Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 221–230

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 221–230

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तृतीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 179 अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी महास्वान्भवति य एवं वेद ॥ 5 ॥

इस हृदयकमल का ऊपर का जो दरवाजा है, उसका अधिष्ठाता देव उदान है, वही मुख्य प्राण है, वही आकाश है, वही बल है, वही तेज है, यह समझकर उपासना करनी चाहिए । इसे जानकर जो साधक यथोक्त प्रकार से उसकी उपासना करता है वह बलवान और तेजस्वी होता है । ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाः स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेदास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान्वेद ॥6 ॥

तो ये ही स्वर्गलोक के द्वारपाल पाँच ब्रह्मपुरुष हैं ॥ जो मनुष्य स्वर्ग के इन द्वारपालों को ऊपर कही गई रीति से हृदय से सम्बद्ध ब्रह्मपुरुष ही मानते हैं, उनके कुल में वीर पुरुष जन्म लेता है और वह स्वयं भी स्वर्गलोक को प्राप्त होता है । अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्त- मेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तःपुरुषे ज्योतिः ॥7 ॥

इस स्वर्गलोक के ऊपर जो तेज है और जो तेज समस्त सृष्टि एवं सत्यादि ऊपर के ऊर्ध्व लोकों में है, वही तेज इस पुरुष के हृदय तस्यैषा दृष्टिर्यत्रैतदस्मिञ्छरीरे सस्पर्शेनोष्णीमानं विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनदमिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुप्यः श्रुतो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥8 ॥

इति त्रयोदशः खण्डः ॥ उसी तेज का प्रत्यक्ष प्रमाण यह नेत्र है कि जहाँ तक शरीर में गरमी बनती जाती है, वहाँ तक मनुष्य जीवित है ऐसा समझा जाता है । उसी तेज का प्रत्यक्ष प्रमाण यह श्रुति ( श्रवण) भी है कि कान बन्द कर देने पर रथ के ‘ घरघर' जैसी या अग्नि के जलने की - सी या बैल की- सी आवाज सुनाई देती है । “ ऐसी ज्योति को मैंने देखा है और सुना भी है ” – ऐसी समझदारी से उसकी उपासना बढ़तीकरनी चाहिए । जो इस तरह उपासना करता है, उसकी आँखों का तेज बढ़ता है, और उसकी ख्याति है । ( यहाँ तेरहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) चतुर्दशः खण्डः सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपसीताथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथा क्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ॥1 ॥

यह सब सचमुच ब्रह्म ही है । तत् = उस ब्रह्म में से, ज = यह जन्मा हुआ है और लान् =करनीउसी में लय होनेवाला है और उसी में चेष्टा करता है - इस प्रकार शान्त रहकर उसकी उपासना

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180 उपनिषत्सञ्चयनम् चाहिए । यह जीव संकल्पमय है । इस लोक में जीव जैसा संकल्प करेगा वैसा ही यहाँ से जाकर होता है । इसलिए अच्छे संकल्प ही करने चाहिए । मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥।2 ॥ यह आत्मा (ब्रह्म) मनरूप होता है, प्राण और शरीररूप भी वह है; वह प्रकाशस्वरूप है, सत्यसंकल्पवाला है, आकाशादि का निर्माण करनेवाला है । सभी कर्म उसी के हैं, सभी धर्म उसी के हैं, वह सभी गन्धों से पूर्ण है, वही सभी रसों से परिपूर्ण है, यह सारा जगत् उससे व्याप्त है । वह वाणी आदि इन्द्रियों से परे है । वह पक्षपातरहित है । एष य आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान्त्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद्वा श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वा एष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्त- रिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥3 ॥

यह मेरा आत्मा चावल से, यव से, सरसों से या धान ( शालि ) से या सामा से भी अधिक छोटा है । फिर भी हृदय के भीतर स्थित मेरा आत्मा पृथ्वी से बड़ा, आकाश से बड़ा, अन्तरिक्ष से बड़ा, स्वर्ग से भी बड़ा और इन लोकों से भी बड़ा है । (ऐसे आत्मा की उपासना करनी चाहिए ) । सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्मान्तर्हृदय एतद्ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्सास्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ॥4 ॥

इति चतुर्दशः खण्डः ॥ “सर्व कर्मोंवाला, सर्व इच्छाओं वाला, सर्वगन्धयुक्त, सर्वरसयुक्त; इन सबको व्याप्त कर रहनेवाला, वाणी से परे, पक्षपातरहित यह जो आत्मा मेरे हृदय के भीतर स्थित है वह ब्रह्म है । इस शरीर को छोड़ने के बाद भी मैं उसे पा सकूँगा ।”–ऐसा जिसका निश्चय होता है, और जिसमें इस विषय के प्रति शंका का लेशमात्र भी नहीं है, वह अवश्य ईश्वर को प्राप्त कर लेता है । इस प्रकार की यह विद्या शाण्डिल्य ने कही है । ( यहाँ चौदहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) पञ्चदश: खण्ड: अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिर्बुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य क्तयो द्यौर- स्योत्तरं बिल स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन्विश्वमिदः श्रितम् ॥1 ॥

आकाश इस विराट् पुरुष का उदर है, पृथ्वी पाद है, दिशाएँ हाथ हैं, उसका मस्तक पर का छिद्र ( ब्रह्मरन्ध्र ) स्वर्ग है, ऐसा यह कोशभाण्डागार है, उसका कभी नाश नहीं होता । इसमें सारा जगत् अवस्थित है । तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम नामोदीचीरोद रोदितितासांसोऽहमेतमेवंवायुर्वत्सःवायुंस यदिशांएतमेवंवत्संवायुंवेद दिशांमा वत्संप्रतीचीवेद नसुभूतापुत्र- पुत्ररोद रुदम् ॥2 ॥

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181तृतीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) उस विराट् पुरुष की पूर्व दिशा 'जुहु' ( होमस्थल) नाम की है, दक्षिण दिशा ' सहमाना' ( कर्मफल स्वीकारना ) नाम की है, पश्चिम दिशा का नाम ' राज्ञी' (सान्ध्य वर्ण की ) है, उत्तर दिशा का नाम 'सुभूता' है ( कुबेरादि का स्थान ) है । उन दिशाओं का पुत्र वायु है । जो साधक वायु को दिशाओं के पुत्र के रूप में पूजते हैं उसे पुत्र के कारण रोना नहीं पड़ता । मैं उस वायु को दिशाओं का पुत्र मानकर पूजता हूँ जिससे कि पुत्र के कारण कभी मैं न रोऊँ । अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना प्राणं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भूः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भुवः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना स्वः प्रपद्येऽमुना- ऽमुनाऽमुना ॥3 ॥

नामवाले पुत्र के साथ अविनाशी कोश की शरण में हूँ । इसी प्रकार प्राण की शरण में हूँ, वैसे ही भूर्लोक के अधिष्ठाता देव की शरण में हूँ । इसी प्रकार भुवर्लोक के देवता की और स्वर्लोक की भी शरण में हूँ । स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदः सर्वं भूतं यदिदं किंच तमेव तत्प्रापसि ॥ 4 ॥

मैंने जो कहा कि “ मैं मुख्य प्राण की शरण में हूँ” –इसका तात्पर्य यह है कि जो कुछ स्थावरजंगम जगत् है, वह प्राण ही है, मैं उस सर्वात्मक प्राण की शरण में हूँ । अथ यदवोचं भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्ये इत्येव तदवोचम् ॥15 ॥

और भी मैंने जो कहा कि " मैं पृथ्वी की शरण में हूँ ”–इससे मेरा प्रयोजन है कि मैं पृथ्वी की शरण में हूँ, आकाश की शरण में हूँ और स्वर्ग की शरण में हूँ । अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥6 ॥

और जो मैंने कहा कि मैं " भुवर्लोक की शरण में हूँ ” तो इसका अर्थ यह है कि मैं भुवर्लोक की शरण में हूँ, मैं अग्नि की शरण में हूँ, मैं वायु की शरण में हूँ, मैं आदित्य की शरण में हूँ । अथ यदवोचः स्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येव तदवोचं तदवोचम् ॥7 ॥

इति पञ्चदशः खण्डः ॥ जो मैंने कहा था कि “मैं स्वर्ग की शरण में हूँ” –इसका तात्पर्य यह है कि मैं ऋग्वेद की शरण में हूँ, यजुर्वेद की शरण में हूँ, सामवेद की शरण में हूँ । मैंने ऐसा ही कहा था, यही कहा ( यहाँ पंद्रहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) षोडशः खण्डः पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विशतिवर्षाणि तत्प्रातःसवनं चतुर्विशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं॥1तदस्य॥ वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीद सर्वं वासयन्ति

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182 उपनिषत्सञ्चयनम् पुरुष ही यज्ञ है । उसकी आयु के पहले चौबीस वर्ष प्रातः - सन्ध्या है, क्योंकि गायत्री चौबीस अक्षर की है, और प्रात: सवन की आहुति के मंत्र गायत्री छन्द के हैं । इस प्रातः सवन के देवता वसु हैं । प्राण ही वसु हैं क्योंकि प्राण ही सबको अपने में बसाते हैं । तं चेदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा वसव इदं प्रातःसवनं माध्यन्दिनः सवनमनुसन्तनुतेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत इत्यगदो ह भवति ॥2 ॥

चौबीस वर्ष की आयु में यज्ञकर्ता को कोई रोग पीड़ित करे तो उसे कहना चाहिए कि “ हे प्राणो! हे वसुओ! मेरी इस प्रातर्यज्ञ की आयु को मध्याह्नयज्ञ की आयु तक फैला दीजिए, जिससे प्राणरूपी वसुदेवताओं के आगे यज्ञरूप मैं नष्ट न होऊँ ।” – ऐसी प्रार्थना से वह रोगादिरहित हो जाता है । अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिनः सवनं चतुश्चत्वारि - शदक्षरा त्रिष्टुप् त्रैष्टुभं माध्यन्दिनः सवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीद सर्व रोदयन्ति ॥3 ॥

चौबीस वर्ष के बाद की जो चँवालीस वर्ष तक की (अड़सठ वर्ष तक की आयु है, वह मध्याह्न की आहुति है ( मध्याह्न सन्ध्या है ), क्योंकि त्रिष्टुभ् छन्द चॅवालीस अक्षरों का है और मध्याह्न की यज्ञक्रिया के मन्त्र भी त्रिष्टुभ् छन्द के ही हैं । मध्याह्न की यज्ञक्रिया के देव रुद्र हैं । यहाँ प्राण ही रुद्र हैं । क्योंकि उस आयु में प्राण सतानेवाले होने से सबको रुला सकते हैं । (जो रुलाता है, वही रुद्र है ) । तं चेदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यन्दिन सवनं तृतीयसवनमनुसन्तनुतेति माहं प्राणाना रुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥4 ॥

और यदि पुरुष को इस दूसरी अवस्था में कोई दुःख हो तो वह प्रार्थना करे कि— “हे प्राणो! हे रुद्रो! मेरी इस मध्याह्न आहुति को तीसरी आहुति (सायंसन्ध्या) तक पहुँचा दीजिए कि जिससे यज्ञरूप मैं रुद्ररूप प्राणों से बीच में ही बिछुड़ न जाऊँ । ” ऐसी प्रार्थना से यह रोगमुक्त हो जाता है । अथ यान्यष्टाचत्वारिशद्वर्षाणि तृतीयसवनमष्टाचत्वारिशदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वावादित्या एते हीद सर्वमाददते ॥5 ॥

अब बाद के जो अड़तालीस वर्ष ( 69 से 116 वर्ष तक ) हैं, वे तीसरी आहुति ( सायंसन्ध्या ) है । क्योंकि जगती छन्द अड़तालीस अक्षरों का है और तृतीय सवन की आहुतियों के मन्त्र भी जगती छन्द के ही हैं । उस आहुति के देवता आदित्य हैं । यहाँ प्राण ही आदित्य है, क्योंकि वही सबको ले जाते हैं । तं चेदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा आदित्या इदंमे तृतीय- सवनमायुरनुसन्तनुतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सी- येत्युद्धैव तत एत्यगदो हैव भवति ॥6 ॥

और यदि इस तीसरी अवस्था में पुरुष को पीड़ा हो तो वह कहे कि-मेरी इस तीसरे सवन की आहुति को मेरी पूरी आयु तक पहुँचा दीजिए "हे प्राणो! हे आदित्यो! में ही प्राणों या आदित्यों से बिछुड़ न जाऊँ । ” ऐसी प्रार्थना से वह नीरोगीकि जिससे यज्ञरूप मैं बीच हो जाता है ।

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तृतीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 183 एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत्प्र ह षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥7 ॥

इति षोडशः खण्डः ॥ इस प्रसिद्ध विद्या को जाननेवाले इतरापुत्र महीदास ने इस प्रकार कहा है– “ अरे, (रोग! ) तू मुझे क्यों पीड़ा दे रहा है? तुझसे मैं मरनेवाला नहीं हूँ । " फलस्वरूप वह एक सौ सोलह वर्ष तक जीवित रहा था । और भी कोई उपासक यदि यह जानता है तो वह भी एक सौ सोलह साल तक जीवित रहता है । ( यहाँ सोलहवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) * सप्तदश: खण्ड: स यदशिशिषति यत्पिपासति यन्न रमते ता अस्य दीक्षाः ॥1 ॥

वह यज्ञकर्ता खाने की इच्छा करता है, पीने की इच्छा भी करता है, पर अन्य वस्तुओं में— इन्द्रियादि सुखों में इच्छा नहीं करता, वही उसकी दीक्षा है । ( आत्मसंयम का यह प्रथम सोपान है ) । अथ यदश्नाति यत्पिबति यद्रमते तदुपसदैरेति ॥2 ॥

फिर भी वह जो खाता है, जो पीता है, जो रति का अनुभव करता है, वह तो उपसदों के जैसा ही माना जाता है । ( यज्ञकर्ता की खानपानादि क्रियाएँ उपसदों के जैसी ही मानी जाती है ) । अथ यद्धसति यज्जक्षति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रैरेव तदेति ॥3 ॥

और जब वह हँसता है, खाता है, मैथुन करता है, तब स्तुतशस्त्र की समानता रखता है ।

ता अथ यत्तपो दानमार्जवमहिसा सत्यवचनमिति अस्य दक्षिणाः ॥4 ॥

उसी प्रकार उस यज्ञकर्ता के दान, तप, सरलता, अहिंसा और सत्यवचन हैं, वे ही उसकी दक्षिणा है । तस्मादाहुः सोष्यत्यसोष्टेति पुनरुत्पादनमेवास्य तन्मरणमेवास्याव- 2: 115 11 इसलिए कहते हैं कि— जन्म देगा या जन्म दिया वह उसका पुनर्जन्म ही है । और उसका मरण ही अवभृथ स्नान है । तद्धैतद्द्द्घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायोक्त्वोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणसञ्- शितमसीति तत्रैते द्वे ऋचौ भवतः ॥6 ॥

अंगिरा के पुत्र घोर नामक ऋषि ने यह यज्ञ- शास्त्र देवकीपुत्र कृष्ण को सुनायातीन मंत्रथाजपने, जिसेचाहिए—सुनकर वह तृष्णारहित हो गया था । उस घोर ऋषि ने कहा कि मरण समय में मेंउसेदोयेऋचाएँ और भी हैं । “तू अक्षय है, तू अच्युत है, तू अतिसूक्ष्म है ।" और इस विषय

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184 उपनिषत्सञ्चयनम् आदित्प्रत्नस्य रेतसः । ज्योतिः पश्यन्ति वासरम् । परो यदिष्यते दिवि ॥7 ॥

उद्वयन्तमसस्परि ज्योतिः पश्यन्त उत्तरःस्वः पश्यन्त उत्तरं देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तममिति ज्योतिरुत्तममिति ॥8 ॥

इति सप्तदशः खण्डः ॥ ब्रह्मज्ञानी लोग परब्रह्म के प्रकाशमान तेज को ही जगत् का बीज मानते हैं । यह प्रकाश सूर्यप्रकाश की ही तरह सर्वव्यापक है । यह शाश्वत है, यह महाप्रकाश समस्त विश्व का मूलस्रोत है । यह महत्तम प्रकाश अन्धकाररूपी अज्ञान को दूर कर देता है । इसी प्रकाश को अपने हृदय में देखकर हमने स्वयंप्रकाश परमतत्त्व को प्राप्त कर लिया है, जो कि प्रकाशों का भी प्रकाश है । ( यहाँ सत्रहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) अष्टादश: खण्ड: मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्ममथाधिदैवतमाकाशो ब्रह्मेत्युभयमादिष्टं भवत्यध्यात्मं चाधिदैवतं च ॥1 ॥

'मन ब्रह्महै ''.– इस प्रकार उपासना करनी चाहिए । यह आध्यात्मिक उपासना है । और ' आकाश ब्रह्म है' – ऐसी उपासना आधिदैविक उपासना है । इस प्रकार अध्यात्म ( आध्यात्मिक उपासना ) और अधिदैवत ( आधिदैविक उपासना) दोनों यहाँ कहे गये हैं । तदेतच्चतुष्पाद्ब्रह्म । वाक् पादः प्राणः पादश्चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद इत्यध्यात्मम् । अथाधिदैवतमग्निः पादो वायुः पाद आदित्यः पादो दिशः पाद इत्युभयमेवादिष्टं भवत्यध्यात्मं चैवाधिदैवतं च ॥2 ॥

उस ब्रह्म के चार भाग हैं - वाक्पाद, प्राणपाद, चक्षुपाद और श्रोत्रपाद ( वाणी, प्राण, नेत्र और कान ) यह अध्यात्म है । अब अधिदैवत कहते हैं कि अग्नि, वायु, सूर्य और दिशाएँ — ये भाग हैं । इस प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत - दोनों के चार- चार भाग कहे गये हैं । वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥3 ॥

मनरूपी ब्रह्म का वाणी ही चौथा पाद (भाग) है । वह पाद अग्नि से प्रकाशित होता घृतादि भक्षण से तेजस्वी होता है । जो उपासक इस ज्ञान के साथ मनोब्रह्म की उपासना करता है और,, कीर्ति यश और ब्रह्मतेज से प्रकाशमान होता है । है वह प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद॥4 ॥

मनोब्रह्म का चौथा भाग प्राण है, प्राण बाह्य वायु के तेज से प्रकाशित और तप्त उपासक इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह तेजस्वी होता है, प्रत्यक्ष-परोक्ष कीर्तिहोता है, जोब्रह्मतेज से प्रकाशित होता है । से और

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185तृतीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स आदित्येन ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥5 ॥

मनरूपी ब्रह्म का आँख चौथा भाग है । नेत्र आदित्य के तेज से प्रकाशित और तेजस्वी होता है । जो उपासक इस प्रकार समझ- बूझ कर उपासना करता है, वह तेजस्वी होता है और कीर्ति से तथा ब्रह्मतेज से ओजस्वी एवं शोभित होता है । श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स दिग्भिर्ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥16 ॥

इत्यष्टादशः खण्डः ॥ श्रोत्र ही मनोब्रह्म का चौथा पाद है । वह दिशाओं के तेज से प्रकाशित और शोभित होता है । जो साधक इस प्रकार जानकर उपासना करता है वह प्रकाशित और शोभित होता है । और कीर्ति एवं ब्रह्मतेज से तेजस्वी और शोभित होता है । ( यहाँ अठारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) एकोनविंशः खण्डः आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत् । तत्सदा- सीत्तत्समभवत्तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम् ॥1 ॥

के ' सूर्य ब्रह्म है ' इस उपदेश का व्याख्यान करते हैं - यह नामरूपात्मक जगत् अपनी उत्पत्ति। बाद में पहले असत् ( अनभिव्यक्त) नामरूपहीन ही था । बाद में यह सत् (परिमाणवालाफूटा) । हुआफूटे हुए अण्डे अण्डाकार हुआ । बाद में एक वर्ष तक वैसे ही पड़ा रहा । एक वर्ष के बाद वह के दो भागों में से एक स्वर्ण हुआ और दूसरा रजत हुआ । तद्यद्रजत सेयं पृथिवी यत्सुवर्णं सा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्ब समेघो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकः स समुद्रः ॥2 ॥

) भाग जो रजत है वह यह पृथ्वी है, जो सोना है वह स्वर्ग है । अण्डे केके भीतरभीतर केजोरेशे(जरायुनदियाँ हुईं था वह पर्वत हैं, उल्ब भाग का स्तर मेघों के साथ ओस हुआ, अण्डे और अण्डे का पानी सागर बना । अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्तं जायमानंकामास्तस्मात्तस्योदयंघोषा उलूलवो- ऽनूदतिष्ठन् सर्वाणि च भूतानि च सर्वे च भूतानि प्रति प्रत्यायनं प्रति घोषा उलूलवोऽनूत्तिष्ठन्ति सर्वाणि च सर्वे चैव कामाः ॥3 ॥

हुईं, उस अण्डे से सूर्य उत्पन्न हुआ । उसके उत्पन्न होते ही उत्साहसूर्य के(आनन्दउदय )औरकी अस्तआवाजेंहोते ही स्थावरजंगम जीव और भोग्य पदार्थ भी उत्पन्न हुए । इसलिए तो । उत्साह ( आनंद ) के शब्द होने लगते हैं

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186 उपनिषत्सञ्चयनम् स य एतमेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनः साधवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निम्म्रेडेरन्निम्रेडेरन् ॥4 ॥

इत्येकोनविंशः खण्डः ॥ इति छान्दोग्योपनिषदि तृतीयोऽध्यायः ॥ 3 ॥

पूर्वोक्त प्रकार से जानकर जो कोई ब्रह्मबुद्धि से सूर्य की उपासना करता है, वह सूर्यरूप होउ है और उसे आनन्द के शब्द सुनाई देते हैं और सुनाई देते रहेंगे । ( यहाँ उन्नीसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) यहाँ छान्दोग्योपनिषद् का तृतीय अध्याय समाप्त हुआ ।

पृष्ठ 229

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 229 का मूल पृष्ठ
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छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 187चतुर्थोऽध्यायः ] अथ चतुर्थोऽध्यायः प्रथमः खण्डः ॐ जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य आस स ह सर्वत आवसथान्मापयांचक्रे सर्वत एव मेऽस्यन्तीति ॥1 ॥

जनश्रुत- वंशी ( उसके पुत्र का पुत्र) जानश्रुति श्रद्धापूर्वक बहुत दान देनेवाला था । उसके यहाँ बहुत अन्न पकाया जाता था । "सब लोग मेरा ही अन्न खाएँ” –इस आशय से उसने स्थान-स्थान पर धर्मशालाएँ बनवाई थीं । अथ ह हसा निशायामतिपेतुस्तद्वैवः हः सो हसमभ्युवाद हो होऽपि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत्त्वा मा प्रधाक्षीरिति ॥2 ॥

उसी समय रात को उस तरफ से उड़ते- उड़ते कुछ हंस आए । उनमें से किसी एक हंस ने दूसरे हंस से कहा— “हे भल्लाक्ष! भल्लाक्ष! इस जानश्रुति पौत्रायण का तेज स्वर्ग की तरह फैला हुआ है । उसे तुम स्पर्श मत करना । शायद वह तुझे स्पर्श करने से जला देगा । ” तमु ह परः प्रत्युवाच कम्बर एनमेतत्सन्तः सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथः सयुग्वा रैक्व इति ॥3 ॥

तब उससे दूसरे हंस ने कहा- " अरे, इस राजा में ऐसी तो कौन- सी बड़ाई है कि तुम इसके सम्बन्ध में ऐसे मानसूचक शब्द कह रहे हो? – गाड़ीवाले रैक्व के समान कह रहे हो? ” तब पहले ने पूछा- "कौन है वह गाड़ीवाला रैक्व? ” उसने कहा——-' सुनो ।' यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेन सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥4 ॥

“जिस तरह जुए में ' कृत' नाम के (चार अंकवाले) अक्ष से जीतनेवाले पुरुष के प्रभुत्व में निम्नश्रेणी के सभी अक्ष आ जाते हैं, उसी तरह जो अच्छे काम करते हैं, वे सभी रैक्व के अधीन हो जाते हैं । जो रैक्व जानता है, यदि उसे कोई जान लेता है तो वह रैक्व जैसा हो जाता है । इस प्रकार मैंने रैक्व के विषय में कहा ।" तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव । स ह संजिहान एव क्षत्तार- मुवाचाङ्गारे ह सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथ सयुग्वा रैक्व इति ॥5 ॥

जानश्रुति पौत्रायण ने यह बात सुनी । प्रातः काल उठते ही उसने बन्दीजन से यह बात कही— “ अरे भाई! तू मेरी प्रशंसा में गाड़ीवाले रैक्व की स्तुति- सी” ही क्यों कर रहा है? ” तब बन्दीजन ने "पूछा- "कौन है वह गाड़ीवाला रैक्व? कैसा है वह? यत्किञ्च यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेन सर्वं तदभिसमेति ॥ प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥6

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उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 230 का मूल पृष्ठ
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188 उपनिषत्सञ्चयनम् "जिस तरह जुए में 'कृत' नाम के ( ज्यादा आँकड़ों वाले) अक्ष से जीतनेवाले पुरुष के प्रभुत्व में निचली श्रेणी के सभी अक्ष आ जाते हैं, उसी प्रकार जो अच्छे कार्य करते हैं, वे सभी रैक्व के अधीन हो जाते हैं | जो रैक्व जानता है, उसे जो जान लेता है, तो वह रैक्व जैसा हो जाता है । इस प्रकार मैंने रैक्व के बारे में तुमसे कह दिया ।" –ऐसा प्रत्युत्तर राजा ने बन्दीजन को दिया । स ह क्षत्ताऽन्विष्य नाविदमिति प्रत्येयाय त होवाच यत्रारेब्राह्मणस्या- न्वेषणा तदेनमर्च्छति ॥7 ॥

तब उस बन्दीजन ने जाँच- पड़ताल करके लौटकर कहा--'" मुझे तो उसका पता नहीं मिला ” तब राजा ने कहा— “ अरे भाई! जहाँ ब्रह्मज्ञानी की खोज की जाती है, वहाँ (अरण्यादि में ) उसे खोज निकालो । ” सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तः हाभ्युवाद त्वं तु भगवः सयुग्वा रैक्व इत्यह ह्यरा 3 इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताऽविदमिति प्रत्येयाय ॥8 ॥

इति प्रथमः खण्डः ॥ उस बन्दीजन ने गाड़ी के नीचे खाज खुजलाते हुए रैक्व को देखा । उनके पास वह बन्दीजन बैठा और उसने कहा— ‘“क्या आप ही महानुभाव गाड़ीवाले रैक्व हैं न? ” रैक्व ने कहा— “ अरे हाँ, मैं ही रैक्व हूँ । ” तब बन्दीजन ने उन्हें पहचाना । यह जानकर वह राजा के पास लौटा और राजा से कहा– “रैक्व मुझे मिल गए हैं ।" ( यहाँ पहला खण्ड पूरा हुआ ।) द्वितीयः खण्डः तदुह जानश्रुतिः पौत्रायणः षट् शतानि गवां निष्कमश्वतरीरथं तदादाय प्रतिचक्रमे तः हाभ्युवाद ॥1 ॥

इसके बाद ज'नश्रुति पौत्रायण छः सौ गायें, एक हार और टट्टुओं से जुड़ा हुआ रथ लेकर उनके पास गया और बोला कि— रैक्वेमानि षट् शतानि गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथो नु म एतां भगवो देवता शाधि यां देवतामुपास्स इति ॥2 ॥

“ हे रैक्व! ये छ: सौ गायें, यह हार और यह टट्टुओं से जुड़ा हुआ रथ मैं लाया हूँ, इन्हें स्वीकार करके हे भगवन्! आप जिस देवता की उपासना करते हैं, उसका मुझे उपदेश दीजिए । तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारे त्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति तदुह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ॥३ ॥

तब उसको दूसरे (रैक्व) ने उत्तर दिया– “हे शूद्र! ये गायें हारादि सहित तुम अपने रखो । तब फिर जानश्रुति पौत्रायण हजार गायें, एक हार, खच्चरों से जुता हुआ रथ और अपनीपासकन्याही लेकर उनके पास आया ।