्वितीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 163 सप्तदश: खण्ड: पृथिवी हिंकारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोताः ॥1 ॥

पृथ्वी हिंकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, द्यौ उद्गीथ है, दिशाएँ प्रतिहार हैं, समुद्र निधन है । वह शक्वरी साम लोकों में ओतप्रोत है । स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या लोकान्न निन्देत्त- द्व्रतम् ॥2 ॥

इति सप्तदशः खण्डः ॥ जो उपासक शक्वरी साम को इस प्रकार लोकों में अनुस्यूत जानता है, वह लोकवान होता है, . पूरा आयुष्य भोगता है, उज्ज्वल जीवन जीता है, संतति और पशुओं से भी महान् बनता है, बड़ा यशस्वी होता है । लोकों की निन्दा न करे – यह नियम है । ( यहाँ सत्रहवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) * अष्टादश: खण्ड: अजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधन- मेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः ॥1 ॥

बकरे हिंकार हैं, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गायें उद्गीथ हैं, घोड़े प्रतिहार हैं, पुरुष निधन है । इस प्रकार से रेवती साम पशुओं में ओतप्रोत है । स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान्भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या पशून्न निन्देत्तद्- व्रतम् ॥2 ॥

इत्यष्टादशः खण्डः ॥ जो उपासक इस रेवती साम को पशुओं में ओतप्रोत जानता है, वह पशुवाला होतायशस्वीहै, होतापूरा आयुष्य भोगता है, ओजस्वी जीवन जीता है, प्रजा और पशुओं से बड़ा होता है, बहुत है । पशुओं की निन्दा न करना यहाँ नियम है । (यहाँ अठारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) एकोनविंशतिः खण्डः लोम हिंकारस्त्वक्प्रस्तावो मासमुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जा निधन- मेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतम् ॥1 ॥

मज्जा निधन है । इस रोंगटे हिंकार हैं, त्वचा प्रस्ताव है, मांस उद्गीथ है, हड्डियाँ प्रतिहार हैं, है । प्रकार यह यज्ञायज्ञीय साम अंगों में ओतप्रोत

पृष्ठ 206

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164 उपनिषत्सञ्चयनम् स य एवमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गी भवति नाङ्गेन विहूर्च्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात्तद्व्रतं मज्ज्ञो नाश्नीयादिति वा ॥2 ॥

इत्येकोनविंशः खण्डः ॥ जो उपासक इस यज्ञायज्ञीय साम को अंगों में ओतप्रोत होते हुए जानता है, वह सबल अंगोंवाला होता है । किसी अंग से खण्डित नहीं होता । पूरी आयु भोगता है, उज्ज्वल जीवन जीता है, सन्तति और पशुओं से महान् होता है, बड़ा यशस्वी बनता है । एक वर्ष तक मांस न खाना यहाँ नियम है । अथवा तो मांस ही न खाना- यह नियम है । ( यहाँ उन्नीसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) विंशः खण्डः अग्निर्हिकारो वायुः प्रस्ताव आदित्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु प्रोतम् ॥1 ॥

अग्नि हिंकार है, वायु प्रस्ताव है, आदित्य उद्गीथ है, नक्षत्र प्रतिहार है, चन्द्रमा निधन है । यह राजन साम देवताओं में ओतप्रोत है । स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवताना सलोकता सार्ष्टिताः सायुज्यं गच्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥2 ॥

इति विंशः खण्डः ॥ जो साधक इस प्रकार राजन साम को देवताओं में ओतप्रोत जानकर उपासना करता है, वह इन देवताओं के सालोक्य और ऐश्वर्य को प्राप्त करता है, पूर्ण आयु पाता है, उज्ज्वल जीवन जीता है, सन्तान और पशुओं से बड़ा होता है । बहुत यशस्वी होता है । ब्राह्मणों की निन्दा न करना, यहाँ नियम है । ( यहाँ बीसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * एकविंशः खण्डः त्रयी विद्या हिंकारस्त्रय इमे लोकाः स प्रस्तावोऽग्निर्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि वयासि मरीचयः स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितर- स्तन्निधनमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतम् ॥1 ॥

तीनों वेद हिंकार हैं; तीनों लोक ( पृथ्वी- अन्तरिक्ष-स्वर्ग ) प्रस्ताव है; अग्नि, वायु और आदित्य — ये उद्गीथ हैं; नक्षत्र, पक्षी और किरणें - प्रतिहार हैं; सर्प, गंधर्व और पितृ— ये निधन हैं ।

यह सामोपासना सबमें अनुगत है ।

स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतं वेद सर्व ह भवति ॥2 ॥

इस तरह जो इस साम को सबमें अनुगत जानकर उपासना करता है, वह सर्वरूप होता है ।

पृष्ठ 207

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द्वितीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 165 तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परम- न्यदस्ति ॥3 ॥

इस खण्ड में हिंकारादि पाँच अंग सहित तीन रूप वाले साम कहे गए हैं, उनसे ज्यादा उत्तम —कोई भी पदार्थ नहीं है । इस विषय में यह श्लोक है- यस्तद्वेद स वेद सर्वः सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति सर्वमस्मीत्युपासीत तद्व्रतं तद्व्रतम् ॥4 ॥

इत्येकविंशः खण्डः ॥ जो इसे जानता है, सब जानता है, उसे सभी दिशाएँ बलि समर्पित करती हैं । “ मैं सब कुछ जानता हूँ ” – ऐसी भावना करनी चाहिए । सर्वात्मक साम को जाननेवाले का यह नियम है । यह व्रत है । ( यहाँ इक्कीसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) द्वाविंश: खण्ड: विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायो श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं. बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान्सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वैव वर्जयेत् ॥1 ॥

जो अग्निरूपी सामगान है, वह पशुओं की वृद्धि करनेवाला है, वह गाय-बछड़े के शब्द जैसा है । जो उद्गीथरूप ब्रह्मा का गान है, वह अनिरुक्त शब्दवाला है । जो निरुक्त शब्दवाला गान है, वह चन्द्रमा का है । जो गान केवल कर्णमधुर है, वह वायु का है । जो गान प्रिय और उच्च स्वरवाला है, वह इन्द्र का है । जो गान सारसपक्षी के स्वर-सा है, वह बृहस्पति का है, जो गान टूटे हुए कांस्य घण्ट का- सा है, वह वरुण का है । उन्हीं सब सामगानों की उपासना करनी चाहिए । परन्तु वरुण देवता से सम्बद्ध अप्रिय साम का त्याग करना चाहिए । इस प्रकार मैं पूर्वोक्त प्रकार को चाहता हूँ—ऐसा एक उद्गाता कहता है । अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत्स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्य- स्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥2 ॥

एक उद्गाता कहता है कि- " मैं देवताओं के लिए अमृत का गान करूँ, पितृओं के लिए स्वधासम्बन्धी सामगान करूँ, मनुष्यों के लिए आशा सम्बन्धी सामगान करूँ, पशुओं केअन्नलिएसम्बन्धीघास-, पानी सम्बन्धी साम का गान करूँ यजमान के लिए स्वर्गलोक सम्बन्धी और अपने लिए करना साम का गान करूँ । ” इस प्रकार मन से चिन्तन करके स्वरव्यंजन से सावधान होकर सामगान चाहिए । सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मानः सर्व ऊष्माणः प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानस्तं यदि स्वरेषूपालभेतेन्द्रः शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति वक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥3 ॥

पृष्ठ 208

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166 उपनिषत्सञ्चयनम् सभी स्वर इन्द्र के अंग हैं । सभी उष्माक्षर प्रजापति के अंगभूत हैं । सभी स्पर्शव्यंजन मृत्यु के अंगीभूत हैं । कोई भी मनुष्य यदि उद्गाता को अशुद्ध उच्चारण करते हुए देख लें, तो उद्गाता को कहना चाहिए कि— “ मैं इन्द्र की शरण में गया हूँ । तेरे प्रश्न का वे उत्तर देंगे । ” अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत प्रजापतिः शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति पेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयादथ यद्येनःस्पर्शेषूपालभेत मृत्यु शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥4 ॥

यदि कोई उस साम- उद्गाता को ऊष्माक्षरों के अशुद्ध उच्चारण के लिए उलाहना दे तो उसको यह कहना चाहिए कि “ मैं प्रजापति की शरण में गया हूँ, वह तुम्हें पीस डालेंगे । ” और यदि कोई उस सामगाता को स्पर्शव्यंजनों के अशुद्ध उच्चारण करने के लिए उलाहना दे तो, उसको यह कहना चाहिए कि “ मैं मृत्यु की शरण में गया हूँ, वह तुम्हें भस्म कर डालेंगे ” । सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्वे ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा लेशेनानभिनिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥5 ॥

इति द्वाविंशः खण्डः ॥ “ मैं अपना बल इन्द्र को देता हूँ” – ऐसी भावना करके सभी स्वर गंभीर और उच्च आवाज से बोलने चाहिए । “ मैं अपनी आत्मा प्रजापति को सौंपता हूँ” – ऐसी भावना करके ऊष्माक्षर मुँह में बिना दबाए, जैसे - तैसे बिना फेंके ठीक तरह की खुली आवाज से बोलने चाहिए । “ मैं अपने को मृत्यु से बचालूँ” – ऐसी धारणा करके सभी स्पर्श व्यंजन जिसका परस्पर मिश्रण न हो, इस प्रकार से स्पष्ट उच्चारण करके ही बोलने चाहिए । ( यहाँ बाईसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) त्रयोविंशः खण्डः यो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्म- चार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसःस्थोऽमृतत्वमेति ॥1 ॥

धर्म के तीन भाग हैं । प्रथम भाग यज्ञ, वेदाध्ययन और दान है । द्वितीय भाग तपश्चर्या है । तृतीय भाग कष्टदायक तपश्चरण करते हुए आचार्य के घर में निवास करना है । ऐसे तपस्वी पुण्यलोक प्राप्त करते हैं, पर ब्रह्मोपासक तो मोक्ष ही प्राप्त करता है । प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्त्रवत्तामभ्य- तपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति ॥2 ॥

प्रजापति ने लोकों के लिए तप किया । सन्तप्त हुए उन लोकों से तीन वेद निकले । उन तीन वेदों से तप (विचार) किया तो अभितप्त हुई उस त्रयी विद्या से भूः भुवः और स्व: -ये तीन व्याहृतियाँ निकल पड़ीं ( तीन अक्षर निकले ) ।

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द्वितीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 167 तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐकारः सम्प्रास्त्रवत्तद्यथा शकुना सर्वाणि पर्णानि सन्तृष्णान्येवमोंकारेण सर्वावाक् सन्तृष्णोंकार एवेद सर्वमोंकार एवेद सर्वम् ॥3 ॥

इति त्रयोविंशः खण्डः ॥ बाद में प्रजापति ने उन अक्षरों का परीक्षण किया । उन परीक्षित अक्षरों से ॐकार निकला । जिस तरह नसों के द्वारा सभी पत्ते व्याप्त होते हैं, उसी तरह ॐ कार से समस्त वाणी व्याप्त है । केवल ॐकार ही यह सब कुछ है । (यहाँ तेईसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * चतुर्विंशः खण्डः ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद्वसूनां प्रातः सवन रुद्राणां माध्यन्दिनः सवनमादित्यानां च विश्वेषां च देवानां तृतीयसवनम् ॥1 ॥

ब्रह्मवादी कहते हैं कि जो सुबह का होम है, वह वसुओं के लिए है, जो मध्याह्न का हवन है, वह रुद्रों के लिए है और जो तीसरा होम ( संध्या का ) करते हैं वह आदित्यों के लिए और विश्वदेवों के लिए है । क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं न विद्यात्कथं कुर्यादथ विद्वान्कुर्यात् ॥2 ॥

यदि ऐसा ही है तो यजमान का यज्ञफलरूप लोक कहाँ है? यदि यजमान वह नहीं जानता, तो फिर भला वह यज्ञ ही क्यों करेगा? इसलिए उसे जाननेवाला ही यज्ञ करेगा । पुरा प्रातरनुवाकस्योपाकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्योदङ्मुख उपविश्य स वासवः सामाभिगायति ॥3 ॥

सुबह में ‘ शस्त्र ' नामक स्तोत्र का प्रारंभ करने से पहले, गार्हपत्य अग्नि के पीछे उत्तराभिमुख बैठकर वह यजमान वसुदेवता सम्बन्धी साम का गान करे ( करता है ) । लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वय: ३ ३ ३ ३ ३ हुं ३ आ ३३ जा ३ यो ३ आ ३२१११ इति ॥4 ॥

हे अग्निदेव! मेरे लिए पृथ्वीलोक के द्वार को खोल दीजिए, जिससे मैं आपको देखूँ और ऐश्वर्य पाऊँ । अथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एतास्मि ॥5 ॥

में रहनेवाले (इस लोक के इसके बाद यजमान इस मंत्र के द्वारा हवन करता है– “पृथ्वीकी प्राप्ति कराइए । मैं अवश्य निवासी ) अग्निदेव को नमस्कार । मुझ यजमान को आप पुण्यलोक ही इस पुण्यलोक में जानेवाला हूँ । " अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि॥6 ॥ परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति

तस्मै वसवः प्रातःसवनः सम्प्रयच्छन्ति

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उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 210 का मूल पृष्ठ
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168 उपनिषत्सञ्चयनम् इस लोक में यजमान हवन करते हुए बोलता है कि- “मेरी आयु पूरी होने के बाद मैं उस लोक में जाना चाहता हूँ—- स्वाहा । " और भी — “जब मैं आऊँ, तब पृथ्वीलोक के दरवाजे की आड़ को दूर करके दरवाजा खोल देना ।” – यह मंत्र बोलकर वह खड़ा होता है । वसुदेवताएँ उसे वह फल देती हैं । पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीधीयस्योदङ्मुख उपविश्य स रौद्रः सामाभिगायति ॥ 7 ॥

मध्याह्न के यज्ञ के प्रारंभ से पहले, दक्षिणाग्नि के पीछे से उत्तराभिमुख होकर यजमान रुद्रदेवता सम्बन्धी साम का गान करता है कि- लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयं वैरा ३३३३३ हुं ३ आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११ इति ॥8 ॥

“हे अग्नि! अन्तरिक्ष के द्वार को खोल दीजिए, जिससे हम अन्तरिक्ष लोक को प्राप्त करने के लिए आपको देखें । अथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एतास्मि ॥9 ॥

बाद में यजमान इस मंत्र के द्वारा हवन करता है– “अन्तरिक्ष में रहनेवाले अन्तरिक्षवासी वायुदेव को नमस्कार हो । मुझ यजमान को आप अन्तरिक्षलोक की प्राप्ति कराइए । यजमान का वही लोक है, मैं उसे प्राप्त करूँगा । " अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा माध्यन्दिनः सवनः सम्प्रयच्छन्ति ॥10 ॥

यहाँ यजमान “ आयुष्य पूर्ण होने के बाद मैं अन्तरिक्षलोक पाऊँगा स्वाहा ”'- वह बोलकर होम करता है । और, “ लोकद्वार की आड़ को दूर कीजिए"- ऐसा बोलकर उठ जाता है । तब रुद्र उसे मध्याह्न के हवन का फल देते हैं । पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यः स वैश्वदेवः सामाभिगायति ॥11 ॥

सायंकालीन यज्ञारंभ के पहले यजमान आहवनीय अग्नि के पीछे उत्तराभिमुख बैठकर आदित्यसम्बन्धी और वैश्वदेवसम्बन्धी साम का भी गान करता है कि— लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयःस्वारा ३३३३३ हुं ३ आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११ इति ॥12 ॥

हे अग्नि! कृपा करके मेरे प्राप्य लोक का द्वार खोल दीजिए, कि जिससे हम स्वाराज्य प्राप्त करने के लिए आपके दर्शन पा सकें । आदित्यमथ वैश्वदेवं लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयः साम्ना ३३३३३ हुं ३ आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११ इति ॥13 ॥

( पूर्वमंत्र आदित्य के लिए था और अब वैश्वदेव के लिए है कि— ) हे अग्नि! हमारे प्राप्य लोक का द्वार खोल दीजिए, जिससे स्वाराज्य प्राप्त करने के लिए हम आपके दर्शन पा सकें ।