Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 261–270
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 261–270
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पञ्चमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 219 तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैव हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति ॥3 ॥
जैसे मुंज की सलाई का अग्रभाग अग्नि में डालने से तुरन्त जल जाता है, वैसे ही इसे जाननेवाला कोई मनुष्य यदि अग्निहोत्र करे, तो उसके सभी पाप जल जाते हैं । तस्मादु हैवंविद्यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद्वैश्वानरे हुतः स्यादिति तदेष श्लोकः ॥4 ॥
अतः इस प्रकार जाननेवाला यदि चाण्डाल को उच्छिष्ट (जूठा) दे, तो भी वह अन्न वैश्वानर आत्मा में यज्ञ करने के समान है । इस विषय में यह मन्त्र है—
यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते ।
एव सर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासत ॥
इत्यग्निहोत्रमुपासत इति ॥5 ॥
इति चतुर्विंशः खण्डः ॥
इति छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमोऽध्यायः ॥5 ॥
जिस तरह भूखे बच्चे माँ की राह देखते हैं, वैसे ही सभी प्राणी इस ज्ञानी के हव्य रूप यजन की ( यह तत्त्वज्ञानी कब भोजन लेगा, इसकी ) राह देखते हैं । ( यहाँ चौबीसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) यहाँ छान्दोग्योपनिषद् का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।
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220 उपनिषत्सञ्चयनम् अथ षष्ठोऽध्यायः प्रथमः खण्डः ॐ श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तरह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यं न वै सोम्य! अस्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥1 ॥
अरुण का पुत्र श्वेतकेतु था । उससे पिता ने कहा- "हे श्वेतकेतु! ब्रह्मचर्याश्रम में रहो । हे सोम्य! हमारे कुल में जन्मा कोई पुरुष बिना अध्ययन किए केवल नाम का ब्राह्मण ही नहीं रहता । स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विशतिवर्षः सर्वान्वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥2 ॥
बारह वर्ष का वह गुरु के यहाँ रहकर चौबीस साल तक सभी वेदों का अध्ययन करके अपने को बड़ा पण्डित और पढ़ालिखा मानता हुआ गर्व से अक्खड़ बनकर लौटा । तब उसके पिता ने पूछा— “हे श्वेतकेतु! हे सोम्य! जो तुम इस प्रकार अपने को बड़ा पण्डित और पढ़ा- लिखा मानकर गर्विष्ट हुए हो, तो क्या तुमने अपने गुरु से परब्रह्म का उपदेश पूछा है? ” येनाश्रुतश्श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥3 ॥
“जिससे न सुना हुआ सुना होता है, नहीं विचारा हुआ विचारा होता है, न जाना हुआ जाना जाता है? ” यह सुनकर श्वेतकेतु बोला-“भगवन्! ऐसा उपदेश कैसे होता है? ” यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातःस्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥4 ॥
तब पिता बोले— “जैसे मिट्टी के एक पिण्ड से मिट्टी से बने सभी पदार्थ जाने जा सकते हैं, क्योंकि मिट्टी से बने पदार्थों के नाम-रूप वाणी के आश्रय में रहे हुए विकार हैं । वास्तव में तो मिट्टी ही सत्य है I यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातः स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम् ॥5 ॥
“हे सौम्य! जैसे एक लोहमणि ( सोने की ईंट ) के ज्ञान से सभी सुवर्णनिर्मित गहने जाने जा सकते हैं । वाणी के आश्रय में रहे हुए नामों के ही ये सब विकार हैं । वास्तव में तो सोना ही सत्य है । ” यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातः स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कार्ष्णायसमित्येव सत्यमेव सोम्य स आदेशो भवतीति ॥6 ॥
“हे सोम्य! जिस प्रकार एक ही नखैनी (नख काटने का औजार) के ज्ञान से सभी लोहमय पदार्थ जाने जा सकते हैं । लोहोत्पन्न सभी पदार्थों का नाममात्र वाणी के आश्रय में रहे हुए विकार हैं । वास्तव में सत्य तो एक लोहा ही है । "
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षष्ठोऽध्यायः ] 221 छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिषुर्यद्ध्येदवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवास्त्वेवमेतद्ब्रवीत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥7 ॥
इति प्रथमः खण्डः ॥ तब श्वेतकेतु ने कहा— “मेरे पूज्य गुरु वह नहीं जानते होंगे, यदि जानते होते तो मुझे क्यों नहीं बताते? इसलिए पूज्य आप ही मुझसे यह कहिए । " तब पिता ने कहा-ठीक है, हे सोम्य! ” ( यहाँ पहला खण्ड पूरा हुआ ।) * द्वितीयः खण्डः सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसी- देकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत ॥1 ॥।
हे सोम्य! यह पहले सत् ही था, वह एक था— अद्वितीय था । कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि असत् ही पहले था, वह एक और अद्वितीय था । उस असत् में से सत् जन्मा । कुतस्तु खलु सोम्यैवः स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति । सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ॥2 ॥
हे सोम्य! परन्तु ऐसा कैसे हो सकता है? कुछ न हो, उसमें से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है? इसलिए हे सौम्य! पहले 'सत्' ही था, वह अकेला ही था, अन्य कुछ नहीं था । तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत । तत्तेज ऐक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत । तस्माद्यत्र क्व च शोचति स्वेदते वा पुरुष- स्तेजस एव तद्ध्यापो जायन्ते ॥3 ॥
उसने संकल्प किया— “ मैं बहुत होऊँ, अनेक प्रकार से उत्पन्न होऊँ । ” उसने तेज बनाया । उस तेज ने संकल्प किया— “ मैं बहुत होऊँ ”, तो उसने पानी बनाया । इसीलिए जहाँ- कहीं मनुष्य शोक करता है या उसे पसीना आता है, वह तेजसे (गरमी से ) ही पानी होता है । ता आप ऐक्षन्त बह्वयः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त । तस्माद्यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदध्यन्नाद्यं जायते ॥4 ॥
इति द्वितीयः खण्डः ॥ अन्न पैदा किया । फिर उस पानी ने सोचा—' मैं बहुत होऊँ', 'बहुत रूप धारण करूँ' – तो वहउसनेअन्न उपजता है । इसीलिए जहाँ कहीं भी वर्षा होती है वहाँ बहुत अन्न होता है । पानी से ही (यहाँ दूसरा खण्ड पूरा हुआ । ) तृतीयः खण्डः तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भवन्त्याण्डजं जीवजमुद्भिज्ज- मिति ॥1 ॥
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222 उपनिषत्सञ्चयनम् इन प्राणियों के तीन बीज ( प्रकार) हैं - अण्डे से उत्पन्न होनेवाले, जीव (जरायु) से उत्पन्न होने-वाले और धरती को भेदकर उत्पन्न होनेवाले । ( यहाँ स्वेदज का अन्तर्भाव अण्डज में किया गया है ) । सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥2 ॥
फिर उस ‘ सत्’ तत्त्व ने सोचा कि “ अब मैं इन तेज, जल और अन्न में जीव के साथ प्रवेश करके उन्हें अलग- अलग नामवाले और रूपवाले बनाऊँ । ” तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अने- नैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् ॥3 ॥
“ और इन तीनों देवताओं को ( तेज, जल और अन्न ) तिगुना कर दूँ" - ऐसा सोचकर उस ' सत्' तत्त्व ने ( सत् नामक देव ने ) उन तीनों देवताओं में जीव के साथ प्रवेश किया और उन्हें अलग- अलग नाम-रूप वाला बनाया । तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद्यथा नु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥4 ॥
इति तृतीयः खण्डः ॥ “ हे सोम्य! बाद में उसने उन तीनों देवताओं को त्रिगुणित त्रिगुणित बनाया । ऐसा किस तरह किया, वह मैं तुम्हें समझाता हूँ ।” ( यहाँ तीसरा खण्ड पूरा हुआ ।) चतुर्थः खण्डः यदग्ने रोहित रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापा- गादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥1 ॥
तिगुने किए अग्नि में जो लाल वर्ण है वह तेज का रूप है, जो शुक्ल है वह जल का और जो काला वर्ण है वह अन्न ( पृथ्वी ) का रूप है । अग्नि का अग्नित्व चला गया । वाणी से कहा जाने वाला नाममात्र का ही वह विकार है । तीन रूप ही वास्तव में सत्य हैं I यदादित्यस्य रोहित रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्न- स्यापागादादित्यादादित्यत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपा- णीत्येव सत्यम् ॥2 ॥
सूर्य का लाल वर्ण तेज का रूप है, जो शुक्लवर्ण है वह जल का रूप है, जो कृष्ण वर्ण है, वह अन्न ( पृथ्वी ) का रूप है । इस तरह आदित्य से आदित्यत्व चला गया । वाणी से कहा जानेवाला नाममात्र का ही वह विकार है । वास्तव में तीन रूप ही सत्य हैं । यच्चन्द्रमसो रोहितः रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्न- स्यापागाच्चन्द्राच्चन्द्रत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणी- त्येव सत्यम् ॥3 ॥
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षष्ठोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 223 चन्द्रमा में जो लाल वर्ण है वह तेज का रूप है, जो शुक्ल वर्ण है वह जल का रूप है जो कृष्णवर्ण है वह अन्न ( पृथ्वी ) का रूप है । इस तरह चन्द्र का चन्द्रत्व चला गया । वाणी का आश्रितऔर नाममात्र का ही यह विकार रह गया । वास्तव में तीन रूप ही सत्य हैं । यद्विद्युतो रोहित रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्या- पागाद्विद्युतो विद्युत्त्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥4 ॥
विद्युत् में जो लाल वर्ण है वह तेज का रूप है, जो शुक्ल वर्ण है वह जल का रूप है और जो कृष्णवर्ण है, वह अन्न ( पृथ्वी ) का रूप है । इस तरह विद्युत् का विद्युत्त्व चला गया । वाणी में आश्रित नाममात्र का विकार रह गया! वास्तव में तीन रूप ही सत्य हैं । एतद्ध स्म वै तद्विद्वास आहुः पूर्वे महाशाला महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्श्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यतीति ह्येभ्यो विदांचक्रुः ॥5 ॥
इस त्रिवृत्करण को जाननेवाले पूर्व के बड़े गृहस्थों और महाश्रोत्रियों ने कहा था कि— ‘हमारे कुल में आज से कोई ऐसा नहीं कह सकेगा कि यह न सुना हुआ, न माना हुआ, न ठीक से जाना हुआ है । क्योंकि अग्नि आदि के दृष्टान्त से वे सब कुछ जानते थे 1 यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपमिति तद्विदांचक्रुर्यदु शुक्लमिवा- भूदित्यपा रूपमिति तद्विदांचक्रुर्यदु कृष्णमिवाभूदित्यन्नस्य रूपमिति तद्विदांचक्रुः ॥6 ॥
जो लालिमा जैसा रूप दिखाई देता था उसे वे तेज का रूप जानते थे, जो सफेद रूप दिखाई पड़ता था उसे वे जल का रूप समझते थे, और जो काला-सा रूप दिखाई पड़ता था उसे वे अन्न (पृथ्वी) का रूप समझते थे । यद्विज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवताना समास इति तद्विदांचकुर्यथा नु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥7 ॥
इति चतुर्थः खण्डः ॥ जो कुछ भी न समझ में आनेवाली वस्तु हो, तो उसे वे इन्हीं तीन तत्त्वों से बनी समझाऊँगाहुई समझते| थे । हे सोम्य! अब ये तीनों देव किस तरह मनुष्य के शरीर में त्रिगुणित हुए, वह मैं तुम्हें ( यहाँ चौथा खण्ड पूरा हुआ । ) * पञ्चमः खण्डः यो अन्नमशितं त्रेधा विधीयते । तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति मध्यमस्तन्मासं योऽणिष्ठस्तन्मनः ॥1 ॥
है, जो मध्य भाग खाए हुए अन्न के तीन परिणाम होते हैं, जो स्थूलमनभागबनताहै वह Iमल बनता है उसका मांस बनता है और जो सूक्ष्म भाग है उसका
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224 उपनिषत्सञ्चयनम् आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः ॥ 2 ॥
पिये हुए जल के तीन परिणाम होते हैं । उसका जो स्थूल भाग है वह मूत्र बनता है, जो मध्यम है वह लहू बनता है और जो सूक्ष्म है वह प्राण है । तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स मज्जा योऽणिष्ठः सा वाक् ॥3 ॥
खाए हुए घृतादि तेज के तीन परिणाम होते हैं, उसका स्थूलतम भाग है वह हड्डियाँ बनता है, मध्यम भाग चरबी होता है और सूक्ष्मतम भाग वाणी बनता है । अन्नमयः हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥4 ॥
इति पञ्चमः खण्डः ॥ “हे सोम्य! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमय है । ” आरुणि के ऐसा कहने पर श्वेतकेतु बोला— “ भगवन्! मुझे फिर से विस्तृत रूप में समझाइए । " पिता ने कहा - "ठीक है । ” ( यहाँ पाँचवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) षष्ठः खण्डः दध्नः सोम्य मथ्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तत्सर्पि- र्भवति ॥1 ॥
हे सोम्य! मथे हुए दही का जो सूक्ष्म भाग है वही ऊर्ध्व- गमन करते हुए घृत रूप में परिणत होता है । एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तन्मनो भवति ॥ 2 ॥
हे सोम्य! इसी प्रकार खाए जानेवाले अत्र का जो अतिसूक्ष्म अंश है, जो ऊपर एकत्रित होता है वही मन रूप में परिणत होता है । अपाः सोम्य पीयमानानां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति स प्राणो भवति ॥३ ॥
हे सोम्य! पिये जानेवाले जल का सूक्ष्मतम भाग जो ऊपर एकत्रित होता है, वही प्राण के रूप
में परिणत होता है ।
तेजसः सोम्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा वाग्भ- वति ॥4 ॥
हे सोम्य! ग्रहण किए हुए तेज का सूक्ष्मतम भाग जो ऊपर आता है, वही वाणीपरिणत होता है । के रूप में अन्नमयहि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥5 ॥ वागिति भूय एव मा
इति षष्ठः खण्डः ॥
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षष्ठोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 225 “ हे सोम्य! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है, वाणी तेजोमयी है । " आरुणि ने ऐसा कहा, तब श्वेतकेतु बोला— “ भगवन्! फिर से और अधिक समझाइए । ” पिता ने कहा–– '“हाँ, ठीक है । ” ( यहाँ छठा खण्ड पूरा हुआ । ) * सप्तम: खण्ड: षोडशकलः सोम्य पुरुषः पञ्चदशाहानि माशीः । काममपः पिबापोमयः प्राणो न पिबतो विच्छेत्स्यत इति ॥1 ॥
हे सोम्य! यह पुरुष सोलह कलाओं वाला है । पंद्रह दिनों तक तुम खाओ नहीं । परन्तु अपनी इच्छानुसार जल पीओ | क्योंकि पानी नहीं पिओगे, तो प्राण निकल जाएँगे । ( क्योंकि प्राण आपोमय है) । स ह पञ्चदशाहानि नाशाथ हैनमुपससाद । किं ब्रवीमि भो इत्यृचः सोम्य यजुषि सामानीति स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ॥2 ॥
उसने पंद्रह दिनों तक खाया नहीं, फिर बाद में पिता के पास आकर बोला— “ जी, मैं क्या बोलूँ? ” पिता ने कहा –“ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद के मंत्र बोलो । ” उसने कहा– “जी, मुझे तो कुछ याद नहीं आता । त होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परि- शिष्टः स्यात्तेन ततोऽपि न बहु दहेदेवः सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टा स्यात्तयैतर्हि वेदान्नानुभवस्यशानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥3 ॥
आरुणि ने उससे कहा— “हे सोम्य! जैसे बहुत ईंधन से प्रज्वलित अग्नि का एक जुगनू जैसा अंगारा ही शेष रहा हो, तो वह अपने से बड़े परिमाणवाले पदार्थ को नहीं जला सकता । इसी प्रकार तुम्हारी सोलह कलाओं में से मात्र एक कला ही शेष रही हो, तो उस एक ही कला से इस समय तुम वेदों का अनुभव नहीं कर सकते हो । अब तुम खा लो । बाद में मेरी बात को समझ सकोगे । स हाशाथ हैनमुपससाद तह यत्किंच पप्रच्छ सर्व ह प्रतिपेदे ॥4 ॥
उसने खाया और बाद में वह अपने पिता के पास गया । उस समय पिता ने जो कुछ भी कहा, उन सबको वह समझ गया । त होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरूपसमाधाय प्राज्वलयेत्तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥5 ॥
आरुणि ने उससे कहा— “हे सोम्य, जिस तरह बहुत ईंधन से प्रज्वलित अग्नि के शेष, तोरह फिरगए जुगनू जैसे छोटे अंगारे में तिनके, घास, लकड़ियाँ आदि डालकर धीरे- धीरे जलाया जाए ज्यादा परिमाणवाले पदार्थ को भी वह जला सकता है । एवसमाहितासोम्यप्राज्वालीत्तयैतर्हिते षोडशानां कलानामेकावेदाननुभवस्यन्नमयकलाऽतिशिष्टाऽभूत्सान्नेनोप-हिविजज्ञावितिसोम्य मन आपो-॥6 ॥ मयः प्राणस्तेजोमयी वागिति तद्धास्य विजज्ञाविति
इति सप्तमः खण्डः ॥ 15 उ ० प्र०
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226 उपनिषत्सञ्चयनम् “इस प्रकार हे सोम्य! पंद्रह दिनों तक भोजन किए बिना तुम्हारी सोलह कलाओं में से एक ही कला अवशिष्ट रही थी । वह कला अन्न से फिर से प्रज्वलित की गई । इसीलिए तुम इस समय वेदों को याद करते हो । हे सोग्य! मन ही अन्नमय है, प्राण जलमय है, और वाणी तेजोमय है । ऐसा समझो । ” पिता ने ऐसा कहा तो पुत्र समझ गया । समझ गया । ( यहाँ सातवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * अष्टमः खण्डः उद्दालको हारुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनः स्वपितीत्याचक्षते स्वः ह्यपीतो भवति ॥1 ॥
आरुणि उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु से कहा- "हे सोम्य! अब तुम मुझ से स्वप्नावस्था के विषय में जानो । स्वप्नावस्था में पुरुष ' स्वपिति' ( अपि इति) अर्थात् सत् साथ मिल जाता है । इसलिए सो जाता है | स्वयम् अपने आपको अपीत = मिला हुआ रहता है । इसलिए उसे ‘ स्वपिति’ कहा जाता है अर्थात् अपने साथ मिला हुआ रहता है । स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयत एवमेव खलु सोम्य तन्मनो दिशं दिशं पतित्वान्य- त्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते प्राणबन्धनः हि सोम्य मन इति ॥2 ॥
जैसे डोरी से बाँधा हुआ कोई पक्षी प्रत्येक दिशा में घूमकर कहीं भी आश्रय न मिलने पर, अपने बन्धन का ही आश्रय लेता है, उसी प्रकार हे सोम्य! यह मन प्रत्येक दिशा में घूमकर कहीं भी आश्रय न मिलने पर प्राण का आश्रय ही लेता है । हे सोम्य! मन प्राणरूपी बन्धनवाला है । अशनापिपासे मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमुत्पतितः सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥3 ॥
अब हे सोम्य! तुम मुझसे ' अशनाय' ( भूख ) और पिपासा के विषय में जान लो । जब कोई पुरुष ‘ अशन' (खाने ) की इच्छा करता है, तब उस खाए हुए अन्न को पानी ही ले जाता है ( नयति तो जिस प्रकार गाय को ले जानेवाला ' गोनाय', अश्व को ले जानेवाला ' अश्वनाय' और पुरुष को )ले| जानेवाला ‘ पुरुषनाय’ कहलाता है, वैसे ही अशित को ले जाने वाला ' अशनाय' कहलाता को अशनाय कहते हैं । ऐसा होने से इस जलरूप अशनाय से ही शरीररूप शुंग है । पानी ( )है । क्योंकि कारण के बिना कार्य उत्पन्न नहीं होता । कार्य उत्पन्न हुआ तस्य क्व मूलः स्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यान्नेन शुङ्गेनापोमूल- मन्विच्छाद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः शुङ्गेन तिष्ठाः ॥4 ॥ सत्प्र-
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षष्ठोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 227 उस ( शरीर ) का अन्न के सिवा क्या कारण हो सकता है । हे सोम्य! इस अन्नरूप कार्य का मूल जल को जानो । हे सोम्य! जल रूप कार्य का मूल तेज को जानो और तेजरूप कार्य का मूल ' सत्' तत्त्व को जानो । हे सोम्य! यह सब प्रजा सत् रूप आश्रयवाली और सत् तत्त्व में ही अधिष्ठित है अर्थात् सत् रूप कारणवाली है । अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोना- योऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्गमु- त्पतितः सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥5 ॥
जब पुरुष को 'पिपासा ( पीने की इच्छा ) होती है, तो पिए हुए जल को तेज ही ले जाता है । जैसे गाय को हाँकनेवाला ' गोनाय', अश्व को हाँकनेवाला ' अश्वनाय' और पुरुष को ले जानेवाला ‘ पुरुषनाय ' कहलाता है, इसी तरह तेज को ' उदन्य' (उदक को ले जानेवाला) कहा गया है । हे सोम्य! यह शरीर कार्यरूप है, कारण के बिना वह उत्पन्न नहीं हो सकता । तस्य क्व मूलः स्यादन्यत्राद्द्भ्योऽद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठा यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवता- याम् ॥6 ॥
जल के सिवा शरीर का मूल भला क्या हो सकता है? हे सोम्य! जल रूप कार्य का कारण तेज को ही जानो । और तेजरूप कार्य का कारण ' सत्' तत्त्व को जानो । ये सारी प्रजाएँ हे सोम्य! सत् रूप कारणवाली हैं, सत् पर ही अवलम्बित हैं और सत् में ही अधिष्ठित हैं । हे सोम्य! जिस प्रकार ये तीनों— अन्न-जल- तेज प्रत्येक तिगुना-तिगुना होता है, वह पहले ही बताया जा चुका है! हे सोम्य! यह पुरुष जब मरने लगता है, तब उसकी वाणी मन में समा जाती है, मन प्राण में और प्राण तेज में समा जाता है । स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदः सर्वं तत्सत्य स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥7 ॥
इत्यष्टमः खण्डः ॥ यह जो सूक्ष्म है, यह सारा जगत् उसी का आत्मरूप है । हे श्वेतकेतु! तो वास्तविक रूप से वह आत्मतत्त्व तुम्हीं हो । बाद में श्वेतकेतु बोला– “ भगवन्! और भी अधिक स्पष्टतापूर्वक कहिए ” तब आरुणि ने कहा- "ठीक है । " ( यहाँ आठवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) नवमः खण्डः यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणासा- न्समवहारमेकताः रसं गमयन्ति ॥1 ॥
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228 उपनिषत्सञ्चयनम् हे सोम्य! जैसे मधुमक्खियाँ अनेक वृक्षों के फूलों के रस को ले आकर उन सभी रसों को एक-रूप बना देती हैं और मधु बनाती हैं । ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पद्यामह इति ॥2 ॥
मधु बनने के बाद उस मधु में "मैं अमुक- अमुक वृक्ष का रस हूँ ।" इस प्रकार का कोई भेद जाना नहीं जा सकता, इसी प्रकार हे सोम्य! ये सारी प्रजाएँ सत् से मिलकर यह नहीं जानतीं कि हम अलग- अलग थीं और सत् में मिली हैं । त इह व्याघ्रो वा सि हो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदा भवन्ति ॥3 ॥
बाघ, सिंह, वृक, वराह, कीड़ा, जुगनू, डाँस या मच्छर- आदि सभी पहले यहाँ जैसे थे, उसी रूप में फिर से जब सत् से अलग होते हैं, तब स्वरूप वाले हो जाते हैं । स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदः सर्वं तत्सत्यः स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥4 ॥
इति नवमः खण्डः ॥ “ अत: यह सत् रूप सूक्ष्म तत्त्व ही सारे जगत् का मूल है, वही जगत् का आत्मा है, वही सत्य है, और हे श्वेतकेतु! वह आत्मा तुम्हीं हो । ” पिता के ऐसा कहने पर श्वेतकेतु ने कहा— “ भगवन्! मुझे फिर से समझाइए", तब पिता ने कहा— “ठीक है । ” ( यहाँ नवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) दशमः खण्डः इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात्प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात्प्रतीच्यस्ताः समुद्रात्स- मुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहम- स्मीति ॥1 ॥
“ हे सोम्य! पूर्व दिशावाली नदियाँ पूर्व की ओर बहती हैं, पश्चिम की नदियाँ पश्चिम की ओर बहती हैं । ये सभी नदियाँ समुद्र से निकल कर समुद्र में ही मिल जाती हैं । समुद्र से मिली हुई वे नहीं जानतीं कि मैं अमुक- अमुक नदी हूँ । एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजा सत आगत्य न विदुः सत आगच्छामह इति त इह व्याघ्रो वा सिहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा 'दशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदा भवन्ति ॥2 ॥
हे सोम्य! इसी प्रकार ये सब प्रजाएँ सत् से आकर भी यह नहीं जानतीं कि आ रहे हैं । इस लोक में बाघ, सिंह, वृक, वराह, कीड़ा, जुगनू, डाँस, मच्छर आदि हमजो-जोसत् से ही,सत् से निकलकर वे उसी रूपवाले होते हैं । होते हैं