Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 211–220
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 211–220
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द्वितीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 169 अथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दत ॥14 ॥
अब यजमान होम करते हुए कहता है –“ स्वर्गस्थ द्युलोकवासी आदित्यों को नमस्कार । मुझ यजमान को पुण्यलोक की प्राप्ति कराइए । एष वै यजमानस्य लोक एतास्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहा- ऽपहतपरिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति ॥15 ॥
“ यह स्वर्गलोक अवश्य ही यजमान का लोक है । मैं मृत्यु के बाद उसी लोक में जानेवाला हूँ, स्वाहा ” — “स्वर्ग के दरवाजे की आड़ को दूर कर दीजिए ।”– ऐसा मंत्र कहकर यजमान खड़ा हो जाता है तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयः सवनः सम्प्रयच्छन्त्येष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥16 ॥
इति चतुर्विंशः खण्डः ॥ इति छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयोऽध्यायः ॥2 ॥
उस यजमान को आदित्य और विश्वदेव तीसरे सवन का फल देते हैं । जो इस प्रकार जानता है, वह निश्चय ही यज्ञ के यज्ञार्थ स्वरूप को जानता है । ( यहाँ चौबीसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) यहाँ छान्दोग्योपनिषद् का द्वितीय अध्याय समाप्त हुआ ।
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170 उपनिषत्सञ्चयनम् अथ तृतीयोऽध्यायः प्रथमः खण्डः ॐ असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवशोऽन्तरिक्ष- मपूपो मरीचयः पुत्राः ॥1 ॥
यह सूर्य देवों का मधु है, द्युलोक एक तिरछा बाँस है, अन्तरिक्ष उस बाँस पर आया हुआ शहद का छत्ता ( मोहार ) है, उस छत्ते में सूर्य शहद ( मधु ) है, और किरणें उस छत्ते में रहनेवाले मक्खियों के बच्चे हैं । तस्य ते प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्य ऋच एष मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः ॥2 ॥
पूर्वदिशा की सूर्यकिरणें इस अन्तरिक्षरूप छत्तों के पूर्वीय छिद्र हैं, ऋचाएँ मधुमक्खियाँ हैं, ऋग्वेद पुष्प है, वे सोमरसादि प्रवाही (जल ) है - ये ऋचाएँ हैं । एतमृग्वेदमभ्यतपस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्य रसोऽजायत ॥3 ॥
इन ऋचारूप मधुमक्खियों ने ही ऋग्वेद को अभितप्त किया । तप्त हुए उस ऋग्वेद से (ऋग्वेदनिर्दिष्ट यज्ञादि क्रियाओं से ) यश, तेज, नीरोगी इन्द्रियाँ, बल, अन्नादि- ये सब फल मिलते
हैं । वे फल ही रस है (वह यज्ञादि से उत्पन्न होता है ) ।
तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य रोहित’- रूपम् ॥4 ॥
इति प्रथमः खण्डः ॥
यज्ञकर्म से यश आदि जो क्रियाशील हुआ उसने सूर्य के पूर्वभाग में आश्रय लिया । इसलिए सूर्य का जो लाल रूप दीखता है, वह यज्ञ-कर्मों के फलरूप यश, कान्ति आदि है । ( यहाँ पर पहला खण्ड पूरा हुआ ।) * द्वितीयः खण्डः अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाड्यो यजूष्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥1 ॥
सूर्य की दक्षिण की ओर की किरणें ही छत्ते (मोहार ) के दक्षिण ओर के छिद्र ही मधुमक्खियाँ हैं, यजुर्वेद की यज्ञक्रियाएँ ही पुष्प हैं, सोमादि वनस्पति ( अमृतरूपहैं, यजुर्वेद) हीकेजलयज्ञमन्त्र है । तानि वा एतानि यजूयेतं यजुर्वेदमभ्यतपस्तस्याभितप्तस्य यशस्ते इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यरसोऽजायत ॥2 ॥
यजुर्वेद निर्दिष्ट यज्ञादि क्रियाओं से यश, शरीर का तेज और बल हैं तथा अन्नादि पदार्थ मिलते हैं । यजुःश्रुतियों ने यजुर्वेद को अभितप्त बढ़ताकिया है।; उसइन्द्रियाँअभितप्तनीरोगी बनतीसे यह सब होता है । यजुर्वेद
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तृतीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 171 तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्ल रूपम् ॥3 ॥
इति द्वितीयः खण्डः ॥ वह रस नीचे स्रवित होता है, सूर्य में ढलता है । सूर्य में जो श्वेत तेज दीखता है, वह वही रस है । ( यहाँ दूसरा खण्ड पूरा हुआ । ) तृतीयः खण्डः अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥1 ॥
सूर्य की पश्चिमी किरणें इस आदित्यरूप छत्ते के पश्चिम के छिद्र हैं, साममन्त्र ही मधुमक्खियाँ हैं, सामनिर्दिष्ट विधि ही पुष्प है और वही सोमादि अमृत है । तानि वा एतानि सामान्येत सामवेदमभ्यतपःस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यः रसोऽजायत ॥2 ॥
इन साममन्त्रों ने ही सामनिर्दिष्ट कर्मों को अभितप्त किया । उस अभितप्त कर्म से ही यश, फल ही सामवेद का शरीरकान्ति और बल बढ़ता है, इन्द्रियाँ नीरोगी होती हैं, अन्नादि मिलते हैं- ये सार हैं । तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्ण- रूपम् ॥3 ॥
इति तृतीयः खण्डः ॥ रूप उस रस ने विशिष्ट गति की । उसने आदित्य के पास आश्रय लिया । सूर्य का जो काला दीखता है, वही वह रस है । ( यहाँ तीसरा खण्ड पूरा हुआ । ) * चतुर्थः खण्डः अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवास्योदीच्यो मधुनाड्योऽथर्वाङ्गिरस एव ॥ मधुकृत इतिहासपुराणं पुष्पं ता अमृता आपः ॥1 हैं, इतिहास सूर्य की उत्तरी किरणें ही उत्तर के मधुछिद्र हैं, अथर्ववेदही अमृतके मन्त्रहै । ही मधुमक्खियाँ और पुराण ही पुष्प हैं और वेदमन्त्रों से दिया हुआ जल ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपुराणमभ्यतपस्तस्याभितप्तस्य॥2 ॥
यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यः रसोऽजायत । अभितप्त इतिहासपुराण से ही उन अथर्वणमन्त्रों ने इस इतिहासपुराण को। अभितप्त किया कीर्ति, प्रताप, बल, अन्नादिरूप रस उत्पन्न हुआ
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172 उपनिषत्सञ्चयनम् तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्णरू- पम् ॥3 ॥
इति चतुर्थः खण्डः ॥ ये यश आदि रस सूर्य से निकलकर सूर्य के चारों ओर फैल गए । सूर्य का जो काला रूप दीख पड़ता है, वही ये रस हैं । ( यहाँ चौथा खण्ड पूरा हुआ । ) * पञ्चमः खण्डः अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयस्ता एवास्योर्ध्वा मधुनाड्यो गुह्या एवादेशा मधुकृतो ब्रह्मैव पुष्पं ता अमृता आपः ॥1 ॥
जो सूर्य की ऊपर की किरणें हैं, वे ही मधु झरने के स्थान हैं । गूढ उपदेश मधुमक्खियाँ हैं, प्रणवब्रह्म पुष्प है, घृतादि हव्य पदार्थ अमृत है । ते वा एते गुह्या आदेशा एतद्ब्रह्माभितपस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यः रसोऽजायत ॥2 ॥
वे गूढोपदेश ही प्रणवसंज्ञक ब्रह्म का ध्यान करने लगे । ध्यान किए गए उस ब्रह्म से यश, देहकान्ति, इन्द्रियबल, शक्ति, अन्नादि फल मिला । यह फल ही अमृत रस है । तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ॥3 ॥
वे यश आदि रस सूर्य की किरणोंरूपी छिद्रों से निकलकर बहने लगे और सूर्य के चारों ओर फैल गए । सूर्य के बीच चमकता हुआ जो मधु दिखाई पड़ता है, वह ये रस ही हैं । ते वा एते रसाना रसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥4 ॥
इति पञ्चमः खण्डः ॥ सभी का सारतत्त्व ये सूर्य प्रभाएँ हैं, क्योंकि वेद सभी का सार है, और उन वेदों का भी प्रभाएँ सारतत्त्व हैं । ये सूर्यप्रभाएँ अमृतों के भी अमृत- सी हैं, क्योंकि वेद अमृत हैं, और येयेप्रभाएँसूर्य-उन वेदों का भी सार हैं । (यहाँ पाँचवाँ खण्ड पूरा हुआ।) * षष्ठः खण्डः तद्यत्प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥1 ॥ देवा अश्नन्ति
वास्तव में देवता खाते भी नहीं और पीते भी नहीं हैं, किन्तु इसअमृत को देखकर ही तृप्त
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तृतीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 173 हो जाते हैं । इस रीति से सूर्य की जो पहली लाल प्रभा है, उसी अमृतरूप प्रभा पर आठों वसु - देवताएँ,
अपने मुखरूप अग्निदेवता के साथ जीवननिर्वाह करती हैं ।
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥2 ॥
वे वसुदेवताएँ सूर्य की इसी लाल प्रभा को देखकर (भोगकर) उदासीन हो जाती हैं और उसी में लीन हो जाती हैं ( पड़े रहती हैं ) । (और फिर भोगसमय आने पर) उसी में से बाहर निकल आती हैं । स य एतदेवममृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाऽग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥3 ॥
जो साधक पूर्वोक्त प्रकार से इस अमृत की उपासना करता है, वसुओं में से कोई एक बन जाता हैं और अग्नि को अग्रसर करके अमृत को देखकर तृप्त हो जाता है और वह उसी सूर्यरूप को (लालरूप का) प्राप्त होता है अर्थात् उसमें मिल जाता है । फिर भोगसमय आनेपर उसमें से निकल आता है । स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता वसूनामेव तावदाधित्य स्वाराज्यं पर्येता ॥4 ॥
इति षष्ठः खण्डः ॥ ऐसा उपासक, सूर्य जहाँ तक पूर्व में उदय होता रहेगा और पश्चिम में अस्त होता रहेगा, वहाँ तक वसुदेवताओं का स्वामित्व और स्वर्गीय सुख भोगा करेगा । ( यहाँ छठा खण्ड पूरा हुआ । ) सप्तमः खण्डः अथ यद् द्वितीयममृतं तद्वृद्रा उपजीवन्तीन्द्रेण मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥1 ॥
बाद में सूर्य का दूसरा जो शुक्लरूप है, उस शुक्लरूप का रुद्रदेवताएँ इन्द्र को आगे कर पान करते हैं । वास्तव में देव न खाते हैं, न पीते हैं किन्तु अमृतरूप शुक्ल प्रभा को देखकर ही तृप्त हो जाते हैं! त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥2 ॥
वे रुद्रदेव इसी सूर्य के शुक्लरूप को भोगने के बाद उसी में मग्न हो जाते हैं और बाद में भोगेच्छा होने पर फिर उसमें से निकल आते हैं । स य एतदेवममृतं वेद रुद्राणामेवैको भूत्वेन्द्रेणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥3 ॥
जो उपासक सूर्य की श्वेतप्रभा रूप अमृत को जानता है, वह रुद्रों में से कोईऔर उसीएक रुद्रमें मग्नबन होकरजाता है और इन्द्रदेव को अग्रसर कर, उस प्रभामृत को देखकर ही तृप्त हो जाता है निकल आता है । पड़ा रहता है और भोग का समय आने पर फिर से
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174 उपनिषत्सञ्चयनम् स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता द्विस्तावद्दक्षिणत उदेतोत्तर- तोऽस्तमेता रुद्राणामेव तावदाधिपत्यः स्वाराज्यं पर्येता ॥4 ॥
इति सप्तमः खण्डः ॥ जितने काल तक सूर्य पूर्व में उदय होकर पश्चिम में अस्त हुआ करेगा, उससे दुगुने काल तक वह दक्षिण में आकर उत्तर में अस्त होगा । उतने काल तक वह उपासक स्वर्ग के राज्य को और रुद्रों के स्वामित्व को पाएगा । ( यहाँ सातवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) अष्टमः खण्डः अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ 1 ॥
आदित्य की तीसरी कृष्णप्रभा रूप अमृत वरुण को आगे करके आदित्य पान करते हैं । वास्तव में देवलोग तो खाते भी नहीं और पीते भी नहीं हैं । इस प्रभामृत को देखकर ही तृप्त हो जाते हैं । त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥2 ॥
वे इसी कृष्णरूप अमृत में मग्न होकर पड़े रहते हैं और भोग के अवसर पर फिर निकल आते हैं । स य एतदेवममृतं वेदादित्यानामेवैको भूत्वा वरुणेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥3 ॥
जो साधक इस कृष्णरूप को यथोक्त प्रकार से जानता है, वह आदित्यों में से एक बनकर वरुण को अग्रेसर रखकर इस अमृत को देखकर ही तृप्त हो जाता है, वह इसी रूप में मग्न हो जाता है, और भोग के समय इसी रूप से बाहर आता है । स यावदादित्यो दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता द्विस्तावत्पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेताऽऽदित्यानामेव तावदाधिपत्यः स्वाराज्यं पर्येता ॥4 ॥
इत्यष्टमः खण्डः ॥ जब तक सूर्य दक्षिण में उगकर उत्तर में अस्त हुआ करेगा, उससे दुगुने काल तक पश्चिम में उगकर पूर्व में अस्त हुआ करेगा । यह साधक इतने काल तक आदित्यों के स्वामित्व को और स्वर्ग- सुख भोगेगा । ( यहाँ आठवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) * नवमः खण्डः अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥1 ॥
आदित्य के चौथे अतिकृष्णरूप अमृत, सोम को अग्रेसर करके मरुतदेवताएँ पान करती हैं । देवतालोग न खाते हैं, न पीते हैं, वे लोग तो मात्र इस प्रभामृत को देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ।
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तृतीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 175 त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥2 ॥
वे देव इसी अमृत में ( अतिकृष्ण प्रभा में ) तल्लीन हो जाते हैं, फिर भोग के समय इसी से उदित हो जाते हैं । स य एतदेवममृतं वेद मरुतामेवैको भूत्वा सोमेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥3 ॥
जो साधक यथोक्त प्रकार से इस अमृत को जान लेता है, वह मरुतों में से एक बनकर सोम को अग्रेसर कर उस अमृत को देखकर ही तृप्त हो जाता है और इसी अमृत में लीन हो जाता है । फिर भोग का समय आने पर इसी से निकल आता है । स यावदादित्यः पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्तावदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधिपत्यः स्वाराज्यं पर्येता ॥4 ॥
इति नवमः खण्डः ॥ सूर्य पश्चिम में उदय होकर पूर्व में अस्त होगा, इससे दुगुने काल तक वह उत्तर में उगकर दक्षिण में अस्त होता रहेगा । वह साधक उतने काल तक मरुतों का आधिपत्य और स्वर्ग का सुख भोगेगा । ( यहाँ नौवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * दशमः खण्डः अथ यत्पञ्चमममृतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥1 ॥
जो सूर्यमण्डलस्थ तेजोरूप पाँचवाँ अमृत है, उसका साध्य लोग ब्रह्मा को अग्रेसर बनाकर पान करते हैं । यद्यपि ये साध्यलोग (देव ) खाते भी नहीं और पीते भी नहीं, पर उस अमृत को ही देखकर
तृप्त हो जाते हैं ।
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥2 ॥
वे साध्यजाति के देव इसी रूप में मग्न हो जाते हैं और समय आने पर उसी से फिर बाहर निकल आते हैं1. स य एतदेवममृतं वेद साध्यानामेवैको भूत्वा ब्रह्मणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥3 ॥
जो साधक यथोक्तरूप से उस अमृत को जान लेता है, वह साध्य जाति के देवों में से एक होकर ब्रह्मा को अग्रेसर बनाकर इस अमृत को देखकर तृप्त हो जाता है, इसी में भग्न हो जाता है,
और समय आने पर उसी से बाहर निकलता है ।
स यावदादित्य उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्वमुदेता-॥4 ॥
ऽर्वाङ्ङस्तमेता साध्यानामेव तावदाधिपत्यः स्वाराज्यं पर्येता इति दशमः खण्डः ॥ जब तक सूर्य उत्तर से उदय होकर दक्षिण में अस्त होगा उससे दुगुने समय तक ऊपर से उगकर
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176 उपनिषत्सञ्चयनम् नीचे की ओर अस्त होगा । उतने काल तक वह साधक साध्यजाति के देवों का आधिपत्य और स्वर्ग का सुख भोगेगा । ( यहाँ दसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) एकादश: खण्ड: अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता । तदेष
श्लोकः ॥1 ॥
तदनन्तर इस उच्च स्थिति में उदित होकर सूर्य कहीं और उदय नहीं होता और अस्त भी नहीं होता । मध्य में वह अकेला ही अपने आप में स्थित रहता है । यहाँ यह श्लोक है— न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन । देवास्तेनाहः सत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥2 ॥
उस ब्रह्मलोक में सचमुच ऐसा नहीं होता । वहाँ सूर्य कभी उदय नहीं होता और अस्त भी नहीं होता । हे देवलोग! यह सत्य सुनो । इस सत्य से मैं कभी ब्रह्म से विरुद्ध न होऊँ अर्थात् पतित न होऊँ । न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥3 ॥
ब्रह्मज्ञ उपासक के लिए सूर्य का उदय या अस्त नहीं होता । उसके लिए तो सूर्य सदा एक समान प्रकाशमान रहता है । यहाँ तक कि वह स्वयं प्रकाशवान हो जाता है । तद्वैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्वैतदुद्दा- लकायारुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥4 ॥
यह मधुविद्या ब्रह्मा ने प्रजापति से कही । प्रजापति ने मनु से कही । मनु ने प्रजाओं से कही । वही यह मधुविद्या अपने बड़े पुत्र उद्दालक आरुणि को उसके पिता ने कही थी । इदं वाव तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात्प्राणाय्याय वान्ते- वासिने ॥5 ॥
यह पूर्वोक्त प्रसिद्ध ब्रह्मविद्या पिता को अपने बड़े पुत्र या विनयी अन्तेवासी को कहनी चाहिए | नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥6 ॥
इत्येकादशः खण्डः ॥ यह ब्रह्मविद्या और किसी से भी नहीं कहनी चाहिए, चाहे वह धन से परिपूर्ण फैला हुआ राज्य भी इस ब्रह्मविद्या के बदले में क्यों न दे दे । क्योंकि यह ब्रह्मविद्या ऐसेऔरविशालसमुद्र राज्यतक से भी श्रेष्ठ है, श्रेष्ठ है । ( यहाँ ग्यारहवाँ खण्ड पूरा हुआ ।)
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177तृतीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) द्वादश: खण्ड: गायत्री वा इदः सर्वं भूतं यदिदं किंच वाग्वै गायत्री वाग्वा इदः सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥1 ॥
यह सब जो स्थावर- जंगम रूप जगत् है, वह गायत्री ही है । शब्दमात्र गायत्री ही है और यह स्थावर- जंगमरूप जगत् वाणी (वाक् ) ही है क्योंकि वाक् ही सर्व जीवों का निर्देश करती है और रक्षा करती है । या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यस्याः ही सर्वं भूतं प्रतिष्ठित- मेतामेव नातिशीयते ॥ 2 ॥
गायत्री पृथ्वीरूप है और पृथ्वी गायत्रीरूप है । जिस तरह पृथ्वी में सब कुछ (प्राणी मात्र ) रहता है, वैसे ही गायत्री में भी सारा जगत् रहता है, जगत् गायत्रीरूपी पृथ्वी से अलग अस्तित्व नहीं रखता । या वै सा पृथिवी यं वाव सा यदिदमस्मिन्पुरुषे शरीरमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ॥3 ॥
जो पृथ्वीरूप गायत्री है, वही शरीररूप गायत्री है क्योंकि जैसे पृथ्वी में सारा जगत् व्यांप्त है, उसी प्रकार इस पुरुषशरीर में भी सारा जगत् व्याप्त है, क्योंकि इसी पुरुषशरीर में ये पाँचों प्राण रहते हैं । ( अर्थात् जिस तरह गायत्री में सब जीव रहते हैं उसी प्रकार शरीर में भी पाँच प्राणों से युक्त हुआ जीव रहता है । जैसे पृथ्वी गायत्रीरूप है, वैसे शरीर भी गायत्रीरूप है । जैसे पृथ्वी में सब जीव रहते हैं, वैसे ही शरीर में प्राण सब रहते हैं ) । यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तःपुरुषे हृदयमस्मिन्हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ॥4 ॥
पुरुष का जो शरीर है वही गायत्री है और जो अन्त: पुरुष में हृदय- कमल है वह भी गायत्री है ।
क्योंकि इस हृदयकमल में प्राण रहते है, वे उसका अतिक्रमण नहीं करते ।
सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतदृचाऽभ्यनूक्तम् ॥5 ॥
यही वह गायत्री चार चरणों वाली और छः प्रकार की है । यह गायत्र्याख्य ब्रह्म मन्त्र से प्रकाशित किया गया है । तावानस्य महिमा ततो ज्यायाश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं नित्रीति ॥6 ॥
यह समस्त जगत् ब्रह्म का एक चरण है । यों तो सब गायत्रीरूपजो प्रकाशितही है, फिरबुद्धिभीमेंइसरहताजगत्है, से परे ब्रह्म के जो तीन चरण शेष रहते हैं, वह अविनाशी ब्रह्मपुरुष वह तो गायत्री से भी श्रेष्ठ है । यद्वै तद्ब्रह्मेतीदं वाव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशो यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाशः ॥7 ॥
आकाश है और जो बाहर वह त्रिपाद् अमृतरूप अर्थात् गायत्रीरूप ब्रह्म ही इस पुरुष के बाहर का का आकाश है वही गायत्रीरूप ब्रह्म है । 12 उ ०प्र०
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178 उपनिषत्सञ्चयनम् अयं वाव स योऽयमन्तः पुरुष आकाशो यो वै सोऽन्तः पुरुष आकाशः ॥ 8 ॥
वह गायत्रीरूप ब्रह्म ही इस पुरुष के भीतर रहा हुआ आकाश है और भीतर का आकाश ही गायत्रीरूप ब्रह्म है । अयं वाव सोऽयमन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत्पूर्णमप्रवर्ति पूर्णमप्रवर्तिनी’ श्रियं लभते य एवं वेद ॥9 ॥
इति द्वादशः खण्डः ॥ हृदय के भीतर जो आकाश हैवह तो पूर्ण आत्मा ही है । वह सर्वव्यापक है, उसका कभी नाश नहीं होता । जो साधक इस तरह आत्मा की पूजा करता है, उसको पूर्णतया लक्ष्मी प्राप्त होती है । ( यहाँ बारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * त्रयोदशः खण्डः तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः स योऽस्य प्राङ्सुषिः स प्राणस्तच्चक्षुः स आदित्यस्तदेतत्तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥1 ॥
इस हृदयकमल के पाँच दरवाजे हैं । जो पूर्व का दरवाजा है वह प्राण है, वह आँख से सम्बद्ध है । आँख के देव सूर्य हैं । उस प्राण को तेजस्वी और अन्नभोक्ता मानकर पूजना चाहिए । जो ऐसी उपासना करता है, वह तेजस्वी होता है और अन्न पचाने की शक्तिवाला होता है । अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रः स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत श्रीमान्यशस्वी भवति य एवं वेद ॥2 ॥
इसका जो दक्षिणी दरवाजा है वह व्यान है, वह श्रोत्र से सम्बन्ध रखता है, उसके देव चन्द्रमा हैं । ‘ वह व्यान श्रीरूप और यशोरूप है' – ऐसा मानकर उपासना करनी चाहिए । ऐसी उपासना करनेवाला श्रीमान और यशस्वी होता है । अथ योऽस्य प्रत्यङ्सुषिः सोऽपानः सा वाक् सोऽग्निस्तदेतद्ब्रह्मवर्चस- मन्नाद्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥3 ॥
हृदयकमल का जो पश्चिमी दरवाजा है वह अपान है, वही वाणी है, वही अग्नि है, वही ब्रह्मतेज है, वही बल है, ऐसा जानकर यथोक्त उपासना करनेवाला ब्रह्मतेज से युक्त और भोजन पचाने की क्षमतावाला होता है । अथ योऽस्योदङ्सुषिः स समानस्तन्मनः स पर्जन्यस्तदेतत्कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत कीर्तिमान् व्युष्टिमान् भवति य एवं वेद ॥4 ॥
हृदयकमल का जो उत्तरी दरवाजा है वह समान है, उसका मन के देव पर्जन्य है । उस समान को कीर्ति और प्रकाश से युक्त मानकर जो साधकसाथ सम्बन्ध है, उसका,कीर्तिमान और प्रकाशवान होता है । उपासना करता है वह