Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 271–280
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 271–280
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षष्ठोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 229 स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदः सर्वं तत्सत्यः स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥3 ॥
इति दशमः खण्डः ॥ वह जो यह सूक्ष्म आत्मा है, यह सारा जगत् उसी का स्वरूप है, वही सत्य है और हे श्वेतकेतु! तुम्हीं वह आत्मा हो ” पिता के ऐसा कहने पर पुत्र ने कहा– “हे भगवन्! आप फिर से मुझे उपदेश दीजिए । " तब पिता ने कहा- "ठीक है ।' ( यहाँ दसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * एकादश: खण्ड: अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेद्यो मध्येऽ- भ्याहन्याज्जीवन्त्रवेद्योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन्त्रवेत्स एष जीवेनात्मनानु- प्रभूतः पेपीयमानो मोदनमानस्तिष्ठति ॥1 ॥
हे सोम्य! इस महान् वृक्ष के मूल में अगर कोई प्रहार करे उसमें से रस का स्राव होता है, और वह जीवित रहता है । कोई यदि बीच के भाग में प्रहार करे तो वहाँ रस का स्राव होता है । और वृक्ष जीवित ही रहता है । अगर कोई अग्र भाग में प्रहार करे, तो भी वहाँ रस झरता है और वृक्ष जीवित रहता है । वह यह वृक्ष जीवात्मा से संपूर्णतया व्याप्त है । वृक्ष उस आत्मा का रस पीता हुआ आनन्द से खड़ा रहता है । अस्य यदेका शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां जहात्यथ सा शुष्यति सर्वं जहाति सर्वः शुष्यति ॥ 2 ॥
जब इसकी एक शाखा को जीव छोड़ देता है, तो वह सूख जाती है, जब दूसरी को छोड़ देता है तब वह सूख जाती है, जब तीसरी को छोड़ता है तो वह भी सूख जाती है और जब सबको छोड़ देता है, तब सारा वृक्ष ही सूख जाता है । एवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियत इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदः सर्वं तत्सत्यः स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥3 ॥
इत्येकादशः खण्डः ॥ हे सोम्य! ठीक उसी तरह जीव के निकल जाने के बाद सचमुच यह शरीर मर जाता है, परन्तु, जीव नहीं मरता । ऐसा तुम जानो ।” उसने आगे यह भी कहा कि— “ यह जो अणिमा ( सूक्ष्मतम) तत्त्व है, वही आत्मा है, सारा जगत् इसी का रूप है, वही सत्य है । हे श्वेतकेतु! वह तत्त्व तुम्हीं हो । ” तब श्वेतकेतु ने कहा--'"भगवन्! और भी आगे मुझे समझाइए । ” तब पिता ने कहा --"" हाँ ठीक है । " ( यहाँ ग्यारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) *
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230 उपनिषत्सञ्चयनम् द्वादश: खण्ड: न्यग्रोधफलमत आहरेतीदं भगव इतिभिन्द्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्द्वीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किंचन भगव इति ॥1 ॥
पिता बोले — ‘ एक वटफल लाओ ।' पुत्र बोला– 'यह लाया भगवन् । ' पिता बोले— 'इसे तोड़ो' । पुत्र बोला— ‘ यह तोड़ा भगवन्', पिता बोले- 'इसमें क्या देखते हो? ' पुत्र बोला— ‘ अतिसूक्ष्म बीज भगवन् ।’ पिता बोले– ' भाई, इसमें से एक को तोड़ो', पुत्र बोला- 'तोड़ा भगवन्' । पिता ने पूछा— ‘इसमें क्या देखते हो?' पुत्र ने कहा– 'हे भगवन् । मैं तो इसमें कुछ भी नहीं देखता । ' त होवाच यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽ- णिम्न एवं महान्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धत्स्व सोम्येति ॥2 ॥
पिता बोले— “हे सोम्य! वट के बीज में जिस सूक्ष्म तत्त्व को तुम नहीं देख रहे हो, हे सोम्य! उसी से यह इतना बड़ा बना है । तुम इस कथन में श्रद्धा रखो” । स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदः सर्वं तत्सत्यः स आत्मा तत्त्वमसि श्वेत- तो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥3 ॥
इति द्वादशः खण्डः ॥ “वह यह सूक्ष्म ( अणु- सा) आत्मा है, सारी सृष्टि उसी से व्याप्त है, वही सत्य है, वही आत्मा है, और श्वेतकेतु! वह आत्मा तुम्ही हो ' तब श्वेतकेतु बोला- ' और ज्यादा आप महानुभाव मुझे कहिए" । तब पिता बोले – “ठीक है । ” ( यहाँ बारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) त्रयोदशः खण्डः लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह तथा चकार त होवाच यद्दोषा लवणमुदकेऽबाधा अङ्ग तदाहरेति तद्भावमृश्य न विवेद ॥1 ॥
पिता ने कहा— ' ( रात को ) जल में नमक डालकर प्रातः काल उसे मेरे पास लाओ ( ) – “ "उसने श्वेतकेतु ने ऐसा ही किया । तब पिता ने कहा रात को जो नमक इसमें । ”,!उसे यहाँ लाओ । श्वेतकेतु ने पानी में उसे खोजा पर वह उसे पा न सका । डाला था भाई यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति चामेति कथमिति लवणमित्यन्तादाचामेति कथमिति मध्यादा- प्रास्यैस्तदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार लवणमित्यभि-तच्छश्वत्संवर्तते तहोवाचात्र वाव किल सत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैवकिलेति ॥2 ॥
पिता बोले— “हे वत्स! जैसे वह (नमक ) उसी में ( पानी में ही) समा गया है, तुम ऊपर से
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षष्ठोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 231 उसका आचमन करो । कैसा लगा? " पुत्र बोला-' खारा' । पिता बोले- “मध्यभाग से आचमन करो । कैसा लगा? ” पुत्र बोला- ' खारा' । पिता बोले–“ तल भाग से आचमन करो । कैसा लगा? ” पुत्र बोला–‘खारा' । पिता ने तब कहा- " अब उस जल को फेंककर मेरे पास आओ । ” पुत्र ने ऐसा ही किया । तब पिता ने कहा- " वह नमक हमेशा ही जल में रहता ही है । ” और भी कहा कि— “ऐसे ही ‘ सत्' यहाँ भी विद्यमान ही है । भले ही तुम उसे देख नहीं सकते, पर है तो वह यहाँ ही । ” स ह एषोऽणिमैतदात्म्यमिदः सर्वं तत्सत्यः स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥3 ॥
इति त्रयोदशः खण्डः ॥ " और वही यह अणु (सूक्ष्म ) आत्मा है, सभी उससे व्याप्त है, वही सत्य है, वही आत्मा है और श्वेतकेतु! तुम ही तो वह आत्मा हो ।" तब श्वेतकेतु बोला- “भगवन्! फिर से और ज्यादा मुझे बताइए । ” पिता बोले– “ अच्छा सोम्य! " ( यहाँ तेरहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * चतुर्दशः खण्डः यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षमानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत्स यथा तत्र प्राङ्वोदङ्वाऽधराङ्वा प्रत्यङ्वा प्रध्मायीताभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः ॥ 1 ॥
“हे सोम्य! जिस प्रकार गांधार देश में से आँखें बाँधकर लाए गए पुरुष को किसी निर्जन प्रदेश में छोड़ दिया जाए, और वहाँ पर वह पूर्व, पश्चिम, उत्तर या दक्षिण की ओर मुँह करके क्रन्दन करता है । वह कहता है कि “ मैं आँखें बाँधकर यहाँ लाया गया हूँ- मेरी आँखें बाँधकर मुझे यहाँ छोड़ दिया गया है । ” तस्य यथाभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद्ग्रामं पृच्छन् पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसम्पद्येतैवमेवेहा- चार्यवान् पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्य इति ॥2 ॥
उस पुरुष के बन्धन को खोलकर जैसे उससे कोई कहे— “इस दिशा में गन्धार देश है, इस दिशा में चलो । ” तो वह बुद्धिमान और समझदार पुरुष एक गाँव से दूसरे गाँव पूछते - पूछते गन्धार देश में पहुँच ही जाता है । उसी प्रकार इस लोक में आचार्यवाला मनुष्य ही सत् को जान सकता है । उसके लिए मोक्षप्राप्ति में उतनी ही देर लगती है जब तक कि वह देहबन्धन से मुक्त नहीं हो जाता । इसके बाद तो वह पुरुष मुक्त होते ही सत् को प्राप्त कर लेता है । स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदः सर्वं तत्सत्यः स आत्मा तत्त्वमसि श्वेत- केतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥3 ॥
इति चतुर्दशः खण्डः ॥
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232 उपनिषत्सञ्चयनम् “वही यह सूक्ष्मतम है, उसी से सब कुछ व्याप्त है, वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतु! वह आत्मा तुम ही हो । ” श्वेतकेतु बोला– “भगवन्! और भी आगे समझाइए ” । पिता बोले- “हाँ ठीक है सोम्य ।" ( यहाँ चौदहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) पञ्चदश: खण्ड: पुरुषः सोम्योतोपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति ॥1 ॥
“हे सोम्य! ज्वरादि से सख्त तपे हुए आदमी को सब सगे- सम्बन्धी, 'मुझे पहचानते हो? मुझे पहचानते हो? ' – ऐसा कहते हुए, उसे घेरकर बैठते हैं, तब उसकी वाणी मन में नहीं समा गई होती, मन प्राण में नहीं समाया होता, त्राण तेज में नहीं समाया होता, और तेज परमात्मा में नहीं समाया होता, तब तक वह पहचान पाता है । अथ यदाऽस्य वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ॥2 ॥
परन्तु, जब उसकी वाणी मन में, मन प्राण में, प्राण तेज में और तेज परमात्मा में समा जाता है, तब वह नहीं पहचान पाता । स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदः सर्वं तत्सत्यः स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥३ ॥
इति पञ्चदशः खण्डः ॥ "वह यह सूक्ष्मतम तत्त्व है, वह सर्व का स्रोत है, वह सत्य है, वह आत्मा है, हे श्वेतकेतु ” – “!! और तुम वही आत्मा हो । तब श्वेतकेतु बोला हे भगवन् और भी ज्यादा मुझे बताइए - ",! ” ” बोले ठीक है सोम्य । पिता ( यहाँ पंद्रहवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) षोडशः खण्डः पुरुष सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत्स्तेयमहार्षीत्परशुमस्मै तेति स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं तप- सन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णातिकुरुतेससोऽनृताभि- हन्यते ॥1 ॥ दह्यतेऽथ
“और हे सोम्य! किसी पुरुष को हाथ बाँधकर ( राजपुरुष ) “चोरी की है । इसके लिए कुल्हाड़ी तपाओ । अगर इसने ले आते हैं और कहते हैं— इसने चोर नहीं हूँ, तो जब वह तपी हुई कुल्हाड़ी को छुएगा तोचोरीवहकीजलकरहै, फिर भी झूठ बोलता है कि मैं मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा ।
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षष्ठोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 233 अथ यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्या- भिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥2 ॥
और यदि उसने चोरी नहीं की है, तो उसी से ही वह अपने आत्मा को सच्चा कर देता है । सत्याश्रयी वह अपनी आत्मा को सत्य से ढँककर तपी हुई कुल्हाड़ी को छूता है, तो वह नहीं जलता और मुक्त हो जाता है । स यथा तत्र नादाह्येतैतदात्म्यमिदः सर्वं तत्सत्यः स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्वास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥3 ॥
इति षोडशः खण्डः ॥ इति छान्दोग्योपनिषदि षष्ठोऽध्यायः ॥6 ॥
जैसे वह सत्याश्रयी पुरुष तप्त कुल्हाड़ी से नहीं जलता है, वैसे ही वह सत्यात्मक ही सब-कुछ है, वही सत् है, वही आत्मा है, और हे श्वेतकेतु! वह आत्मा तुम ही हो । तब श्वेतकेतु ने कहा भगवन्! मैं उस सत्यतत्त्व को समझ गया, समझ गया । ( यहाँ सोलहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) यहाँ छान्दोग्योपनिषद् में छठा अध्याय समाप्त हुआ ।
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234 उपनिषत्सञ्चयनम् अथ सप्तमोऽध्यायः प्रथमः खण्डः अधीहि भगव इति होपसपाद सनत्कुमारं नारदस्त होवाच यद्वेत्थ तेन मोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति स होवाच ॥1 ॥
एक बार नारद सनत्कुमार के पास गए और उनसे कहने लगे- "हे भगवन्! मुझे उपदेश दीजिए ” । तब सनत्कुमार ने उनसे कहा- "पहले तुम जो कुछ जानते हो वह कहो, बाद में उससे आगे की बात कहूँगा | ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदः सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यः राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्या सर्पदेवजन- विद्यामेतद्भगवोऽध्येमि ॥2 ॥
नारद ने कहा— “हे भगवन्! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और चौथा अथर्ववेद मैं जानता हूँ । इतिहापुराण रूप पाँचवाँ वेद, वेदों का वेद ( व्याकरण ), श्राद्धकल्प, गणितशास्त्र, दैव ( उत्पात ज्ञान ), निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, शिक्षा- कल्पादि ब्रह्म ( वेदांग ) विद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्प- देव- जन विद्या ( अर्थात् गारुडीमंत्र, नृत्य, संगीत, शिल्पादि सभी विद्याएँ) मैं जानता हूँ । सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छुतः ह्येव मे भगवदृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि तं मा भगवाञ्छोकस्य पारं तारयत्विति त होवाच यद्वै किंचैतदध्यगीष्ठा नामैवैतत् ॥3 ॥
“हे भगवन्! मैं केवल मंत्रवेत्ता ही हूँ, आत्मवेत्ता नहीं हूँ । मैंने आप जैसे लोगों से सुना है कि आत्मवेत्ता शोक को पार कर जाता है । और मैं तो शोक करता हूँ । हे भगवन्! कृपया मुझको शोक के पार लगा दीजिए । ” तब सनत्कुमार ने नारद से कहा- यह जो कुछ तुम जानते हो ( पढ़े हो ) यह सब नाम ही है ' नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः पित्र्यो राशिर्दैवो निधिर्वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्या ब्रह्म- विद्या भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या सर्वदेवजनविद्या नामैवैतन्नामो- पास्स्वेति ॥4 ॥
यह ऋग्वेद नाम ( सत् का एक नाम) है । यजुर्वेद, सामवेद और चौथा अथर्ववेद, पाँचवें वेद का स्वरूप इतिहास - पुराण, वेदों के वेद रूप व्याकरण, पितृविद्या, गणित, दैवविज्ञान, निधिशास्त्र,,,,,,, तर्कशास्त्र नीतिशास्त्र निरुक्त वेदांगविद्या भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या गारुड़ीमंत्रविद्या, ” (,, संगीतकला शिल्प आदि यह सभी विद्याएँ नाम हैं । नाम की उपासना करो । नृत्यविद्याहै कि जिस तरह विष्णुबुद्धि से प्रतिमा की पूजा की जाती है, उसी तरह तुम नामोंकहने का तात्पर्य यह की— ‘ यह ब्रह्म है' इस बुद्धि से उपासना करो ) । स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य यथाकामचारोभवति
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सप्तमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 235 यो नाम ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो नाम्नो भूय इति नाम्नो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥5 ॥
इति प्रथमः खण्डः ॥ ' यह नाम ब्रह्म है'– ऐसा समझकर जो उसकी उपासना करता है, वह जहाँ तक अर्थात् जिस देशकाल तक नाम की गति (विषय ) होती है, वहाँ तक अपनी इच्छानुसार जा सकता है । ” सनत्कुमार के ऐसा कहने पर नारद ने पूछा- "नाम से कोई बड़ा है क्या? " सनत्कुमार बोले— “ हाँ, नाम से बड़ा है । ” तब नारद बोले- "भगवन्! वह मुझे कहिए । " ( यहाँ पहला खण्ड पूरा हुआ । ) * द्वितीयः खण्डः वाग्वाव नाम्नो भूयसी वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयति यजुर्वेदः सामवेद- माथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यः राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाकाशं मनुष्याश्च चापश्च तेजश्च देवाश्च पशूश्च वयासि च तृणवनस्पतीञ्छ्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं च यद्वै वाङ्नाभविष्यन्न धर्मो नाधर्मो व्यज्ञापिष्यन्न सत्यं नानृतं न साधु नासाधु न हृदयज्ञो नाहृदयज्ञो वागेवैतत्सर्वं विज्ञापयति वाचमुपास्स्वेति ॥1 ॥
(हे नारद! ) वाणी नाम से बड़ी है । वाणी ही ऋग्वेद को समझती है । यजुर्वेद, सामवेद और चौथे अथर्ववेद को, पाँचवें इतिहासपुराण को, वेदों के वेद समान व्याकरण को, श्राद्धकल्प को, गणित को, भविष्यविद्या को, निधिविद्या को तर्कविद्या को, नीतिशास्त्र को, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, खगोलविद्या, सर्पविद्या, देवविद्या, मनुष्यविद्या को तथा स्वर्ग, पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज को तथा देवों, मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों को तथा घास, वनस्पतियों, हिंसक पशुओं को, कीट- जुगनू आदि से लेकर चींटी जैसे सब जन्तुओं को, धर्म, अधर्म, सत्य, असत्य, हृदयंगम पदार्थों या हृदय को अच्छे न लगने वाले पदार्थों को— सबको वाणी ही तो समझाती है । यदि वाणी नहीं होती तो धर्म या अधर्म समझाया नहीं जा सकता । सत्य- असत्य, भला-बुरा, हृदयंगम या अहृदयंगम-कुछ भी समझाया नहीं जा सकता । वाणी ही सब कुछ हमें समझाती है, इसलिए तुम वाणी की उपासना करो । ” 'स यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्वाचो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो वाचो भूय इति वाचो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥2 ॥
इति द्वितीयः खण्डः ॥ “जो वाणी को ब्रह्म समझकर उसकी उपासना करता है, वह जिस देश- काल तक वाणीबोले—की गति है, वहाँ तक अपनी इच्छानुसार गति कर सकता है । ” सनत्कुमार के ऐसा कहने पर नारद
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236 उपनिषत्सञ्चयनम् “जिस वाणी को ब्रह्म समझ कर उपासना करता है, उस वाणी से बड़ा कोई है क्या? ” सनत्कुमार बोले— “हाँ बड़ा है ही । " तब नारद बोले – “ भगवान् आप वही मुझे बताइए । ” ( यहाँ दूसरा खण्ड पूरा हुआ । ) तृतीयः खण्डः मनो वाव वाचो भूयो यथा वै द्वे वामलके द्वे वा कोले द्वौ वाक्षौ मुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नाम च मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते कर्माणि कुर्वीतेत्यथ कुरुते पुत्राश्च पशूश्श्चेच्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेत्यथेच्छते मनो ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म मन उपास्स्वेति ॥1 ॥
रखता (होहे, नारदवैसे ही! ) मनमन मेंवाणीवाणीसे औरबड़ा नामहै । जैसेदोनों कोईरहते अपनीहैं । पहलेमुट्ठी मनुष्यमें दो आँवलेमन में, दो बेर या दो बहेड़े मन्त्रपाठ करूँ ”, इसके बाद ही वह मन्त्रों को बोलता है । पहले सोचता है- " सोचता है कि— “मैं “ ” – ", वह कर्म करता है । मैं पुत्रों और पशुओं को प्राप्त करूँ पहले ऐसी मैं कर्म करूँ तभी पशुओं को प्राप्त करता है । "मैं इस लोक या उस लोक को प्राप्त करूँइच्छा करके ही वह पुत्रों और, " - ही वह उन्हें प्राप्त करता है । मन ही आत्मा है मन ही लोक, ऐसी पहले इच्छा करके करो । है मन ही ब्रह्म है अतः मन की उपासना स यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्मनसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो यो मनो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो मनसो भूय भवति भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥2 ॥ इति मनसो वाव
इति तृतीयः खण्डः ॥ “जो मन को ब्रह्म समझकर उसकी उपासना करता तक अपनी इच्छानुसार? ” आ-जा सकता है । ” सनत्कुमार– है, वह जहाँ तक मन की गति “है, वहाँ बड़ा कोई है क्या सनत्कुमार" ने उत्तर दिया “, के ऐसा" कहने पर नारद ने पूछा—“ मन से, आप वही मुझसे कहिए । हाँ है ही । तब नारद ने कहा— तब भगवान् ( यहाँ तीसरा खण्ड पूरा हुआ । ) चतुर्थः खण्डः संकल्पो वाव मनसो भूतान्यदा वै रयति तामु नाम्नीरयति नाम्नी मन्त्रासंकल्पयतेऽथएकं भवन्ति मन्त्रेषुमनस्यत्यथकर्माणिवाचमी-॥1 ॥ (हे नारद! ) संकल्प मन से बड़ा है
में वाणी बोलता है । वाणी को नाम ( शब्द । कोई भी पहले संकल्प करने के बाद ही सोचता है । बाद है, और मंत्रों में क्रिया की प्रेरणा निहित )हीरूपहै से। बाहर निकालता है, और उन्हीं शब्दों से मंत्र बनता तानि ह वा एतानि संकल्पैकायनानि संकल्पात्मकानि संकल्पे प्रति- ष्ठितानि समक्ऌपतां द्यावापृथिवी समकल्पेतां वायुश्चाकाशं च समक-
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सप्तमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( १ ) 237 ल्पन्तामापश्च तेजश्च तेषाः संक्लृप्त्यै वर्ष संकल्पते वर्षस्य संक्लृप्त्या अन्न संकल्पतेऽन्नस्य संक्लृप्त्यै प्राणाः संकल्पन्ते प्राणानाः संक्लृप्त्यै मन्त्रा संकल्पन्ते मन्त्राणाः संक्लृप्त्यै कर्माणि संकल्पन्ते कर्मणाश् संक्लृप्त्यै लोकः संकल्पते लोकस्य संक्लृप्त्यै सर्व संकल्पते स एष संकल्पः संकल्पमुपास्स्वेति ॥2 ॥
" मन, वाणी आदि सब संकल्प में ही लीन होनेवाले, संकल्पमय तथा संकल्प में ही रहनेवाले होते हैं । मानो स्वर्ग और पृथ्वी ने संकल्प किया हो, आकाश और पृथ्वी ने संकल्प किया हो, जल और तेज ने भी संकल्प किया हो— ऐसा लग रहा है । उन्हीं सबके संकल्प से ही मानो वर्षा बरसती है, वर्षा के संकल्प से अन्न होता है, अन्न के संकल्प से प्राण होता है, प्राण के संकल्प से मंत्र होते हैं, मन्त्रों के संकल्प से क्रियाएँ होती हैं, क्रियाओं के संकल्प से फल उत्पन्न होता है, फल के संकल्प से ही सारा जगत् संकल्प करता है । इस प्रकार संकल्प ही बड़ा है, इसलिए संकल्प को ही ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करो । स यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते क्लृप्तान्वै स लोकान् ध्रुवान् ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिध्यति यावत्सं- कल्पस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः संकल्पाद्भूय इति संकल्पाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥3 ॥
इति चतुर्थः खण्डः ॥ “संकल्प को ब्रह्म समझकर जो उसकी उपासना करता है, वह स्थायी, प्रतिष्ठित, पीड़ारहित लोकों को स्वयं में स्थिर, स्वयं में प्रतिष्ठित और स्वयं में व्यथारहित होकर प्राप्त करता है । जहाँ तक संकल्प की गति होती है वहाँ तक (उस देशकाल तक ) इस संकल्पब्रह्म के उपासक की भी इच्छानुसार गति होती है । ” सनत्कुमार ने ऐसा कहा । तब नारद बोले- "हे भगवन् संकल्प से भी कोई बड़ा है क्या? ” तब सनत्कुमार बोले— “हाँ, है ही ” तब नारद फिर बोले– “तो भगवान्, उसे आप मुझे कहिए । ” ( यहाँ चौथा खण्ड पूरा हुआ । ) * पञ्चमः खण्डः चित्तं वाव संकल्पाद्भूयो यदा वै चेतयतेऽथ संकल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥1 ॥
(हे नारद! ) चित्त ही संकल्प से बड़ा है । मनुष्य जब कुछ जानता है तभी संकल्प करता है, बाद में सोचता है, फिर बोलता है, उस बोलने में नाम बोले जाते हैं, उन नामों में शब्द इकट्ठे होते हैं और शब्दों में ( मंत्रों में ) क्रियाएँ रहती हैं । तानि ह वा एतानि चित्तैकायनानि चित्तात्मानि चित्ते प्रतिष्ठितानि तस्माद्यद्यपि बहुविदचित्तो भवति नायमस्तीत्येवैनमाहुर्यदयं वेद यद्वा अयं विद्वान्नेत्थमचित्तः स्यादित्यथ यद्यल्पविच्चित्तवान्भवति तस्मा
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238 उपनिषत्सञ्चयनम् एवोत शुश्रूषन्ते चित्तह्येवैषामेकायनं चित्तमात्मा चित्तं प्रतिष्ठा चित्त- स्वेति ॥2 ॥
ये संकल्पादि सब चित्त में ही समा जानेवाले, चित्त से ही उदित होनेवाले, चित्त में ही रहनेवाले हैं । अतः यदि कोई मनुष्य बहुत जाननेवाला होने पर भी चित्तवाला न हो तो लोग “उसमें कुछ भी नहीं है ” —ऐसा समझेंगे । भले ही वह विद्वान् और बहुत जाननेवाला क्यों न हो! परन्तु यदि वह कम जाननेवाला भले ही हो, किन्तु चित्तवाला ( भानवाला ) हो, तो लोग उसे सुनते हैं । अन्त में संकल्पादि सब चित्त में ही समा जाते हैं, चित्त से उत्पन्न होते हैं, चित्त में ही रहते हैं । अतः चित्त को ही ब्रह्म समझकर उसकी उपासना करो । स यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्ते चित्तान्वै स लोकान् ध्रुवान् ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिद्ध्यति यावच्चित्तस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवंश्चित्ताद्भूय इति चित्ताद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥3 ॥
इति पञ्चमः खण्डः ॥ “ जो मनुष्य चित्त को ही ब्रह्म समझकर उसकी उपासना करता है, वह नित्य, बुद्धियुक्त, स्थायी और पीड़ारहित लोकों को प्राप्त होता है और स्वयं भी नित्य, स्थिर, पीड़ारहित होता है । और जहाँ तक चित्त की गति हो सकती है, वहाँ तक वह अपनी इच्छानुसार जा सकता है । " सनत्कुमार के ऐसा कहने पर नारद ने कहा- "भगवन्, चित्त से बड़ा कोई है क्या? " तब सनत्कुमार ने कहा— “हाँ, चित्त से बड़ा है ” । तब नारद बोले- " आप भगवान्, मुझे इसका उपदेश दीजिए । ” ( यहाँ पाँचवाँ खण्ड पूरा हुआ) षष्ठः खण्डः ध्यानं वाव चित्ताद्भूयो ध्यायतीव पृथिवी ध्यायतीवान्तरिक्षं ध्यायतीव द्यौर्ध्यायन्तीवापो ध्यायन्तीव पर्वता ध्यायन्तीव देवमनुष्यास्तस्माद्य इह मनुष्याणां महत्तां प्राप्नुवन्ति ध्यानापादाशा इवैव ते भवन्त्यथ येऽल्पाः कलहिनः पिशुना उपवादिनस्तेऽथ ये प्रभवो ध्यानापादाशा इवैव ते भवन्ति ध्यानमुपास्स्वेति ॥1 ॥
(हे नारद! ) ध्यान चित्त से बड़ा है । ऐसा लगता है कि मानो पृथ्वी ध्यान करती हो, अन्तरिक्ष ध्यान कर रहा हो, स्वर्ग ध्यान कर रहा हो, जल ध्यान कर रहा हो, पर्वत भी मानो ध्यान कर रहे हों, देव और मनुष्य भी ध्यान कर रहे हों, ऐसा लगता है । इस लोक में मनुष्यों में जो महत्ता को,,करते हैं वे मानो ध्यान के अंश का ही लाभ पाते हैं । और जो क्षुद्र होते हैं वे तो प्राप्त चुगलीखोर, दूसरों को उनका दोष बतानेवाले होते हैं । पर जो शक्तिशाली ( समर्थ ) होते हैंझगड़ालू, वे भी, ध्यानांश के लाभ को ही प्राप्त करनेवाले होते हैं । अतः ध्यान को ब्रह्म मानकर उसकी उपासनाकरो । स यो ध्यानं ब्रह्मत्युपास्ते यावद्ध्यानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो ध्यानं ब्रह्मत्युपास्तेऽस्ति भगवो ध्यानाद्भूय इति भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्वितिइति षष्ठः खण्डः॥2 ॥ ॥ ध्यानाद्वाव