Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 241–250

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

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199चतुर्थोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) तत्पुरुषोऽमानवः । स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते नावर्तन्ते ॥5 ॥

इति पञ्चदशः खण्डः ॥ इसके बाद ऐसे ज्ञानियों के मरण के बाद उनकी उत्तरक्रियाएँ की गई हों या न की गई हों, पर वे अर्चिष ( तेज ) को ही प्राप्त होते हैं, अर्चिष से वे दिवसाभिमानी देव को प्राप्त होते हैं, दिवसदेव से शुक्लपक्ष को शुक्लपक्ष से उत्तरायण के जो छ: मास हैं उनको, उन मासों से संवत्सर को, संवत्सर से आदित्य को आदित्य से चन्द्रमा को, चन्द्रमा से वे विद्युत् को प्राप्त हो जाते हैं । वहाँ कोई अमानवीय पुरुष उन्हें ब्रह्मतत्त्व को प्राप्त करवाता है । यही देवमार्ग है, यही ब्रह्ममार्ग है । इसको प्राप्त होनेवाले ज्ञानी फिर इस मानुषी ( मर्त्य ) लोक के गमनागमन में नहीं आते । ( यहाँ पंद्रहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) षोडशः खण्डः एष ह वै यज्ञो योऽयं पवत एष ह यन्निदः सर्वं पुनाति यदेष यन्निद’ सर्वं पुनाति तस्मादेष एव यज्ञस्तस्य मनश्च वाक्च वर्तनी ॥1 ॥

जो यह बहता ( चलता है ) यह वायु ही यज्ञ है । वह बहता हुआ वायु ही सारे जगत् को पवित्र (स्वच्छ) कर देता है | और चूँकि बहता हुआ यह सारे जगत् को पवित्र ( स्वच्छ ) कर देता है इसीलिए यह यज्ञ है । मन और वाणी इसके मार्ग हैं । तयोरन्यतरां मनसा सस्करोति ब्रह्मा वाचा होताध्वर्युरुद्गाता- न्यतरास यनोपाकृते प्रातरनुवाके पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यववदति ॥2 ॥

उन दो मार्गों में से एक मार्ग का ब्रह्मा ऋत्विक् मन से संस्कार करता है औरअवस्थाहोता, अध्वर्युमें वह एवं उद्गाता— ये तीन ऋत्विज दूसरे मार्ग का वाणी से संस्कार' ऋचाकरते काहैं जप। ऐसीकरने से पहले बोल ब्रह्माऋत्विज् ‘प्रातरनुवाक' कर्म का प्रारंभ होते ही और 'परिधानीया उठते हैं । ( तब— ) अन्यतरामेव वर्तनी सस्करोति हीयतेऽन्यतरा स यथैकपाद्व्रजन्रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो रिष्यत्येवमस्य यज्ञो रिष्यति यज्ञः रिष्यन्तं यज- मानोऽनुरिष्यति स इष्ट्वा पापीयान्भवति ॥3 ॥

का संस्कार तो ( केवल ब्रह्मा के ही बोलने पर तो) ब्रह्मा केवल एक ही मार्ग अभाव सेदूसरा मार्ग मार्ग बाकी रह जाता है ) और अन्य ऋत्विजों के कार्यों के रथ नष्ट ह जिस तरह एक पैर से चलनेवाला पुरुष अथवा एक ही पहिए से चलनेवाला का नाश होने के बाद यजमान इसी तरह उसका (यजमान का) यज्ञ भी नष्ट ही हो जाता है । यज्ञ अधिक पापी होता जाता है । नाश हो जाताअथहै । यत्रोपाकृतेऐसे यज्ञ किएप्रातरनुवाकेजाने से वहन उत्तरोत्तरपुरा परिधानीयाया॥4 ॥ ब्रह्मा व्यववदत्युभे

एव वर्तनी सश्स्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरा

पृष्ठ 242

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200 उपनिषत्सञ्चयनम् बाद में यदि ‘प्रातरनुवाक' का प्रारंभ होने के बाद एवं 'परिधानीया' ऋचा के पहले यदि ब्रह्मा न बोलता हो, तब तो सब ऋत्विज् मिलकर दोनों मार्गों का संस्कार कर देते हैं, किसी मार्ग का नाश नहीं होता । स यथोभयपद्व्रजन्रथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान्भवति ॥5 ॥

इति षोडशः खण्डः ॥ जिस तरह दोनों पैरों से चलनेवाला पुरुष अथवा दोनों चक्रों से चलनेवाला रथ स्थित रहता है, ठीक उसी तरह उसका यज्ञ स्थित रहता है । यज्ञ के स्थित होने से यजमान भी स्थित रहता है । ऐसा यज्ञ करके वह श्रेष्ठ होता है । ( यहाँ सोलहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) सप्तदश: खण्ड: प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेषां तप्यमानानाः रसान्प्रावृहदग्निं पृथिव्या वायुमन्तरिक्षादादित्यं दिवः ॥1 ॥

प्रजापति ने लोकों का सारतत्त्व जानने के लिए तप किया । इससे उन्होंने पृथ्वी अग्नि को, अन्तरिक्ष के सारतत्त्व वायु को और स्वर्ग के सारतत्त्व आदित्य को जाना । के सारतत्त्व स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत्तासां तप्यमानानाः रसान्प्रावृहदग्नेर्ऋचो वायोर्यजुषि सामान्यादित्यात् ॥2 ॥

इन तीन देवताओं का सारतत्त्व जानने के लिए उन्हें लक्ष्य कर प्रजापति इससे उन्होंने अग्नि से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद और आदित्य से सामवेद को साररूपने फिरमेंसेजानातप किया । ग्रहण किया । अर्थात् स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत्तस्यास्तप्यमानाया रसान्प्रावृहद् भूरित्यृग्भ्यो भुवरिति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः ॥3 ॥

प्रजापति ने तीनों विद्याओं का सारतत्त्व जानने के लिए फिर कि ऋग्वेद का सार ‘ भू: ’ है, यजुर्वेद का सार 'भुव: ' है और सामवेदसे तप किया । इससे उन्होंने जाना का सार 'स्व: ' है । तद्यद्ध्यृक्तो रिष्येद्भूः स्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयादृचामेव वीर्येणर्चा यज्ञस्य विरिष्ट सन्दधाति ॥4 ॥ तद्रसेनर्चां

इसलिए ऋग्वेद - मंत्रों में क्षति चाहिए । ऋग्वेद के उस सारतत्त्व से होने, ऋग्वेदपर, 'भूःके स्वाहावीर्य '( महत्त्वऐसा )बोलकरसे गार्हपत्य अग्नि में होम करना ( ) ( )अवश्य ही वह ब्रह्मा ऋत्विज् पूर्ण कर देता है । यजमान के यज्ञ की क्षति को अथ यदि यजुष्टो रिष्येद् भुवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौजुहुयाद्यजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषां यज्ञस्य विरिष्ट सन्दधाति ॥5 ॥

यदि यजुः श्रुतियों से क्षति हुई हो, तो ' भुव: स्वाहा' ऐसा बोलकरदक्षिणाग्नि में होम करना

पृष्ठ 243

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चतुर्थोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 201 चाहिए । इस तरह यजुषों के रस से, यजुषों के प्रभाव द्वारा यज्ञ की यजुः सम्बन्धी क्षति को ब्रह्मा दूर करते हैं । अथ यदि सामतो रिष्येत्स्वः स्वाहेत्याहवनीये जुहुयात्साम्नामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां यज्ञस्य विरिष्ट सन्दधाति ॥6 ॥

यदि साम श्रुतियों के कारण कोई गलती हो, तो 'स्व: स्वाहा' – ऐसा बोलकर आहवनीय अग्नि में होम करना चाहिए । इस तरह सामों के रस से, सामों के महत्त्व से यज्ञ की साम सम्बन्धी क्षति ब्रह्मा (ऋत्विज्) पूर्ण कर देता है । तद्यथा लवणेन सुवर्णः संदध्यात्सुवर्णेन रजतः रजतेन त्रपु त्रपुणा सीस सीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा ॥7 ॥

इसमें ऐसा समझना चाहिए कि जैसे क्षार से सोना, सोने से रजत, रजत से रांगा, रांगे से सीसा, सीसे से लोहा तथा लोहे से काष्ठ को और चमड़े से काष्ठ को जोड़ा जाता है । एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्ट संदधाति भेषजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवति ॥8 ॥

उसी प्रकार इन लोकों, देवताओं और त्रयी विद्या के प्रभाव से यज्ञ के क्षत को जोड़ा जाता है । जिस यज्ञ में इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा (ऋत्विज्) होता है, वह अवश्य ही मानो औषधियों ( आहुतियों ) के द्वारा सुसंस्कृत होता है । एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद् ब्रह्मा भवत्येवंविदः ह वा एषा ब्रह्माणमनु गाथा यतो यत आवर्तते तत्तद्गच्छति ॥9 ॥

जिस यज्ञ में ऐसा जानकार ब्रह्मा (ऋत्विज्) होता है, वह यज्ञ उत्तरमार्ग की प्राप्ति का कारण होता है । ऐसी जानकारी रखनेवाले ब्रह्मा की स्तुति के लिए ही कहा गया है कि ( यह गाथा है कि— ) ‘“ जहाँ - जहाँ यज्ञकर्म आवृत्त (क्षतियुक्त ) होता है, वहाँ उस क्षति (कमी ) की पूर्ति करनेवाला ब्रह्मा (ऋत्विज् ) आ जाता है । " मानवो ब्रह्मैवैक ऋत्विक्कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानः सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥10 ॥

इति सप्तदशः खण्डः ॥ इति छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थोऽध्यायः ॥4 ॥

को वही सच्चा ब्रह्मा (ऋत्विज्) है, जो मननशील और शान्तिप्रिय हो । जैसे युद्ध में योद्धाओं) यजमान अश्वा ( घोड़ी ) हर तरह से बचा लेती है, वैसे ही यह पूरी जानकारी रखनेवाला ब्रह्मा को(ऋत्विज्ही ब्रह्मा बनाना एवं अन्य ऋत्विजों की भी हर तरह से रक्षा करता है । इसलिए ऐसा जाननेवाले नहीं बनाना चाहिए | चाहिए, नहीं जाननेवाले को ब्रह्मा नहीं बनाना चाहिए, नहीं जाननेवाले को ब्रह्मा ( यहाँ सत्रहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) यहाँ छान्दोग्योपनिषद् का चौथा अध्याय समाप्त हुआ ।

पृष्ठ 244

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202 उपनिषत्सञ्चयनम् अथ पञ्चमोऽध्यायः प्रथमः खण्डः ॐ यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥1 ॥

जो सबसे बड़े को और सबसे ज्यादा गुणवाले को जान लेता है, वह स्वयं ही सबसे बड़ा और सबसे अधिक गुणवाला हो जाता है । प्राण ही इन्द्रियों में सबसे बड़ा और सबसे अधिक गुणवाला है । यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग्वाव वसिष्ठः ॥2 ॥

जो कोई वसिष्ठ को ( धनवान को - आच्छादक को ) जानता है, वह स्वयं अपनी जातियों में स्थायी ( धनवान अर्थात् सब पर छा जानेवाला) होता है । सचमुच वाणी ही वसिष्ठ है । यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिश्च लोकेऽमुष्मिच चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥3 ॥

जो कोई प्रतिष्ठा को जानता है, वह इस लोक में और परलोक में प्रतिष्ठित होता है । चक्षु ही प्रतिष्ठा है ।1 यो ह वै सम्पदं वेद सहास्मै कामाः पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव सम्पत् ॥4 ॥

जो कोई संपत् को जानता है, उसको सभी दैवी और मानुष कामभोग आ मिलते हैं । श्रोत्र ही

वह संपत् है ।

यो ह वा आयतनं वेदायतनः ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥5 ॥

जो कोई आयतन ( आश्रय) को जानता है, वह स्वजनों का आश्रय होता है । सचमुच मन ही

आयतन ( आश्रय ) है ।

अथ ह प्राणा अहः श्रेयसि व्यूदिरेऽह श्रेयानस्म्यह श्रेयानस्मीति ॥6 ॥

एक बार सभी इन्द्रियाँ “ मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ ".'- इस प्रकार अपनी- अपनी श्रेष्ठता के लिए वाद- विवाद करने लगीं । ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन्को नः श्रेष्ठ इति तान्होवाच यस्मिन्व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति॥ 7 ॥

वे इन्द्रियाँ अपने पिता प्रजापति के पास जाकर कहने लगीं कि— “हे भगवन्! हममें 1 श्रेष्ठ है? ” तब प्रजापति ने उनसे कहा – “ तुममें से जिसके चले जाने से शरीर शव की तरह से कौन अपवित्र दिखाई दे, वह तुममें से श्रेष्ठ है । " साह वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा कला अवदन्तः प्राणन्तः शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेशप्राणेनह वाक्पश्यन्तश्चक्षुषा॥8 ॥

पहले वाणी शरीर से बाहर चली गई । एक वर्ष तक शरीर से बाहर रहकर लौटकरउसने अन्यों

पृष्ठ 245

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पञ्चमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 203 से पूछा– “ मेरे बिना तुम ( सब अन्य इन्द्रियाँ ) कैसे जी सकीं? ” तब अन्य इन्द्रियों ने उत्तर दिया— “ जैसे गूँगे लोग न बोलते हुए भी नाक से श्वास लेते हुए, आँखों से देखते हुए, कान से सुनते हुए और मन से विचार करते हुए जीते हैं, उसी प्रकार हम जी सकीं" । तब वाणी फिर से शरीर में प्रविष्ट हो गई । चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथान्धा अपश्यन्तः प्राणान्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ १ ॥

फिर चक्षुरिन्द्रिय शरीर से बाहर निकल गई । एक वर्ष तक शरीर से बाहर रहकर वापस लौटकर उसने अन्य इन्द्रियों से पूछा- " मेरे बिना तुम किस तरह जी सकीं? इन्द्रियों ने उत्तर दिया– “जैसे अन्धे लोग नासिका से श्वास लेते हुए, वाणी से बोलते हुए, कान से सुनते हुए और मन से विचार करते हुए जीते हैं, वैसे ही हम जी सकीं । " ऐसा सुनकर चक्षुरिन्द्रिय ने फिर से शरीर में प्रवेश किया । श्रोत्र होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकर्ते मज्जीवितुमिति यथा बधिरा अशृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥10 ॥

बाद में श्रोत्रेन्द्रिय शरीर से बाहर निकल गई । एक वर्ष तक शरीर से बाहर रहकर फिर लौटकर उसने अन्य इन्द्रियों से पूछा- " मेरे बिना तुम किस तरह जी सकीं? तब अन्य इन्द्रियों ने उत्तर दिया-"जैसे बहरे लोग न सुनते हुए भी नासिका से श्वास लेते हुए, वाणी से बोलते हुए, आँखों से देखते हुए और मन से विचार करते हुए जीते हैं, वैसे ही हम जी सकीं ।" ऐसा सुनकर श्रोत्रेन्द्रिय ने भी वापस शरीर में प्रवेश कर लिया । मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवि- तुमिति यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्च- क्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥11 ॥

फिर मन शरीर को छोड़कर चला गया । एक वर्ष तक दूर रहकर वापिस आकर अन्य अवयवों से वह बोला- “मेरे बिना तुम लोग कैसे जी सकीं? ” तब उन्होंने कहा— “जिस प्रकार बच्चे विचारहीन होते हुए भी नाक से श्वास लेकर, वाणी से बोलकर, आँखों से देखकर, कानों से सुनकर जीते हैं, वैसे ही हम जी सके ।" यह सुनकर मन ने फिर से शरीर में प्रवेश कर लिया । अथ ह प्राण उच्चिक्रमिषन्त्स यथासुहयः पड्वीशशकून्संखिदेदेव- मितरान्प्राणान्समखिदत्तः हाभिसमेत्योचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥12 ॥

अब जब प्राण ने शरीर छोड़ना चाहा, तब जैसे ऊँची जाति का कोई घोड़ा पैर बाँधने। बादके मेंखूँटोंउन को भी उखाड़ डालता है, वैसे ही उसके निकलने से अन्यान्य इन्द्रियाँ भी उखड़ने। आपलगीं इस शरीर में - "! ” इन्द्रियों ने प्राण से कहा हे महानुभाव आप हमारा स्वामित्व स्वीकार। करेंवापस लौट जाइए, आप हम सबमें श्रेष्ठ हैं । बाहर मत जाइए वाचअथ हैनंयदहंवागुवाचप्रतिष्ठास्मियदहंत्वंवसिष्ठोऽस्मितत्प्रतिष्ठासीतित्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ॥13 ॥ हैनं चक्षुरु-

पृष्ठ 246

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204 उपनिषत्सञ्चयनम् फिर उस (प्राण ) से वागिन्द्रिय ने कहा– “ मैं जो वसिष्ठ ( धनवान) हूँ वह वसिष्ठ ( धनवान ) आप ही हैं । फिर चक्षुरिन्द्रिय ने उससे कहा – “ मैं जो प्रतिष्ठा (स्थिति) हूँ वह प्रतिष्ठा (स्थिति) आप ही हैं ” । अथ हैनं श्रोत्रमुवाच यदह संपदस्मि त्वं तत्संपदसीत्यथ हैनं मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥14 ॥

फिर श्रोत्रेन्द्रिय ने उससे कहा- "मैं जो संपत् हूँ, वह संपत् आप ही हैं । बाद में मन ने उससे कहा कि— “ मैं जो आयतन हूँ, वह आयतन भी आप हैं । न वै वाचो न चक्षूषि न श्रोत्राणि न मनासीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवन्ति ॥15 ॥

इति प्रथमः खण्डः ॥ लोग इन इन्द्रियों को वाणी, चक्षु, श्रोत्र, मन आदि नहीं कहते अपितु सभी को ' प्राण' ( शब्द से) कहते हैं । क्योंकि प्राण ही इन सभी इन्द्रियों के रूप में सम्बोधित होता है । ( यहाँ पहला खण्ड पूरा हुआ । ) * द्वितीयः खण्डः स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किंचिदिदमा श्वभ्य आ शकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतदनस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किंचनानन्नं भवतीति ॥1 ॥

प्राण ने इन्द्रियोंसे कहा—-'"मेरा अन्न ( भोग) क्या होगा? ” इन्द्रियों ने कहा –-‘' “हे भगवन् कुत्तों से लेकर, पक्षियों से लेकर, सब जीवों का जो कुछ भी अन्न है, वही आपका भोग ( भोग्य आहार ” ' ' (‘ ) होगा । इसलिए यह सब अन्न प्राण का ही अन्न है । प्राण का प्रत्यक्ष नाम अन है । इस धातु के आगे प्र वि उद् सम् अप् उपसर्ग लगने से क्रमश: प्राण, व्यान, उदान, समान अन् गतौ ’ ) ' ’ ‘ ’ | शब्द बनते हैं । ऐसा जाननेवाले के लिए कुछ भी अनन्न अनाहार नहीं है और अपान स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ 2 ॥

तब प्राण ने इन्द्रियों से पूछा- "मेरा वस्त्र क्या होगा? ” इन्द्रियों होगा । ” इसीलिए तो भोजन करने वाले भोजन से पहले और भोजन करनेने कहा– “जल आपका वस्त्र से प्राण का आस्तरण और आच्छादन करते हैं । ऐसा करनेवाला व्यक्ति के बाद भी पानी के आचमन ‘ ' ' ' ( में ॐ अमृतोपस्तरणमसि और ॐ अमृतापिधानमसि ऐसे भोजन से पहले और बादवस्त्र प्राप्त करनेवाला होता है, वह कभी नग्न नहीं रहता । मंत्रपूर्वक आचमन करनेवाला व्यक्ति) तद्धैतत्सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच च्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः यद्यप्येत- नीति ॥3 ॥ प्ररोहेयुः पलाशा-

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पञ्चमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 205 यह प्राणविद्या सत्यकाम जाबाल ने वैयाघ्रपद्य गोश्रुति से कहकर फिर कहा- “ यदि यह प्राण-विद्या सूखे हुए ठूंठे को भी सुनाई जाए, तो उसमें से भी डालियाँ और पत्ते भी फूट निकलेंगे । अथ यदि महज्जिगमिषेदमावास्यायां दीक्षित्वा पौर्णमास्याः रात्रौ सर्वौष- धस्य मन्थं दधिमधुनोरुपमथ्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् ॥4 ॥

प्राणविद्या के बोध के बाद यदि कोई महत्त्व की (बड़प्पन की प्राप्ति करना चाहे, तो अमावास्या के दिन दीक्षा लेकर, पूर्णिमा की रात्रि में सभी प्रकार की औषधियों को बारीक कूटकर उसे लकड़ी के बरतन में मधु और दही के साथ मन्थन कर (घोंटकर) –'ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहा' — यह मंत्र पढ़कर घी का अग्नि में होम करने के बाद स्रुव में से टपकता हुआ घी उस मन्थ में डालना चाहिए । वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् संपदे स्वाहेत्यग्नावा- ज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् ॥5 ॥

‘वसिष्ठाय स्वाहा' – यह मन्त्र बोलकर अग्नि में घी की आहुति देकर बाद में घी को उस मन्थ में टपकाना चाहिए । ‘ प्रतिष्ठायै स्वाहा' – इस मंत्र को बोलकर अग्नि में घी की आहुति डालकर बाद में वह घी उस मन्थ में टपकाना चाहिए । 'सम्पदे स्वाहा' – यह मंत्र बोलकर पहले अग्नि में उस घी की आहुति देकर बाद में घी को उस मन्थ में टपकाना चाहिए । ' आयतनाय स्वाहा' - यह मंत्र बोलकर अग्नि में घी की आहुति देनी चाहिए फिर उस स्रुव में रहे (बचे हुए ) घी को उस मन्थ में टपकाना चाहिए | अथ प्रतिसृष्याञ्जलौ मन्थमाधाय जपत्यमो नामास्यमा हि ते सर्वमिद‍ स हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाधिपतिः स मा ज्यैष्ठ्यः श्रैष्ठ्यः राज्यमाधिपत्यं गमयत्वहमेवेदः सर्वमसानीति ॥6 ॥

हवन के बाद थोड़ा दूर खिसकर मंथ को अंजलि में लेकर स्तुति करनी चाहिए— “हे मन्थ,! तू ‘ अम' नामवाला है । क्योंकि यह सारा जगत् अपने प्राणभूत रूप में तुझमें रहा है । वह, जिससेतू ज्येष्ठमैं श्रेष्ठ, दीप्तिमान और सर्वाधिपति है । तू मुझे ज्येष्ठत्व, श्रेष्ठत्व, राज्य और' आधिपत्यसे लेकर ‘दोआसानि’ तक यह ऐश्वर्य पा सकूँ । ” ( यह मूल मंत्र ऊपर की कण्डिका में— ' अमो नामासि दिया है ) । अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति तत्सवितुर्वृणीमह इत्याचामतितुरं भगस्यवयं देवस्य भोजनमित्याचामति श्रेष्ठः सर्वधातममित्याचामति संविशति धीमहीति सर्वं पिबति । निर्णिज्य कसं चमसं वा पश्चादग्नेःपश्येत्समृद्धं चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः । स यदि स्त्रियं कर्मेति विद्यात् ॥7 ॥

मन्थ का प्राशन करना इसके बाद आगे कही जाने वाली ऋचा का एक-एक, चरण( 2 ) वयंबोलकरदेवस्य भोजनम्, ( 3 ) श्रेष्ठं चाहिए अर्थात् खाना चाहिए । यथा— ( 1 ) तत्सवितुर्वृणीमहेअन्तिम चौथे चरण को बोलकर कांस्यपात्र अथवा सार्वधातमम्, ( 4 ) तुरं भगस्य धीमहि । इस प्रकार । इसके बाद मृगचर्म पर या पवित्र यज्ञभूमि पर चमस में रखा हुआ सब मन्थ धोकर पी जाना चाहिए

पृष्ठ 248

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206 उपनिषत्सञ्चयनम् वाणी का संयम रखते हुए अर्थात् अनिष्ट स्वप्नदर्शनादि से अभिभूत न होते हुए चित्त को शान्त करके सो जाना चाहिए । यदि स्वप्न में स्त्री दिखाई दे तो कार्य सफल हो गया है, ऐसा समझना चाहिए । तदेष श्लोकः– यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियः स्वप्नेषु पश्यति । समृद्धिं

तत्र जानीयात्तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने । तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने इति ॥8 ॥

इति द्वितीयः खण्डः ॥

इस विषय में यह श्लोक है— जब काम्य कर्मों में स्वप्न में कोई स्त्री को देखता है, तब समृद्धि जाननी चाहिए अर्थात् कार्य की सफलता जाननी चाहिए । ( यहाँ दूसरा खण्ड पूरा हुआ । ) तृतीयः खण्डः श्वेतकेतुर्हारुणेयः पञ्चालाना समितिमेयाय तह प्रवाहणो जैबलिरुवाच कुमारानु त्वाशिषत्पितेत्यनु हि भगव इति ॥1 ॥

आरुणि का पुत्र श्वेतकेतु एक बार पंचालों की सभा में आया । उससे जैबलिपुत्र प्रवाहण ( राजा ) ने पूछा— “कुमार! तुम्हारे पिता ने तुम्हें उपदेश दिया है क्या? " श्वेतकेतु बोला- “हाँ, भगवन्! मेरे पिता ने मुझे उपदेश दिया है ” । वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति न भगव इति वेत्थ यथा पुनरावर्तन्त 3 इति न भगव इति वेत्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना 3 इति न भगव इति ॥2 ॥

फिर प्रवाहण ने पूछा— “ मरने के बाद मनुष्य कहाँ जाते हैं, वह तू जानता है? ” उसने कहा— “ नहीं भगवन् ” । प्रवाहण ने पूछा– “ वहाँ से वे किस तरह लौटते हैं वह तू जानता है? ” श्वेतकेतु ने कहा— “ नहीं भगवन्! ” प्रवाहण ने पूछा–“देवयान और पितृयाण– ये दो मार्ग कहाँ से अलग होते हैं, वह तू जानता है?" श्वेतकेतु ने कहा- “ नहींभगवन् । ” वेत्थ यथासौ लोको न संपूर्यत 3 इति न भगव इति वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति नैव भगव इति ॥3 ॥

प्रवाहण ने कहा— “ मरे हुए लोगों से पितृलोक क्यों भर नहीं जाता, वह तू “ ” – “ '? श्वेतकेतु बोला— नहीं भगवन् । प्रवाहण ने पूछा पाँचवीं आहुति जानता है क्या जीववाचक कैसे बन जाता है, वह तू जानता है क्या? श्वेतकेतु ने कहामें-जल" पुरुषवाचक अथवा नहीं भगवन्” । अथानु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात्कथसोऽनुशिष्टो ब्रुवीतेति स हायस्तः पितुरर्धमेयाय त होवाचाऽननुशिष्य वाव मा भगवानब्रवीदनु त्वाशिषमिति ॥4 ॥ किल

प्रवाहण ने कहा— “ यदि तू कुछ भी नहीं जानता तो, ' मेरे पिता? ” 'कहा प्रवाहण के ऐसा कहने से श्वेतकेतु खिन्न हो गया । ने मुझे पढ़ाया ऐसा कैसे तूनेकहने लगा— “पूर्ण उपदेश दिए बिना ही आपने मुझे ऐसा क्योंयहकहापिताकिके मैंनेपास वापिस आया और तुझे पढ़ा दिया है?

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पञ्चमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 207 पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत्तेषां नैकंचनाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं तदैतानवदो यथाहमेषां नैकंचन वेद यद्यहमिमा- नवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥5 ॥

“ उस क्षत्रियबन्धु ने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे थे । उनमें से एक का भी उत्तर मैं न दे सका । ” तब पिता ने कहा– “ तूने आते ही ये जो प्रश्न मुझे सुनाए, उनमें से एक का भी उत्तर मैं नहीं जानता । यदि जानता होता तो भला क्यों तुझे न बताया होता? मैं स्वयं ही उत्तर नहीं जानता । ” सह गौतम राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायार्हांचकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय त होवाच मानुषस्य भगवन्गौतम वित्तस्य वरं वृणीथा इति स होवाच तवैव राजन्मानुषं वित्तं यामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तामेव ब्रूहीति । सह कृच्छ्रीबभूव ॥6 ॥

इसके बाद, गौतमगोत्रीय आरुणि ऋषि प्रवाहण राजा के पास गए । राजा ने उनकी आदरपूर्वक पूजा की । दूसरे दिन प्रात: काल में ऋषि राजा की सभा में गए । तब राजा ने उनसे कहा— “ मनुष्य सम्बन्धी धनधान्यादि जो कुछ भी चाहिए, सो माँग लीजिए । ” तब ऋषि ने कहा— “हे राजन्! धनधान्यादि मनुष्य सम्बन्धी सब कुछ आपके पास ही रहने दीजिए । जो प्रश्न आपने मेरे पुत्र से पूछे थे, उन्हीं के सम्बन्ध में मुझे कहिए ।" तब राजा (सोच में पड़ गया कि यह विद्या इस ब्राह्मण को कैसे दी जाए? इसलिए) दुःखी हो गया । त ह चिरं वसेत्याज्ञापयांचकार त होवाच यथा मा त्वं गौतमावदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान्गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति तस्मै होवाच ॥7 ॥

इति तृतीयः खण्डः ॥ प्रवाहण ने ऋषि को आज्ञा की कि "यहाँ लम्बे समय तक रहिए । " और आगे कहा कि— "पूर्व काल में आपसे पहले यह अग्निविद्या ब्राह्मणों में नहीं गई है । इसीलिए सभी लोकों में क्षत्रियों का ही प्रशासन चल रहा था " । ऐसा कहकर वे गौतम को इस विद्या का उपदेश देने लगे । ( यहाँ तीसरा खण्ड पूरा हुआ । ) * चतुर्थः खण्डः असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहर- र्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गा ॥ 1 ॥।

हे गौतम! यह प्रसिद्ध द्युलोक ही अग्नि है, आदित्य ही उसकी समिध है, किरणें धुआँ हैं, दिन ही ज्वाला है, चन्द्रमा अंगारे हैं और नक्षत्र चिनगारियाँ हैं । तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुतेः सोमो राजा संभवति ॥2 ॥

इति चतुर्थः खण्डः ॥

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208 उपनिषत्सञ्चयनम् उस द्युलोक नामक अग्नि में देवलोग श्रद्धा का हवन करते हैं । उस आहुति से सोम राजा उत्पन्न होते हैं । ( यहाँ चौथा खण्ड पूरा हुआ । ) ** पञ्चमः खण्डः पर्जन्यो वाव गौतमाग्निस्तस्य वायुरेव समिदभ्रं धूमो विद्युदर्चिरशनिर- ङ्गारा ह्रादनयो विस्फुलिङ्गाः ॥1 ॥

पर्जन्य ( वर्षा के देव ) ही अग्नि हैं, हे गौतम! उसका समित् वायु है, बादल धुआँ है, विद्युत् उसकी ज्वाला है, इन्द्र का वज्र अंगारे हैं और मेघ की गड़गड़ाहट ही चिनगारियाँ हैं । तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमः राजानं जुह्वति तस्या आहुतेर्वर्ष सम्भवति ॥2 ॥

इति पञ्चमः खण्डः ॥ उस अग्नि में देवगण राजा सोम के निमित्त हवन करते हैं । उस आहुति से वर्षा उत्पन्न होती है । ( यहाँ पाँचवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) षष्ठः खण्डः पृथिवी वाव गौतमाग्निस्तस्याः संवत्सर एव समिदाकाशो धूमो रात्रि- रर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गाः ॥1 ॥

हे गौतम! पृथ्वी ही अग्नि है, संवत्सर उसका समित् है, आकाश धुआँ है, रात्रि ज्वालाएँ हैं,

दिशाएँ अंगारे हैं और अग्नि आदि अवान्तर दिशाएँ चिनगारियाँ हैं ।

तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्षं जुह्वति तस्या आहुतेरन्नः संभवति ॥2 ॥

इति षष्ठः खण्डः ॥

उस अग्नि में देवलोग वर्षा के निमित्त हवन करते हैं । इस आहुति से अन्न उत्पन्न होता है । ( यहाँ छठा खण्ड पूरा हुआ । ) सप्तम: खण्ड: पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेव समित्प्राणो धूमो जिह्वार्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः ॥1 ॥

हे गौतम! पुरुष ही अग्नि है, उसकी वाणी ही समित् है, प्राण धुआँ है, जिह्वा ज्वालाएँ हैं,

चक्षु अंगारे हैं और श्रोत्र चिनगारियाँ हैं ।

तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्था आहुते रेतः संभवति ॥2 ॥

इति सप्तम खण्डः ॥।