Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 31–40

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 31–40

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(29 ) विशिष्टताएँ रखते हुए पाते हैं, पर सम्पूर्ण उपनिषत्साहित्य में सर्वोत्तम और सार्वत्रिक चिन्तन प्रदान करने का श्रेय तो याज्ञवल्क्य ऋषि को ही जाता है । उनका योगदान इतना महत्त्वपूर्ण है कि आज भी विश्व के तत्त्व-चिन्तकों के लिए भी उसका स्मरण रखना अनिवार्य है! महामुनि याज्ञवल्क्य के विषय में यहाँ कुछ विशेष प्रकाश डालना अनुचित नहीं होगा । याज्ञवल्क्य के सन्दर्भ में ज्ञातव्य मिथिला प्रदेश का देवरात नामक ब्राह्मण बड़ा ही अन्नदान करनेवाला था, इसलिए वह ' वाजसनि' ( बहुत अत्र देनेवाला) के नाम से विख्यात हुआ । अनेक यज्ञ करने के बाद उसे एक पुत्र हुआ इसलिए उसका नाम 'याज्ञवल्क्य' रखा गया । उपवीत के बाद याज्ञवल्क्य ने वाष्कल से ऋग्वेद सीखा, यजुर्वेद अपने मामा वैशम्पायन से, सामवेद जैमिनि से और अथर्ववेद आरुणि से सीखा । याज्ञवल्क्य बचपन से ही निर्भय और स्पष्टवक्ता थे । उन्होंने अपने मामा और गुरु वैशम्पायन के हाथ से अनजाने में हुई हिंसा का प्रायश्चित्त-विधान निर्भयता पूर्वक सम्पन्न किया । जिससे गुरु ने क्रुद्ध होकर उन्हें अध्ययन से निकाल दिया । बाद में उन्होंने हिमालय में सूर्योपासना की । उसके प्रभाव से उन्होंने यजुर्वेद की स्वतंत्र शाखा की स्थापना की । वही शाखा यजुर्वेद की वाजसनेयि शाखा है । इस शाखा में मंत्र - भाग और ब्राह्मण - भाग अलग- अलग होने से उसे शुक्लयजुर्वेद कहा गया और प्राचीन यजुर्वेद में दोनों मिश्रित होने से उसे ' कृष्णयजुर्वेद' कहा गया । जैसे तीतर पक्षी के पंख मिश्रित होते हैं, वैसे ही यहाँ दोनों का मिश्रिण होने से इस शाखा का नाम तैत्तिरीय पड़ा - ऐसा कहा जाता है । बाकी तीतर पक्षीवाली बात तो केवल अतिशयोक्ति ही है । याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ (मैत्रेयी और कात्यायनी) थीं । मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी और कात्यायनी व्यवहारकुशल । याज्ञवल्क्य प्रणीत शुक्लयजुर्वेद से ही बृहदारण्यकोपनिषद् सम्बद्ध है । इस उपनिषद् जैसी गंभीर दूसरी कोई भी उपनिषद् नहीं है । याज्ञवल्क्य वेद के ब्राह्मण- ग्रन्थ के निर्माता, याज्ञवल्क्यशिक्षा, प्रतिसूत्र, योगसूत्र (अलभ्य), याज्ञवल्क्यस्मृति आदि ग्रन्थों के प्रणेता परम्परा से माने गए हैं । इसकी प्रमाणभूतता के आगे अभी प्रश्नार्थ ही है । ये याज्ञवल्क्य जनक से सम्बद्ध होने से राम के समकालीन माने जाते थे । परन्तु रा.बा.पी.बी. जोशी का मत है कि वे युधिष्ठिर के समकालीन थे । वे कहते हैं कि धर्मसूत्रकार मनु वसिष्ठ के बाद हुए । क्योंकि वसिष्ठ के धर्मसूत्रों से मनु ने अवतरण लिए हैं । याज्ञवल्क्य मनु के बाद हुए । युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में याज्ञवल्क्य अध्वर्यु थे । याज्ञवल्क्य से सम्बद्ध जनक सीता के पिता नहीं अपितु वे दूसरे थे । जोशीजी ने अन्य कई प्रमाण दिए हैं पर यहाँ वह अप्रासंगिक होने से नहीं दिए जा रहे हैं1 कुछ भी हो, उपनिषदों में याज्ञवल्क्य का योगदान अद्भुत ही है । उपनिषदों में से, विशेषकर बृहदारण्यक उपनिषद् से याज्ञवल्क्य के स्वतंत्र विचार आसानी से चुने जा सकते हैं, क्योंकि ये विचार बृहदारण्यक उपनिषद् में उन्होंने अपनी वाणी से स्वयं कहे हैं । याज्ञवल्क्य से पहले तो जगत् के कारण- सम्बन्धी निर्णय या तो अधिभूत दृष्टि से या अधिदैव दृष्टि से ही किए गए थे इसलिए ब्रह्मतत्त्व को या तो जगत् के कारण के रूप में, अथवा विश्व के नियन्ता ईश्वर के रूप में निरूपित किया जाता था । परन्तु 'वह विश्वकारण और विश्वनियंता भी सबका

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( 30 ) आत्मा ही है, और कोई पृथक् पदार्थ नहीं है ' – ऐसा स्वतंत्र निश्चय तर्क के द्वारा जैसा याज्ञवल्क्य ने किया है, वैसा निश्चय उपनिषदों के किसी भी ऋषि ने नहीं किया । आइए याज्ञवल्क्य की ही कुछ वाणी सुन लें- "यह लोकप्रसिद्ध आत्मा ही ब्रह्म है । वह आत्मा विज्ञान की उपाधि से 'विज्ञानमय', मन की उपाधि से ‘ मनोमय', चक्षु की उपाधि से 'चक्षुष्मय', श्रोत्र की उपाधि से 'श्रोत्रमय', पृथ्वी की उपाधि से ‘ पृथ्वीमय', जल की उपाधि से 'जलमय', वायु की उपाधि से ' वायुमय', तेज की उपाधि से 'तेजोमय', आकाश की उपाधि से ' आकाशमय', काम की उपाधि से 'काममय', वैराग्य की उपाधि से ' अकाममय', क्रोध की उपाधि से 'क्रोधमय', शान्ति की उपाधि से ' शान्त', धर्म की उपाधि से ' धर्ममय', अधर्म की उपाधि से ‘ अधर्ममय' - संक्षेप में जिस- जिस उपाधि से वह जुड़ा हुआ होता है, उस - उस उपाधिमय वह देखा जाता है । आत्मा स्वेच्छाचारी है और वही आत्मा सदाचारी भी है । वही एक आत्मा पापकर्मों से पापी काम या संकल्प होता है और, वैसापुण्यकर्मोंही उसकासे पुण्यवानआत्मा होतामानाहैजाता। है जैसे। विद्वान्उसकेकहतेकर्महैं वैसीकि जैसाउसकीजिसकागति होती है । वह कर्मसंस्कारानुसार फल भोगता है । कर्मफल क्षीण होते ही वह मर्त्यलोक में लौट आता है । …………. जिसकी कामना आत्मा के सिवा किसी अन्य पदार्थ में नहीं है वह 'आप्तकाम आप्तकाम लोकान्तर में रति नहीं करता इसी लोक में वह ब्रह्मरूप हो जाता है ।" आदि-हैआदि। ' ' ' ' '। याज्ञवल्क्य के मतानुसार कामनावाला पुरुष ही संसारी जीव है और कामनारहित असंसारी और वही मुक्तब्रह्म है । याज्ञवल्क्य इस विशुद्ध असंसारी ब्रह्मात्मा को स्वतः आनन्दस्वरूप मानते हैं । उसी के सम्बन्ध से स्त्री, पुत्र, शरीर आदि प्रिय लगते हैं । 'आत्मा स्वतः प्रियरूप है'-हैं' - यह निश्चय ही बड़े महत्त्व का है, और यह याज्ञवल्क्य का ही अपना मौलिक निश्चय है । यह ज्ञान उन्होंने अपनी पत्नी मैत्रेयी को दिया । आत्मा की स्वयंज्योतिर्मयता और विज्ञानघनता का निर्णय भी याज्ञवल्क्य का अपना मौलिक ही I संक्षेप में— ( 1 ) जगत्कारण और जगन्नियन्ता ब्रह्म और कुछ नहीं, अपनी आत्मा ही है । ( 2 ) वही आत्मा स्वतः आनन्दरूप है और ( 3 ) वही विज्ञानघन और स्वप्रकाश है— याज्ञवल्क्य के ये विचार ही उपनिषदों को प्रदत्त है । उपनिषदों में व्यावहारिक जीवन के मूल्य उपनिषदों का चरम लक्ष्य जीव के साथ ब्रह्म का ऐक्य तादात्म्य ही है, अद्वैत ही है; फिर भी द्वैतमूलक व्यावहारिक सत्ता का उपनिषदों ने कभी निरादर नहीं किया अपितु द्वैतमूलक जगत् की सापेक्ष सत्ता को उपनिषदों ने सर्वदा स्वीकार किया है । जगत् की सत्ता सापेक्ष है, परिवर्तनशील है - बस इतना ही उन्होंने बताया है । साधारणतया सर्वानुभूत द्वैत में से अद्वैत की ओर जाने के लिए भी पहले द्वैतमूलक उपासनाओं (विद्याओं) का अनुष्ठान करना पड़ता है । और उन्हीं की सफलता के लिए प्रथम सोपान जीवन के कुछ व्यावहारिक मूल्य हैं । उनके आचरण के बिना आगे उन्नति नहीं की जा सकती । उपनिषदों में ऐसे मूल्य ज्यादातर आनुषंगिक रूप में हैं । ईश्वर की ओर सहज मनोगति बताते हुए उपनिषद् कहती है— “हे प्रभु, मैं शुद्ध होऊँ । ” “जैसे पक्षी शाम को अपने नीड़ की ओर जाते

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( 31 ) हैं, वैसे मैं तुम्हारे पास आऊँ ”, “मैं तुझमें प्रविष्ट हो जाऊँ”, आदि वाक्य तथा उपनिषदों के विविध शान्तिपाठों के सभी मन्त्र ऐसे जीवनमूल्यों को स्पष्ट रूप से बताते हैं । परा- अपरा विद्या, संभूति- विनाश की उभयोपासना, अभ्युदय और निःश्रेयस्-- दोनों का स्वीकार इत्यादि के द्वारा द्वैत का स्वीकार भी सप्रयोजन रूप से किया गया है । द्वैत- अद्वैत कोई अन्धकार- प्रकाश जैसे प्रतियोगी शब्द नहीं हैं । यदि ऐसा होता तो जहाँ जगत् है वहाँ ब्रह्म नहीं होता और जहाँ ब्रह्म है वहाँ जगत् नहीं होता; यदि ऐसा मान लें तो भी ब्रह्म की सर्वव्यापकता बाधित होती । इस समस्या के निवारण के लिए ही तो कठोपनिषद् में 'ऊर्ध्वमूल' और ' अवाक्शाख' अश्वत्थ को जगत् का रूप दिया गया है । उपनिषदों में बताई गई सभी विद्याएँ-उपासनाएँ भी द्वैतमूलक ही हैं, अन्यथा वे व्यर्थ ही हो जातीं । हमारे उपनिषदों के चिन्तक यह मानते आए हैं कि जिन सत्यों का हमें आन्तरिक अनुभव होता हो, उनकी छाया (उनका प्रतिफलन ), उनकी अभिव्यक्ति किसी - न- किसी प्रकार से हमारे व्यावहारिक जीवन में होनी ही चाहिए । अन्यथा कोरा तत्त्वज्ञान या केवल आन्तरिक अनुभव का कोई मूल्य नहीं है । इसलिए आदर्श पुरुष का आचार उन औपनिषदिक अनुभूतिलब्ध सत्य की नींव पर ही खड़ा है । बृहदारण्यकोपनिषद् (5.3.1-3 ) में प्रजापति के माध्यम से देव, दानव और मनुष्यों को दिए गए उपदेश की आख्यायिका के द्वारा आत्मसंयम, दया और दान के जीवनमूल्यों का निर्देश किया गया है तो छान्दोग्योपनिषद् ( 3.17.4 ) में तपस्या, दान, आर्जव, अहिंसा, सत्यवचन आदि को गुरु आध्यात्मिक उन्नति का साधन बताया गया है । तैत्तिरीय उपनिषद् ( 1.2.1-3 ) में स्नातक को ने समावर्तन के समय पर बड़ी ही मूल्यवान शिक्षाएँ दी हैं । यहाँ माता-पिता- गुरु के प्रति सम्मान और सेवाभाव की शिक्षा दी गई है । इनमें स्वाध्याय और धर्मपरायणता का बड़ा महत्त्व है । किसी भी काल में ये सभी शिक्षाएँ प्रस्तुत ही हैं, वे स्थायी हैं और वैश्विक भी । परन्तु इन सीखों में भी ‘ सत्यं वद’ की शिक्षा सिरमौर है । छान्दोग्य (4.4.1-5 ) की जाबाल- सत्यकाम की कथा में और प्रश्नोपनिषद् की अनृतभाषण की निन्दा में तथा मुण्डकोपनिषद् में भी सत्यवचन के जीवनमूल्य को शीर्षस्थ माना गया है । बृहदारण्यकोपनिषद् ( 4.4.23 ) में शम, दम, उपरति, तितिक्षा तथा समाधान की भी जीवन- मूल्यों में गणना की गई है लेकिन वे ज्यादातर आध्यात्मिक साधक के लिए उपयोगी हैं और सामान्य व्यवहार में भी विवेकबुद्धि से उन मूल्यों का विनियोग करना चाहिए । ज्ञानसाधकों के लिए विवेक- वैराग्य के जीवन- मूल्य विशेष रूप में बतलाए गए हैं । उपनिषदों का तर्कपूत और बुद्धिगम्य आकर्षक सिद्धान्त ' कर्मस्वातन्त्र्य' है । उपनिषदें कहती हैं कि हम ही अपने जीवन के निर्माता हैं । यह सिद्धान्त ही मनुष्य को मानवीय मूल्यों की ओर मूल्यलक्षी जीवन जीने की ओर अग्रसर कर देता है । बृहदारण्यकोपनिषद् ने स्पष्ट ही कह दिया है । कि— “ यह पुरुष काममय है । जैसी उसकी इच्छा होती है, वैसा उसका क्रतु ( संकल्प ) होता है, और जैसा संकल्प होता है, वैसा उसका कर्म होता है, और जैसा कर्म होता है, वैसा वह स्वयं होता है । " कौषीतकि ब्राह्मणोनिषद् ( 3.9 ) में किए गए स्वातंत्र्य निषेध छान्दोग्य में पुनः दिए हुए कर्म- स्वातन्त्र्य के आगे उपेक्षणीय ही मानना चाहिए । यहाँ मुक्तिकोपनिषद् का यह विधान आकर्षक है, चाहे वह बाद की ही कृति क्यों, न हो— शुभाशुभाभ्यां मार्गाभ्यां वहन्ती वासनासरित् । पौरुषेण प्रयत्नेन योजनीया शुभे पथि । अशुभेषु समाविष्टं शुभेष्वेवावतारयेत् ॥ ( 2.5-6 )

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( 32 ) अर्थात् “वासंनारूपी नदी शुभ और अशुभ– ऐसे दो मार्गों में बह रही है । मनुष्य को अपने प्रयत्न द्वारा अशुभ में लगी वासना को शुभ की ओर ले जाना चाहिए । " कर्म- निष्पादन में आत्मस्वातंत्र्य का प्रतिपादन ही उपनिषद् के मानवीय जीवन का सारतत्त्व है । इससे कोरे दैववाद का उपनिषदों ने जोरदार खण्डन किया है । ऊपर बताए गए जीवनमूल्य तो उपनिषदों के अन्तः साक्ष्य से स्पष्ट रूप से ही हम पा सकते हैं । परन्तु कुछ गर्भित जीवन- मूल्य भी हम उपनिषदों से पा सकते हैं । वे मूल्य कथा, प्रसंग, संवाद आदि से सूचित किए गए हैं तो उनकी ओर भी हम एक नजर डाल लें— ऐसे मूल्यों में एक महत्त्वपूर्ण मूल्य भेद की दीवारों को तोड़ने का है । सत्यकाम जाबाल को गौतम ने विद्यार्थी के रूप में स्वीकार किया, तब उन्होंने न उसका वंश देखा, न गोत्र देखा पर केवल सच्चाईपूर्ण चारित्र्य ही देखा । वंशीयता, जातिभेद और ज्ञातिवाद से छिन्न-भिन्न समाज को इससे यह चुनौती मिलती है कि वह मनुष्य का मूल्य गीता के अनुसार उसके गुण और कर्म से ही आँके और जातिपाति के सामाजिक भेदों को तोड़ दे । वंशीयता के बदले गुण- कर्म देखे । संकुचितता छोड़कर, प्रेम, सहकार, सहानुभूति रखे । दूसरे एक जीवनमूल्य की सूचना भी हम उसी कहानी से पाते हैं । गौतम ने सत्यकाम को गायें लेकर वन में भेजा, तब सत्यकाम ने ही जहाँ तक गायों की संख्या अधिक न हो जाय, वहाँ तक वनों में घूमने का निश्चय किया । तो सत्यकाम ने वन में रहकर क्या किया? उसने प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित किया, वह प्रकृति के पशु-पक्षियों के मनोभाव और भाषा तक समझने लगा और प्रकृति के तत्त्वों ने ही उसे ज्ञान दिया । आज के प्रकृति- विमुख, नगर- संस्कृति वाले, हिंसक और केवल स्वकेन्द्री मनुष्यों के लिए प्रकृति- प्रेम, ग्राम- संस्कृति की निर्दोषता और निर्देशता, अहिंसा, प्राणी प्रेम, और परोपकार की शिक्षा इस कथा में वर्णित की गई है । सबको अपने- सा मानना इसका मूल्यबोध है । ईशावास्योपनिषद् के दूसरे ही मंत्र में दो जीवनमूल्यों का निर्देश है । एक है— ' जिजीविषेच्छतं समाः ' अर्थात् सौ साल तक जीने की इच्छा करनी चाहिए । यह सूचित करता है कि मनुष्य को अपने जीवन के प्रति पूरा आदर होना चाहिए । इसमें स्वजीवन के आदर के साथ परजीवन के प्रति आदर भी उपलक्षित है । अपने और दूसरे के जीवन को कर्मठतापूर्ण और सुखी बनाने का संकेत इससे मिलता है । आत्महत्या और परहत्या की गर्हणीयता इससे सूचित होती है । उसी उपनिषद् के पहले मंत्र में ' तेन त्यक्तेन भुंजीथा ' में त्याग का जीवनमूल्य बताया गया है । अन्य की भलाई के लिए त्याग करने में भी एक विशेष प्रकार का आनंद है, तुष्टि है छोटे- से किए गए त्याग का कल्याणकारी फल मिलता है । अन्य के लिए किए जाने वाले त्याग में ‘ आत्मैक्य' की लाभकारी छाया पड़ती है । आत्मब्रह्मात्मैक्य का व्यावहारिक जीवन में वह प्रतिफलन है । उपनिषद् कहती है — ‘ एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ।' सत्तत्त्व के ज्ञान के अनेक मार्ग हैं, उनमें से किसी एक का पूर्वाग्रह रखना मनुष्य की अपूर्णता और अदूरदृष्टि का ही परिणाम है । पूर्वाग्रहों को छोड़कर सर्वधर्म- स्वीकार या सर्वधर्म समभाव का जीवनमूल्य इस वाक्य से सूचित होता है । हमारे उपनिषदों के द्रष्टाओं ने सत्य की खोज के लिए अपने जीवन तक की परवाह नहीं की उपनिषदों में आत्मज्ञानी का मुख्य स्वरूप ' अभय' बताया गया है— ' अभयं वै जनकं प्राप्तोऽसि' आदि।

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( 33 ) वाक्य मानवजीवन में अभय के मूल्य को दर्शाते हैं । स्वामी विवेकानन्द को सबसे उत्कृष्ट जीवनमूल्य यह ‘ अभय’ उपनिषदों में दृष्टिगोचर हुआ । उपनिषदों में उपासनाओं में प्राकृतिक जड़ दीखने वाले तत्त्वों में दैवी आरोपण करने के लिए कहा गया है, तो हम जीते -जागते -हिलते डुलते हमारे ही जैसे चेतन मनुष्य में भला देव का ( ईश्वर का ) दर्शन क्यों न करें? सर्वव्यापक ईश्वर मनुष्य में तो प्रायः प्रकाशित ही है । इसलिए प्रत्येक मानव में, प्रत्येक प्राणी में ईश्वर को देखने का प्रयत्न करना भी तो एक मानवीय मूल्य ही है । उपनिषदों में बाद के दर्शनों के बीज भारत में जो तत्त्वज्ञान का विकास हुआ है इसमें छ: आस्तिक दर्शनों के बीज तो उपनिषदों में पड़े ही हैं । नास्तिक माने जाने वाले जैन और बौद्ध दर्शनों में भी उपनिषदों का स्पष्ट प्रभाव मालूम होता है, क्योंकि उपनिषदों की तरह ही सभी भारतीय दर्शनों का केन्द्रबिन्दु धर्म है, सभी दर्शन जीवनलक्षी हैं, सभी दर्शनों का चरमलक्ष्य आत्यन्तिक मुक्ति है, युक्ति के साथ अनुभूति की प्रामाणिकता, आत्मानुसन्धान, साधनामार्ग और संयम, त्याग आदि हैं । फिर इनके लिए बाद में जन्मे दृष्टिकोण की विषमता के कारण ही अन्यान्य दर्शनों का स्वाभाविक रूप से ही निर्माण हुआ है । क्योंकि परिवर्तनशीलता और गत्यात्मकता जगत् का सहज धर्म है । वेदान्त ( उत्तरमीमांसा) की तो उपनिषदें प्राण ही हैं— ' वेदान्तो नाम उपनिषत्प्रमाणं तदुपकारीणि शारीरकसूत्रादीनि च' ( वेदान्तसार ) । वेदान्त के प्रस्थानत्रय में प्रथम स्थान उपनिषदों का ही है | वेदान्त की सभी द्वैताद्वैत शाखाओं ने उपनिषदों का प्रधान प्रामाण्य स्वीकार किया है । सांख्य और योगदर्शन के बीज भी उपनिषदों में पाये जाते हैं । सांख्यदर्शन द्वैतमूलक है । उसमें पुरुष और प्रकृति —— ये दो तत्त्व मूल माने गए हैं । इनमें प्रकृति समग्र सृष्टि का मूल कारण है । (उत्पत्तिस्थान है ) और पुरुष मूलत: अकर्ता - साक्षी ही है । सांख्य पुरुषों का अनेकत्व भी मानता है । उपनिषदें पुरुष का अनेकत्व नहीं मानतीं किन्तु विश्व में नींवरूप चैतन्यतत्त्व जो उपनिषदों में है, वही सांख्य में पुरुष का स्वरूप है, इसमें तो कोई विवाद नहीं है । उपनिषदों में चैतन्य तत्त्व एक ही है । संभव है कि एकेश्वरवाद या सेश्वरवाद में उपनिषदों के बाद के चिन्तकों ने ऐसा गर्भित विचार खोज लिया हो कि परमात्मा से जीवात्मा का अस्तित्व अलग है । इस विचार से जीवों का अनेकत्व परिणत हो गया हो । परन्तु एक 'सर्वेश्वर' का मूलस्रोत तो उपनिषदें ही हैं । सांख्यदर्शन यदि भारतीय तत्त्वज्ञान का पिता समझा जाए तो उपनिषदों को भारतीय तत्त्वज्ञान का पितामह माना जाना चाहिए । सांख्यदर्शन अपने ढंग से विकसित हुआ । फिर भी सांख्य दार्शनिक इतना तो समझते ही थे कि परमात्मा और जीवात्मा के अलग अस्तित्व और स्वातंत्र्य को किसी तर्क की कसौटी पर सिद्ध करना अत्यन्त कठिन है । दोनों में से कोई एक तत्त्व अन्य की उपेक्षा कर सकता है । चैतन्य तत्त्व के दो स्वरूप - दो लक्षण तो तर्कपूत नहीं कहे जा सकते । इसलिए दो रूपों में से अर्थात् जीव और ईश्वर में से या तो जीव को निकाल दीजिए या तो ईश्वर को निकाल दीजिए । जब सांख्यदर्शन होने प्रकृतिगया । को ही जगत् का उपादानकारण माना । तब उनकी दृष्टि में ईश्वर निरर्थक और निरुपयोगी इस विचार में ईश्वरविहीन अकेली जड़ प्रकृति को ही सर्जन के सभी कार्य सौंप दिए गए । यह बात। उपनिषदों की विचार- परम्परा से मेल नहीं खाती है । उपनिषदों ने इस बात का घोर विरोध किया 3 उ० भू०

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( 34 ) उपनिषदों की यह स्पष्ट उद्घोषणा है कि 'एकमेवाद्वितीयम्' अर्थात् ब्रह्म एक और अद्वितीय है । उपनिषदें इसी अद्वैत की धरती पर ज्ञाता ज्ञेय या द्रष्टा- दृश्य की मायिक लीला की उत्पत्ति मानती हैं । यहाँ दो तत्त्व हैं ही नहीं । ऐतरेय ( 1.1.2 ), बृहदारण्यक ( 1.4.3 ), छान्दोग्य ( 6.2.6 ), तैत्तिरीय ( 2.1 ) आदि उपनिषदें ढोल पीटकर यह बात कह रही हैं । बाद के विज्ञानभिक्षु आदि ने सांख्यदर्शन के सूत्र 'ईश्वरासिद्धेः ' की व्याख्या करते समय ईश्वर को तर्कातीत अस्तित्ववाला माना है, वह तो एक अलग ही बात है; परन्तु एक तरह से उपनिषदों के बताए हुए ईश्वर के सर्वनियंतृत्व को उनकी स्वीकृति समझा जाए तो वह अनुचित नहीं होगा । सांख्यदर्शन की तरह उपनिषदों में योगदर्शन के बीज भी खोजे जा सकते हैं । उपनिषदों के द्रष्टा ऋषि- मुनियों को यह अच्छी तरह मालूम था कि हमारी अपूर्ण - एकांगी या धुँधली - सी समझदारी से किसी भी तरह सत् तत्त्व का सम्यक् दर्शन संभव नहीं हो सकता । इसीलिए उन्होंने मनुष्य के मन की दर्पण के साथ तुलना की है । मनुष्य के मन में 'सत्' तत्त्व का प्रतिबिम्ब पड़ता है । जिस प्रमाण में हमारा मन शुद्ध होगा उसी प्रमाण में उसमें सत् का प्रतिबिम्ब शुद्ध स्वच्छ -चमकीला- स्पष्ट पड़ेगा । और उस प्रतिबिंब के प्रमाण में ही हमें 'सत्' तत्त्व का ज्ञान होगा । जैसे अन्धा रंग नहीं देखता, बहरा संगीत नहीं सुन सकता, उसी तरह निर्बल ( अस्वच्छ ) मन वाला मनुष्य सत्य नहीं देख सकता । इसलिए मन को स्वच्छ अर्थात् रागद्वेष आदि मलिनताओं से दूर अज्ञानरहित बनाना पड़ता है । इस मन को पूर्वोक्त प्रकार से राग-द्वेषरहित कैसे किया जाए । इसकी पूरी प्रक्रिया योगदर्शन में निहित है । अपूर्ण, विकृत, स्वार्थी, भ्रान्त, मलिन मन को परिष्कृत, स्वच्छ, अविकारी, ज्ञानी बनाने के लिए साधना का अत्यन्त महत्त्व है । साधना में तिलभर की कमी भी सम्यग्दर्शन नहीं होने देती । मन के सभी अहंकारजन्य दोषों को संपूर्ण रूप से धो डालना ही साधना का कार्य है । इस साधना के द्वारा ही हम अतन्द्रित निर्मलत्व की एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाते हैं कि जहाँ से जगत् की प्रतिभासम्पन्न विभूतियाँ दूर- दूर तक देखती रहती हैं । योगदर्शन की यह बात उपनिषदों के आत्मविषयक सिद्धान्त से ठीक मेल खाती है । हमारी चेतना शाश्वत सत् से विमुख होकर इन्द्रियजन्य नश्वर जगत् में भटकती हुई जीवभावापन्न हो गई है । जीवत्व की उस संकीर्णता को लाँघकर पार हो जाने पर आत्मा का कहीं अभाव नहीं दीखता और तब आत्मा की सघनता दिखाई देती है । लौकिकताबद्ध आत्मा पारमार्थिक प्रगति नहीं कर सकता । बन्धन से मुक्ति पाना, आत्मा की अनन्तता की अनुभूति करना, आत्मा के साथ एकात्म्य स्थापित करना, चित्तशुद्धि के द्वारा चित्त से अर्थात् मन से आत्मा को पाना आदि योगदर्शन के सिद्धान्त उपनिषदों में पाए ही जाते हैं । इस तरह सांख्यदर्शन की तरह योगदर्शन भी उपनिषदों का ऋणी है । योगदर्शन हमें मन और आत्मा को साधना के क्रम में अग्रसर होने की आज्ञा करता है, तो उपनिषदें भी हमें जोर देकर यही तो कहती हैं कि तप, संयम, ब्रह्मचर्य आदि गुणों का आचरण करने के बाद ही चरम लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है । प्रश्नोपनिषद् में परब्रह्म की खोज में निकले हुए छ: जिज्ञासुओं को पिप्पलाद ने साधना में एक और साल बिताने को कहा था । ब्रह्मचारी - जीवन में चित्तविक्षेपकारी सांसारिक जाल नहीं होता । तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा चित्तैकाग्र्य में सहायक होते ही हैं । तप से चित्तशान्ति और श्रद्धा से चेतना का सीधा संपर्क किया जा सकता है । और उसी में योगदर्शन का और उपनिषदों के अपरोक्ष सिद्धान्त का सारतत्त्व समाया है— वही दोनों का सम्बन्ध है ।

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( 35) हमें बाह्य विषयों में बाँधने वाला चित्त गुलाम बनाता है । उस पर प्रभुत्व होने से ही मुक्ति मिलती है । मन का मालिन्य किसी भी साधना का फल नहीं देता । उपनिषद् कहती है— “हे गौतम! स्वच्छ पानी में स्वच्छ जल डालने से वह स्वच्छ ही रहता है । " आदि बहुत- सी बातें ऐसी हैं जो योगदर्शन और उपनिषदों समान रूप में पाई जाती हैं । वेदान्त, सांख्य, योग- इन तीन दर्शनों का उपनिषदों के साथ हमने सम्बन्ध देखा । ये तीनों दर्शन एक तरह से ज्ञानकाण्ड में गिने जा सकते हैं । योगदर्शन को तो हम ज्ञानकाण्ड की प्रयोगशाला ही कह सकते हैं । इस ज्ञानकाण्ड के अतिरिक्त एक दूसरा काण्ड हमारे शास्त्रों में पाया जाता है वह है— कर्मकाण्ड | कर्मकाण्ड का भी भारत में एक दर्शन स्थापित हुआ है, उसका भी एक तत्त्व- ज्ञान है, उसका भी एक प्रमाणशास्त्र है, उसका भी एक आचारपक्ष है । उस दर्शन का नाम है— पूर्वमीमांसा । सामान्यतः कर्मकाण्ड ज्ञानकाण्ड का विरोधी माना जाता है । विधिविधान का बाहुल्य, यज्ञों की प्रचुरता इस दर्शन की विशिष्टता है । मूल आर्यसंस्कृति यज्ञसंस्कृति ही थी इसलिए भारत में यज्ञों की विविधता को, विधिविधानों के बाहुल्य को प्रधानता दी गई हो, यह स्वाभाविक ही है! पर ज्ञानकाण्ड तो निवृत्तिपरक है अतः श्रौत उपनिषदों में- ज्ञानकाण्ड में और श्रौत ही ब्राह्मणादि यज्ञप्रधान वाङ्मय के साथ सम्बन्ध बिठाना कठिन हो गया है । यह ठीक है कि ये दोनों काण्ड श्रौत होने पर भी एक साथ नहीं रह सकते, ये तम: प्रकाश की तरह अलग मालूम पड़ते हैं; जैसे रोटी और ईख एक साथ नहीं चबाई जा सकती, वैसे ही इन दोनों काण्डों का आचरण एक साथ नहीं किया जा सकता । दोनों का समुच्चय भले ही न हो सके, पर दोनों में क्रमिकता को अनिवार्य रूप से स्वीकार किया ही गया है । वह इस प्रकार है- पहले वेदविहित कर्मों का अनुष्ठान, फिर निष्काम कर्मनिष्ठा, उससे अन्त:करण की शुद्धि, शमदमादिसाधनपूर्वक ज्ञाननिष्ठा और तब आत्मज्ञान से मुक्ति लाभ । स्मरण रहे, यह क्रमिकता अनिवार्य है । इस क्रमिक सोपान- परंपरा में सभी सोपान मानव-जीवन के लिए अनिवार्य होने से सभी का अपना महत्त्व है और सभी का एक प्रकार का पारस्परिक क्रमिक सम्बन्ध भी है । उपनिषद् के ज्ञानकाण्ड में उस क्रमिकता का पालन करके ही उसमें पदार्पण किया जा सकता है । इसलिए पूर्वमीमांसा के कर्मकाण्ड का अनुसरण किए बिना उत्तरमीमांसा के ज्ञानकाण्ड का अधिकार ही नहीं प्राप्त होता । ऐसी योजना है । फिर भी यह क्रम सर्वसामान्य है । उसमें कहीं - कहीं वामदेव आदि में इस नियम का अपवाद हो सकता है । यहाँ एक बात स्मरण रखना जरूरी है, वह यह है कि भारतीय संस्कृति में कर्म और ज्ञान का प्रवाह समानान्तर ही चला है । यही कारण है कि कुछ उपनिषदें सीधी संहिताओं में से आई हैं, कुछ ब्राह्मणग्रंथों से आई हैं, और कुछ ही आरण्यकों से आई हैं । एक बात यह मान सकते हैं कि आरण्यकों से सम्बद्ध उपनिषदें ज्यादा परिपक्व और विकसित तत्त्वज्ञान वाली हैं, जबकि अन्य उपनिषदों में स्थिर प्रकाश के बदले विद्युत् चमक रही हैं । षड्दर्शनों में उपनिषद् के सम्बन्ध को देखने पर न्यायदर्शन का बीज उपनिषदों में खोजना बड़ा मुश्किल है । आगे चलकर न्यायदर्शन का जो प्रमाणशास्त्र विकसित हुआ, इसका एकमात्र निर्देश मुण्डकोपनिषद् में इस प्रकार मिलता है— “ नाऽयमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो

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(36 ) वाऽप्यलिंगात् । ” यहाँ पर जो 'लिंग' शब्द आया है, वह न्यायदर्शन का पारिभाषिक शब्द है । वह अनुमानवाक्यों का मध्यम पद है । यह पद उपनिषदों का न्यायदर्शन के साथ जोड़नेवाली श्रृंखला हो सकती है । उदाहरणों से सत् तत्त्व का स्वरूप-ज्ञान हो सकता है । ऐसी बात कहनेवाले तथा प्रत्यक्षज्ञान के उदाहरण भी न्यायदर्शनानुकूल मिलते हैं । लेकिन सांख्य, योग, पूर्वणीमांसा जैसी सहजता से यह सम्बन्ध नहीं जोड़ा जा सकता । उपनिषदों में मनोविज्ञान उपनिषदों में आज के लोग यदि मन के व्यवस्थित पृथक्करण की अपेक्षा रखें, तो वह उचित नहीं है, क्योंकि आज का मनोविज्ञान एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में विकसित हुआ है । फिर भी उपनिषदों के मन सम्बन्धी विचार कुछ हद तक आज भी प्रासंगिक तो हैं ही । प्रश्नोपनिषद् ( 4.2 ) में पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों का अर्थात् गति और संवेदनातंत्र काकरतीही हैंकेवलऔर उल्लेखमन मध्यवर्तीहै । परअंगबृहदारण्यकहै । मेंमनकहाके बिनाहै किइन्द्रियाँये इन्द्रियाँनिष्क्रियमन केहैं प्रभुत्व( बृह. 1.5.3के नीचे) इसीलिएही काम मन को प्रमुख इन्द्रिय माना गया है । मन के बिना इन्द्रियाँ कुछ काम नहीं कर सकतीं अर्थात् मन के बिना वे व्यर्थ हैं । उपनिषदें मन को भौतिक मानती हैं, उसे आज का विज्ञान भी मानता है । अन्यमनस्क व्यक्ति की इन्द्रियाँ ज्ञानोत्पादन में अक्षम होने की बात तो हम अपने व्यवहार में अनुभव करते ही हैं । इसलिए वास्तव में देखा जाय तो यह उपनिषद्वचन सत्य ही है कि-" मनुष्य मन से ही देखता, सुनता और सोचता है, आदि ।” इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से प्रत्यक्ष तभी हो सकता है जब कि मन: संयुक्त आत्मारूप देखनेवाली आँख हो । ऐतरयोपनिषद् में अन्त:करण ( मानस) के एक अंश बुद्धि ये कार्य बताए गए हैं — संज्ञान, आज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, जूति, स्मृति, संकल्प, क्रतु, असु, काम और वश; ये भले ही पृथक्कर आधुनिक मनोविज्ञान की कसौटी पर खरा न उतरे, फिर भी इससे इतना तो निश्चित हो ही जाता है कि उपनिषत्काल में भी मनोविज्ञान सम्बन्धी चर्चाएँ होती थीं । का भी उपनिषदोंमन है । वहकी दृष्टिआत्मासे आँखउच्चतमकी ज्ञानभी आँखतो आत्माऔर काकानहीकाहै, भीमनकानका हैनहीं। वह। क्योंकिसर्वेन्द्रियोंआत्मा तो मन प्राण — सब पर शासन करने वाला है । वह हृदयाकाश में स्थित है । कहीं- कहीं उसका, मन एवं द्रव्य की तरह भी किया गया है । आत्मा के लिए अंतिम सिद्धान्त शंकर के केवलाद्वैत वर्णन भौतिक – | या रामानुज के विशिष्टाद्वैत का माना जाय यह निश्चित करना कठिन है का माना जाए अस्तु, वह तो एक अन्य ही विषय है । आत्मा तो प्राणों का प्राण और यह ' प्राण' चेतना का अपर नाम है, और जो मन है, वह चेतना से विशाल मन का भी मन है । तो मानसिक जीवन का एक अंगमात्र है । प्राण तो केवल हमारे आध्यात्मिकतत्त्व है । प्राण - चेतना है | चेतना, मन के द्वारा हुए ज्ञान का एक आकस्मिक तत्त्व है, ऐसा मनोवैज्ञानिकजीवन की अवस्था ही कहते हैं । जब हम ऐसी चेतना से मन की विशालता का स्वीकार पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक “ ( ),,तब तो हमारा आन्तर जगत् उस चेतना प्राण से ज्यादा समृद्ध ज्यादा ढंग से करते हैं ' -—यह लाइबनीज की उक्ति तो उपनिषत्कारों को पहले से मालूम थी हीविशाल और ज्यादा गूढ़है”

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( 37 ) माण्डूक्योपनिषद् में कही गई आत्मा की जाग्रदादि चार अवस्थाओं में जाग्रत् में मन और इन्द्रियों की क्रियाएँ चालू ही रहती हैं, स्वप्नावस्था इन्द्रियाँ शान्त और मनोलीन हो जाती हैं । यह बात आधुनिक मनोविज्ञान नहीं मानता । पर उपनिषदों का कहना है कि जहाँ तक इन्द्रियाँ कुछ- न-कुछ करती हैं, वहाँ तक हम स्वप्न देखते ही नहीं । वह तन्द्रावस्था है, स्वप्न नहीं । सच्ची स्वप्नावस्था केवल मन का ही स्वैरविहार है, उस समय इन्द्रियाँ बिल्कुल शान्त (विलीन ) ही होती हैं । स्वप्नावस्था के पदार्थ में संस्कारयुक्त मनोजन्य ही होते हैं, जाग्रदवस्था के पदार्थ बाह्य होते हैं — यही दोनों में अन्तर है । सुषुप्ति में मन अपने कारण - अविद्या - में लीन हो जाता है । उपनिषदें कहती हैं कि सुषुप्ति में मन और इन्द्रियाँ शान्त हो जाती हैं । जिस प्रकार स्वप्न में मन जाग्रदवस्था के अनुभवों के संस्कारों से युक्त होकर पदार्थज्ञान उत्पन्न कर सकता है, उस प्रकार सुषुप्ति में नहीं कर सकता । उसमें ज्ञाता ज्ञेय, दृश्य- द्रष्टा के भेद नहीं होते । चेतना का प्रवाह उस समय बन्द हो जाता है । फिर भी कहा जाता है कि उस समय निर्विषय चेतना तो उपस्थित रहती ही है । आत्मा इस समय में ही केवल ब्रह्मैक्य का अनुभव कर लेता है । कुछ भी हो, पर इतना तो निश्चित ही है कि सुषुप्ति में भी संपूर्ण अभाव या शून्य की अवस्था तो होती ही नहीं । सुषुप्ति में भी आत्मा तो उपस्थित ही रहता है और तब उस आत्मा को कुछ भी अनुभव नहीं होता । फिर भी वह आनंदानुभव करता है | उपनिषद् की यह—“ कुछ अनुभव न करते हुए भी आनन्दानुभव करने की ” बात मानना मुश्किल- सा लगता है । पर वास्तविक बात यह है कि उपनिषदें शरीर द्वारा अभानरूप से चलती हुई क्रियाओं का समाधान ' प्राण' नामक तत्त्व से करती हैं । वे कहती हैं कि श्वासोच्छ्वास, रुधिराभिसरण आदि क्रियाओं का नियन्त्रण करनेवाला यह 'प्राण' है । शरीर में 'स्मृति' नामक तत्त्व के द्वारा चेतना का प्रवाह अखंडित- सा होता है । संभव है कि यह समाधान ठीक हो । फिर भी हम यह तो कह ही आए हैं कि उपनिषदों के मत में बड़ी भारी अस्पष्टता है, धुँधलापन है । सुषुप्ति अवस्था में, प्रत्यक्षज्ञान के अभाव में, इन्द्रिय और मन की शान्त (निष्क्रिय ) दशा में आत्मा आनन्दानुभव करता होगा क्या? तुरीय में भी केवल एकत्वभान ही होता है । वहाँ भी लौकिक, इन्द्रियजन्य तो है नहीं । फिर भी ये सब रहस्यमय बातें हैं, वे बुद्धिगम्य नहीं अपितु अनुभूतिगम्य ही हैं । ऐसा मानने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं है । उपनिषदों की व्यापकता उपनिषदें वैदिक धर्म और वैदिक तत्त्वज्ञान के सारतत्त्व रूप हैं । और यह तो कहा ही गया है कि सभी भारतीय दर्शनों के बीज उपनिषदों में निहित हैं । वेदान्तदर्शन की तो सभी शाखाएँ उपनिषदों के अध्ययन का ही साक्षात् फल हैं । उपनिषदों में कहे गए मानव-जीवन का परम लक्ष्य (मोक्ष) तो भारतीय संस्कृति, सभ्यता, तत्त्वज्ञान और धर्म में इतना व्यापक हो गया है कि परंपरा से शताब्दियों-सहस्राब्दियों तक भारतीय जनजीवन में एकदम ओतप्रोत हो गया है । यह उपनिषदों की भारतीय जीवन को बहुत बड़ी देन है । प्रस्थानत्रय की नींव उपनिषदें ही हैं । बाकी के दो ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता हैं, लेकिन केन्द्रस्थानीय तो उपनिषदें ही हैं । उपनिषदों के विचारों की गम्भीरता और वैचारिक उदारता इतनी बड़ी है कि अन्य धर्मावलम्बियों और अन्य समाज के लोगों का ध्यान भी इनकी ओर आकर्षित हुआ है । और उन्होंने उपनिषदों से

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(38 ) आकर्षित होकर उनका अपनी- अपनी भाषा में अनुवाद किया करवाया है । ई.स. 1640 में बादशाह शाहजहाँ के पुत्र दाराशिकोह को उपनिषदों के सर्वात्मभाव के सिद्धान्त ने इतना आकर्षित किया कि वह उस समय अपने कश्मीर के आवास को छोड़कर तुरन्त दिल्ली आ पहुँचा और काशी से कुछ विद्वानों को बुलवाया और उपनिषदों का फारसी भाषा में अनुवाद करवाने का काम अपने हाथों में लिया । ई.स. 1775 में जन्द अवेस्ता की खोज करने वाले एन्क्वेटील ड्युपेरोन ने उपनिषदों के उस फारसी अनुवाद की नकल मुजाउद्दौला के राज्य में निवास करने वाले फ्रेंच रेसीडेण्ट मि. ला जेन्टिल को मैत्री- सम्बन्ध से भेंट की । एन्क्वेटील ने उसका भाषान्तर लैटिन भाषा में भी करवाया और वह ई.स. 1800-1801 में प्रकाशित हुआ । यद्यपि यह भाषान्तर बहुत ही अस्पष्ट था, फिर भी जर्मन तत्त्ववेत्ता शोपनहॉवर ने स्वयं में उपनिषद् के तत्त्वज्ञान के प्रभाव को कबूल किया है । शोपनहॉवर के वे शब्द उद्धृत करना यहाँ अनुचित नहीं होगा । उन्होंने कहा है कि— “ उपनिषदों ने गत सदी में जीनेवाले लोगों से अधिक वर्तमान सदी में जीनेवाले मनुष्यों पर उपकार किया है । मेरे मतानुसार पंद्रहवीं सदी में ग्रीक साहित्य के पुनरुद्धार के द्वारा जो प्रभाव पड़ा था इससे कहीं ज्यादा असर संस्कृत साहित्य के पुनः उद्धार के द्वारा सम्भव है । यदि वाचक को प्राचीन हिन्दुओं के ज्ञान की प्राप्ति हुई होगी और उनके विचार पचे होंगे, तो मेरे विचार को समझने का मैं उन्हें खास अधिकारी मानूँगा । मैं ऐसा मानता हूँ कि जिन विचारों के सूत्र उपनिषदों में इधर- उधर बिखरे हुए मालूम पड़ते हैं, उनकी व्यवस्था मैं जिस तत्त्व- पद्धति के द्वारा करना चाहता हूँ, उसमें से फलित हो सकती है । हालाँकि उसके विपरीत मेरी विचारपद्धति या तत्त्वपद्धति कहीं उपनिषदों में से नहीं उत्पन्न होती । इन उपनिषदों की प्रत्येक पंक्ति कितने निश्चित, स्पष्ट और मधुर अर्थ को अभिव्यक्त करती है । उनके प्रत्येक वाक्य में कैसे गहन, अपूर्व और भव्य विचार प्राप्त होते हैं । और उपनिषदों के समग्र संचय में द्रष्टाओं के पवित्र, उदार और उत्साहजनक आशय कैसे प्रकट होते हैं । इस समग्र विश्व में मूल ग्रन्थ के सिवा भी केवल अनुवाद से ही कोई ग्रन्थ हमारे लिए लाभदायक सिद्ध हुआ हो, तो वह मात्र उपनिषद् ही है । हमारे मन को अधिक उच्चादि दिशा में ले जाने के लिए जो एकमात्र प्रकाश है— वही उपनिषद् है । उन ( उपनिषद्) ग्रन्थों में मेरे जीवन का विराम है और प्रयाणपर्यन्त उससे मुझे शान्ति मिलती रहेगी ” । शोपनहॉवर की कही गई उपनिषदों की स्तुति के पश्चात् जर्मनी में उपनिषदों का अध्ययन व्यापक मात्रा में होने लगा | और वहाँ से योरप के अन्य सभी देशों में फैल गया । प्रो. ड्युसन ने भाष्य के साथ उपनिषदों का अनुवाद किया । साथ ही ब्रह्मसूत्र- शांकरभाष्य का भी अनुवाद किया । ‘ अध्यात्म विद्या के मूलतत्त्व' नामक ग्रन्थ में उपनिषदों के विचारों का गुम्फन काण्ट के कुछ सिद्धान्तों के आधार पर भी किया गया । प्रोफेसर मैक्समूलर ने शंकर के वेदान्तदर्शन की मुक्तकंठ से प्रशंसा की । राजा राममोहन राय ने अपने खर्च से उपनिषदों का हिन्दी- अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करवाया । ब्राह्मसमाज के कुछ सिद्धान्त उपनिषदों से ही लिए गए हैं, वह तो सर्वविदित ही है । प्रकृत संस्करण की उपादेयता उपनिषदों के मतों में दिखाई देनेवाली अस्पष्टताएँ होने से या तो कहिए कि सर्वाभिमुखता से उनमें से अलग- अलग अर्थ निकालने का बहुत बड़ा अवकाश है उन मतों की विविध मतों का भी यही कारण है । इतने भाष्य-टीकाएँ-वार्तिक आदि होने पर भी । भाष्यकारों के निकालने की संभावना यथावत् बनी हुई ही है । सहज रूप से अपने शरीर के रंगअभीकोऔरबदलनेवालेनए अर्थ ;