Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 251–260

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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पञ्चमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 209 उस अग्नि में देवलोग अन्न के निमित्त हवन करते हैं, उस आहुति से वीर्य उत्पन्न होता है । ( यहाँ सातवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) अष्टमः खण्डः योषा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समिद्यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः ॥1 ॥

हे गौतम! स्त्री अग्नि है, उपस्थ (जननेन्द्रिय ) उसका समित् है, पुरुष जो उसका उपमंत्रण करता है ( उसको प्रेरणा देता है ) वह धूम है, योनि ज्वालाएँ हैं, स्त्री- पुरुष का सम्मिलन ही अंगारे हैं और

उससे जो आनन्दानुभूति है वह चिनगारियाँ हैं ।

तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुतेर्गर्भः संभवति ॥2 ॥

इत्यष्टमः खण्डः ॥

उस अग्नि में देवलोग वीर्य के निमित्त हवन करते हैं, उस आहुति से गर्भ उत्पन्न होता है । ( यहाँ आठवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * नवमः खण्डः इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति स उल्बावृतो गर्भो दश वा नव वा मासानन्तः शयित्वा यावद्वाथ जायते ॥1 ॥

इस प्रकार पाँचवीं आहुति देने के बाद जल पुरुषशब्दवाची बन जाता है । उल्ब से (जरायु हैसे )। ढँका हुआ वह गर्भ नव या दस मास तक माता की कोख में शयन करने के बाद उत्पन्न होता स जातो यावदायुषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः संभूतो भवति ॥2 ॥

इति नवमः खण्डः ॥ देने के लिए जन्म के बाद जितनी आयुष्य है, उतना जीता है और मरने के बाद उसेचलाअग्निदाहजाता है । (उसके पुत्रादि) ले जाते हैं । इस प्रकार अन्त में जहाँ से आया था, वहीं ( यहाँ नवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) दशमः खण्डः तेऽर्चिषमभिसंभ- तद्य इत्थं विदुः । ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते मासा- वन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति जो मनुष्यस्तान्इस॥1पंचाग्नि॥ विद्या को जानते हैं, वे वनअधिष्ठातामें रहकरदेवश्रद्धाको प्राप्तऔर तपकरतेका हैंसेवन। वहाँकरतेसे हुए उपासना करते हैं, वे पूर्वकथित सूर्यकिरणों के 14 उ० प्र०

पृष्ठ 252

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210 उपनिषत्सञ्चयनम् दिवसाधिष्ठाता देव को, दिवसाधिष्ठाता देव से शुक्ल पक्ष को, शुक्ल पक्ष से उत्तरायण के छ: मासों को प्राप्त करता है । चन्द्रमसो मासेभ्यः संवत्सरः संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवयानः पन्था इति ॥2 ॥

वह मासों से संवत्सर को, संवत्सर से आदित्य को, आदित्य से चन्द्रमा को, चन्द्रमा से विद्युत् को प्राप्त होता है । वहाँ ब्रह्मलोक में अमानव दिव्य पुरुष आकर उसे ब्रह्मलोक में ले जाता है । यह देवयान ( देवलोक ) का मार्ग है । अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिं रात्रेरपरपक्षमपरपक्षाद्यान्षड्दक्षिणैति मासास्तान्नैते संवत्सरमभिप्राप्नु- वन्ति ॥३ ॥

अब जो गृहस्थ मनुष्य गाँव में ही रहकर यज्ञयागादि क्रियाएँ तथा कूपतडागादि जनहित के कार्य करते हैं, या दान देते हैं, वे धूम्राभिमानी देवता को प्राप्त कर वहाँ से रात्रि को, रात्रि से कृष्णपक्ष को, कृष्णपक्ष से दक्षिणायन के देव को प्राप्त करते हैं, पर वहाँ से वे लोग संवत्सर को नहीं प्राप्त कर सकते । मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमसमेष सोमो राजा तद्देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति ॥4 ॥

दक्षिणायन के मासों से वे पितृलोक में जाते हैं, पितृलोक से आकाश में, आकाश से वे लोग चन्द्रलोक को जाते हैं । यह चन्द्रमा ही राजा सोम है । वह सभी देवों का अन्न है, देवलोग उसका भक्षण करते हैं । तस्मिन्यावत्संपातमुषित्वाथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते यथेतमाकाशमा- काशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाभ्रं भवति ॥5 ॥

उस चन्द्रमण्डल में कर्मों के क्षय होने तक रहकर वे फिर से उसी मार्ग से (जिस मार्ग से गए आ जाते हैं । वे पहले आकाश को प्राप्त होते आकाश से वायु को, तदुपरान्त वायुभूत थे ) पुनःवे धूम होते हैं धूम होकर ही बादल हो जाते है,है । होकर और अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधि- वनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्तेऽतो वै खलु दुर्निष्प्रपतरं यो यो ह्यन्न- मत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥6 ॥

बादल होकर मेघ होता है, मेघ होकर बरसता है, उससे चावल, जव, औषधियाँ, वनस्पति, तिल, उड़द बनकर पृथ्वी में उगते हैं । ये अपने स्थान से स्वयं कहीं नहीं जा सकते । उन्हें जो- जो मनुष्य खाता है और बाद में वीर्यसिञ्चन (स्त्रीसंभोग ) करता है, तब उसके जैसे ही होकर वे जन्म लेते हैं । तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्ब्राह्मण- योनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिंह at 117 11

पृष्ठ 253

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पञ्चमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 211 अनुशयी जीवों में जो इस लोक में शुभ आचरणवाले होते हैं, वे शीघ्र ही उत्तम योनि को अर्थात् ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि या वैश्ययोनि को प्राप्त होते हैं । पर जो दुराचरणवाले होते हैं, वे शीघ्र ही निकृष्ट योनियों अर्थात् कुत्ते की, सूअर की या चाण्डाल की योनि को प्राप्त होते हैं । अथैतयोः पथोर्न कतरेण च न तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व प्रियस्वेत्येतत्तृतीयः स्थानं तेनासौ लोको न संपूर्यते तस्माज्जगुप्सेत तदेष श्लोकः ॥8 ॥

जो उपर्युक्त दो मार्गों में से किसी भी मार्ग में नहीं जा सकते, वे तो क्षुद्र- बार- बार मरने वाले और बार- बार जन्मने वाले ( मच्छर, जू आदि ) जन्तु के रूप में आया- जाया करते हैं । जीवन- धारण और मृत्यु ही उनका तृतीय स्थान कहा गया है । इसीलिए तो परलोक पूरा नहीं भर पाता । इसीलिए संसार से घृणा ही करनी चाहिए । इस विषय में यह श्लोक है- स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबच गुरोस्तल्पमावसन्ब्रह्महा चैते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरःस्तैरिति ॥ १ ॥

सोना चुरानेवाला, शराब पीनेवाला, गुरु की स्त्री के साथ निषिद्ध सम्बन्ध रखनेवाला और ब्राह्मण की हत्या करनेवाला— ये चार और पाँचवाँ उनके साथ सम्बन्ध रखनेवाला महापापी है । अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन्वेद न स ह तैरप्याचरन्पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः पुण्यलोको भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥10 ॥

इति दशमः खण्डः ॥ इस प्रकार कही गई इस पंचाग्निविद्या जाननेवालों का कोई भी मनुष्य संग करे, तो भी उसे पाप नहीं लगता । ऐसा समझदार मनुष्य पवित्र और पुण्यशाली लोक को प्राप्त करता है । ( यहाँ दसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * एकादश: खण्ड: प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुषिरिन्द्रद्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमा सां चक्रुः को नु आत्मा किं ब्रह्मेति ॥1 ॥

जन, उपमन्युपुत्र प्राचीनशाल, पुलुषपुत्र सत्ययज्ञ, भल्लवि कामहापंडितोंपौत्र इन्द्रद्युम्नने एक, बारशर्कराक्षपुत्रमिलकर विचार अश्वतराश्वपुत्र गुडिल — इन सब बड़े गृहस्थों और सदाचारसम्पन्न किया कि— “ आत्मा क्या है और ब्रह्म क्या है? " ते ह संपादयांचक्रुरुद्दालको वै भगवन्तोऽयमारुणिः संप्रतीममात्मानं॥2 ॥

वैश्वानरमध्येति त हन्ताभ्यागच्छामेति त हाभ्याजग्मुः इस वैश्वानर अन्त में उन्होंने निश्चय किया कि- "वर्तमान में तो अरुण ऋषि मेंके वेपुत्रउद्दालकउद्दालकके पास गये । आत्मा को भलीभाँति समझते हैं । तो हम उन्हीं के पास जाएँ । ” बाद न स ह संपादयांचकार प्रक्ष्यन्ति मामिमे महाशाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो सर्वमिव प्रतिपत्स्ये हन्ताहमन्यमभ्यनुशासानीति ॥3 ॥

पृष्ठ 254

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212 उपनिषत्सञ्चयनम् वे ( उद्दालक ) समझ गए कि ये परमश्रोत्रिय महान् गृहस्थ मुझे पूछेंगे, पर मैं पूर्ण रूप से तो बता नहीं पाऊँगा । मैं उन्हें अन्य के पास उपदेश के लिए भेजूँ । तान्होवाचाश्वपतिर्वै भगवन्तोऽयं कैकयः संप्रतीममात्मानं वैश्वानर- मध्येति त्र हन्ताभ्यागच्छामेति तः हाभ्याजग्मुः ॥4 ॥

उद्दालक ने उनसे कहा कि- "हे सम्माननीय महानुभावो! वर्तमान में तो केकयकुमार अश्वपति ही वैश्वानर आत्मा को अच्छी तरह से समझते हैं । अतः हम सब उन्हीं के पास जाएँ । ” बाद में वे सब अश्वपति के पास गए । तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पृथगर्हाणि कारयांचकार स ह प्रातः संजिहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपो नानाहुताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुतो यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि यावदेकैकस्मा ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद्भगवद्द्भ्यो दास्यामि वसन्तु भगवन्त इति ॥5 ॥

उस अश्वपति ने अपने पास आए हुए उन श्रेष्ठ ऋषियों की अलग- अलग पूजा की ( सत्कार किया ) । दूसरे दिन वह राजा निद्रा का त्याग करके ( आकर ) बोला- “ मेरे राज्य में चोर नहीं हैं, कोई लोभी ( कृपण) नहीं है, कोई मद्य पीनेवाला नहीं है, कोई यज्ञ न करनेवाला नहीं है, कोई मूर्ख नहीं है, कोई परस्त्रीगामी नहीं है, तो फिर दुराचारिणी स्त्री हो ही कैसे सकती है? हे महानुभावो! मैं कुछ समय बाद यज्ञ करनेवाला हूँ । एक-एक ऋत्विज को मैं जितना धन दूँगा, उतना ही धन आप सभी को भी दूँगा । आप कृपा करके यहीं रह जाइए " ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत्तश्चैव वदेदात्मानमेवेमं वैश्वानरः संप्रत्य- ध्येषि तमेव नो ब्रूहीति ॥6 ॥

वे ऋषि बोले – “कोई भी पुरुष जिस हेतु से जहाँ जाता है, उसे उसी हेतु को कहना चाहिए । आप वैश्वानर आत्मा को जानते हैं । इस समय उसी को आप हमारे लिए कहिए ।" तान्होवाच प्रातर्वः प्रतिवक्तास्मीति ते ह समित्पाणयः पूर्वाह्णे प्रतिचक्र- मिरे तान्हानुपनीयैवैतदुवाच ॥7 ॥

इत्येकादशः खण्डः ॥ उस अश्वपति ने उनसे कहा –'-" सुबह में आपको इसका उत्तर दूँगा ।" अत एव दूसरे दिन हाथ में समिधा लेकर वे राजा के पास गए । उनका उपनयन किए बिना राजा ने पूछा— ( यहाँ ग्यारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) द्वादश: खण्ड: औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ॥1 ॥

“हे उपमन्युपुत्र! तुम किसे आत्मा समझकर पूजते हो? " प्राचीनशाल ने कहा– “ भगवन्! हे राजन्! मैं तो स्वर्ग को ही आत्मा समझता हूँ । ” राजा ने कहा-'-"तुम जिसे आत्मा समझते हो,

पृष्ठ 255

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पञ्चमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 213 और पूजते हो, वह ‘ सुतेजा' नामक प्रसिद्ध वैश्वानर आत्मा है । इसकी उपासना से तुम्हारे कुल में सुत, प्रसुत और आसुत ( तीनों प्रकार से निकाला गया सोमरस) पुष्कल प्रमाण में मिलता है । अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ 2 ॥

इति द्वादश: खण्ड: ॥ “ तुम अन्न खाते हो, और ( पुत्र-पौत्रादि) अपने इष्ट ( प्रिय ) को देखते हो । और इस प्रकार जो भी इस वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है वह अन्न खाता है और इष्ट देखता है, उसके कुल में ब्रह्मतेज होता है । तुम जिसकी उपासना करते हो वह तो वैश्वानर आत्मा का मस्तक है " । ऐसा कहकर राजा फिर बोला— “ यदि तुम यहाँ नहीं आते, तो तुम्हारा मस्तक गिर पड़ता ” । ( यहाँ बारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * त्रयोदशः खण्डः अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुषिं प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥1 ॥

बाद में पुलुषपुत्र सत्ययज्ञ से राजा ने कहा- "हे प्राचीनयोग्य! तुम किस आत्मा की उपासना करते हो? ” सत्ययज्ञ बोला- “हे भगवन्! हे राजन्! मैं आदित्य को आत्मा मानकर उसकी उपासना करता हूँ । ” राजा बोला—“ यही विश्वरूप वैश्वानर आत्मा है । इसीलिए तुम्हारे कुल में बहुत विश्वरूप साधन ( धनधान्यादि ) दिखाई पड़ते हैं । प्रवृतोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुष्ट्वेत- दात्मन इति होवाचान्धोऽभविष्यो यन्मां नागमिष्य इति ॥2 ॥

इति त्रयोदशः खण्डः ॥ तुम्हारे पास टट्टुओं से जुता हुआ रथ और दासी के साथ हार ( धन) है, तुम नीरोगीहै । उसकेहो, सुखकुल भोगते हो, जो इस आत्मा की उपासना करता है, वह निरोगी होता है, सुख भोगता, वह आदित्य में ब्रह्मतेज स्थिर होता है । जिस आदित्य की आत्मा समझकर तुम उपासना करते हो अन्धे ही तो उस वैश्वानर आत्मा की केवल आँख ही है । यदि तुम मेरे पास नहीं आए होते तो तुम बन गए होते ” । ( यहाँ तेरहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) चतुर्दशः खण्डः अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्सवैश्वानरोइतियं वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै पृथग्वर्त्मात्मा

पृष्ठ 256

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214 उपनिषत्सञ्चयनम् त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वां पृथग्बलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनु- यन्ति ॥1 ॥

बाद में राजा ने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्न से कहा- "तुम किस आत्मा की उपासना करते हो? ” इन्द्रद्युम्न बोला— “हे भगवन्! हे राजन्! मैं वायु को ही आत्मरूप से उपासना करता हूँ । ” राजा ने कहा— ‘ “ वही ‘ पृथग्वर्त्मा’ नामक वैश्वानर आत्मा है । इसीलिए तुम्हारे पास तरह- तरह के उपहार आते हैं, और तुम्हारे पीछे तरह- तरह के रथों का हार है । अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ 2 ॥

इति चतुर्दशः खण्डः ॥ “ तुम अन्न खाते हो, ( पुत्र - पौत्रादि ) अपने प्रिय को देखते हो । जो कोई इस तरह वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, वह अन्न खाता है, इष्ट देखता है, उसके कुल में ब्रह्मतेज होता है । परन्तु, यह तो आत्मा का प्राणमात्र है" । ऐसा कहकर राजा फिर बोला– “ अगर तुम मेरे पास नहीं आए होते तो तुम्हारे प्राण निकल जाते ” । ( यहाँ चौदहवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) पञ्चदश: खण्ड: अथ होवाच जनः शार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ 1 ॥

बाद में राजा ने जन से पूछा- "हे शार्कराक्ष्य! तुम किस आत्मा की उपासना करते हो? ” जनने कहा-- ""हे भगवन्! हे राजन्! मैं आकाश को आत्मा मानकर उपासना करता हूँ । " तब राजा ने कहा— “तुम जिसकी आत्मा मानकर उपासना करते हो, वह 'बहुल' नामका वैश्वानर आत्मा है । इसीलिए तुम प्रजा और धन के बाहुल्यवाले हो । अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते संदेहस्त्वेष आत्मन इति होवाच संदेहस्ते व्यशीर्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ 2 ॥

इति पञ्चदशः खण्डः ॥ " तुम अन्न खाते हो, ( पुत्र- पौत्रादि ) अपने प्रिय को देखते हो । जो इस प्रकार वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, वह अन्न खाता है, प्रिय देखता है, उसके कुल में ब्रह्मतेज होता है । परन्तु, यह तो आत्मा का मध्यभाग ही है ” । ऐसा कहकर राजा फिर बोला- “ यदि तुम मेरे पास नहीं होते तो तुम्हारे शरीर का मध्यभाग(यहाँनष्ट पंद्रहवाँहो जाताखण्ड। पूरा हुआ ।) आए

पृष्ठ 257

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पञ्चमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 215 षोडशः खण्डः अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्चिं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मान- मुपास्से तस्मात्त्व रयिमान्पुष्टिमानसि ॥1 ॥

बाद में राजा ने अश्वतराश्व के पुत्र बुडिल से पूछा- "तुम किस आत्मा की उपासना करते हो? ” कुडिल ने कहा— “हे भगवन्! हे राजन् । मैं जल को आत्मा मानकर उसकी उपासना करता हूँ । ” तब राजा ने कहा– “ यही 'दधि' नामवाला वैश्वानर आत्मा । उसकी तुम उपासना करते हो । इसीलिए तुम धनवान और पुष्टिमान हो । ” अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते बस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥2 ॥

इति षोडशः खण्डः ॥ " तुम अन्न खाते हो, प्रिय देखते हो । जो ऐसे इस वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है वह अन्न खाता है, प्रिय देखता है उसके कुल में ब्रह्मवर्चस् होता है, परन्तु यह तो आत्मा की बस्ति ( मूत्राशय) ही है ” । ऐसा कहकर राजा फिर बोला–“ तुम यदि मेरे पास नहीं आते तो तुम्हारी बस्ति नष्ट हो जाती ” । (यहाँ सोलहवाँ खण्ड समाप्त हुआ । ) * सप्तदश: खण्ड: अथ होवाचोद्दालकमारुणिं गौतम कं त्वमात्मानमुपास्स इति पृथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै प्रतिष्ठात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं प्रतिष्ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च ॥1 ॥

मानकर फिर राजा ने गौतमवंशीय अरुणपुत्र उद्दालक से पूछा– “हे गौतम! तुमआत्माकिसेमानकरआत्मा उपासना उपासना करते हो? ” आरुणि बोला- 'हे भगवन्! हे राजन्! मैं पृथ्वी को तुम प्रजा और पशुओं करता हूँ । ” राजा बोला— “वह 'प्रतिष्ठा' नामक वैश्वानर आत्मा है, इसलिए से प्रतिष्ठित (अच्छी स्थितिवाले ) हो ” । कुले य अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्यइतिब्रह्मवर्चसंहोवाच पादौ ते एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन व्यम्लास्येतां यन्मां नागमिष्य इति ॥2 ॥

इति सप्तदशः खण्डः ॥ उपासना करता है, वह “ तुम अन्न खाते हो, प्रिय देखते हो । जो इस आत्मामात्रकीपैरइसही प्रकारहैं । " ऐसा कहकर राजा फिर अन्न खाता है, प्रिय देखता है । परन्तु यह तो आत्मापैर ढीलेके पड़ जाते । से बोला— “ यदि तुम यहाँ नहीं आते तो तुम्हारे (यहाँ सत्रहवाँ खण्ड पूरा हुआ । )

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216 उपनिषत्सञ्चयनम् अष्टादश: खण्ड: तान्होवाचैते वै खलु सूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वासोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ॥1 ॥

बाद में राजा ने उन सभी से कहा- "तुम सभी आत्मा को भिन्न-भिन्न समझकर अन्न ( सुख ) भोगते हो । पर जो कोई इसको आकाशरूप मस्तक से लेकर पृथ्वीरूप चरण तक में कि-" यह सब मैं ही हूँ ” इस प्रकार वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, वह सब प्राणियों, लोकों, इन्द्रियों, शरीरों आदि में सुख भोगता है ” । तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धेव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदि- र्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥2 ॥

इत्यष्टादशः खण्डः ॥ “ इस विराट् पुरुष का स्वर्ग ही सर है, आँखें ही सूर्य हैं, वायु ही प्राण हैं, आकाश ही उदर है, जल ही बस्ति है ( मूत्राशय है ), पृथ्वी चरण है, वेदि ही वक्ष:स्थल है, दर्भ ही लोम हैं, हृदय गार्हपत्य अग्नि है, मन दक्षिणाग्नि है, और मुख आहवनीय अग्नि है । ( यहाँ अठारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) एकोनविंशः खण्डः तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीय स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृप्यति ॥1 ॥

अतः जो अन्न पहले आए, उसमें से पहला ग्रास ' प्राणाय स्वाहा' - ऐसा बोलकर पहली आहुति देनी चाहिए ( ग्रास भरना चाहिए ) । उससे प्राण तृप्त होते हैं । प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यत्यादित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किंच द्यौश्चादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजयां पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥2 ॥

इत्येकोनविंशः खण्डः ॥ प्राण तृप्त होने से आँख तृप्त होती है, आँख तृप्त होने पर आदित्य तृप्त होता है तृप्त होने पर स्वर्ग तृप्त होता है, स्वर्ग के तृप्त होने पर जिस पर स्वर्ग और आदित्य का, स्वामित्वआदित्य है, वह सब तृप्त हो जाता है । सबकी तृप्ति होने से वह अन्नभोक्ता पशुओं से, प्रजा से, अन्न से और ब्रह्मतेज से तृप्त ही जाता है । (यहाँ उन्नीसवाँ खण्ड पूरा हुआ।) विंशः खण्डः अथ यां द्वितीयां जुहुयात्तां जुहुयाद् व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति ॥1 ॥

पृष्ठ 259

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] ( 9 ) 217पञ्चमोऽध्यायः छान्दोग्योपनिषत् उसके बाद दूसरी आहुति –' व्यानाय स्वाहा' कहकर देनी चाहिए । इससे व्यान तृप्त होता है । व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किंच दिशश्च चन्द्रमाश्चाधि- तिष्ठन्ति तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥2 ॥

इति विंशः खण्डः ॥ व्यान तृप्त होने से श्रोत्र तृप्त होता है, श्रोत्र तृप्त होने से चन्द्रमा तृप्त होता है, चन्द्रमा के तृप्त होने से दिशाएँ तृप्त होती हैं, दिशाएँ तृप्त होने पर जो कुछ भी दिशाओं और चन्द्रमा के स्वामित्व में है, वह सब कुछ तृप्त हो जाता है । सबकी तृप्ति होने से वह अन्नभोक्ता पशुओं से, प्रजा से, अन्न से और ब्रह्मतेज से तृप्त हो जाता है । ( यहाँ बीसवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) * एकविंशः खण्डः अथ यां तृतीयां जुहुयात्तां जुहुयादपानाय स्वाहेत्यपानस्तृप्यति ॥1 ॥

अब जो तीसरी आहुति देनी है, वह ' अपानाय स्वाहा'– यह कहकर देनी चाहिए । इससे अपान तृप्त होता है । अपाने तृप्यति वाक्तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किंच पृथिवीं चाग्निश्चाधि- तिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥2 ॥

इत्येकविंशः खण्डः ॥ अपान के तृप्त होने से वाणी तृप्त होती है, वाणी के तृप्त होने से अग्नि तृप्त होता है, अग्नि के तृप्त होने से पृथ्वी तृप्त होती है, पृथ्वी के तृप्त होने पर जो कुछ भी पृथ्वीपशुओंऔर अग्निसे, अन्नके आधिपत्यआदि से, में है, वह सब तृप्त हो जाता है । ऐसा होने से वह अन्नभोक्ता प्रजा और तृप्त हो जाता है, वह ब्रह्मतेज से युक्त होता है । (यहाँ इक्कीसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * द्वाविंश: खण्ड: ॥1 ॥

अथ यां चतुर्थी जुहुयात्तां जुहुयात्समानाय स्वाहेति समानस्तृप्यति भरना चाहिए ) । इससे बाद में ‘ समानाय स्वाहा’- यह बोलकर चौथी आहुति देनी चाहिए (ग्रास समान तृप्त होता है । पर्जन्ये तृप्यति समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति विद्युच्चपर्जन्यस्तृप्यतिपर्जन्यश्चाधितिष्ठस्त- विद्युत्तृप्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किंच

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उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 260 का मूल पृष्ठ
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218 उपनिषत्सञ्चयनम् तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्च- सेनेति ॥2 ॥

इति द्वाविंशः खण्डः ॥ समान तृप्त होने से मन तृप्त होता है, मन के तृप्त होने से पर्जन्य तृप्त होता है, पर्जन्य के तृप्त होने से विद्युत् तृप्त होती है, विद्युत् के तृप्त होने से जो कुछ भी विद्युत् और पर्जन्य के आधिपत्य में है, वह तृप्त हो जाता है । ऐसा होने से वह अन्न भोक्ता प्रजा, पशुओं और अन्नादि से तृप्त हो जाता है, ब्रह्मतेज से युक्त होता है । ( यहाँ बाईसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) त्रयोविंशः खण्डः अथ यां पञ्चमीं जुहुयात्तां जुहुयादुदानाय स्वाहेत्युदानस्तृप्यति ॥1 ॥

बाद में ‘ उदानाय स्वाहा’- यह बोलकर पाँचवीं (ग्रास रूप) आहुति देनी चाहिए । इससे उदान तृप्त होता है । उदाने तृप्यति त्वक् तृप्यति त्वचि तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्या- काशस्तृप्यत्याकाशे तृप्यति यत्किंच वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥2 ॥

इति त्रयोविंशः खण्डः ॥ उदान तृप्त होने से त्वचा तृप्त होती है, त्वचा तृप्त होने से वायु तृप्त होता है, वायु तृप्त होने से आकाश तृप्त होता है, आकाश तृप्त होने से आकाश और वायु के प्रभुत्व वाला जो कुछ है, तृप्त होता है । ऐसा होने से वह अन्नभोक्ता प्रजा, पशुओं और अन्नादि से तृप्त होता है, ब्रह्मतेज से युक्त होता है । ( यहाँ तेईसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) चतुर्विंशः खण्डः स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति यथाङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात्तादृक् तत्स्यात् ॥1 ॥

जो मनुष्य इस वैश्वानरदर्शन को बिना जाने ही होम करता है, उसका वह अग्निहोत्र तो जैसे अंगारों को दूर करके भस्म में आहुति देता हो, ऐसा ही होता है । अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥2 ॥

जो यह सब समझकर अग्निहोत्र करता है, वह सभी लोकों के लिए, सभी प्राणियों के लिए और सभी आत्माओं के लिए होम करता है ।