Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 281–290
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 281–290
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सप्तमोऽध्यायः ] 'छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 239 “ जो ध्यान को ब्रह्म समझकर उपासना करता है, वे उनकी स्वेच्छानुसार गति के अनुरूप उनके ध्यान की गति हो जाती है” । सनत्कुमार के इन वचनों को सुनकर नारद ने पूछा— “हे भगवन्! से बड़ा कुछ है क्या? ” सनत्कुमार बोले- “हाँ, है तो! ” नारद बोले– “तो भगवन्, ऐसे आपध्यानमुझे उसका उपदेश दीजिए । ( यहाँ छठा खण्ड पूरा हुआ । ) * सप्तम: खण्ड: विज्ञानं वाव ध्यानाद्भूयो विज्ञानेन वा ऋग्वेदं विजानाति यजुर्वेदःसामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यः राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्याः सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाकाशं चापश्च तेजश्च देवाश्च मनुष्याश्च पशूश्च वयासि च तृणवनस्पतीञ्छ्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं चान्नं च रसं चेमं च लोकममुं च विज्ञानेनैव विजानाति विज्ञानमुपास्स्वेति ॥1 ॥
(हे नारद! ) विज्ञान ध्यान से बड़ा है । विज्ञान से ऋग्वेद समझा जाता है । यजुर्वेद, सामवेद, चौथा अथर्ववेद, इतिहास- पुराण, व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातविद्या, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, व्युत्पत्तिशास्त्र, वेदविद्या, भूततंत्र, धनुर्विद्या, खगोलशास्त्र, सर्पविद्या, संगीतादि देवविद्या, मनुष्यविद्या आदि को समझा जाता है । तदुपरान्त देवों, मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों, घास-वनस्पतियों, हिंसक प्राणियों को, धर्म, अधर्म, सत्य, असत्य, अच्छे- बुरे को, मनोज्ञ या अमनोज्ञ पदार्थों को, अन्न, रस तथा इस लोक को और परलोक को - सभी को 'विज्ञान' द्वारा ही तो जाना जा सकता है इसलिए ‘ विज्ञान' को ही ब्रह्म समझ उसकी उपासना करो । स यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्ते विज्ञानवतो वै स लोकाञ्ज्ञानवतोऽभि- सिद्ध्यति । यावद्विज्ञानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति । यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो विज्ञानाद्भूय इति विज्ञानाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥2 ॥
इति सप्तमः खण्डः ॥ "इस प्रकार जो विज्ञान को ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करता है, वह विज्ञानवाले और ज्ञानवाले लोकों को प्राप्त करता है, और जहाँ तक विज्ञान की गति है, वहाँ तक वह अपनी इच्छा के अनुसार परिसरण कर सकता है ।" सनत्कुमार का यह कथन सुनकर नारद ने पूछा- "भगवन्, विज्ञान से भी बड़ा कोई है क्या? " सनत्कुमार ने कहा– “हाँ, है तो! ” तब नारद बोले— “ तो भगवन्, आप मुझे उसी का उपदेश दीजिए । ” ( यहाँ सातवाँ खण्ड पूरा हुआ । )
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240 उपनिषत्सञ्चयनम् अष्टम: खण्ड: बलं वाव विज्ञानाद्भूयोऽपि ह शतं विज्ञानवतामेको वलवानाकम्पयते स यदा बली भवत्यथोत्थाता भवत्युत्तिष्ठन्परिचरिता भवति परि- चरन्नुपसत्ता भवत्युपसीदन्द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवति बलेन वै पृथिवी तिष्ठति बलेनान्तरिक्षं बलेन द्यौर्बलेन पर्वता बलेन देवमनुष्या बलेन पशवश्च वयासि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपलीकं बलेन लोकस्तिष्ठतिं बलमुपास्स्वेति ॥1 ॥
(हे नारद! ) बल विज्ञान से बड़ा है । सौ विज्ञानवालों को एक ही बलवान कँपा देता है । वह यदि बलवान होता है तो उठ सकता है, उठकर सेवा कर सकता है, सेवा कर आचार्य के पास जा सकता है, देख सकता है, उपदेश सुन सकता है, सोच सकता है, जान सकता है, काम कर सकता है, कर्मफल भोग सकता है, बल से ही यह पृथ्वी टिकी है, बल से ही आकाश, स्वर्ग, पर्वत, देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, घास, वनस्पति, हिंसक पशु, कीड़े, जुगनू, चींटी तक के जन्तु सब स्थिर रह सकते हैं । समग्र जगत् बल से ही स्थिर रह सकता है । इसलिए ' बल' को ही ब्रह्म समझकर उसकी उपासना करो । स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद्भूय इति बलाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥2 ॥
इत्यष्टमः खण्डः ॥ "जो बल को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह जहाँ तक बल की गति है, वहाँ तक अपनी इच्छा अनुसार जा सकता है । ” सनत्कुमार का यह वचन सुनकर नारद बोले– “भगवन्! बल से कोई बड़ा है? ” सनत्कुमार बोले- “हाँ, है तो! ” नारद ने कहा- " तो फिर आप मुझे उसी का उपदेश दीजिए । ” ( यहाँ आठवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) नवमः खण्डः अन्नं वाव बलाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि दशरात्रीर्नाश्नीयाद्यद्यु ह जीवेदथवा- ऽद्रष्टाऽश्रोताऽमन्ताऽबोद्धाऽकर्ताऽविज्ञाता भवत्यथाऽन्नस्यायै भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाताद्रष्टा भवत्यन्नमुपास्स्वेति ॥1 ॥
(हे नारद! ) अन बल से बड़ा है, अतः यदि कोई दस रात तक खाए रहे तो वह देख नहीं सकता, सुन नहीं सकता, सोच नहीं सकता, समझ नहीं सकतानहीं और वह जीवित सकता, कुछ भोग नहीं सकता । पर यदि अन्न प्राप्त हो तो वह देख सकता है, सुन, कुछ कर नहीं सकता है, जान सकता है, काम कर सकता है, कर्मफल भोग सकता है । अतः अन्नसकता है, सोच से उपासना करो । की ब्रह्मभाव
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सप्तमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 241 स योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽन्नवतो वै स लोकान्पानवतोऽभिसिद्ध्यति यावदन्नस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽन्नाद्भूय इत्यन्नाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥2 ॥
इति नवमः खण्डः ॥ “जो इस प्रकार अन्न की ब्रह्मभाव से उपासना करता है, वह अन्नवाले और पानवाले लोकों को प्राप्त होता है । ” — सनत्कुमार का ऐसा वचन सुनकर नारद ने पूछा– “हे भगवन्! अन्न से बड़ा कोई है? ” सनत्कुमार ने कहा- " हाँ भाई! है ही । " तब नारद बोले- "तो आप भगवान्! उसके बारे में ही मुझे कहिए । " ( यहाँ नौवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * दशमः खण्डः आपो वावान्नाद्भूयस्तस्माद्यदा सुवृष्टिर्न भवति व्याधीयन्ते प्राणा अन्नं कनीयो भविष्यतीत्यथ यदा सुवृष्टिर्भवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं बहु भविष्यतीत्याप एवेमा मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्षं यद् द्यौर्यत्पर्वता यद्देवमनुष्या यत्पशवश्च वयासि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीट- पतङ्गपिपीलकमाप एवेमा मूर्ता अप उपास्स्वेति ॥1 ॥
(हे नारद! ) जल अन्न से बड़ा है । अत: जब अच्छी वर्षा नहीं होती तब ' अन्न कम होगा'– ऐसा समझ कर प्राण व्यथित होने लगते हैं, और जब वर्षा अच्छी होती है, तब ' बहुत अन्न होगा'-ऐसा समझकर प्राण आनन्दित हो जाते हैं । जल ही विविध मूर्त रूप धारण करके पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग, पर्वत, देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, घास, वनस्पति, हिंसक पशु, कीड़े, जुगनू और चींटी तक के जन्तु बनता है । इसलिए जल को ही ब्रह्म समझकर उसकी उपासना करो । स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्त आप्नोति सर्वान्कामास्तृप्तिमान्भवति यावदपां गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽपो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोद्धयो भूय इत्यद्भ्यो वा भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥2 ॥
इति दशमः खण्डः ॥ "जो पुरुष जल की ब्रह्मभाव उपासना करता वह सभी इच्छाओं को प्राप्त करता है । और तृप्त हो जाता है । ” सनत्कुमार का यह वचन सुनकर नारद बोले– “भगवन्! जल से बड़ा कोई है क्या? ” सनत्कुमार ने कहा-- "हाँ भाई! है तो सही । " तब नारद बोले– “हे भगवन्! आप मुझे उसी का उपदेश दीजिए ।" ( यहाँ दसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * एकादश: खण्ड: तेजो वावाद्भ्यो भूयस्तद्वा एतद्वायुमागृह्याकाशमभितपति तदाहुर्निशो- चति नितपति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाऽथापः सृजते तदेतदूर्ध्वाभिश्च तिरश्चीभिश्च विद्युद्भिराह्वादाश्चरन्ति तस्मादाहुर्विद्योतते 16 उ०प्र०
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242 उपनिषत्सञ्चयनम् स्तनयति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाऽथापः सृजते तेज उपास्स्वेति ॥1 ॥
( हे नारद! ) तेज जल से बड़ा है । यह तेज ही वायु को निगृहीत करके (निश्चल बनाकर) आकाश को सर्वत: तपाता है । इसीलिए लोग कहते हैं कि गरमी होती है, बड़ा ताप होता है, बरसात आएगी । तेज ही पहले अपने आपको दिखाकर बाद में जल को उत्पन्न करता है । ऊँची -सीधी और बाँकी विद्युत् के साथ गड़गड़ाहट होती है । इससे लोग कहते हैं कि बिजली चमकती है, गड़गड़ाहट होती है, वर्षा होगी ऐसा लगता है । तेज पहले अपने आपको बताकर बाद में जल को उत्पन्न करता है । अत: तेज की उपासना करो । स यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्ते तेजस्वी वै स तेजस्वतो लोकान्भास्वतो- ऽपहततमस्कानभिसिध्यति यावत्तेजसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवस्तेजसो भूय इति तेजसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥2 ॥
इत्येकादशः खण्डः ॥ “जो तेज की ब्रह्मबुद्धि से उपासना करता है वह तेजस्वी होकर तेजवाले और अन्धकार को दूर करनेवाले लोकों को प्राप्त करता है । और जहाँ तक तेज की गति है, वहाँ तक अपनी इच्छानुसार विचरण कर सकता है । ” सनत्कुमार के ऐसा कहने पर पर नारद ने पूछा-"भगवन्! तेज से बड़ा कोई है क्या? ” तब सनत्कुमार ने कहा– “हाँ भाई, है न? ” तब नारद ने कहा— “ तो इसी का आप भगवान्! मुझे उपदेश दीजिए । ” ( यहाँ ग्यारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) द्वादश: खण्ड: आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्रा- ण्यग्निराकाशेनाह्वयत्याकाशेन शृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायत आकाशमभिजायत आकाश- मुपास्स्वेति ॥1 ॥
(हे नारद! ) आकाश तेज से बड़ा है । सूर्य-चन्द्र दोनों तथा अग्नि, नक्षत्र और विद्युत्– ये सब आकाश में ही रहते हैं । आकाश है, इसीलिए किसी को बुलाया जा सकता है । आकाश है, इसीलिए सुना जा सकता है | आकाश में ही एक- दूसरे के साथ क्रीड़ा की जा सकती है । और आकाश में ही मनुष्य क्रीड़ा नहीं करता ( दुःख सहन करता है ) । प्राणी आकाश में ही जन्मता है, आकाश में ही बढ़ता है, इसलिए आकाश की ही ब्रह्मभाव से उपासना करो । स य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्त आकाशवतो वै स लोकान्प्रकाशवतोऽ- सम्बाधानुरुगायवतोऽभिसिध्यति यावदाकाशस्य गतं तत्रास्य कामचारो भवति य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव यथा- इत्याकाशाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥2 ॥ आकाशाद्भूय
इति द्वादशः खण्डः ॥
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सप्तमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 243 "जो कोई आकाश की ब्रह्मभाव से उपासना करता है, वह आकाश जैसे विस्तृत, प्रकाशवान और किसी भी प्रकार की बाधा न हो, ऐसे लोकों को प्राप्त करता है । और जहाँ तक आकाश की गति है, वहाँ तक वह अपनी इच्छानुसार विचरण कर सकता है ।” सनत्कुमार के ऐसा कहने पर नारद ने पूछा— ‘ “ आकाश से बड़ा कोई तत्त्व है क्या? ” तब सनत्कुमार ने कहा- " हाँ भाई, है तो । ” तब नारद बोले— “तो भगवन्? उसी को आप मुझे बताइये । ( यहाँ बारहवाँ खण्ड पूर्ण हुआ ।) * त्रयोदशः खण्डः स्मरो वावाकाशाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि बहव आसीरन्न स्मरन्तो नैव ते कंचन शृणयुर्न मन्वीरन्न विजानीरन् यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन् स्मरेण वै पुत्रान्विजानाति स्मरेण पशून् स्मरमुपास्स्वेति ॥1 ॥
(हे नारद! ) स्मरण आकाश से भी बड़ा है । क्योंकि यदि बहुत से मानव उपस्थित हों और वे कुछ याद न कर सकते हों, तो वे न कुछ सुन सकते हैं, न सोच ही सकते हैं । वे कुछ जान ही नहीं सकते । परन्तु, यदि वे स्मरण कर सकते हैं, तब एक- दूसरे को सुन सकते हैं, सोच सकते हैं, जान सकते हैं । स्मरण से ही पुत्रों को और पशु आदि को जाना जा सकता है । इसलिए स्मरण की ब्रह्मरूप से उपासना करो । स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत्स्मरस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः स्मराद्भूय इति स्मराद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥2 ॥
इति त्रयोदशः खण्डः ॥ “जो स्मरण की ब्रह्मबुद्धि से उपासना करता है, वह जहाँ तक स्मरण की गति है, वहाँ तक अपनी इच्छा के अनुसार रह सकता है । ” सनत्कुमार के ऐसा कहने पर नारद ने पूछा— “ भगवन्!! स्मरण से भी कोई बड़ा है क्या? " सनत्कुमार बोले— “हाँ है तो । ” तब नारद बोले— “ तो भगवन् मुझे इसका उपदेश दीजिए । ” (यहाँ तेरहवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) चतुर्दशः खण्डः आशा वाव स्मराद्भूयस्याशेद्धो वै स्मरो मन्त्रानधीते कर्माणि कुरुते॥1 ॥
पुत्राश्च पशूश्श्चेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छत आशामुपास्स्वेति है, कर्म करता (हे नारद! ) आशा स्मरण से बड़ी है । आशा से वर्धित स्मरण ही मंत्रोंकी इच्छाको पढ़ताकरता है । इसलिए है, पुत्रों को और पशुओं की इच्छा करता है । इस लोक की और परलोक आशा की ब्रह्मभाव से उपासना करो । स य आशां ब्रह्मेत्युपास्त आशयास्य सर्वे कामा: समृद्धन्त्यमोघाभवति यहास्या-आशां शिषो भवन्ति यावदाशाया गतं तत्रास्य यथाकामचारो
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244 उपनिषत्सञ्चयनम् ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आशाया भूय इत्याशाया वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥2 ॥
इति चतुर्दशः खण्डः ॥ “ जो आशा की ब्रह्मभाव से उपासना करता है, तो इस आशा से उसकी सभी कामनाएँ समृद्ध होती हैं | उसकी दी हुई आशिषें सफल होती हैं । जहाँ तक आशा की गति हैं, वहाँ तक वह अपनी इच्छानुसार रह सकता है " । सनत्कुमार के ऐसा कहने पर नारद ने पूछा- "भगवन्! आशा से भी बड़ा पदार्थ कोई है क्या? " सनत्कुमार ने कहा-–' “हाँ, है ही । " तब नारद बोले— “ हे भगवन् । तब उसी को आप मुझे कहिए । ” ( यहाँ चौदहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) पञ्चदश: खण्ड: प्राणो वा आशाया भूयान्यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्व समर्पितं प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥ 1 ॥
( हे नारद! ) प्राण ही आशा से बड़ा है । जिस तरह रथ के पहियों की नाभि में आरे लगे हुए होते हैं, इसी प्रकार इस प्राण में सारा जगत् अनुस्यूत हुआ है ( आधारित रहता है ) । प्राण अपनी शक्ति से ही चलता है, प्राण ही प्राण को देता है, प्राण के लिए देता है । प्राण ही पिता, माता, भाई, 1, आचार्य और ब्राह्मण है बहन सं यदि पितरं वा मातरं वा भ्रातरं वा स्वसारं वाचार्यं वा ब्राह्मणं वा किंचिद् भृशमिव प्रत्याह धिक्त्वाऽस्त्वित्येवैनमाहुः । पितृहा वै त्वमसि मातृहा वै त्वमसि भ्रातृहा वै त्वमसि स्वसृहा वै त्वमस्याचार्यहा वै त्वमसि ब्राह्मणहा वै त्वमसीति ॥2 ॥
यदि कोई पिता, माता, भाई, बहन, आचार्य या ब्राह्मण को न कहने योग्य कुछ बात कहे, तो उसके आसपास के लोग 'तुझे धिक्कार है' - ऐसा ही कहेंगे । और कहेंगे कि “ तू तो,,, ”,मातृघाती भ्रातृघाती बहन का हत्यारा या आचार्य का घातक है । पितृघाती अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणान् शूलेन समासं व्यतिषं दहेन्नैवैनं पितृहासीति न मातृहासीति न भ्रातृहासीति न स्वसृहासीति नाचार्य-ब्रूयुः हासीति न ब्राह्मणहासीति ॥3 ॥
परन्तु वही पुरुष मरे हुए (प्राण निकले हुए ) पिता आदि को शूल से एकत्रित ,भगिनीघातकसँड़से से इकट्ठा, आचार्यघातककरके अग्नि यामें जलाब्राह्मणघातकदेता है, नहींतो कोईकहताभी उसे पितृघातक, मातृघातक, करकेबन्धुघातकअर्थात् । प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीतिपश्यन्नेवं मन्वान एवं पवीत ॥4 ॥ ब्रूयान्ना- इति पञ्चदशः खण्डः ॥
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सप्तमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 245 इसीलिए ये सब ( माता- पिता आदि) प्राण के ही रूप हैं । प्राण को समझनेवाला मनुष्य, -, “ उसेअनुभवकहे करकेकि “ तुमसोचतोसमझज्यादाकरकेबोल मनदेतेमेंहोनिश्चय- तुमकरकेअतिवादीकह देताहो "हैतोकिउसेमैंकहनाही प्राणचाहिएहूँ । ”कि—अगर “कोईऐसाहाँ ", मैं वास्तव में अतिवादी हूँ । उसे इस तथ्य को स्वीकार कर लेना चाहिए । ( यहाँ पंद्रहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * षोडशः खण्डः एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति सोऽहं भगवः सत्येनाति- वदानीति सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सत्यं भगवो विजिज्ञास इति ॥1 ॥
इति षोडशः खण्डः ॥ "जोसत्य लिए ( पारमार्थिक सत्य के लिए, आत्म विज्ञान के लिए ) अतिवाद करता है वही सच्चा अतिवाद करता है अर्थात् निर्भयता से निश्चयपूर्वक बोल देता है ।" ऐसा सनत्कुमार ने कहा । तब नारद बोले— “भगवन्! मैं भी इस आत्मविज्ञान के लिए ही अतिवाद करता हूँ । ” तब सनत्कुमार बोले— “ पहले तो आत्मविज्ञान का वह सत्य ही समझ लेना चाहिए ।" तब नारद बोले— “ भगवन्! मैं उस सत्य को समझना चाहता हूँ । " ( यहाँ सोलहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) सप्तदश: खण्ड: यदा वै विजानात्यथ सत्यं वदति नाविजानन् सत्यं वदति विजानन्नेव सत्यं वदति विज्ञानं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति ॥1 ॥
इति सप्तदशः खण्डः ॥ (हे नारद! ) जब सत्य को अच्छी तरह से समझ लिया जाता है, तभी सत्य बोला जाता है । अच्छी तरह से सत्य को नहीं जानने वाला सत्य नहीं बोल सकता । सत्य को अच्छी तरह जाननेवाला ही सत्य बोलता है । सत्य के विशेषज्ञान को ही जानने की इच्छा करनी चाहिए है । तब नारद बोले-“भगवन्! उस विशेषज्ञान को जानने की मैं इच्छा करता हूँ । ( यहाँ सत्रहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * अष्टादश: खण्ड: यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति मतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥1 ॥
इत्यष्टादशः खण्डः ॥
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246 उपनिषत्सञ्चयनम् सनत्कुमार बोले — मनन करके (सोचकर के ) ही मनुष्य पदार्थ को ठीक-ठाक समझ सकता है । बिना सोचे वस्तु समझी नहीं जा सकती । मति ( मनन- विचार ) की ही जिज्ञासा करनी चाहिए । ” तब नारद बोले— “ भगवन्! मैं उस मति को ( मनन-विचार को ) जानने की जिज्ञासा करता हूँ । " ( यहाँ अठारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * एकोनविंशः खण्डः यदा वै श्रद्दधात्यथ मनुते नाश्रद्दधन्मनुते श्रद्दधन्नेव मनुते श्रद्धा त्वेव विजिज्ञासितव्येति श्रद्धां भगवो विजिज्ञास इति ॥1 ॥
इत्येकोनविंशः खण्डः ॥ " मनुष्य जब श्रद्धा करता है, तभी सोच सकता है । श्रद्धा किए बिना सोचता नहीं है । श्रद्धा करके ही सोचता है, श्रद्धा जानने की इच्छा करनी चाहिए ।" सनत्कुमार का यह कथन सुनकर नारद बोले— “ भगवन्! मैं श्रद्धा को जानना चाहता हूँ ” । ( यहाँ उन्नीसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * विंशः खण्डः यदा वै निस्तिष्ठत्यथ श्रद्दधाति नानिस्तिष्ठञ्छ्रद्दधाति निस्तिष्ठन्नेव श्रद्द- धाति निष्ठा त्वेव विजिज्ञासितव्येति निष्ठां भगवो विजिज्ञास इति ॥1 ॥
इति विंशः खण्डः ॥ “ मनुष्य जब निष्ठा ( एकाग्रता ) रखता है, तभी श्रद्धा रख सकता है, निष्ठा के बिना श्रद्धा नहीं रख सकता । निष्ठा रखते हुए ही श्रद्धा रखता है अतः निष्ठा की जिज्ञासा करनी चाहिए । ” सनत्कुमार का यह कथन सुनकर नारद बोले– “ भगवन्! मैं निष्ठा जानना चाहता हूँ । ” ( यहाँ बीसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * एकविंशः खण्डः यदा वै करोत्यथ निस्तिष्ठति नाकृत्वा निस्तिष्ठति कृत्वैव निस्तिष्ठति कृतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति कृतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥1 ॥
इत्येकविंशः खण्डः ॥ "मनुष्य जब इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह के लिए कोई कार्य करता है, तभी वह निष्ठा ( एकाग्रता) रख सकता है । इन्द्रियसंयम या मनोनिग्रह किए बिना श्रद्धा नहीं रख सकता । मनोनिग्रह और इन्द्रियसंयम करके ही श्रद्धा करता है " । सनत्कुमार के ऐसा कहने पर नारद ने " “! मैं इन्द्रियों और मन के निग्रह को जानना चाहता हूँ । कहा— भगवन् (यहाँ इक्कीसवाँ खण्ड पूरा हुआं । )
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सप्तमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 247 द्वाविंश: खण्ड: यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति नासुखं लब्ध्वा करोति सुखमेव लब्ध्वा करोति सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सुखं भगवो विजिज्ञास इति ॥1 ॥
इति द्वाविंशः खण्डः ॥ “ जब मनुष्य सुख प्राप्त करता है, तभी क्रिया करता है । सुख को प्राप्त किए बिना क्रिया नहीं की जाती । सुख प्राप्त किए जाने से ही मनुष्य क्रिया करता है । इसलिए सुख की जिज्ञासा करनी चाहिए । ” सनत्कुमार का यह कथन सुनकर नारद ने कहा - "भगवन्! मैं सुख को जानना चाहता हूँ ।” ( यहाँ बाईसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * त्रयोविंशः खण्डः यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति ॥1 ॥
इति त्रयोविंशः खण्डः ॥ सनत्कुमार ने कहा– “जो भूमा है (विशालता है ) वही सुख है, अल्प में ( कम में या संकुचितता में) सुख नहीं है इसलिए भूमा को ( विशालता का ) समझना चाहिए । " तब नारद बोले— “ हे भगवन्! मैं विशालता को समझना चाहता हूँ । " ( यहाँ तेईसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * चतुर्विंशः खण्डः यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यः स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नीति ॥1 ॥
सनत्कुमार बोले— “ जब मनुष्य किसी को अपने से अलग नहीं देखता, अलगअलगनहींदेखतासुनताहै,, अलग नहीं जानता, वही भूमा ( वही विशालता) है । जब मनुष्य दूसरे को अपने सेहै वह अमृत है और अलग सुनता है, अलग समझता है, वही अल्पता है ( संकुचितता है ) । जो वहभूमाभूमा किसमें प्रतिष्ठित जो अल्प है वह मर्त्य ( विनाशी ) है । " तब नारद बोले- “हे भगवन् यों! कहें कि वह अपनी महिमा है? ” सनत्कुमार ने कहा — वह अपनी महिमा में ही प्रतिष्ठित है, । अथवा में भी नहीं रहता । अर्थात् वह किसी पर भी आधारित नहीं है गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यं क्षेत्राण्यायतनानीिइति ॥2 ॥
नाहमेवं ब्रवीमि ब्रवीमीति होवाचान्यो ह्यन्यस्मिन्प्रतिष्ठित इति चतुर्विंशः खण्डः ॥
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248 उपनिषत्सञ्चयनम् इस जगत् में कुछ लोग गायों को और घोड़ों को ' महिमा' कहते हैं । हाथी, सोना, दास- दासियाँ, स्त्रियाँ, खेतीबाड़ी, घर इत्यादि को भी कुछ लोग ' महिमा' मानते हैं, पर मैं ऐसा नहीं कहता । मैं तो कहता हूँ कि ये बताए गए पदार्थ अन्य में अर्थात् भूमा में ही प्रतिष्ठित हैं, भूमा किसी में प्रतिष्ठित नहीं है । ( यहाँ चौबीसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) पञ्चविंशः खण्डः स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स पश्चात्स पुरस्तात्स दक्षिणतः स उत्तरतः स एबेद सर्वमित्यथातोऽहङ्कारादेश एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतोऽहमुत्तरतोऽहमेवेद सर्वमिति ॥1 ॥
“वह भूमा ही नीचे, ऊपर, आगे, पीछे, दाहिनी ओर, बाईं ओर- सब जगह पर है । वही यह सब कुछ है । अब इसके साथ अपना ऐक्य बताने के लिए ' मैं' के रूप में ( अहंकार के रूप में) आदेश किया जाता है कि मुझसे अन्य कुछ है ही नहीं । मैं ही नीचे, ऊपर, आगे, पीछे, दाहिनी ओर, बाईं ओर— जब जगह पर हूँ । मैं ही सब कुछ हूँ ।" अथात आत्मादेश एवात्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्ता- दात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदः सर्वमिति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराट् भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति । अथ येऽन्यथाऽतो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषाः सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥ 2 ॥
इति पञ्चविंशः खण्डः ॥ अब आत्मरूप से ही भूमा का आदेश किया जा रहा है । आत्मा ही नीचे, ऊपर, आगे, पीछे, दाईं ओर, बाईं ओर है — यह सब कुछ आत्मा ही है । कोई भी मनुष्य यदि ऐसा देखता है, सोचता है, समझता है, वह आत्मा में ही आनन्द मानता है, आत्मा के साथ ही खेलता है, आत्मा | ( ),आनन्द है वह स्वराट् स्वयं का राजा होता है वह लोक में स्वेच्छाविचरण ही उसकाजो आत्मा को निर्दिष्ट प्रकार से अन्यथा समझता है वह अन्यों के अधीन रहता है, करवह सकता है । पर, सकता ।में जाता है किसी भी लोक में वह अपनी इच्छानुसार जा नहीं विनाशी लोकों ( यहाँ पच्चीसवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) षड्विंशः खण्डः तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतआत्मत आशाऽऽत्मतःआविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतोस्मर आत्मत आकाश आत्मतस्तेजआत्मतःआत्मत प्राणआप मात्मतो ध्यानमात्मतश्चित्तमात्मतः संकल्प बलमात्मतो विज्ञान- त्मतो नामात्मतो मन्त्रा आत्मतः कर्माण्यात्मतआत्मतो मन आत्मतो वागा- एवेदः सर्वमिति ॥1 ॥