Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 231–240

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 231 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

189चतुर्थोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) त हाभ्युवाद रैक्वेद सहस्त्रं गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जायाऽयं ग्रामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा भगवः शाधीति ॥4 ॥

जानश्रुति ने रैक्व से कहा— “हे रैक्व! ये एक हजार गायें, यह हार, यह टट्टुओं से जुड़ा हुआ रथ, यह पत्नी, जहाँ आप रहते हैं वह गाँव— इन सबको स्वीकार करते मुझे आप अवश्य उपदेश दीजिए । तस्याह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति ते हैते रैक्वपर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास तस्मै होवाच ॥5 ॥

इति द्वितीयः खण्डः ॥ उस कन्या का मुँह ऊँचा करके ग्रहण करते हुए रैक्व ने कहा– “हे शूद्र! तुम मेरे लिए बहुत- सी वस्तुएँ लाए हो वे सब मेरे लिए गौण है किन्तु विद्या ग्रहण के इस द्वार से आप मुझसे उपदेश कराते है । ” जहाँ वे रैक्व रहते थे, वह 'रैक्वपर्णा' नामक गाँव ' महावृष' प्रदेश में अवस्थित है । फिर रैक्व ने जानश्रुति को यह (निम्न) उपदेश दिया । ( यहाँ दूसरा खण्ड पूरा हुआ । ) * तृतीयः खण्डः वायुर्वाव संवर्गो यदा वा अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्त- मेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ॥1 ॥

वायु ही सबका संग्राहक है । जब अग्नि शान्त होती है तब वायु में ही मिल जाती है, जब सूर्य अस्त होता है, तब वायु में ही मिल जाता है, जब चन्द्र अस्त होता है, तब वायु में ही मिल जाता I यदाप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इत्यधि- दैवतम् ॥2 ॥

का आधार जब जल सूख जाता है, वायु में ही मिल जाता है, क्योंकि वायु ही अग्नि आदि है । इस प्रकार यह देवतासम्बन्धी संवर्ग कहा गया । अथाध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणश्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इति ॥3 ॥

सोता है अब अध्यात्म ( शारीरिक ) संवर्ग कहते हैं । प्राण ही संवर्गमें (हीसंग्राहककान,) प्राणहै । जबमें हीमनुष्यमन लीन हो तब प्राण में ही वाणी लीन होती है, प्राण में ही आँख, प्राण

जाता है । प्राण ही इन सबका आधार है ।

तौ वा एतौ द्वौ संवर्गौ वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ॥4 ॥

तो ये दो संवर्ग हैं — देवों में वायु है और इन्द्रियों में प्राण है । परिविष्यमा अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं ब्रह्मचारी बिभिक्षे तस्मा उ ह न ददतुः ॥5 ॥

परोसा जा रहा एक बार कापिगोत्रोत्पन्न शौनक और कक्षसेन- पुत्र अभिप्रतारीभिक्षाकोनहींजबदी भोजन। था तो बीच में ही किसी ब्रह्मचारी ने भिक्षा माँगी, किन्तु उन्होंने

पृष्ठ 232

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 232 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

190 उपनिषत्सञ्चयनम् स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः स जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय नाभिपश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन्बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ॥6 ॥

वह ब्रह्मचारी बोला— “एक कोई देव चार महात्माओं को निगल गया । हे कापेय! हे अभिप्रतारी! मरणधर्मा मानव, उस अनेक रूपों में अवस्थित जगत् के रक्षक देव को देख नहीं पाते, जिसके लिए यह अन्न है, उसको नहीं दिया गया । ” तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायात्मा देवानां जनिता प्रजाना हिरण्यदष्ट्रो बभसोऽनसूरिर्महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदनन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्नेदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ॥7 ॥

उस कथन पर कपिगोत्रीय शौनक ने चिन्तन किया फिर ब्रह्मचारी के पास जाकर कहा "जो देवों का आत्मा है, जो प्रजाओं को उत्पन्न करनेवाला है, जो अटूट दंष्ट्रावाला है, जो भक्षणशील है, जो मेधावी है, जो बड़ा महिमावान कहा जाता है, जो अन्यों से अभक्षणीय है, जो वस्तुतः अन्न न हो तो उसे भी खा जाता है, हे ब्रह्मचारी! हम उसी देव की उपासना करते हैं । " ऐसा कहकर उसने सेवकों से कहा— “इसे भिक्षा दे दो । " तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश संतस्तत्कृतं तस्मात्सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दशकृतः सैषा विराडन्नादी तयेदः सर्वं दृष्टः सर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥8 ॥

इति तृतीयः खण्डः ॥ बाद में उन्होंने उसे भिक्षा दी । वायु आदि पाँच तत्त्व और प्राण आदि पाँच तत्त्व मिलकर दस होते हैं । ये दस मानो द्युत के 'कृत' नाम का अक्ष है । इसलिए सभी दिशाओं में यह अन्न ही दशकृत है | यह विराट् ही अन्नभक्षक है, इसी से यह सब देखा जाता है । जो इस प्रकार जानता है, वह सब कुछ देख सकता है और वह अन्न पचानेवाला होता है । ( यहाँ तीसरा खण्ड पूरा हुआ ।) * चतुर्थः खण्डः सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रयाञ्चक्रे । ब्रह्मचर्यं भवति निवत्स्यामि किंगोत्रोन्वहमस्मीति ॥1 ॥

जबालापुत्र सत्यकाम ने अपनी माता जबाला से कहा- “आदरणीय माता, मैं ब्रह्मचर्यपूर्वक गुरुगृहनिवास करना चाहता हूँ । तो मेरा गोत्रं कौन- सा है? ” सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवथा इति ॥2 ॥

, तुम किस गोत्र उस जबाला ने से कहा- "हेपुत्र, लोगों की सेवा- शुश्रूषा पुत्रकरते हुए मैंने युवावस्था में तुम्हें प्राप्त कियाके होहै वह। मैं मैंयहनहींनहींजानतीजानतीहूँकि। बहुततुम

पृष्ठ 233

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 233 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

191चतुर्थोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) किस गोत्र के हो । मेरा नाम तो जबाला है और तुम्हारा नाम सत्यकाम है । इसलिए गुरु के पास जाकर "मैं सत्यकाम जाबाल हूँ” – ऐसा कह दो । स ह हारिद्रुमतं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्यं भगवति वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति ॥3 ॥

वह सत्यकाम गौतमगोत्रीय हरिद्रुमान के पुत्र हारिद्रुमत के पास जाकर बोला– “आदरणीय, आपके पास मैं ब्रह्मचर्यपूर्वक गुरुगृहवास करूँगा । इसलिए मैं आया हूँ । ” त होवाच किंगोत्रो नु सोम्यासीति स होवाच नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रो- ऽहमस्म्यपृच्छं मातरः सा मा प्रत्यब्रवीद् बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साऽहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्य- कामो नाम त्वमसीति सोऽह सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥4 ॥

गौतम ने उससे कहा— “हे सौम्य! तुम किस गोत्र के हो? ” उसने कहा– “यह तो मैं नहीं जानता । हाँ मैंने अपनी माता से अपना गोत्र पूछा था । उसने मुझे उत्तर दिया कि— “बहुत लोगों की सेवा- शुश्रूषा करती हुई मैंने युवावस्था में तुम्हें प्राप्त किया है । अतः वह यह नहीं जानती कि तुम किस गोत्र के हो । मेरा नाम जबाला है और तुम्हारा नाम सत्यकाम है । इसलिए हे पूजनीय! मैं जाबाल सत्यकाम हूँ । ” तु होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधः सौम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानामबलानां चतुःशता गा निराकृत्यो- वाचेमाः सोम्यानुसंव्रजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणावर्तयेति स ह वर्षगणं प्रोवास ता यदा सहस्त्र संपेदुः ॥5 ॥

इति चतुर्थः खण्डः ॥ गौतम ने उस सत्यकाम से कहा- "ब्राह्मण के सिवा ऐसी स्पष्ट बात कोई नहीं कह सकता । अतः हे सौम्य! समिधा ले आओ, मैं तुम्हें उपवीत दूँगा, क्योंकि तुमने सत्य नहीं छोड़ा । के” फिरपीछे उपनयन करके चार सौ दुबली- पतली गायें अलग कर उसे देते हुए कहा– “ सौम्य,नहींइन । "गायोंऔर हजार जाओ । ” तब सत्यकाम बोला- “ (चार सौ की ) हजार गायें होने तक मैं लौटँगा गायें होने तक बहुत वर्ष वह वन में ही रहा । ( यहाँ चौथा खण्ड पूरा हुआ । ) ** पञ्चमः खण्डः अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद सत्यकाम 3 इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्राप्ताः सोम्य सहस्रः स्मः प्रापय न आचार्यकुलम् ॥1 ॥

बाद में सत्यकाम को ऋषभ ने बुलाकर कहा- 'हे सत्यकाम! ' तब सत्यकाम उत्तर कहा में हो गए हैं, अब हमें आचार्य ‘कहिए महानुभाव! ’ तब ऋषभ ने कहा - " अब हम हजार संख्या के घर पर ले चलो । ” प्राची ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच

पृष्ठ 234

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 234 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

192 उपनिषत्सञ्चयनम् दिक्कला प्रतीची दिक्कला दक्षिणा दिक्कलोदीची दिक्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम ॥ 2 ॥

ऋषभ ने कहा— “ मैं तुम्हें ब्रह्म के एक चरण के विषय में भी कह दूँ । ” सत्यकाम ने कहा— “ हाँ कहिए महानुभाव! ” तब ऋषभ बोला – पूर्वदिशा ब्रह्म की एक कला है, पश्चिम दिशा दूसरी कला है, दक्षिण दिशा एक और कला है और उत्तर दिशा भी एक और कला है । हे सौम्य! इन चार कलाओं से ब्रह्म का एक पाद होता है । इस पाद का नाम ' प्रकाशवान' है । स य एतमेवं विद्वाश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते प्रकाशवानस्मिँल्लोके भवति प्रकाशवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते ॥3 ॥

इति पञ्चमः खण्डः ॥ जो पुरुष इस प्रकार ब्रह्म के इस चार कलावाले पाद को प्रकाशवान मानकर जानता है और उपासना करता है, वह इस लोक में प्रकाशवान कीर्तिमान होता है और प्रकाशवाले लोकों को प्राप्त होता है । जो साधक इस चतुष्कल ब्रह्मपाद को प्रकाशवान रूप से जानता है, वह यहाँ से जाने के बाद ( मृत्यु के बाद ) प्रकाशवान लोकों को प्राप्त होता है । ( यहाँ पञ्चम खण्ड पूरा हुआ ।) षष्ठः खण्डः अग्निष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ॥1 ॥

ऋषभ ने कहा— “ अग्नि तुम्हें ब्रह्म के द्वितीय पाद के बारे में कहेगा । " दूसरे दिन सत्यकाम गायों को इकट्ठा करके आगे बढ़ने लगा । जाते-जाते शाम होने पर गायों को बाँधकर कुछ लकड़ी

लाकर अग्नि जलायी और बाद में वह अग्नि के सामने पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया ।

तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम 3 इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥2 ॥

उससे अग्नि ने कहा— ‘ हे सत्यकाम! ' तब उसने प्रत्युत्तर दिया– 'हाँ महानुभाव! ' ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच पृथिवी कलान्तरिक्षं कला द्यौः कला समुद्रः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ॥3 ॥

अग्नि ने कहा— “हे सौम्य! मैं तुम्हें ब्रह्म के एक पाद के बारे में कहूँगा । ” सत्यकाम ने कहा— ‘“ कहिए भगवान्! ” तब सत्यकाम से अग्नि ने कहा कि– “ पृथ्वी इसकी एक कला,,अन्तरिक्ष दूसरी कला है स्वर्ग फिर और एक कला है और समुद्र भी एक कला है है,!चार कलाएँ ब्रह्म के इस पाद की हैं इसका नाम अनन्तवान् है ॥ हे सोम्य ये स य एतमेवं विद्वाश्श्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्तेऽनन्त-

पृष्ठ 235

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 235 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चतुर्थोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 193 वानस्मिँल्लोके भवत्यनन्तवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाश्चतु- ष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्ते ॥4 ॥

इति षष्ठः खण्डः ॥ जो पुरुष चार कलावाले ब्रह्म के इस पाद को अनन्तवान् के रूप में उपासना करता है, वह इस जगत् अनन्त आयुवाला होता है । चार कला वाले अनन्तवान नाम के इस ब्रह्मपाद को जाननेवाला और उपासना करने वाला साधक मरण के बाद चिरस्थायी ( अनन्त ) लोकों को प्राप्त होता है । ( यहाँ छठा खण्ड पूरा हुआ ।) * सप्तमः खण्डः हसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभि- सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ॥1 ॥

अग्नि बोला— “ हंस तुम्हें ब्रह्म के अन्य पाद के विषय में कहेगा ।” दूसरे दिनको सत्यकामबाँधकर समिधगायों को साथ लेकर आगे बढ़ा । रास्ते में सायंकाल होने पर अग्नि की स्थापना की, गायों लाकर फिर अग्नि के सामने पूर्वाभिमुख बैठ गया है । त हस उपनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम 3 इति भगव इति ह प्रतिशु- श्राव ॥2 ॥

वहाँ उसके सामने उड़कर आए हुए हंस ने कहा- 'सत्यकाम!' सत्यकाम ने उत्तर दिया— ‘ हाँ भगवन्! कहिए । ’ होवाचाग्निः ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै पादो कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ॥3 ॥

।” सत्यकाम बोला- “हाँ भगवन्हंस बोला—! कहिए“हे। ”सौम्यतब!हंसतुझसेने उससेब्रह्म केकहाएक- और"अग्निपादएकके बारेकलाकलाओंमें हैकहूँगा, सेसूर्यब्रह्मदूसरीका कलायह पादहै, बनताचन्द्र तीसरी कला है और विद्युत् चौथी कला है । हे सौम्य! इन चार है । इस पाद का नाम ‘ ज्योतिष्मान्’ है ” । ज्योति- स य एतमेवं विद्वाश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्तेय एतमेवं विद्वाश्च- ष्मानस्मिँल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकाञ्जयति॥ तुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥4 इति सप्तमः खण्डः ॥ को 'ज्योतिष्मान्' के स्वरूप में जानता है— जो इस प्रकार से चार कलावाले ब्रह्म के पादहोता है । जो इस चार कलावाले ब्रह्मपाद की (उपासना करता है ), वह इस लोक में ज्योतिष्मान्है, वह ज्योतिवाले लोकों को प्राप्त होता है । ‘ ज्योतिष्मान्’ के रूप में उपासना करता (यहाँ सातवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * 13 उ०प्र०

पृष्ठ 236

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 236 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

194 उपनिषत्सञ्चयनम् अष्टमः खण्डः मद्गुष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयांचकार ता यत्राभि सायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ॥1 ॥

हंस बोला— “ तुम्हें मद्गु (एक जलचर पक्षी) ब्रह्म के अन्य पाद के विषय में कहेगा । ” दूसरे दिन सत्यकाम गायों को इकट्ठा कर गुरुगृह की ओर आगे बढ़ाने लगा । जब सायंकाल हुआ तब अग्निस्थापनकर, गायें बाँधकर, अग्नि में लकड़ी डालकर अग्नि के पास पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया । तं मद्गुरभिनिपत्याभ्युवाद सत्यकाम 3 इति भगव इति ह प्रतिशु- श्राव ॥2 ॥

मद्गु उड़कर उसके पास आकर बोला- 'हे सत्यकाम । ' उसने उत्तर दिया— ‘हाँ कहिए महानुभाव ।' ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राणः कला चक्षुः कला श्रोत्रं कला मनः कलैष वै सोम्य चतुष्कलो पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम ॥3 ॥

मृद्गु बोला— “हे सौम्य! मैं तुम्हें ब्रह्म का एक और पाद कहूँगा । " वह बोला— “ भगवन्, आप कहिए । ” तब मद्गु ने कहा - "प्राण कला है, चक्षु कला है, श्रोत्र कला है, मन कला है— इस प्रकार यह ब्रह्म का चार कलावाला पाद है, इसका नाम ' आयतनवान्' है । स य एतमेवं विद्वाश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्त आयत- नवानस्मिँल्लोके भवत्यायतनवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाश्च- तुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते ॥4 ॥

इत्यष्टमः खण्डः ॥ जो पुरुष इस तरह ‘ आयतनवान्' नामके इस चार कला वाले ब्रह्मपाद को जानकर, ( ), करता है वह इस लोक में अन्यों का आयतन आधार बनता है और जो इस तरह उपासना इस चार कलावाले ब्रह्मपाद को जानकर उपासना करता है, वह मृत्यु के बाद आश्रयवालेआयतनवान् नामके ) ( प्रदेशवाले लोकों को प्राप्त करता है । विस्तृत ( यहाँ आठवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) नवमः खण्डः प्राप हाचार्यकुलं तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकाम 3 इति भगव प्रतिशुश्राव ॥1 ॥ इति ह

अन्त में वह आचार्य के घर पर पहुँचा । उससे आचार्य ने कहा - - ‘!’ ' 'दिया जी भगवन् हे सत्यकाम । उसने प्रत्युत्तर ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वानुशशासेत्यन्ये ॥ प्रतिजज्ञे भगवास्त्वेव मे कामे ब्रूयात् ॥2 मनुष्येभ्य इति ह

पृष्ठ 237

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 237 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चतुर्थोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 195 आचार्य ने कहा— “ हे सौम्य! तुम ब्रह्मज्ञानी जैसे तेजस्वी लगते हो । तुम्हें किसने उपदेश दिया? ” सत्यकाम ने उत्तर दिया- "मनुष्यों से अन्यों ने ( देवादियों ने ) मुझे उपदेश दिया है । अब मेरी इच्छा है कि आप ही मुझे उपदेश करें । ” श्रुतः ह्येव मे भगवदृशेभ्य आचार्याद्वैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापय- तीति तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किंचन वीयायेति वीयायेति ॥3 ॥

इति नवमः खण्डः ॥ सत्यकाम ने कहा— “ मैंने आप जैसे आदरणीय पुरुषों से सुना है कि जब पुरुष किसी सुयोग्य आचार्य से उपदेश लेता है, तभी वह अच्छा फल देनेवाला होता है । ( सत्यकाम के ऐसा कहने पर गौतम ने उसे ) ऐसा ज्ञान दिया कि जिसमें कुछ भी बाकी न रह जाय । ( यहाँ नौवाँ खण्ड पूरा हुआ) । * दशम: खण्ड: उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास तस्य ह द्वादशवर्षाण्यग्नीन्परिचचार स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयस्त ह स्मैव न सभावर्तयति ॥1 ॥

कमल का पुत्र उपकोसल नाम का ब्रह्मचारी सत्यकाम जाबाल के पास बारह वर्ष तक ब्रह्मचारी के रूप में शास्त्राध्ययन करते हुए और गुरु की यज्ञाग्नि का ध्यान रखते हुए रहा । विद्याध्ययन पूरा होने पर गुरु दूसरे छात्रों को तो घर वापिस जाने की अनुज्ञा दे रहे थे, पर उपकोसल को अनुमति नहीं दे रहे थे । तं जायोवाच तप्तो ब्रह्मचारी कुशलमग्नीन्परिचचारीन्मा त्वाग्नयः परिप्रवोचन्प्रब्रूह्यस्मा इति तस्मै प्रोच्यैव प्रवासांचक्रे ॥2 ॥

तब सत्यकाम की पत्नी ने उससे कहा-" यह ब्रह्मचारी तप से क्षीण हो गया है, बड़े जतन से यज्ञाग्नियों की देखभाल भी कर रहा है । तुम्हें कहीं ये अग्नि उपालम्भ न दे दें । दे दो न इसे उपदेश । ” पर सत्यकाम ने उसे उपदेश न दिया । उल्टे प्रवास करने के लिए निकल पड़ा । स ह व्याधिनानशितुं दधे तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिन्नशान किंनु नाश्नासीति स होवाच बहव इमेऽस्मिन्पुरुषे काम नानात्यया व्याधिभिः परिपूर्णोऽस्मि नाशिष्यामीति ॥3 ॥

उपकोसल उद्विग्न हो उठा । उसने खाना बन्द कर दिया । गुरुपत्नी ने कहा- "ब्रह्मचारी! कुछ खा लो । खाते क्यों नहीं? ” उपकोसल बोला – “मुझमें बहुत- सी कामनाएँ भरी हैं, वे मुझे दूसरी ओर खींच रही हैं । मैं अनेक रोगों से भरा हूँ । मैं खाना नहीं चाहता । ” अथ हाग्नयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं नः पर्यचारीद्धन्तास्मै प्रब्रवामेति तस्मै होचुः प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति ॥4 ॥

उपकोसल के द्वारा जतन से सम्हाले ये तीन अग्नि, उसकी दशा देखकर कहने लगे—उपदेश“इस तपस्वी ब्रह्मचारी ने हमारी अच्छी सेवा की है । हमें बड़ा खेद है । हम उसे ब्रह्मविद्या का करेंगे । ” बाद में उन्होंने उपदेश दिया– “प्राण ब्रह्म है, क = सुख ब्रह्म है, ख = आकाश ब्रह्म है |

पृष्ठ 238

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 238 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

196 उपनिषत्सञ्चयनम् स होवाच विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामीति ते होचुर्यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः ॥5 ॥

इति दशमः खण्डः ॥ उपकोसल बोला — ‘“ प्राण ब्रह्म है, वह तो मैं जानता हूँ, परन्तु 'क' और 'ख' ब्रह्म वह मैं नहीं जानता । ” तब अग्नियों ने कहा- "जो 'क' है, वही 'ख' है और जो 'ख' है वही ' क' भी है । ” ऐसा कहकर अग्नियों ने उसे 'प्राण और आकाश ब्रह्म ही है'- ऐसा बोध प्रदान किया । ( यहाँ दसवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) एकादश: खण्ड: अथ हैनं गार्हपत्योऽनुशशास पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इति य एष आदित्ये पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥1 ॥

फिर गार्हपत्य अग्नि ने उपकोसल से कहा-- "" पृथ्वी, अग्नि, अन्न और आदित्य—- ये मेरे ब्रह्म के भाग हैं । जो पुरुष सूर्यमण्डल में दिखाई देता है, वह मैं हूँ, वह मैं ही हूँ । स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकीभवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जानोऽस्मिश्च लोकेऽमुष्मिच य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥2 ॥

इत्येकादशः खण्डः ॥ जो इस प्रकार गार्हपत्य को जानकर उसकी उपासना करता है, उसके सारे पाप नष्ट होते हैं, और वह गार्हपत्यलोक को प्राप्त करता है, वहाँ पूर्ण आयु भोगता है, उज्ज्वल जीवन जीता है, उसके वंशज कभी क्षीण नहीं होते, हम उसका इस लोक और परलोक में पालन करते हैं । ( यहाँ ग्यारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) द्वादश: खण्ड: अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशासापो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इति य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥1 ॥

फिर अन्वाहार्य अग्नि (दक्षिणाग्नि ने ) उपकोसल से कहा- “जल, दिशाएँ, नक्षत्र औरचन्द्रमा मेरा शरीर है । यह जो चन्द्रमा में पुरुष दिखाई देता है, वही मैं हूँ, वही मैं हूँ " । स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकीभवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जानोऽस्मिँश्च लोकेऽमुष्मिँश्च च एतमेव विद्वानुपास्ते ॥2 ॥

इति द्वादशः खण्डः ॥ जो इस प्रकार दक्षिणाग्नि को जानकर उपासना करता है, उसके सभी पाप नष्टहो जाते हैं, और

पृष्ठ 239

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 239 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

197चतुर्थोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) वह अन्वाहार्यलोक को प्राप्त होता है, वहाँ पूरी आयु भोगता है, उज्ज्वल जीवन जीता है, उसके वंशज कभी क्षीण नहीं होते, हम उसका इस लोक और परलोक में पालन करते हैं । ( यहाँ बारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * त्रयोदशः खण्डः अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास प्राण आकाशो द्यौर्विद्युदिति य एष पुरुषो विद्युति दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥1 ॥

इसके बाद उपकोसल को आहवनीय अग्नि ने कहा- "प्राण, आकाश, स्वर्ग और विद्युत् ही मेरा शरीर है । विद्युत् में जो यह पुरुष दिखाई देता है, वह मैं हूँ, मैं ही वह हूँ । ” स य एनमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकीभवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जानोऽस्मिश्च लोकेऽमुष्मिच य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥2 ॥

इति त्रयोदशः खण्डः ॥ जो मनुष्य इस प्रकार आहवनीय अग्नि को जानकर उपासना करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । वह आहवनीय अग्नि के लोक को प्राप्त होता है, वह वहाँ पूर्ण आयु भोग कर तेजस्वी जीवन जीता है । हम उसे यहाँ (इस लोक में ) और परलोक में उसका जतन करते हैं । ( यहाँ तेरहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * चतुर्दशः खण्डः ते होचुरुपकोसलैषा सोम्य तेऽस्मद्विद्याऽऽत्मविद्या चाचार्यस्तु ते गतिं वक्तेत्याजगाम हास्याचार्यस्तमाचार्योऽभ्युवादोपकोसल 3 इति ॥1 ॥

फिर उन अग्नियों ने उपकोसल से कहा – “हे उपकोसल! हे सौम्य! हमने अभी तुम्हें हमारीकी ( अग्नियों की ) विद्या कही है । यह विद्या आत्मविद्या भी है । अब तुम्हारे आचार्य उस विद्योपासना” । फिर कुछ पद्धति कहेंगे अर्थात् उपासना के द्वारा प्राप्त किया जानेवाला! ' परलोक का मार्ग बताएँगे समय बाद आचार्य ने लौटकर कहा- 'अरे उपकोसल भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वानुशशासेति को नु मानुशिष्याद्धो इतीहापेव निह्नुत इमे नूनमीदृशा॥2 ॥

अन्यादृशा इतीहाग्नीनभ्युदे किं नु सौम्य किल तेऽवोचन्निति तब उपकोसल ने उत्तर दिया– “ हाँ भगवन्! ” तब आचार्य ने कहा-?“हे” सौम्यउपकोसल! तुम्हाराबोला—मुख तो ब्रह्मज्ञानी की तरह प्रकाशवान दीख पड़ता है । तुम्हें किसने उपदेश दिया था । फिर अग्नियों के “मुझे भला कौन उपदेश देगा? ” ऐसा कहकर मानो वह कुछ छिपाना येचाहताऐसे (उपदेशक ) हो गए । ” “ ( ),! बारे में कहने लगा— पहले ये अग्नि अलग प्रकार के थे और अब सौम्य इन अग्नियों ने ऐसा कहकर उसने अग्नियों की ओर संकेत किया । तब आचार्य ने पूछा – “ तुम्हें क्या सिखाया? ”

पृष्ठ 240

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 240 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

198 उपनिषत्सञ्चयनम् इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान्वाव किल सोम्य तेऽवोचन्नहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच ॥3 ॥

इति चतुर्दशः खण्डः ॥ उपकोसल ने उत्तर दिया– “उन्होंने ऐसा ऐसा कहा ।" ( इस प्रकार उसने आचार्य को अग्नि द्वारा दिए हुए सब उपदेश बताए) । तब आचार्य ने कहा- "हे सौम्य! उन्होंने तुम्हें केवल लोकों के बारे में ही बताया है । परन्तु मैं तुम्हें ब्रह्म के विषय में बताऊँगा । जिस तरह कमलपत्र के पानी कभी ठहरता नहीं है, ठीक उसी प्रकार उस ब्रह्म को जाननेवाले को पाप कभी स्पर्श नहींऊपरकर सकता । ” तब उपकोसल ने कहा- " आप महानुभाव मुझे यह कहिए ।" इस पर आचार्य ने कहा- ( यहाँ चौदहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) पञ्चदश: खण्ड: य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तद्यद्यप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चन्ति वर्त्मनी एव गच्छति ॥1 ॥

“ आँख में जो यह पुरुष दिखाई देता है, वह आत्मा है । यह (आत्मा ) अमर है, निर्भय है ब्रह्म है । इसीलिए यदि कोई इस ( आँख ) में घी या पानी डालता है, तो वह आँख की पलकों, वही ( ) निकल जाता है आँख के साथ उसका कोई सम्बन्ध नहीं होता । से बाहर एत संयद्वाम इत्याचक्षत एतः हि सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति सर्वाण्येनं वामान्यभिसंयन्ति य एवं वेद ॥ 2 ॥

इसे ज्ञानी लोग ‘ संयद् वाम' कहते हैं । क्योंकि जो कुछ अच्छा और सुन्दर है । जो पुरुष इस तत्त्व को जानता है, उसे सब सुन्दर और सब उत्तम ही मिलताहै,है वह। वामइसमें मिलता,, ) ( आकर्षक सुन्दर इच्छित आदि होता है । का अर्थ एष उ एव वामनीरेष हि सर्वाणि वामानि नयति सर्वाणि वामानि नयति य एवं वेद ॥3 ॥

आँख में दिखाई देनेवाला यह पुरुष ही 'वामनी' है ('वामनी फलदाता होता है ) क्योंकि वही सभी लोगों को शुभ कार्यों की ' का अर्थ शुभ कर्मों का समुचित अक्षिपुरुष को इस प्रकार से जानता है, उसको सभी शुभ कर्म प्राप्तओर प्रेरितहो जातेकरताहैं । है । जो पुरुष इस एष उ एव भामनीरेष हि सर्वेषु लोकेषु भाति सर्वेषु लोकेषु भाति वेद ॥4 ॥ य एवं

यही अक्षिपुरुष ‘भामनी ’ (प्रकाशक) है, क्योंकि यही सभी साधक इसको ऐसा जानता (उपासना करता ) है, उसे सभी प्रकाशलोकों को प्रकाशित करता है । जो मिल जाते हैं । अथ यदु चैवास्मिञ्छव्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेवाभिसंभवन्यर्चिषो- ऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्गेति सेभ्यः संवत्सरः संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं मासास्तान्मा- चन्द्रमसो विद्युतं